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Rath Yatra  - This is a famous temple festival of Orissa held at the Jagannath Temple of Puri. The festival takes place with three chariots or Raths in which the idol of Lord Jagannath, his sister Subhadra and brother Balbhadra is taken out in a procession to their summer temple for a week long festival. The ropes of the chariots or Rathas are pulled by devotees who gather in huge numbers from different places.

जगन्नाथ रथ यात्रा भगवान विष्णु के अवतार भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ पूरी मंदिर में आयोजित की जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार यह रथ यात्रा हर साल आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है।

 

जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा

उड़ीसा के पूरी में स्थित जगन्नाथ जी का मंदिर समस्त दुनिया में प्रसिद्ध है. यह मंदिर हिन्दुओं के चारों धाम के तीर्थ में से एक है. कहते है मरने से पहले हर हिन्दू को चारों धाम की यात्रा करनी चाहिए, इससे मोक्ष की प्राप्ति होती है. जगन्नाथ पूरी में भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण का मंदिर है, जो बहुत विशाल और कई सालों पुराना है. इस मंदिर में लाखों भक्त हर साल दर्शन के लिए जाते है. इस जगह का एक मुख्य आकर्षण जगन्नाथ पूरी की रथ यात्रा भी है. यह रथ यात्रा किसी त्यौहार से कम नहीं होती है, इसे पूरी के अलावा देश व विदेश के कई हिस्सों में भी निकाली जाती है.

जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा की कहानी

Jagannath Puri Rath Yatra Story In Hindi

इस रथ यात्रा से जुड़ी बहुत सी कथाएं है, जिसके कारण इस महोत्सव का आयोजन होता है. कुछ कथाएं मैं आपसे शेयर करती हूँ –

  • कुछ लोग का मानना है कि कृष्ण की बहन सुभद्रा अपने मायके आती है, और अपने भाइयों से नगर भ्रमण करने की इच्छा व्यक्त करती है, तब कृष्ण बलराम, सुभद्रा के साथ रथ में सवार होकर नगर घुमने जाते है, इसी के बाद से रथ यात्रा का पर्व शुरू हुआ.
  • इसके अलावा कहते है, गुंडीचा मंदिर में स्थित देवी कृष्ण की मासी है, जो तीनों को अपने घर आने का निमंत्रण देती है. श्रीकृष्ण, बलराम सुभद्रा के साथ अपनी मासी के घर 10 दिन के लिए रहने जाते है.
  • श्रीकृष्ण के मामा कंस उन्हें मथुरा बुलाते है, इसके लिए कंस गोकुल में सारथि के साथ रथ भिजवाता है. कृष्ण अपने भाई बहन के साथ रथ में सवार होकर मथुरा जाते है, जिसके बाद से रथ यात्रा पर्व की शुरुवात हुई.
  • कुछ लोग का मानना है कि इस दिन श्री कृष्ण कंस का वध करके बलराम के साथ अपनी प्रजा को दर्शन देने के लिए बलराम के साथ मथुरा में रथ यात्रा करते है.
  • कृष्ण की रानियाँ माता रोहिणी से उनकी रासलीला सुनाने को कहती है. माता रोहिणी को लगता है कि कृष्ण की गोपीयों के साथ रासलीला के बारे सुभद्रा को नहीं सुनना चाहिए, इसलिए वो उसे कृष्ण, बलराम के साथ रथ यात्रा के लिए भेज देती है. तभी वहां नारदजी प्रकट होते है, तीनों को एक साथ देख वे प्रसन्नचित्त हो जाते है, और प्रार्थना करते है कि इन तीनों के ऐसें ही दर्शन हर साल होते रहे. उनकी यह प्रार्थना सुन ली जाती है और रथ यात्रा के द्वारा इन तीनों के दर्शन सबको होते रहते है.

जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा इतिहास ( Jagannath Puri Rath Yatra History)-

कहते है, श्रीकृष्ण की मौत के पश्चात् जब उनके पार्थिव शरीर को द्वारिका लाया जाता है, तब बलराम अपने भाई की मृत्यु से अत्याधिक दुखी होते है. कृष्ण के शरीर को लेकर समुद्र में कूद जाते है, उनके पीछे-पीछे सुभद्रा भी कूद जाती है. इसी समय भारत के पूर्व में स्थित पूरी के राजा इन्द्रद्विमुना को स्वप्न आता है कि भगवान् का शरीर समुद्र में तैर रहा है, अतः उन्हें यहाँ कृष्ण की एक विशाल प्रतिमा बनवानी चाहिए और मंदिर का निर्माण करवाना चाहिए. उन्हें स्वप्न में देवदूत बोलते है कि कृष्ण के साथ, बलराम, सुभद्रा की लकड़ी की प्रतिमा बनाई जाये. और श्रीकृष्ण की अस्थियों को उनकी प्रतिमा के पीछे छेद करके रखा जाये.

राजा का सपना सच हुआ, उन्हें कृष्ण की आस्तियां मिल गई. लेकिन अब वह सोच रहा था कि इस प्रतिमा का निर्माण कौन करेगा. माना जाता है, शिल्पकार भगवान् विश्वकर्मा एक बढई के रूप में प्रकट होते है, और मूर्ती का कार्य शुरू करते है. कार्य शुरू करने से पहले वे सभी से बोलते है कि उन्हें काम करते वक़्त परेशान नहीं किया जाये, नहीं तो वे बीच में ही काम छोड़ कर चले जायेगें. कुछ महीने हो जाने के बाद मूर्ती नहीं बन पाती है, तब उतावली के चलते राजा इन्द्रद्विमुना बढई के रूम का दरवाजा खोल देते है, ऐसा होते ही भगवान् विश्वकर्मा गायव हो जाते है. मूर्ती उस समय पूरी नहीं बन पाती है, लेकिन राजा ऐसे ही मूर्ती को स्थापित कर देते  है, वो सबसे पहले मूर्ती के पीछे भगवान कृष्ण की अस्थियाँ रखते है, और फिर मंदिर में विराजमान कर देते है.

एक राजसी जुलूस तीन विशाल रथों में भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा का हर साल मूर्तियों के साथ निकाला जाता है। भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की प्रतिमा हर 12 साल के बाद बदली जाती है, जो नयी प्रतिमा रहती है वह भी पूरी बनी हुई नहीं रहती है. जगन्नाथ पूरी का यह मंदिर एकलौता ऐसा मंदिर है, जहाँ तीन भाई बहन की प्रतिमा एक साथ है, और उनकी पूजा अर्चना की जाती है.

जगन्नाथ पूरी रथ का पूरा विवरण (Jagannath puri rath yatra information)–

क्रमांक किसका रथ है रथ का नाम रथ में मौजूद पहिये रथ की ऊंचाई लकड़ी की संख्या
1. जगन्नाथ/श्रीकृष्ण नंदीघोष/गरुड़ध्वज/ कपिलध्वज 16 13.5 मीटर 832
2. बलराम तलध्वज/लंगलाध्वज 14 13.2 मीटर 763
3. सुभद्रा देवदलन/पद्मध्वज 12 12.9 मीटर 593

जगन्नाथ पूरी के रथ का निर्माण अक्षय तृतीया के दिन से शुरू हो जाता है. इसे हर साल नए तरीके से बनाया जाता है, इसे बनाने में कई लोग लगते है, फिर इसे सजाया भी जाता है.

 

  • जगन्नाथ(श्रीकृष्ण) का रथ – यह 45 फीट ऊँचा होता है, इसमें 16 पहिये होते है, जिसका व्यास 7 फीट का होता है, पुरे रथ को लाल व पीले कपड़े से सजाया जाता है. इस रथ की रक्षा गरुड़ करता है. इस रथ को दारुका चलाता है. रथ में जो झंडा लहराता है, उसे त्रैलोक्यमोहिनी कहते है. इसमें चार घोड़े होते है. इस रथ में वर्षा, गोबर्धन, कृष्णा, नरसिंघा, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान व रूद्र विराजमान रहते है. इसे जिस रस्सी से खींचते है, उसे शंखचुडा नागनी कहते है.
  • बलराम का रथ – यह 43 फीट ऊँचा होता है, इसमें 14 पहिये होते है. इसे लाल, नीले, हरे रंग के कपड़े से सजाया जाता है. इसकी रक्षा वासुदेव करते है. इसे मताली नाम का सारथि चलाता है. इसमें गणेश, कार्तिक, सर्वमंगला, प्रलाम्बरी, हटायुध्य, मृत्युंजय, नाताम्वारा, मुक्तेश्वर, शेषदेव विराजमान रहते है. इसमें जो झंडा लहराता है, उसे उनानी कहते है. इसे जिस रस्सी से खींचते है, उसे बासुकी नागा कहते है.
  • सुभद्रा का रथ – इसमें 12 पहिये होते है, जो 42 फीट ऊँचा होता है. इसे लाल, काले रंग के कपड़े से सजाया जाता है. इस रथ की रक्षा जयदुर्गा करता है, इसमें सारथि अर्जुन होता है. इसमें नंद्बिक झंडा लहराता है. इसमें चंडी, चामुंडा, उग्रतारा, वनदुर्गा, शुलिदुर्गा, वाराही, श्यामकली, मंगला, विमला विराजमान होती है. इसे जिस रस्सी से खींचते है, उसे स्वर्णचुडा नागनी कहते है.

इन रथों को हजारों लोग मिलकर खींचते है, सभी लोग एक बार इस रथ को खीचना चाहते है, क्यूंकि इससे उन्हें लगता है कि उनकी सारी मनोकामना पूरी होती है. यही वो समय होता है जब जगन्नाथ जी को करीब से देखा जा सकता है.

रथ यात्रा सेलिब्रेशन (Jagannath puri rath yatra celebration)–

रथ यात्रा गुंडीचा मंदिर पहुँचती है, अगले दिन तीनों प्रतिमा को मंदिर में स्थापित किया जाता है. फिर एकादशी थे ये वही रहते है. इस दौरान पूरी में मेला भरता है, तरह तरह के आयोजन होते है. महाप्रसाद की बितरी होती है. एकादशी के दिन जब इन्हें वापस लाया जाता है, उस दिन वैसे ही भीड़ उमड़ती है, उस दिन को बहुडा कहते है. जगन्नाथ की प्रतिमा अपने मंदिर के गर्भ में स्थापित कर दी जाती है. साल में एक बार ही एक प्रतिमा को उनकी जगह से उठाया जाता है.

रथ यात्रा का आयोजन देश विदेश के कई हिस्सों में होता है. भारत देश के कई मंदिरों में कृष्ण जी की प्रतिमा को नगर भ्रमण के लिए निकाला जाता है. विदेश में इस्कोन मंदिर के द्वारा रथ यात्रा का आयोजन होता है. 100 से भी ज्यादा विदेशी शहरों में इसका आयोजन होता है, जिसमें से मुख्य डबलिन, लन्दन, मेलबर्न, पेरिस, न्यूयॉर्क, सिंगापूर, टोरेन्टो, मलेशिया, कलिफ़ोर्निया है. इसके अलावा बांग्लादेश में रथ यात्रा का बहुत बड़ा आयोजन होता है, जो एक त्यौहार की तरह मनाया जाता है.

Year 2020 - Rath Yatra (23 July 2020)

Rath Yatra
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