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इस बार आषाढ़ मास के गुप्त नवरात्र 22 जून सोमवार से प्रारंभ हो रहे हैं और 29 जून तक चलेंगे। नवरात्रों में षष्ठी तिथि का क्षय है, अर्थात नवरात्र 8 दिन ही होंगे। यही नहीं इस अवधि में सिद्धि योग और वृद्धि योग इसे ओर भी शुभ बना रहे हैं। इस संयोग भरे गुप्त नवरात्र में की गई पूजा-अर्चना का विशेष लाभ प्राप्त होता है। नवरात्र का पर्व ऋतु परिवर्तन का भी सूचक है। यह गर्मियों से वर्षा ऋतु की यात्रा आरंभ होने का भी समय है। मौसम बदलने से और वर्षा होने से हर तरह के संक्रमण भी उत्पन्न होने लगते हैं।

इंदौर के ज्योतिषविद पंडित गिरिश व्यास ने बताया कि कोरोना वायरस जो दिसंबर 2019 में सर्दियों में आया था, अप्रैल की गर्मियों तक बना हुआ है। गुप्त नवरात्रों में होने वाले यज्ञों के प्रभाव से प्रभु भक्ति से इसका प्रकोप खत्म हो जाए, ऐसी भावना से मां की आराधना का बहुत यह सुन्दर समय है क्योंकि ऋतु परिवर्तन में किसी भी बीमारी का संक्रमण बढ़ता ही है। 22 जून सोमवार से विक्रम नवसंवत्सर 2077 की द्वितीय ऋतु की शुरुआत होगी। इसी दिन से आषाढ़ मास का गुप्त नवरात्र भी शुरू होगा। इस बार के संवत्सर का नाम प्रमादी है यानी इस वर्ष में प्रमाद, उन्माद, आलस्य, तनाव या अकारण चिंता हो सकती है।

घट स्थापना मुहूर्त

आषाढ़ मास के गुप्त नवरात्र पूजन का आरंभ घट स्थापना से शुरू हो जाता है। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन प्रात: स्नानादि से निवृत हो कर संकल्प किया जाता है। व्रत का संकल्प लेने के पश्चात मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोया जाता है। इसी वेदी पर घट स्थापित किया जाता है। घट के ऊपर कुल देवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन किया जाता है तथा "दुर्गा सप्तशती" का पाठ किया जाता है।

 

पाठ पूजन के समय अखंड दीप जलता रहना चाहिए। पंडित गिरीश व्यास बताते हैं कि घट स्थापना का समय 09 बजकर 45 मिनट से लेकर 11 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। यह सिंह लग्न में पड़ रहा है, अत: इस लग्न में पूजा तथा कलश स्थापना करना शुभ होगा। इसके पश्चात अभिजित मुहुर्त में भी कलश स्थापना की जा सकती है। अभिजीत मुहूर्त 12 बजकर 02 मिनट से लेकर 12 बजकर 56 मिनट तक है, जो ज्योतिष शास्त्र में स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना गया है।

मां दुर्गा के नौ रूप शैल पुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्घिदात्री माता हैं, जिनकी नवरात्र में पूजा की जाती है। साथ ही दस महाविद्या देवियां तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुनेश्वरी, छिन्नमस्ता, काली, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी हैं, जिनकी गुप्त नवरात्र में पूजा-उपासना की जाती है। यह नवरात्र पर्व तंत्र साधना करने वाले साधकों के लिए विशेष महत्व रखता है।

 

गुप्त नवरात्र तिथि

पहला नवरात्र, प्रथमा तिथि, 22 जून 2020, दिन सोमवार

दूसरा नवरात्र, द्वितीया तिथि 23 जुन 2020, दिन मंगलवार

तीसरा नवरात्र, तृतीया तिथि, 24 जून 2020, दिन बुधवार

चौथा नवरात्र, चतुर्थी तिथि, 25 जून 2020, दिन गुरुवार

पांचवां नवरात्र , पंचमी तिथि , 26 जून 2020, दिन शुक्रवार

छठा नवरात्रा, षष्ठी तिथि, 26 जून 2020, दिन शुक्रवार

सातवां नवरात्र, सप्तमी तिथि , 27 जून 2020, दिन शनिवार

आठवां नवरात्रा , अष्टमी तिथि, 28 जून 2020, दिन रविवार

नौवां नवरात्र नवमी तिथि 29 जुन 2020 दिन सोमवार

चैत्र नवरात्र में बन रहे हैं शुभ योग

इस बार ये योग एक साथ काफी वर्षों बाद आ रहे हैं। अतः ये गुप्त नवरात्र अधिक फलदायी होंगे। सिद्ध योग में मिलेगी सफलता। वक्री ग्रहों में रहेगी भगवती की आराधना। इस तरह से गुप्त नवरात्र में नौ में से छह ग्रह वक्री हैं। इन दिनों पूजा, उपासना और किसी कार्य को आरंभ करने में वक्री ग्रहों के प्रभाव को समाप्त करने की पूर्ण क्षमता होती है तथा भक्ती और तंत्र के लिये गुप्त नवरात्र काफी शुभ मानी जाते हैं।

 

22 जून द्वितीया तिथि के दिन वृद्धि योग है। इस दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का उत्तन फल मिलेगा।

26 जून को तृतीया तिथि के दिन भी सिद्धि योग रहेगा। इस दिन मां चंद्रघंटा की पूजा से उत्तम फल की प्राप्ति होगी।

अक्सर यह मान्यता रहती है कि नवरात्रों में बिना मुहूर्त देखे विवाह कर लिया जाए। मगर, इस वर्ष, 22 जून से 29 जून को अषाढ़ मास है और 01/07/2020 को देवशयनी एकादशी है। मान्यता है की देवशयन से पूर्व विवाह कर लेना ही उचित होता है। मगर, चातुर्मास के करण ऐसे मांगलिक कार्य नहीं हो सकेंगे।

 

कोरोना से मुक्ति सिंतबर से मिलने लगेगी

पंडित गिरिश व्यास ने बताया कि इस महामारी का प्रारम्भ 2019 के अंत में 19 दिसम्बर से हुआ है। दिसंबर मेंपड़ने वाले सूर्यग्रहण से बृहृत संहिता में वर्णन आया है कि कोई भी महामारी सूर्य ग्रहण से प्रारंभ होती है। यथा शनिश्चर भूमिप्तो स्कृद रोगे प्रपिडिते जनाः अर्थात जिस वर्ष के राजा शनि होते हैं, उस वर्ष में महामारी फैलती है।

 

नक्षत्रों के आधार पर भी हम देखेंगे कि 12 दिसंबर 2019 से राहू स्वयं अपने आर्दा नक्षत्र में आ गए थे। आर्द्रा नक्षत्र में जो बीमारी आएगी वो राहू संबंधी होगी जैसे सूखी खासी, फेफड़े आदि संबंधित आती है। परंतु राहू स्वयं कार्य नहीं करते, उन्हें किसी भी बीमारी को फैलाने के लिए किसी अन्य ग्रह की आवश्यकता पड़ती है। यहां 19 दिसंबर2019 को शनि महाराज, सूर्य के नक्षत्र में आए हैं और इस संवत्सर के स्वामी भी शनि हैं। वही दिन था, जब कोरोना वायरस का प्रकोप दुनियाभर में फैलना शुरू हो गया।

 

राहू का राहु के नक्षत्र से निकलकर मंगल के नक्षत्र में जाना, इस महामारी के डर से मुक्त होने का काल होगा। आर्थात 20 मई 2020 को राहू मंगल के नक्षत्र में प्रवेश कर चुके हैं। अब 25 सितंबर 2020 से केतु भी केतु के नक्षत्र से निकलकर जब बुध के नक्षत्र में प्रवेश करेंगे, वास्तव में सही उपचार तब ही हमें प्राप्त होगा। इसके साथ ही शनी भी सूर्य के नक्षत्र से निकलकर चंद्रमा के नक्षत्र में आएंगे, तो वह कोरोना समाप्ति का काल होगा यानी 27 जनवरी 2021 तक यह बीमारी खत्म हो जाएगी।

 

कोरोना वायरस की मुक्ति के लिए हम मां भगवती की आराधना बड़े भक्ति भाव से करें, तथा सुख, स्वास्थ्य संबंधी लाभ हमें प्राप्त हों, इस कामना से भगवती की अपने घरों में घट स्थापना कर पूजा-अर्चना करें।

Gupt Navratri 2020 : गुप्त नवरात्र का आज पहला दिन
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