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साधकों/उपासकों द्वारा नवरात्र के पूजन में की जाने वाली सामान्य भूलें

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इस पेज पर मैं कुछ और लिखना चाह रहा था, जैसे पूजन के सामान्य नियम या कोई लेख इत्यादि। किंतु इस अति गंभीर विषय पर अचानक माता जगदम्बा ने मुझे लिखने के लिए संकेत दिया। यह विचार मेरे मन में बहुत दिनों से थी, कि इस पर चर्चा की जानी चाहिए। आमतौर पर नवरात्र के पूजन में अनजाने में ही सही, भक्तों द्वारा कुछ बहुत बड़ी गलतियाँ हो जाती हैं, जिसकी उन्हें जानकारी नहीं होती है। मैं अपने अनुभव एवं अपने ज्ञान तथा तर्क शक्ति के आधार पर इस महत्वपूर्ण विषय पर लिख रहा हूँ। आशा है आप सभी वास्तविक साधक/उपासक इस पर गंभीरता से विचार करेंगे। अगर आपको उचित लगे तो अपने नियमों में बदलाव कर सकते हैं, नहीं तो आप अपनी परम्परा का पालन अपने विचार से कर सकते हैं।

1.            नवरात्र में छः दिनों तक (षष्ठी तक) देवी की प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमा का चेहरा ढंक देना और उनकी पूजा रोक देना :- यह अनजाने में एक बहुत बड़ी गलती अधिकतर साधक या मंदिरों के पुजारी कर बैठते हैं। आमतौर पर हमारे आस-पास जो पंडित महाशय हैं, वे केवल परम्परावश मिट्टी के मूर्ति की पूजा करने के नियम जानते हैं और जैसा कि वे अपने बाप-दादों से सीखते चले आएं हैं कि सप्तमी के दिन माता का पट खुलता है, तो बस इसी नियम के सहारे मंदिरों में पहले से प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमा को कपड़े से ढंक देते हैं और उनकी पूजा रोक कर केवल कलश की पूजा करते रहते हैं। मैं एक बात आपसे पूछता हूँ। किसी भी व्यक्ति अथवा प्राणी को उसकी जिंदगी में कितने बार प्राण शरीर में आता है, बस केवल एक बार। किसी भी जीवधारी के शरीर में प्राण केवल एक बार आता है और एक बार निकल जाता है। इसका कोई विकल्प नहीं है। क्या कोई दावा कर सकता है कि वह जब चाहे अपने शरीर से प्राण निकाल लेता है और जब चाहे वापस बुला लेता है। बस यही बात प्राण-प्रतिष्ठित धातु या पत्थर की प्रतिमाओं के बारे में है। उनमें भी बस केवल एक बार ही प्राण प्रतिष्ठा होता है अथवा मात्र एक बार ही विसर्जन होता है। ऐसा पूजन का कोई नियम नहीं है कि रोज-रोज किसी प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा अथवा विसर्जन किया जाय। शास्त्रों में प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति की पूजा रोके जाने का हर प्रकार से निषेध किया गया है। जब बहुत आपत्ति काल हो, जैसे कि घर में कोई सूतक हो जाए, या केदारनाथ जैसी कोई प्राकृतिक आपदा तब अलग बात है। आप किसी भी शक्तिपीठ में चले जाओ, जैसे कामाख्या, विन्ध्याचल, वैष्णोदेवी, तारा शक्तिपीठ, कालीघाट, मैहर इत्यादि कहीं भी माता का पट बंद नहीं किया जाता, बल्कि भक्तों को पूजन के लिए और भी समय मिले इसके लिए मंदिर का पट बंद करने का समय भी बढ़ा दिया जाता है और अहले सुबह ही मंदिर को खोल दिया जाता है। पर यहाँ के पंडितों में बिना चिंतन किए केवल देखा-देखी ऐसा ही होता है,  कर दिया। एक बात पूछता हूँ। और किसी देवता के तो पट बंद नहीं किए जाते, फिर नवरात्र में देवी की प्रतिमा के ही क्यों? हाँ, कामाख्या में केवल अम्बुवाची पर्व के अवसर पर मंदिर के कपाट बंद किए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि उस समय माता रजस्वला होती है, इसलिए। कलश स्थापना एवं उसका पूजन तो प्रतिमा के स्थापित होने का प्रथम क्रिया विधि मात्र है। और जब मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठित होकर बैठ गयी, देवी अपने संपूर्ण स्वरूपों में भक्तों को दर्शन देने के लिए तत्पर है तो फिर कलश का महत्व गौण हो जाता है। कलश प्रतीक है अखिल ब्रह्माण्ड के पूजन का। जहाँ मूर्ति पूजा का निषेध रहता है, वहाँ कलश पर ही पूजा की जाती है। जैसे रजरप्पा में छिन्नमस्तिका देवी के मंदिर के परिधि के 50 किमी0 के गाँव। भगवती छिन्नमस्तिका अत्यंत प्रचण्ड महाशक्ति हैं, महाविद्या हैं। जब ये चलती हैं, उससे बहुत पहले ही भगवती दुर्गा, काली जैसी शक्तियाँ जा चुकी होती हैं। माता छिन्नमस्तिका के आगे कोई शक्ति पिण्ड धारण नहीं कर पाती है। अतः वहाँ के आस-पास के गाँवों में किसी भी देवी की प्रतिमा स्थापित नहीं होती और सभी पूजन केवल कलश पर ही संपन्न किए जाते हैं। आपकी जानकारी हेतु बता दूं कि छिन्नमस्तिका शक्ति वहीं पर क्रियाशील हो पाती है,  जो एकलिंग स्थान हो, अर्थात् 50 किमी0 के एरिया में मात्र एक शिवलिंग रहे, तो वह एकलिंग स्थल कहलाता है। पुराने रजरप्पा में यह विशेषता थी। परशुराम जी की तपस्या स्थली है। आशा है कि मेरे इस लेख को पढ़कर, विचार को जानकर इस बार इस गलती को नहीं दुहराएंगे। चलिए मान लिया कि ऐसी परम्परा रही है और मंदिरों को सप्तमी तक अनावश्यक भीड़ से बचाने के लिए भी अगर ऐसा किया जाता है तो यह निवेदन करना चाहूंगा कि केवल प्रतिमा के आगे पर्दा कर दें और प्रतिमा को न ढंके। जैसा हमेशा करते आए हैं उसी प्रकार नवरात्र के दिनों में भी पहले से प्रतिष्ठित प्रतिमा की पूजा-अर्चना करते रहें। और हाँ, अगर पूजा रोकना ही चाहते हैं तो पहले प्रतिमा को किसी पवित्र नदी या सरोवर में डूबा कर पुनः निकाल लें और विसर्जन का मंत्र पढ़कर साल भर पूजा रोक दें और पुनः उसे सप्तमी के दिन प्राण-प्रतिष्ठा कर के पूजा करें। धातु या पत्थर की स्थायी प्रतिमा के विसर्जन का यही तरीका शास्त्रों में बताया गया है।

2.            कलश में दीपक के लौ को  इधर-उधर करना, उसकी दिशा बदलना :- क्या करें, हमारे अधिकतर पंडित महाशय और भक्त लोग थोड़ा वास्तुशास्त्र ज्यादा पढ़ लिए हैं। बस पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण में अटके रहते हैं। कलश में जो आप नवरात्र के नौ दिनों में जलने वाले अखण्ड लौ की व्यवस्था करते हैं, वह केवल प्रकाश देने के लिए दीपक की लौ नहीं है, बल्कि वह प्रतीक है माता ज्वाला देवी का। देवी का वास अग्नि में माना गया है। तत्वों के निरूपण में देवी अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करती है। अखण्ड दीपक द्वारा हम आदिशक्ति से यह प्रार्थना करते हैं कि हे माँ जगदम्बा! नवरात्र के पूरे नौ दिन इस ज्वाला के रूप में आप हमारे पूजन स्थल पर विराजमान रहें। लेकिन कुछ भक्त लोग सुबह में पूर्व दिशा की तरफ तो शाम मे उस दीपक का मुँह पश्चिम की तरफ कर देते हैं और अखण्ड लौ को चलायमान कर देते हैं। एक तो शक्ति वैसे ही गामिनी है, चंचला है, उस पर भी  आप और उसे इधर से उधर करते हो। अखण्ड दीपक का नियम यह है कि जिस दिशा की तरफ ज्वाला प्रतिष्ठापित की गयी है, पूरे साधना काल में उसी तरफ जलेगी, चाहे वह कोई भी दिशा हो। सबसे अच्छा तो यह होता है कि दीपक का लौ ऊध्र्वगामी हो, ऊपर की तरफ जले। इससे दिशाओं का चक्कर नहीं रहेगा। अन्यथा देवी के प्रतिमा की तरफ ही दीपक का लौ रहना चाहिए।

3.            हवन कुण्ड में जौ बोना :- यह एक बहुत बड़ी गलती आमतौर पर साधक लोग कर बैठते हैं। इस जौ बोने को वे केवल अच्छे दिखने के लिए एक शो-पीस मात्र समझते हैं कि हरा-हरा लगेगा। लेकन यह एक बहुत बड़ी गलती है। देवी की पूजा में, नवरात्र में मिट्टी में जौ क्यों बोए जाते हैं, इसका कारण, इसकी व्याख्या आपको दुर्गा तंत्र में नहीं मिलेगा, बल्कि बहुत-दूर इसे कामकला काली तंत्र एवं गुह्य काली तंत्र तक ले जाना पडे़गा। वास्तव में जनन का महाविज्ञान है। प्रकृति की वह पूजा है, जिसमें आदि शक्ति प्रथम गर्भ धारण करती है। आप इतिहास पढ़ें। सिंधु घाटी सभ्यता में, आर्यों के आगमन से भी पहले, एक मिट्टी की मूर्ति मिली है, जिसे प्रकृति देवी की संज्ञा दी गयी है, जिसमें दिखाया गया है कि प्रतिमा के नाभी से एक वृक्ष निकल रहा है और देवी उसे हाथों में पकड़ कर रक्षा प्रदान कर रही है। यह अंकुरित जौ प्रतीक है कामदेव का, सृजन के महाविज्ञान का। इसे तंत्र शास्त्रों में मदन रोपण अथवा कामदेव आरोहन कहा जाता है। गुह्य काली तंत्र में जब आप जाएंगे तो वहाँ स्पष्ट उल्लेख है कि पंक में अन्न का रोपण करें और उस पर विभिन्न प्रकार से सृजन के आदिस्रोत कामदेव का पूजन करें। अंत में इस का एक भाग देवी गुह्यकाली को प्रस्तुत किया जाता है। पहले कामदेव का पूजन होता है, तब देवी की। और आप हवनकुण्ड में इस जौ को रोपकर अग्नि द्वारा उसे जला देते हैं। यह अंकुरित अन्न जलने का प्रतीक है आप सृजन कार्य, पालन कार्य को संहार में परिणत कर रहे हैं। यह कामदेव परम पुरुषत्व का प्रतीक है। पुरुषत्व का अर्थ केवल आप बच्चे पैदा करना नहीं समझ लें। बल्कि पुरुषत्व का यह तो अत्यंत निचला स्तर मात्र है, केवल शरीर के तल पर। पुरुषत्व की भावना बहुत व्यापक है। इसे मैं इन कम पृष्ठों पर अभी नहीं समझा सकता। वह एक अलग विषय हो जाएगा। यह कामदेव देवी को बहुत ही प्रिय है। यही कारण है कि अधिकतर साधकों में समय से पहले वृद्धावस्था आ जाती है। जब कुछ प्राप्त करने का समय आता है, तो सब कुछ छोड़कर जाने की बात करने लगते हैं। पुरुषत्वहीन हो जाते हैं। क्यों,  क्योंकि तंत्र उपासना के प्रथम केन्द्र बिंदु को जला देते हैं। याद करें कि शिव कामदेव का दहन करते हैं, लेकिन माता शक्ति पुनः उसे जीवन प्रदान करती है और पूरे संसार में व्याप्त कर देती है। और यह आदेश देती है कि बिना मदन आरोहण किए मेरी पूजा अधूरी रहेगी। जौ रोपा जाता है, कलश के नीचे और उसे लगातार जीवन दायिनी जल प्रदान किया जाता है। जिस प्रकार गर्भ में शिशु का विकास होता है, उसी प्रकार ऊपर बीज और कलश के अंदर से आया जल उसे जीवन प्रदान करता है। ऊपर रोपा गया बीज शिव की कृति है और उसमें जीवन प्रदान करती हैं, माता शक्ति। यही रहस्य है, जीवन का। नहीं तो शक्ति के अभाव में शिव तो शव मात्र है।

4.            गोबर के गणेश जी स्थापित करना :- एक बात का जवाब दें, आप 33 हजार या मात्र 11 हजार वोल्ट/मेगावाट की बिजली गुजारना चाहते हों और उसके लिए सामान्य सा प्लास्टिक तार इस्तेमाल करें, तो क्या यह तार उस करंट के झटके को सह पाएगा। आपको बिजली मिल पाएगी। बस यही बात है, आप महाशक्ति की आराधना करते हो, उनको प्रचण्ड रूप में प्राप्त करना चाहते हो और उनको झेलने के लिए एक गोबर की पिण्डी मात्र रख देते हो, जिसमें अष्टमी-नवमी आते-आते कीड़े लग जाते है। याद रखें शक्ति की पूजा के साईड इफेक्ट बहुत होते हैं। इसका झटका सर्वप्रथम गणपति गणेश ही झेलते हैं। गणपति तत्व के अभाव में शक्ति विनाशक भी हो जाती है। पुत्र को देखते ही कैसी भी क्रूरा क्यों न हो, कितनी भी प्रचण्ड क्यों न हो, सौम्य रूप धारण करती है, वात्सल्यमय, ममतामय हो जाती है। गणपति के प्रतीक के रूप में कोई अच्छी सी प्रतिमा रखे, नहीं तो ताम्बूल गणपति की स्थापना करें।

5.            शिव एवं विष्णु पूजन को महत्व न देना :- आमतौर पर पण्डित जी महाराज गणेश पूजन, कलश पूजन करने के बाद सीधे शक्ति के पूजन में हाथ लगा देते हैं, जो कि कभी-कभी गलत निर्णय साबित हो सकता है। महाशक्ति की प्रचण्डता को केवल शिव ही अपनी छाती पर झेलते हैं। शिव प्रथम पुत्र हैं, आद्याशक्ति के। उनके स्वामी हैं। शक्ति को केवल शिव ही आत्मसात कर पाए हैं। शक्ति का अत्यंत प्रचण्ड रूप हैं माता महाकाली एवं कामाख्या देवी के। एक अवतार में माता शिव पर ही पाँव धरे खड़ी है, तो दूसरे अवतार में शिव के नाभी से निकले कमल पर विराजमान हैं। तारा अवतार में तो शिव जगदम्बा के सिर पर विराजमान हैं, तो धूमावती अवतार में महाशक्ति ने शिव का ही भक्षण कर लिया। ध्यान दें कि गणपति तो केवल प्रथम प्रहरी के रूप में शक्ति की प्रथम प्रचण्डता से बचाने को स्थापित किए जाते हैं, लेकिन महाशक्ति तो संपूर्ण लीला केवल शिव के साथ ही संपन्न करती हैं। यह रहस्य है शक्ति के पूजन में शिवलिंग स्थापित किए जाने का। शिव ही शक्ति को धारण करते हैं। अतः शक्ति पूजन के संपूर्ण लाभ को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम उनसे पहले शिवलिंग पर शिव की पूजा अर्चना संपन्न करें। याद रखें कि एक मात्र शिवलिंग पर भी सभी देवियों की पूजा अर्चना संपन्न की जा सकती है। महाशक्ति अगर आपके पास आएंगी तो अपना परम पवित्र चरण कहाँ रखेंगी, केवल शिवलिंग पर ही। क्या आपको सामर्थ्य है अपने छाती पर महाशक्ति के प्रहार को, आघात को झेलने की।

                इसी प्रकार शक्ति के पूजन में शालिग्राम भी रखा जाता है, जो कि शक्ति की प्रचण्डता एवं नकारात्मकता को नियंत्रित करता है। मैंने पहले लिखा कि शक्ति की पूजा के साईड इफेक्ट भी बहुत होते हैं। क्या आपके घरों में जो बिजली का करंट दौड़ रहा है, केवल उसके लाभ ही होते हैं? एक गलत निर्णय लाभ को हानि में भी बदल देता है। शक्ति की पूजा को तो असुर भी संपन्न करते हैं। किसी भी कार्य का फल, तपस्या का ताप सब कुछ अच्छा ही हो, ऐसा नहीं होता। आसुरी तत्वों से एवं शक्ति पूजन के अति खतरनाक तत्वों से रक्षा हेतु तथा नकारात्मकता को सकारात्मकता में परिवर्तन करने हेतु, संहार को पालन में परिणत करने हेतु पूजन स्थल पर विष्णु का प्रतीक शालिग्राम शिला को रखा जाता है।

6.            गले में रूद्राक्ष धारण न करना :- आमतौर पर अधिकतर मौसमी साधक/भक्त लोग ऐसा ही करते हैं। पहले ही बताया जा चुका है कि शक्ति पूजन के साईड इफेक्ट भी बहुत होते हैं। अगर शक्ति द्वारा पूजन में किसी प्रकार के आघात भी होते हैं, तो यह रूद्राक्ष स्वयं पर उसे झेल लेते हैं। इसके अभाव में बहुत से साधकों को मतिभ्रम होना, शरीर के किसी भाग से खून गिरना, सिर में अचानक पीड़ा झेलना इत्यादि होते हैं। शिव एवं देवी के भक्तों/आराधकों के लिए गले में सिद्ध रूद्राक्ष कवच एवं 108 दानों की रूद्राक्ष माला बहुत ही आवषश्यक है। ध्यान दें कि शक्ति के पूजन में हँसी-ठिठोली, मजाक या नियमों की अवहेलना नहीं चलती। देवी का तंत्र मार्गी पूजन जहाँ अति शीघ्र फलदायी होती है वहीं कभी-कभी एक मामूली सी गलती भी सोचनीय विषय बन सकती है। यह एक कटू सत्य है। अतः जानबूझकर आलस्य, प्रमाद एवं अति अहंकार न करें।

7.            भैरव पूजन न करना अथवा उनकी स्थापना नहीं करना :- आमतौर पर लोग/साधक गणपति एवं पञ्च महादेवो और नवग्रहों के पूजन करने के बाद सीधे महाशक्ति की पूजा-आराधना चालू कर देते है. पर वे ये भूल जाते है की आदिदेव महादेव ने शक्ति के प्रत्येक अवतार के साथ उनके विशेष भैरव के रूप में लीला की है. ये भैरव शक्ति विशेष के साथ उस महाशक्ति के वाहक होते है. महाशक्ति के पूजन के बाद उनके द्वारा उच्छिष्ट बलि को ये भैरव एवं भैरवीयाँ ही स्वीकार करते है. इसलिए प्रत्येक शक्तिपीठो में माता के साथ उनके भैरव भी स्थापित रहते है. भैरव के अनेक अवतार है. जिनमे से प्रत्येक की जानकारी एक सामान्य साधक को संभव नहीं. अतः आप शक्ति के किसी भी स्वरुप की आराधना करे, बटुक भैरव सभी शक्तिओ/देविओ के पूजन में उनके पुत्र के रूप में स्वीकार है. तांत्रोक्त पूजन भैरव की आराधना के बिना अधूरी है. अगर तांत्रिक बनना चाहते है, तंत्र विद्या पर पूर्ण सिद्धि चाहते है, तो माता जगदम्बा के साथ भैरव को भी पूजन करे, प्रतिक स्वरुप उनके तस्वीर, यन्त्र, प्रतिमा अथवा आठ मुखी रुद्राक्ष को रख सकते हैं. चाहे तो अदृश्य रूप में भी आप उनका रक्षात्मक देव के रूप में आवाहन कर सकते है. प्रत्येक पूजन के प्रारंभ में पूजन कर्म की आसुरी शक्तिओ एवं बाधा-विध्नो से रक्षा के लिए भैरव की स्थापना की जाती है. भैरव अपने कालदंड के साथ प्रत्येक दुष्ट एवं विरोधी शक्तिओ को दंड देने के लिए विराजमान रहते है. कोई भी अनावश्यक तत्त्व, नकारात्मक चिंतन महाशिव एवं महाशक्ति की पवित्रता को स्पर्श भी न कर पाए, इसका सदा ध्यान रखते है भगवान् भैरव देव अपने सभी मुर्तियो (

Navratra : नवरात्री विशेष : साधकों/उपासकों द्वारा नवरात्र के पूजन में की जाने वाली सामान्य भूलें
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