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दवा की तरह ले सकेंगे बैक्टीरिया, शरीर से अमोनिया निकालकर करेगा इलाज


हेल्थ डेस्क. बैक्टीरिया अब बीमारियों से लड़ने के लिए दवा के रूप में लिया जाएगा।मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने जेनेटिकली मॉडिफाइड बैक्टीरिया (ई-कोली निसेल) विकसित किया है। यहशरीर में अमोनिया का स्तर ज्यादा होने पर इसे बाहर निकालकर पेट और लिवर की बीमारियों का इलाज करेगा। इसे लिविंग मेडिसिन का नाम दिया गया है।

    • जेनिटिकली मोडिफाइड बैक्टीरिया को मैसाच्यूसेट्स ऑफ इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की एक फर्म सिनलॉजिक ने तैयार किया है। चूहे पर हुए प्रयोग में सामने आया कि यह अमोनिया के खतरनाक स्तर को घटाने में समर्थ है।
    • रिसर्च के दौरान, चूहे को बैक्टीरिया की ओरल डोज (SYNB1020) दी गई। इसके बाद उसके ब्लड में अमोनिया का स्तर कम हुआ और जीवित रहने की संभावना बढ़ी।
    • वैज्ञानिकों के मुताबिक, ऐसे लोग जिनका लिवर डैमेज हो चुका है या दुर्लभ जेनेटिक डिसऑर्डर से जूझ रहे हैं उनके लिए अमोनिया जानलेवा बन सकता है। ऐसे मरीजों में जेनेटिकली मॉडिफाइड बैक्टीरिया सर्वाइवल रेट बढ़ाने का काम करताहै।
    • इसका परीक्षण स्वस्थ इंसानों पर भी किया गया है, यह उनके लिए सुरक्षित साबित हुआ है। फर्म के हेड पाउल मिलर का कहना है कि इंसान को स्वस्थ रखने के लिए बैक्टीरिया में जेनेटिकली बदलाव कर उसे तैयार किया जा सकता है।
    • बैक्टीरिया की डोज (SYNB1020) उस स्थिति में ली जाती है जब शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम और अमोनिया का स्तर बढ़ जाता है। डोज की मदद से अमोनिया को आर्जेनीन (अमीनो एसिड) में तोड़ा जाता है।
    • वैज्ञानिकों का दावा, बैक्टीरिया में ऐसे बदलाव किए गए हैं कि इनकी संख्या में तय मात्रा में ही बढ़ोतरी होती है। इसलिए आंतों में इनकी संख्या अधिक बढ़ने का खतरा बिल्कुल भी नहीं है।
    • हायपर अमोनिया ऐसी स्थिति है जब रक्त में अमोनिया की मात्रा अधिक बढ़ जाती है। एक स्वस्थइंसान में प्रोटीन केपाचन के बाद अमोनिया का निर्माण होता है।
    • लिवर में अमोनिया को यूरिया में तब्दील करने के बाद यूरिन के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
    • लिवर डैमेज होने की स्थिति में अमोनिया का स्तर बढ़ता जाता है और रक्त में घुलकर मस्तिष्क तक पहुंचती है। स्थिति गंभीर होने पर मरीज की जान भी जा सकती है।


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      MIT scientist develops first living medicine GM microbes can mop up toxins in the human body

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कॉफी की 60% प्रजातियां खतरे में, जलवायु परिवर्तन और जंगलों की कटाई है वजह


लाइफस्टाइल डेस्क. जलवायु परिवर्तन का सीधा असर समुद्री जीवों के अलावा कॉफी पर भी पड़ रहा है। जंगली कॉफी की 124 में से 75 प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं, इसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन और जंगलों का कटना है जो कॉफी की कुल प्रजातियों का 60% है। यह रिसर्च दुनिया के सबसे बड़े जैव विविधता वाले इंग्लैंड के बॉटेनिकल पार्क क्यू गार्डन में की गई।

    • शोधकर्ताओं के मुताबिक, जंगली कॉफी की दो प्रजाति अरेबिका और रोबस्टा दुनिया में सबसे ज्यादा पी जाती हैं, ये भी विलुप्त होने वाली प्रजातियों की सूची में शामिल हैं। विलुप्ति की कगार में खड़ी 75 प्रजातियों में से 13 सबसे ज्यादा संकटग्रस्त स्थिति में हैं। जलवायु परिवर्तन में सुधार न होने पर 50%प्रजातियां 2088 तक हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी।
    • शोधकर्ताओं के मुताबिक, दुनियाभर में दो तिहाई लोग अरेबिका कॉफी पीते हैं, इसे प्रीमियम कैटेगरी में शामिल किया गया है। इसकी पैदावार में तेजी से कमी हो रही है जिसने किसानों और व्यापारियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, अरेबिका और रोबस्टा के विकल्प के तौर पर कॉफी की कुछ किस्में हैं जो पी जा सकती हैं।

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    • सबसे खास बात है कि विलुप्त होने वाली प्रजाति में काॅफी की एक किस्म ऐसी भी है जिसे 60 साल बाद दोबारा खोजा गया था। रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, वाइल्ड कॉफी की कुछ चुनिंदा ऐसी प्रजाति भी हैं जिनकी जलवायु परिवर्तन के बाद भी पैदावार जारी रहेगी। ये प्रजाति कॉफी के पौधों में होने वाली बीमारी से भी लड़ने में समर्थ है।
    • जंगली प्रजाति का इस्तेमाल कॉफी के क्रॉस ब्रीड पौधों के निर्माण में भी किया जाता है। ऐसे पौधों से तैयार होने वाली कॉफी स्ट्रॉन्ग होती है। क्यू गार्डन के हेड डॉ. डेविस के मुताबिक, 60% प्रजातियों के खत्म हाेने का आंकड़ा कॉफी पीने वालों को चौकाने वाला है। जंगली प्रजाति का खत्म होना चिंता का विषय है, चाहेकाॅफी हो या चिड़िया।
    • ऐसा पहली बार है जब इसकी 124 प्रजातियों पर इतनी बड़ी रिसर्च की गई है। इनकी ज्यादातर पैदावार अफ्रीका, एशिया, ऑस्ट्रेलिया, मेडागास्कर और भारतीय समुद्री आईलैंड में होती है। साइंस एडवांसेस पत्रिका में प्रकाशित इस रिसर्च के मुताबिक, विलुप्त प्रजातियों को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर ने रेड लिस्ट में शामिल किया है।
    • वैज्ञानिकों का कहना है कि इनकी आधी से भी कम प्रजातियों को बीज बैंक में रखा गया है। एक चौथाई से अधिक प्रजातियों कहां पर मौजूद हैं इसकी जानकारी भी नहीं हैं।
    • चॉकलेट का इतिहास लगभग 4 हजार साल पुराना है। कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि चॉकलेट बनाने वाला कोको पेड़ अमेरिका के जंगलों में सबसे पहले पाया गया था। हालांकि, अब अफ्रीका में दुनिया के 70% कोको की पूर्ति अकेले की जाती है।
    • कहा जाता है चॉकलेट की शुरुआत मैक्सिको और मध्य अमेरिका के लोगों ने की था। 1528 में स्पेन ने मैक्सिको को अपने कब्जे में लिया पर जब राजा वापस स्पेन गया तो वो अपने साथ कोको के बीज और सामग्री ले गया। जल्द ही ये वहां के लोगों को पसंद आ गया और अमीर लोगों का पसंदीदा पेय बन गया।
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    • एक सर्वे यह पाया गया कि पुरुषों की तुलना में भारतीय महिलाएं 25 फीसदी ज्यादा चॉकलेट उत्पाद ऑनलाइन मंगाती हैं। अध्ययन के अनुसार ऑनलाइन सभी मिठाइयों में से आधे से ज्यादा चॉकलेट की बनी होती हैं।
    • वास्तव में इस प्लेटफार्म पर प्रमुख मांग वाली 60 फीसदी मिठाइयां चॉकलेट पर आधारित हैं। एक अन्य तथ्य के अनुसार इसमें 18-24 आयु वर्ग वाले लोग ज्यादा चॉकलेट उत्पादों को ऑनलाइन मंगाते हैं।
    • भारत में चॉकलेट का कारोबार हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है। इस लिहाज से भारत में इसका कारोबार वर्ष 2023 तक यह 5.01 बिलियन यूएस डॉलर यानी 500 करोड़ रुपए से अधिक हो जाएगा।
    • वर्ष 2017 में चॉकलेट का कंजम्प्शन 19.3 करोड़ किलो का रहा। वहीं चॉकलेट के ऑनलाइन कारोबार की बात करें तो वर्ष 2012 से 2017 के बीच ऑनलाइन रीटेल कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट 57.9% रही। जिसकी वैल्यू 24.4 मिलियन डॉलर यानी 2.44 करोड़ रुपए रही।


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      More than half of wild species are threatened with extinction says study at Kew Gardens

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बैंडेज जो घाव भरकर त्वचा में ही घुल जाएगा , बार-बार नहीं करनी पड़ेगी ड्रेसिंग


लाइफस्टाइल डेस्क. वैज्ञानिकों ने ऐसा एंटीबैक्टीरियल बैंडेज विकसित किया है जो त्वचाको तेजी रिपेयर करने के साथ संक्रमण से भी बचाता है। लंबे समय तक इसका इस्तेमाल किया जा सकता है और एक बार इसे लगाने के बाद बदलने की जरूरत नहीं पड़ती। यह बायोडिग्रेडेबल है जो धीरे-धीरे अपने त्वचामें मिल जाता है। इसे मॉस्को की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी और चेक रिपब्लिक की ब्रनो यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी ने मिलकर तैयार किया है।

  1. शोधकर्ता एलिजवेटा का कहना है कि बैंडेज को पॉलीकापरोलेक्टोन नैनोफाइबर से बनाया गया है। इसके फाइबर में जेंटामायसिन मौजूद है। यह बैंडेजधीरे-धीरे गलते हुए त्वचामें मिल जाता है। इस्तेमाल करने के 48 घंटे के अंदर बैक्टीरिया की संख्या में तेजी से कमी आती है।

  2. शोधकर्ताओं का कहना है कि आमतौर पर घाव होने की स्थिति में एंटीसेप्टिक का प्रयोग किया जाता है जो संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया को खत्म करने के साथ शरीर को फायदा पहुंचाने वाले जीवाणुओं को भी खत्म कर देता है। घाव वाले हिस्से की ड्रेसिंग बार-बार होने पर मरीज को दर्द होता है।

  3. रिसर्च के दौरान बैंडेज का असर ई-कोली बैक्टीरिया पर देखा गया। बैंडेज का उपयोग घाव भरने के साथ हड्डियों से जुड़ी सूजन जैसे ऑस्टियोपाेरोसिस में भी कारगर है। रिसर्च मटेरियल एंड डिजाइन एकेडमिक पत्रिका में प्रकाशित की गई है।



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      New biodegradable nanofibre bandage enables faster healing says scientist

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60% भारतीयों को शाकाहार पसंद, ग्लोबल रिसर्च कंपनी ने 29 देशों में किया सर्वे


लाइफस्टाइल डेस्क. ग्लोबल रिसर्च कंपनी इप्सोस ने भारतीयों के खाने के मिजाज पर एक सर्वे किया है। इसके मुताबिक, 60 फीसदी भारतीय शाकाहार पसंद करते हैं और नॉनवेज छोड़ना चाहते हैं। ग्लोबल रिसर्च कंपनी इप्सोस की रिपोर्ट फूड हैबिट्स ऑफ इंडियंस के मुताबिक,देश में डायबिटीज जैसे रोगों से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ने के बीच खाने की पसंद बदल रही है और मांसाहारी के मुकाबले शाकाहारी लोगों की तादात बढ़ रही है।

57% भारतीयों को ऑर्गेनिक फूड पसंद

रिपोर्ट केमुताबिक, परंपरागत तरीकों को छोड़कर अब भारतीय प्रयोग में विश्वास करने लगे हैं। 29 देशों में करीब दो महीने तक चले सर्वे में एक हजार लोग शामिल किए गए थे। रिपोर्ट में सामने आया कि 57 फीसदी भारतीय खान-पानमें ऑर्गेनिक फूड शामिल करते हैं। वहीं, ब्रिटेन में 12 फीसदी और जापान में 13 फीसदी लोग ऑर्गेनिक फूड (प्लांट बेस्ड डाइट) खाना चाहते हैं।

77% डायटिंग में नहीं करते यकीन

सर्वे में यह भी पता चला कि भारतीय डाइटिंग में बहुत यकीन नहीं रखते हैं। वजन कम करने और मनपसंद खानेमें से एक चीज चुनने की बात पर 77 फीसदी भारतीयों ने खाना चुना है। खासकर मध्यमवर्गीय भारतीय डाइटिंग को गैरजरूरी मानते हैं।



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प्रतीकात्मक चित्र।

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शरीर में गर्माहट और ऊर्जा को बढ़ाता है तिल इसलिए मकर संक्रांति में बनाए जाते हैं इसके पकवान


लाइफस्टाइल डेस्क. तिल को सर्दी में खाने का वैज्ञानिक महत्व भी है। धीरे-धीरे घटते तापमान के कारण अधिक ऊर्जा और गर्माहट की जरूरत होती है, इसकी पूर्ति तिल करता है। इसलिए सर्दी में मनाए जाने वाले त्योहार मकर संक्रांति और लोहड़ी में परंपरा से लेकर पकवानों से तिल का प्रयोग किया जाता है।

शीत ऋतु में खाई जाने वाली हर मिठाई में आपको तिल मिल जाएगा क्योंकि इसमें पोषक तत्व के साथ ‘गुड फैट' की मात्रा अधिक होती है जो शरीर को ज़रूरी ऊष्मा प्रदान करता है। तिल में अच्छी मात्रा में मैग्निशियम होता है जो हायपरटेंशन से बचाता है और एंटीऑक्सीडेंट्स रोग-प्रतिरोधक तंत्र को मज़बूती प्रदान करते हैं। कोलम्बिया एशिया हॉस्पिटल गुड़गांव की आहार विशेषज्ञ डाॅ. शालिनी गार्विन ब्लिस से जानते हैं तिल के क्या हैं फायदे….

  1. पोषण से भरपूर तिल का तेल हृदय को भी स्वस्थ रखता है। यह कोलेस्ट्रॉल को कम करता है और रक्तचाप सामान्य रखता है। इसमें आयरन भी अच्छी मात्रा में होता है जो एनीमिया जैसी बीमारियों को दूर रखता है। जोड़ों के दर्द और सूजन में तिल खाना फ़ायदेमंद होता है क्योंकि इसमें मौजूद कॉपर सूजन और दर्द से आराम दिलाता है। तिल त्वचा और बालों के लिए भी फ़ायदेमंद है।

  2. त्वचा के लिए गुणकारी तिल में फाइबर अधिक मात्रा में होता है जो पाचन क्रिया को भी दुरुस्त रखता है। तिल निर्मित कोई भी खाद्य पदार्थ भोजन की गुणवत्ता तो बढ़ाता ही है और कब्ज़ को भी दूर रखता है। तिल प्रोटीन और वसा का भंडार होते हैं इसलिए इसका सेवन गर्भावस्था में फ़ायदेमंद होता है। तिल के नियमित सेवन से त्वचा के दाग़-धब्बे भी मंद होते हैं। इसमें मौजूद जिंक मांसपेशियों मज़बूती प्रदान करता है।



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      makar sankranti 2019 why people eat til ke laddu in makar sankranti lohri pongal benefits of til

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वैज्ञानिकों ने खोजा शरीर का कैलेंडर, फरवरी बचत का तो अक्टूबर प्यार का महीना


हेल्थ डेस्क.प्यार पाने के लिए अक्टूबर का महीना सबसे अच्छा होता है और वजन कम करने के लिए नवंबर। वहीं, जनवरी सबसे बेहतर होता है नई आदतों की शुरुआत के लिए तो फरवरी में आप अच्छी-खासी बचत भी कर सकते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के वैज्ञानिकों की एक स्टडी में यह निष्कर्ष निकला है। वैज्ञानिकों ने इसके लिए 2019 का कैलेंडर भी बनाया है। इसमें हर काम के लिए एक खास महीना बताया गया है। वैज्ञानिकों ने इसका कारण मौसम या हम जो करते हैं या खाते हैं उसमें हो रहे बदलाव को बताया। वैज्ञानिकों की टीम के प्रमुख डॉ. एंड्रयू लिम ने बताया कि ऐसा हमारे शरीर में विशिष्ट हार्मोन और दिमाग में रसायन परिवर्तन के कारण होता है। विटामिन डी का स्तर भी इसका अहम कारण है।

    • जनवरी :सर्दियों में दिमाग अधिक रचनात्मक होता है।कोई नया और छोटा संकल्प लेकर उस पर टिके रहें।
    • फरवरी : पैसा बचाने के लिए अच्छा समय हो सकता है।बैंक, फोन टैरिफ स्वीच कर सकते हैं। फायदा होगा।
    • मार्च : बसंत के इस मौसम में उदासी, डिप्रेशन दूर भगाएं।ग्रीन टी पीएं। विटामिन-डी और एंटीऑक्सीडेंट बढ़ेगा।
    • अप्रैल :सूर्य की तेज रोशनी से लोग ज्यादा चिंता में रहते हैं।तनाव वाले इस महीने में आप कढ़ी का सेवन ज्यादा करें।
    • मई : सूर्य की तेज रोशनी से आप ज्यादा खुश होते हैं।शाम को 15 मिनट खुद को दें। पॉजिटिव एनर्जी मिलेगी।
    • जून : शरीर में सेरोटोनिन बढ़ने से एकाग्रता बढ़ जाती है।एक कप लेकर ध्यान केंद्रित करें। उर्जावान महसूस करेंगे।
    • जुलाई : हार्मोन कोर्टिसोल कम होगा। टूर प्लान करें।दोस्तों के साथ समय बिताएं। सोशल नेटवर्क को भी बढ़ाएं।
    • अगस्त : आपका प्रदर्शन इस महीने सबसे अच्छा होता है।इस महीने आपको कुछ नया सीखना शुरू करना चाहिए।
    • सितंबर : हल्की ठंड से ज्यादा ऊर्जावान महसूस करेंगे।सोचे हुए काम की लिस्ट बना लें और पूरा करने में जुट जाएं।
    • अक्टूबर : ठंड बढ़ने से प्यार पाने की इच्छा होगी।डेटिंग पर जाएं। प्यार पाने के लिए एक कदम आगे बढ़ाएं।
    • नवंबर : बारिश के बाद आप वजन कम कर सकते हैं।लंबी दौड़ लगानी चाहिए। वह भी सीधी सड़क पर नहीं।
    • दिसंबर: तनाव वाले हार्मोन कोर्टिसोल को काबू में रखें।करीबियों को बांहों में भरें। इससे कोर्टिसोल कम होगा।


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      scientist invents a health calendar every month is special

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तिल के नए-नवेले स्वाद जो पकवान और परंपरा को देंगे नया रंग


लाइफस्टाइल डेस्क. साल के पहले बड़े त्योहारों में लोहड़ी और संक्रांति में तिल का खास महत्व है। त्योहार की परंपरा से लेकर पकवानों तक तिल को शामिल किया जाता है। इस मौके पर तिल को नए तरीके से परोसिए। जानिए तिल से जुड़ी खास तरह की रेसिपीज…

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    • क्या चाहिए : तिल- कप, घी- कप, गुड़- कप, सूजी- कप, पिसी इलायची- 1/4 छोटा चम्मच।
    • ऐसे बनाएं : तिल को रातभर पानी में भिगोकर रखें। सुबह पानी निथारकर मिक्सी में महीन पीस लें। अब कड़ाही में घी गर्म करें। इसमें सूजी डालकर गुलाबी होने तक सेंकें, अब तिल का पेस्ट डालकर लगातार हिलाते हुए भूनें। सुनहरी रंगत होने पर आवश्यकतानुसार पानी मिलाएं। गुड़ मिलाकर 3-4 मिनट पकाएं। अंत में पिसी इलायची मिलाकर आंच बंद करें। स्वादिष्ठ तिल गुड़ का हलवा तैयार है। सूखे मेवों से सजाकर गरमा-गरम हलवा पेश करें। सर्दियों में इसका सेवन बहुत लाभप्रद होता है।
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    • क्या चाहिए : मैदा- 1 कप, घिसा मावा- 1 कप (हल्का भुना हुआ), भुने तिल- कप, सूखे मेवे की कतरन- 2 बड़े चम्मच (काजू, किशमिश, चारोली), शक्कर पिसी हुई 1 कप, पिसी इलायची- छोटा चम्मच, घी- आवश्यकतानुसार।
    • ऐसे बनाएं : मैदे में 2 बड़े चम्मच पिघले घी का मोयन डालकर ठंडे पानी की मदद से सख़्त आटा गूंधे। आटे को गीले कपड़े से 15 मिनट ढककर रखें। मावे में भुने तिल, सूखे मेवे की कतरन, शक्कर व इलायची अच्छी तरह से मिलाकर भरावन तैयार करें। अब गूंधे मैदे की लोई बनाकर पूरी बेलें। इसमें भरावन भरकर गुझिया का आकार दें। इन्हें गर्म घी में धीमी आंच पर सुनहरा गुलाबी तल लें। तिल के स्वाद वाली ये स्वादिष्ठ गुझिया सभी को पसंद आएगी।
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    • क्या चाहिए : तिल- 200 ग्राम, कंडेस्ड मिल्क- 200 ग्राम, घी- 1 बड़ा चम्मच, पिसी इलायची- छोटा चम्मच।
    • ऐसे बनाएं : कड़ाही में तिल को सूखा ही हल्का-सा सेंक लें। ठंडा होने पर दरदरा पीसें। नाॅनस्टिक पैन में घी गर्म करें। इसमें भुने तिल का पाउडर डालकर 2 मिनट भूनें। कंडेस्ड मिल्क मिलाकर लगातार चलाते हुए पकाएं। जब ये कड़ाही छोड़ने लगे तब इलायची मिलाकर तुरंत चिकनाई लगी गहरी ट्रे या थाली में पलटकर सेट होने के लिए छोड़ दें। मनचाहे आकार के टुकड़े काटकर टेस्टी तिल बर्फी सर्व करें। ये आसान व झटपट बनने वाली रेसिपी है।
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    • क्या चाहिए : मैदा- 1 कप, बेसन- 2 बड़े चम्मच , मक्खन- 3 बड़े चम्मच, बेकिंग सोडा- चुटकीभर, नमक। भरावन सामग्री : भुने व पिसे हुए तिल- 2-3 बड़े चम्मच, कीसा नारियल- 2-3 बड़े चम्मच, हल्दी- छोटा चम्मच, नमक स्वादानुसार, तेल- 1 बड़ा चम्मच, लाल मिर्च- 1 छोटा चम्मच, जीरा- 1 छोटा चम्मच, धनिया पाउडर- 2 छोटे चम्मच, इमली का पेस्ट- 1 बड़ा चम्मच, गरम मसाला- 1 छोटा चम्मच, अजवायन- चुटकीभर, शक्कर- छोटा चम्मच।
    • ऐसे बनाएं : मैदे में बेसन व बेकिंग सोडा मिलाकर छान लें। अब इसमें मक्खन डालकर उंगलियों की मदद से अच्छी तरह मिक्स करें। आवश्यकतानुसार पानी मिलाकर आटा गूंध लें। इसे ढककर आधा घंटे के लिए अलग रखें। भरावन बनाने के लिए तेल को छोड़कर सभी सामग्री मिलाकर एकसार करें। अब गूंधे मैदे की लोइयां बनाकर बेलें। इसपर तेल लगाकर ऊपर से भरावन फैलाकर रोल कर लें और टुकड़ों में काट लें। इन टुकड़ों को बेकिंग ट्रे में रखकर अवन में सुनहरा होने तक बेक करें। तैयार हैं हैल्दी व टेस्टी बेक्ड तिल भाकरवड़ी। इन्हें पूरी तरह ठंडा होने पर हवाबंद डिब्बे में भरकर रखें। ये 8-10 दिन तक इस्तेमाल में ली जा सकती हैं।
    • क्या चाहिए : मैदा- 250 ग्राम, भुने व पिसे हुए तिल 3-4 बड़े चम्मच, भुना बेसन- 4-5 बड़े चम्मच, लहसुन की चटनी- 1 बड़ा चम्मच, अमचूर- छोटा चम्मच, हल्दी- छोटा चम्मच, नमक- स्वादानुसार, लाल मिर्च- 1 छोटा चम्मच, चाट मसाला- छोटा चम्मच, जीरा- 1 छोटा चम्मच, धनिया पाउडर- 2 छोटे चम्मच, गरम मसाला- 1 छोटा चम्मच, हींग- छोटा चम्मच, तेल- आवश्यकतानुसार।
    • ऐसे बनाएं : मैदे में नमक व 2 बड़े चम्मच तेल मिलाकर पानी की मदद से सख़्त गूंध लें। आधा घंटा ढककर रखें। स्टफिंग बनाने के लिए भुने व पिसे हुए तिल में सभी मसाले, बेसन व लहसुन की चटनी डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। गूंथे मैदे की लोइयां बनाकर प्रत्येक में तिल को भरकर कचौरी बनाएं। इन्हें गर्मतेल में धीमी आंच पर सुनहरी तलें। स्वादिष्ट तिल की चटपटी मसाला कचौरी तैयार है।


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      Lohri Food Recipes: List of Best makar sankranti til recipes in hindi

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चीन में एक महिला को दुर्लभ बीमारी, पुरुषों की नहीं सुनाई देती है आवाज


हेल्थ डेस्क. चीन में रहने वाली एक महिला दुर्लभ बीमारी से जूझ रही है। उसे पुरुषों की नहीं, सिर्फ महिलाओं की तेज आवाज सुनाई देती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह बीमारी कान की समस्या से जूझ रहे 13 हजार लोगों में एक को होती है। इसेरिवर्स स्लोप हियरिंग लॉस कहते हैं। ऐसी स्थिति में मरीज को केवल हाई फ्रीक्वेंसी साउंड सुनाई देता है।डॉक्टरों के मुताबिक, महिला में इस बीमारी की वजह तनाव हो सकता है।

  1. चीन के जियामेन में रहने वाली चेन को बीमारी का पता तब चला जब एक सुबह उन्हें अपने दोस्त की आवाज सुनाई देना बंद हो गई थी।हालांकि, महिलाओं की आवाज सुनने में उसे किसी भी तरह की परेशानी नहीं थी। महिला को स्थानीय अस्पताल ले जाया गया है जहां जांच के बाद दुर्लभ बीमारी रिवर्स स्लोप हियरिंग लॉस का पता चला।

  2. रिवर्स स्लोप हियरिंग लॉस उन लोगों में देखा गया, जिन्हें लंबे वक्त से कान से संबंधित समस्या होती है।बीमारी के कारण कम आवृत्ति यानी धीमी आवाज सुनने में दिक्कत होती है।

  3. आवाजको सुनने की क्षमता को एक ग्राफ की मदद से समझा जाता है, इसे ऑडियोग्राम कहा जाता है। आमतौर पर बहरेपन के ज्यादातर मामलों में मरीजों को हाई फ्रीक्वेंसी की आवाज सुनने में परेशानी होती है,लेकिनइस स्थिति में ऑडियोग्राम पर बनने वाला ग्राफ हाई पिच की आवाज के साथ नीचे गिरता जाता है।

  4. लो फ्रीक्वेंसी ना सुनाई देने के मामले में यह स्लोप ढलने की बजाय ऊपर चढ़ता दिखाई देता है, इसीलिए इसका नाम रिवर्स स्लोप हियरिंग लॉस रखा गया। इससे जूझ रहे मरीज इंसानों की सामान्य आवाज के अलावा लो फ्रीक्वेंसी साउंड भी नहीं सुन पाते।

  5. सामान्यत: पुरुषों की आवाज लो फ्रीक्वेंसी और महिलाओं की आवाज हाई फ्रीक्वेंसी की होती है। हालांकि, इस समस्या से जूझ रहे लोग हाई फ्रीक्वेंसी आवाज वाले पुरुषों की आवाज सुन सकते हैं और लो फ्रीक्वेंसी आवाज वाली महिलाओं की आवाज नहीं सुन सकते।

  6. यह बीमारी तनाव के अलावा कान संबंधी बीमारी मेनियर, जेनेटिक डिसऑर्डर, वायरल इन्फेक्शन, किडनी फेलियर और हायपरटेंशन के कारण हो सकती है। सुनने में समस्या वाले 13 हजार लोगों में से किसी एक व्यक्ति को यह बीमारी होती है।



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      rare disease in which one can hear women voice but can't hear mens

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सर्दियों में डाइट में बदलाव कर अस्थमा मरीज रख सकते हैं अपना ख्याल


हेल्थ डेस्क.सर्दी का मौसम जहां स्वस्थ लोगों के लिए सौगात बनकर आता है तो वहीं अस्थमा के रोगियों के लिए परेशानी का सबब भी रहता है। अस्थमा रोगियों के लिए खासकर चढ़ती और उतरती सर्दी ज्यादा घातक होती है, क्योंकि इस दौरान मौसम में तेजी से बदलाव होता है। इससे उनमें सांस चलने की समस्या काफी बढ़ जाती है। अब जबकि मकर संक्रांति के बाद सूरज अपनी दिशा बदलेगा तो बदलते मौसम में अस्थमा रोगियों को कुछ ज्यादा सतर्कता रखनी होगी। घर के बाहर निकलने पर इन्हें अपने मुंह और नाक को मास्क या कपड़े से कवर करके रखना होगा। इसके अलावा डाइट में कुछ चीजों को शामिल करने से भी अस्थमा के मरीजों को थोड़ी सहूलियत हो सकती है। डाइट और वेलनेस एक्सपर्ट डॉ. शिखा शर्मा बता रही हैंतीनअसरदार तरीके...

  1. हल्दी और शहद

    हल्दी और शहद दोनों में एंटी इंफ्लेमेटरी और एंटी एलर्जिक प्रॉपर्टीज होती हैं जो कफ से राहत दिलाती है। अगर हल्दी व शहद को मिलाकर लिया जाए तो इसका असर दोगुना हो जाता है। अस्थमा के रोगियों के लिए तो यह प्रभावी फॉर्मूला है। रोजाना दो बार चुटकी भर हल्दी में शहद मिलाकर उसे चाटने से अस्थमा रोगियों को श्वास चलने की समस्या में राहत मिलती है। सर्दी-जुकाम से परेशान सामान्य व्यक्ति भी इसका इस्तेमाल कर सकता है।

  2. अंजीर का सेवन

    रोजाना रात को सोने से पहले साफ पानी में दो-तीन सूखे अंजीर भिगो दीजिए। अंजीर भिगोने से पहले उन्हें भी अच्छे से धो लीजिए। सुबह उठकर खाली पेट ही उन्हें अच्छी तरह से चबा-चबाकर खा लीजिए। अंजीर खाने के बाद उस पानी को पी लीजिए जिसमें आपने रात भर अंजीर भिगोए थे। अंजीर श्वास नली में जमा कफ को साफ कर देता है जिससे अस्थमा के मरीज को श्वास लेने में कम दिक्कत होती है।

  3. अदरक-लहसुन की चाय

    अस्थमा के दौरान श्वास लेने में आने वाली दिक्कतों को दूर करने में अदरक और लहसुन की चाय भी काफी मददगार होती है। इसे बनाना भी बहुत आसान है। पहले अदरक की सामान्य चाय बना लीजिए। अब लहसुन की दो-दिन कलियों को पीसकर उसे उस चाय में मिक्स कर लीजिए। अब इसे दोबारा से गरम करने की जरूरत नहीं है। यह चाय पीने में बेस्वाद लग सकती है, लेकिन काफी असरदार होती है।



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      diet changes for asthma patients by dr shikha sharma

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बादाम को चावल और पिश्ते को दाल के आकार में काटकर बनी थी वाजिद अली शाह के लिए शाही खिचड़ी


हेल्थ डेस्क.देशके अलग-अलग हिस्सों में मकर संक्रांति का पर्व अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। मध्य, पश्चिम और उत्तर भारत के कई हिस्सों में इस दिन खासतौर पर खिचड़ी बनाई और खाई जाती है। वैसे खिचड़ी पूरे भारत में लोकप्रिय है और इसके स्वास्थ्य संबंधी गुणों के कारण कुछ लोग तो सप्ताह में कई बार इसे खाते हैं। जैसे प्रदेश बदल जाने पर पानी बदल जाता है, वैसे ही खिचड़ी बनाने का तरीका और स्वाद में भी अंतर आ जाता है। आज इसी खास व्यंजन खिचड़ी के बारे में बता रहे हैं शेफ हरपाल सिंह सोखी...


हमारे यहां खिचड़ी सदियों से खाई जाती रही है। लेकिन आज से करीब 1800 साल पहले लिखे एक ग्रंथ में इसका उल्लेख मिलता है। दूसरी सदी के एक ग्रंथ 'कमिका अगामा' के छठे अध्याय में कई डिशेज और उन्हें बनाने के तरीकों का वर्णन किया गया है। इसी अध्याय में 'क्रूसरन्न' का उल्लेख है जिसे आज की खिचड़ी माना जा सकता है। क्रूसरन्न मूंग की दाल, चावल, तिल के दानों, काली मिर्च और नमक डालकर बनाई जाती थी। क्रूसरन्न के अलावा भी खिचड़ी के दो अन्य रूपों 'मुदगन्न'और 'हरिद्रन्न' का उल्लेख मिलता है। मुदगन्न बहुत ही साधारण तरीके से मूंग दाल और चावल से बनाई जाती थी, जबकि हरिद्रन्न बनाने में चावल, काली मिर्च, हल्दी, जीरा और राई का इस्तेमाल किया जाता था।

अमीर-गरीब सबकी पसंद


दिल्ली के अंतिम हिंदू शासक पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल (1166-1192) के दौरान एक दरबारी कवि खिचड़ी जैसी एक डिश का उल्लेख करते हुए कहता है कि इसे गरीब से लेकर अमीर तक सभी खाते थे। अमीर लोग खिचड़ी में घी और अन्य सब्जियां मिलाते थे, जबकि गरीब बगैर घी के ही खाते थे। अल-बरुनी ने किताब-उल-हिंद में खिचड़ी को सर्वप्रिय बताया है। 14वीं सदी में मोरक्को से भारत आए यात्री और विद्वान इब्न बतूता ने भी खिचड़ी का वर्णन करते हुए लिखा है- 'इस दौर में लोग नाश्ते में मूंग दाल और चावल से बनी एक चीज खाते थे जिसमें ऊपर से ढेर सारा घी डाला जाता था।'

जहांगीर को पसंद थी गुजरात की बाजरा खिचड़ी


सोलहवीं सदी में अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल लिखते हैं कि जहांगीर खासकर गुजरात की बाजरा खिचड़ी खाने का काफी शौकीन था। फजल लिखते हैं कि जिस दिन जहांगीर को मांस नहीं खाना होता था, उस दिन वह बाजरा खिचड़ी ही खाता था। नवाबों के शासनकाल में 'शाही खिचड़ी' का संस्करण सामने आया। वाजिद अली शाह (1822-1887) के एक शेफ ने बादाम और पिश्ते से खिचड़ी बनाई थी। उसने बादाम को बारीक-बारीक काटकर चावल का आकार दिया था, जबकि पिश्ते को काटकर दाल का।

बौद्ध भिक्षुओं की खास पसंद


खिचड़ी बौद्ध भिक्षुओं का भी पसंदीदा भोजन रहा। मध्यकाल में बौद्ध भिक्षु भिक्षा के लिए घर-घर जाते थे। अधिकांश को भिक्षा में दाल और चावल ही मिलते थे। कई बार उन्हें साथ में सब्जियां और मसाले भी मिल जाते थे। उन्हें जो भी मिलता था, वे सभी को एक बर्तन में एकसाथ मिलाकर उसे पका लेते थे। इस तरह खिचड़ी भी बौद्ध भिक्षुओं का प्रमुख खाना बन गई। देश में खिचड़ी का विस्तार करने में भी बौद्ध भिक्षुओं ने प्रमुख भूमिका निभाई। बौद्ध भिक्षुओं के साथ-साथ जैन, हिंदू और सूफी संतों के बीच भी खिचड़ी लोकप्रिय होती चली गई।

पाचन तंत्र के लिए अच्छी मानी जाती है खिचड़ी


आयुर्वेद के अनुसार खिचड़ी ऐसी डिश है जो शरीर के तीनों दोषों- कफ, पित्त और वात को संतुलित करती है। आयुर्वेद में माना जाता है कि सेहत पाचन तंत्र से शुरू होता है। स्वस्थ रहने के लिए पूरा शरीर अच्छे पाचन पर निर्भर करता है। अगर हमारा पाचन तंत्र सही ढंग से काम नहीं करता है, तो हम कई बीमारियों के शिकार हो सकते हैं। पाचन ऊर्जा को 'अग्नि' कहते हैं। यह अग्नि बहुत ताकतवर होनी चाहिए। खिचड़ी इसी अग्नि को और भी तेज करती है और इस तरह हमारे सारे तंत्र को संतुलित बनाए रखती है।



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Story of Khichdi by Chef Harpal Singh Sokhi

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अंग्रेज वैज्ञानिकों ने भारत में उगने वाले बाबची के फूलों में ढूंढ़ा झुर्रियां मिटाने का फार्मूला, बीज सिर्फ 45 रुपए किलो मिलता है


हेल्थ डेस्क.पथरीली जमीन पर उगने वाला बाबची पौधा चेहरे पर उम्र का असर घटाने के साथ दाग-धब्बों में भी कमी लाता है। ब्रिटिश जर्नल ऑफ डर्मेटोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, भारतीय पौधे बाबची के बीज में पाया जाने वाला केमिकल बाकूचियोल एंटीबैक्टीरियल और एंटीऑक्सीडेंट है। जिसका इस्तेमाल लंबे समय से आयुर्वेदिक और चीनी दवाओं में किया जा रहा है। यह विटामिन-ए (रेटिनॉल) से बेहतर है।

आयुर्वेदाचार्य बालकृष्ण के मुताबिक, इसे बावची या बाकुची के नाम से भी जाना जाता है जिसे दाद, खुजली, सफेद दाग और दांत दर्द समेत कई रोगों में प्रयोग किया जाता है। बाबची के बीज और जड़ों का इस्तेमाल दवा की तरह होता है। जैसे बाबची की जड़ों को पीसकर और फूली हुई है फिटकरी को मिलाकर मंजन करने से दांतों का दर्द, कीड़ों और पायरिया की समस्या दूर होती है। इसके बीज 45 रुपए प्रति किलो की दर से ऑनलाइन खरीदे जा सकते हैं।

  1. ज्यादातर स्किनकेयर प्रोडक्ट में रेटिनॉल का इस्तेमाल एक एंटी-एजिंग तत्व के रूप में किया जाता है, यह विटामिन-ए का एक प्रकार है। लेकिन कई बार इसके साइडइफेक्ट स्किन पर लाल चकत्ते के रूप में सामने आते हैं। कुछ स्किन केयर प्रोडक्ट में विटामिन-ए के दूसरे प्रकार रेटनल और रेटिनिल का प्रयोग भी किया जाता है। लेकिन ऐसी महिलाएं जो प्रेग्नेंट या मां बनना चाहती हैं, उन्हें इसके इस्तेमाल की सलाह नहीं दी जाती है। क्योंकि इसकी हैवी डोज का साइड इफेक्ट बच्चे पर दिख सकता है।

  2. ऐसे खतरों से बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने भारतीय पौधे बाबची का इस्तेमाल अपने शोध में किया। रिसर्च में 44 लोगों को शामिल किया गया। इन्हें रोजाना चेहरे पर दो बार 0.5 फीसदी बाकूचियोल या रेटिनॉल लगाने के कहा गया। ऐसा 12 हफ्तों तक किया गया।

  3. रिसर्च के बेहतर परिणामों को जानने के लिए शोधकर्ताओं ने तस्वीरों, चर्म रोग विशेषज्ञों की सलाह और यूजर से किए जाने वाले सवाल-जवाबों का सहारा लिया। परिणाम के रूप में सामने आया कि दोनों ही रसायनों ने चेहरे की 20 फीसदी झुर्रियों को कम किया। जिन्होंने रेटिनॉल का प्रयोग किया उन्हें स्किन पर चुभन शिकायत हुई। लेकिन सबसे ज्यादा लोगों ने बाकूचियोल का प्रयोग किया उनकी झुर्रियों और दाग-धब्बों में रेटिनॉल के मुकाबले काफी कमी आई।

  4. डर्मेटेलॉजिस्ट अंजली महतो का कहना है, साइडइफेक्ट सामने आने पर रेटिनॉल को हमेशा के लिए छोड़ना, सही नहीं है। इसके कई फायदे भी हैं। ऐसे लोग जो रेटिनॉल का इस्तेमाल नहीं पसंद करते वे रेटिनॉल के दूसरे प्रकार रेटिनल या रेटिनल का प्रयोग कर सकते हैं। इस शोध को काफी बड़े स्तर पर कराने की जरूरत है। तभी बेहतर पता चल पाएगा कि रेटिनॉल बाकूचियोल से बेहतर है या नहीं। हां, जो लोग रेटिनॉल को बिल्कुल भी नहीं पसंद करते वे बाकूचियोल का प्रयोग कर सकते हैं।

  5. भारत में बाबची का पौधा पथरीली जमीन वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। इसकी ऊंचाई 1-4 फुट तक होती है। पत्ते की लंबाई 1 से 3 इंच की होती है। बैगनी रंग के फूले वाले इस पौधे का इस्तेमाल आयुर्वेद में बुखार, कुष्ट रोग, खाांसी, बवासीर, सूजन और दांतों में कीड़े के इलाज में किया जाता है। बाबची के बीजों से प्राप्त तेल सफेद दाग, दाद, खाज, मुंहासों, झांई जैसे चर्म रोगों में फायदा पहुंचाता है।



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      babchi seeds bakuchiol works as an anti aging agent and better than retiol or vitamin a

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डायबिटीज मरीजों के पेंक्रियाज की नई कोशिकाओं से ही बनाया जाएगा इंसुलिन


हेल्थ डेस्क. वैज्ञानिकों ने पेन्क्रियाज में ऐसी कोशिकाओं की खोज की है जिनसे इंसुलिन हार्मोन का निर्माण किया जा सकता है। इंसुलिन हार्मोन का काम शरीर में ब्लड शुगर को नियंत्रित करना है। यह शोध चूहों पर किया गया है। रिसर्च के दौरान इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं को निकाल दिया गया। कुछ समय के बाद आसपास की अल्फा कोशिकाओं ने इंसुलिन बनाना शुरू कर दिया। वैज्ञानिकों का कहना है कि डायबिटीज के मरीजों के लिए यह नए तरह का इलाज साबित होगा। यह रिसर्च बेरगेन, नार्वे और जेनेवा विश्वविद्यालयाें ने संयुक्त रूप से की है।

  1. शरीर के जिस हिस्से में जहां बीटा कोशिकाएं पाई जाती हैं वहां शोधकर्ताओं ने चूहे में डिप्थीरिया का बैक्टीरिया इंजेक्ट किया। बैक्टीरिया ने 10 दिन के अंदर बीटा कोशिकाओं को खत्म कर दिया। चूहे की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण ट्रांसप्लांट हुई बैक्टीरिया वाली कोशिकाओं को रिजेक्ट नहीं कर सका। चूहों में ब्लड शुगर को नियंत्रित करने के लिए पेन्क्रियाटिक कोशिकाएं ट्रांसप्लांट की गईं। करीब एक महीने के बाद चूहों में अल्फा कोशिकाएं विकसित होने लगी। इनसे इंसुलिन का निर्माण शुरू हुआ।

  2. वैज्ञानिकों का मानना है कि बीटा कोशिकाओं के दोबारा बनने और ब्लड शुगर को सामान्य करने के लिए इंसुलिन की इतनी कम मात्रा पर्याप्त है। वैज्ञानिकों ने जब बीटा कोशिकाओं की आधी मात्रा हटाई तो अल्फा कोशिकाओं ने काम करना शुरू नहीं किया। रिसर्च के मुताबिक, जब पूरी तरह बीटा कोशिकाओं को हटाया गया तभी अल्फा कोशिकाओं ने इंसुलिन बनाना शुरू किया। शोधकर्ताओं के अनुसार, कोशिकाओं की पहचान और इनके कार्यों के बदलने की क्षमता दूसरी बीमारियों जैसे अल्जाइमर को भी दूर करने में मददगार साबित होंगी।

  3. बेरगेन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता लूइजा घिला के मुताबिक, टाइप-1 डायबिटीज की स्थिति तब बनती है जब पेन्क्रियाज में मौजूद बीटा कोशिकाओं इंसुलिन बनाने में पूरी तरह असमर्थ होती हैं वही टाइप-2 की स्थिति में ये कोशिकाएं जरूरत के मुताबिक इंसुलिन नहीं रिलीज कर पाती हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, ब्रिटेन में 40 लाख और अमेरिका में 4 करोड़ डायबिटीज रोगी हैं। दोनों ही देशों में करीब 90 फीसदी डायबिटीज रोगी टाइप-2 से पीड़ित हैं।



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      new cell to produce insulin in pancreas by manipulating it

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मां बनना चाहती हैं तो जल्दी सोने-जल्दी उठने का फॉर्मूला अपनाएं, इसका सीधा सम्बंध प्रेग्नेंसी से है


हेल्थ डेस्क. सुबह जल्दी उठने वाली महिलाओं के प्रेग्नेंट होनी की संभावना अधिक होती है। 100 महिलाओं पर हुई वारविक यूनिवर्सिटी की रिसर्च में कहा गया है कि प्रेग्नेंसी प्लान करना चाहती हैं तो देर रात तक जगने की बजाय सुबह जल्दी उठने की आदत डालें। शोध के मुताबिक, जल्दी सोने और जल्दी उठने की आदत का फॉर्मूला अपनाएं।

  1. शोध के अनुसार, रिसर्च में शामिल 100 में से एक तिहाई महिलाएं गर्भवती हुई हैं। ये वो महिलाएं हैं जिनके सोने का समय रात 10.30 से लेकर सुबह 6.30 बजे तक था। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये महिलाएं रात 2.30 से 3.30 बजे के बीच गहरी नींद में थीं। वहीं देर रात सोने वाली महिलाएं का गहरी नींद का समय सुबह 6 बजे था।

  2. जल्दी उठने का प्रेग्नेंसी से क्या कनेक्शन है, इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने महिलाओं के स्लीपिंग पैटर्न का अध्ययन किया। रिसर्च से जुड़े प्रोफेसर गेराल्डाइन हार्टसोर्न के अनुसार, ऐसी महिलाएं जो सुबह जल्दी उठती हैं उनमें स्मोकिंग, ओवरवेट, डायबिटीज और हृदय रोगों की आशंका कम होती है। स्मोकिंग के अलावा ये समस्याएं प्रेग्नेंसी में कई तरह की बाधाएं पैदा करती हैं।

  3. देर रात जगने वाली महिलाओं की फिटनेस सुबह उठने वालों के मुकाबले कमजोर हाेती है। ऐसी महिलाएं ज्यादातर रोजमर्रा के कामों को पूरा करने के लिए बॉडी क्लॉक के विरुद्ध जाती हैं जो शरीर की अंदरूनी कार्यशैली को अव्यवस्थित करता है। ऐसी महिलाएं जो मां बनना चाहती हैं उन्हें नाइट शिफ्ट से दूरी बनानी चाहिए।

  4. शिकागो के नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी मेडिकल स्कूल के न्यूरोलॉजिस्ट फिलीज ज़ी का कहना है कि ऐसी महिलाएं जो देर रात या नाइट शिफ्ट करती हैं उनकी प्रजनन क्षमता और मासिकधर्म अनियमित हो जाता है। जो प्रेग्नेंसी के लिए रिस्क फैक्टर बनता है।

  5. ताइवान में हुए एक हालिया अध्ययन में सामने आया है कि नींद से जुड़ी समस्याओं का असर प्रजनन क्षमता पर पड़ता है। शोधकर्ता डॉ. वैग का कहना है कि महिलाएं को बच्चे जन्म देने की उम्र तक जल्द ही साेने की आदत डालनी चाहिए और नाइट शिफ्ट से बचना चाहिए।



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      early riser women more likely to be pregnant than who is working till late night

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खून में मिली कीमोथैरेपी ड्रग को छानकर अलग करने के लिए बनाया फिल्टर, तेज हो सकेगी कैंसर से रिकवरी


हेल्थ डेस्क. कैंसर मरीज को कीमोथैरेपी के खतरों से बचाने के लिए कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक खास तरह का 3डी प्रिंटेड ड्रग स्पंज तैयार किया है। यह ट्रीटमेंट के दौरान दिए कीमोथैरेपी ड्रग को रक्त से अलग करता है ताकि दवाओं की हाई डोज को पूरे शरीर में सर्कुलेट होने से रोका जा सके। वैज्ञानिकों का कहना है कि डिवाइस की मदद से कैंसर मरीज को हाई डोज देकर इलाज में तेजी लाई जा सकती है।

  1. वैज्ञानिकों के मुताबिक, कैंसर को खत्म करने के लिए कीमोथैरेपी के दौरान 100 से अधिक तरह ड्रग दिए जाते हैं जो ब्लड में मिलकर कैंसरस ट्यूमर को खत्म करने का काम करते हैं। लेकिन दवाएं रक्त में मिलकर पूरे शरीर में सर्कुलेट होती हैं जो शरीर को नुकसान पहुंचाती हैं। इस समस्या को खत्म करने के लिए ड्रग स्पंज बनाया गया है। जो कीमोथैरेपी के ठीक बाद रक्त में से दवाओं को फिल्टर शुद्ध रक्त बॉडी मेंं रिलीज करता है। वर्तमान में टेस्ट कीमो ड्र्रग डोक्सोरुबिसिन पर किया गया है जिसका इस्तेमाल कई तरह के कैंसर में किया जाता है।

  2. एक रोल के आकार का 3 मिमी लंबाई का स्पंज पॉली डाईएक्रेलेट से तैयार किया गया है। इसकी अंदरूनी संरचना ऐसी है कि जो सिर्फ ब्लड को फिल्टर करता है और कीमो ड्रग को रोक देता है। शोधकर्ता बेलसरा का कहना है कि यह फिल्टर केमिकल इंजीनियर के कॉन्सेप्ट पर काम करता है। जैसे पेट्रोलियम रिफाइनरी ऑयल से सल्फर को निकाने का काम करती हैं। यह रिसर्च अमेरिकन केमिकल साेसायटी के जर्नल सेंट्रल साइंस में प्रकाशित हो चुकी है।

  3. शोध अभी सुअरों पर किया गया है। लिवर कैंसर से पीड़ित सुअरों के शरीर में कीमोड्रग इंजेक्ट (डोक्सोरुबिसिन ) किया गया। कीमोफिल्टर की मदद से 64 फीसदी ड्रग को ब्लड से अलग किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कीमोथैरेपी के दौरान 100 से अधिक ड्र्रग का इस्तेमाल किया जाता है जो अक्सर शरीर की सामान्य क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। करीब 50-80 फीसदी ड्रग कैंसर ट्यूमर तक नहीं पहुंच पाते हैं और रक्त में घुलकर पूरे शरीर में फैलकर नुकसान पहुंचाते हैं।

  4. वैज्ञानिकों के मुताबिक, डिवाइस की मदद से किस हद तक कीमोथैरेपी के साइड इफेक्ट कम किए जा सकते हैं इस पर काम जारी है। साथ ही धमनियों में रक्त के थक्कों से भी निपटा की कोशिशें जारी हैं। ब्रिटेन में हर साल 6 लाख 50 हजार लोगों को कीमोथैरेपी दी जाती है।

  5. कैंसर की स्थिति में शरीर में मौजूद कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ना शुरू हो जाती हैं। कीमोथैरेपी की मदद से दिया जाने वाला ड्रग इन कोशिकाओं को खत्म करता है। लेकिन इन दवाओं के कारण सामान्य और स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है। साइड इफेक्ट के रूप में बालों का झड़ना, संक्रमण, सुनने में दिक्कत होना, सांस लेने में तकलीफ होना, थकान लगना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। कुछ मामलों में कीमोथैरेपी के साइडइफेक्ट ट्रीटमेंट के बाद दिखाई देते हैं।



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      drug sponge reduces side effect of chemotherapy as it removes drug from blood

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हर 20 हजार साल में हरा-भरा हो जाता है दुनिया का सबसे बड़ा सहारा रेगिस्तान


लाइफस्टाइल डेस्क. एक रिसर्च में दावा किया गया है कि सहारा मरुस्थल हर 20 हजार साल में बदलता है। यह कभी सूखा तो कभी हर-भरा हो जाता है। मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) की रिसर्च में शोधकर्ताओं ने कहा कि मरुस्थल का काफी हिस्सा (3.6 मिलियन स्क्वैयर) उत्तरी अफ्रीका में है जो हमेशा से सूखा नहीं था। यहां की चट्टानों पर बनी पेंटिंग और जीवाश्मों की खुदाई से मिले प्रमाण बताते हैं कि यहां पानी था। इंसान के अलावा पेड़-पौधों और जानवरों की कई प्रजातियां भी मौजूद थीं। यह रिसर्च साइंस एडवांसेस मैगजीन में प्रकाशित हुई है।

  1. एमआईटी के शोधकर्ताओं ने मरुस्थल के पिछले 2 लाख 40 हजार सालों का इतिहास समझने के लिए पश्चिमी अफ्रीका के किनारों पर जमा धूल-मिट्टी का विश्लेषण किया। शोधकर्ताओं का कहना है कि हर 20 हजार साल में सहारा मरुस्थल और उत्तरी अफ्रीका बारी-बारी से पानीदार और सूखे रहे हैं। यह क्रम लगातार जारी रहा है। जलवायु में यह परिवर्तन पृथ्वी की धूरी में बदलाव के कारण होता है।

  2. रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। अलग-अलग मौसम में सूर्य की किरणों का वितरण प्रभावित होता है। हर 20 हजार साल में पृथ्वी अधिक धूप से कम की ओर घूमती है। उत्तर अफ्रीका में ऐसा होता है।

  3. जब पृथ्वी पर गर्मियों में सबसे ज्यादा सूरज की किरणें आती हैं तो मानसून की स्थिति बनती है और यह पानीदार जगह में तब्दील हो जाता है। जब गर्मियों में पृथ्वी तक पहुंचने वाली सूर्य की किरणों की मात्रा में कमी आती है तो मानसून की गतिविधि धीमी हो जाती है और सूखे की स्थिति बनती है, जैसी आज है।

  4. हर साल उत्तर-पूर्व की ओर से चलने वाली हवाओं के कारण लाखों टन रेत अटलांटिक महासागर के पास दक्षिण अफ्रीका के किनारों पर पर्तों के रूप में जमा हो जाती हैं। धूल-मिट्टी की ये मोटी पर्तें उत्तरी अफ्रीका के लिए भौगोलिक प्रमाणों की तरह काम करती हैं।

  5. मोटी पर्तों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि यहां सूखा था और जहां पर धूल कम है वो जगह इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्र में कभी पानी मौजूद था। सहारा मरुस्थल से जुड़ी रिसर्च का नेतृत्व करने वाले एमआईटी के पूर्व अनुसंधानकर्ता चार्लोट ने पिछले 2 लाख 40 हजार साल तक जमा हुईं पर्तों का विश्लेषण किया है।

  6. चार्लोट के अनुसार, पर्तों में धूल के अलावा रेडियोएक्टिव पदार्थ थोरियम के दुर्लभ आइसोटोप भी पाए गए हैं। इसकी मदद से यह पता किया गया है कि धूल-मिट्टी ने कितनी तेजी से पर्तों का निर्माण किया है।

  7. हजारों साल पुरानी चट्टानों की आयु का पता लगाने के लिए यूरेनियम-थाेरियम डेटिंग तकनीक का प्रयोग किया जाता है। रिसर्च के मुताबिक, समुद्र में बेहद कम मात्रा में रेडियोएक्टिव पदार्थ यूरेनियम के घुलने से एक नियत मात्रा में थोरियम का निर्माण होता रहा है, जो इन पर्तों में मौजूद है।



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      Sahara swung between lush and desert conditions every 20,000 years says mit study

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53 प्रतिशत महिलाएं शारीरिक रूप से कम सक्रिय, एक दिन में 44 फीसदी ही कैलोरी बर्न कर पाती हैं


हेल्थ डेस्क@ बेंगलुरु. देश की 53% महिलाओं की शारीरिक एक्टिविटी जरूरी स्तर से कम है। पुरुषों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। करीब 48% पुरुष फिजिकली इनएक्टिव हैं। ये नतीजा बेंगलुरू के फिटनेस एप हेल्दीफाई मी के एक हालिया सर्वे से निकले हैं। सर्वे के मुताबिक, बेंगलुरू, गुरुग्राम के लोग अपनी सेहत को लेकर सबसे ज्यादा सतर्क हैं, जबकि कोलकाता, लखनऊ, अहमदाबाद के लोग सेहत पर सबसे कम ध्यान दे रहे हैं।

  1. एप ने 25 साल से अधिक की करीब 10 लाख भारतीयों की सेहत से जुड़ी आदतों पर सर्वे किया और उसके आधार पर ‘फिजिकल एक्टिविटी लेवल ऑफ इंडियंस’ नाम से रिपोर्ट तैयार की। नतीजा निकला किफिजिकल एक्टिविटी के साथ-साथ महिलाओं का कैलोरी बर्न भी पुरुषों से कम है।

  2. महिलाओं को एक दिन में जितनी कैलोरी बर्न करनी चाहिए, उसकी सिर्फ 44% ही बर्न कर पाती हैं। वहीं, पुरुष एक दिन के जरूरी कैलोरी बर्न का करीब 55% लक्ष्य हासिल करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं को एक दिन में औसतन 374 कैलोरी बर्न करनी चाहिए। इसमें से वो औसतन 165 कैलोरी ही बर्न कर पाती हैं। वहीं पुरुषों को एक दिन में औसतन 476 कैलोरी बर्न करनी चाहिए, जिसमें से वो करीब 262 कैलोरी बर्न कर लेते हैं।

  3. कैलोरी बर्न का सीधा संबंध शारीरिक सक्रियता से ही होती है। सर्वे करने वाले एप के सीईओ तुषार वशिष्ठ का कहना है कि "ये बड़ी चिंता वाली बात है कि देश की आधी आबादी जरूरी फिजिकल एक्टिविटी ही नहीं कर रही है। अगर हम देश के महिला-पुरुषों को मिलाकर बात करें तो हर व्यक्ति जरूरी फिजिकल एक्टिविटी का महज 50% लक्ष्य ही हासिल कर पा रहा है।

  4. इसकी सबसे बड़ी वजह है- रोजमर्रा की गलत आदतें और खान-पान में पौष्टिक चीजों का शामिल न होना। यही आदतें मोटापे, हायपरटेंशन, डायबिटीज का कारण बनती हैं। सर्वे में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई। फिजिकल एक्टिविटी का 30 साल के आस-पास की उम्र वाले लोगों में भी बहुत खराब स्तर है।

  5. सर्वे करने वाले एप ने अलग-अलग शहरों के लोगों के फिटनेस बैंड या फोन के फिटनेस एप का डेटा इकट्‌ठा कर उसके आधार पर नतीजे निकाले। ये भी पता चला कि बड़े शहर यानी टियर-1 के लोग एक दिन में औसतन 407 कैलोरी बर्न कर रहे हैं। वहीं छोटे शहर यानी टियर-2 वाले एक दिन में औसतन 371 कैलोरी ही बर्न कर पा रहे हैं। यानी टियर-1 शहर वाले टियर-2 की तुलना में ज्यादा एक्टिव हैं।



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      fitness app surveys 53 indian women are less active and burns only 44 percent calorie

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फिल्ममेकर राकेश रोशन को हुआ गले का कैंसर, यह अल्कोहल और टोबेको के कारण होता है


हेल्थ डेस्क. फिल्ममेकर राकेश रोशन गले के कैंसर की पहली स्टेज से जूझ रहे हैं। इसका खुलासा अभिनेता रितिक रोशन ने मंगलवार को ट्विट के जरिए किया। ट्विट के मुताबिक, उनके पिता को गले के कैंसरस्क्वेमस सेल कार्सिनोमा (Squamous Cell Carcinoma) की पहली स्टेज डायग्नोज हुई है।अल्कोहल और टोबेको इसका बड़ा कारण है।

ऋत‍िक रोशन, ने पापा राकेश रोशन के साथ ज‍िम में वर्कआउट के दौरान एक तस्वीर पोस्ट की है। इसमें उन्होंने ल‍िखा, मैंने आज सुबह डैड से वर्कआउट करने के लिए पूछा, मुझे पता था वो सर्जरी के द‍िन भी एक्सरसाइज करना नहीं छोड़ेंगे। हाल ही में गले में Squamous Cell Carcinoma का पता चला। आज वो अपनी जंग लडेंगे। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमारी फैमिली को आपके जैसा लीडर मिला।

क्या होता है स्क्वैमस सेल कार्सिनाेमा

  • स्क्वैमस सेल कार्सिनाेमा ऑफ थ्रोट गले का कैंसर का होता है। यह टॉन्सिल से जुड़ा कैंसर है जो ज्यादातर पुरुषों को होता है। पश्चिम यूरोप के देशों जैसे फ्रांस में इसके मामले अधिक देखे जाते हैं। इसका मुख्य कारण अधिक अल्कोहल लेना और स्मोकिंग करना है।
  • गले के कैंसर का कारण वायरस इंफेक्शन भी हो सकता है। कुछ मामलों में इसका कारण ह्यूमन पेपिलोमा वायरस, हरपीज सिम्प्लैक्स वायरस और एचआईवी का संक्रमण भी होता है। इस कैंसर से जूझ रहे मरीज में फेफड़े और ब्लैडर कैंसर की आशंका भी होती है क्योंकि इन बीमारियों के रिस्क फैक्टर भी एक ही जैसे होते हैं।
  • खाना निगलने में दर्द महसूस होना, मुंह और गले में छाले निकलना, गले में गांठ और कान में दर्द रहना जैसे लक्षण गले के कैंसर की ओर इशारा करते हैं। लक्षण दिखने पर ऑन्कोलॉजिस्ट से सलाह लें।

ऐसे तय होती है गले के कैंसर की स्टेज

  • अगर ट्यूमर 2 सेमी. का है और गले तक सीमित है तो इसे पहली स्टेज का कैंसर कहते हैं। ट्यूमर का आकार 4 सेमी. हो गया है और गले के आसपास बढ़ गया है तो इसे स्टेज-2 कहते हैं। वहीं इसके 4 सेमी से अधिक बढ़ने और लिम्फ नोड तक फैलने पर तीसरी और लिम्फ नोड व शरीर के दूसरे अंगों तक फैलने पर चौथी स्टेज का कैंसर कहा जाता है।


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Rakesh Roshan diagnosed cancer know what is Squamous Cell Carcinoma a type of skin cancer

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साल में खाना चाहिए 7 किलो तेल, खा रहे हैं 18 किलो


हेल्थ डेस्क. बदलती खान-पान की आदतों के कारण देश में लगातार खाद्य तेलों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। देश में एक व्यक्ति अभी औसतन 17.5-18 किलो तेल प्रतिवर्ष खा रहा है, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को अधिकतम 7 किलो तेल का इस्तेमाल ही एक साल में करना चाहिए। वहीं स्वास्थ्य के प्रति सचेत लोगों ने नए तरह के ऑइल (जैसे ऑलिव, अवोकाडो) का इस्तेमाल भी बढ़ा दिया है। वे तेल का इस्तेमाल बदल-बदलकर कर रहे हैं। देश में राइस ब्रान का उपयोग प्रतिवर्ष करीब 50 हजार टन बढ़ रहा है, जबकि उच्च आय वर्ग खाने में ऑलिव ऑइल को तरजीह दे रहा है।

भारत में पिछले 8 साल के दौरान सनफ्लॉवर तेल का उपयोग करीब ढाई गुना बढ़ गया है, जबकि मूंगफली (पीनट) के तेल का इस्तेमाल कम हुआ है। वहीं दूसरी ओर, करीब 23 वर्ष बाद भी वनस्पति घी की मात्रा लगभग स्थिर है, यह 10 लाख टन के आसपास बनी हुई है। वनस्पति घी का 80 फीसदी तक व्यावसायिक उपयोग हो रहा है। द सॉल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार देश में वर्तमान में करीब 17.5 से 18 किलो तेल का उपयोग औसतन एक व्यक्ति द्वारा हो रहा है। 2017-18 में 16.5 किलो तेल औसतन प्रति व्यक्ति की खपत का अनुमान था। इसमें घरेलू उपभोग के तेल के अतिरिक्त होटल-रेस्त्रां और कमर्शियल यूज़ भी शामिल है।

सेहत के लिए अच्छा होता है तेल बदल-बदल कर खाना

न्यूट्रीशियन दीप्ति रावत बताती हैं कि स्वास्थ्य के लिए नेचुरल ऑइल का प्रयोग ही सही है। ऑलिव ऑइल का इस्तेमाल करते समय ध्यान देना चाहिए कि यह डीप फ्राइ के लिए नहीं है। इसमें स्मोकिंग पॉइंट कम होता है, इसका उपयोग सलाद आदि में अधिक फायदेमंद है। रावत कहती हैं कि एक टी स्पून (पांच एमएल) घी और अधिकतम 15 से 20 एमएल तेल का उपयोग चालीस वर्ष से अधिक की उम्र के व्यक्ति को करना चाहिए जबकि इससे कम उम्र के लोगों को अधिकतम 20 से 25 एमएल तेल प्रतिदिन का प्रयोग करना चाहिए। तेल का उपयोग करते समय ध्यान रखना चाहिए कि इसे बदल-बदलकर खाना चाहिए। इस तरह औसतन एक व्यक्ति को एक वर्ष में करीब सात किलो तेल का उपयोग आदर्श स्थिति में करना चाहिए।

पाम ऑयल का होता है सबसे ज्यादा आयात

भारत में वर्तमान में खाद्य तेलों की खपत 2.5 से तीन फीसदी की दर से बढ़ रही है। देश में सर्वाधिक आयात पाम तेल का होता है, इसका सबसे ज्यादा उपयोग व्यावसायिक इस्तेमाल में हो रहा है। इस संबंध में अडानी विल्मर के निदेशक और एसईए के अध्यक्ष अतुल चतुर्वेदी बताते हैं कि स्वास्थ्य के प्रति सजगता बढ़ी है इसलिए ऑलिव ऑइल और राइस ब्रान जैसे तेलों का उपयोग बढ़ रहा है। ऑलिव ऑइल का उपयोग अभी 10 हजार मीट्रिक टन से अधिक प्रतिवर्ष है। यह मात्रा बहुत थोड़ी है। बीते तीन-चार सालों में सनफ्लॉवर का उपयोग तेजी से बढ़ा है। एसईए के कार्यकारी निदेशक डॉ. बीवी मेहता ने बताया कि देश में औसतन तेल की खपत 230 लाख टन वार्षिक की है। राइस ब्रान के एडिबल केटेगिरी में आने के बाद से इसका उपयोग तेजी से बढ़ा है वर्तमान में करीब दस से 11 लाख टन तेल प्रतिवर्ष का उपयोग हो रहा है। हर वर्ष करीब 50 हजार टन राइस ब्रान तेल का उपयोग बढ़ रहा है। देश में करीब 50 फीसदी लूज और इतना ही पैक्ड ऑइल बिक रहा है।

फूड एक्सपर्ट और होटल-रेस्त्रां मैनेजमेंट कंपनी फूड डिजाइन हॉस्पिटैलिटी सिस्टम्स के सीएमडी एचए मिश्रा के मुताबिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का असर है कि परंपरागत रूप से नारियल का प्रयोग करने वाले दक्षिण भारत में सनफ्लॉवर, मध्य भारत में सरसों और पश्चिम भारत में सोयाबीन का प्रयोग बढ़ रहा है। वहीं दूसरी ओर कोलेस्ट्रॉल और फैट कम करने वाले गुणों के कारण राइस ब्रान, ऑलिव ऑइल और सनफ्लॉवर का प्रयोग बढ़ रहा है। अधिक कीमत होने के कारण ऑलिव ऑइल का प्रयोग आर्थिक रूप से समृद्ध घरों में हो रहा है। फाइव स्टार होटल में बनने वाला 30 फीसदी खाना इसी तेल से बन रहा है। जबकि इटैलियन और विदेशी रेस्त्रां में तो 90 फीसदी तक खाना पकाने में इसका प्रयोग किया जाता है।

इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. केके पांडे कहते हैं कि अगर महीने में परिवार में तीन किलो तेल का प्रयोग किया जाता है तो एक किलो सरसों, एक किलो तिल और एक किलो सनफ्लॉवर के तेल का उपयोग होना चाहिए। कहने का आशय यह है कि तेलों को बदल-बदलकर उपयोग करना चाहिए जो स्वास्थ्य के लिए सही रहता है। एक व्यक्ति को एक दिन में दो बड़े चम्मच ही तेल का सेवन करना चाहिए।

क्रूड और सोने के बाद सर्वाधिक आयात तेल का


जीजीएन रिसर्च के मैनेजिंग पार्टनर नीरव देसाई के अनुसार क्रूड ऑयल और सोने के बाद खाद्य तेलों का देश में सर्वाधिक आयात होता है। भारत अपने खाद्य तेल की आवश्यकता का करीब 75% आयात करता है और 11.5 अरब डॉलर (करीब 80 हजार करोड़ रु.) का इंपोर्ट करता है। देश में सोयाबीन तेल का आयात ब्राजील, अर्जेंटीना और पराग्वे से, सनफ्लॉवर तेल का यूक्रेन, रूस, अर्जेंटीना से, पाम तेल का इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड से सर्वाधिक होता है।

खाद्य तेलों की खपत

तेल 2008-09 2016-17
सोयाबीन 21.12 48.95
पाम ऑइल 63.92 91.05
सरसों 16.10 21.21
मूंगफली 5.91 5.31
कॉटन सीड 9.65 11.89
सनफ्लाॅवर 8.46 21.16
अन्य 15.43 17.83
कुल 140.59 217.5

(खपत लाख टन में)
(आंकड़े द सॉलवेंड एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट, जीजीएन रिसर्च पर आधारित।)

  1. ऑलिव

    न्यूट्रीशनिस्ट दीप्ति रावत कहती हैं इसमें एंटी ऑक्सीडेंट्स हैं, जो आर्थराइटिस के दर्द को कम करते हैं। ये पार्किन्सन और अल्जाइमर से बचाता है। ऑलिव ऑयल दिल के लिए बेहद फायदेमंद होता है।
    लेकिन इसके 5 एमएल में करीब 45 कैलोरी होती है।

  2. मूंगफली


    इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के डॉ. केके पांडे कहते हैं कि इसमें मोनो और पॉलीअनसैचुरेटेड फैट होते हैं, जिससे बैड कॉलेस्ट्रॉल कम होता है।

    लेकिनयह तेल बहुत भारी होता है।

  3. राइस ब्रान

    इसमें ओरीज़नॉल पाया जाता है। जिससे कॉलेस्ट्रॉल लेवल कम होता है। यह तेल इंसुलिन रेजिस्टेंस को बेहतर करता है। इसमें स्क्वालीन भी पाया जाता है, जो त्वचा को बेहतर बनाता है।
    लेकिन इस तेल में ओमेगा-3 नहीं के बराबर होता है, जो सेहत के लिए ठीक नहीं है।

  4. सरसों

    फूड एक्सपर्ट एचए मिश्रा बताते हैं कि यदि इसेसंतुलित मात्रा में खाया जाएतो यह पाचन बेहतर करता है और इससेभूख भी बढ़तीहै। सरसों का तेलसर्दी औरत्वचा की बीमारियों में फायदेमंद होता है।
    लेकिनइसमें इरूसिक एसिड पाया जाताहै। जो दिल और फेफड़े के लिए खतरा है।

  5. सनफ्लॉवर

    ओमेगा-6 और विटामिन ई होने के कारण यह शरीर की कोशिकाओं के लिए अच्छा है। सनफ्लॉवर ऑयल कैंसर और दिल की बीमारियों से बचाता है। इससे प्रतिरक्षा तंत्र और तंत्रिका तंत्र बेहतर होता है।
    लेकिन इसमें सैचुरेटेड फैट ज्यादा होता है जिसके कारणअधिक सेवन से कॉलेस्ट्रॉल बढ़ता है।



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      oil consumption in India, pros and cons of different oils

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मटके को जमीन में उल्टा रखकर पकाई जाती है किंग ऑफ गुजराती डिशेज 'उंधियू'


लाइफस्टाइल डेस्क. उंधियू गुजरात की एक खासडिश है, जो ज्यादातर सर्दियों के मौसम में ही बनाई और खाई जाती है। इसमें खासकर दक्षिणी गुजरात में सर्दी के मौसम में इफरात से मिलने वाली कई तरह की सब्जियां डाली जाती हैं। माना जाता है कि इस डिश का ईजाद सूरत में हुआ था। हालांकि इसको लेकर दूसरे शहर भी दावे कर सकते हैं। आज इसी डिश के बारे में बता रहे हैं शेफ हरपाल सिंह सोखी...

उल्टे मटके में पकाने से मिला नाम उंधियू

इस डिश को यह नाम मिला है गुजराती शब्द 'उंधू' से जिसका मतलब होता है उलटा। दरअसल, पारंपरिक तौर पर उंधियू को मिट्‌टी के मटके में बनाया जाता है। इसमें इस्तेमाल होने वाली सभी सब्जियों को केले के पत्तों में लपेटकर उन्हें मटके में भर दिया जाता है। फिर मटके के मुंह पर आम के पत्ते रखकर उसे आटे से सील कर दिया जाता है। जमीन में गड्ढा खोदकर उसमें आग जलाते हैं और फिर इस मटके को गड्ढे में उलटा रख देते हैं। मटके के भीतर सब्जियों को करीब दो घंटे तक धीमी आंच पर पकाया जाता है। दो घंटे बाद जब उसे निकाला जाता है, तो बन जाता है उंधियू। लेकिन उंधियू को बनाने का यह तरीका अतीत की बात हो चुकी है। शहरों या कस्बों में अब बहुत ही कम लोग इस तरीके से उंधियू बनाते हैं। आजकल उंधियू को गैस पर ही कुकर या कड़ाही आदि में बनाया जाता है।

तली मुठिया और बनाने का तरीका देता है खास स्वाद

इस डिश में मुख्य रूप से हरी बीन्स या ताजी मटर के दाने, कच्चे केले, छोटे बैंगन, छोटे आलू और यम (कंद) जैसी सब्जियां डलती हैं जो दक्षिण गुजरात के इलाकों जैसे सूरत, नवसारी और वलसाड में ठंड के मौसम में प्रचुरता से मिलती हैं। अब आप सोचेंगे कि यह तो मिक्स वेजिटेबल है। इसमें नया क्या है? जी हां, नया है तो इसमें डलने वाले मुठिया और इसे बनाने का तरीका। भले ही इसे अब मटके में नहीं बनाया जाता हो, तब भी इसे पकाने का तरीका आम सब्जी से अलग ही है। ये मुठिया ही उंधियू को खास बनाते हैं। उंधियू बनाने से पहले मुठिया बनाए जाते हैं। मुठिया बनाने के लिए बेसन के आटे में मेथी की भाजी को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर मिलाया जाता है और फिर उसे पूरी के आटे की तरह गूंध लिया जाता है। उन्हीं के छोटे-छोटे रोल्स कर उन्हें बाद में तेल में तलकर मुठिया बनाए जाते हैं।

खास मसालों से खिलता है रंग

पिसे हुए भुने तिल, पिसे हुए भुने मूंगफली के दाने, कद्दूकस किया हुआ अदरक, पिसी हुई हरी मिर्च, पिसा हुआ हरा धनिया, नमक, मिर्च, धनिया पाउडर, अमचूर पाउडर, गुड़ या शक्कर आदि को थोड़े से तेल और पानी या छाछ में अच्छी तरह से भूनकर मसाला बनाया जाता है। इसी मसाले के इस्तेमाल से बनता है उंधियू। यहां हम इसकी पूरी विधि नहीं बता रहे हैं, लेकिन इतने से ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि उंधियू बनाने की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है। उंधियू बनाने वाले को पर्याप्त समय और धैर्य का परिचय देना पड़ता है। जाहिर है, जब इतना समय लगेगा तो चीज भी तो स्वादिष्ट बनेगी ही। गुजराती परिवारों में उंधियू को गरमा-गरम चपाती या पूरी के साथ परोसा जाता है। यह शादियों में भी एक शानदार पकवान होता है।

सर्दियों के लिए रसम का नया अंदाज 'मिलागू रसम'

चलते-चलते दक्षिण भारत के गरमागरम रसम की भी बात कर लेते हैं। वैसे तो रसम दक्षिण भारत की सदाबहार डिश है। लेकिन सर्दियों के मौसम में इसमें भी थोड़ा ट्विस्ट दे दिया जाता है। इस मौसम में रसम में काली मिर्च की मात्रा काफी बढ़ा दी जाती है। काली मिर्च सर्दी के दिनों में शरीर को अंदर से गर्म रखती है। इस रसम को 'मिलागू रसम' कहा जाता है।



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story of Gujarati dish undhiyu and milagu rasam by chef harpal singh sokhi

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सेहत के खजाने से भरपूर होता है दूध, पीने के भी है खास नियम


हेल्थ डेस्क. दूध को सुपर फूड माना गया है। हमारे यहां आयुर्वेद में भी इसकी काफी अहमियत बताई गई है। यह कई तरह के पोषक तत्वों जैसे कैल्शियम, प्रोटीन, आयोडीन, पोटैशियम, फॉस्फोरस, विटामिन बी-12 और विटामिन बी-2 का अच्छा सोर्स है। इसलिए यह अपने आप में एक पूर्ण आहार भी है। नियमित तौर पर रोजाना दूध लेने से ताकत और रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ती है। लेकिन दूध पीने के भी कुछ नियम हैं। आज इन्हीं नियमों के बारे में बता रहीं है डाइट एंड वेलनेस एक्सपर्ट डॉ. शिखा शर्मा...

  1. दूध पीने का सबसे बेहतर समय रात को सोने से पहले का है। डिनर के कम से कम एक घंटे बाद गुनगुना दूध पीने से न केवल दिनभर का तनाव दूर होता है, बल्कि तनाव दूर होने से नींद भी अच्छी तरह से आती है। सुबह के समय दूध लेने से उसे पचाने में दिक्कत होती है। कई लोगों को इससे गैस की प्रॉब्लम भी हो सकती है। हालांकि बच्चे सुबह के समय दूध पी सकते हैं क्योंकि दिनभर सक्रिय रहने के कारण उनमें पाचन संबंधी समस्या नहीं होती।

  2. गुनगुना और ठंडा दूध दोनों के अपने-अपने फायदे हैं। अगर आप सामान्य फायदों जैसे कैल्शियम, फॉस्फोरस आदि पोषण तत्व हासिल करना या इम्युनिटी बढ़ाना चाहते हैं तो गुनगुना दूध पीना चाहिए। लेकिन अगर आपको एसिडिटी की समस्या है तो ठंडा दूध पीना चाहिए। लेकिन यहां ठंडे दूध से मतलब कच्चे दूध से कतई नहीं है और न ही फ्रिज से एकदम बाहर निकाला हुआ। दूध को एक बार अच्छी तरह से उबाला तो जाना ही चाहिए। उबालने के बाद उसे कमरे के तापमान पर ठंडा करके पीना ही बेहतर रहेगा।

  3. जो लोग लेक्टोस इन्टॉलरेंस हैं, उन्हें दूध तो क्या, दूध से बने तमाम उत्पादों का सेवन करने से बचना चाहिए। लेक्टोस इन्टॉलरेंस में शरीर दूध (या अन्य डेयरी प्रोडक्ट्स) में प्राकृतिक रूप से मौजूद शक्कर को भी नहीं पचा पाता है। इससे उलटी, अपच जैसी समस्याएं होती हैं। जिन लोगों का हाजमा बहुत ही ज्यादा खराब रहता है, उन्हें भी दूध पीने से बचना चाहिए, भले ही उन्हें लेक्टोस इन्टॉलरेंस की समस्या हो या न हो।

  4. अगर आप मांसाहारी हैं और मछली खाते हैं तो इस बात का बहुत ध्यान रखें कि मछली वाले भोजन के साथ या इसके तुरंत बाद दूध बिल्कुल नहीं पिएं। इसी तरह खट्टे फलों के साथ या तुरंत बाद भी दूध पीना अवॉइड करना चाहिए। नमकीन के साथ भी दूध नहीं लेना चाहिए। इस तरह के कॉम्बिनेशन्स से शरीर में कई तरह के टॉक्सिन्स पैदा होते हैं जो सेहत के लिए हानिकारक होते हैं। इसीलिए खाना खाने के कम से कम एक घंटे बाद ही दूध पीने की सलाह दी जाती है।

  5. वैसे तो ऐसी कई चीजें हैं जिन्हें दूध के साथ लेने से इसके फायदे कई गुना बढ़ जाते हैं। लेकिन हम यहां दो चीजों के बारे में बता रहे हैं। एक, दूध और हल्दी। रात के समय गुनगुने दूध में एक चुटकी हल्दी पाउडर मिलाकर पिएं। हल्दी में एंटी बैक्टीरियल और हीलिंग प्रॉपर्टी होती है जिससे इम्युनिटी पॉवर बढ़ती है। दूसरा, दूध और खजूर। दोनों में प्रोटीन की भरपूर मात्रा होती है। ऐसे में दूध में खजूर डालकर पीने से हडि्डयों की सघनता बढ़ती है और मसल्स भी मजबूत बनती हैं।



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      five important things to remember about drinking milk by Dr. Shikha Sharma

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पॉकेट स्कैनर बताएगा कोई चीज खाने लायक है या नहीं, एक्सपायरी डेट भी पता चल सकेगी


साइंस डेस्क. जर्मनी में फ्रैनहॉफर इंस्टीट्यूट ने एक पॉकेट साइज फूड स्कैनर बनाया है। यह किसी भी फूड आइटम को स्कैन करके बता सकता है कि वह खाने लायक गुणवत्ता का है या नहीं। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह पता लगाने के लिए स्कैनर इन्फ्रारेड किरणों का इस्तेमाल करता है। इसे बनाने वाले शोधकर्ताओं का दावा है कि इसडिवाइस की मदद से खाने की एक्सपायरी डेट भी पता की जा सकती है।

  1. ‘वी रेस्क्यू फूड' प्रोजेक्ट के तहत बावेरियन मिनिस्ट्री ऑफ फूड, एग्रीकल्चर एंड फॉरेस्ट्री और फ्रॉनहॉफर इंस्टीट्यूट ने मिलकर खाने की जांच करने वाली यह डिवाइस बनाई है। अभी इसे डेमो देने के लिए ही बनाया गया है, लेकिन जल्द ही इसे कहीं भी ले जा सकने लायक रूप में तब्दील कर बाजार में उपलब्ध कराया जाएगा।

  2. शोधकर्ताओं के अनुसार, खाना कैसा है, यह जांचने के लिए डिवाइस उस पर इंफ्रारेड किरणें डालती है। रिफ्लेक्ट हुई किरणों के स्पेक्ट्रम की जांच करने के बाद वेवलेंथ से फूड के केमिकल कंपोजिशन का पता लगाया जाता है। स्कैनर से यह जानकारी ब्लूटूथ के जरिए डाटाबेस तक पहुंचाई जाती है और यहां से यूजर को मिलती है।

  3. शोधकर्ता इसके लिए मोबाइल एप भी विकसित कर रहे हैं जिसमें टेस्ट के रिजल्ट दिखाई देंगे। खाने को प्रिजर्व करने के लिए कौन सी स्थिति बेहतर है जिससे वह ज्यादा समय तक खाने योग्य रहेगा, इसकी भी जानकारी मिलेगी। खराब हो चुके खाने का इस्तेमाल किस रूप में किया जा सकता है, इसकी जानकारी भी यूजर तक पहुंचेगी। एक रिसर्च के मुताबिक, सिर्फ जर्मनी में ही हर साल करीब 10 मिलियन मीट्रिक टन खाना कचरे में फेंका जाता है।



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      german researchers makes pocket size food scanner

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21.5 करोड़ रुपए में बिकी 278 किलो वजनी टूना फिश, रेस्तरां मालिक ने खरीदा


टोक्यो. जापान में एक बार फिर ब्लूफिन टूना मछली चर्चा में है। टोक्यो के बिजनेस टायकून कियोशी किमुरा ने नए मछली मार्केट से साल की पहली नीलामी में टूना को 21.5 करोड़ रुपए में खरीदा। यह एक रिकॉर्ड है। मछली का वजन 278 किलोग्राम था। कियोशी किमुरा सूशी रेस्तरां चेन के मालिक हैं।

  1. 'टूना किंग' के नाम से मशहूरकियोशी किमुरा ने इस मछली के लिए 333.6 मिलियन येन की बोली लगाई, जो भारतीय रुपए में करीब 21.5 करोड़ होते हैं। यह कीमत 2013 में लगाई गई रिकॉर्ड 155 मिलियन येन (9 करोड़ 93 लाख) से दोगुनी है। 2013 में भीकिमुरा ने ही यह कीमत चुकाई थी।

  2. किमुरा ने कहा, ''यह बेस्ट टूना है। मैं एक स्वादिष्ट, बेहद ताजी टूना खरीदने में कामयाब रहा। वास्तव में जैसा सोचा था, कीमत उससे ज्यादा थी। लेकिन, मुझे उम्मीद है कि हमारे ग्राहक इस बेहतरीन टूना का स्वाद ले सकेंगे।''

    • ब्लूफिन टूना मछली बमुश्किल पाई जाती है, जिसे जापान के उत्तरी तट से पकड़ गया था
    • इससे तैयार होने वाली डिश जापानी लोगों को काफी पसंद है
    • ब्लूफिन पर लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा
    • काफी पसंदीदा होने के कारण इसका अधिक शिकार किया जा रहा


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      टूना फिश के साथ टोक्यो के बिजनेसमैन कियोशी किमुरा।
      japan bluefin tuna fish makes a record and soldin crores in japan
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वैज्ञानिकों ने अलादीन के कालीन जैसी चटाई बनाई, यह खुद चलेगी और आकार भी बदलेगी


लाइफस्टाइल डेस्क. अमेरिकी शोधकर्ताओं ने अलादीन की कहानियों में बताए गए ‘जादुई कालीन' की तर्ज पर आकार बदलने वाली लचीली शीट बनाई है। यह एक खास तरह के फ्लुइड (तरल पदार्थ) के संपर्क में आने पर खुद चल सकती है। एक रासायनिक प्रक्रिया के जरिए फ्लुइड गतिशील हो जाता है। इसके साथ ही लचीली शीट भी चलने लगती है।

  1. शोध कर रही यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के वैज्ञानिक एना सी ब्लेज्स के मुताबिक रसायन की मदद से एक बेजान चीज को चलने-फिरने लायक बनाना बड़ी चुनौती है। शोध के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने इस चटाई को बनाने में गोल और चौकोर आकार के पार्टिकल का इस्तेमाल किया, जो फ्लुइड भरे माइक्रो चेंबर के अंदर खुद मूव कर सकते हैं।

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    वैज्ञानिकों के अनुसार, उन्होंने एक ऐसा सिस्टम बनाया है जो केमिकल रिएक्शन की मदद से तरल पदार्थ को गति प्रदान करता है। इसकी मदद से चटाई अपने आप चलने और मुड़ने के साथ आकार भी बदलती है। चटाई में मौजूद केमिकल कैटालिस्ट (रसायन प्रक्रिया को संचालित करने वाले कारक) की तरह काम करते हैं। ऐसा पहली बार है, जब कोई 2डी शीट कैटालिटिक केमिकल रिएक्शन की मदद से चलने के अलावा 3डी रूप में कन्वर्ट हो जाती है।

  3. चटाई में अलग-अलग जगहों पर कैटालिस्ट लगाए गए हैं जो इसमें मौजूद तरल पदार्थ को कंट्रोल करने का काम करते हैं। शोध टीम से जुड़े वैज्ञानिक ओलेग का कहना है कि यह किसी सामान को उठाने, हल्की-फुल्की चीजों को पकड़ने और जमीन साफ करने जैसा काम कर सकती है।

  4. शोध के अनुसार, यह डिवाइस चलने-फिरने में केमिकल एनर्जी का इस्तेमाल करती है। इसकी मदद से कई तरह के काम किए जा सकते हैं। इसके अलावा अगर इस डिवाइस को फूलों का आकार दिया जाए तो यह अपने आप खिलने और कली में भी तब्दील हो सकती है।



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      researchers design sheet that wraps and creeps like Aladdins magic carpet

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लौटेगा पारंपरिक तरीके से खाना पकाने का ट्रेंड और देसी खाने में दिखेगा फ्यूजन


लाइफस्टाइल डेस्क. नए स्वाद की तलाश का सिलसिला 2019 में क़दम रख चुका है। हर साल नए फूड ट्रेंड्स उभरते हैं। अभी तो यह अंदाज़ा है, लेकिन इसकी ज़मीन पुख़्ता है। देखिए इस साल भोजन में क्या बदलाव देखे जाएंगे जो लोगों के ज़ुबां का स्वाद बदलेंगे। शेफ अजय बता रहे हैं इनके बारे में...

  1. बदलती जीवनशैली के कारण अब लोग सेहत के प्रति सतर्क हो रहे हैं। यही वजह है कि इस साल लोगों का ध्यान डिनर से ज़्यादा नाश्ता और दोपहर के भोजन पर होगा जिसमें सुपरफूड का महत्व बढ़ेगा। सुबह के नाश्ते में पराठा, पोहा या ब्रेड की बजाय सुपरफूड जैसे सूखे मेवे, सभी प्रकार की दालें, कॉर्नफ्लेक्स और फल को दही या योगर्ट के साथ लिया जाएगा। वहीं लंच में मूंग दाल के चीले, सीज़नल सब्ज़ियां, ग्रिल्ड सब्ज़ियां या सलाद आदि पसंद किए जाएंगे। कूसकूस, किनोआ, मक्का और बाली का सलाद अहम होगा।

  2. व्यंजन से देश और राज्य की पहचान होती है। राज्यों के खानपान तो अपना रंग दूसरे राज्यों में जमा ही रहे हैं, चायनीज़, थाई और मेक्सिकन भोजन भी मिल जाता है, लेकिन अब दौर आ रहा है फूड यानी व्यंजन के लिए यात्रा करने का। देश के विभिन्न राज्यों की यात्रा तो लोग इस वजह से करते रहे हैं, लेकिन अब इस साल विदेश भी जाना होगा।

  3. भारत अपने स्वाद के लिए जाना जाता है। लेकिन वैश्वीकरण की वजह से हम विदेशी व्यंजनों की ओर आकर्षित होते गए और अपने पारम्परिक भोजन से दूर होते चले गए। जहां लोगों का स्वाद बदला वहीं भोजन को देखने के नज़रिए में भी बदलाव आया। पिछले साल लोगों का रुख़ मॉलिक्यूलर कुज़ीन और बबल कुज़ीन की ओर ज़्यादा रहा। लेकिन इस साल भारतीय पारम्परिक भोजन वही स्वाद और रूप में लौट रहे हैं। वहीं भोजन बनाने का तरीक़ा भी बदलेगा। सिलबट्‌टा, चक्की, भट्‌टी और कोयले में खाना पकाने का तरीक़ा एक बार फिर लौटकर आएगा। देश के टॉप 50 शेफ़ पारम्परिक भोजन को नए-नए अंदाज़ में ला रहे हैं। इस साल कई भारतीय व्यंजन फ्यूजन फूड के रूप में नज़र आएंगे।

  4. पहले लोग सिर्फ़ पेट भरने के लिए भोजन करते थे। वहीं स्वाद से ज़्यादा थाली में भोजन की मात्रा मायने रखती थी। लेकिन अब समय के साथ लोगों में अच्छे-बुरे स्वाद की पहचान बढ़ रही है। अब थाली में भोजन की मात्रा से ज़्यादा उसका स्वाद मायने रखता है। यही सजगता इस साल लोगों में ज़्यादा नज़र आएगी। लोग वही भोजन करना पसंद करेंगे जहां उन्हें गुणवत्ता और स्वाद से भरपूर भोजन परोसा जाएगा।

  5. इस साल सोशल मीडिया भोजन के शौक़ीन लोगों के लिए ग्लोबल प्लैटफॉर्म बनकर उभरेगा। हालांकि सोशल मीडिया की दीवानगी लोगों में बहुत पहले से थी। लेकिन अब उनमें इसके प्रति धीरे-धीरे समझ बढ़ रही है। वे नई जगह घूम रहे हैं और नए व्यंजनों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं और सिर्फ़ एक हैशटैग से भोजन विश्वभर में पहुंच रहा है। भोजन से सम्बंधित छोटी-छोटी बातें भी अब सोशल मीडिया पर मिलेंगी, स्टोरीज़ बनेंगी और विश्वभर के व्यंजन हैशटैग से लोगों तक पहुंचेंगे।



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      food trend 2019 Traditional way to cook food will return and fusion of traditional food will rule in 2019

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डेंगू की दवा और वैक्सीन होंगे बाजार में, एचआईवी वैक्सीन का ह्यूमन ट्रायल शुरू


हेल्थ डेस्क. मेडिकल के क्षेत्र में भी 2019 नई उम्मीदें लेकर आ रहा है। उम्मीद है कि डेंगू की वैक्सीन और कारगर दवा बाजार में आ जाएगी। कैंसर ट्रीटमेंट के लिए 500 करोड़ की थेरेपी मशीन भी इस साल आ सकती है। सुपर कंप्यूटर की मदद से इलाज में तेजी आएगी।

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    सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंस (सीसीआरएएस) ने 7 औषधीय पौधों से डेंगू की दवा तैयार की है। फ्रांसीसी कंपनी सनोफी ने डेंगू वैक्सीन भी तैयार कर ली है। ये दोनों इस साल बाजार में होंगी। देश में 9 साल में डेंगू के सवा लाख मरीज बढ़े हैं।

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    एचआईवी से बचाने वाली वैक्सीन का ह्यूमन ट्रायल 2019 में शुरू हो जाएगा। अब तक जानवरों पर वैक्सीन का ट्रायल किया गया है, जो सफल रहा। अब अगर अमेरिका में जून-जुलाई में होने वाला ह्यूमन ट्रायल सफल होता है तो पहला एचआईवी वैक्सीन विकसित हो सकेगा।

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    लैब में तैयार किया जाने वाला मीट इस साल भारतीय बाजार में आ सकता है। इसे लैब में कोशिका विकसित कर तैयार किया जाता है। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने कहा है कि 60% लोग अहिंसा मीट के लिए तैयार हैं। अभी इसकी अमेरिका, इजरायल में अच्छी बिक्री है।

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    बच्चेदानी के मुंह के कैंसर से बचाव के लिए एचपीवी वैक्सीन को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा। 9-13 वर्ष की बच्चियों का टीकाकरण होगा। भारत में स्तन कैंसर के बाद सबसे ज्यादा महिलाएं बच्चेदानी के मुंह के कैंसर से ही पीड़ित हैं।

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    कैंसर मरीजों के इलाज के लिए देश में करीब 500 करोड़ रु. की प्रोटोन थेरेपी मशीन आ जाएगी। चेन्नई के इन्द्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में लगने वाली इस मशीन से कैंसर सेल खत्म करने के लिए टारगेटेड थेरेपी दी जाएगी। इससे हेल्दी सेल्स को नुकसान नहीं होगा।

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    मानव दिमाग की तरह काम करने वाला सुपर कंप्यूटर स्पिननेकर मेडिकल इस्तेमाल में आएगाा। इसकी मदद से डॉक्टरों के लिए पार्किंसन, अल्जाइमर जैसी बीमारियों को डिटेक्ट करना आसान होगा। अब तक ये बीमारियां 3 से 5 साल में डिटेक्ट हो पाती थीं।



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      medical and innovation 2019 trial to hiv drugs in human and dengue vaccine will be available

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भारतीयों के सिर की स्किन अलग तरह की, इस कारण इंटरनेशनल ब्रांड के शैंपू भी डैंड्रफ में कारगर नहीं होते


हेल्थ डेस्क (रश्मि प्रजापति खरे). बालों में डैंड्रफ का सम्बंध रोजाना नहाने से नहीं है। वैज्ञानिकों ने भारतीयों में डैंड्रफ का कारण स्कैल्प (सिर की स्किन) में पाए जाने वाले बैड बैक्टीरिया और फंजाई को बताया है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसईआर) भोपाल के प्रोफेसर डॉ. विनीत शर्मा ने पहली बार स्कैल्प माइक्रोबायोम की मेटाजीनोमिक स्टडी की है जिसमें उन्होंने पाया कि दरअसल स्कैल्प को हेल्दी रखने वाले कुछ बैक्टीरिया भी होते हैं, जो सिर में डैंड्रफ पनपने नहीं देते। स्टडी में सामने आया कि भारतीयों का स्कैल्प काफी अलग तरह का है। इनमें से 40 प्रतिशत फंजाई और बैक्टीरिया की प्रजाति हैं जिन्हें अब नहीं पहचाना गया है। यही कारण है कि विदेशियों के स्कैल्प के हिसाब से तैयार इंटरनेशनल ब्रांड के शैंपू और अन्य प्रोडक्ट भारतीयों के स्कैल्प पर उतने कारगर नहीं होते। देश में पहली बार इतने बड़े स्केल पर यह स्टडी हुई है।

  1. स्कैल्प में दो तरह की बैक्टीरिया पाई जाती हैं - गुड बैक्टीरिया (प्रोपिओनिबैक्टीरियम एक्नेस) और बैड बैक्टीरिया (स्टैफिलोकोकस एपिडर्मिडिस)। गुड बैक्टीरिया की वजह से डैंड्रफ की प्रॉब्लम होती ही नहीं है, भले ही लोगों की लाइफस्टाइल, खान-पान कैसा भी हो। वहीं, कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखते हैं, फिर भी डैंड्रफ से छुटकारा नहीं मिलता, वजह है स्कैल्प पर बैड बैक्टीरिया का होना। ये लोग चाहे जितने भी क्लीन एन्वॉयर्नमेंट में रहें, इसको हटाने के लिए तरह-तरह के एंटी-डैंड्रफ शैंपू इस्तेमाल करें या फिर होममेड सॉल्यूशंस जैसे नींबू या दही का प्रयोग करें, पर डैंड्रफ नहीं जाता।

  2. डॉ. विनीत कहते हैं- यह रिसर्च डैंड्रफ की पैथोफिजिओलॉजी को बेहतर ढंग से समझने का काम करती है। इन बैक्टीरिया और फंगल माइक्रोबायोम्स की फंक्शनल एनालिसिस की जाए, तो फंगल माइक्रोबायोम डैंड्रफ को स्कैल्प में चिपकाए रहने में मदद करता है, जबकि बैक्टीरियल माइक्रोबायोम स्कैल्प में विटामिन-बी, बायोटिन, मेटाबॉलिज्म ऑफ एमीनो एसिड को बनाए रखते हैं, जिससे स्कैल्प के लिए जरूरी न्यूट्रिएंट्स उसे मिलते हैं और ऐसे लोगों के बालों की ग्रोथ भी बेहतर ढंग से हो पाती है। यह स्टडी डैंड्रफ के ट्रीटमेंट को बेहतर करने में मददगार साबित होगी।

  3. रिसर्च में 20-45 साल की उम्र वाली 140 महिलाओं के स्कैल्प की जांच की गई। इनमें से 70 महिलाएं ऐसी थीं जिन्हें डैंड्रफ था और 70 ऐसी जिन्हें ये समस्या नहीं थी। सैंपल के तौर पर ऐसी महिलाओं को ही लिया गया, जो नॉन-स्मोकर थीं। जिन्होंने पिछले एक महीने में कोई एंटी-बायोटिक्स या एंटी-फंगल ट्रीटमेंट नहीं लिया था। साथ ही पिछले तीन महीनों में कभी एंटी-डैंड्रफ शैंपू, एंटी-हेयर लॉस ट्रीटमेंट, डाई, ब्लीच, परमानेंट वेविंग या स्ट्रेट्निंग नहीं करवाई थी।

  4. डॉ. विनीत शर्मा की इस रिसर्च में उनके साथ रितुजा सक्सेना, पारुल मित्तल, सेसिल क्लेवॉड, दर्शना बी. धाकन, प्रशांत हेगड़े, महेश एम., सुबर्णा साहा, लुक सॉवरेन, नीता रॉय, लियोनेल ब्रेटन, नमिता मिश्रा की टीम ने काम किया। अक्टूबर 2018 में यह स्टडी फ्रंटियर्स सेलुलर एंड इन्फेक्शन माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित भी हुई है।



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      IISER bhopal reveals why international brand shampoo does not work on indian scalp

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सीजनल फ्रूट-वेजिटेबल्स के टेस्ट में ट्विस्ट, हरे चने का हलवा और कटहल का केक जो इम्युनिटी बढ़ाते हैं


लाइफस्टाइल डेस्क. सीजनल फ्रूट्स एंड वेजिटेबल्स खाने की सलाह बड़े-बुजुर्गों से लेकर डॉक्टर्स तक देते रहते हैं। आप जितने ज्यादा सीजनल फ्रूट्स और सब्जियां खाएंगे, आपके शरीर की इम्युनिटी बढ़ेगी और बीमारियों दूर रहेंगे। लेकिन, अक्सर बच्चे और कई बार बड़े भी सीजनल फल-सब्जियां खाने में खास रुचि नहीं दिखाते और उनसे मिलने वाले न्यूट्रिएंट्स को मिस कर देते हैं। यह न्यूट्रिएंट्स इस सीजन में मिस न हों इसके लिए फूड एक्सपर्ट्स और शेफ्स से हमने कुछ ऐसी सीजनल डिशेज की रेसिपीज जानी, जिनमें एक्सपेरिमेंट किया गया है।

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    • ​​​​​​इंग्रीडिएंट्स : पौने 3 कप पिसे बादाम, 1 कप पका चॉप्ड कटहल, 4 अंडे, सवा कप शक्कर, 8 चम्मच बटर, 3/4 कप आटा, 1/2 चम्मच बेकिंग पाउडर, 1 नींबू का रस।
    • ऐसे बनाएं: ओवन को 175 डिग्री पर प्री-हीट करें। जार में शक्कर और अंडे को पीला होने तक फेंटें। बटर, आटा, बेकिंग पाउडर और थोड़ा पानी डालकर मिक्स करें। अब बैटर में बादाम, जैकफ्रूट और लेमन जेस्ट को मिलाएं। बैटर को केक पैन में डालें। 45 से 50 मिनट तक बेक करें।
    • कटहल ऐसा यूनिक फ्रूट है, जिसमें फोर्बिक एसिड भरपूर मात्रा में मिलता है। कई देशों में कटहल को डेजर्ट के तौर पर खाया जाता है।

      आनंद कुमार, आईएचएम प्रिंसिपल
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    • इंग्रीडिएंट्स : 200 ग्राम हरे चने, 200 ग्राम शक्कर, 1 कप दूध, 2 चुटकी इलायची, 8-10 किशमिश, काजू, बादाम
    • ऐसे बनाएं: हरे चने को दो उबाल आने तक उबालें। पानी निकालकर चनों को पीस लें। कढ़ाई में घी गर्म करें और हरे चने के पेस्ट को मध्यम आंच पर भूनें। पेस्ट में दूध और शक्कर मिलाकर पकाएं। दूध सूखने तक भूनें। गैस बंद करके हलवे में इलायची, किशमिश, कटे काजू-बादाम मिक्स करें।
    • हरे चने हमारी सेहत के लिए बहुत अच्छे होते हैं। यही चने सेहत के साथ-साथ हमारा स्वाद भी बढ़ाएंगे, तो हम चने बार-बार खाएंगे। यहां पेश है हरे चने का हलवा।

      शेफ रमन कपूर, जहांनुमा रिट्रीट, भोपाल
  3. डायटीशियनडॉ. निधि पांडेय के अनुसार,विंटर में शुगर का लेवल घटता-बढ़ता रहता है। बीपी ज्यादातर हाई रहता है। जिन्हें कोलेस्ट्रॉल की दिक्कत नहीं होती उनको भी कई बार कोलेस्ट्रॉल की प्रॉब्लम हो जाती है। ऐसी स्थितियों से बचने के लिए कुदरत ने विंटर फ्रूट्स को विटामिन-सी रिच बनाया है। इनदिनों कई रंग-बिरंगी सब्जियां जैसे रेड-यलो कैप्सिकम, बैंगन, बेबी कॉर्न आसानी से उपलब्ध होती हैं, इन सभी में एंटी ऑक्सिडेंट्स अधिक मात्रा में होते हैं। इनमें कैंसर से बचाने वाले पदार्थ भी होते हैं।



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      grean pea halwa and jackfruit recipe in winter to boost immunity

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कैंसर की शुरुआती स्टेज पर अलर्ट कर देगा ब्रीथ एनालाइजर


हेल्थ डेस्क. कैंसर को शुरुआती अवस्था में कैसे पहचाना जाए, इस पर देश-दुनिया में काफी रिसर्च की जा रही है। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने एक ऐसा ब्रीथ एनालाइजर विकसित किया है, जो समय पर कैंसर की जानकारी देगा। यहडिवाइस दूषित हवा के कारण होने वाली बीमारियों को शुरुआती स्टेज पर ही पहचान लेगी। इसका अंतिम ट्रायल कैम्ब्रिज के एडनब्रूक हॉस्पिटल में किया जा रहा है।

    • कैंसर कोशिकाओं के कारण शरीर में वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड बनते हैं,जो रक्त में मिलकर सांसों में तक पहुंचते हैं। ठीक वैसे ही जैसे अल्कोहल।
    • सांसों में मौजूद इन कंपाउंड का पता ब्रीथ एनालाइजर लगाता है और समय पर अलर्ट करता है।
    • कैंसर का पता लगाने के लिए मरीज को 10 मिनट डिवाइस की मदद से सांस लेने और छोड़ने के लिए कहा जाता है।
    • डिवाइस सांस में मौजूद वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड के कणों को इकट्ठा करती है। इसे लैब में जांच के लिए भेजा जाता है।
    • कुछ ही दिनों में मरीज को इसकी रिपोर्ट मिल जाती है,जबकि बायोप्सी के मामलों में रिपोर्ट में मिलने में ही दो हफ्तों का समय लग जाता है।
  1. करीब एक दशक से इस डिवाइस काम कर रहे शोधकर्ता डॉ. डेविड क्रॉसबाय का कहना है कि कैंसर की जानकारी समय से मिलने पर इलाज करना आसान होगा। अब तक कोई ऐसी जांच नहीं है, जो कैंसर की जानकारी शुरुआती स्टेज में दे सके, क्योंकि लक्षण दिखते ही नहीं है। नए ब्रीथ एनालाइजर की मदद से बिना बायोप्सी के कैंसर की जांच संभव होगी।

  2. शोधकर्ताओं के अनुसार, ब्रीथ एनालाइजर की मदद से सांस से जरिए होने वाले कैंसर को रोका जा सकता है साथ ही बायोप्सी जांच की जरूरत को कम किया जा सकता है। यह एक खास तरह का टेस्ट है जो काफी सस्ता और बिना किसी चीर-फाड़ (बायोप्सी) के किया जा सकता है। पिछले दो सालों में यह टेस्ट 1500 मरीजों पर किया गया है। डिवाइस को जल्द ही लॉन्च किया जाएगा।

  3. वैज्ञानिकों का मानना है कि अलग-अलग तरह की कैंसर कोशिकाओं के कारण वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड में भी बदलाव देखने को मिलता है, लेकिन ब्रीथ एनालाइजर की मदद से हर तरह के केमिकल को समझा जा सकता है। सबसे पहले टेस्ट आहारनाल और पेट के कैंसर पेशेंट पर किया गया था। सफलता मिलने पर इसे प्रोस्टेट, किडनी, ब्लैडर, लिवर और पेंक्रियाटिक कैंसर के मरीजों पर किया गया। ट्रायल ब्रिटेन के कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथ आउलस्टोन मेडिकल इंस्टीट्यूट की टीम मिलकर कर रही है।

  4. ब्रिटेन में हर साल 17 हजार से भी ज्यादा लोगों की मौत कैंसर के कारण होती है, क्योंकि उन्हें इसका पता स्थिति गंभीर होने के बाद चलता है। हर साल यहां करीब 3 लाख 60 हजार कैंसर के मामले सामने आते हैं, इनमें से आधे से ज्यादा मरीजों को इसका पता गंभीर अवस्था में चलता है।



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      Cancer breathalyzer detects early stage of cancer through breath
      Cancer breathalyzer detects early stage of cancer through breath

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स्ट्रोक के खतरे के बारे में बताएगा सेंसर, खून की दो बूंदों से पता चल जाएगा


हेल्थ डेस्क. किसी व्यक्तिको ब्रेन स्ट्रोक की आशंका कितनी है, अब इसका पता लगाया जा सकता है। ब्रिटेन की वारविक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने ऐसा सेंसर बनाया है जो मस्तिष्क में खून के थक्के जमने से लेकर स्ट्रोक के खतरों की जानकारी देता है। सेंसर में लगी पिन से ब्लड टेस्ट किया जाता है। ब्लड की मदद से शरीर में प्यूरिन का लेवल जांचकर डिवाइस मरीज को आगाह करती है। शरीर में प्यूरिन बढ़ना कई बीमारियों का कारण बनता है।

  1. प्यूरिन ऐसा पदार्थ है जो खानपान की चीजों से शरीर में पहुंचता है। खूनमें मिलने के बाद यह किडनी तक पहुंचता है। जहां ये यूरिक एसिड में टूटकर शरीर में बाहर निकल जाता है। कई बार ऐसा न होने पर प्यूरिन का लेवल शरीर में बढ़ने लगता है। इससे पैरों और जोड़ों में दर्द, गांठों में सूजन और धमनियों में ब्लॉकेज का कारण बनता है।

  2. रिसर्च में सफलता के बाद 400 मरीजों के खून के नमूनेलेकर ट्रायल किया जा रहा है। शोध में यह भी पता लगाया जा रहा है कि स्ट्रोक के बाद शरीर को कितना नुकसान होता है। रिसर्च से जुड़े डॉ. याकूब बट्ट के मुताबिक, वर्तमान में ऐसी कोई भी जांच नहीं है जो ब्लड टेस्ट की मदद से स्ट्रोक की जानकारी दे सके। ऐसे में यह रिसर्च काफी राहत देने वाली साबित होगी।

  3. डॉ. बट्टके अनुसार, स्ट्रोक के बाद रक्त में प्यूरिन के स्तर की जानकारी काफी मददगार होगी। सेंसर की मदद से ऐसे लोगों को अवेयर किया जा सकेगा जो स्ट्रोक से जूझ चुके हैं या जिन्हें स्ट्रोक होने की आशंका है। इसकी मदद से समय पर इलाज किया जा सकेगा।

  4. ब्रिटेन में स्ट्रोक के करीब 1 लाख मामले हर साल सामने आते हैं। इनमें से 85 फीसदी मामले इश्चीमिक नाम केस्ट्रोक के होते हैं। यह मस्तिष्क को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में खून काथक्का जमने के कारण होता है।
    वैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसे मरीजों को थक्का खत्म करने वाली दवाएं देकर स्ट्रोक से बचाया जा सकता है। स्ट्रोक के मरीजों में कई बार लक्षण माइग्रेन और दिमाग में संक्रमण जैसे दिखाई देते हैं। ऐसे में लक्षणों के आधार पर स्ट्रोक का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। सेंसर की मदद से मिनटों में स्ट्रोक की पुष्टि की जा सकेगी।



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      सिम्बॉलिक इमेज।

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नए साल में सबसे ज्यादा बच्चे भारत में जन्मे, 70 हजार बच्चों के साथ भारत पहले पायदान पर, चीन पीछे छूटा


हेल्थ डेस्क. दुनियाभर में 1 जनवरी को 3 लाख 95 हजार से भी ज्यादा बच्चों ने जन्म लिया। यह आंकड़ा बुधवार को यूनिसेफ ने जारी किया है। यूनिसेफ के मुताबिक, नए साल के मौके पर भारत में 69,944 बच्चों का जन्म हुआ है, जो विश्व में सबसे ज्यादा है। यह कुल आंकड़ों का 17.7 फीसदी है। वहीं आंकड़ों के चौथाई हिस्से के तहत आने वाले बच्चों ने साउथ एशिया में जन्म लिया है।

दूसरे स्थान पर चीन
चीन इस मामले में दूसरे स्थान पर है। भारत में करीब 70 हजार बच्चों ने जन्म लिया तो चीन में 44,940 बच्चे पैदा हुए। नाइजीरिया में 25,685 बच्चे पैदा हुए जो तीसरे पायदान है और पाकिस्तान चौथे स्थान पर है यहां 15,112 बच्चों का जन्म हुआ है। इंडोनेशिया में 13,256, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में 11,086, द डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कॉन्गो में 10,053 और बांग्लादेश में नए साल पर 8,428 बच्चे पैदा हुए।



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highest number of babies born in india in the world on 1 January says unicef

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बिना सर्जरी मरीज की ही स्टेम सेल से दूर होगा कमर दर्द, अमेरिकी वैज्ञानिकों का दावा


हेल्थ डेस्क. मरीज की ही स्टेम कोशिकाओं की मदद से उनका कमर दर्द दूर किया जा सकेगा। बिना किसी सर्जरी के ऐसा करना संभव होगा। अमेरिका के क्लीवलैंड मेडिकल सेंटर हॉस्पिटल ने यह प्रयोग किया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, कमर दर्द के मरीजों में डिस्क डैमेज होने के कारण ऐसी स्थिति बनती है। इंजेक्शन की मदद से मरीज की स्टेम सेल्स को लेकर डैमेज हुई डिस्क में प्रत्यारोपित किया जाएगा। जैसे-जैसे डिस्क में सुधार होगा दर्द और सूजन में कमी आएगी।

  1. शाेधकर्ताओं का कहना है कि स्टेम कोशिकाओं में खुद को विकसित करने की खूबी होती है। ये कई तरह की कोशिकाओं को भी बढ़ने में मदद करती हैं। इसी खूबी का इस्तेमाल अध्ययन में किया गया है। शोध में पाया गया है कि प्रभावित जगह इंजेक्शन की मदद से स्टेम कोशिकाओं के पहुंचने के बाद डैमेज डिस्क ने खुद को दोबारा विकसित किया।

  2. अमेरिका के ओहियो स्थित क्लीवलैंड मेडिकल सेंटर में इसका ट्रायल किया जा रहा है। शोध में 24 मरीजों को शामिल किया गया है। इन्हें रोजाना स्टेम सेल की दो डोज दी जा रही हैं। रिसर्च का उद्देश्य स्टेम सेल की मदद से बीमारी के कारणों को समझना है। प्रभावित जगह पर नए टिश्यू को विकसित कर सूजन और दर्द को कम करने की कोशिश की जा रही है। ट्रायल कर रहे वैज्ञानिकों के अनुसार, इसकी मदद से बीमारी बढ़ने की रफ्तार को भी नियंत्रित किया जा सकता है।

  3. शोधकर्ताओं के मुताबिक, स्टेम कोशिकाएं डिस्क को उसके आकार में लाने के साथ अपने चारों ओर लिक्विड की मात्रा बढ़ाती हैं। ऐसा होने रीढ़ की हड्डियों का मूवमेंट बेहतर होता है और दर्द-सूजन घटती है। रिसर्च के दौरान मूवमेंट और दर्द को समझने के लिए मरीज की एमआरआई भी की जाएगी। इसके लिए मरीज को एनेस्थीसिया देकर इंजेक्शन की मदद से कूल्हे की हड्डी से बोन मैरो लिया जाएगा। इससे स्टेम कोशिकाओं को रिकवर किया जाएगा।

  4. इंसान की रीढ़ की हड्डी में 26 वर्टिब्री पाई जाती हैं जो एक दूसरे से बेहद सॉफ्ट डिस्क की मदद से जुड़ी रहती हैं। डिस्क में जैलीनुमा पदार्थ के कारण रीढ की हड्डी को मोड़ना संभव हो पाता है। लेकिन बढ़ती उम्र, आनुवांशिक बीमारी या एक्सीडेंट के बाद इसके मूवमेंट में दिक्कत आती है। डिस्क धीरे-धीरे नमी खाेने लगती है और ब्लड का सर्कुलेशन घट जाता है। इस कारण डिस्क खुद को रिपेयर नहीं कर पाती है और नतीजतन कमर में दर्द और इसे मोड़ने में दिक्कत होती है। कमर दर्द के मामलों में पेन किलर, स्टीरॉयड इंजेक्शन और फिजियोथैरेपी की मदद से सूजन और दर्द को दूर करने की कोशिश की जाती है। गंभीर कमर दर्द के मामलों में सर्जरी की जाती है।



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      stem cell jab helps to reduce lower back pain and inflamation

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पसलियों से कान बनाकर लगाया, 7 हजार में से एक बच्चे को होती है यह बीमारी


हेल्थ डेस्क. लंदन में डॉक्टरों को शरीर के हिस्से से कान बनाकर बच्चे कोलगाने में कामयाबी मिली है।11 साल के रीज ग्लिसन के जन्म से ही कान नहीं थे। ऐसा एक आनुवांशिक स्थिति के कारण था, जिसे माइक्रोशिया कहते हैं। रीज की पसलियों का कुछ हिस्सा लेकर कान तैयार किया गया। इसे सर्जरी की मदद से लगाया गया।ब्रिटेन में ऐसाऑपरेशनपहली बार किया गया। डॉक्टर के मुताबिक, ऐसी आनुवांशिक स्थिति सात हजार में से एक बच्चे में दिखाई देती है।

  1. रीज की मां टोनी के मुताबिक, जब वह छोटा था तो बच्चे उसे चिढ़ाते थे और वह नर्वस हो जाता है। किसी को पता न चले कि उसके कान नहीं इसलिएवह बाल कटवाने से भी मना करता था। 2016 में लंदन के ग्रेट ऑरमंड स्ट्रीट हॉस्पिटल में उसकी पहली सर्जरी हुई।

  2. हॉस्पिटल के सर्जन नील बल्सट्रोड के मुताबिक, ‘‘कान बनाने के लिए पसलियों के ढांचे से ऊतक (कार्टिलेज) निकाले। यह दिखने में एकदम कुदरती कान की तरह है। कृत्रिम तौर पर पहले भी कान तैयार किए गए हैं, लेकिन पसलियों से इसे पहली बार बनाया गया। ऐसे मामले में कान को पूरी तरह से सामान्य होने में कम से कम छह महीने लगते हैं और दो बार सर्जरी की जाती है।’’

  3. सर्जन के मुताबिक, पहली सर्जरी 2016 में की गईजो करीब तीन घंटे चली। इस दौरान छठवीं, सातवीं और आठवीं पसली में से ऊतक लिया गया। इसे कान के आकार में बदला गया। कान वाले हिस्से को स्टील के धागे की मदद से आकार दिया गया। चीरा लगाकर नए कान को सर्जिकल धागे की मदद से सिला गया। धीरे-धीरे यह सामान्य कान की तरह दिखने लगा।

  4. छह महीने बाद रीज को वापस बुलाया गया और दूसरी सर्जरी की गई। इसमें सिर और कानों के बीच की दूरी को कम किया गया। करीब दो घंटे चली इस सर्जरी में कानों को असली स्थिति में लाया गया।सिलिकॉन ब्रेस की मदद से सर्जरी के बाद कान को सपोर्ट दिया गया। जिसे कभी भी हटाया या लगाया जा सकता था। करीब दो साल बाद रीज काफी खुश है और उसका विश्वास जागा है।



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      Rhys was suffering from genetic condition surgeon constructs ear from rib cage in britain

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खुशी, खूबसूरती और अच्छी नींद के लिए लें 4 संकल्प, ये दिल से लेकर दिमाग तक पहुंचाएंगे सुकून


हेल्थ डेस्क. छोटी-छोटी आदतें बड़ा बदलाव लाती हैं। सेहतमंद होना इसी की निशानी है। 2019 शुरू हो चुका है। नए साल के संकल्प में इस बार दिनचर्या से जुड़ी बातों को भी शामिल करें क्योंकि इलाज का दायरा जितना बढ़ रहा है उतनी बीमारियों की संख्या भी। फिजीशियन डॉ. पंकज जैन और डाइटीशियन सुरभि पारीक से जानिए 5 ऐसी आदतें जो आपको रखेंगी सेहतमंद।

    • मोबाइल और कम्प्यूटर स्क्रीन के सामने बिताया गया समय सबसे ज्यादा दिमाग और आंखों को नुकसान पहुंचाता है। लगातार एक ही पोजिशन में बैठे रहने से कार्पल टनल, बैक पेन, नर्व्स से जुड़ी परेशानियां, अनिद्रा जैसी दिक्कते होती हैं।
    • अगर ऐसा करना जरूरी भी है तो एंटी-ग्लेयर ग्लास पहनें और 45 मिनट में एक बार ब्रेक जरूर लें। संभव हो तो हर तीन घंटे के बाद एक बार मुंह को धाेएं इससे आंखों को आराम मिलेगा और दिमाग को सुकून। रिसर्च में साबित हो चुका है कि कम से कम 6 घंटे की नींद न पूरी होने पर हृदय रोगों का खतरा बढ़ता है।
    • बच्चों को इंडोर गेम्स और वीडियो गेम की बजाय मैदान में जाकर खेलने के लिए प्रेरित करें। इससे उनका शरीर मजबूत होगा, भूख बढ़ेगी और वर्चुअल दुनिया से अलग सच्चे दोस्त मिलेंगे।
    • मौसम कोई भी पानी की कमी न होने दें। दिनभर में 8-10 गिलास पानी जरूर पिएं। डाइट में लिक्विड चीजें जैसे जूस, छाछ, दूध, हर्बल चाय शामिल करें। ये शरीर में पोषक तत्वों की मात्रा और इलेक्ट्रोलाइट को बैलेंस करते हैं।
    • सुबह का नाश्ता कभी न छोड़ें। यह दिनभर के लिए एनर्जी देता है। डाइट में मोटा अनाज, खट‌्टे और मौसमी फल, हरी सब्जियां और ड्राय फ्रूट्स लें।
    • सुबह का नाश्ता हैवी और रात का खाना बेहद हल्का करने की कोशिश करें। ये अच्छी नींद आने के साथ पेट से जुड़ी दिक्कतों से दूर रखेगा।
    • साल में दो बार फैमिली या दोस्तों के साथ टूर प्लान करें। ये आपको अंदर से खुशी का अहसास कराते हैं और तनाव का स्तर घटाते हैं।
    • लोगों के साथ क्लालिटी टाइम बिताने और मनपसंद एक्टिविटी करने पर शरीर में हैप्पी हार्मोन रिलीज होता है जो आपको खुश रखने में मदद करता है।
    • अधिक शोरगुल वाले टूरिस्ट डेस्टिनेशन चुनने की बजाय ऐसी जगह जाएं जहां हरियाली, पानी और शांति हो। यहां बिताया गया समय हमेशा आपके लिए यादगार साबित होगा।
    • नए साल में अपनी दिलचस्पी किताबों में बढ़ाएं। ऐसी किताबें पढ़ें जो आपको प्रेरित करें, नई बातें सिखाएं और नए शब्दों से रूबरू कराएं।
    • कई रिसर्च में भी साबित हो चुका है कि किताबें इंसान की सोचने-समझने की क्षमता बढ़ाती हैं साथ ही याद्दाश्त (डिमेंशिया) घटने की प्रक्रिया को धीमा करती हैं।


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      new year health resolution to make a person healthy happy and beautiful

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Infertility  का सबसे कारगर और किफ़ायती इलाज है  IVF!


हर घर को नन्हीं किलकारी का सुख नसीब हो ये जरूरी नहीं, कुछ परिवार ऐसे भी हैं जो संतान सुख से वंचित रह जाते हैं। मेडिकल कारणों के साथ, ज़्यादा उम्र में शादी करना, खान- पान का सही न होना, धूम्रपान और शराब आदि का सेवन करने से Infertility की समस्या उत्पन्न हो सकती है और इससे जूझ रहे लोगों को कंसीव करने में अधिकतर निराशा ही मिलती है।
लेकिन अब चिंता की बात नहीं क्योंकि साइंस और बेहतरीन डॉक्टरी प्रशिक्षण से आजकल हर चीज़ का इलाज़ संभव है। IVF एक ऐसी तकनीक है जिसने कई घरों में संतान की कमी को पूरा किया है।


तो आइए जानते हैं IVF तकनीक की कुछ विशेष बातें:


क्या है IVF तकनीक: इन्दिरा आईवीएफ जमशेदपुर की आईवीएफ स्पेशलिस्ट डॉ. वन्दना पाण्डे बताती हैं कि IVF तकनीक शुरू करने से पहले डॉक्टर और प्रशिक्षकों के द्वारा पति-पत्नी की पूरी जांच की जाती है और इसके बाद ज़रूरत के अनुसार ही इस process को आगे बढ़ाया जाता है। जांच की रिपोर्ट के अनुसार ही ज़रूरी दवाएं दी जाती हैं जिसके बाद महिला व पुरुष दोनों के सबसे healthy और mature eggs व sperms को ही lab के नियंत्रित पर्यावरण में fertilize किया जाता है ।


Fertilization के बाद सबसे अच्छी गुणवत्ता के embryos यानि भ्रूण को ही महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित किया जाता है ताकि वह भ्रूण सामान्य रूप से महिला के गर्भ में बढ़ सके। इसके साथ ही महिला को medication के जरिये pregnancy के लिए तैयार भी किया जाता है।


पहली बार में सफलता मिले, ये जरूरी नहीं:
इन्दिरा आईवीएफ हैदराबाद सेंटर की आईवीएफ स्पेशलिस्ट डॉ. मधु पाटिल कहती है कि कई बार ये देखा गया है कि कम जानकारी के अभाव में लोग अक्सर एक बार की असफलता के बाद इलाज बंद कर देते हैं जो एक गलत फैसला भी साबित हो सकता है। हालांकि IVF की मदद से pregnancy के chances और किसी भी इलाज से ज़्यादा होते हैं लेकिन पहली बार में ही pregnancy में कामयाबी मिले ऐसा ज़रूरी नहीं है।


IVF की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि couple में Infertility किस प्रकार की है और महिला की उम्र क्या है? तो चलिए अब जानते हैं कि महिला की उम्र किस तरह IVF तकनीक की सफलता से जुड़ी हुई है और किस उम्र में इलाज़ करवाना हो सकता है फायदेमंद।


महिला की उम्र के अनुसार, IVF का success rate:
34 साल या कम उम्र में 40%
35-37 की उम्र में 31%
38-40 की उम्र में 21%
41-42 की उम्र में 11%
43 या अधिक उम्र में 5%


आसान और किफ़ायती इलाज़ है IVF:
ज्यादातर दम्पतियों को यह लगता है कि IVF इलाज काफी महंगा होता है जिस वजह से कई बार पैसों की मजबूरी के कारण कई लोग संतान सुख से ज़िंदगी भर वंचित रह जाते हैं। दुसरे देशों के मुक़ाबले अब भारत में IVF कराना बहुत किफ़ायती हो गया है। भारत में Indira IVF के 54 सेंटर्स हैं जहां किफ़ायती कीमत में IVF उपचार किया जाता है और अगर बात करें success rate की तो इन्दिरा IVF का success rate 70 प्रतिशत से भी अधिक है जो अन्य सेंटर्स के मुक़ाबले काफी बेहतर है।


सही निर्णय लेना है जरूरी:
इन्दिरा आईवीएफ मुम्बई की डॉ. कनिका कल्याणी बताती हैं कि ये जरूरी नहीं की पहली ही कोशिश में महिला गर्भ को धारण कर ले, कई बार IVF तकनीक की पहली कोशिश असफल भी हो सकती है। सही समय पर दवाएं न लेना या सही देखभाल न मिलना भी IVF cycle की असफलता की वजह बन सकते हैं। दम्पती को हमेशा यह सलाह दी जाती है कि वे धैर्य से काम लें और जल्दबाज़ी न करें। अगर कोशिश नाकामयाब हो जाए तो पहले अपने डॉक्टर से कारणों की चर्चा करें और इसके बाद अन्य संभावनाओं के बारे में भी बात करें।


कई बार IVF के जरिये सफल Pregnancy की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए डॉक्टर कई अन्य assisted तकनीक का सुझाव देते हैं जैसे; LAH यानि Laser Assisted Hatching या Blastocyst Culture का सहारा लेकर भी गर्भ धारण किया जा सकता है।
तो निराशा नहीं उम्मीद की ओर कदम बढ़ाएँ और आगे बढ़कर बात करें।

निःसंतानता से जुड़ा आपका कोई भी सवाल है तो इन्दिरा आईवीएफ कि वेबसाइट विजिट करे, अपनी समस्या लिखें या एक्सपर्ट डॉ. से बात करने के लिए कॉल करें - 07230062727



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IVF is affordable and effective, gives better results

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ओवेरियन स्टुमिलेशन पर हुई संगोष्ठी में फर्टिलिटी तकनीकों पर चर्चा


ओवेरियन स्टुमिलेशन पर संगोष्ठी का भव्य आयोजन रिनाईसेन्स होटल, गोमती नगर लखनऊ में हुआ। जिसमें लखनऊ एवं आसपास क्षेत्र से 200 से भी अधिक स्त्रीरोग विशेषज्ञों ने भाग लिया। संगोष्ठी में मुख्य वक्ता दुबई से डॉ. गौतम इलाहाबादिया थे, जिन्होंने ओवेरियन स्टुमिलेशन पर प्रकाश डाला। उन्होंनेआईवीएफ क्षेत्र में नई-नई तकनीकों के उपयोग से मिल रही सफलता दर पर भी अपनेविचार व्यक्त किए। आईवीएफ तकनीक से किस तरह जटील से जटील केस को सुलझाया जासकता है इस पर अपने अनुभव भी साझा किए।

इन्दिरा आईवीएफ के स्त्रीरोग एवं आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. पवन यादव ने एआरटी (आर्ट) में महिला में अण्डे बनने और परिपक्व होकर बाहर फैलोपयन ट्यूब मेंआने के दौरान किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए और जिससे सफलता की संभावनाएं अधिक हो विषय पर अपना वक्तव्य रखा।

इस दौरान डॉ. राधिका बाजपेयी ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में निःसंतान दम्पतियों में आईवीएफ/इक्सी ईलाज के प्रति काफी रूझान बढ़ा है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि निःसंतानता की दर काफी ज्यादा है और लोगों को इसके प्रति जागरूक करने की जरूरत है। डॉ. सुकृति शुक्ला ने कहा कि ई एंड वाई के 2015 के सर्वे के अनुसार भारत में 3 करोड़ से भी ज्यादा दम्पति निसंतानता से ग्रसित हैं। कार्यक्रम का संचालन डॉ. तान्या सिंह, डॉ. अर्चिता शालिन एवं डॉ. सोनल आनन्द ने किया। डॉ. अमित कुरील ने अतिथियों का गुलदस्ता भेंटकर स्वागत किया। कार्यक्रम के विशिष्ठ अतिथियों में आईएमए लखनऊ के अध्यक्ष डॉ. रमा श्रीवास्तव एवं डॉ. चन्द्रावती, डॉ. रूकसाना खान, डॉ. रेणु मक्कर, डॉ. रश्मि कुलश्रेष्ठ, डॉ. कविता बंसल एवं डॉ. तनुश्री गुप्ता थे।



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Indira IVF organized a Seminar in Lucknow on Ovarian stimulation and fertility techniques

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सर्दियों में हार्टअटैक के 50 फीसदी मामले होते हैं साइलेंट; ठंड में सुबह सैर से बचें, कुछ समय धूप में बिताएं


हेल्थ डेस्क. सर्दियों में हार्टअटैक के 50 फीसदी मामले साइलेंट होते हैं। इस मौसम में दिल का दौरे पड़ने पर हर बार सांस लेने में परेशानी, सीने में जकड़न, सांस फूलने और अचानक पसीना आने जैसी शिकायत नहीं होती। विशेषज्ञों के मुताबिक, साइलेंट हार्ट अटैक डायबिटिक पेशेंट्स को होने की आशंका ज्यादा होती है। जब भी ऐसा अटैक होता है तो हार्ट से जाने वाली नसें गल जाती हैं। इस कारण उन्हें दर्द का अहसास होता है। कई बार गैस या घबराहट के कारण भी यह होता है। ठंड में नसें सिकुड़ी रहती हैं और ब्लडप्रेशर भी हाई रहता है। कई लोग ठंड में पानी कम पीते हैं। इस कारण डिहाईड्रेशन होता है और नतीजा ब्लड गाढ़ा हो जाता है। धमनियों में ब्लॉकेज होने के कारण भी ऐसे अटैक ज्यादा होते हैं। हार्ट अटैक के मामलों मे 90 फीसदी डायबिटीक लोगों में होते हैं। इसलिए उन्हें नियमित जांच कराना चाहिए। सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अल्केश जैन से जानते हैं सर्दियों में कैसे दिल को रखें दुरुस्त...

    • सामान्य लक्षणों के बगैर होने वाले हार्ट अटैक को 'साइलेंट' कहा जाता है। इसमें हृदय की मांसपेशी की तरफ बहने वाला रक्त प्रवाह काफी हद तक कम हो जाता है या फिर पूरी तरह से कट जाता है।
    • हार्ट अटैक के जोखिम से घिरे अधिक उम्र के लोग साइलेंट हार्ट अटैक के झटके को अमूमन नहीं झेल पाते। यह हृदय पर इतना जबरदस्त दबाव बनाता है कि कई बार मरीज मदद के लिए पुकार भी नहीं पाता।
    • साइलेंट हार्ट अटैक अक्सर न पहचाने जा सकने वाले लक्षणों, समुचित इलाज के अभाव या समय पर इलाज न मिलने की वजह से घातक हो सकता है।
  1. हार्ट अटैक का पहला लक्षण सीने में जलन या फिर दर्द होना है, लेकिन साइलेंट हार्ट अटैक में ऐसा बिल्कुल नहीं होता। जब किसी व्यक्ति को साइलेंट अटैक की प्रॉब्लम होती है तो उसे सीने में किसी प्रकार का दर्द नहीं होता। इस बीमारी में मरीज को पता ही नहीं चलता है कि क्या हो रहा है। इसलिए इसे पहचानना काफी मुश्किल होता है। बेहतर उपाय है कि ऐसी आदतें लाइफस्टाइल में शामिल की जाएं जो ऐसी स्थितियां बनने से रोकें। जैसे-

    • सुबह ठंड में सैर करने से बचें क्योंकि ऐसा करने से ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, जो हार्ट पर दबाव बढ़ाता है। सैर का समय बदलने से आपको न सिर्फ पर्याप्त धूप मिलेगी जो कि विटामिन डी का स्रोत होती है बल्कि शरीर को गर्मी भी मिलेगी।
    • घर से बाहर जाते समय शरीर को गर्म कपड़ों से अच्छी तरह से ढककर रखें। घर में या धूप में हल्के-फुल्के व्यायाम करना जारी रखें। साथ ही ब्लड प्रेशर भी जांचते रहें।
    • भोजन और दवाएं समय से लेते रहें ताकि मौसम की मांग के मुताबिक शरीर ढलता रहे। इसी तरह, वायु प्रदूषण और अन्य कारणों की वजह से होने वाले संक्रमण से बचने का हर संभव प्रयास करें। अगर संक्रमण हो भी जाए तो तत्काल चिकित्सा सहायता लें, जिससे मरीज को आराम मिल सके।
    • साइलेंट हार्ट अटैक से बचने के लिए हृदय रोगियों को तला भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसे पचाने के लिए शरीर को अधिक काम करना पड़ता है। ऐसा भोजन करें जो हृदय के लिए सेहतमंद हो और आपकी सेहत बेहतर बनाने में मददगार हो।
    • हार्ट में ऑक्सीजन की अधिक मांग होने, शरीर का तापमान असामान्य ढंग से कम होने, छाती में संक्रमण पैदा करने वाले वायु प्रदूषकों आदि के चलते हार्ट अटैक के मामले बढ़ सकते हैंं। इसलिए वायु प्रदूषण से जितने बचें उतना ही बेहतर है। जिन शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर अधिक है वहां मास्क का इस्तेमाल करना बेहतर विकल्प है।
    • धूम्रपान से दूरी बनाना जरूरी है चाहें मोटे हों या दुबले। साइंस पत्रिका, यूरोपियन हार्ट जनरल में छपे एक शोध के अनुसार दुबले लोगों को भी हार्ट अटैक का खतरा होता है। शोध के अनुसार, जिन लोगों का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम होता है और वे धूम्रपान करते हैं, तो उनमें दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा अधिक होता है।


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      50 percent cases of heart attack are related to silent attack know how to take care of heart

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वैज्ञानिकों ने किया 10 मिनट में कैंसर की सटीक रिपोर्ट का दावा और लैब में तैयार हुए जेनिटिकली मोडिफाइड जुड़वा बच्चे


हेल्थ डेस्क. मेडिकल जगत के लिए 2018 नए अविष्कारों के नाम रहा। लैब में जेनिटिकली मोडिफाइड जुड़वा बच्चों केभ्रूण तैयार किए और दुनिया का पहला 3डी स्कैनर ईजाद किया गया। कैंसर से लोगों को बचाने की जंग इस साल भी जारी। वैज्ञानिकों ने ऐसे टेस्ट का प्रयोग किया जिसकी मदद से 10 मिनट में हर तरह का कैंसर पता लगाया जा सकता है। वहीं भारत में आईआईटी रुढ़की के शोधकर्ताओं नेगुलाब की पत्तियों से बनाए नैनो डाॅट्स जो कैंसर कोशिकाओं ढूंढ़कर नष्ट कर देंगे। जानिए ऐसी ही बड़ी खबरें जो दुनिया में चर्चा का विषय बनीं।

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    चीनी वैज्ञानिक ही जियानकुई ने लैब में दुनिया का पहला ऐसा मानव तैयार किया जिसके जीन में बदलाव किया गया है। वैज्ञानिक के अनुसार, उसने जुड़वा बच्चियों के जन्म से पहले ही उनके जीन में बदलाव करने का लक्ष्य था उन्हें भविष्य में एचआईवी वायरस से बचाने के लिए तैयार करना। इन बच्चियों को लुलु और नाना नाम दिया गया। यह मामला सामने आने के बाद चीनी वैज्ञानिक को दुनियाभर में काफी विरोध झेलना पड़ा था। इसे डिजाइनर बेबी के नाम से भी जाना गया।

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    शोधकर्ताओं ने नए तरह का टेस्ट विकसित किया जो हर तरह के कैंसर का पता लगाने में सक्षम है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह टेस्ट डीएनए की संरचना पर आधारित है। यह 10 मिनट के अंदर कैंसर और उसके प्रकार का पता लगा सकता है। टेस्ट में सोने के कणों का इस्तेमाल किया गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक कैंसर का डीएनए सोने के कणों की ओर ज्यादा आकर्षित होता है। इस टेस्ट का क्लीनिकल ट्रायल जल्द ही किया जाएगा। यह रिसर्च ऑस्ट्रेलिया की क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने की है। इसे नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

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    दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर के द्वीपीय देश वनुआतू का एक माह का ज्वाय नोवाई ड्रोन से भेजे गए वैक्सीन लगवाने वाला विश्व का पहला बच्चा बना। संक्रामक रोगों से बचाने के लिए उसे टीका लगाया गया। वनुआतूू करीब 80 छोटे-छोटे द्वीपों से मिलकर बना है। साल 2006 में यह द्वीप धरती की सबसे खुशहाल जगहों की सूची में पहले स्थान पर आया था।

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    मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने एक खास तरह का इलेक्ट्रॉनिक कैप्सूल बनाया। यह पेट में पहुंचकर दवा रिलीज करता है। इसे बाहर से एक ब्लूटूथ डिवाइस से कंट्रोल किया जाता है। दवा के एक माह के कोर्स के बाद यह कैप्सूल पेट में घुल जाता है और मलद्वार से बाहर निकल जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक कैप्सूल की मदद से मरीजों को इजेक्शन के दर्द से मुक्ति मिल सकेगी। खास बात है कि यह डिवाइस शरीर में संक्रमण और एलर्जी का पता लगाकर बीमारी के अनुसार दवा रिलीज करेगी।

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    वाराणसी के बीएचयू हॉस्पिटल (बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी) में 4 दिन की जुड़वां बच्चियों को ऑपरेशन कर अलग किया गया। दोनों बच्चियां सीने से पेट तक आपस में जुड़ी थीं। उन्हें अलग करने के लिए 20 डॉक्टरों की टीम को साढ़े 4 घंटे का समय लगा। डॉक्टर वैभव पांडेय के मुताबिक, पहले बच्चियों का ब्लड प्रेशर, शुगर, हार्ट बीट टेस्ट करके देखा गया था। दोनों बच्चियों को एक साथ बेहोश करना बड़ा चैलेंज था। उन्होंने बताया कि 10 लाख बच्चों में से कोई एक जुड़वां इस तरह पैदा होता है। फिलहाल दोनों स्वस्थ हैं। कुछ दिन तक उन्हें डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाएगा।

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    महाराष्ट्र के पुणे में एक महिला ने अपनी मां के गर्भाशय से बच्ची को जन्म दिया। 17 माह पहले महिला का गर्भाशय डैमेज हो गया था। इसके बाद महिला में उनकी मां का गर्भाशय ट्रांसप्लांट किया गया था। दुनिया का यह 12वां मामला है जहां यूट्रस ट्रांसप्लांट के बाद बच्चे का जन्म हुआ है। इससे पहले 9 मामले स्वीडन में और 2 अमेरिका में सामने आ चुके हैं। एशिया में ऐसा पहली बार हुआ है।

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    ब्राजील में एक ऐसी महिला मां बनी जिसका जन्म बिना गर्भाशय के हुआ था। इसके बाद डॉक्टर्स ने एक मृत महिला का गर्भाशय उसे प्रत्यारोपित किया, जिसके बाद उसने एक बेटी को जन्म दिया था। मृत महिला के गर्भाशय का इस्तेमाल करके किसी बच्चे के जन्म का ये दुनिया में अपनेआप में पहला मामला था। इस केस के बारे में दुनिया को तब पता चला, जब इसकी डिटेल्स मेडिकल जनरल द लंसेट में हाल ही में प्रकाशित हुई।

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    आईआईटी दिल्ली के इंजीनियर्स ने थ्रीडी बायोप्रिंटिंग तकनीक से विश्व में पहली बार कोशिकाओं की मदद से मानव अंग जैसी ही हड्डी और कार्टिलेज तैयार कर लिए हैं। अब इनके क्लीनिकल ट्रायल की तैयारी चल रही है। अगर ट्रायल सफल रहता है तो लैब में तैयार इन अंगों का इस्तेमाल इंसानों पर किया जा सकता है। रिसर्च से यह स्पष्ट हुआ है कि सेल्स की मदद से जो हड्‌डी विकसित की गई है, उसकी प्रकृति भी इंसान की हड्‌डी जैसी ही है। हालांकि इस पर अभी और काम किया जाना बाकी है। इसके इम्प्लांट के बाद दवा के प्रभाव और दुष्प्रभाव पर भी काम होना है। लेकिन सफलता मिलने पर यह तकनीक स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा बदलाव साबित हो सकती है।

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    वैज्ञानिकों ने ततैया की प्रजाति ढूंढी जिसमें पाया जाने वाला जहर सुपरबग के लिए खतरनाक है, लेकिन इंसानों पर इसका जहरीला असर नहीं होता। इसका नाम है पॉलिबिया पॉलिस्टा। इसके डंक का जहर सुपरबग को मारने में कारगर है। सुपरबग एक ऐसा बैक्टीरिया है, जिस पर एंटीबायोटिक का असर नहीं होता। एमआईटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक, पॉलिबिया पॉलिस्टा के डंक में खास तरह का जहर पाया जाता है जिसे MP1 कहते हैं। इसका इस्तेमाल ततैया अपनी सुरक्षा के लिए करती है। हाल ही में हुए एक और अध्ययन में पाया गया कि ये कैंसर कोशिकाओं को भी खत्म करने में अहम भूमिका निभाता है।

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    वॉशिंग्टन की रहने वाली 19 साल की गायिका कीरा की सर्जरी चर्चा में रही। अजीबोगरीब बीमारी म्यूजिकोजेनिक एपिलेप्सी से जूझ रहीं थी। जांच रिपोर्ट के अनुसार, दिमाग का वह हिस्सा जो सुनने और गुनगुनाने की क्षमता नियंत्रित करता है वहां छोटे पत्थर के आकार का ट्यूमर है, जो इस डिसऑर्डर का कारण है। ब्रेन सर्जरी के दौरान कीरा गाना गुनगुना रही थीं और डॉक्टर्स ऑपरेशन के दौरान दिमाग के उस हिस्से को बचाने की कोशिश कर रहे थे जो सुनने और गुनगुनाने के लिए जिम्मेदार है।

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    2017 में दुनियाभर में चेचक के मामले 31% बढ़े गए। ऐसा टीकाकरण में लापरवाही के कारण हुआ। इसका खुलासा विश्व स्वास्थ्य संगठन और सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन की रिपोर्ट से हुआ। हाल ही में जारी रिपोर्ट के मुताबिक 2000 से 2017 के बीच चेचक के मामलों में करीब 83% कमी आई, लेकिन पिछला साल सामान्य नहीं रहा।अमेरिका और यूरोप में बढ़े रोगीशोधकर्ताओं के मुताबिक, बढ़े हुए रोगियों की संख्या खासतौर पर ऐसे क्षेत्र में देखी गई जहां विशेष नजर रखी जाती है। सबसे ज्यादा मामलों वाले देशों मेंं अमेरिका और यूरोप जैसे देश शामिल है। केवल पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में मामलों में कमी देखी गई है।

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    अच्छा बैक्टीरिया बुरे बैक्टीरिया के संक्रमण से बचाएगा। ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने ऐसी नोज ड्रॉप बनाई जिसमें काफी संख्या में ऐसे गुड बैक्टीरिया हैं जो मेनिनजाइटिस के संक्रमण को रोकेंगे। इसे ब्रिटेन के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ रिसर्च के साउथैम्पटन बायोमेडिकल रिसर्च सेंटर ने तैयार किया है। दुनिया में पहली बार ऐसी ड्रॉप तैयार की गई है और हाल ही में इसका ट्रायल भी किया गया है।

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    कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों ने ऐसा 3डी बॉडी स्कैनर बनाया जो 20 सेकंड में पूरे शरीर की तस्वीर दिखाता है। इसे ‘एक्सप्लोरर स्कैनर’ नाम दिया गया है। दुनिया के इस पहले 3डी स्कैनर को पैट स्कैन और एक्स-रे की तकनीक मिलाकर तैयार किया गया है। सबसे खास बात है कि मशीन इंसान के शरीर में बीमारी का पता लगाने के साथ कैसे कैंसर और संक्रमण फैल रहा है इसे वीडियो के रूप में रिकॉर्ड करने में सक्षम है। 3डी वीडियो होने के कारण शरीर के हर हिस्से की सटीक जानकारी मिलने पर इलाज आसानी से किया जा सकेगा। इसे कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सिमोन चैरी और रामसे बडावी ने एक दशक की रिसर्च के बाद तैयार किया है।

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    विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां 2017 में मलेरिया के मामलों में गिरावट देखी गई है। रिपोर्ट में दुनियाभर के 11 मलेरिया प्रभावित देशों को शामिल किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले साल मलेरिया के मरीजों में 4 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। यह मलेरिया के मामलों में कमी लाने के कदम की ओर एक सफल कदम है। देशभर में मलेरिया के 40 फीसदी मामले सिर्फ ओडिशा में देखे जाते हैं। लेकिन रिपोर्ट की सबसे खास बात है कि राज्य में 2016 में मलेरिया के मामलों में 24 फीसदी कमी आई है। इस बड़ा कारण ओडिशा सरकार का एंटी मलेरिया प्रोजेक्ट है। आंकड़ों के मुताबिक राज्य के चार बड़े जिलों में 85 फीसदी मलेरिया के मामलों में कमी आई है।

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    आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने कैंसर सेल्स का पता लगाने और खत्म करने वाले कार्बन नैनोडॉट्स विकसित किए हैं। ये कार्बन मैटेरियल गुलाब की पत्तियों से हासिल किए गए हैं। इसलिए इन्हें फ्लोरेसेंट कार्बन नैनो डॉट्स नाम दिया गया है। ये कैंसर सेल्स पता लगाकर और उसे खत्म करने में मदद करते हैं।

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    ब्रिटेन के यॉर्कशायर की एक डॉक्टर ने एसिड से बचाव करने वाला मेकअप केमिकल तैयार किया। इसका उद्देश्य महिलाओं को तेजाब के हमले से होने वाले नुकसान से बचाना है। 32 वर्षीय डॉ. अलमस अहमद ने 10 साल की कोशिशों के बाद ‘अकेरियर’ केमिकल तैयार किया। इसे फाउंडेशन क्रीम में मिलाकर चेहरे पर आसानी से लगाया जा सकता है। जल्द ही इसे मॉइश्चराइजर और सनस्क्रीन के साथ भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह त्वचा को एक रक्षा कवच प्रदान करता है।

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    लंदन में मां की कोख में ही बच्चे की स्पाइनल सर्जरी की गई। गर्भस्थ शिशु में स्पाइना बाइफिडा नाम की बीमारी का पता चला था। 90 मिनट चली सर्जरी को लंदन यूनिवर्सिटी कॉलेज के हॉस्पिटल की 30 डॉक्टरों की एक टीम ने अंजाम दिया। स्पाइना बाइफिडा ऐसी स्थिति है जब गर्भावस्था के दौरान बच्चे की रीढ़ की हड्डी ठीक से विकसित नहीं हो पाती। रीढ़ की हड्डी में एक दरार बन जाती है। नतीजतन जन्म के बाद बच्चे को चलने-फिरने और सीधे खड़े होने में दिक्कत होती है। बच्चा दिमागी रूप से भी कमजोर हो सकता है। ज्यादातर मामलों में बच्चे के जन्म के बाद सर्जरी की जाती है।

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    जीका वायरस से जयपुर में करीब 22 से अधिक लोग संक्रमित हुए। हालात इतने बिगड़े कि वायरस की पुष्टि होने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्वास्थ्य मंत्रालय से इसकी व्यापक रिपोर्ट मांगी। भारत में पिछले साल जनवरी और फरवरी में पहली बार वायरस के अहमदाबाद में होने की बात सामने आई थी। 86 देशों में इसके होने की पुष्टि हो चुकी है। WHO के मुताबिक जीका वायरस एडीज मच्छर से फैलता है जो दिन के समय काटता है। संक्रमण फैलता का सबसे ज्यादा खतरा गर्भवती महिलाओं और बच्चों को है।

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    कोयंबटूर के एक हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने ऑपरेशन करके रिकॉर्ड बनाया। डॉक्टरों ने एक महिला की ओवरी में मौजूद 33.5 किलो के ट्यूमर को निकालने में कामयाबी पाई। कोयंबटूर के खेतों में मजदूरी करने वाली वसंता को कई सालों से दर्द की शिकायत थी। जिसके बाद उसने ऑपरेशन कराने का फैसला लिया। वह अब स्वस्थ है। ऑपरेशन करने वाली टीम के हेड डॉ. सेंथिल के अनुसार इतना बड़ा ट्यूमर को सर्जरी से हटाया जाना एक रिकॉर्ड है। इसे इंडियन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स से मंजूरी मिल चुकी है। ऑपरेशन से जुड़ी सभी जानकारी गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के लिए भेजी गई हैं। इसे दुनिया के सबसे बड़े ट्यूमर का दर्जा मिल सकता है।

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    मानव मस्तिष्क में 2 मिलीमीटर आकार के एक नए हिस्से की खोज की गई है। यह खोज करने वाले ऑस्ट्रेलियाई न्यूरोसाइंटिस्ट प्रो. जॉर्ज पेक्सिनोस के मुताबिक इसे ‘एंडोरेस्टिफॉर्म न्यूक्लियस' नाम दिया गया है। प्रो. पेक्सिनोस और उनकी टीम ने इसकी खोज स्टेनिंग और इमेजिंग तकनीक से की है। दरअसल, मस्तिष्क की संरचना पर नया मैप बनाने के लिए वैज्ञानिक मानव मस्तिष्क की तस्वीरें ले रहे थे, तभी उन्हें यह अलग हिस्सा नजर आया। उन्होंने ‘एंडोरेस्टिफॉर्म न्यूक्लियस' की खोज से जुड़ी जानकारी अपनी किताब ‘ह्यूमन ब्रेन स्टेम’ में दी है।



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      health flashback 2018 from gene edited babies to dead uterus transplantation happened in 2018

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सालभर छाया रहा मिनिमल मेकअप और गोल्डन हेयर कलर का जादू


लाइफस्टाइल डेस्क. साल 2018 में मिनिमल मेकअप छाया रहा। एलिगेंट लुक के लिए हेयर कलर से लेकर लिपस्टिक में महिलाओं ने नए एक्सपेरिमेंट किए। इस साल मेकअप के ट्रेंड ने साबित किया कि खूबसूरत नजर आने के लिए आपको हैवी मेकअप ही करना पड़े, ऐसा जरूरी नहीं है। इसके अलावा बालों को लेकर काफी प्रयोग किए गए। इनमें गोल्डन हेयर कलर काफी पसंद किया गया। मेकअप एक्सपर्ट सुप्रीति बत्रा से जानिए 2018 में मेकअप ट्रेंड से जुड़ी ऐसी ही खास बातें...

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    ब्लैक आईलाइनर गर्ल्स की पहली पसंद बने। इस साल आई मेकअप में मैटेलिक ग्रीन, गोल्ड, पिंक जैसे वायब्रेंट कलर फैशन में रहे जो पार्टी मेकअप में भी नजर आए। वहीं पेस्टल शेड्स भी गर्ल्स ने खूब पसंद किए। आई मेकअप में आंखों को नेचुरली खूबसूरत दिखाने के लिए वॉटरलाइन पर स्मज प्रूफ काजल का यूज किया गया। लिक्विड आईलाइनर से लेकर ऑरेंज और ओशियन ब्लू आईशैडाे को गर्ल्स ने पसंद किया।

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    लिपस्टिक में स्किन से मेल खाते नेचुरल शेड्स पसंद किए गए। लाइट पिंक या बेबी पिंक जैसे लिप कलर का इस्तेमाल खूब हुआ। इसके अलावा पिच, कैमल ब्राउन, बबल पिंक, सैंड पिंक, लाइट मॉव जैसे न्यूट्रल शेड्स भी मेकअप में इन रहे। लिप ग्लॉस में बेबी पिंक और पीच शेड्स का यूज अधिक हुआ। इसे चिक्स पर भी अप्लाय किया गया।

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    गोल्डन हेयर कलर का ट्रेंड जोरों पर रहा। हर तरह के स्किन कलर वाली गर्ल्स और बॉयज ने इस कलर को अपने मेकओवर के लिए अप्लाय किया। समर सीजन में ऑरेंज और रेड कलर का मिक्स शेड भी पसंद किया गया। यूथ को क्रेजी बनाने वाले इन शेड्स की डिमांड साल भर बनी रही।

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    कर्ली हेयरस्टाइल और बॉयकट हेयर स्टाइल गर्ल्स के बीच छाए रहे। ये हेयरस्टाइल जितना कैजुअल और ऑफिशियल हैं, उतना ही पार्टीवियर और हॉट भी लगते हैं। एकदम डिफरेंट लुक के लिए बॉइश बैंग और बबल अप भी ट्रेंड में रहे। मेसी लुक के लिए वेवी बैंग हेयर स्टाइल को भी फॉलाे किया गया।

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    मेटैलिक नेल पेंट्स, कैमल कलर या डीप यलो कलर की नेलपेंट साल भर ट्रेंड में रहीं। पर्पल, बेरी, ओशियन ब्लू और न्यूड नेल पेंट्स के शेड्स ज्यादा पसंद किए गए। नेल्स की डिजाइन में जिग जैग और पोल्का डॉट्स के अलावा कंट्रास्ट डिजाइन को गर्ल्स ने खूब पसंद किया। ये ट्रेंड पार्टी में भी छाए रहे।

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    राइनस्टोंस, जेम्स और सीक्वेंस को आई लिड के लिए बेस्ट माना गया। डिफरेंट फैशन शोज में भी मॉडल ने आई मेकअप के इस ट्रेंड को फॉलो किया। ग्लिटर्स और स्पार्कल्स का क्रेज साल भर देखने को मिला। इसे आई मेकअप के अलावा चिक्स और गर्दन पर भी अप्लाय किया गया।

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    गोल्ड हाइलाइटर ट्रेंड में रहे। यलो गोल्ड मैटेलिक पिगमेंट को पूरे फेस पर अप्लाय करने का चलन इस साल भी रहा। स्पॉट हाइलाइटर और आईशैडो के लिए पेल और कूल स्किन टोन हर उम्र की महिलाओं को पसंद आए। पाउडर हाइलाइटर यूट्यूबर्स और फैशन ब्लॉगर्स की पहली पसंद साबित हुए।

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    ऑयल बेस्ड फाउंडेशन 2018 में ट्रेंड से आउट रहा। इसके बजाय वेटलेस फाउंडेशन अप्लाय किया गया। फ्रेश लुक के लिए इसके लाइट टोन पसंद किए गए। नैचुरल लुक और फील के लिए ऐसे फाउंडेशन बेस्ट हैं। डस्की स्किन के लिए गोल्ड या यलो टोन फाउंडेशन ट्रेंड में रहा।



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      make up trend 2018 girls liked minimal make up and golden hair colour

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रेडिएशन के साइड इफेक्ट से राहत देगी प्रोटॉन थैरेपी, कैंसर और ब्रेन ट्यूमर के मरीजों को बचाना होगा आसान


हेल्थ डेस्क. आधुनिक रॉकेट टेक्नोलॉजी के पितामह डॉ. रॉबर्ट एच गोडार्ड ने कहा था, ‘यह बताना कठिन है कि असंभव क्या है, क्योंकि कल के सपने आज की उम्मीद और आने वाले कल की वास्तविकता होते हैं।’ बीत रहा साल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन टेक्नोलॉजी के संदर्भ में इन शब्दों को सच साबित करता है। ये दोनों टेक्नोलॉजी न सिर्फ हेल्थकेयर डिलीवरी को बुनियादी रूप से बदल रही हैं बल्कि मेडिकल टेक्नोलॉजी में नई खोजों, रोग निदान को नया रूप देने और उपचार में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। भारतीय हेल्थ केयर इंडस्ट्री ने नई टेक्नोलॉजी में निवेश करके इस साल वक्त के साथ रफ्तार बनाए रखी है, जिसमें हेल्थकेयर में ढेर सारी नई चीजें आई हैं और तरक्की हुई है। कई चीजें विकसित हो रही हैं जैसे उन जीन्स पर रिसर्च जो कैंसर पैदा करते हैं, ऐसे डीएनए टेस्ट जो दवाओं के साइड इफेक्ट का पूर्वानुमान लगा सकेंगे, मादक पदार्थों के आदी लोगों के इलाज के लिए ब्रेन केमेस्ट्री संबंधी रिसर्च, इंटरनेट ऑफ थिंग्स का उपयोग करके बनाए जाने वाले सक्रिय इम्प्लांट करने वाले उपकरण, कोलेस्ट्रॉल घटाने के लिए नई किस्म की दवाएं, आनुवांशिक रूप से होने वाली रेटिना संबंधी बीमारियों में जीन थैरेपी का उपयोग आदि।

यह तो केवल बानगी है। लेकिन, कई चीजें ऐसी भी हुई हैं, जो हमारे दैनिक जीवन में आ गई हैं। इनमें से एक है सर्जिकल रोबोट्स का आगमन, जिसने सर्जरी में क्रांति ला दी है। इससे सर्जन अब कई तरह की जटिल प्रक्रियाएं अधिक अचूकता, लचीलेपन और नियंत्रण के साथ करने में सक्षम हो गए हैं। आज ज्यादातर रूटीन हार्ट सर्जरी जैसे सीएबीजी, वॉल्व बदलना व उसे रिपेयर करना और दिल में छेद की समस्या को मिनिमल इन्वेजिव कार्डिएक सर्जरी (एमआईसीएस) से आसानी से किया जा सकता है। हमारा संस्थान दुनिया के चंद केंद्रों में से है, जहां मिनिमली इन्वेज़िव हाइब्रिड कोरोनरी रिवैस्क्यूलराइजेशन (एमआईएचसीआर) नियमित रूप से होता है। नवीनतम दा विंची सिस्टम भी हमारे यहां है, जो मिनिमली इन्वेज़िव सर्जरी संभव बनाता है। इसे नासा और स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा टेलीप्रजेंस रोबोटिक टेक्नोलॉजी का उपयोग कर विकसित किया है। इससे सर्जरी में अत्यधिक अचूकता मुमकिन हो पाती है।

कैंसर के खिलाफ लड़ाई में भी तरक्की हुई है। रोगी की कोशिका के उपयोग से इलाज से लेकर जीन बदलकर ल्यूकेमिया का इलाज करने और अत्याधुनिक रेडिएशन थैरेपी- प्रोटोन थैरेपी से इस रोग का मुकम्मल इलाज अब बहुत ही निकट है। चेन्नई में जल्द ही हमारा अपोलो प्रोटोन थैरेपी सेंटर खुलने वाला है, जो दक्षिण एशिया में पहला होगा और इस क्षेत्र के 3 अरब लोगों की पहुंच में यह अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी होगी। पूरी दुनिया में यह तेजी से बढ़ी है, क्योंकि इसका डोज़ वितरण बहुत अच्छा है, जिससे साइड इफेक्ट न्यूनतम हो जाते हैं। इससे उन कैंसर रोगियों को फायदा होगा, जिनके सामने परम्परागत रेडिएशन थैरेपी के जोखिमों के कारण सीमित विकल्प होते थे। इससे बच्चों में होने वाले कैंसर, खोपड़ी के ट्यूमर आदि संभव होंगे, जिसमें जीवित बचने की दर में उल्लेखनीय सुधार होगा। आईबीएम वॉटसन जैसे सहयोगात्मक सॉफ्टवेयर के कारण हेल्थकेयर में एआई का विस्फोट होने वाला है। यह सॉफ्टवेयर मेडिकल रिपोर्ट के डेटा का विश्लेषण करके कैंसर विशेषज्ञों को सबूत पर आधारित इलाज के विकल्प देता है। एआई का इस्तेमाल मेडिकल कंडिशन और ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल के बिग डेटा को संग्रहित करने में भी हो रहा है। इससे आने वाले दिनों में डॉक्टरों को मेडिकल डेटा का इस्तेमाल करके रोग निदान के लिए लक्षण आधारित श्रेष्ठतम जांच की सलाह देने और श्रेष्ठतम इलाज पद्धति सुझाने में मदद मिलेगी।

एआई टेलीमेडिसीन और रिमोट हेल्थकेयर को अगले स्तर पर ले जाएगा। 2019 में हमें रोगों के प्रबंधन ही नहीं बल्कि रोगों के पूर्वानुमान और रोकथाम के क्षेत्र में मेडिकल टेक्नोलॉजी और इनोवेशन देखेंगे। गैर संक्रामक रोग (एनसीडी) खासतौर पर युवाओं में, उनके सबसे उत्पादक वर्षों में मौत का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरे हैं। विश्व आर्थिक मंच का आकलन है कि एनसीडी पर वैश्विक खर्च 35 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगा। यह ऐसा बोझ है, जिसे दुनिया वहन नहीं कर सकती। हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी यह सुनिश्चित करेगी कि हेल्थ रिस्क का समय रहते पता लग जाए और उनका उपचार हो जाए। हम रोगों के रोकथाम की ऐसी व्यापक व्यवस्था कायम करने के लिए काम कर रहे हैं, जिसमें तीन वर्षों के भीतर हेल्थ मॉनिटरिंग के जरिये एनसीडी के जोखिम को पूरी तरह काबू में किया जा सकेगा।



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proton therapy will reduce side effect of radiation in 2019

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सब्जियों से बने नूडल्स और आइसक्रीम में गुलाब जामुन का जायका लोगों की जुबान पर चढ़ा


लाइफस्टाइल डेस्क.2018 में खानपान में इतने बदलाव देखे गए जितने पिछले कुछ सालों में हुई हैं। सबसे खास बात रही कि स्वाद में एक्सपेरिमेंट से लेकर परोसने तक की कला को लोगों ने काफी पसंद किया। इसके अलावा जो बात दूसरे सालों से अलग रही वह है लोगों का शाकाहारी फूड की तरह झुकाव। शाकाहारी भोजन को काफी पसंद किया गया और अपनाया भी गया। जूडल्स यानी ज़ूकीनी से बना पास्ता या स्पैगेटी, सब्ज़ियों का सालसा और चॉकलेट-फ्रूट पुडिंग 2018 में काफ़ी पसंद किए गए। इस तरह के भोजन को प्लांट बेस्ड डिश कहते हैं यानी पौधे या सब्ज़ियों से बनी ऐसी डिश जिसमें दूध या दूध से बने उत्पाद का इस्तेमाल नहीं होता है। सब्ज़ियों के अलावा फल, अनाज, दाने या फ़लियों से ये डिश तैयार की जाती हैं।फूड एक्सपर्ट अमृता पुरंदरे से जानिए 2018 के फूड ट्रेंड्स के बारे में...

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    सूखे मेवे, हरी सब्जियां और हल्दी हमेशा से ही सुपरफूड रहे हैं। लेकिन इस साल इन सुपरफूड के साथ कई नए नाम शामिल हुए जैसे- अलसी, चीया यानी सबज़ा, कोको पाउडर। ये सेहतमंद होने के साथ खाने का स्वाद भी बढ़ाते हैं। इन्हें किसी भी व्यंजन में डाला जा सकता है। नया और अनोखा होने की वजह से माचा पाउडर भी इस सुपरफूड की सूची में शामिल रहा। ये ग्रीन-टी पाउडर होता है जिसे ड्रिंक पर डस्टिंग, गार्निशिंग या फ्लेवर के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।

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    अमूमन हम सब्ज़ी का छिलका और जड़ दोनों को हटाने के बाद ही उसे पकाते हैं। लेकिन इस साल जड़-छिलके समेत सब्ज़ियां पसंद की गई। इसमें सब्ज़ी की जड़ का पेस्टो, वेजीटेबल स्टॉक, सूप या सलाद में इस्तेमाल हुआ। गोभी के डंठल की सब्ज़ी या आलू, टिंडा, परवल के छिलकों की सब्ज़ी तैयार गई। गाजर और मूली के पत्तों की भाजी कई रेस्तरां के मेन्यू में शामिल हो गई।

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    इस साल खाने के नए रंग और रूप ने लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। आइसक्रीम कप में सॉफ्टी, काले रंग के नूडल्स में रंग-बिरंगे बेबी टोमैटो, गोल्डन मिल्क, गुलाबी कॉफी और ब्लैक बर्गर ट्रेंड में रहे। वहीं भारतीय व्यंजनों को भी पश्चिमी अंदाज़ में परोसा जा रहा है जैसे गिलास में चटनी और उसमें कटलेट लॉलीपॉप।

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    इसमें पहले कुल्हड़ को तंदूर में गर्म किया जाता है। उसके बाद आधी पकी हुई चाय को इस गर्म किए हुए मिट्टी के कुल्हड़ में डाला जाता है, जिससे चाय में बुलबुले उठने लगते हैं। इससे चाय में स्मोकी फ्लेवर आने लगता है और चाय का स्वाद बढ़ जाता है। इसमें तंदूरी चाय के अलावा तंदूरी कॉफी, चाय मसाला, मटका लेमन चाय जैसे और भी कई फ्लेवर काफी पसंद किए गए। तुर्की की तंदूर चाय भी लोगों को काफ़ी पसंद आई।

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    मैदे के नूडल्स तो खाए ही होंगे। इस साल मैदे से ज़्यादा सब्ज़ियों से बने नूडल काफ़ी पसंद किए गए हैं। ये आमतौर पर खाए जाने वाले नूडल्स से अलग होते हैं, जो कहीं ज़्यादा पौष्टिक भी होते हैं। इनमें जूडल्स यानी ज़ूकीनी से बने नूडल्ड सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध हैं। सिर्फ़ ज़ूकीनी ही नहीं बल्कि गाजर, खीरा या मूली से नूडल्स बनाए जाते हैं। इन्हें ठीक उसी तरह से बनाया जाता है जिस प्रकार आमतौर पर नूडल्स बनाए जाते हैं।

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    फ्राइड और तवा आइसक्रीम काफी पसंद की गईं। ये तवे पर बनाई जाती है जो रोल की तरह दिखती है। तवे पर दूध और क्रीम डालकर -23 डिग्री सेंटीग्रेड पर ठंडा किया जाता है। इसमें फल, चॉकलेट चिप्स, कैंडी, कुकीज़, गुलाब जामुन, मीठा पान या मिठाई डालकर मिलाते हैं। तेज़ धार वाले स्पेच्यूला से इसे बारीक़ करके तवे पर फैला देते हैं। फिर रोल बनाकर एक बोल में ओरियो, चॉकलेट के साथ सर्वकिया जाता है।

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    पोक बोल जापान का एक व्यंजन है। इस बोल में स्वाद और पोषण संतुलित मात्रा में होते हैं। इसमें एक बोल में कई प्रकार के फल रखे जाते हैं, जो स्वाद में एक-दूसरे से बहुत अलग होते हैं। इसमें पपीता, अवोकाडो, गाजर, ब्रोकली, बींस, पालक, मूली को अलग-अलग आकार में सजाकर पेश किया जाता है। वहीं भारत में इसे भारतीय व्यंजन के साथ परोसा जा रहा है। भारतीय व्यंजन पसंद करने वालों के लिए एक बोल में चावल को करी और सलाद आदि के साथ परोसा जा रहा है।



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      year ender food trends 2018 how veggie noodle super food and dish decoration changed trend

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भारतीयों की पहली पसंद इंडियन डिशेज और हेल्दी ड्रिंक्स, स्विग्गी और उबर ईट्स ने जारी की रिपोर्ट


लाइफस्टाइल डेस्क. 2018 में खाने के प्रति लोगों का बढ़ता लगाव ऑनलाइन फूड डिलीवरी कंपनियों और स्टार्टअप के लिए फायदेमंद साबित हुआ है। इस साल लोगों ने कौन-कौन से फूड ऑनलाइन ऑर्डर किए, इसकी लिस्ट फूड डिलीवरी कंपनी स्विग्गी और उबर ईट्स ने जारी की है। यह ट्रेंड पिछले 6 महीने में लोगों की डिमांड के आधार पर तैयार किया गया है। सबसे खास बात है कि लोगों ने हेल्दी ड्रिंक्स और भारतीय व्यंजनों को सबसे ज्यादा ऑर्डर किया है।

  1. उबर ईट्स के मुताबिक, पिछले छह महीनों में भारतीय व्यंजन विदेशों में भी पसंद किए गए। भारत में हैदराबाद, दिल्ली और चेन्नई जैसे प्रमुख शहरों में लोगों की पहली पसंद भारतीय व्यंजन रहे। इसके बाद लोगों ने अमेरिकन और चाइनीज डिशेज को पसंद किया। उबर ईट्स इंडिया के हेड दीपक रेड्डी के अनुसार, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लोगों ने भारतीय व्यंजनों को अधिक तवज्जो दी है। उनकी डिमांड काफी बढ़ी हैं।

  2. स्विग्गी की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, बेंगलुरू, हैदराबाद और चेन्नई में ऑनलाइन फूड ऑर्डर करने पर सबसे ज्यादा लोगों ने हेल्दी फूड पसंद किया। यह आंकड़ा दिसंबर 2017 से नवंबर 2018 का है। भारत के बड़े शहरों में तरबूज, मौसमी, अनानास और संतरे का जूस की डिमांड बढ़ी है। सॉफ्ट ड्रिंक के मुकाबले दिन में फ्रूट जूस पांच बार पीया गया। वहीं अहमदाबाद, चंडीगढ़, दिल्ली, लखनऊ, मुंबई और पुणे जैसे शहरों में लोगों ने रोस्टेड चिकन और फ्रूट सैलेड ऑर्डर किया।

  3. स्टडी के मुताबिक, अब लोग वीकेंड पर भी कैलोरी को लेकर काफी जागरूक हुए हैं, ऐसे मौकों पर उन्होंने लो-कैलोरी फूड ऑर्डर किया। स्विग्गी के अनुसार, 2017 के मुकाबले 2018 में लोगों शाकाहार खाना अधिक पसंद किया। 2018 में 62 फीसदी ऑर्डर शाकाहारी खाने के लिए थे। सबसे ज्यादा वेजिटेरियन फूड के ऑर्डर अहमदाबाद से किए गए और सबसे ज्यादा नाॅन वेज फूड बेंगलुरु के लोगों ने मंगाए।

  4. स्विग्गी के मुताबिक, 2018 में आम दिनों के मुकाबले त्योहारों में लोगों ने अधिक खाना ऑर्डर किया। दुर्गा पूजा के मौके पर मिष्ठी और कलाकंद ऑर्डर किया वहीं ईद के मौके पर बटर चिकन, हैदराबादी बिरयानी और हलीम की डिमांड अधिक रही। गणेश चतुर्थी के मौके पर लड्डुओं की डिमांड में 400 गुना इजाफा हुआ और होली में 10 गुना गुजिया अधिक ऑर्डर की गईं।



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      indian foodies ordered online india cuisine and healthy drink in 2018 swiggy and uber eats report

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कभी केक में बटर इस्तेमाल करना था मना, प्रिंस ने पोप को लेटर लिखकर मांगी थी इजाजत


लाइफस्टाइल डेस्क. क्रिसमस का सबसे खास हिस्सा है केक। बिना केक सेलिब्रेशन अधूरा है। केक की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। एक दौर ऐसा भी था जब बेकर्स को केक में बटर तक इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं थी। नतीजा स्टॉलेन केक बेहद स्वादहीन और कठोर बनताथा। जर्मन में बनने वाले स्टॉलेन केक को सबसे पहले 1545 में क्रिसमस ब्रेड के तौर पर बेक किया गया था। केक कई वैरायटी सालों तक यह अपने बदलाव के कई पड़ावों को पार करने के बाद आज हमारे डेजर्ट का सबसे खास हिस्सा बन गया है। जानते हैं इसका सफरनामा….

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    • जर्मनी के सैक्सनी प्रांत में यह केक आटे, यीस्ट और ऑयल से बनाया गया था। यह टेस्टलेस और हार्ड था। तब बेकर्स को बटर इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं थी।
    • 15वीं शताब्दी में प्रिंस इलेक्टर अर्न्स्ट और उनके भाई ड्यूक अल्ब्रेख्त ने रोम में पोप को लिखा कि बेकर्स को बटर इस्तेमाल करने की इजाजत दी जाए। इसकी वजह थी कि ऑयल वहां महंगा था और मुश्किल से मिलता था। शुरुआत में इनकी अपील खारिज कर दी गई।
    • आखिरकार पोप ने प्रिंस को जवाब दिया कि सिर्फ आप और आपकी फैमिली बटर इस्तेमाल कर सकती है। इसे बटर लेटर के तौर पर जाना जाता है। कुछ और लोगों को भी इजाजत दी गई, लेकिन सालाना रकम चुकानी पड़ती थी।
    • काफी सालों बाद बटर से बैन पूरी तरह से हटाया गया। आज भी पारंपरिक स्टॉलेन उतना मीठा और हल्का नहीं होता जैसा दुनिया के अन्य हिस्सों में बनाया जाता है।
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    • 19वीं सदी में स्कॉटलैंड में इसे सबसे पहले बेक किया गया था। कहा जाता है कि मेरी क्वीन ऑफ स्कॉट्स को अपने केक में ग्लेस चेरीज़ पसंद नहीं थीं। इसलिए सबसे पहले उनके लिए यह केक बनाया गया, जिसमें चेरी की जगह बादाम इस्तेमाल किए गए।
    • आज यह यूके के सुपरमार्केट्स में बड़े पैमाने पर बिकता है और इसकी खासियत ही है- बादाम से डेकोरेशन। 1947 के बाद एक नामी कंपनी ने इसे इंडिया में भी बेचा।
    • हालांकि 1980 में इसे मार्केट से विदड्रॉ कर लिया गया, लेकिन क्रिसमस गिफ्ट के तौर पर दिया जाता रहा। ऐसा कहा जाता है कि टी टाइम में क्वीन एलिजाबेथ डंडी केक पसंद करती हैं।


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      christmas 2018 history of Stalin Cake and Dundee cake

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जितनी ज्यादा ओस, उतनी ज्यादा स्वादिष्ट बनती है बनारस की खास मिठाई मलइयो


हेल्थ डेस्क. ठंड का मौसम आते ही हर किसी का ध्यान मुख्य रूप से दो चीजों पर जाता है। एक, रंग-बिरंगे ऊनी व गरम कपड़ों पर और दूसरा, स्वादिष्ट पकवानों पर। इस मौसम में क्या उत्तर, क्या दक्षिण, क्या पूरब क्या पश्चिम, हर जगह खाने के लिए कुछ न कुछ खास चीज जरूर मिलेगी जो उस क्षेत्र विशेष की पहचान बन जाती है। शेफ हरपाल सिंह सोखी आज बात कर रहे हैं सर्दी के दिनों में उत्तरप्रदेश के बनारस में बनने वाली मलइयो और पंजाब की पिन्नियों की...

बनारस की गलियों में ही बनती हैं मलइयो

सर्दी के मौसम में यह केवल बनारस की गलियों में ही बनती और मिलती है। और इसे वहां भी हर कोई बनाता भी नहीं है, क्योंकि बनाना इतना आसान नहीं है। वहां कुछ ही लोग हैं जो सालों से इस मिठाई को बनाते आ रहे हैं और उसे गलियों के नुक्कड़ों पर बेचते आ रहे हैं। यह मिठाई झागनुमा होती है और इसे मिट्टी के कुल्हड़ों में बादाम और पिश्ता के साथ सर्व किया जाता है। यह मुंह में जाते ही तुरंत घुल जाती है, लेकिन उसका स्वाद लंबे समय तक बना रहता है। मुझे लगता है कि अगर कहीं स्वर्ग में कोई मिठाई परोसी जाती होगी तो यह बनारस की मलइयो ही होगी।

जितना बढ़िया झाग, उतना बढ़िया स्वाद

मलइयो आमतौर पर सुबह 11 बजे के पहले ही मिलती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसके झाग केवल सुबह की ठंडी में ही बने रहते हैं। जैसे-जैसे ठंडक कम होती जाती है, झाग भी खत्म होते जाते हैं। और बगैर झाग के इसका कोई स्वाद है नहीं। हालांकि अब कुछ स्थानों जैसे सिगरा, गोदौलिया, अस्सी और लंका में यह दिनभर भी मिलने लगी है, लेकिन उसकी गुणवत्ता वैसी नहीं होती, जैसी कि बनारस के पुराने क्षेत्रों जैसे चौखम्बा और ठठेरी गली में मिलने वाली मलइयो की होती है।

ओस हैं इस खास ज़ायके के पीछे का राज

मलइयो को बनाने की प्रक्रिया इसके स्वाद से भी ज्यादा अनूठी है, बल्कि दरअसल उसकी बनाने की इसी प्रक्रिया के कारण यह इतनी स्वादिष्ट होती है। इसको तैयार करने की प्रक्रिया लंबी भी काफी है। पहले कच्चे दूध को लोहे के एक बड़े कड़ाहे में काफी देर तक उबाला जाता है। फिर इस उबले दूध को रात भर खुले आसमान के नीचे रख दिया जाता है ताकि इस पर ओस पड़ सके। सुबह होते ही दूध को मथा जाता है, ताकि उससे अच्छा झाग निकल सके। इस झाग में शक्कर, केसर, पिस्ता, मेवा, इलायची आदि मिलाए जाते हैं। बस तैयार हो गई मलइयो। फिर इसे कुल्हड़ या छोटी-छोटी मटकियों में सजाकर पेश किया जाता है। माना जाता है कि ओस की वजह से ही मलइयो का झाग घंटों बना रहता है। यह भी माना जाता है कि ठंड में जितनी ज्यादा ओस पड़ती है, मलइयो भी उतनी ही टेस्टी होती है।

ओस से बनी यह मिठाई स्किन के लिए भी काफी अच्छी मानी जाती है। बनारस में आने वाले विदेशी पर्यटकों के बीच भी मलइयो की खूब मांग होती है। कहा जाता है कि अगर आप बनारस गए और वहां मलइयो नहीं खाई तो फिर आपकी बनारस यात्रा व्यर्थ है।

पंजाब की पिन्नी

ठंड के दिनों में पंजाब में भी एक खास मिठाई बनाई जाती है- पिन्नी। यह आमतौर पर आटे से बनाई जाती है। हालांकि कई लोग मूंग दाग या उड़द दाल से भी बनाते हैं। इसमें ड्राय फ्रूटस, अजवायन और तिल मिलाई जाती है। पिन्नी की तासीर गर्म होती है। इसलिए ठंड के दिनों में इसे खाया जाता है ताकि शरीर को गर्मी मिल सके। पिन्नी को अगर एयर टाइट कंटेनर में रख दें तो यह लंबे समय तक चलती है। इसे फ्रिज में रखने की भी जरूरत नहीं है।



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banarasi malaiyo and punjabi pinni's food story by chef harpal singh sokhi

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ठंड में बड़ा फायदेमंद है बाजरा


हेल्थ डेस्क. सर्दियों के मौसम में बाजरा ऐसा फूड है, जो न सिर्फ स्वाद से भरपूर है, बल्कि शरीर के लिए इसके ढेरों फायदे भी हैं। आयुर्वेद में भी बताया गया है कि यह शरीर को गर्म बनाए रखने के साथ वात और पित्त दोष को संतुलित करता है। तो इस मौसम में बाजरे की रोटियों के अलावा बाजरे का ढोकला, खिचड़ी, टिक्की, हलुआ, रोटी, भरपूर खाएं और खिलाएं, साथ ही डाइट एंड वेलनेस एक्सपर्ट डॉ. शिखा शर्मा से जानेंबाजरे के फायदे...

  1. बाजरा में आयरन खूब होता है। इसलिए इसका सेवन रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ाता है। इससे एनीमिया जैसी बीमारी से भी बचा जा सकता है। इसमें काफी मात्रा में स्टार्च भी होता है। चूंकि स्टार्च ग्लूकोज के रूप में टूट जाता है। इससे शरीर को धीरे-धीरे ऊर्जा मिलती रहती है और यह शरीर को लंबे समय तक ऊर्जावान बनाए रखता है। इसमें अमीनो एसिड की भी अच्छी मात्रा होती है। यह मांसपेशियों और शिराओं को बनाने तथा उनकी मरम्मत करने के लिए आवश्यक होता है।

  2. बाजरा में लिग्निन नामक तत्व होता हे जो कैंसर रोधी होता है। इस तरह भोजन में बाजरा का नियमित इस्तेमाल करने से कैंसर की आशंका कम होती है। बाजरा में मौजूद पोटेशियम और मैग्नीशियम ब्लडप्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं। इसके अलावा इसमें मौजूद विटामिन बी 3 शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी नियंत्रित रखता है, जिससे दिल की बीमारियों का खतरा कम होता है।

  3. जिन लोगों को कॉन्सिटपेशन यानी कब्ज़ की दिक्कत बनी रहती है, उनके लिए बाजरा किसी वरदान से कम नहीं है। इसमें अघुलनशील फाइबर की अच्छी मात्रा होती है, जो बॉउल मूवमेंट को ठीक करता है। बाजरा पित्त के स्राव को कम करता है। इससे गालब्लैडर में गालस्टोन बनने की आशंका भी कम हो जाती है। बाजरा खाने के बाद लंबे समय तक भूख भी नहीं लगती है। इससे वजन कम करने में मदद मिलती है।

  4. डायबिटीज़ के रोगियों को बाजरा खाने की सलाह दी जाती है। इसमें मौजूद मैग्नीशियम इंसुलिन के प्रति प्रतिरोध को कम करता है। इससे शरीर को इंसुलिन का अच्छी तरह से उपयोग में मदद मिलती है। बाजरा ग्लूटेन फ्री होता है। कई लोगों को ग्लूटेन प्रोटीन से एलर्जी होती है। सेलिएक नामक रोग से पीड़ित ये लोग गेहूं, जौ, पास्ता, पिज्जा और ओट्स में मौजूद ग्लूटेन नामक प्रोटीन से एलर्जी के कारण यह सब नहीं खा पाते। ऐसे लोगों के लिए बाजरा काफी उपयोगी है।

  5. बाजरा में मौजूद प्रोटीन और विटामिन के कारण यह त्वचा और बालों को हमेशा स्वस्थ बनाए रखता है। इससे त्वचा मुलायम बनी रहती है। इसलिए भी बाजरा को सर्दी के मौसम में खाने की सलाह दी जाती है। यह बालों को जड़ से मजबूत बनाता है। साथ ही डैंड्रफ, गंजेपन, सोरायसिस, एक्जिमा आदि से भी रक्षा करता है।



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      baajra aka pearl millet sead's benefits by dr shikha sharma

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साइकिलों की संख्या लोगों से ज्यादा, चलाने के लिए टैक्स में छूट दे रही सरकार


लाइफस्टाइल डेस्क. ईंधन से चलने वाले वाहनों का इस्तेमाल कम करने के लिए नीदरलैंड साइकिलिंग प्रमोट कर रहा है। देश की कुल आबादी इस वक्त करीब 1.7 करोड़ है, जबकि साइकिलों की संख्या करीब 2.3 करोड़ है। ऐसे में सरकार अब अपने रोड इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने में जुटी है। इसके लिए 39 करोड़ डॉलर (करीब 2700 करोड़ रुपए) खर्च किए जा रहे हैं, ताकि अगले 3 साल में 2 लाख लोगों के साइकिल इस्तेमाल करने पर जोर दिया जा सके। इसके अलावा सरकार साइकिल से ऑफिस जाने वालों को टैक्स में प्रति किलोमीटर के हिसाब से 0.22 डॉलर (15 रुपए) की छूट भी दे रही है। साइकिल चलाना खुद की सेहत के साथ ही प्रकृति की सेहत के लिए भी अच्छा है।

  1. नीदरलैंड पहले ही साइकिल को बढ़ावा देने में कई यूरोपीय देशों से आगे है। इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसपोर्ट पॉलिसी एनालिसिस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 में करीब 37% लोग छुट्टी के दिनों में साइकिल इस्तेमाल कर रहे थे, जबकि काम पर जाने के लिए सिर्फ 25% लोग ही साइकिल का इस्तेमाल कर रहे थे। ऐसे में माना जा रहा है कि नीदरलैंड सरकार अब ज्यादा से ज्यादा लोगों को पैसे के जरिए कार से साइकिल पर लाना चाहती है।

  2. नीदरलैंड के 11 बड़े नौकरी देने वाले संस्थान साइकिलिंग की आदत को बढ़ावा देने के लिए साइकिलों को फाइनेंस भी करते हैं। सरकार ने ज्यादातर संस्थानों से साइकिल से ऑफिस आने वालों को बेहतर सुविधा मुहैया कराने की अपील की है। इनमें बेहतर पार्किंग और ऑफिस में ही शॉवर से नहाने की सुविधा एक है।

  3. नीदरलैंड को आज साइकिलिंग कल्चर के लिए जाना जाता है। लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। यूनिवर्सिटी ऑफ एम्सटर्डम में अर्बन साइकिलिंग इंस्टीट्यूट की शोधकर्ता मेरेडिथ ग्लासर कहती हैं- 1960-70 के दशक में डच शहरों में कार और साइकिल रखने के लिए इमारतों में ज्यादा जगह नहीं होती थी।

  4. ग्लासर के मुताबिक- 1980 और 90 के दशक में साइकिलिंग और पैदल चलने को लेकर सरकार की तरफ से पॉलिसी लाई गई। कई इवेंट्स ने भी साइकिलिंग को प्रमोट करने का काम किया। वहीं, 1960 के दशक में सामाजिक आंदोलन, 70 के दशक में तेल की कमी और पड़ोसी देशों में साइकिलिंग के लिए फ्री वे के निर्माण ने नीदरलैंड में साइकिलिंग को प्रमोट किया।



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      netherland's govenment giving tax concession to cycle riders
      netherland's govenment giving tax concession to cycle riders

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10 प्वाइंट्स, कैसे स्किन से लेकर बालों तक की नमीं को बरकरार रखें


लाइफस्टाइल डेस्क. सर्दियों में ड्राय स्किन और डैंड्रफ की समस्या सबसे कॉमन है। बालों और स्किन का रूखापन रोकने के लिए मॉश्चराइज करना ही जरूरी नहीं बल्कि कुछ खास बातों का ध्यान रखना जरूरी है। जैसे बहुत ज्यादा गर्म पानी का इस्तेमाल स्किन और बाल, दोनों को नुकसान पहुंचाता है। जानिए इस मौसम में कैसे रखें शरीर का ख्याल....

  1. सर्दी में शुष्क हवा सबसे पहले त्वचा की नमी को खत्म करती है। इसका असर पूरी बॉडी पर पड़ता है। मार्केट में अलग-अलग बॉडी टाइप के अनुसार बॉडी लोशन उपलब्ध हैं, जिसे इस्तेमाल किया जा सकता है। जैसे स्किन ड्राई है तो ऐसा बॉडी लोशन प्रयोग करें जिसमें मिल्क और ग्लिसरीन की मात्रा हो।

  2. मार्केट में मौजूद बॉडी लोशन का प्रयोग नहीं करना चाहती हैं तो ग्लिसरीन, गुलाबजल और नींबू को मिलाकर आसानी से बॉडी लोशन तैयार कर सकती हैं। इसके लिए अगर 50 एमएल गुलाब जल ले रही हैं तो 20 एमएल ग्लिसरीन लें। इसमें 1 नींबू पूरा निचोड़कर अच्छे से मिलाएं। नहाने के तुरंत बाद इसे पूरे शरीर पर लगाएं।

  3. इन दिनों गुनगुने पानी से ही नहाएं वरना रूखापन अधिक बढ़ सकता है। साधारण साबुन और स्क्रब का प्रयोग न करें। ये रूखी स्किन में खिंचाव पैदा करते हैं। इनकी जगह माइल्ड सोप का प्रयोग करें। इनमें केमिकल की मात्रा बेहद कम होती है और स्किन को मॉइश्चराइज करते हैं।

  4. ग्लिसरीन बेस्ड मॉइश्चराइजर न होने पर नहाने के तुरंत बाद शरीर में नमी बरकरार रखने के लिए नारियल तेल को पूरे शरीर पर लगाएं। या फिर इसेंशियल ऑयल की कुछ बूंदें नहाने के पानी में मिलाएं।

  5. अंडे का प्रयोग एक अच्छा फेस मास्क के रूप में हो सकता है। अंडे में प्रोटीन और वसा दोनों की मात्रा होती है, इसलिए चेहरे पर फेसमास्क की तरह प्रयोग करने से त्वचा में नमी और ग्लो दोनों ही रहता है। अंडे को शहद में मिलाकर भी फेसमास्क के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है।

  6. होंठों की देखभाल के लिए पेट्रोलियम जेली या विटामिन-ई युक्त लिपबाम का प्रयोग करें। ये नमी बनाए रखता है। अगर होंठ बहुत ज़्यादा फट रहे हों तो कुछ दिनों के लिए लिपस्टिक ना लगाएं। सर्दियों में मैट लिपस्टिक लगाने के पहले और लिपस्टिक लगाने के बाद होंठों को मॉइस्चराइज करना न भूलें।

  7. पैरों की देखभाल के लिए ऑयल बेस्ड मॉइस्चराइजर लगाएं। ऑयल बेस्ड मॉस्चराइजर पैर की त्वचा पर एक मजबूत परत बनाता है, जो किसी भी साधारण क्रीम की तुलना में त्वचा की नमी को बनाए रखने में अधिक कारगर है। एड़ियों को मुलायम बनाने के लिए पेट्रोलियम जेली या ग्लिसरीन बेस्ड लोशन लगाएं। समय-समय पर एड़ियों को स्क्रब कर मॉइश्चराइज करें।

  8. ठंड में अक्सर आंखों के आसपास की त्वचा सिकुड़ी नजर आती है और गंदगी जम जाती है। इससे बचने के लिए सोने से पहले साफ पानी से आंखों को धो लें और फ‌िर कॉटन बॉल से पोछें। अब कॉटन बॉल को बादाम तेल में डुबोकर आइलिड्स पर पांच से दस मिनट तक रखें, उसके बाद एक उंगली से हल्के हाथों से मसाज करें।

  9. बाल सर्दी में भी मजबूत रहें, इसके लिए उनकी जड़ों से मजबूत होना जरूरी है। बालों की नियमित तौर पर मसाज करनी चाहिए। हफ्ते में दो से 3 बार मसाज करना पर्याप्त रहता है। जैतून के तेल से या बादाम के तेल से बालों की मसाज की जा सकती है। ठंड के मौसम में तेल में थोड़ा सा नींबू भी डाल लें और इससे बालों की हफ्ते में 1 बार 15 मिनट तक मसाज करें।

  10. डैंड्रफ से छुटकारा पाने के लिए एक कटोरी दही में दो नींबू निचोड़कर पेस्ट जैसा बना लें। इसे बालों के जड़ों पर हाथ के पोर से लगाएं और 15 मिनट तक मसाज करें। पेस्ट को 1 से डेढ़ घंटे तक बालों में लगा रहने दें और इसके बाद हल्के गुनगुने पानी से बालों को धो लें। इससे बालों का रुखापन और डैंड्रफ दूर होता है।



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      winter care how to moisturize skin and hair

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ड्रोन से भेजी गई वैक्सीन लगवाने वाला दुनिया का पहला बच्चा बना ज्वाय


संयुक्त राष्ट्र. दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर के द्वीपीय देश वनुआतू का एक माह का ज्वाय नोवाई ड्रोन से भेजे गए वैक्सीन लगवाने वाला विश्व का पहला बच्चा बना गया है। संक्रामक रोगों से बचाने के लिए उसे टीका लगाया गया है। वनुआतूू करीब 80 छोटे-छोटे द्वीपों से मिलकर बना है। साल 2006 में यह द्वीप धरती की सबसे खुशहाल जगहों की सूची में पहले स्थान पर आया था।

  1. यूनीसेफ के कार्यकारी निदेशक हेनरिएटा फोर ने कहा कि वनुआतू के सुदूर बीहड़ पहाड़ी क्षेत्र में स्थित डिलांस बे से 40 किमी पश्चिम स्थित कूक्स बे के लिए ड्रोन से वैक्सीन भेजे गए थे। इस क्षेत्र के 13 बच्चों और 5 गर्भवती महिलाओं को टीके लगाए गए। पहली बार ड्रोन के इस सफल प्रयोग से विश्व के कोने-कोने तक बच्चों को वैक्सीन पहुंचाने का नया रास्ता खुल गया है।

  2. कूक्स बे में रहने वाले लोगों को बिजली और स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलती हैं। यहां केवल पैदल अथवा छोटी नाव से ही पहुंचा जा सकता है। कई इलाकों में पहुंचना बेहद ही मुश्किल है।

  3. विश्व के पहले बच्चे को ड्रोन से आने वाले वैक्सीन लगाने वाली नर्स मरियम नामपिल ने कहा, "ऐसी जगह ड्रोन से वैक्सीन का पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। इसके पहले नाव से ही इस क्षेत्र में वैक्सीन पहुंच पाते थे। हम बेहद खुश हैं।"



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      Vaccines delivered by drone to remote Vanuatu island in world first trial
      Vaccines delivered by drone to remote Vanuatu island in world first trial
      Vaccines delivered by drone to remote Vanuatu island in world first trial

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मरीज की स्किन से तैयार होने वाली स्टेम सेल से होगा मिर्गी के दौराें का इलाज


हेल्थ डेस्क. मिर्गी के दौरों को स्टेम सेल की मदद से रोका जा सकेगा। टेक्सास एग्रीकल्चरल एंड मैकेनिकल यूनिवर्सिटी में हुई रिसर्च के मुताबिक मरीज की ही स्किन से स्टेम सेल तैयार की जाएंगी और इसे मस्तिष्क में प्रत्यारोपित किया जाएगा ताकि शरीर इन्हें स्वीकार कर सके। कंवर्ट की हुईं नई स्टेम सेल्स दौरों को रोकने और इसका असर कम करने के लिए खासतौर पर डिजाइन की गई हैं। चूहों पर हुई रिसर्च में सामने आया कि स्टेम सेल प्रत्यारोपित करने के बाद 70 फीसदी मिर्गी के दौरों में कमी आई। ब्रिटेन में हर 100 में से एक और अमेरिका में पूरी जनसंख्या का 1.2 फीसदी लोग मिर्गी के रोगी हैं।

  1. मिर्गी एक तरह का न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है, जिसमें मरीज के दिमाग में असामान्य तरंगें पैदा होने लगती हैं। यह कुछ वैसा ही है जैसे कि शॉर्ट सर्किट में दो तारों के बीच गलत दिशा में तेज करंट दौड़ता है। इसमें मरीज को झटके-से महसूस होते हैं, वह जमीन पर गिर जाता है और वह कुछ देर के लिए बेहोश हो जाता है। 1 दिन के बच्चे से लेकर सौ साल के बुजुर्ग तक को मिर्गी हो सकती है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार पूरी दुनिया में 5 करोड़ लोग मिर्गी से पीड़ित हैं।

  2. दिमाग में मौजूद छोटी-छोटी ब्रेन सेल्स के बीच इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी होती है। इनमें से कुछ कोशिकाएं दूसरी सेल्स को उत्तेजित करती हैं। ऐसी स्थिति बनने पर इनहिबिटर कोशिकाएं रोकने का काम करती हैं। इनहिबिटर कोशिकाएं आवश्यकता से कम होने पर संतुलन बिगड़ता है और मिर्गी के दौरों का खतरा बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों ने दौरों को रोकने के लिए इन्हीं कोशिकाओं को बढ़ाने की कोशिश की है।

  3. दौरों को रोकने के लिए सबसे पहले चूहों के शरीर में क्लोजापाइन-एन-ऑक्साइड रसायन इंजेक्ट किया गया। यह दौरों को बढ़ाने का काम करता है। शोध से जुड़े डॉ. दिनेश उपाध्याय और टीम ने स्किन से तैयार की हुई स्टेम सेल्स को चूहों के दिमाग में प्रत्यारोपित किया। 5 माह बाद सामने आया कि दूसरे चूहों के मुकाबले इनमें 70 फीसदी दौरों में कमी आई।

  4. वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह प्रक्रिया ऐसे मरीजों के लिए कारगर होगी जिनमें दौरों की शुरुआत हिप्पोकैंपस (दिमाग का मध्य में स्थित हिस्सा) से होती है। हिप्पोकैंपस का सम्बंध इंसान की याद्दाश्त और इमोशन से होता है। शोध में हिप्पोकैंपस में प्रत्यारोपित कोशिकाएं सफल रही हैं। रिसर्च के लेखक डॉ. अशोक शेट़्टी के मुताबिक, इस तकनीक में ट्रांसप्लांटेशन के बाद बनने वाले न्यूरॉन शांत रहते हैं। इसे कीमोजेनेटिक प्रक्रिया कहते हैं।

  5. वर्तमान में मिर्गी के मरीजों में दौरों को रोकने के लिए एंटी-एप्लेटिक दवाएं दी जा जाती हैं। गंभीर स्थिति में सर्जरी भी की जाती है। जिसमें हिप्पोकैंपस का प्रभावित हिस्सा हटाया जाता है। इससे 70-80 फीसदी मामलों में सफलता मिलती है। वैज्ञानिकों का कहना है चूंकि सर्जरी की स्थिति में हिप्पोकैंपस प्रभावित हो सकता है और इसका असर याद्दाश्त पर भी पड़ता है। ऐसे में इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है। तकनीक इंसान पर कितनी कारगर साबित होगी यह ट्रायल के बाद साबित हो पाएगा।



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      scientists discover implanting stem cells in brain stop seizures in epileptics

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वैज्ञानिकों ने बनाई डिवाइस जिसे पेट में लगाकर कम किया जा सकेगा मोटापा, 15 दिन में 35 फीसदी वजन घटाने का दावा


हेल्थ डेस्क. अमेरिका की विस्कॉन्सिन-मेडिसन यूनिवर्सिटी केवैज्ञानिकों ने एक ऐसी डिवाइस बनाई है जिसे मोटापा नियंत्रित किया जा सकेगा। सर्जरी की मदद से डिवाइस को पेट से जोड़ा जाएगा जो बेहद कम तीव्रता का करंट रिलीज करेगा। जब व्यक्ति खाना खाएगा तो यह डिवाइस एक्टिवेट हो जाएगी और दिमाग को संदेश भेजने वाली नर्व को उत्तेजित करेगी। नर्व की मदद से मस्तिष्क संकेत भेजेगा कि इंसान काे भूख नहीं है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इसकी मदद से 15 दिन में 38 फीसदी तक वजन कम किया जा सकता है। हालांकि अब तक इम्प्लांट काे कोई नाम नहीं दिया है। गौरतलब है कि अमेरिका में 9.33 करोड़ लोग और ब्रिटेन में हर चार में में एक युवा मोटापे से परेशान है।

  1. वैज्ञानिकों ने यह शोध चूहों पर किया है। जिसके परिणाम जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित किए गए हैं। शोधकर्ता टीम के प्रमुख डॉ. शूडॉन्ग वैंग का कहना है कि डिवाइस बेहतर काम करे इसके लिए हृदय की धड़कनों को आधार बनाया गया है। खाना खाने के दौरान पेट के काम करने की गति ही से धड़कने बढ़ती हैं और संदेश दिमाग तक जाता है।

  2. शोधकर्ताओं का कहना है कि डिवाइस में लगा इलेक्ट्रिक नैनो जनरेटर ही दिमाग से जुड़ी नर्व को उत्तेजित करता है। वैज्ञानिकों ने सर्जरी की मदद से डिवाइस को पेट में इम्प्लांट किया। डिवाइस को एक सोने की प्लेट से जोड़ा गया है। शोध में 250 ग्राम के एक चूहे को शामिल किया गया और 93 दिनों तक हर दिन उसके खाने पर नजर रखी गई। 15 दिनों के बाद ही उसके खाने में दो तिहाई की कमी आई। 18 दिनों के अंदर वजन में 35 फीसदी में गिरावट दर्ज की गई।

  3. वर्तमान में मेस्ट्रो नाम की एक डिवाइस को वजन कम करने में इस्तेमाल किया जा रहा है। जिसे 2015 में फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने मंजूरी दी थी। लेकिन इसकी सबसे बड़ी खामी बैट्री है, जिसे कई बार बदला जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक नई डिवाइस में इलेक्ट्रोड मौजूद हैं जो खुद ही बिजली जनरेट करते हैं। पेट में होने वाले मूवमेंट से ही बैट्री चार्ज हो जाती है। करीब एक घंटे के मूवमेंट से बैट्री एक हफ्ते तक पावर सप्लाई कर सकती है।

  4. विस्कॉन्सिन एल्युमिनी रिसर्च फाउंडेशन की मदद से इस डिवाइस का पेटेंट कराया गया है और शोधकर्ताओं को उम्मीद है जल्द ही इंसान से पहले इसका प्रयोग बड़े जन्तु में किया जाएगा। वैज्ञानिकों ने डिवाइस में कहीं भी इसे ऑन या ऑफ करने की सुविधा नहीं दी है। ऐसे में खाने की शुरुआत में ही दिमाग पेट के भर जाने का संकेत देगा जो सेहत को नुकसान भी पहुंचा सकता है। इस बारे में शोधकर्ताओं ने कुछ भी स्पष्ट नहीं किया है।



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      Scientists create 1cm device that help to reduce weight

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इजरायली वैज्ञानिकों का दावा- तम्बाकू के पौधे से बनाया जा सकेगा कृत्रिम फेफड़ा


हेल्थ डेस्क. इजरायली बायोटेक फर्म कोलप्लांट के वैज्ञानिकों ने तम्बाकू के पौधे से कृत्रिम फेफड़े बनाने का रास्ता खोजने का दावा किया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, तम्बाकू के पौधे को आनुवांशिक तौर पर सुधार कर कोलेजन नाम का प्रोटीन बनाया जा सकता है। इसके बाद थ्रीडी तकनीक के जरिए वैज्ञानिक कोलेजन से बनी खास स्याही का इस्तेमाल कृत्रिम फेफड़ों के विकास में कर सकते हैं। इसमें मानव कोशिका डालकर स्वस्थ फेफड़े को ट्रांसप्लांट के लिए तैयार किया जा सकता है।

  1. कोलेजन प्रोटीन त्वचा और जोड़ों के ऊतकों में पाया जाता है। इसके अणु कोशिकाओं के विकास में सहायक ढांचे का काम करते हैं।

  2. वैज्ञानिकों ने बताया कि जेनेटिकली मोडिफाइड तम्बाकू के पौधे से 8 हफ्ते में कोलेजन का निर्माण शुरू किया जा सकेगा। पत्तियों को खास प्रक्रिया से गुजारने के बाद कोलेजन इकट्ठा कर इसे एक स्याही में बदल दिया जाएगा।

  3. यूएस की एक फर्म यूनाइटेड थैरेप्यूटिक्स एक ऐसा थ्रीडी प्रिंटर विकसित करने पर काम कर रही है, जिसके जरिए कृत्रिम फेफड़े बनाए जा सकें।

  4. इस तरह के प्रिंटर का इस्तेमाल त्वचा और रेटिना बनाने में किया जा चुका है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि फेफड़े के निर्माण के लिए तकनीकी रूप से ज्यादा सक्षम प्रिंटर का इस्तेमाल करना होगा, जो कोलेजन के बड़े अणुओं को संभाल सके। क्योंकि, रोशनी पड़ने पर ही कोलेजन अणु आपस में जुड़कर सख्त हो जाते हैं।

  5. अभी तक वैज्ञानिकों ने फेफड़ों के ऊतकों का केवल एक छोटा सा हिस्सा तैयार किया है। कोशिकाओं की सहायता से पूरा फेफड़ा विकसित करने पर काम जारी है। हालांकि, जानवरों पर किए गए प्रयोगों में सामने आया है कि यह प्रक्रिया कारगर हो सकती है।

  6. यूके स्टेम सेल फाउंडेशन के मुख्य वैज्ञानिक प्रोफेसर ब्रेंडन ने कहा कि तम्बाकू के पौधे से बने फेफड़ों में ट्रांसप्लांट सर्जरी को पूरी तरह बदल देने की क्षमता होगी। हो सकता है कि अगले 10 सालों में यह हमारे सामने मौजूद हो। लेकिन, अभी बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना है।

  7. ब्रेंडन ने कहा- अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि कोशिकाओं के साधारण ढांचे को फेफड़े जितने बड़े और पेंचीदा अंग में विकसित किया जा सकता है कि नहीं।



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      artificial lungs for human transplants made of tobacco will cure disease

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