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ईश्वर को जानने की प्रक्रिया है ध्यान

 

         ईश्वर को पाना संभव है। उन्हें कर्मयोग के माध्यम से जाना जा सकता है। अगर ईश्वर को जानना है और उन्हें पाना है, तो उन्हें अपने हृदय में पहले स्थान पर रखना होगा। उन्हें बिना किसी स्वार्थ के पुकारना होगा। इस स्थिति तक पहुंचने के लिए ध्यान सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। कर्म, ज्ञान व भक्ति को संयुक्त और संतुलित करने की प्रक्रिया है ध्यान:-

सर्वप्रथम आपको ईश्वर की एक सही धारण रखनी चाहिए, एक निश्चित विचार, जिसके द्वारा आप उनके साथ एक संबंध स्थापित कर सकें। तत्पश्चात् आपको ध्यान एवं प्रार्थन तब तक करनी चाहिए, जब तक कि आपकी मानसिक धारणा वास्तविक प्रत्यक्ष बोध में न बदल जाए। तब आप उन्हें जान पाएंगे। अगर आप दृढ़ता से डटे रहेंगे, तो ईश्वर अवश्य आएंगे। सबके हृदय को को जानने वाले प्रभु केवल आपके सच्चे प्रेम को चाहते हैं। वे एक छोटे बच्चे की भाँति हैं, उनको कोई आनी सारी संपत्ति भेंट कर सकता है और व उसे नहीं चाहते और दूसरा कोई उनको पुकारता है, ‘हे प्रभो! मैं आपको प्रेम करता हूँ! और उस भक्त की पुकार पर उसके हृदय में वे दौड़े चले आते हैं।

ईश्वर को किसी बाह्य उद्देश्य से न खोजें, अपितु उनसे निःशर्त्त, एक लक्षित अविचल भक्ति से प्रार्थना करें। जब प्रभु के लिए आपका प्रेम इतना अधिक हो जाए, जितना कि अपनी नश्वर देह के प्रति आसक्ति, तब वे आपके पास आ जाएंगे।

ईश्वर की खोज में भक्ति का महत्व कर्म से अधिक है। कुछ लोग कहते हैं, ‘ईश्वर शक्ति हैं, अतः हमें भी शक्ति के साथ कर्म करना चाहिए।’ जब आप अपने हृदय में ईश्वर को सर्वोच्च स्थान देते हुए अच्छे कर्म करने में सक्रिय होते हैं, तो इस प्रकार आप उनको अनुभव कर सकेंगे। परंतु अच्छा करने में भी गलत और सही, दोनों प्रकार के कर्म होते हैं। एक उत्साही पादरी, जो अपनी सभा में अधिक से अधिक लोगों को केवल अपने अहम को संतुष्ट करने के लिए आकर्षित करता है, वह इस कर्म के द्वारा ईश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकता। दिव्य अन्तर्निवासी की उपस्थिति को अनुभव करने की इच्छा प्रत्येक हृदय में प्रथम स्थान पर होनी चाहिए।

जब आपके प्रत्येक कार्य निरंतर, निःस्वार्थ भाव से और प्रेम प्रेरित ईश्वर चिंतन के साथ करेंगे, तब वे आपके पास आएंगे। तब आपको अनुभव होगा कि आप जीवन-रूपी सागर हैं, जो प्रत्येक जीवन-रूपी छोटी लहर में बदल गए हैं। यही कर्मयोग के द्वारा ईश्वर को जानने का तरीका है। 

जब आपके मन में प्रत्येक कार्य करने से पहले, कार्य करने के दौरान और कार्य पूरा करने के बाद प्रभु का विचार बना रहे, तब वे स्वयं आपको दर्शन देंगे। आपको कार्यरत रहना होगा, परंतु ईश्वर को अपने माध्यम से कार्य करने दें, यह भक्ति का सबसे अच्छा पक्ष है। यदि आप निरंतर यह सोच रहे हैं कि वे आपके पैरों द्वारा चल रहे हैं, आपके हाथों के द्वारा कार्य कर रहे हैं, आपकी इच्छाशक्ति के माध्यम से कार्य संपादित कर रहे हैं, तब आप उन्हें जान लेंगे। आपको विवेक भी विकसित करना चाहिए, ताकि आप ईश्वर चिंतन के बिना किए गए कार्यों की अपेक्षा आध्यात्मिक रूप से रचनात्मक एवं ईश-चेतना से युक्त हर कार्य करने को प्राथमिकता दें।

 

श्रेष्ठतर कर्म है ध्यान:-

परंतु कर्म, भक्ति अथवा ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठतर है। सच्चाई से ध्यान करने का अर्थ है-केवल ब्रह्म पर एकाग्र होना। यह अंतरंग ध्यान है। यह उच्चतम प्रकार का कर्म है, जिसे मानव कर सकता है और यह ईश्वर को पाने का अत्यधिक संतुलित मार्ग है। यदि आप हर समय कार्य करते रहें, तो आप यंत्रवत् बन सकते हैं और अपने कर्त्तव्यों की व्यस्तता में उन्हें भूल सकते हैं। यदि उन्हें केवल विवेक द्वारा खोजें, तो आप असंख्य तर्कों की भूलभुलैया में उसे खो देंगे; और यदि आप केवल ईश्वर की भक्ति करते हैं, तो आपका विकास मात्र भावनात्मक हो सकता है। परंतु ध्यान इन सब पद्धतियों को संयुक्त और संतुलित करता है।

केवल प्रभु के लिए कार्य करें, भोजन करें, चलें, हंसे, रोएं और ध्यान करें। जीने का यही सर्वोत्तम रीति है। इस प्रकार, उनके लिए सेवा करके, उनसे प्रेम करके और उनके साथ वार्तालाप करके आप वास्तव में प्रसन्न रहेंगे। जब तक आप अपनी इच्छाओं और भौतिक शरीर की कमजोरियों को अपने विचारों और कार्यों पर नियंत्रण करने देंगे, तब तक आप उन्हें नहीं पा सकेंगे। सदा अपने शरीर के स्वामी बने रहें। जब आप मंदिर या चर्च में बैठते हैं, तो हो सकता है आप कुछ भक्ति और विवेकशील ज्ञान का अनुभव करें, परंतु वह पर्याप्त नहीं है। यदि आप उनकी उपस्थिति के प्रति वास्तव में सचेत रहना चाहते हैं, तो ध्यान की अंतरंग क्रिया आवश्यक है।

आप ऐसा सोच सकते हैं कि दो घंटे के ध्यान के पश्चात् मैं बुरी तरह उकता जाता होऊंगा। नहीं, मुझे इस संसार में अपने प्रभु के समान मतवाला कर देने वाला और कुछ नहीं मिला। जब मैं अपनी आत्मा की उस परिपक्व मदिरा का पान करता हूँ, तो मेरा हृदय आकाशतुल्य असीम आनंद से स्पन्दित होने लगता है। दिव्य आनंद प्रत्येक व्यक्ति में है। कोयले और हीरे पर सूर्य का प्रकाश एक समान चमकता है, परंतु हीरा प्रकाश को परावर्तित करता है। ऐसे ही वे पारदर्शी मन हैं, जो ब्रह्म को जानते हैं और परावर्तित करते हैं। इसी प्रकार, ध्यान की अंतरंग क्रिया में आप ईश्वर को जानने रहस्य का समाधान पाते हैं।

                                   --- श्री श्री परमहंस योगानदं

(योगदा सत्संग सोसायटी ऑफ इंडिया के सौजन्य से)

 

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