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सर्जरी नहीं, जैल से होगा आंखों की इंजरी का इलाज, दावा; एक दिन में दिखता है असर


हेल्थ डेस्क. आंखों में होने वाले घावों को जैल की मदद से भरा किया जा सकेगा। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ऐसा जैल बनाया है जिसका इस्तेमाल आंखों की इंजरी के इलाज में किया जाएगा और सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ेगी। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं ने बनाया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि जैल की मदद से आंखों की खामियों को दूर करने के साथ कॉर्निया कोशिकाओं को दोबारा तैयार किया जा सकेगा।

  1. हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के ऑप्थेल्मोलॉजिस्ट रेजा डाना का कहना है कि जैल में खास तरह के रसायन हैं जो कॉर्निया की कोशिकाओं को मिलाते हैं और दोबारा इसे तैयार होने में मदद करते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, ड्रॉपर या सीरिंज की मदद से जैल का इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह प्रकाश के संपर्क में आते ही सख्त होने लगता है। इसे लगाते ही कॉर्निया की कोशिकाएं बढ़ना शुरू कर देती हैं और जैल के साथ मिलकर एक हो जाती हैं।

  2. शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने 3 मिमी का कॉर्निया डिफेक्ट होने पर 20 फीसदी सांद्रता के साथ जैल इस्तेमाल किया। करीब 4 मिनट बाद इसका असर दिखाई दिया। एक दिन के बाद आंखों पर पारदर्शी सतह दिखाई दी। इस दौरान किसी भी तरह की सूजन नहीं दिखाई दी। धीरे-धीरे आसपास के ऊतक में बढ़ोतरी हुई। शोधकर्ता इंसानों पर इसका ट्रायल जल्द ही शुरू करेंगे।

  3. दुनियाभर में अंधता का बड़ा कारण कॉर्निया में इंजरी होना है, हर साल इससे जुड़े करीब 15 लाख मामले सामने आते हैं। कुछ मामलों में कॉर्निया ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है। ट्रांसप्लांट के बाद भी इंफेक्शन के मामले सामने आते हैं। इसके अलावा कई मामलों में आंखें दूसरी कॉर्निया को स्वीकार नहीं कर पाती।



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      american scientist made Adhesive Gel To Repair Eye Injury Without Surgery

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सेहत के लिए हानिकारक है खाने के साथ आइसक्रीम और फल खाना


हेल्थ डेस्क. आयुर्वेद के अनुसार हर खाद्य पदार्थ का अपना खास स्वाद, अपनी तासीर और पाचन के पश्चात शरीर पर उसका खास असर होता है। इसलिए कोई भी दो अलग-अलग फूड खाते समय इस बात का ख्याल रखना जरूरी है कि कहीं इस कॉम्बिनेशन का सेहत पर कोई नकारात्मक असर तो नहीं पड़ेगा। डाइट एंड वेलनेस एक्सपर्ट डॉ. शिखा शर्मा आज कुछ ऐसे ही फूड कॉम्बिनेशन के बारे में बता रही हैं, जिन्हें अच्छी सेहत की खातिर अवॉइड करना जरूरी है। ऐसे में अगर आपको स्वाद से भी थोड़ा समझौता करने पड़े, तो हिचकिचाइए मत...

  1. यह हमारे यहां काफी कॉमन है। खासकर शादियों या पार्टियों में भोजन के बाद आइसक्रीम खाने-खिलाने का एक रिवाज ही बन गया है। लेकिन यह हमारे पाचन के लिए ठीक नहीं है। दरअसल, भोजन के बाद पाचन अग्नि (जठराग्नि) जागृत होती है। भोजन को ढंग से पचने के लिए यह जठराग्नि जरूरी है। लेकिन भोजन के तत्काल बाद आइसक्रीम खाने से जठराग्नि पैदा ही नहीं हो पाती। इससे खाना ठीक ढंग से नहीं पच पाता है।

  2. आयुर्वेद के अनुसार भोजन शरीर के सभी टिश्यूज तक पहुंचकर उनको पोषित करने वाला होना चाहिए। कई लोगों की यह आदत होती है कि वे खाने के साथ या खाने के तुरंत बाद कोल्ड ड्रिंक (सोडे वाला यानी कार्बोनेटेड ड्रिंक) लेते हैं। खासकर पिज्जा के साथ तो कोल्ड ड्रिंक लिया ही जाता है। लेकिन ये ड्रिंक भोजन से शरीर को मिलने वाले पोषण में बाधा उत्पन्न करते हैं। कोल्ड ड्रिंक्स अमाशय में भोजन को पचाने वाले एंजाइम्स को भी नुकसान पहुंचाते हैं जिससे हाजमा खराब होता है।

  3. ग्रीन टी में फ्लेवोनॉयड्स होते हैं जिन्हें कैटेचिन्स कहा जाता है। ये दिल की बीमारियों, कैंसर और स्ट्रोक की आशंका को कम करते हैं। लेकिन अगर दूध में ग्रीन टी मिलाकर पी जाएगी तो इससे दूध के फायदे तो कम होंगे ही, साथ ही ग्रीन टी के भी फायदे नहीं मिलेंगे। इस स्थिति में दूध में पाए जाने वाला कैसीन प्रोटीन, कैटेचिन्स की सघनता यानी असर को कम कर देता है। इससे कैटेचिन्स के अपेक्षित फायदे नहीं मिलते हैं।

  4. भोजन के साथ-साथ या भोजन के तत्काल बाद भी फल नहीं खाना चाहिए। इसकी वजह यह है कि फलों में केवल शक्कर और फाइबर्स होते हैं, जिन्हें पचने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। इसके विपरीत भोजन में प्रोटीन, फैट, कार्बोहाइड्रेट और स्टार्च जैसे तत्व होते हैं, जिन्हें पचने में अपेक्षाकृत ज्यादा समय लगता है। इस वजह से भोजन के साथ-साथ खाए फल या फ्रूट चाट का कोई फायदा नहीं होता और वे जल्दी पचकर अमाशाय में ही सड़ने लगते हैं।

  5. दूध की पाचन प्रक्रिया अन्य फूड से बहुत अलग होती है। दूध का सबसे ज्यादा फायदा तब मिलता है, जब इसे विशुद्ध रूप से सिर्फ दूध के रूप में ही लिया जाए। किसी के साथ मिलाकर नहीं। हां, इसे कुछ नॉन-यीस्टी फूड जैसे कॉर्न फ्लेक्स के साथ लिया जा सकता है, लेकिन फलों के साथ तो बिल्कुल नहीं। आयुर्वेद में तो इसे मना किया ही गया है, नई डाइट्री गाइडलाइंस भी दूध और फलों के कॉम्बिनेशन को अवॉइड करने की सलाह देती है। इसलिए फ्रूट मिल्क शेक भी नहीं लेना चाहिए, यह हाजमा खराब कर सकता है।

  6. अंडे, मछली और मांस में जो प्रोटीन होता है, वह दूध के प्रोटीन से बिल्कुल अलग तरह का होता है। दूध ड्यूडेनम (पेट और छोटी आंत के बीच की जगह) में ही पचता है, न कि अमाशय में। इस वजह से अमाशय से शरीर के बाकी अंगों व टिश्यूज के लिए होने वाला स्राव बाधित होता है, जिसके फलस्वरूप अंडा-मछली या चिकन-मटन आदि खाने के बाद या पहले दूध पीने से पाचन में दिक्कत आ सकती है।



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      food combination to avoid by Dr shikha sharma

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व्यंजनों में झलकें होली के रंग


लाइफस्टाइल डेस्क. होली रंगों का त्योहार है तो क्यों न व्यंजनों को भी रंग-बिरंगा सजाया जाए। पहले से तैयार व्यंजनों को गुलाब की पत्तियों से सजा सकते हैं। इसके अलावा मेहमानों को यदि कुछ नया परोसना चाहते हैं तो नए फूड स्टाइल आज़मा सकते हैं। संगीता साहू, फूड ब्लॉगर के जाने घर में मौजूद सामाग्री का प्रयोग कर व्यंजनों को नया अंदाज़ कैसे दे सकते हैं।

  1. ,,,

    आइसक्रीम कोन में कई तरह के फल डालकर सजा सकते हैं। अगर आपके पास स्टैंड है तो इनपर सजाएं।इसके अलावा पानी के गिलास या आइसक्रीम के सांचों में सजा सकते हैं।

  2. ...

    इस बार फलों के साथ नए प्रयोग करके देखें।इसके लिए अलग-अलग फलों को ट्विस्ट करें। इसमें पपीता, केला, पुदीना, कीवी, स्ट्रॉबैरी जैसे कई फलों के टुकड़े एक सीक में पिरोकर मेहमानों को परोसें।

  3. ...

    रंग भरे नमकीन के कई विकल्प हैं। भेल बना सकते हैं जिसमें टमाटर, मटर और मूंगफली हो। उबले लोबिया, मोगर और चने की रंगीन भेल भी बना सकती हैं। या पपड़ी पर चटनी-सॉस डालकर रंगीन कर लें।

  4. ...

    बर्फी या लड्डू को भी आकर्षक रूप देकर परोस सकते हैं। एक ट्रे पर लड्डू सलीक़े से रखें और उनके बीचों-बीच चेरी रख दीजिए। इन लड्डुओं को टूटी-फ्रूटी से भी सजा सकते हैं।

  5. ...

    अगर खीर, ठंडाई, कस्टर्ड, शेक जैसे व्यंजन तैयार कर रही हैं तो इन्हें गुलाब से सजा सकती हैं। जब इन्हें परोसना हो तो इनके ऊपर कुछ ताज़े गुलाब की पत्तियां डाल दीजिए।

  6. ...

    अगर लस्सी जैसे पेय पदार्थ परोस रहे हैं तो इनके ऊपर रंगीन टूटी-फ्रूटी डालें। और ऊपर ताज़ा पुदीने की पत्तियां रख दें। टूटी-फ्रूटी वज़न में भारी होती है इसलिए इन्हें गाढ़े पेय पदार्थ के ऊपर ही डालें।

  7. ...

    व्हिप्ड क्रीम बोल में डालकर पांच मिनट तक फेंट लें। अगर वनीला एसेंस है तो इसमें डालकर फेंटें। अब क्रीम को अलग-अलग बोल में डालकर मनपसंद फूड कलर डालें। इसे मिलाना नहीं है, चम्मच से हल्के हाथ पलटना है। इन अलग-अलग रंगों की क्रीम को पाइपिन डालकर पसंदीदा नोज़ल में बिस्किट के ऊपर आकार दें। फिर रंगीन सौंफ या स्प्रिंकल्स ऊपर से डाल दीजिए।



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      special story on holi festival on food

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होली में त्वचा का रखें ख़्याल


हेल्थडेस्क. होली में त्वचा का ख़्याल होली रंगों का त्योहार है। ऐसे में रंगों से पूरी तरह बचना मुश्किल होता है। परंतु होली में सिंथेटिक रंगों के अधिक प्रयोग के कारण त्वचा पर कई तरह की एलर्जी, चुभन और रेशेज़ हो सकते हैं। इससे बचाव के लिए हम कुछ उपाय लेकर आए हैं।

  • होली खेलने के एक दिन पहले 2 चम्मच बादाम पाउडर में थोड़ा सा दूध मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को चेहरे पर 10-15 मिनट तक लगाकर रखें। सूखने पर ठंडे पानी से धो लें। इससे रंगों का प्रभाव कम होगा।
  • होली पर होंठ फटने की समस्या भी हो सकती है। ऐसा न हो इसके लिए पहले से ही होंठों पर वैसलीन या लिपबाम लगाना शुरू कर दें। रात में मलाई लगाकर भी सो सकते हैं।
  • होली खेलने से पहले त्वचा पर 30 एसपीएफ की सनस्क्रीन लगाना न भूलें। ये त्वचा पर एक परत बना देगी। इससे रंगों के नकारात्मक असर से राहत मिलेगी।
  • होली के 3-4 दिन बाद तक त्वचा पर किसी तरह का ट्रीटमेंट (फेशियल, वैक्स, ब्लीच) नहीं लेना चाहिए।
  • एलर्जी होने पर प्राकृतिक ऐलोवेरा जैल में खीरे का रस व गुलाबजल मिलाकर फ्रिज में रख दें। ठंडा होने पर प्रभावित जगह पर 8-10 मिनट के लिए लगाएं। 20 मिनट बाद ठंडे पानी से धो लें।
  • रंग निकालने के लिए बोल में 2 चम्मच बेसन, 2 छोटे चम्मच दूध और 3-4 बूंद नींबू का रस मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को 8-10 मिनट लगाकर हल्के हाथों से रगड़ते हुए निकालें और ठंडे पानी से धो लें।
  • होली के पहले चेहरे पर ब्लीच, फेशियल, वैक्स आदि नहीं करना चाहिए। इससे एलर्जी और इंफेक्शन होने का ख़तरा रहता है।
  • होली के बाद वैक्सिंग कराएं। इससे रंग व टैनिंग दोनों निकल जाएंगे।


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skin care tips for holi

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होली में केमिकल वाले रंगों से बचें, आंखों का ध्यान रखें और लिक्विड डाइट अधिक लें


लाइफस्टाइल डेस्क. होली रंगों और मस्ती का त्योहार है इसका आनंद लें लेकिन थोड़ा संभलकर। केमिकल वाले रंगों से बचें, अधिक तलाभुना खाना सीमित मात्रा में लें और आंखों का खास ध्यान रखें। डायबिटीज, हार्ट और अस्थमा के पेशेंट हैं तो अपनी रेग्युलर लाइफस्टाइल को फाॅलो करें। होली के मौके जानिए ऐसी ही 10 बातें जो आपको रखेंगी सेहतमंद...

  1. डायटीशियन डॉ. देबजानी, के मुताबिक, इस मौके पर हर घर में अलग-अलग तरह के पकवान बनते हैं। ये तले-भुने होने के साथ शक्कर की मात्रा भी ज्यादा होती है। इनका स्वाद ले सकते हैं लेकिन सीमित मात्रा में। अधिक मात्रा में खाने पर बदहजमी का शिकार हो सकते हैं और ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है।

  2. अधिक तली हुई चीजों को खाने पर खट्टी डकार, सीने में जलन, गैस, उल्टी-दस्त जैसी दिक्कतों से गुजरना पड़ सकता है। कुछ मामलों में फूड प्वॉइजनिंग का कारण बन सकता है। इसलिए पकवानों को कम मात्रा में ही लें। दिन में कई बार पकवान खा चुके हैं तो रात का खाना बेहद हल्का करें।

  3. रंग वाले हाथों से खाने की चीजें न छुएं। इससे केमिकल शरीर में पहुंचकर नुकसान पहुंचाता है। बेहतर तरीका है त्योहार में लिक्विड चीजों को अधिक लें। खासकर पानी की कमी न होने दें। इनमें छाछ, नींबू पानी और जूस को शामिल कर सकते हैं।

  4. जिन लोगों का हाजमा सही नहीं है, या जो डायबिटीज या हार्ट पेशेंट हैं, उन्हें बेहद कम मात्रा में ही पकवानों को खाना चाहिए। बेहतर तरीका है कि तली-भुनी, मसालेदार और मीठी चीजें खाने की बजाय फल या ड्राय फ्रूट्स लें। होली पर अक्सर लोग बाजार से गुझिया, मठरी खरीद कर लाते हैं, अगर इन्हें घर में ही तैयार किया जाए तो बेहतर होगा।

  5. ऑप्थल्मोलॉजिस्ट डॉ. अदिति दुसाज के मुताबिक, होली खेलने के दौरान सबसे जरूरी बात है रंगों को आंखों में जाने से बचाना। रंगों में मौजूद लेड, सिलिका जैसे केमिकल आंखों में इंफेक्शन, जलन, सूजन और दर्द का कारण बनते हैं। आंखों में रंग जाने पर सबसे पहले पानी से धोएं, इसे मलने या रगड़ने से बचें।

  6. रंग खेलने के बाद आंखों में किसी भी तरह की परेशानी महसूस होने पर आई स्पेशलिस्ट को दिखाएं। होली के दौरान कई बार लोग मोबिल और पेंट का इस्तेमाल करते हैं इनसे बचें। हर्बल रंगों और हर्बल गुलाल का प्रयोग करें। हमेशा साफ पानी में ही रंग घोलें। जो बच्चे चश्मा लगाते हैं, वे चश्मा उतारकर होली खेलें। होली खेलने के दौरान चश्मा टूटने पर इसके कांच आंखों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

  7. डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. निपुन जैन बताते हैं कि कई बार रंग या गुलाल खेलने के बाद स्किन में जलन होना, लाल चकत्ते, खुजली, छोटे-छोटे दाने या फुंसियाें की शिकायत होती है। इनकी वजह रंग में मिले केमिकल होते हैं, जो स्किन एलर्जी का कारण भी बनते हैं।

  8. कोशिश करें ऑर्गेनिक कलर्स का प्रयोग करें। चाहें तो कलर्स की जगह नेचुरल प्रोडक्ट जैसे हल्दी, चंदन, नील आदि का प्रयोग कर सकते हैं। ये आपकी स्किन को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। रंग खेलने से 20 से 30 मिनट पहले अपनी स्किन पर क्रीम, लोशन या तेल का इस्तेमाल करें। इससे कलर्स आपकी स्किन पर सीधा असर नहीं डाल पाएंगेे और आप नुकसान से बच जाएंगे।

  9. रंग खेलने से पहले अपने चेहरे पर वाटर रेसिस्टेंट या वाटरप्रूफ सनस्क्रीन लगाएं। इसके साथ ही, रंग खेलने से पहले फेशियल, ब्लीच या केमिकल पील करवाने से भी बचें। होली में अधिक देर तक भीगने से बचें। ये बुखार, गले में खराश, सांस की परेशानी का कारण बन सकता है। हार्ट और अस्थमा पेशेंट रंग से बचकर ही रहें। बच्चों को लेकर विशेष तौर पर सावधानी बरतें।

  10. रंग निकालने के लिए जेंटल क्लींजर या माइल्ड क्रीमी साबुन का इस्तेमाल करें। कलर निकालने के लिए स्क्रब का इस्तेमाल न करें। कई कलर ऑयल साॅल्यूबल होते हैं और वे पानी से नहीं निकलते हैं। ऐसे कलर को निकालने के लिए हल्के हाथों से तेल की मसाज करें। उसके बाद जेंटल क्लींजर लगाकर रंग निकालें।



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      holi 2019 how to take care during holi and what to eat in holi skin and hair tips for holi

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डायबिटीज के मरीज हैं तो फाइबर्स ज्यादा लें और जूस को कहें ना


हेल्थ डेस्क.डायबिटीज जीवन भर चलने वाली बीमारी है। अगर यह एक बार हो जाए तो इसे केवल कंट्रोल कर सकते हैं, पूरी तरह से खत्म नहीं कर सकते। डायबिटीज को कंट्रोल करने में शुगर लेवल को मेनटेन करना काफी अहम होता है। शुगर लेवल को मेनटेन करने में यह बात बहुत मायने रखती है कि आप खाते क्या हैं और कितना खाते हैं।

डायबिटीज मैनेजमेंट का मतलब यह नहीं है कि किसी फूड को पूरी तरह से बंद करना है। बस इस बात का ध्यान रखना होगा कि अगर आप ज्यादा शुगर या ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाले फूड को खाना चाहते हैं तो साथ में फाइबर्स की मात्रा बढ़ा दें। ब्लड लेवल में शुगर की तेजी से बढ़ोतरी को फाइबर्स बैलेंस करने का काम करते हैं। उदाहरण के लिए अगर आप आलू खाना चाहते हैं तो साथ ही ढेर सारा सलाद भी जरूर खाएं। सलाद में फाइबर होते हैं जो ब्लड में शुगर लेवल में अचानक बढ़ोतरी को रोकते हैं।

अक्सर एक सवाल और पूछा जाता है कि डायबिटीज के मरीज फल खा सकते हैं तो क्या फलों का जूस भी पी सकते हैं? इसका जवाब है- नहीं। फलों के जूस में केवल और केवल शुगर होती है। शुगर को बैलेंस करने वाले फाइबर इसमें बिल्कुल नहीं होते। इसलिए फलों के जूस की थोड़ी-सी भी मात्रा डायबिटीज के मरीज के लिए घातक हो सकती है। अत: फलों का जूस पूरी तरह अवॉइड करें।

जीआई और जीएल
कौन-सा फूड डायबिटीज के मरीज के लिए अच्छा और कौन-सा खराब, इसके निर्धारण में ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआई) और ग्लाइसेमिक लोड (जीएल) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ग्लाइसेमिक इंडेक्स बताता है कि अमुक फूड में मौजूद कार्बोहाइड्रेट्स शरीर के ब्लड शुगर लेवल को कितनी तेजी से प्रभावित करता है। ग्लाइसेमिक इंडेक्स को 1 से 100 की रैंकिंग पर मापा जाता है। जिस फूड का ग्लाइसेमिक इंडेक्स जितना कम होगा, डायबिटीज के मरीज के लिए वह उतना ही अच्छा होगा। 55 या उससे कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फूड को ही डायबिटीज के मरीज के लिए अच्छा माना जाता है।


डाइबिटीज के मरीज को एक और पहलू पर ध्यान देना चाहिए और वह है ग्लाइसेमिक लोड। किसी फूड का ग्लाइसेमिक लोड यह बताता है कि अमुक फूड की कितनी मात्रा से ब्लड में शुगर का लेवल बढ़ जाएगा। जिन फूड का ग्लाइसेमिक लोड 20 से कम होता है, उन्हें डायबिटीज के मरीज के लिए सुरक्षित माना जाता है। ग्लाइसेमिक लोड का संबंध अमूमन किसी फूड विशेष में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा से होता है।

हम यहां उन सीजनल फलों की सूची दे रहे हैं जो आमतौर पर काफी लोग खाते हैं और इनको लेकर डायबिटीज के मरीजों में अक्सर दुविधा बनी रहती है।

  • अंगूर का ग्लाइसेमिक इंडेक्स तो कम यानी 46 होता है। लेकिन एक छोटे-से अंगूर में ही करीब 0.4 ग्राम शुगर होती है। इसलिए अगर बहुत ज्यादा अंगूर खा लेंगे तो शरीर में ग्लाइसेमिक लोड बढ़ जाएगा। इसलिए अपनी पूरी मुट्‌ठी में जितने अंगूर आते हैं, उसके करीब आधी मात्रा में ही खाएं।
  • तरबूजका जीआई 72 होता है, लेकिन प्रति 100 ग्राम में शुगर की मात्रा केवल 6 ग्राम होती है जिससे जीएल बहुत कम (2) होता है, यानी सुरक्षित पैमाने के अंदर। इसलिए इसकी एक-दो स्लाइस खाई जा सकती हैं।
  • आमका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 56 होता है यानी सुरक्षित पैमाने से एक ज्यादा। लेकिन यहां भी यह देखना होगा कि इसमें ग्लाइसेमिक लोड कितना होता है। एक बड़े आम में शुगर की मात्रा 26 ग्राम होती है। इसलिए डायबिटिक्स के लिए आम सुरक्षित नहीं है। एक दिन में आम की एक स्लाइस भर खाई जा सकती है।
  • केलेका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 55 होता है यानी सुरक्षित पैमाने पर होता है। लेकिन एक छोटे केले में ही शुगर की मात्रा लगभग 10 ग्राम होती है। इसलिए बेहतर होगा कि एक बार में आधा केला ही खाया जाए।


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diet salah by dr shikha sharma- what should diabetes patient eat

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पणाकम ड्रिंक: दक्षिण भारत की 'ठंडाई'


हेल्थ डेस्क.उत्तर भारत में ठंडाई के बिना होली फीकी मानी जाती है।लेकिन आज शेफ हरपाल सिंह सोखी बात कर रहे हैं दक्षिण भारत की 'ठंडाई' की, जिसका नाम है 'पणाकम'।

भगवान नरसिंह का गुस्सा ठंडाकरने के लिए बना था पणाकम

प्रह्लाद, होलिका और हिरण्यकश्यप की कहानी से सभी वाकिफ होंगे ही। होलिका का दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। होलिका की मृत्यु के बाद भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार ने अपने भक्त प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप को मारा था। दक्षिण में प्रचलित कहानी के अनुसार हिरण्यकश्यप को मारते समय भगवान नरसिंह इतने गुस्से में थे कि चारों ओर अग्नि बरसने लगी। नरसिंह के गुस्से की अग्नि को शांत करने के लिए प्रह्लाद ने उन्हें एक ठंडा रस 'पणाकम' प्रदान किया। इसके पीते ही भगवान नरसिंह शांत हो गए। इसलिए दक्षिण भारतीय लोग 'पणाकम' को प्रसाद के तौर पर अर्पित करते हैं।

ठंडे पानी और गुड़ से बनती है ये आसान ड्रिंक

पणाकम बनाने में दो चीजें बहुत जरूरी होती हैं - ठंडा पानी और गुड़। आधे लीटर पणाकम को बनाने के लिए करीब 150 ग्राम गुड़ की जरूरत पड़ती है। पहले ठंडे पानी में गुड़ को अच्छी तरह से घोल लिया जाता है। फिर इस घोल में काली मिर्च व हरी इलाइची का चुटकी भर पाउडर और इतनी ही मात्रा में सौंठ मिलाई जाती है। स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें नींबू का रस भी मिलाया जाता है। प्रसाद के तौर पर बनाने पर इसमें ऊपर से तुलसी की पत्तियां डाली जाती हैं। इस प्रसाद को भगवान नरसिंह को अर्पित किया जाता है।


दक्षिण भारत में इसे अलग-अलग मौकों पर बनाते हैं। कुछ लोग इसे होलिका दहन वाले दिन बनाते हैं तो अधिकांश लोग रामनवमीं के दिन। वैसे गर्मी के दिनों में यह सबसे हेल्दी कोल्ड ड्रिंक माना जाता है। इसलिए कई लोग समर में इसका नियमित सेवन भी करते हैं।



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food history by chef harpal singh sokhi- cold drink of the south panakam

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घावों को 4 गुना तेजी से भरेगा इलेक्ट्रॉनिक बैंडेज


  • अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ऐसा इलेक्ट्र्रॉनिक बैंडेज बनाया है, जो घावों को 4 गुना तेजी से भरता है। इसे यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन मेडिसन ने तैयार किया है।
  • आमतौर पर घाव भरने में 10-12 दिन लगते हैं। ई-बैंडेज 3 दिन में ठीक करता है। शोधकर्ताओं का दावा- बैंडेज पूरी तरह सुरक्षित, कोई साइड-इफेक्ट नहीं।


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american Researchers created electronic bandage

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होली की थाली में परोसें नया स्वाद, घर पर बनाएं पान गुझिया, मूंग पापड़ी और चीज चकली


लाइफस्टाइल डेस्क. रंगों का त्योहार है, तो जाहिर है गुलाल लगाने मेहमान तो आएंगे ही। कैसा रहेगा अगर इस बार स्वाद के नए अंदाज़ से मेहमानों का स्वागत करें। इसलिए हम आपके लिए मीठे, नमकीनऔर चटपटे व्यंजन लेकर आए हैं, जो नए होने के साथ ही स्वाद में भी अलगहैं। तो आइए शुरू करते हैं इन्हें बनाने की तैयारी..

  1. ...

    सामग्री : मैदा- 1 कप, भुनी सूजी- 2 बड़े चम्मच, भुना खोया- कप, पिसी शक्करकप, पान के पत्ते- 2, गुलकंद- 2 बड़े चम्मच, खोपरे का बूरा- 2 बड़े चम्मच, पेठाचेरी- 2 बड़े चम्मच, गुलाबकतरी- 2 बड़े चम्मच, मीठा पान मसाला- छोटा चम्मच, सौंफ- 1 छोटा चम्मच, बादाम कतरन2 बड़े चम्मच, घी।


    विधि : मैदे में 2 बड़े चम्मच पिघले घी का मोयन डालकर ठंडे पानी से सख्त आटा गूंधे। गीले कपड़े से 15 मिनट ढककर रखें। पान के पत्ते मिक्सी में दरदरे पीस लें। बची हुई सामग्री मिलाकर भरावन तैयार करें। मैदे की लोई बनाकर पूरी बेलें। इसमें भरावन भरकर गुझिया का आकार दें। इन्हें गर्म घी में गुलाबी होने तक तल लें।

  2. ..

    सामग्री : बेसन- डेढ़ कप, मैदा- 2 बड़े चम्मच, मक्के का आटा- 2 बड़े चम्मच, नमक- स्वादानुसार, हींग- 1/4 छोटा चम्मच, हल्दी- 1/4 छोटा चम्मच, लाल मिर्च- 1 छोटे चम्मच, अजवायन- 1/2 छोटा चम्मच, अदरक-हरी मिर्च का पेस्ट- 1 छोटा चम्मच, कसूरी मेथी- 2 बड़े चम्मच, तेल- तलने के लिए।


    विधि : बेसन, मैदा व मक्के का आटा मिलाकर छानें। इसमें सभी मसाले व 2 बड़े चम्मच तेल मिलाकर एकसार करें। पानी की मदद से आटा गूंध लें। इसकी बड़ी रोटी बेलकर कांटे से गोदें व चौकोर आकार में काट लें। इन्हें गर्म तेल में सुनहरे करारे होने तक तले लें। तैयार कसूरी क्रिस्पी को पूरी तरह ठंडा होने पर एयरटाइट कंटेनर में रखें।

  3. ...

    सामग्री : मैदा- 1 कप, सोया आटा-1 बड़ा चम्मच, नमक- स्वादानुसार, तेल2 बड़े चम्मच। भरावन के लिए- मटर- 1 कप, पनीर- 150 ग्राम, काज के टुकड़े- 1 बड़ा चम्मच, किशमिश- 1 बड़ा चम्मच, अखरोट- 1 बड़ा चम्मच (दरदरा), अनारदाना- 1 छोटा चम्मच, हरी मिर्च- 1 बारीक़ कटी, नमकस्वादानुसार, लालमिर्च, धनिया, काली मिर्च पाउडर, गरम मसाला- इच्छानुसार।


    विधि : मैदा व आटे को छान लें। नमक और मोयन डालकर सख्त आटा गूंध लें। पैन में तेल गर्म करके हरी मिर्च, मटर, मेवा, पनीर व मसाले डालकर भूनें व ठंडा करें। आटे की छोटी लोई बनाकर पूरी बेलें। बीच-बीच में चाकू से लम्बाई में चीरा लगाकर समोसे के आकार में मोड़कर मसाला भरकर डीप फ्राय करें। स्टफ्ड ड्रायफ्रूट समोसों को सॉस व चटनी के साथ सर्व करें।

  4. ...

    सामग्री : मैदा- 1 कप, सूजी- 2 बड़े चम्मच, शेज़वान साॅस- कप, काॅर्नफ्लोर- 1 बड़ा चम्मच, अजवायन1 छोटा चम्मच, नमक- स्वादानुसार, घी- आवश्यकतानुसार।


    विधि : मैदा, सूजी, अजवायन, नमक व 2 बड़े चम्मच तेल को मिलाकर सख्त आटा गूंध लें। शेज़वान साॅस में काॅर्नफ्लोर मिलाकर पेस्ट बनाएं। अब मैदे की लोइयां बनाकर बेलें। इसकी लंबी पटिटयां काट लें। हर पटटी पर शेज़वान पेस्ट लगाकर मोड़े व दबा दें, ताकि तलते समय खुले नहीं। अब इन्हें गर्म घी में धीमी आंच पर सुनहरा होने तक तल लें। टेस्टी लेयर्ड शेज़वान मठरी तैयार है।

  5. ...

    सामग्री : आलू- 3-4, दही- कप, अरारोटकप, शक्कर- 1 कप, केसर- छोटा चम्मच, इलायची- 1/2 छोटा चम्मच, गुलाबजल- 1 बड़ा चम्मच, घी- तलने के लिए।


    विधि : केसर को गुलाबजल में घोंट लें। शक्कर की 1 तार की चाशनी बना लें। इसमें केसर व इलायची मिलाकर अलग रखें। आलू उबालकर छीलें व मैश करें। इसमें दही व अरारोट मिलाकर एकसार करें। जलेबी के घोल की तरह घोल तैयार कर लें। अब इसकी गर्म घी में जलेबियां तल लें। इन्हें चाशनी में 5-7 मिनिट डुबोकर रखें फिर प्लेट में निकालें।

  6. ...

    सामग्री : बेसन- 3/4 कप, मैदा- 1/4 कप, उबले मूंग- 1/4 कप, नमक- स्वादानुसार, हींग- 1/4 छोटा चम्मच, सौंफ- 1/2 छोटा चम्मच, हल्दी- 1/4 छोटा चम्मच, गरम मसाला- 1/2 छोटा चम्मच, लाल मिर्च- 1 छोटे चम्मच, अजवायन- 1/2 छोटा चम्मच, अदरक-लहसुन का पेस्ट1 छोटा चम्मच, चाट मसाला- 1/2 छोटा चम्मच, तेल- आवश्यकतानुसार।


    विधि : बेसन व मैदा मिलाकर छान लें। इसमें सभी मसाले व 1 चम्मच तेल का मोयन डालकर उबले मूंग मिलाकर नर्म आटा गूंध लें। अब इसकी लोइयां बनाकर पूरी बेल लें। प्रत्येक पूरी को कांटे से हल्का- हल्का गोद दें। फिर इन्हें गर्म तेल में धीमी आंच पर तल लें। ऊपर से चाट मसाला छिड़के। पूरी तरह ठंडा होने पर हवाबंद डिब्बे में भरकर रखें।

  7. ...

    सामग्री : चावल का आटा- 200 ग्राम, मक्के का आटा- 100 ग्राम, मैदा- 200 ग्राम, सूजी- 1 बड़ा चम्मच, चुकन्दर का पेस्ट- 1 कप, नमकस्वादानुसार, अजवायन, सौंफ, जीरा, काली मिर्च- इच्छानुसार, तेल- मोयन और तलने के लिए।


    विधि : चावल के आटे, मक्के के आटे, सूजी व मैदा को छान लें। उसमें अजवायन, सौंफ, जीरा, काली मिर्च व 2 बड़े चम्मच तेल डालकर सख्त आटा गूंध लें। लंबी पूरी बेलकर चाकू से दोनों तरफ़ तिरछी पट्टी काट लें। इन लीव्स को गर्म तेल में फ्राई करें।

  8. ...

    सामग्री : चावल का आटा- 2 कप, मैदा- 1/4 कप, टमाटर पाउडर- 1/4 कप, चीज़ क्यूब- 2 कद्दूकस किए हुए, ताज़ी क्रीम- 2 बड़े चम्मच, चिली फलेक्स- 1 छोटा चम्मच, मिक्स हर्ब- 1/4 छोटा चम्मच, तेल- तलने के लिए


    विधि : चावल के आटे में मैदा मिलाकर टमाटर पाउडर, चीज़, रेड चिली फलेक्स, मिक्स हर्बक्रीम मिलाकर गूंध लें। मोटी लोइ लेकर चिकनाई लगे चकली मोल्ड में डालकर चकली बनाएं। इन्हें गर्म तेल में करारी होने तक तल लें। अनाेखे स्वाद वाली टोमैटो चीज़ चकली सभी को जरूर पसंद आएगी। (नोट- टमाटर पाउडर न होने पर टमाटर प्यूरी भी प्रयोग कर सकते हैं।)

  9. ...

    सामग्री : मैदा- 400 ग्राम, तेल- 2 बड़े चम्मच, नमकस्वादानुसार। भरावन के लिए- मूंग दाल, चना दाल, उड़द दाल- 200 ग्राम (भीगी हुई), नमक, मिर्च, गरम मसाला- स्वादानुसार, जीरा, हींग, सौंफ, खड़ा धनिया, हरी मिर्च, हरा धनिया- इच्छानुसार, तेल- तलने के लिए।


    विधि : सभी दालों का पानी निकाल दें। पैन में एक चम्मच तेल डालकर दालें व सभी मसाले डालकर भूनें। मिश्रण को ठंडा होने पर मिक्सी में दरदरा पीस लें। अब मैदे में नमक व मोयन डालकर कड़ा आटा गूंध लें। आटे की पूरी बेलकर चाकू से बीच में लंबी पट्टियां काटकर एक पूरी और लगाएं। गुझिया के सांचे में पूरी रखकर भरावन भर दें। गर्म तेल में धीमी आंच पर सुनहरा होने तक तलें। (खाने वाले रंगों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।)

  10. ...

    सामग्री : चावल का आटा- 2 कप, सूजी- 2 बड़े चम्मच, चने का आटा- 2 बड़े चम्मच, चुकंदर 2 कद्दूकस किए, मखाने- 1 कप, तेल- 2 बड़े चम्मच, अजवायन- 2 छोटे चम्मच, काली मिर्च 2 छोटे चम्मच, नमक स्वादानुसार, लाल मिर्च- 2 छोटे चम्मच।


    विधि : मखाने सेक कर बारीक़ पीस लें। चुकंदर को मिक्सी में पीसकर पेस्ट बना लें। अब चावल का आटा, सूजी, चने का आटा छानकर उसमें चुकंदर का पेस्ट, मखाने का पाउडर व सभी मसाले मोयन डालकर मिला लें। सख्त आटा गूंध कर पूरी बना लें। चाकू की मदद से बीच में काटकर मोड़ लें। अब दोनों ओर से एक-एक बार मोड़कर गर्म तेल में डीप फ्राय करें।



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      holi 2019 special dishes for holi celebration

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घावों को 4 गुना तेजी से भरेगा इलेक्ट्रॉनिक बैंडेज, सांसों से होगा ऑपरेट


हेल्थ डेस्क. अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ऐसा इलेक्ट्र्राॅनिक बैंडेज बनाया है जो घावों को 4 गुना तेजी से भरता है। इसे यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन मेडिसन ने तैयार किया है। इलेक्ट्राॅनिक बैंडेज का प्रयोग चूहे पर किया गया। प्रयोग के दौरान चूहे की पीठ पर हुए घाव पर इसे बांधा गया। जितनी बार चूहा सांस लेता था, उसकेबाद इलेक्ट्रिक तरंग पैदा हुई। इससेघाव को ठीक होने में मदद मिली।

  1. शोधकर्ताओं के अनुसार, ई-बैंड बनाने के बाद चूहे की पीठ पर 1 सेंटीमीटर का एक चीरा लगाया गया। 2 दिन बाद देखा गया तो घाव भर चुका था। वहीं दूसरे चूहे जिन्होंने बैंड लगाया हुआ था लेकिन उसमें करंट नहीं जारी हुआ था, उनमें घाव दिख रहा था।

  2. यहीप्रयोग उन्होंने जानवरों पर जारी रखा और पाया कि ई-बैंडेज की मदद से 3 दिनों के अंदर घाव को ठीक किया जा सकता है। वहीं आमतौर पर ऐसे घावों को भरने में 10-12 दिन लगते हैं। शोधकर्ताओं का दावा है कि बैंड पूरी तरह सुरक्षित है और इसके कोई साइड-इफेक्ट नहीं हैं।

  3. शोध के मुताबिक, मधुमेह रोगियों के पैरों में घाव और अल्सर जैसे मामलों में अक्सर इन्हें भरने में काफी समय लगता है। सिर्फ अमेरिका में ही हर साल ऐसे 65 लाख मामले सामने आते हैं।

  4. 1960 में पहली बार ये पता चला था कि इलेक्ट्रिकल तरंगेंघावों को भरने में सक्षम है। सूजन दूर करने के साथ यह नए ऊतकों के विकसित होने मदद करताहै और ब्लड सर्कुलेशन दुरुस्त रखता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसके लिए खास तरह के इलेक्ट्रिकल सिस्टम की जरूरत होती है जो सिर्फ हॉस्पिटल में मौजूद होते हैं।



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      american Researchers created electronic bandage that helps wounds heal FOUR TIMES faster

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स्टीरॉयड का अधिक इस्तेमाल भी ग्लूकोमा का कारण, समय-समय पर कराएं आई चेकअप


हेल्थ डेस्क. दुनियाभर में 6 फीसदी लोग ग्लूकोमा से पीड़ित हैं और यह आंखों की रोशनी खत्म होने की दूसरी सबसे बड़ी वजह भी है। एक्सपर्ट के मुताबिक, यह किसी भी उम्र में हो सकता है। समय से पहले इसकी जानकारी मिलने पर इलाज संभव है। दुनियाभर में ऐसे मामलों में कमी लाने के लिए हर साल 10-16 मार्च तक वर्ल्ड ग्लूकोमा वीक मनाया जाता है। एक्सपर्ट्स से जानिए क्या है ग्लूकोमा और इससे कैसे बचा जा सकता है....

  1. ग्लूकोमा होने पर आंखों की ऑप्टिक नर्व में दबाव बढ़ने लगता है। ऐसा किसी भी उम्र में हो सकता है। इसके मामले ज्यादातर उन लोगों में देखने को मिलते हैं जिनकी फैमिली हिस्ट्री होती है या फिर किसी दुर्घटना के कारण सिर या आंखों पर चोट पहुंचती है। लगातार आईड्रॉप, ओरल मेडिसिन और क्रीम में स्टीरॉयड का इस्तेमाल भी ग्लूकोमा का कारण बन सकता है। आंखों की सर्जरी के कुछ गंभीर मामले भी इसकी वजह बन सकते हैं।

    • इसे पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता है लेकिन काफी हद आंखों की रोशनी दुरुस्त की जा सकती है। ग्लूकोमा के ज्यादातर मरीजों को इसकी जानकारी ही नहीं होती है, यह तब पता चलता है जब रोशनी काफी हद तक कम हो चुकी होती है।
    • एक्सपर्ट के मुताबिक, ग्लूकोमा के मात्र 50 फीसदी मामले में ही सामने आ पाते हैं। इसका बेहतर उपाय है समय-समय पर आंखों की स्क्रीनिंग। समय पर आई स्पेशलिस्ट से जांच कराएं ताकि आंखों और ऑप्टिक नर्व पर पड़ रहे दबाव को जांचा जा सके।
    • ग्लूकोमा टेस्ट, दवाओं और सर्जरी की मदद इस रोग का इलाज किया जाता है। ग्लूकोमा के ज्यादातर मामलों को आईड्रॉप से ही ठीक किए जा सकते हैं।
    • स्मोकिंग से दूरी बनाएं और कैफीनयुक्त पेय की मात्रा घटाएं।
    • डाइट में हरी सब्जियों की मात्रा बढ़ाएं और पानी अधिक पींए।
    • ग्लूकोमा के मरीजों को शीर्षासन नहीं करना चाहिए।


    एक्सपर्ट पैनल
    डॉ. गणेश दिलीप कुमार पिल्लई, ऑप्थेमोलॉजिस्ट, एम्स, दिल्ली
    डॉ. नेहा चतुर्वेदी, ऑप्थेमोलॉजिस्ट, एम्स, दिल्ली
    डॉ. प्रशांत सिंह, ऑप्थेमोलॉजिस्ट, एएसजी आई हॉस्पिटल, भोपाल
    डॉ. अर्पिता बसिया, ऑप्थेमोलॉजिस्ट, एएसजी आई हॉस्पिटल, भोपाल



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      world glaucoma week 2019 what is glaucoma and precautions to away from glaucoma

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किडनी का फिटनेस प्लान; डाइट में नमक घटाएं , रोजाना 10 गिलास पानी पींए और वजन कंट्रोल करें


हेल्थ डेस्क.दुनियाभर में 19.5 करोड़ महिलाएं किडनी की समस्या से पीड़ित है। भारत में भी यहसंख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है। हर साल 2 लाख लोगों को किडनी रोग होजाता है। शुरूआती स्टेज में इस बीमारी को पकड़ पाना मुश्किल है क्योंकि दोनोंकिडनी 60 प्रतिशत ख़राब होने के बाद ही मरीज़ को इसका पता चल पाता है।2019 के वर्ल्ड किडनी डे की थीम है किडनी हेल्थ फॉर एवरी वन, एवरी वेयर। एक्सपर्ट के मुताबिक, किडनी की बीमारियों से बचने के लिए तीन चीजों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। डाइट में नमक की मात्रा कम हो, रोजाना 10-12 गिलास पानी पीएं और खाने में फैट कम से कम लें।वर्ल्ड किडनी डे के मौके पर श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट के सीनियर नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. राजेश अग्रवाल से जानिए, इसे कैसे फिट रखें….

  1. जवाब : किडनी की बीमारियों से दूर रहने के लिए डाइट में नमक और फैट कम से कम लें।गर्मी के दिनों में खासतौर पर किडनी का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। शरीर से पानी पसीने के रूप में निकलता है ऐसे में मिनिरल्स निकलने पर इलेक्ट्रोलाइट्स का नुकसान होता है, जिसके कारण किडनी में पथरी होने की आशंका बढ़ जाती है।

    • पानी की कमी के कारण डिहाइड्रेशन, डायरिया और हीट स्ट्रोक की आशंकाएं भी बढ़ जाती हैं। इसलिए गर्मियों में पानी अधिक मात्रा में पीना चाहिए।
    • नमक और फैट किडनी की समस्या के बड़े कारण हैं। भोजन में भोजन में ऊपर से नमक न डालें। इसके बजाय नींबू या कोई हर्ब डालें। सोडायुक्त पेय व फास्टफूड से दूरी बनाएं।
    • नियमित रूप से व्यायाम करें और वज़न पर नियंत्रण रखना किडनी की सेहत के लिए अच्छा होता है।
    • 35 साल की उम्र के बाद समय-समय पर ब्लड प्रेशर और शुगर की जांच कराएं। ब्लड प्रेशर या मधुमेह के लक्षण मिलने पर हर छह महीने में पेशाब और खून की जांच करानी चाहिए।
    • दर्दनिवारक दवाओं का कम मात्रा में इस्तेमाल करें। लाइफस्टाइल में सुधार की जाए तो कई बीमारियों से बचा जा सकता है।
  2. जवाब : लगातार उल्टी आना, भूख ना लगना, थकान और कमज़ोरी महसूस ह़ोना, पेशाब की मात्रा कम ह़ोना, खुज़ली की समस्या ह़ोना, नींद ना आना, मांसपेशियों में खिंचाव होना किडनी में खराबी के लक्षण हैं। शरीर में ऐसे बदलाव दिखने पर नेफ्रोलॉजिस्ट से मिलें।

  3. जवाब: किडनी रक्त को साफ़ करके अतिरिक्त पानी और लवण को बाहर निकालने का काम करती है। अगर गुर्दे दवाओं और खान-पान के नियमन से बाहर हो जाएं, ख़राब हो जाएं, तो इस स्थिति को क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ कहा जाता है। इसके बाद डायलिसिस और ट्रांसप्लांट तक की नौबत आ सकती है। गुर्दों की अनदेखी शरीर के लिए बहुत महंगी साबित होती है।

    गुर्दे ख़राब होने के कारण आमतौर पर मूत्र मार्ग में संक्रमण, मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसी दिक्कतें गंभीर किडनी रोग का कारण बन सकती हैं।

    ऐसी स्थितियां बिगड़ी लाइफस्टाइल के कारण होती हैं जैसे कम मात्रा में पानी पीना, नमक व शक्कर की अधिकता वाला भोजन करना (फास्ट या प्रोसेस्ड फूड), दर्दनाशक दवाओं का अधिक सेवन करना, मांस का अधिक सेवन करना, धूम्रपान या अल्कोहल लेना, अधिक सोडायुक्त ड्रिंक्स पीना, नींद में कमी और व्यायाम कम व आराम ज्यादा करना।

  4. जवाब:किडनी का सबसे महत्वपूर्ण काम है शरीर में पानी के स्तर को संतुलित करना। यह सोडियम, पोटैशियम और कैल्शियम जैसे मिनिरल्स को भी कंट्रोल करती है। ये मिनिरल्स हमें भोजन से मिलते हैं और सेहत के लिए ज़रूरी भी हैं, लेकिन शरीर में इनकी मात्रा अधिक बढ़ने किडनी पर दबाव बनाने लगते हैं। दबाव लगातार बना रहे तो किडनी की कार्यक्षमता कम होने लगती है, जिसके कारण ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है। किडनी यूरिया और क्रिएटिनिन का भी कंट्रोल करता है। यूरिया प्रोटीन के पचने पर शरीर में पैदा होता है।



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      world kidney day 2019 know kidney fitness plan and how to make kidney healthy

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दुनियाभर में हर साल समय से पहले होने वाली 90 लाख मौतों का कारण पर्यावरण प्रदूषण


साइंस डेस्क. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, दुनियाभर में पर्यावरण प्रदूषण के कारण हर साल समय से पहले 90 लाख लोगों की मौत हो रही है। संयुक्त राष्ट्र की ग्लोबल एनवायर्नमेंट आउटलुक सीरिज में करीब 6 साल तक अध्ययन किया। 740 पेजों की रिपोर्ट में परिणाम के तौर पर बताया गया कि दुनियाभर में समय से पहले होने वाली एक चौथाई मौतें और बीमारियां प्रदूषण और पर्यावरण क्षतिग्रस्त होने के कारण हाे रही हैं।

  1. शोध में 70 देशों के 250 वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया। उन्होंने बताया कैसे गरीब और अमीर देशों के बीच खाई गहरी होती जा रही है। चीजों का अधिक उपयोग, प्रदूषण, खाने की बर्बादी, गरीबी के साथ बीमारियां भी बढ़ रही हैं।

  2. रिपोर्ट के मुताबिक, इन मौतों का कारण शहरों में गैसों का उत्सर्जन, दूषित पानी और पारिस्थितिक तंत्र को क्षति पहुंचना है। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ने से समय से पहले कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। इसके अलावा समुद्र का स्तर बढ़ने से तूफान आने की आशंका भी बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि खाने की बर्बादी को रोककर ग्रीन हाउस गैसों में 9 फीसदी की कमी की जा सकती है।

  3. शोध में सामने आया कि साफ पानी के अभाव में हर साल 14 लाखलोगों की मौत हो जाती है। ऐसा डायरिया और संक्रमण जैसी बीमारियों के कारण होता है जिसे रोका जा सकता है। समुद्र में बढ़ते रसायन सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कृषि का क्षेत्र बढ़ने से रहने के लिए जमीन का दायरा कम हो रहा है और पेड़ों का कटाव बढ़ रहा है।

  4. रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ एयर पॉल्यूशन से हर साल 60 से 70 लाखमौतें होती हैं। खाद्य उत्पादन में बढ़ा एंटीबायोटिक का प्रयोग सुपरबग को ड्रग रेसिस्टेंट बना रहा है जो समय से पहले होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण है।

  5. 2015 में पेरिस जलवायु समझौते के दौरान हर देश ने गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के साथ दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड करने का वादा किया था। लेकिन इस दौरान प्रदूषण, वनों की कटाई और बदलती खाद्य शृंखला के बारे में काफी गहराई से नहीं सोचा गया।



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      Environment damage causes 90 lakh global deaths says Global Environment Outlook report

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ज़रूरी है मस्तिष्क की जिमिंग, इससे अवसाद और चिड़चिड़ापन होता है कम


हेल्थ डेस्क. स्वस्थ मन का स्वस्थ शरीर पर सीधा असर पड़ता है। मन को जकड़ते रोगों के मौजूदा दौर में दिमाग़ी कसरत अनिवार्यता बन चुकी है। रोज़ाना मस्तिष्क की कसरत करने से अवसाद, चिड़चिड़ापन तथा चिंता कम होती है और मानसिक क्षमता का विकास होता है। आप अपना दैनिक कार्य करते हुए भी इन्हें कर सकते हैं।

  1. अपने ज़रूरी किराने के सामान की सूची तैयार करें। जब सामान ख़रीदने जाएं तो सामान की सूची को ध्यान से पढ़ें और घर पर ही छोड़ दें। अब आपको जो भी सामान याद है वो ख़रीदें। अगर आपको लगता है कि आप कुछ भूल रही हैं तो दिमाग़ पर ज़ोर डालकर याद करने की कोशिश करें। बार-बार बाज़ार जाने से बचने के लिए लिस्ट की फोटो खींचकर भी रख सकते हैं। लेकिन लिस्ट तभी देखें जब आप वस्तुयाद कर थक जाएं।

  2. ये कसरत काफ़ी मज़ेदार है। आपको सिर्फ़ एक शब्द या कोई चीज़ सोचनी है। मिसाल के तौर पर चावल। अब सोचें कि चावल से संबंधित और कौन सी चीज़ें हो सकती हैं जैसे खीर, खिचड़ी आदि। इसी प्रकार कई तरह के वस्तुया शब्द का प्रयोग कर याददाश्त बढ़ा सकते हैं।

  3. मान लीजिए कि आप ऑफिस या कहीं बाहर से घर आईं हैं। जब आप घर आती हैं तो दरवाज़ा खोलने के बाद सबसे पहले क्या करती हैं, शायद चप्पल उतारती होंगी या चाबी अपने स्थान पर रखती होंगी। कुछ इसी तरह दिनभर की गतिविधियों को याद करें। हर बारीक़ गतिविधि को याद करें। आंखे बंद करें कल्पना करें। आंखें खुली होने से ध्यान भटक सकता है।

  4. अगर आपको चित्रकारी पसंद है तो यह आपको बिल्कुल पसंद आएगा। मान लीजिए कि आपके घर के क़रीब आपकी दोस्त रहती है। अब आपके घर से उसके घर के बीच का रास्ता एक पन्ने पर स्केच करें- एक मैप की तरह। इसी तरह किसी दुकान या मेडिकल स्टोर जैसे स्थानों को याद करें और उसका मैप स्केच करें। रेल मार्ग के स्टेशनों का सिलसिला भी लिख सकती हैं।



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      benefits of mind gyming

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शरीर के दोषों के अनुसार डाइट चुनने में मदद करता है वैदिक पोषण सिद्धांत


हेल्थ डेस्क.हमारे यहां सालों पहले वैदिक पोषण (वैदिक न्यूट्रिशन) का सिद्धांत बहुत प्रचलित था, लेकिन समय बीतने के साथ हम इसे भूलते गए। आयुर्वेद में इसी वैदिक पोषण की चर्चा की गई है। वैदिक पोषण शरीर के दोष के अनुसार सही डाइट बता रही हैं डाइट एंड वेलनेस एक्सपर्ट डॉ. शिखा शर्मा।

आयुर्वेद के अनुसार हमारे शरीर में तीन दोष होते हैं - वात, पित्त और कफ। तीनों का संतुलन जरूरी है। किसी का भी असंतुलन होने पर उससे संबंधित बीमारी की आशंका बढ़ जाती है। जैसे वात का असंतुलन होने पर नर्वस सिस्टम, पित्त का असंतुलन होने पर पाचन प्रणाली और कफ का असंतुलन होने पर इम्युनिटी पर नकारात्मक असर पड़ता है। इसलिए हर व्यक्ति को सबसे पहले तो इस बात को पहचानना जरूरी है कि उसमें क्या दोष है या उसके शरीर की प्रकृति कैसी है? इसकी पहचान आयुर्वेद का कोई अच्छा विशेषज्ञ ही कर सकता है।

  1. वात प्रकृति के लोगों को उस तरह का अनाज अवॉइड करना चाहिए जो फाइबर से भरपूर होता है, जैसे मक्का, बाजरा, ओट्स इत्यादि। ये ड्राय फाइबर कहलाते हैं। चूंकि वात की वजह से शरीर में ड्रायनेस बढ़ती है। ऐेसे में अगर वात प्रकृति का व्यक्ति इस डाइट को लेगा तो उसके भी शरीर में ड्राइनेस बढ़ती जाएगी।

  2. आयुर्वेद के अनुसार वात प्रकृति के व्यक्तियों को ड्राइनेस से बचने के लिए ड्राय फाइबर तो अवॉइड करना ही चाहिए, साथ ही उच्च गुणवत्ता वाला फैट भी संतुलित मात्रा में जरूर लेना चाहिए। फैट वात के ड्राई नेचर को बैलेंस करने का काम करेगा। हाई क्वालिटी वाले फैट में सबसे बेहतर होगा कि आप देसी घी लें। देसी घी के अलावा तिल्ली का तेल और ऑलिव ऑइल भी अच्छे विकल्प हैं।

  3. पित्त और कफ प्रकृति के लोगों के लिए सलाद और फलों का सेवन काफी फायदेमंद होता है। वात प्रकृति के लोगों को हल्की उबली हुई सब्जियों का सेवन ज्यादा करना चाहिए। यानी सब्जियों को केवल दो से तीन मिनट तक उबालकर खाना चाहिए।

  4. कफ प्रकृति के लोगों में पानी की मात्रा ज्यादा होती है। इसलिए ऐसे लोगों को कम मात्रा में नमक लेना चाहिए, क्योंकि नमक से शरीर में पानी का जमाव (वॉटर रिटेंशन) बढ़ता है। इससे सूजन की समस्या हो सकती है। हालांकि लो ब्लड प्रेशर की समस्या वाले लोगों को इस मामले में अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

  5. आयुर्वेद के अनुसार सभी तरह के नट्स (अखरोट, बादाम और पिश्ते) और सूरजमुखी व कद्दूके बीज वात और कफ प्रकृति के लोगों के लिए अच्छे होते हैं। पित्त दोष में ब्लांच्ड बदाम का सेवन अच्छा माना जाता है। ब्लांच्ड बदाम बनाने के लिए एक कटोरी में थोड़ी-सी बादाम लीजिए। उसमें उबला हुआ पानी डालिए। इसे केवल एक मिनट तक रखिए। फिर इसमें से बादाम को बाहर निकालकर उनके छिलके निकाल लीजिए।

  6. आयुर्वेद के अनुसार एग योक (यानी अंडे का पीला हिस्सा) पित्त दोष को बढ़ाता है। इसलिए जिन्हें गैस या बहुत ज्यादा एसिडिटी की समस्या हो, उन्हें कम से कम अंडे का पीला भाग खाने से बचना चाहिए। हालांकि अंडे का सफेद हिस्सा लिया जा सकता है।



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      Diet Salah by dr shiksha sharma- vaidik poshan helps in having right diet as per body

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बच्चों को फिट रखना है तो उन्हें रोजाना स्कूल भेजें, अमेरिकी शोधकर्ताओं का दावा


हेल्थ डेस्क. बच्चे को फिट बनाना चाहते हैं तो रोजाना स्कूल भेजें। अमेरिकी शोधकर्ताओं की हालिया रिसर्च के मुताबिक, बच्चों की फिटनेस का सम्बंध उनकी स्कूल में उपस्थिति से भी है। अमेरिका के मियामी-डेड कंट्री डिपार्टमेंट की ओर से कराई गई रिसर्च के मुताबिक, रोजाना स्कूल आने वाले बच्चे फिजिकल एक्टिविटी में ज्यादा हिस्सा लेते हैं जो उन्हें सेहतमंद बनाता है। यही खूबी उन्हें भविष्य में अनुपस्थित होने से भी बचाती है।

    • ये शोध न्यूयॉर्क में रहने वाले कक्षा 6-8 के 3 हजार बच्चों पर की गई।
    • शोधकर्ताओं ने उनकी अटेंडेंस, फिजिकल फिटनेस, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का रिकॉर्ड देखा।
    • बच्चों की लंबाई, वजन और पांच तरह की फिटनेस एक्टिविटीज (पुशअप, सेटअप, रनिंग) के आधार पर उनका प्रदर्शन देखा गया।
    • फिटनेस एक्टिविटीज में प्रदर्शन के आधार पर उनको अंक दिए गए।
    • शोध में सामने आया कि जिन बच्चों का फिटनेस स्कोर अच्छा था उनकी उपस्थिति बेहतर रही। यह सकारात्मक बदलाव बेहद कम आय वाले परिवारों के बच्चों में अधिक देखा गया।
    • शोधकर्ताओं के मुताबिक, फिजिकल फिटनेस खुद को स्वस्थ रखने के साथ उपस्थिति बढ़ाने का बेहद किफायती तरीका है। खासतौर पर उनके लिए जो गरीब तबके से सम्बंध रखते हैं।
    • शोधकर्ताओं का कहना है कि इसका असर स्कूल में बेहद कम आय वाले परिवारों की लड़कियों पर ज्यादा देखा गया है। जिनकी उपस्थिति में 10 फीसदी इजाफा भी हुआ।
  1. 2017 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 70 लाख अमेरिकी बच्चे सालभर में 30 दिन अनुपस्थित रहते हैं। पिछले शाेध में सामने आया था कि बच्चे और टीनएजर्स शारीरिक और मानसिक समस्याओं के कारण अनुपस्थित रहते हैं। इसका कारण अस्थमा, मोटापा, डायबिटीज, डिप्रेशन और बेचैनी था। शोध में बताया गया था कि अनुपस्थिति उनके फेल होने, पढ़ाई देरी से पूरी होने और कम उम्र में मां बनने तक का कारण बन सकता है।

  2. 2005 में हुए एक शोध के अनुसार, ऐसे कर्मचारी जो स्पोर्ट्स एक्टिविटी में भाग लेते हैं उनके बीमार और छुट्टी लेने की संभावना कम होती है। वहीं 2017 में हुई एक रिसर्च के मुताबिक, फिजिकल एक्टिवटी कम होने पर बीमारी के कारण अनुपस्थिति का आंकड़ा बढ़ जाता है।



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      Attendance is higher among teens who get fitter each year study finds

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महिलाओं को होने वाली तकलीफों को दूर करने में कारगर होंगे बद्धकोणासन और उपविष्ठकोणासन


हेल्थ डेस्क. घर और बाहर की जिम्मेदारियां निभाने वाली महिलाओं के लिए अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना भी जरूरी है। अपनी व्यस्त दिनचर्या में कुछ समय योग को देना उनकी सेहत के लिए फायदेमंद साबित होगा। यहां जानिए ऐसे आसन जो जो महिलाओं को पीरियड्स के दौरान होने वाली आम समस्याओं से राहत देते हैं।

  1. ...

    सबसे पहले दंडासन में बैठिये। फिर घुटने मोड़कर फैलाइए और पैरों को कदमों के पास धड़ से सटाकर रखिए। जांघों को फैलाइए और घुटनों को जमीन की ओर दबाइए। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर सामान्य श्वसन करते हुए एक से पांच मिनिट की अवधि तक रोकने का प्रयत्न कीजिए। यह आसन पीठ केबल लेटकर भी किया जा सकता है।

    • लाभ : इस आसन से महिलाओं को मासिक स्त्राव के दौरान होने वाली तकलीफों सेराहत मिलती है। इसे नियमित करनेसे उदर के निचलेभाग को आराम मिलता हैऔर हल्कापन महसूस होने लगता है।
    • विशेष : यह आसन महिलाओं के लिए वरदान है, एवं सायटिका व हर्निया मेंभी बहुत लाभकारी है। इसे पीरियड्स केदौरान भी किया जा सकता है।
  2. ...

    सर्वप्रथम दंडासन मेंबैठिए। फिर दोनो पैरों को 1.5 से 2 फीट केअंतर में फैलाइए। ध्यान रखें इस दौरान पैरों का पिछला हिस्सा जमीन पर पूर्णतः चिपका रहे। अब हथेलियां शरीर के पीछे, बाहरी दिशा में जमीन पर रखकर रीढ़ की हड्डी को उठाइए। सीना चौड़ा और गर्दन सीधी रखिए। सामान्य सांस लेतेहुए 1 से 5 मिनिट तक धीरे-धीरे अवधि बढ़ाते जाइए।

    • लाभ : मासिक रजस्राव में अनियमतिता को कम करता है। उदर के निचले भाग, जांघों में होने वाले दर्द, थकान, इनसे पैदा होने वाला मानसिक असंतुलन, मनोधैर्य, और स्थिरता की क्षति आदि के लिए भी यह आसन उपयुक्त है। मानसिक स्तर पर, ईर्ष्या, क्रोध जैसे आवेशों पर सहजता से काबू पाने में भी उपविष्ठकोणासन बहुत सहायक है। पेल्विक एरिया में रक्त संचार बढ़ाने में मदद करता है। महिलाओं की रजोवाहक नलिका किसी रुकावट के कारण बंद हो तो यह आसन लाभकारी है।


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      how to do baddhakonasana and upavishtkonasan its health benefits

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कैलोरी बर्न करने के आसान तरीके हैं घर के ये 4 काम


यूटिलिटी डेस्क. कई शोधों में ये साबित हो चुका है कि यदि रोजाना 2 घंटे घर के काम किया जाएं तो कैलोरी आसानी से बर्न होने लगती हैं। वजन कम करने का ये तरीका जिम का खर्च भी बचाता है। डॉ नम्रता सिंह फिलियोथैरेपिस्ट बता रही हैं ऐसे ही कुछ घरेलू काम जिन्हे करके आप फिट रह सकती हैं।

  1. डस्टिंग करने और झाड़ू व पोछा लगाने से 300 से 350 कैलोरी बर्नहोती है। इससेहाथ सुडौल होते हैं और अपर बॉडी पार्ट्स की मसल्स मजबूत होती हैं। पोछा लगाने के लिए जब आप बार-बार झुकते हैं तो इससे पेट और जांघों पर जमा फैट कम होनेलगता है।


  2. गार्डनिंग करने से मांसपेशियों की कार्यक्षमता बढ़ती है। इससे जोड़ों मेंलचीलापन आता है। यदि आप आधा घंटा गार्डन में पानी देने या निंदाई-गुढ़ाई जैसा काम करतेहैं तो पेट, हाथ और हिप्स पर दबाव पड़ता है। इससे तकरीबन 400 कैलोरी बर्नहोती है।

  3. इसमें सबसे ज्यादा पैरों, पेट व हिप्स के आसपास की मसल्स काम करती हैं। साथ ही हाथों व कंधों को मजबूती मिलती है। बाथरूम के टाइल्स की सफाई करना पेट व हिप्स की चर्बी कम करने का भी आसान तरीका है। इसे करने से तकरीबन 200 कैलोरी बर्नहोती है।

  4. वाशिंग मशीन के बजाय हाथ से कपड़े धोने की प्रक्रिया आपको फिट रखने में मदद कर सकती है। कपड़े धोने के दौरान आपके संपूर्ण शरीर की एक्सरसाइज होती है। एक घंटे कपड़े धोने और सुखाने के दौरान 130 से 150 कैलोरी बर्न की जा सकती है।



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      health benefit of house daily works

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सेल्फ डिफेंस ही नहीं शरीर की मजबूती के लिए भी है जरूरी


हेल्थ डेस्क. बॉक्सिंग से शरीर के सभी हिस्सों की एक्सरसाइज तो होती ही है, साथ ही इसे महिलाओं को सेल्फ डिफेंस के लिए भी सीखना चाहिए। किकिंग, पंचिंग, स्कवैटिंग, स्ट्रेचिंग से भरपूर बॉक्सिंग महिलाओं के लिए बहुत फायदेमंद है।

  1. बॉक्सिंग हाई इंपैक्ट वर्कआउट है, जो मसल्स को टोन करता है। इससे फैट बर्न होता है। यह बॉडी अवेयरनेस बढ़ाकर आपको कॉन्फिडेंट बनाती है। इससे पेट कम होता है और बॉडी का अपर पार्ट स्ट्रॉन्ग होता है।

  2. इससे शरीर को ताकत मिलती है और काम करने की क्षमता बढ़ती है। बॉक्सिंग से ब्लड सर्कुलेशन इम्प्रूव होता है और शरीर के टॉक्सिंस दूर होते हैं। इससे स्किन हेल्दी रहती है।

  3. जब आप बॉक्सिंग करते हैं तो आपके हाथ, कंधे, पैर और कोर की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। हाथ-पैरों में होने वाले दर्द और ऐंठन को कम करने में यह वर्कआउट फायदेमंद होता है।

  4. पंचिंग बैग के चारों और तेजी से घूमते हुए पंच लगाने से आपकी आंखों व हाथों के बीच का कॉर्डिनेशन बेहतर होता है। इससे संपूर्ण शरीर का संतुलन और समन्वय बेहतर होता है।

  5. पंचिंग बैग को हमेशा अपनी कलरई से मारें ताकि आपका पीछे का हाथ कलाई की सीध में रहे।

    • पंच करते समय अपनी कलाई का इस्तेमाल करें वरना हाथ की नसों को नुकसान पहुंच सकता है।
    • बॉक्सिंग करते हुए सही तरीके से सांस ले ताकि कार्डियो वर्कआउट हो सके।


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      benefits of boxing for woman

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डिनर को खास बना देगी पनीर मेथी चमन और मीठी मकई करी


हेल्थ डेस्क. पनीर का प्रयोग सब्ज़ियों के साथ तो मक्के की चाट बनाने में भी किया जाता है। पनीर और मक्का दोनों ही पौष्टिक हैं।इस बार हम दो ऐसी ही डिश लिए लेकर आए हैं जो स्वादिष्ट होने के साथ हेल्दी भी है।

  1. सामग्री : पनीर- 500 ग्राम, मेथी- 1 किलो, सौंफ पाउडर- 1 छोटा चम्मच, हल्दी पाउडर- 1 छोटा चम्मच, छोटी इलायची- 3, लौंग- 4, दालचीनी- 1 इंच, जीरा- छोटा चम्मच, हींग- चुटकीभर, गरम मसाला पाउडर- 1 छोटा चम्मच, प्याज़- 1, अदरक1 इंच, लहसुन- 3 कली, लाल मिर्च पाउडर- 1 छोटा चम्मच, नमक- स्वादानुसार, तेल- 2 बड़े चम्मच।

    विधि : मेथी को उबालकर बारीक पीस लें। पनीर के बड़े टुकड़े काटकर तल लें। अलग से प्याज़, अदरक, लहसुन पीसकर पेस्ट तैयार करें। एक कड़ाही में तेल गर्मकर हींग डालें, फिर जीरा डालें। इसमें प्याज़, अदरक और लहसुन का पेस्ट डालकर 5 मिनट भूनें। फिर हल्दी पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, दालचीनी, छोटी इलायची, लौंग और नमक डालकर तेल छोड़ने तक भूनें। अब पिसी मेथी डालकर अच्छी तरह से भूनें। ये ज़्यादा गाढ़ी लगे तो इसमें थोड़ा पानी डालकर पकाएं। इसमें पनीर डाल दें। तेल छोड़ने पर गरम मसाला डालकर मिलाएं।

  2. सामग्री : मकई दाने- 2 कप, प्याज़- 1 बारीक कटा हुआ, हरी मिर्च- 2, लहसुन-अदरक पेस्ट- 1 छोटा चम्मच, कसूरी मेथी- 1 छोटी चम्मच कुटी हुई, हल्दी पाउडर- छोटा चम्मच, लाल मिर्च पाउडर- 1 छोटा चम्मच, धनिया पाउडर- छोटा चम्मच, जीरा पाउडर- छोटा चम्मच, गरम मसाला पाउडरछोटा चम्मच, टमाटर- 1 बारीक कटा हुआ, नमक,तेल- बड़ा चम्मच।

    विधि : एक पैन में तेल गर्मकरें। इसमें प्याज़ डालकर पारदर्शी होने तक भूनें। फिर हरी मिर्च और लहसुन-अदरक पेस्ट डालकर तीन मिनट मध्यम आंच पर भूनें। कसूरी मेथी डालकर दो मिनट तक भूनें। फिर हल्दी पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, धनिया पाउडर, जीरा पाउडर और नमक डालकर मिलाएं। अब टमाटर डालकर तेल छोड़ने तक भूनें। इसे ढंककर 4 मिनट तक पकाएं। इसमें एक कप पानी डालकर पकाएं। धीमी आंच पर इसे ढंककर 15-20 मिनट तक पकने दें। जब थोड़ा गाढ़ा हो जाए तो इसमें गरम मसाला मिलाएं।



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      recipe of paneer methi chaman and mithi makai kari

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लंदन में एड्स के वायरस से मुक्त हुआ मरीज, दुनिया में ऐसा दूसरा केस


हेल्थ डेस्क. लंदन के एक एचआईवी पॉजिटिव शख्स को स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की मदद से सफलतापूर्वक एड्स के वायरस से मुक्त करा लिया गया है। एड्स से पूरी तरह ठीक होने वाला यह दुनिया का दूसरा शख्स है। पहला मरीज एक जर्मन था जिसे बर्लिन पेशेंट के नाम से जाना गया था जिसे 2008 में एड्स मुक्‍त करार दिया गया था।मामला सामने आने के बाद उसने अपना नाम टिमोथी ब्राउन बताया था। वर्तमान में दुनियाभर में 3.7 करोड़ लोग एचआईवी वायरस से संक्रमित हैं।

  1. डॉक्टर्स के मुताबिक, 2003 में रोगी को एचआईवी ग्रस्त होने की जानकारी मिली थी। 2012 में उसने संक्रमण का इलाज कराना शुरू किया। जांच के दौरान 2012 में ही रोगी को हॉजकिन्स लिम्फोमा से पीड़ित होने की बात भी सामने आई। यह कैंसर का एक प्रकार है जिसमें मरीज की संक्रमण से लड़नेकी क्षमता तेजी से कम होने लगती है।

  2. कैंसर के इलाज के दौरान डॉक्टर्स को एक ऐसा डोनर मिला जिसके शरीर में ऐसा दुर्लभ जीन था जो एचआईवी के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। डॉक्टर्स ने वायरस खत्म के लिए दुर्लभ जीन वाले डोनर की स्टेम सेल को एचआईवी पेशेंट्स में ट्रांसप्लांट किया।

  3. स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के बाद मरीज का इम्यून सिस्टम बदल गया और शरीर पर एचआईवी वायरस बेअसर हो गया।आमतौर पर इसका वायरस कुछ महीनों बाद दोबारा सक्रिय हो जाता है। यह जांचने के लिए मरीज की दवाएं बंद की गईं। करीब 18 महीने बाद भी उसके शरीर में वायरस नहीं पाया गया और प्रयोग सफल रहा।

  4. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के एचआईवी एक्सपर्ट रविंद्र गुप्‍ता के मुताबिक ऐसा दुर्लभ जीन मिलना असंभव माना जाता है। ऐसा जीन म्यूटेशन के कारण होता है। यह उत्‍तरी यूरोप में रहने वाले महज एक प्रतिशत लोगों में होता है।



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      London HIV Patient Worlds Second To Be Cleared Of AIDS Virus

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जैतून तेल से बढ़ेगा खाने का स्वाद और कम होगा हार्ट अटैक का खतरा


हेल्थ डेस्क. पारम्परिक तौर पर सरसों या सोयाबीन के तेल में खानापकाया जाता है, लेकिन अबजैतून केतेल का उपयोग भी खाना बनाने में होने लगाहै। इटैलियन, चायनीज़ और थाई जैसे विदेशी कुज़ीन की ख़ास सामग्रियों में से एक होता है जैतून तेल। ये न केवल भोजन का स्वाद बढ़ाता है बल्कि इसे सेहत के लिए भी अच्छा माना जाता है।जैतून के तेल में फैटी एसिड की मात्रा अधिक होती है, जो हृदय रोग के ख़तरे को कम करता है। इसमें सैचुरेटेड फैट भी कम होता है, जिससे बैड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा नहीं बढ़ती और हृदयाघात का ख़तरा भी कम हो जाता है।

  1. जैतून तेल के भी कई प्रकार होते हैं जिनकी अपनी अलग ख़ूबी होती है। इन्हें अलग-अलग तरीक़ों से खाना बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। आमतौर पर दो-तीन प्रकार से इसका इस्तेमाल होता है।

  2. ये सबसे अच्छी श्रेणी का तेल है जो काफ़ी गाढ़ा होता है। स्वाद और सुगंध में भी यह बहुत अच्छा होता है जिसे स्ट्रांग फ्लेवर भी कह सकते हैं। इसका इस्तेमाल ड्रेसिंग या डिप बनाने में कर सकते हैं। सलाद, चटनी, पास्ता, पिज़्ज़ा, पास्ता में कच्चा डालकर सर्व किया जा सकता है।

  3. इसका स्वाद और ख़ुशबू न ज़्यादा तेज़ और न ज़्यादा कम होती है। भारतीय भोजन पकाने के लिए यह जैतून तेल अच्छा विकल्प है। एक्स्ट्रा वर्जिन ऑइल के मुकाबले इसकी क़ीमत भी कम होती है। इससे पराठा, सब्ज़ी या कोई भोजन सॉटे कर सकते हैं। इससे स्वाद में बदलाव नहीं आता है।

  4. वर्जिन ऑयल निकालने के बाद बचे हुए तेल को रिफाइंड यानी शुद्ध करके थोड़े से वर्जिन ऑयल में मिलाकर इसे तैयार किया जाता है। यह स्वाद में काफ़ी सौम्य होता है। हालांकि भारतीय भोजन पकाने में इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। इसे ज़्यादातर केक, पेस्ट्री या आटा गूंधने में इस्तेमाल कर सकते हैं।

  5. जहां खाने के अन्य तेलों को सम्बंधित पदार्थ के बीज से निकाला जाता है वहीं जैतून का तेल उसके फल से प्राप्त होता है। ऑलिव ऑयल मेडिटेरियन डाइट का मुख्य घटक है। इस डाइट को किश्व की स्वास्थ्यवर्धक डाइट्स में से एक माना जाता है। 2012 में यूनेस्को ने इस डाइट को अमूर्त (इंटेंजिबल) सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया था।

  6. सलाद बनाते वक़्त, पहले वर्जिन ऑयल डालें, उसके बाद ही नमक और नींबू डालकर मिलाएं। इससे सलाद में मौजूद सब्ज़ियां ताज़ी रहेंगी।

    • जैतून का तेल सॉटे या शैलो फ्राई करने में इस्तेमाल किया जाता है। इसे तेज़ आंच में गर्म नहीं किया जाता है। इससे तेल में मौजूद पौष्टिक तत्व खत्म हो सकते हैं और खाने का स्वाद भी खराब हो सकता है।
    • ब्रेड या रोल पर मक्खन लगाने की जगह वर्जिन ऑयल लगा सकते हैं।

  7. जैतून का तेल ख़राब होने पर इसकी ख़ुशबू और स्वाद बिगड़ जाते हैं। इसे ज़्यादा दिनों तक स्टोर न करें। कुछ ही महीनों में उपयोग कर लें।
    इसे अच्छी तरह बंद डिब्बे में रखें। डिब्बा गहरे रंग का हो इसका भी ध्यान रखें।
    हवा, गर्मी और तेज़ रोशनी जैतून तेल को नुकसान पहचा सकते हैं। इसे ठंडी और सूखी जगह पर ही रखें।
    यदि तेल का स्वाद मक्खन जैसा लग रहा है तो यह पुराना हो चुका है। गुणवत्ता बनाए रखने के लिए, गर्मी के महीनों के दौरान तेल को करिज में रखें। रंगत में थोड़ा मटमैला लगेगा लेकिन तेल सुरक्षित रहेगा। जब इसे इस्तेमाल करना हो तो कुछ देर बाहर निकालकर रखें, उसकेबाद उपयोग करें।



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      health benefit of olive oil, how to use olive oil for cooking

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तनाव दूर करना है तो रोजाना 20 मिनट पैरों का व्यायाम करें


हेल्थ डेस्क. दिनभर ऑफिस में बैठना हो या घर-बाहर में भागदौड़ का काम, दोनों ही शारीरिक तथा मानसिक रूप से थका देते हैं। इसे दूर करने के लिए रोजाना 20 का पैरों का व्यायाम किया जा सकता है। जो शरीर के दूसरे हिस्सों को भी आराम पहुंचाता है।

    • दीवार के पास लेट जाएं।
    • पीठ के निचले हिस्से में एक तकिया, मुलायम रोलर या टॉवेल को गोल घुमाकर रख लें।
    • दोनों पैरों को दीवार के समानांतर ऊपर उठाकर 90 डिग्री के कोण में टिका दें।
    • पैरों को सीधा रखें और अपनी बांहों और कंधों को आराम दें।
    • यह वर्कआउट अनिद्रा की समस्या को दूर करता है। मस्तिष्क तक ऑक्सीजन का प्रवाह होता है जिससे तनाव दूर होता है।
    • यदि दिन भर हील वाली चप्पल पहनती हैं तो यह ज़रूर करना चाहिए। यह पैरों को आराम पहुंचाएगा।
    • रक्त संचार में सुधार होगा, पैरों की सूजन कम होगी और उनमें भारीपन महसूस नहीं होगा। पैरों की मांसपेशियों को आराम पहुंचेगा।
    • पाचन क्रिया में सुधार होगा तथा शरीर में पोषक तत्वों का अवशोषण भी जल्द होगा।
    • सभी अंगाें और मांसपेशियों तक अधिक मात्रा में ऑक्सीजन पहुंचेगी जो तंत्रिका तंत्र के लिए लाभदायक है। यह तनाव कम करेगा।
    • पूरे शरीर के लिए लाभदायक इस व्यायाम से पेट, किडनी को आराम मिलता है और अंगों में रक्तापूर्ति सुधरती है।
    • मन शांत रहता है, आंख और नाक सम्बंधी रोगों में कमी आती है। बालों का असमय पकना कम होता है।
    • हाइपोथायराॅयडिज़्म दूर करने में फायदेमंद है। वैरिकाेज़ वेन्स(नसों में सूजन) के इलाज में मदद करता है।
    • पैरों को पूरी तरह दीवार से सटा लें। स्लिप डिस्क, उच्च रक्तचाप या पैर और रीढ़ में कोई दिक्कत है तो इससे पूर्व चिकित्सकीय परामर्श अवश्य लें।
    • यदि पैरों में अधिक खिंचाव महसूस हो तो उन्हें ज़रूरत के अनुसार मोड़ लें।


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      foot workout to release stress and pain

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10 दिन तक स्टोर किया जा सकता है कंडेंस्ड मिल्क, घर पर आसानी से तैयार करें


फूड डेस्क. दूध को लंबे समय तक घर में स्टोर करना चाहती हैं तो इसे कंडेंस्ड मिल्क में तब्दील कर लें। इसे घर पर आसानी से बनाया जा सकता है। इसे बनाने के लिए 4 कप क्रीमयुक्त दूध और 1 कप शक्कर के बूरे की जरूरत होगी।

घर पर ऐसे बनाएं

  • एक पैन में दूध और शक्कर धीमी आंच पर गर्म करें। इसे तब तक चलाते हुए गर्म करना है जब तक पूरी शक्कर घुल न जाए।
  • दूध में उबाल आते वक़्त ऊपर की ओर फेना बनने लगेगा। इसे चम्मच से हटा दें।
  • जब शक्कर दूध में घुल जाए तब आंच मध्यम से कुछ कम रखें।
  • इसे चम्मच से चलाना नहीं है, वरना ये चटक जाएगा और रवेदार हो जाएगा।
  • इसे करीब 35-40 मिनट तक आंच पर पकने दें ताकि ये क्रीम जितना गाढ़ा हो जाए। इसका रंग भी क्रीमी हो जाएगा।
  • जब ये गाढ़ा हो जाए तो इसे आंच पर से उतार लें। अब एक कांच के जार में कंडेंस्ड मिल्क को ठंडा होने के लिए रखें। जब ये ठंडा हो जाए तो इसे फ्रिज में स्टोर करें।
  • इसका स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें वनीला एसेंस भी डाल सकते हैं।
  • करीब 10 दिन से ज़्यादा इसे फ्रिज में स्टोर किया जा सकता है।


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how to make condensed milk at home

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इंस्टाग्राम पर अनहेल्दी फूड की तस्वीरें देखकर बच्चे ज्यादा कैलोरी का सेवन करने लगते हैं


  • फोटो शेयरिंग ऐप इंस्टाग्राम से बच्चों को अनहेल्दी फूड खाने की आदत लग सकती है। ये बात यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल की रिसर्च में सामने आई है।
  • यह अध्ययन पीडियाट्रिक्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसका उद्देश्य व्लॉगर्स के इंस्टाग्राम पेज के जरिए सोशल मीडिया मार्केटिंग के प्रभावों का अध्ययन करना था।


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Instagram: Tempting Food Photos can affect your children diet, Children Tend to Eat High Calorie Food

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इंस्टाग्राम पर अनहेल्दी फूड की तस्वीरें देखकर बच्चे ज्यादा कैलोरी का सेवन करने लगते हैं


लाइफस्टाइल डेस्क. फोटो शेयरिंग ऐप इंस्टाग्राम से बच्चों को अनहेल्दी फूड खाने की आदत लग सकती है। ये बात यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल की रिसर्च में सामने आई है। शोध के मुताबिक, इंस्टाग्राम पर अनहेल्दी स्नैक्स की फोटो देखने वाले बच्चे ज्यादा मात्रा में कैलोरी का सेवन करने लगते हैं। एना कोट्स द्वारा किया गया यह अध्ययन पीडियाट्रिक्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसका उद्देश्य व्लॉगर्सके इंस्टाग्राम पेज के जरिए सोशल मीडिया मार्केटिंग के प्रभावों का अध्ययन करना था।

  1. शोध में 9 से 11 साल की उम्र के 176 बच्चों को शामिल किया गया था। उन्हें तीन समूहों में बांट दिया गया और पॉपुलरब्लॉगर्सके इंस्टाग्राम पेज दिखाए गए। असली नजर आने वालेये पेज आर्टिफिशियल तरीके से तैयार किए गए थे। बच्चों कोब्लॉगर्सके फॉलोवर्स की संख्या भी लाखों में दिखाई गई थी।

  2. पहले समूह के सभी बच्चों को अनहेल्दी स्नैक्स वाली फोटो दिखाई गईं। दूसरे ग्रुप के बच्चों ने हेल्दी स्नैक्स की फोटोज देखीं। जबकि, तीसरे ग्रुप को नॉन-फूड प्रोडक्ट्स की फोटोज दिखाई गईं। इस दौरान प्रतिभागी बच्चों द्वारा सेवन किए गए स्नैक्स (हेल्दी और अनहेल्दी) को भी मापा गया।

  3. इंस्टाग्राम पर अनहेल्दी स्नैक्स की फोटो देखने वाले बच्चों ने अनहेल्दी स्नैक्स का सेवन करके32%अधिक कैलोरी ग्रहण की। जबकि, दोनों प्रकार के स्नैक्स से उन्होंने नॉन-फूड प्रोडक्ट्स की फोटो देखने वाले बच्चों की तुलना में 26% अधिक कैलोरी ग्रहण की।

  4. अध्ययन से सामने आया है कि ब्लॉगर्स के इंस्टाग्राम पेज से अनहेल्दी खाने की मार्केटिंग करने पर बच्चे जल्दी उनका सेवन करते हैं। शोध के मुताबिक, युवासेलिब्रिटीज से ज्यादा ब्लॉगर्स पर विश्वास करते हैं, इसलिए उनके द्वारा इंडोर्समेंट करना और भी अधिक प्रभावशाली हो सकता है।



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      Instagram: Tempting Food Photos can affect your children diet, Children Tend to Eat High Calorie Food

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कैलोरी कॉन्सेप्ट: दुनिया का सबसे बड़ा झूठ


हेल्थ डेस्क.आज सेहत के प्रति जागरूक लोग जब भी स्वास्थ्य की बात करते हैं तो वे सबसे पहले इसी की पड़ताल करते हैं कि वे जो खा या पी रहे हैं, उसमें कैलोरी कितनी है? कहीं वे अपनी डाइट के जरिए जरूरत से ज्यादा कैलोरी तो नहीं ले रहे हैं? लेकिन फिर भी इस कॉन्सेप्ट को फॉलो करने वाले लोग इच्छित वजन नहीं घटा पाते। कारण है कि यह कॉन्सेप्ट एकदम झूठ है।आज डाइट एंड वेलनेस एक्सपर्ट डॉ. शिखा शर्मा पाठकों को बता रही हैं कि क्या है इसकैलोरी कॉन्सेप्ट की वास्तविकता?

  1. इस कॉन्सेप्ट में क्या गड़बड़ी है, इसे एक उदाहरण से समझेंगे। कैलोरी कॉन्सेप्ट के अनुसार स्वस्थ रहने के लिए एक आराम पसंद महिला को रोजाना 1500 से 1800 कैलोरी और सक्रिय महिला को करीब 2200 कैलोरी की जरूरत होती है। यानी अगर एक आराम पसंद महिला रोज 1500 से अधिक कैलोरी लेगी तो उसका वजन अधिक हो जाएगा। कम लेने पर उसका वजन नियंत्रण में रहेगा।

    आइए अब पूरे दिनभर का 1500 कैलोरी वाला एक डाइट प्लान बनाते हैं। कैलोरी वैल्यू के अनुसार महिला इस डाइट प्लान की सारी चीजें खा सकती हैं। चूंकि वह कैलोरी की लिमिट के भीतर ही सबकुछ कंज्यूम करेगी। इसलिए इसके अनुसार तो उसका वजन भी नहीं बढ़ना चाहिए।

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  2. चूंकि कैलोरी कॉन्सेप्ट के अनुसार आपकी रोजाना कैलोरी की खपत 1500 से कम है। यानी आप कम खा रही हैं और इस तरह वजन कम होना चाहिए। लेकिन खुद ही सोचिए कि आप डाइट पर हैं तो क्या इस तरह खाने से वजन वाकई कम होगा या बढ़ेगा?
    कैलोरी कॉन्सेप्ट का संबंध वजन से नहीं है। यही वजह है कि जो लोग इस कॉन्सेप्ट को फॉलो करते हैं, वे इच्छित वजन घटा ही नहीं पाते।

  3. तो गड़बड़ कहां हुई?
    इससे पहले कि मैं कैलोरी के इस कॉन्सेप्ट के साथ जुड़ी समस्या की बात करुं, यहां इस टर्म के इतिहास को भी समझना जरूरी है। 'कैलोरी' शब्द लेटिन शब्द 'कैलोर' से आया है जिसका अर्थ होता है गर्मी। कैलोरी की अवधारणा का श्रेय फ्रेंच वैज्ञानिक निकोलस क्लीमेंट को जाता है जिन्होंने सबसे पहले 1824 में एक जर्नल में इसकी परिभाषा दी थी। उस समय कैलोरी का इस्तेमाल हीट इंजन के संदर्भ में किया गया था। हीट इंजन में सबसे पहले कोयले को जलाया जाता है। उससे जो गर्मी पैदा होती है, वह पानी को गर्म करने के काम आती है। पानी के गर्म होने से वाष्प पैदा होती है जो अंतत: इंजन को गतिशील करती है। कोयले को जलाने की इस प्रक्रिया को 'कम्बशन' कहा जाता है।

  4. इंजन में कोयला जलने की इस प्रक्रिया को ही मानव शरीर में 'मेटाबॉलिज्म' के साथ कन्फ्यूज कर दिया गया जबकि मेटाबॉलिज्म बहुत ही अलग प्रक्रिया है। मेटाबॉलिज्म कई तरह के बायोलॉजिकल रिएक्शन्स की सीरीज होती है जिसमें भोजन को ब्रेक कर विटामिन्स, मिनरल्स, अमिनाे एसिड्स और जरूरी फैट्स के सार को एब्जॉर्ब कर उसका इस्तेमाल कोशिकाओं के निर्माण, कोशिकीय ऊर्जा और शरीर के कायाकल्प में किया जाता है। जिसमें मेटाबॉलिज्म की यह प्रोसेस जितनी फास्ट होगी, उसमें एनर्जी को बर्न करने की कैपेसिटी उतनी ही अधिक होगी और वह उतना ही चुस्त और तंदुरुस्त होगा। इस कन्फ्यूजन को क्रिएट किया था अमेरिकी वैज्ञानिक विल्बर ऑलिन एटवाटर ने जिन्होंने हीट इंजन में प्रयुक्त किए गए 'कैलोरी' शब्द को शरीर के साथ जोड़ दिया। और फिर हम भी दशकों से उसी "कैलोरी' को ढोते आए। आज भी ढो रहे हैं।

  5. तो क्या करें?
    अगर वाकई वजन कम करना है तो कैलोरी काउंट मत कीजिए। समय पर खाइए, समय पर पर्याप्त नींद लीजिए और बैलेंस्ड डाइट लीजिए। बैलेंस्ड डाइट मतलब सब चीजें थोड़ी-थोड़ी जरूर लीजिए। साथ ही थोड़ी शारीरिक गतिविधि भी जरूरी है। इससे शरीर के मेटाबॉलिज्म की प्रोसेस तेज हो सकेगी और आप चुस्त-तंदुरुस्त बने रहेंगे।



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      calorie concept is a lie- diet salah by dr shikha sharma

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खाने की आदतों को बदलकर रहा जा सकता है स्वस्थ


हेल्थ डेस्क.हाल ही खाने से जुड़ी हमारी आदतों को लेकर तीन रिसर्च सामने आई हैं। ये रिसर्च एक्सरसाइज और डाइट के संबंध, मिठाई खाने के फायदे-नुकसान और एक्सपाइरी डेट देखकर खाने से जुड़े प्रोडक्ट्स फेंकने की आदत से जुड़ी नई जानकारियां सामने लाई हैं। पढ़िए तीन अमेरिकी संस्थाओं द्वारा की गई रिसर्च के नतीजे...

  1. इंटरनेशनल ओबेसिटी जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक एक्सरसाइज शुरू करना आपको अच्छा खाना खाने के लिए प्रेरित कर सकती है। टेक्सस यूनिवर्सिटी में न्यूट्रिशनल साइंस की प्रमुख मोली ब्रे लिखती हैं, 'किसी खास डाइट को शुरू करना कठिन होता है। अधिकतर लोग शुरुआत में ही कमी महसूस करने लगते हैं। कुछ खाने की बजाय आप कोई शारीरिक गतिविधि शुरू कर अपने खान-पान में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो सकते हैं'।

    स्टडी के लिए रिसर्चरों ने 2500 कॉलेज छात्रों को चुना। ये डाइटिंग और एक्सरसाइज नहीं करते थे। इन्हें 15 सप्ताह के एरोबिक एक्सरसाइज प्लान (सप्ताह में तीन दिन 30 से 60 मिनट)पर रखा गया। करीब 2000 ने एक्सरसाइज प्लान का पालन किया। जिन लोगों ने ज्यादा और तेज एक्सरसाइज की उनका डाइट बेहतर होता गया। ब्रे कहती हैं, इस बदलाव का कारण मनोवैज्ञानिक और शारीरिक है। अन्य अध्ययनों ने भी दर्शाया है कि एक्सरसाइज से दिमाग की हलचल बदलती है जिससे हेल्दी खाने की इच्छा जाग सकती है।

  2. हाल ही में हुई एक रिसर्च में सामने आया है कि कभी-कभार मीठा खाना फायदेमंद हो सकता है। आमतौर पर शुगर को वजन बढ़ने और टाइप 2 डायबिटीज, कैंसर और दिल की बीमारियों से जोड़ा जाता है। एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजी जर्नल में प्रकाशित स्टडी के लिए 130 कॉलेज छात्रों और स्टाफ को लंच से पहले दो मिठाइयां खाने का विकल्प दिया गया। जिन लोगों ने लेमन चीज केक जैसी खराब मिठाई चुनी, उन्होंने फल खाने वालों की तुलना में हेल्दी खाना और कम कैलोरी लीं। चीज केक खाने वाले 70% लोगों ने स्वास्थ्य के लिए बेहतर मुख्य डिश का चुनाव किया। लेकिन, फल खाने वाले केवल एक तिहाई लोगों ने ऐसा किया। चीज केक खाने वाले लोगों ने फल खाने वालों की तुलना में 250 कैलोरी कम लीं।

    एरिजोना यूनिवर्सिटी में मार्केटिंग और कॉग्निटिव साइंस के असिस्टेंट प्रोफेसर और स्टडी के लेखक मार्टिन रीमान कहते हैं, यदि आप किसी भारी डिश का पहले चुनाव करते हैं तो फिर आप हेल्दी विकल्प की ओर जाते हैं। मिठाई हर दिन नहीं खाई जानी चाहिए और ताजे फल के साथ खाना समाप्त करना ठीक है।

  3. वेस्ट मैनेजमेंट जर्नल में छपी एक स्टडी से पता लगा है, अधिकतर अमेरिकी अनावश्यक तौर पर डिब्बाबंद फूड फेंक देते हैं। वे फूड खराब होने के कारण नहीं बल्कि पैकेट पर लिखी तारीख के आधार पर ऐसा करते हैं। फूड प्रोडक्ट की तारीखों के साथ अक्सर लिखा होता है, बेस्ट बाई या सेल बाई। कई अमेरिकी भरोसा करते हैं, तारीखें संकेत करती हैं कि किस समय के बाद फूड सुरक्षित नहीं है।


    अमेरिकी कृषि विभाग की विशेषज्ञ जेनेल गुडविन बताती हैं, तारीख रहने या निकलने से कोई चीज बेकार नहीं हो जाती है। खाने को खराब और दूषित करने वाला बैक्टीरिया प्रोडक्ट की गंध, जायके या बनावट में बदलाव लाता है। अगर इनमें से कुछ भी नहीं बदला है तो फूड सुरक्षित है। फूड को गर्म कर बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियों से बच सकते हैं। वे कहती हैं, बेस्ट का मतलब है कि फूड का जायका या क्वालिटी कब सबसे अच्छी है। सैल बाई से संकेत मिलता है, कोई स्टोर कितने लंबे समय तक प्रोडक्ट बेच सकता है। और यूज बाई तारीख बताती है कि प्रोडक्ट की क्वालिटी सबसे ज्यादा बेहतर कब तक रहती है।



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      three different studies shows that one can stay healthy by changing food habits

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रोस्टेड चिकन में भीगे पोहे और मसाले मिलाकर बनता है 'पोहा चिकन भुजिंग'


हेल्थ डेस्क.मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में पोहा काफी लोकप्रिय नाश्ता है। खासकर शाकाहारी लोग इसे काफी चाव से खाते हैं। इसे प्याज, मूंगफली के दानों और अन्य भारतीय मसालों से बनाया जाता है। वैसे इसके कई वर्जन हैं और इसे कई तरह से बनाया जा सकता है। अब अगर आपसे यह कहें कि इसे नॉनवेज तरीके से भी बनाया जा सकता है तो क्या आप यकीन करेंगे?जी हां, आज शेफ हरपाल सिंह सोखी बात कर रहें हैं पोहे के इसी नॉनवेज वर्जन की।

सेहत भी, स्वाद भी
यह अजीब लग सकता है, लेकिन पोहे और चिकन के कॉम्बिनेशन से बनाई जाने वाली यह नॉनवेज डिश मुंबई के विरार इलाके में काफी पॉपुलर रही है। सेहत के हिसाब से भी इसे एक कम्पलीट डिश माना जा सकता है क्योंकि पोहे के तौर पर जहां इसमें कॉबोहाइड्रेट होते हैं, तो चिकन के रूप में पर्याप्त प्रोटीन भी।

चिकन का तेल कम करने के लिए मिलाया पोहा
इसके ईजाद होने की कहानी भी बड़ी रोचक है। इसको ईजाद करने का श्रेय बाबू हरि गावड़ को जाता है। बात 1940 के आसपास की है। बाबू हरि ताड़ी की शराब बेचने का धंधा करते थे। जब भी उनके दोस्त उनसे मिलने आते तो बाबू हरि उन्हें शराब पिलाते। शराब के साथ चखना भी होता। एक दिन बाबू हरि और उनके कुछ दोस्त शराब पी रहे थे। चखने के तौर पर चिकन परोसे गए। लेकिन जिस बर्तन में चिकन बनाए गए थे, उसमें उस दिन तेल थोड़ा ज्यादा हो गया। तो बाबू हरि ने तेल को सोखने के लिए उसमें कुछ पोहे मिला दिए। बस, यहीं आविष्कार हो गया एक डिश का। नाम दिया गया 'पोहा चिकन भुजिंग' या 'भुजिंग चिकन'।

महाराष्ट्र और गुजरात में लोगों की खास पसंद
'भुजिंग' शब्द मराठी भाषा के 'भूजने' से लिया गया है जिसका अर्थ है किसी चीज को भूनना। इसे बनाने के लिए चिकन को इसी भूजने यानी रोस्टिंग की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। पहले चिकन को हरे धनिया की चटनी में मेरिनेट किया जाता है और फिर अच्छी तरह भूना जाता है। चिकन को भूनने के बाद इसे प्याज के साथ शेलो फ्राई किया जाता है। जब चिकन की रोस्टिंग और फ्राइड की प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो फिर इसमें पानी में पहले से भिगोए हुए पोहे मिलाए जाते हैं। अब इसमें अपने-अपने स्वाद के अनुसार वही मसाले मिलाए जाते हैं जो सामान्य पोहे में इस्तेमाल किए जाते हैं।मुंबई से यह डिश गुजरात पहुंची जहां नॉन वेजिटेरियन लोगों ने इसे हाथो-हाथ लिया। आज मुंबई और महाराष्ट्र में कई होटलों में यह डिश अलग-अलग तरीकों से बनाई जाती है।



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food history by chef harpal singh sokhi- poha chicken bhujing

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दुनिया की सबसे उम्रदराज प्रोजेरिया सर्वाइवर, 8 गुना तेजी से बढ़ रही उम्र; योग से लड़ रहीं बीमारी की जंग


हेल्थ डेस्क. टिफ्नी वेडकाइंड की उम्र 41 साल है और दुनिया की सबसे उम्रदराज प्रोजेरिया सर्वाइवर हैं। प्रोजेरिया बीमारी से पीड़ित टिफ्नी की उम्र 8 गुना तेजी से बढ़ रही है। चेहरे पर झुर्रियां आ चुकी हैं लेकिन योग की मदद से बीमारी से लड़ने की जंग जारी है। उनका कहना है कि मुझे नहीं मालूम यह चमत्कार है या नहीं लेकिन दूसरों की तरह ही हूं और योग की मदद प्रतिरक्षी तंत्र (इम्यून सिस्टम) बेहतर कर पाई हूं।

  1. ऐसे मामले दुनियाभर में 156 बच्चों में देखे गए हैं। टिफ्नी वेडकाइंड ऐसे दूसरे मरीजों से अलग इसलिए हैं क्योंकि आमतौर पर उम्र के दूसरे साल तक प्रोजेरिया के लक्षण दिख जाते हैं और मरीज 12 साल की उम्र से ज्यादा नहीं जी पाते। लेकिन कोलंबिया की रहने वाली टिफ्नी की बीमारी के खिलाफ जंग जारी है।

  2. डॉक्टरों का कहना है ये बीमारी आनुवांशिक रूप से टिफ्नी में आई है। टिफ्नी का भाई चेड का भी इसी बीमारी के कारण 39 साल की उम्र में निधन हो गया था। वर्तमान में बीमारी के कारण वह कमजोर होते दांतों, झड़ते बाल और हृदय रोगाें से भी जूझ रही हैं। 4 फीट 5 इंच लंबाई वाली टिफ्नी का वजन घटकर 26 किलो रह गया है। वह नियमित तौर पर योग करती हैं और कैंडल बनाने वाली कंपनी कोसफलतापूर्वक चला रही हैं।

  3. नेशनवाइड चिल्ड्रेंस हॉस्पिटल के डॉ. किम मैकब्राइड का कहना है कि करीब 10 साल पहले टिफ्नी और उसका भाई मेरे पास आया था। दोनों की स्थिति काफी दुर्लभ हैं क्योंकि बीमारी के इतने लंबे समय तक जीवित रहना आश्चर्यजनक है। दोनों में ही बीमारी के लक्षण काफी समय बाद देखे गए थे। चेड में भी जब दिल की बीमारी और पैरों की हड्डी टूटने की बात सामने आई थी तब इसका पता चला था।

  4. आमतौर पर प्रोजेरिया की स्थिति में दांतों का टूटना, बॉडी में चर्बी घटने के साथ इंसान बूढ़ा दिखने लगता है। इसके अलावा जोड़ों में जकड़न, कूल्हों का खिसकना और हार्ट डिजीज के मामले बढ़ जाते हैं लेकिन टिफ्नीका कहना है कि बेहद कम उम्र में दांत कमजोर हो गए थे लेकिन वे गिरे नहीं था उन्हें निकलवाया गया था। वर्तमान में लगे दांत नेचुरल नहीं हैंं। मेरे बाल टूट रहे हैं और हार्ट वॉल्व भी कमजोर हो गए हैं।

  5. प्रोजेरिया जीन में परिवर्तन के कारण होने वाली बीमारी है। ऐसी स्थिति में शरीर में लेमिन-ए प्रोटीन का निर्माण अधिक होने लगता है और समय से पहले मरीज बूढ़ा होने लगता है। टिफ्नीकी 70 वर्षीय मां प्रोजेरिया से जुड़े जीन थे हालांकि उनमें बीमारी से जुड़े लक्षण नहीं देखे गए थे।



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      the oldest known survivor of rare Benjamin Button progeria condition
      the oldest known survivor of rare Benjamin Button progeria condition
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दिन में साढ़े 3 घंटे से ज्यादा टीवी देखने पर घट सकती है बुजुर्गों की याददाश्त


  • पचास साल से ज्यादा उम्र के व्यक्तियों को दिन में साढ़े तीन घंटे से ज्यादा टीवी नहीं देखना चाहिए। यह बात 3662 बुजुर्गों पर हुई रिसर्च में सामने आई है।
  • यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों का कहना है कि किताब पढ़ने से मेमोरी में इजाफा होता है। टीवी शोज याद करने की क्षमता को 10% तक घटा देते हैं।


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Over 50s watch 3 and half hours TV a day likely suffer memory loss

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दिन में साढ़े 3 घंटे से ज्यादा टीवी देखने पर घट सकती है बुजुर्गों की याददाश्त, किताब पढ़कर बढ़ाएं मेमोरी


हेल्थ डेस्क. पचास साल से ज्यादा उम्र के व्यक्तियोंकोदिन में साढ़े तीन घंटे से ज्यादा टीवी देखना उनकी याददाश्तको घटा सकता है। यहबात 3662 बुजुर्गों पर हुई रिसर्च में सामने आई है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की रिसर्च के अनुसार, टीवी ज्यादा देखने पर दिमाग पर तनाव बढ़ता है, जो याददाश्तघटने का कारण बनता है और बाद में डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) की वजह बन सकता है।

  1. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों का कहना है कि तय समय से अधिक टीवी देखना याददाश्तको घटाता है लेकिन किताब पढ़ने से मेमोरी में इजाफा होता है। शोध के मुताबिक, सीरियल, डॉक्यूमेंट्रीज और रियलिटीशाेजयाद करने की क्षमता को 10% तक घटा देते हैं।

  2. शोधकर्ता डॉ. डेजी फेनकोर्ट के मुताबिक पिछले एक दशक से टीवी और मेमोरी से जुड़ी रिसर्च को बच्चों से ही जोड़कर देखा जा रहा है। इसे जीवन के दूसरे हिस्से से जोड़ा नहीं गया। ऐसे लोग जो लगातार 25 सालों से टीवी देख रहे हैं उनमें डिमेंशिया की समस्या हो सकती है।

  3. रिसर्च में शामिल 3662 बुजुर्गों ने 2008-2009 और 2014-2015 में दिन में कितनी बार टीवी देखी, यह पूछा गया। इसके बाद उनसे शब्दों की एक सीरीज का टेस्ट लिया गया। परिणाम के रूप में सामने आया कि जिन्होंने टीवी नहीं देखी उनकी याददाश्त5% ज्यादा थी। लगातार 6 साल तक टीवी देखने वाले बुजुर्गों की याददाश्तमें 10% तक की गिरावट दर्ज की गई।

  4. सरेयूनिवर्सिटी के क्लीनिकल साइकोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. बॉब पेटन का कहना है कि टीवी देखने के कारण दिमाग की संरचना में बदलाव होते हैंं खासकर उन हिस्सों में जिसका संबंध याददाश्त से होता है। हालांकि यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पाया है कि टीवी पर प्रसारित होने वाले किस प्रकार के प्रोग्राम की वजह ऐसा होता है।

  5. शोधकर्ता डॉ. डेजी फेनकोर्ट का कहना है कि 50 साल की उम्र से ज्यादा के व्यक्ति अगर टीवी देख रहे हैं तो ज्यादा देर तक मत देखें। समय बिताने के लिए दूसरे रचनात्मक कामों या बुक रीडिंग पर फोकस कर सकते हैं।



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      प्रतीकात्मक फोटो।
      ऐसे लोग जो लगातार 25 सालों से टीवी देख रहे हैं उनमें डिमेंशिया की समस्या हो सकती है।

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पुरुषों के मुकाबले 5 साल ज्यादा जीती है महिलाएं, हार्मोन की वजह से ऐसा होता है


हेल्थ डेस्क. महिलाएं पुरुषों से ज्यादा क्यों जीती हैं। 100 वर्ष की स्कैल परउनकी उम्र पुरुषों से ज्यादा होने का कारणवैज्ञानिकों ने बताया है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, अमेरिकी पुरुषों की औसत आयु 76 साल और महिलाओं की औसत उम्र 81 वर्ष है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की हेल इंडेक्स के मुताबिक, अमेरिका जैसे देश मेंपुरुष उम्र के 67 और महिलाएं 70वें पड़ाव तक स्वस्थ रह सकती हैं। हेल इंडेक्स में सामान्य स्थिति में महिला और पुरुष की उम्र के आंकड़े जारी किए जाते हैं।

  1. न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी ऑस्ट्रेलिया की न्यूरोसाइकियाट्री विभाग केप्रो. परमिंदर सचदेव के मुताबिक, महिलाओं और पुरुषों की आयु में अंतर सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं है, यह दुनिया के हर समाज के लिए लगभगएक जैसा ही है।

  2. प्रो. परमिंदर कहते हैं कि इसके पीछे कई थ्योरीज हैं, जैसे पुरुषों में स्मोकिंग, अल्कोहल और मोटापाजैसी समस्याएं ज्यादा देखी जाती हैं। बीमार होने पर पुरुष दवाएं लेना कम पसंद करते हैं यहां तक कि बीमारी का पता लगने के बाद भी। इसके अलावा दुर्घटनाओं जैसे एक्सीडेंट में पुरुषों की मौतज्यादा होती हैं।

  3. साउथ कोरिया की इनहा यूनिवर्सिटी के बायोलॉजिकल साइंस विभाग के प्रो. क्यूंग-जिन मिन का कहना है कि पुरुषों में उम्र कम करने में टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन कीबड़ी भूमिका होतीहै। पुरुषत्व और आक्रामकता पैदा करने वाला ये हार्मोन उन्हेंकई बार मुश्किल में डालता है और उनकी कम उम्र में मौत की आशंका बढ़ जाती है।

  4. ड्यूक यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के अनुसार, पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन का स्तर अधिक बढ़ने पर उनका बर्ताव जोखिम को बढ़ाता है। यह हार्मोन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है साथ ही हृदय रोगों का खतरा बढ़ाता है।

  5. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एंडोक्राइनोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, टेस्टोस्टेरॉन के विपरीत महिलाओं में पाया जाने वाला एस्ट्रोजन हार्मोन उन्हें खास तरह की सुरक्षा प्रदान करता है। एस्ट्रोजन डीएनए को डैमेज होने से बचाता है जिससे रोगों का खतरा कम हो जाता है। यह एक एंटीऑक्सिडेंट की तरह काम करता है।



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      Why Do Women Live Longer Than Men expert reveals the secret of long life

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मटर, आंवला और मेथी को सालभर इस्तेमाल करने के लिए स्टोर करने का सही वक्त है बसंत


फूड डेस्क. मटर को जमाने यानी फ्रीज़ करने और मेथी को सुखाने का यही समय है, जब उनकी बाज़ार में आमद अच्छी हो रही है। मटर, आंवले या हरे पत्ते की भाजी इसी मौसम में मिलती हैं। इन्हें स्टोर करके सालभर इनका लुत्फ़ लिया जा सकता है। आइए फूड ब्लॉगर प्रीति डाभी जानते हैं, इनको सम्भालने की तरक़ीबें।

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    इन्हें चुनते समय ध्यान रखें कि स्टोर करने के लिहाज़ से बड़ी मटर लें। मटर के दाने निकाल लें। पानी उबाल लें और उबलते पानी में मटर डाल दें। करीब दो-तीन मिनट में सभी मटर के दाने पानी में ऊपर तैरने लगेंगे। इन्हें छलनी की मदद से निकालकर, तुरंत ठंडे बर्फ़ वाले पानी में डाल दें। ठंडे पानी में 5-7 मिनट रखने के बाद आधे घंटे के लिए इन्हें फैलाकर हल्का-सा सुखा लें। फिर इन्हें जि़पर बैग या डिब्बे में भरकर फ्रीज़र में रख लें। ज़िपर बैग में रख रहे हैं तो बैग की पूरी हवा निकाल दें उसके बाद ही फ्रीज़र में रखें। इससे मटर महीनों तक ताज़ी व मुलायम बनी रहेगी। जब इस्तेमाल करना हो तो थोड़ी देर के लिए पानी मे भिगोने के बाद इस्तेमाल करें।

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    आंवलों के बीज हटाकर इनको छोटे टुकड़ों मे काट लें। अब उसको ज़िप लॉक बैग में भर दें। ज़िप बंद करके कोने से बाकी की हवा निकाल दें और फिर फ्रीज़र में रख दें। इन्हें कभी भी जूस या चटनी बनाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके अलावा इन्हें सुखाकर भी रख सकते हैं। आंवले को 6-7 मिनट के लिए उबाल लें। इनको छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें। इन आंवलों के टुकड़ों को फैलाकर धूप में सूखने के लिए रख दें। जब ये सूख जाएं तो एक डिब्बे में बंद कर रख दें। जब इस्तेमाल करना हो तो इसे 15-20 मिनट के लिए गर्म पानी में भिगोकर रखें और फिर इस्तेमाल करें।

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    सबसे पहले मेथी की पत्तियों को तोड़ लें। फिर पानी की धार में इन्हें अच्छी तरह से धोकर पानी निथार लें। अब इनको 2-3 दिन धूप में तब तक सुखाएं जब तक पत्तियां कड़क न हो जाएं। सूखी मेथी को किसी भी एयरटाइट डिब्बे में भर कर रख दे। जब मन हो तब इनको सब्ज़ी, पराठे या दाल में डालकर इस्तेमाल कर सकते हैं। मेथी को लम्बे समय तक स्टोर करके रख सकते हैं।

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    इसी तरह गर्मियों में आने वाले पुदीने को भी सुखाकर इस्तेमाल किया जा सकता है। पुदीने की पत्तियों को दो-तीन बार अच्छी तरह से धो लें। फिर पेपर पर सुखा लें। इन्हें धूप में दो-तीन दिन तक सुखाएं। जब ये सूख जाएं तो इन्हें एयर टाइट डिब्बे में भर दें। इसका पाउडर बनाकर भी रख सकते हैं। जब मन हो तब इन्हें सब्ज़ी, पराठे, रायते या छाछ में डाल सकते हैं। इसी तरह ओरेगानो, बेसिल और धनिए को भी स्टोर कर सकते हैं।



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      how to store pea amla methi and mint leaves for all season

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बॉडी से जहरीले तत्व बाहर निकालने के लिए डाइट में शामिल करें नींबू पानी, अनार और लहसुन


हेल्थ डेस्क.बॉडी बेहतर तरीके से काम करे और रोगों से दूर रहे, इसके लिए बॉडी में मौजूद जहरीले पदार्थों का बाहर निकलना जरूरी है। ऐसे पदार्थों को बाहर निकालने की प्रक्रिया डिटॉक्सीफिकेशन कहलाती है। गाजियाबाद के अटलांटा हॉस्पिटल की न्यूट्रिशनिस्ट डॉ. गरिमा चौधरी बताती हैं ऐसे विषैले तत्वों को बाहर निकालने के लिए कई फल और सब्जियां मदद करती हैं। जानिए इनके बारे में...

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    यह विषाक्त पदार्थों को शरीर से बाहर करने में तथा वज़न घटाने में सहायक होता है। लेमनेड क्लींज बनाने के लिए पानी, नींबू का रस, मेपल सिरप और काली मिर्च को मिलाकर एक पेय बनाकर पिएं।

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    अनार में पर्याप्त मात्रा में विटामिन-सी और फाइबर होते हैं। यह हृदय को स्वस्थ रखने और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में मददगार है। 250 ग्राम अनार का सेवन या 250 एमएल अनार का जूस रोज़ाना पी सकते हैं।

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    इसमें शक्तिशाली एंटीवायरल, एंटीसेप्टिक और एंटीबायोटिक गुण होते हैं। लहसुन डिटॉक्सिफिकेशन एंजाइम का उत्पादन करने के लिए लिवर को उत्तेजित करता है। यह एंजाइम पाचन तंत्र से विषाक्त पदार्थों को फ़िल्टर करने में मदद करते हैं। 4 ग्राम लहसुन एक दिन के लिए पर्याप्त होता है।

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    ब्रोकली स्प्राउट्स में महत्वपूर्ण फाइटोकेमिकल्स होते हैं जो पाचन तंत्र में डिटॉक्सीफिकेशन एंजाइम्स को उत्तेजित करते हैं। 100 ग्राम ब्रोकली का सेवन डिटॉक्सीफिकेशन के लिए अच्छा होता है।

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    सभी बेरीज़ जैसे स्ट्रॉबेरी, रास्पबेरी, ब्लैकबेरी और ब्लूबेरी आदि विटामिन सी और फाइबर के अच्छे स्रोत हैं। इनका सेवन करने पर ब्यूट्रेट उत्पादन में मदद मिलती है। 100 ग्राम बेरी का रोज़ाना सेवन पर्याप्त है।

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    इसमें ब्रोमलेन नामक एंजाइम होता है जो प्रोटीन को अलग करने और उसके पाचन में मदद करता है। यह सूजन भी कम करता है तथा चोट को जल्द ठीक करने में सहायक है। महिलाओं के लिए 21 से 25 ग्राम अनानास तथा पुरुषों के लिए 30 से 38 ग्राम अनानास का सेवन करने की सलाह दी जाती है।

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    यह पोषक तत्वों से भरपूर होता है और विटामिन बी 3, बी 6 के अलावा बीटा- कैरोटीन, मैग्नीशियम, कैल्शियम और आयरन का अच्छा स्रोत है। यह फाइबर पाचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। क़रीब 150 ग्राम चुकंदर का सेवन शरीर के लिए ज़रूरी नाइट्रेट की पूर्ति करता है।

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    सेब में विटामिन, फाइबर और खनिज भरपूर मात्रा में होते हैं और फाइटोकेमिकल और पेक्टिन जैसे प्राकृतिक तत्व भी पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। ये सभी मिलकर विषाक्त तत्वों को दूर करने में मददगार होते हैं। सेब को कच्चा ही खाएं। इसे छिलके सहित खाने पर विटामिन सी और फाइबर प्राप्त होता है।



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      how to detoxify body by vegetables and fruits know what is detoxification

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चीनी वैज्ञानिकों ने बनाया शरीर में अंदर कैंसर की दवा कंट्रोल करने वाला नैनोजनरेटर


हेल्थ डेस्क. चीनी वैज्ञानिकों ने ऐसा नैनोजनरेटर बनाया गया है जो शरीर के अंदर इंम्प्लांट किया जा सकता है। इसकी मदद से कैंसर की दवा कंट्रोल जा सकती है जो कैंसर थैरेपी में अहम रोल निभाती है। इंप्लांट की लंबाई और चौड़ाई 2.5 सेमी है जिसे बीजिंग के इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो एनर्जी ने तैयार किया है। यह टेस्ट चूहों पर किया गया है।

  1. वैज्ञानिकों का कहना है कि जब शरीर में एंटी-ट्यूमर ड्र्रग रिलीज किया जाता है तो यह लाल रुधिर कणिकाओं की मदद से पूरे शरीर में सर्कुलेट होता है। बॉडी में बिजली रिलीज करने पर लाल रुधिर कणिकाओं की क्रियाशीलता बढ़ जाती है। इसी बात को प्रयोग का आधार बनाया गया है।

  2. शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस डिवाइस को स्किन के नीचे इंप्लांट किया जा सकता है। यह पर्याप्त बिजली जनरेट करता है जिससे दवा के लेवल को कंट्रोल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इम्प्लांट की मदद से दवा का लेवल सिर्फ कैंसर वाले हिस्से में ज्यादा बढ़ता है।इंप्लांट स्वस्थ कोशिकाओं में एंटी ट्यूमर ड्रग पहुंचने से रोकता है जिससे उन्हें नुकसान नहीं पहुंचता और मरीज की उम्र में बढ़ोतरी होती है।

  3. शोधकर्ता फेंग हॉन्गक्विंग का कहना है कि हमारी कोशिश है कि इंप्लांट का आकार छोटा किया जाए। कोशिश है कि इसे ऐसी डिवाइस में बदला जा सके जिससे पहनने भर से ही ड्रग को कंट्रोल किया जा सके।



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      Chinese scientists develop nanogenerator for cancer drug delivery system

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अच्छी सेहत के लिए दिन भर में तीन या पांच बार खाएं खाना


हेल्थ डेस्क. यहां शीर्षक को पढ़कर कुछ पाठकों को लग सकता है कि दो वक्त खाने वालों की बात क्यों नहीं हो रही? तो अब वे दिन नही रहे जब हम दो वक्त का खाना खाकर भी स्वस्थ रहते थे, क्योंकि तब न वैसा तनाव था और न ही प्रदूषण। लेकिन अब भी कई लोग केवल दो समय का ही खाना खाते हैं- लंच और डिनर, लेकिन यह सेहत के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है।

अब समय आ गया है कि उतने ही खाने को जितना कि आप दो बार में खाते हैं, को तीन बार में खाएं। बल्कि अब तो कुछ विशेषज्ञ इसे तीन से भी ज्यादा चार या पांच बार में खाने की सलाह देते हैं। आज इसी बात पर चर्चा कर रही हैं डाइट एंड वेलनेस एक्सपर्ट डॉ. शिखा शर्मा कि हमें तीन बार खाना चाहिए या पांच बार?

  1. इसमें अपनी जरूरत के दिनभर के भोजन को तीन हिस्सों में बांटकर खाया जाता है, यानी ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर। इनके बीच में और कुछ नहीं खाया जाता। इस पैटर्न में ब्रेकफास्ट और लंच हैवी होना चाहिए और डिनर अपेक्षाकृत लाइट। यह पैटर्न आपको इस बात की सुविधा देता है कि आप अपनी भूख या शेड्यूल के हिसाब से खाने की मात्रा को ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर में कम-ज्यादा कर सकते हैं। हालांकि कुल मात्रा कमोबेश घटनी या बढ़नी नहीं चाहिए।

  2. इसमें आपके दिनभर के भोजन को तीन हिस्सों में तो बांटा ही जाता है, जैसे ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर। साथ ही ब्रेकफास्ट व लंच और लंच व डिनर के बीच भी छोटे-छोटे स्नैक होते हैं। अगर इसे सही तरीके से अमल में लाया जाए तो यह सबसे बेहतर है। इससे न केवल बीच-बीच में जंक फूड खाने से बचा जा सकता है, बल्कि मेटाबॉलिज्म को बढ़ाकर मोटापे की समस्या को भी कम किया जा सकता है।

  3. दोनों ही पैटर्न अपने आप में सही हैं। अगर आपके लिए पांच बार खाना संभव न हो तो तीन बार खाने के पैटर्न का भी चयन कर सकते हैं। लेकिन अगर आपके पास समय और सुविधा दोनों हैं तो पांच बार मील्स पैटर्न को ही चुनना चाहिए। कुछ बीमारियों जैसे इरिटेबल बाउल सिंड्रोम(आईबीएस) और डायबिटीज के मरीजों को पांच बार खाने की सलाह तो डॉक्टर्स भी देते हैं। डायबिटीज के मरीजों के लिए तो हर तीन-चार घंटे में कुछ न कुछ हेल्दी खाना अनिवार्य होता है ताकि उनके ब्लड में शुगर का लेवल मेंटेन रहे। इसके अलावा बहुत छोटे बच्चों और 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों के लिए भी पांच बार मील्स का पैटर्न अपनाया जाना चाहिए, क्योंकि इस पैटर्न में छोटे-छोटे मील्स होते हैं, जिसे पचाने में दिक्कत नहीं होती।

  4. अगर आप तीन मील्स पैटर्न को आजमाते हैं तो आपको बीच-बीच में अधिक पानी या अन्य पेय पदार्थ लेने होंगे, क्योंकि इसमें एक साथ ज्यादा खाना खाया जाता है। ऐसे में बेहतर पाचन के लिए अधिक से अधिक पेय पदार्थों का सेवन करना चाहिए। पेय पदार्थ साधारण पानी के अलावा नींबू पानी, नारियल पानी जैसा कुछ भी हो सकता है। और चूंकि आपका डिनर बहुत ज्यादा हलका नही होगा। ऐसे में जरूरी है कि आप इसे सोने के कम से कम तीन घंटे पहले लें।

    अगर आप 5 मील्स पैटर्न को आजमाते हैं तो आपको चाहिए कि आप बीच-बीच में चाय या कॉफी न लें क्योंकि इससे भूख नहीं लगेगी और आपके 5 मील्स पैटर्न में खलल पैदा होगी। इसके अलावा एक बात का और ध्यान रखें कि 5 बार खाने का मतलब ज्यादा खाने से कतई नहीं है। जितना आप तीन बार के मील्स में खाते हैं, उतने को ही 5 बार में खाना है। इसमें खतरा यही है कि कई बार लोग ओवरईटिंग कर जाते हैं।



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      how many meals in a day is perfect- Diet salah by dr shikha sharma

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शतरंज में हार से उपजी थी पायसम!


हेल्थ डेस्क. हममें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे खीर पसंद नहीं होगी। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे दक्षिण भारत में इसे पायसम या पायसा कहा जाता है। इसे कहीं दूध में चावल डालकर बनाया जाता है, कही सेवइयां डालकर तो कुछ लोग इसमें साबूदाना मिलाकर बनाते हैं।


देश के अलग-अलग हिस्सों में खीर को बनाने के मौके भी अलग-अलग होते हैं। कई लोग तीज-त्योहारों पर इसे बनाते हैं। कई मंदिरों में यह प्रसाद के तौर पर बनती है। हिंदू परिवारों में बच्चे के अन्नप्राशन के संस्कार में खीर बनाई जाती है। हवन के दौरान भी दूध, चावल और घी वाली खीर बनाने की परंपरा है। तो मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग मीठी ईद के दिन सेवइयां वाली खीर अनिवार्य रूप से बनाते हैं, जिसमें कई तरह के ड्राय फ्रूट्स डले होते हैं। मुगलों के काल में इसका एक और संशोधित संस्करण सामने आया- फिरनी। इसमें चावल को दूध में अच्छी तरह से फेंटकर सूखे मेवों के साथ पेश किया जाता है।

शतरंज में हराकर तोड़ा राजा का घमंड
खीर या पायसम कैसे अस्तित्व में आई, इसको लेकर कई तरह की रोचक कहानियां मौजूद है। पायसम को लेकर सबसे मजेदार कहानी दक्षिण भारत में मिलती है। मान्यता है कि केरल के अम्बलपुझा(अलप्पुझा) में 16वीं सदी के आसपास एक राजा राज करता था। नाम था देवनारायण तामपुरण। वह शतरंज का चैम्पियन था। उसे कोई हरा नहीं पाता था। उसे इस बात का इतना घमंड था कि एक बार उसने घोषणा कर दी कि शतरंज में उसे जो भी हरा देगा, उसे वह मुंहमांगा ईनाम देगा। भगवान कृष्ण ने उसके इस घमंड को तोड़ने के लिए एक लड़के का वेश धरा और उसे शतरंज की चुनौती दी। अब कृष्ण तो कृष्ण थे। एक बार हराया। फिर दोबारा मौका दिया। दूसरी बार भी हरा दिया। अब राजा के पास कोई चारा नहीं था। उसने कृष्ण के वेश में आए उस बालक से मुंहमांगा ईनाम मांगने को कहा। तब कृष्ण ने कहा कि उन्हें चेस बोर्ड के 64 स्क्वेयर में रखे चावल के दानों के बराबर चावल चाहिए। शर्त यह थी कि हर स्क्वेयर में रखे चावल के दाने अगले स्क्वेयर में दोगुने हो जाएंगे। यानी पहले स्क्वेयर में एक दाना तो दूसरे स्क्वेयर में दो दाने, तीसरे स्क्वेयर में चार दाने, चौथे स्क्वेयर में 8 दाने, पांचवे स्क्वेयर में 16 दाने। ऐसे ही यह क्रम चलता रहेगा।

राजा ने बगैर सोचे-समझे कृष्ण की यह मांग मान ली। लेकिन यह चावल इतना हो गया कि राजा का पूरा भंडार खाली हो गया। आस-पड़ोस से चावल मंगाए, लेकिन तब भी पूर्ति नहीं हो पाई। राजा घबरा गया। तब कृष्ण असली रूप में आए। उन्हें देखकर राजा ने अपने घमंड के लिए माफी मांगी। तब कृष्ण ने उनसे कहा कि वे उनकी मांग को किस्तों में पूरी कर सकते हैं। इसके बाद वहां कृष्ण का मंदिर बनाया गया और हर दिन पायसम(खीर) का प्रसाद चढ़ाया जाने लगा। यह परंपरा आज भी जारी है।

वैसे खीर का कोई लिखित इतिहास नहीं है। बस इसको लेकर तरह-तरह की मान्यताएं ही है। एक मान्यता ओडिसाा के पुरी मंदिर से भी जुड़ी है। माना जाता है कि करीब दो हजार साल पहले भगवान जगन्नाथ को खुश करने के लिए खीर बनाई गई थी। और तभी से खीर बनाई जा रही है।



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food history by chef harpal singh sokhi- story of kheer/paysam

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10 साल तक की बच्चियों के लिए खुले ब्यूटी पार्लर, लोग विरोध कर रहे


लाइफस्टाइल डेस्क. दुनिया की ब्यूटी कैपिटल कहे जाने वाले साउथ कोरिया में कॉस्मेटिक कंपनियां टर्नओवर बढ़ाने के लिए अब बच्चों को निशाना बना रही हैं। खासतौर पर 4 से 10 साल की उम्र की बच्चियाें के लिए जानी मानी कॉस्मेटिक कंपनियों ने ब्यूटी प्रोडक्ट बनाने के साथ स्पा की शुरुआत कर दी है। इस नए ट्रेंड से छोटी उम्र की बच्चियां आकर्षित हो रही हैं लेकिन लोग विरोध जता रहे हैं। उनका कहना है कि खूबसूरती के प्रति दीवानगी के कारण बच्चियां बचपन खो रही हैं और उनमें जल्द बड़ा दिखने की चाहत बढ़ रही है।

  1. बच्चियों की खूबसूरती को ‘के-ब्यूटी’ यानी किंडरगार्टेन ब्यूटी कहा जाता है। साउथ कोरिया में बच्चियों में खूबसूरत दिखने की दीवानगी इस कदर बढ़ रही है कि वे अपने यूट्यूब चैनल पर मेकअप ट्रिक शेयर कर रही हैं। वे बता रही हैं कि प्रायमरी स्कूलों में जाने वाली बच्चियों का मेकअप प्लान कैसा होना चाहिए? इसके अलावा नए प्रोडक्ट को वीडियो में प्रमोट भी कर रही हैं।

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    बच्चों के लिए ब्यूटी प्रोडक्ट बनाने वाली शुशु कॉस्मेटिक कंपनी ने साउथ कोरिया में 2013 में कारोबार की शुरुआत की थी। वर्तमान में कंपनी के 13 बड़े स्टोर हैं जो बच्चों के लिए हेल्दी कॉस्मेटिक उपलब्ध कराने का दावा करते हैं। कॉस्मेटिक प्रोडक्ट के तहत पानी में घुलने वाली नेल पॉलिश, नॉन-टाॅक्सिक लिप कलर, फैंसी गर्ल साबुन, बकरी के दूध से बने शैम्पू जैसे कई उत्पाद शामिल हैं। इनकी पैकिंग से लेकर नाम तक बच्चों को लुभाते हैं और पैकिंग पर स्लोगन लिखा रहता है, “मैं बच्ची नहीं हूं”।

    • खासकर 4 से 10 साल की उम्र की बच्चियों के लिए खोले गए स्पा में उन्हें फुट बाथ, मसाज, फेस मास्क, मेकअप और मेनीक्योर जैसी सर्विसेज उपलब्ध कराई जाती हैं। इसमें 1700 से 2500 रुपए तक खर्च आता है। बच्चों के लिए सियोल में प्रीपरा किडस कैफे बनाया गया है, जहां 4 से 9 साल की बच्चियां अपने फेवरेट कार्टून कैरेक्टर की तरह तैयार होती हैं। स्पा लेने के साथ मेकअप करती हैं। यहां शॉपिंग करने के बाद उनकी कैटवॉक होती और एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में गानों पर डांस भी करती हैं।

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      फ्रीलांस मेकअप आर्टिस्ट सियो गारम इसका विरोध करती हैं और कहती हैं कि मैं ऐसे क्लाइंट को सर्विसेस देने से मना करती हूं जो बच्चों का मेकअप करने के लिए कहते हैं। सियो ने फेसबुक पर लोगों से अनुरोध करते हुए लिखा है कि कृपया लाल लिपिस्टिक और कर्ली बालों के साथ बच्चों की फोटो का इस्तेमाल करना बंद करें।

    • सियोल की कोनकुक युनिवर्सिटी की प्रोफेसर यून का कहना है कि खूबसूरत कार्टून कैरेक्टर की तरह सिर से लेकर पैर तक छोटी बच्चियों का मेकअप किया जाता है। धीरे-धीरे बच्चियां उनकी तरह दिखने की कोशिश करने लगती हैं। इससे लड़कियों में संदेश जाता है कि उनकी सफलता सिर्फ खूबसूरती से जुड़ी हुई है।

    • साउथ कोरिया के ब्यूटी इंडस्ट्री के एक्सपर्ट ली हवाजुन का कहना है कि कॉस्मेटिक कंपनियां बच्चों को भी एक उपभोक्ता के तौर पर देख रही हैं और इंडस्ट्री तेजी से विस्तार कर रही हैं। ब्यूटी कंपनियों का फोकस अब बच्चों की मदद से उपभोक्ताओं को बढ़ाना है। हालांकि बच्चों के कारण उन्हें विरोध न झेलना पड़े इसके लिए कंपनियां खास रणनीति बनाकर काम कर रही हैं।

    • शुंगशिन वुमन यूनिवर्सिटी के ब्यूटी स्टडीज के प्रोफेसर किम जू-डक के मुताबिक, इस ट्रेंड एक बड़ा कारण हर तरफ बच्चों के मेकअप वाली तस्वीरों का दिखाया जाना भी है। प्रोफेसर किम ने 2016 में प्राथमिक विद्यालय की 288 बच्चियों पर सर्वे किया। उन्होंने पाया 42 फीसदी बच्चियां मेकअप करके आई थीं। उनका कहना है कि आंकड़ा बहुत तेजी से बढ़ा है।

    • 6 साल की बच्ची की मां क्वों जी हयूं हाल ही में प्रीपरा किडस कैफे गईं थीं। उनका कहना है कि यहां का माहौल बच्चों को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है और उनके दिमाग पर गहरा प्रभाव छोड़ता है, जहां बच्चे खुद को बड़ा महसूस करते हैं। लेकिन मैंने अपनी बेटी को इससे बहुत अधिक प्रभावित नहीं होने दिया।



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        South Koreas K beauty companies aimed at children opened spas and parlors for children 4-10 years

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    रोजाना कच्चा प्याज और लहसुन खाएं, बड़ी आंत के कैंसर का खतरा 79 फीसदी कम होगा


    हेल्थ डेस्क. चाइना मेडिकल यूनिवर्सिटी में हुए शोध के मुताबिक, प्याज और लहसुन बड़ी आंत के कैंसर का खतरा घटाते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि उबालकर खाने पर इसमें मौजूद पोषक तत्व और फायदेमंद केमिकल खत्म हो जाते हैं, इसलिए जरूरी है कि सिर्फ ताजा कटा प्याज और लहसुन खाएं।

    1. 1600 से अधिक महिलाओं और पुरुषों पर शोध किया गया। परिणाम के तौर पर सामने में आया कि इनमें 79 फीसदी तक बड़ी आंत के कैंसर होने का खतरा कम हो गया।

    2. इन सब्जियों में मौजूद बायोएक्टिव कंपाउंड्स (फ्लेवेनॉल्स, ऑर्गेनोसल्फर) पाए जाते हैं जो एंटी-इंफ्लेमेट्री होते हैं। एक अन्य रिसर्च के मुताबिक, ये बायोएक्टिव कंपाउंड्स ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर का खतरा भी कम करते हैं।

    3. शोधकर्ता डॉ. ली के मुताबिक, जितना ज्यादा डाइट में इन सब्जियों की मात्रा बढ़ाई जाती है उनका ही ऐसी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। शोध के मुताबिक, सालभर में कम से कम 15 किलो प्याज और लहसुन कैंसर की आशंका को घटाता है। एक दिन में करीब एक से डेढ़ प्याज खाया जा सकता है।

    4. एशिया पेसिफिक जर्नल ऑफ क्लीनिकल रिसर्च पत्रिका में प्रकाशित शोध के अनुसार,इसमें 833 बड़ी आंत के कैंसर से जूझ रहे मरीजों के खानपान से जुड़ी जानकारियों को भी शामिल किया गया है। हर साल ब्रिटेन के 42 हजार लोगों को बड़ी आंत का कैंसर होता है और 16 हजार से अधिक लोगों की मौत हो जाती है।



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        fresh onions garlic and leeks cuts risk of bowel cancer say Chinese medical university research

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    पीजीआई में 2 दिन के बच्चे की रोबोटिक सर्जरी


    चंडीगढ़.पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआई) ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। पीजीआई ने दो दिन के बच्चे का रोबोटिक सर्जरी की है। यह इलाज कर न सिर्फ मासूम को नई जिंदगी दी है, बल्कि संस्थान का नाम पूरी दुनिया में चमका दिया है। दो दिन के इस नवजात बच्चे की फूड पाइप नहीं थी और वह फीड भी नहीं ले पा रहा था। पीजीआई के पीडियाट्रिक्स सर्जंस ने बच्चे का रोबोटिक सर्जरी के जरिए इलाज किया। ऐसा करने वाला पीजीआई एशिया का पहला अस्पताल बन गया है।

    दो दिन पहले सेक्टर-16 के गवर्नमेंट मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में बच्चे का जन्म हुआ था। लेकिन जन्म के समय से ही उसकी फूड पाइप नहीं थी और उसका वजन महज ढाई किलो था। सेक्टर-16 हॉस्पिटल से बच्चे को पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक्स सेंटर में रेफर कर दिया गया।

    पीजीआई डॉक्टरों के मुताबिक बच्चे की हालत गंभीर थी और उसकी सर्जरी की जानी थी। पीजीआई में अक्सर ऐसे केस आते रहते हैं और इस स्थिति में जन्म के दो-तीन दिन के भीतर ही फूड पाइप को रीकंस्ट्रक्ट किया जाता है। आमतौर पर ऐसे केस में ओपन और लैप्रोस्कॉपिक सर्जरी की जाती है, लेकिन पीजीआई में पहली बार रोबोटिक सर्जरी का इस्तेमाल किया। पीजीआई की ये पहल सफल रही और बच्चा बिल्कुल स्वस्थ हालत में घर भी भेज दिया गया।

    बच्चे के पिता सिक्योरिटी गार्ड, डॉक्टरों ने फ्री में किया ट्रीटमेंट : पीजीआई में पहली बार इस सर्जरी को अंजाम देने वाले डॉक्टरों की टीम को डॉ. रवि कनौजिया ने लीड किया। उनके साथ एनेस्थेटिस्ट प्रो. नीरजा भारद्वाज भी थीं। उन्हें डॉ. अनुपदीप, डॉ. स्वप्निल, डॉ. मोनिका और पीडियाट्रिक्स सर्जरी डिपार्टमेंट के हेड प्रो. राम समुझ ने सहयोग दिया। सर्जरी के बाद बच्चे की देखरेख न्योनेटोलॉजी टीम के डॉ. सूर्या और प्रो. प्रवीन कुमार व उनकी टीम ने की। पीजीआई प्रशासन का कहना है कि इस तरह की एडवांस वर्ल्ड क्लास हेल्थ फैसिलिटी रीजन के गरीब लोगों को भी मुहैया करवाई जा रही है। इस बच्चे के पिता सिक्योरिटी गार्ड हैं और उनके बच्चे को फ्री ट्रीटमेंट दिया गया।



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    robotic surgery 2-day old child in PGI

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    बच्चियों के लिए ब्यूटी पार्लर खुलवाने पर कॉस्मेटिक कंपनियों का विरोध


    • दक्षिण कोरिया में कॉस्मेटिक कंपनियों ने टर्नओवर बढ़ाने के लिए 4 से 10 साल की बच्चियों के ब्यूटी प्रोडक्ट बनाने के साथ स्पा खोले हैं।
    • हालांकि, कई लोगों ने इसका विरोध जताया है। उनका कहना है कि खूबसूरती के प्रति दीवानगी के कारण लड़कियां जल्द बड़ा दिखना चाहती हैं।


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    South Korean beauty product companies made products for 4-10 years old girls

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    दर्द और दौरों से जूझ रही 31 साल की महिला को खून चूसने वाले कीड़े से हुई थी बीमारी


    हेल्थ डेस्क. 31 साल की लौरा मैकलिओड्स गंभीर लाइम डिजीज से जूझ रही हैं। इसका असर उनके पूरे शरीर पर दौरे, तेज दर्द और घटती याद्दश्त के रूप में दिख रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि यह बीमारी खून चूसने वाले कीड़े के कारण हुई है जिसका पता सेंटर कंट्रोल फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन भी पूरी तरह से नहीं लगा पाया है। एंटीबायोटिक समेत कई तरह के ट्रीटमेंट के बाद भी फायदा नहीं हुआ और हालत बिगड़ रही है। लौरा अब जर्मनी जाकर खतरनाक हीट थैरेपी कराना चाहती हैं जिसमें शरीर को 41 डिग्री तापमान पर रखा जाता है। इसमें करीब 28 लाख 64 हजार रुपए का खर्च आता है।

      • अमेरिका की लौरा मैकलिओड्स को बीमारी की जानकारी 2016 में मिली जब एक प्रेजेंटेशन के दौरान दौरा पड़ा। उन्हें याद नहीं कि कब कीड़े ने काटा था लेकिन लक्षण दिखने पर जांच में बीमारी की बात सामने आई।
      • कुछ विवादित अमेरिकन विशेषज्ञ मरीजों को ओजोन इंजेक्शन, मधुमक्खी का डंक और ब्लड क्लीनिंग थैरेपी देकर इलाज का दावा करते हैं। लौरा इलाज के ये सारे तरीके भी आजमा चुकी हैं लेकिन राहत नहीं मिल पाई है।
      • बीमारी का इलाज ढूंढने के लिए वह सोशल मीडिया पर तस्वीरें पोस्ट करती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अगर इस बीमारी को शुरुआती अवस्था में ही पहचान लिया जाए तो एंटीबायोटिक की मदद से ठीक किया जा सकता है।
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      पिछले तीन सालों से एंटीबायोटिक समेत दर्जनों दवाओं का डोज दिया जा रहा है, जिसकी तस्वीर लौरा ने सोशल मीडिया पर पोस्ट की है

      • यह बैक्टीरिया बोरेलिया बुर्गडोरफेरी से फैलने वाली बीमारी है। जो इंसानों में खून चूसने वाले संक्रमित परजीवी कीड़ों से फैलती है। इसके लक्षण 3-30 दिनों के अंदर दिखने शुरू हो जाते हैं। बीमारी कितनी गंभीर है यह संक्रमित कीड़े की प्रजाति निर्भर करता है। 48 घंटे के अंदर एंटीबायोटिक दी जाएं तो मरीज को संक्रमण से मुक्त किया जा सकता है।
      • वेबसाइट वेबएमडी के मुताबिक, अमेरिका के कई राज्यों में 2015-17 के बीच लाइम डिजीज के काफी मामले देखे गए हैं। सेंटर कंट्रोल फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, 2004 में इसके मामले 19,804 थे जो 2016 तक बढ़कर 36,429 हो गए थे।
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      बीमारी की शुरुआती अवस्था में दौरा पड़ने का कारण लौरा ऑफिस में कामकाज के स्ट्रेस को मानती थीं

      • टुलेन यूनिविर्सटी की बैक्टीरियोलॉजी विभाग की प्रोफेसर मोनिका मोरिकी के मुताबिक, संक्रमण के बाद कुछ मरीजों के बर्ताव में बदलाव आता है तो कुछ के शरीर पर चकत्ते से दिखाई देते हैं। दौरे पड़ना और याद्दाश्त में गिरावट भी आम लक्षण हैं।
      • खून चूसने वाले कीड़े के काटने बैक्टीरिया इंसान के ब्लड में अधिक समय तक नहीं रहता। रक्त के माध्यम से पूरे शरीर में फैल जाता है और हृदय या मस्तिष्क के कोलेजन टिश्यू में छिप जाता है। इसलिए ब्लड टेस्ट के माध्यम से पता लगाना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि इससे संक्रमित अलग-अलग इंसानों में लक्षण भी अलग-अलग रूप में दिखते हैं।
      • लौरा के मस्तिष्क में कई बदलाव देखने को मिल रहे हैं। जैसे उसकी याद्दाश्त कम हो रही है। लौरा का कहना है कि साधारण सी चीजों को पढ़ने में मुझे दिक्कत होती है। मैं शब्दों को भूल जाती हूं। कई बार कार की चाबी मेरे हाथ में होती है लेकिन उसे ढूंढती रहती हूं।


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        Woman suffering chronic Lyme disease

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    डिप्रेशन और बढ़ती उम्र के कारण घटने वाली याददाश्त वापस लाने की दवा तैयार


    हेल्थ डेस्क. वैज्ञानिकों ने ऐसी दवा बनाने का दावा किया है जो बढ़ती उम्र और डिप्रेशन के कारण घट चुकी याददाश्त वापस लाती है। टोरंटो के एडिक्शन एंड मेंटल हेल्थ सेंटर ने यह दवा तैयार की है। वैज्ञानिकों ने इसका ट्रायल बढ़ती उम्र के चूहों पर किया है। शोध में उनकी याद्दश्त में तेजी आई है। जल्द ही इंसानों पर ट्रायल किया जाएगा। वाशिंगटन में हुई अमेरिकन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइंस की बैठक में इसकी जानकारी दी गई।

    1. मुख्य शोधकर्ता डॉ. एटीन सिबली के मुताबिक, वर्तमान में डिप्रेशन और मेंटल डिसऑर्डर के कारण कम हुई याददाश्त वापस लाने वाली कोई दवा नहीं है। नई दवा बेंजोडायजेफीन ड्रग का एक प्रकार है। जिसे एंटी-एंजायटी और डिप्रेशन ड्रग वेलियम के तौर पर जाना जाता है। वैज्ञानिकों ने वेलियम ड्रग को और बेहतर बनाकर दवा के रूप में पेश किया है।

    2. डॉ. एटीन का कहना है कि नई दवा से ब्रेन में कोशिकाएं दोबारा पनपने लगती हैं जैसे किसी युवा के दिमाग में होती हैं। रिसर्च के दौरान स्ट्रेस होने पर चूहे की याददाश्त में कमी आने पर नई दवा दी गई। करीब 30 मिनट के बाद चूहे की याददाश्त बढ़ी और प्रयोग के दौरान वह सही पहेली को पहचान पाया। एक दूसरे प्रयोग में उम्रदराज चूहे को दवा दी गई। कुछ समय बाद उसकी परफॉर्मेंस में 80% इजाफा हुआ।

    3. वैज्ञनिकों ने चूहे में ऐसे रसायनों को पहचाना है जो मस्तिष्क तक संदेश पहुंचाने का काम करते हैं। नए केमिकल कंपाउंड की मदद से याददाश्त को घटाने वाली ब्रेन की कमजोर कोशिकाओं को पहचानकर इलाज किया जाएगा।डॉ. एटीन के मुताबिक, 55-60 साल की उम्र में लोग छोटी-छोटी बातेंभूलने लगते हैं उनके लिए यह दवा काफी फायदेमंद होगी। रोजाना एक टेबलेट लेना होगा।



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        New drug reverses memory loss from depression and aging set for human trials

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    डिप्रेशन-बढ़ती उम्र के कारण घटने वाली याद्दाश्त वापस लाने की दवा तैयार


    • टोरंटो के एडिक्शन एंड मेंटल हेल्थ सेंटर ने यह दवा तैयार की। वैज्ञानिकों ने इसका ट्रायल बढ़ती उम्र के चूहों पर किया। शोध में उनकी याद्दाश्त में तेजी देखी गई।
    • एक वैज्ञानिक ने बताया कि नई दवा से ब्रेन में कोशिकाएं दोबारा पनपने लगती हैं। दवा दिए जाने के 30 मिनट बाद ही चूहा सही पहेली को पहचानने लगा।


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    Scientists made medicine that increases memory of aged people, to test on humans soon

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    25 साल की महिला ने नॉर्मल डिलीवरी से 6 लड़कियों समेत 7 बच्चों को जन्म दिया


    हेल्थ डेस्क. पूर्वी इराक के दियाली प्रांत में 25 साल की महिला ने 7 बच्चों को जन्म दिया है। यह इस देश में पहला ऐसा मामला है, जब नॉर्मल डिलीवरी से 6 लड़कियां और 1 लड़के का जन्म हुआ है। बच्चे और मां दोनों स्वस्थ हैं।

    1. दुनिया का पहला ऐसा मामला 1997 में अमेरिका के लोआ में देखा गया था, जहां महिला ने सिजेरियन के बाद 7 बच्चों को जन्म दिया था। इस मामले की खबर मिलने पर तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने उस परिवार से व्यक्तिगत रूप से मिलकर बधाई दी थी। क्लिंटन ने इस दंपती को घर और आर्थिक मदद देने के साथ उनके सभी बच्चों को स्कॉलरशिप भी दी थी।

    2. इराक के इस ताजा मामले से पहले ऐसा केस लेबनान में 2013 में सामने आया था। लेबनान के जॉर्ज यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में एक महिला ने 3 लड़के और 3 लड़कियों को जन्म दिया था। इन बच्चों को सेक्सट्यूपलेट्स कहते हैं।

    3. इराक के इस केस में सात बच्चों के पिता बने यूसुफ फदल कहते हैं कि बच्चों की देखभाल करने के लिए परिवार में 10 लोग हैं। अब हम और बच्चे नहीं चाहते। पति-पत्नी पर सिलेक्टिव रिडक्शन (भ्रूण की संख्या कम करना) के आरोप भी लगे थे, लेकिन दोनों ने इसे खारिज किया है।

    4. प्रेग्नेंसी के दौरान जब गर्भ में एक से ज्यादा भ्रूण विकसित हो रहे होते हैं तो भ्रूण की संख्या कम की जाती है। इसे मल्टीफीटल रिडक्शन भी कहते हैं। यह दो दिन की प्रक्रिया होती है। पहले दिन यह तय किया जाता है कि किस भ्रूण हो हटाया जाना है।

    5. दूसरे दिन अल्ट्रासाउंड की मदद से चुने हुए भ्रूण के हृदय में पोटेशियम क्लोराइड का घोल इंजेक्ट किया जाता है। गर्भ में कई भ्रूण होने पर मां को प्रेग्नेंसी के खतरों से बचाने के लिए ऐसा किया जाता है।



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        Iraqi mother gives birth NATURALLY to six girls and one boy countrys first SEPTUPLET pregnancy
        Iraqi mother gives birth NATURALLY to six girls and one boy countrys first SEPTUPLET pregnancy

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    ध्वनि तरंगों से तोड़ेंगे धमनियों का ब्लॉकेज, ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने बनाई डिवाइस


    हेल्थ डेस्क. ब्लॉक हुई धमनियों का इलाज ध्वनि तरंगों से किया जा सकेगा। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने एक ट्यूब जैसी डिवाइस विकसित की है जो ध्वनि तरंगें पैदा करती है और धमनियों में जमा कैल्शियम तोड़ती है। पहले चरण का ट्रायल सफल रहा है। दूसरे चरण में यूरोप के 15 केंद्रों के 120 मरीजों पर इसका परीक्षण चल रहा है। वैज्ञानिकों ने इसे कोरोनरी लिथोप्लास्टी सिस्टम नाम दिया है।

    1. शोधकर्ताओं के मुताबिक, मरीज को लोकल एनेस्थीसिया देकर बलून के साथ डिवाइस को कैथेटर के रूप में ब्लॉक हुई धमनी तक पहुंचाते हैं। ब्लॉकेज तक पहुंचने के बाद बलून फूल जाता है और सेलाइन सॉल्यूशन रिलीज करता है। ऐसी स्थिति में डिवाइस एक्टिव हो जाती है और बलून की मदद से ध्वनि तरंगें रिलीज करने लगती है। ये तरंगे कैल्शियम के ब्लॉकेज को धीरे-धीरे तोड़ती हैं। जरूरत पड़ने पर सर्जरी के दौरान स्टेंट लगाया जाता है।

    2. JACC जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, इस डिवाइस की मदद से 30 मरीजों का इलाज किया जा चुका है। 90 फीसदी मामले सफल रहे हैं। वर्तमान में दूसरा ट्रायल ऑक्सफोर्ड के जॉन रेडक्लिफ हॉस्पिटल और लंदन के किंग्स कॉलेज में किया जा रहा है।

    3. शोधकर्ताओं के मुताबिक, ज्यादातर हृदय रोगों का कारण ब्लॉकेज के कारण धमनियों का सख्त हो जाना है। इससे हृदय का रक्तसंचार बाधित होता है। सीने में दर्द, धमनियों के डैमेज होने, ब्लड क्लॉट और हार्ट अटैक का कारण बनता है। सर्जरी के लिए स्टेंट या बलून का प्रयोग किया जाता है। लेकिन हर मामले में ऐसा करना खतरनाक रहता है।

    4. शोधकर्ता और कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. पुनीत रामरखा का कहना है कि कई मरीजों में कैल्शियम अधिक इकट्ठा हो जाता है। ऐसे मरीजों में न तो आसानी से कैल्शियम टूट पाता है और न ही बलून फूल पाता है। धमनियों के डैमेज होना का खतरा भी बढ़ जाता है। लेकिन शॉकवेव टेक्नोलॉजी से इसका इलाज संभव है।



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        Soundwaves can treat heart disease by blasting open blocked arteries

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    बच्ची का दिल शरीर के बाहर धड़कता था, 14 महीने इलाज के बाद बचाया गया


    हेल्थ डेस्क.ब्रिटेन में एक ऐसी बच्ची का जन्म हुआ है, जिसका दिल शरीर से बाहर था। डॉक्टर ने इस जन्मजात बीमारी को एक्टोपिया कॉर्डिस बताया है। करीब 14 महीने के संघर्ष और इलाज के बाद बच्ची अबस्वस्थ है। अस्पताल प्रशासन ने पेरेंट्स को घर ले जाने की अनुमति दे दी है। भारत में ऐसा मामला 2009 में आया था। एम्सदिल्ली के डॉक्टर्सने 10दिन के शिशु का सफल ऑपरेशन किया था।

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      • ब्रिटेन का यह पहला मामला है, जब एक बच्चे को जन्मजात एक्टोपिया कॉर्डिस होने के बाद बचाया जा सका है।

      • गर्भावस्था के नौवें महीने में जांच के दौरान नाओमी फिंडले को बच्चे में बीमारी की बात पता चली थी। स्कैनिंग के दौरान बच्ची का हृदय शरीर के बाहर विकसित हो रहा था। ब्रिटेन के ईस्ट मिडलैंड्स कंजेनिटल हार्ट सेंटर में 14 करीब महीनों के दौरान बच्ची की कई सर्जरी हुईं।

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      इक्टोपिया कॉर्डिस एक जन्मजात बीमारी है, जिसमें हृदय जन्म के समय अपने नियत जगह पर न होकर छाती के बाहर उभर आता है या उसके आसपास के हिस्सों में पाया जाता है। साइंस अब तक इसके होने की वजह का पता नहीं लगा पाया है। सर्जरी की मदद से बच्चे को बचाने की कोशिश की जाती है। हालांकि, ज्यादातर मामलों में जन्म के समय ही बच्चे की मौत हो जाती है।

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      चिल्ड्रेन इंटेंसिव केयर के कंसल्टेंट पैट्रिक डेविस के मुताबिक, विशेषज्ञों ने बच्चे को सुरक्षित रखने के लिए एक खास तरह की शील्ड तैयार की थी। इलाज के लिए बड़ी टीम तैयार की गई थी, जिसमें फिजियोथैरेपिस्ट, प्ले स्पेशलिस्ट, नर्स और एडमिन टीम ने अहम रोल अदा किया है। बच्ची अब सामान्य जीवन जी सकती है। इलाज के अगले चरण में एक्सपर्ट शरीर को सीने की ओर से सपोर्ट देने की वाली हड्डी को तैयार करने की कोशिश की जा रही है।

    4. मां नाओमी का कहना है कि लंबे वक्त के बाद बच्ची घर आई है। यह हमारे लिए बेहद यादगार लम्हा है। उसने जीना शुरू कर दिया है। बच्ची के पिता वेनेलोप ने दिन-रात देखभाल के लिए सात लोगों की टीम तैनात कीहै।



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        Miracle baby born with her heart outside her chest finally able to return home
        Miracle baby born with her heart outside her chest finally able to return home

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    शरीर से बाहर धड़कता है बच्ची का दिल, 14 महीने इलाज के बाद स्वस्थ


    • ब्रिटेन के डॉक्टर ने इस जन्मजात बीमारी को एक्टोपिया कॉर्डिस नाम दिया है। ब्रिटिश महिला की सिजेरियन डिलीवरी 2017 में हुई थी। डॉक्टर्स ने एक साल बाद बच्ची को घर ले जाने की अनुमति दी।
    • ब्रिटेन में इस तरह का पहला मामला है।भारत में 2009 में ऐसे ही शिशु कादिल्ली एम्स के विशेषज्ञों ने सफल ऑपरेशन किया था। उसकी उम्र महज 10 दिन थी।


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    Miracle baby born with her heart outside her chest finally able to return home

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    अमेरिका-कनाडा में जॉम्बी डियर बीमारी से पागल हो रहे हिरण, इंसानों में भी फैलने का खतरा


    हेल्थ डेस्क. अमेरिका मेंहिरणों मेंजॉम्बी डियर नाम की बीमारी तेजी से फैल रही है। अमेरिकी संघीय एजेंसी ‘सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन’ के मुताबिक, यहां के 24 राज्यों और कनाडा के दोप्रांतों में यह बीमारी फैल चुकी है।इंसानों में भी इसके फैलने काखतरा है। हिरण प्रजाति के जानवरों में होने वाली इस बीमारी के कारण वे आक्रामक हो जाते हैं और अजीब व्यवहार करने लगते हैं। पिछले साल कनाडा में इसके मामले सामने आए थे और अथॉरिटी को गाइडलाइन जारी करनी पड़ी थीं।

      • जॉम्बी डियर को क्रॉनिक वेस्टिंग डिसीज भी कहते हैं। यह लाइलाज है। दांतों का किटकिटाना, वजन तेजी से कम होना, मुंह में ज्यादा लार बनना, सिर अक्सर झुका रहना और आक्रामक होकर इधर-उधर भागना इसके लक्षण हैं।
      • मस्तिष्क में संक्रमण होने के कारण सीधा असर दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड पर होता है। माना जाता है कि इसका कारण शरीर में संक्रमित प्रोटीन का पहुंचना है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे इंसान में भी संक्रमण फैलने का खतरा है।

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      • मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल ऑस्टरहोल्म के मुताबिक, संक्रमित मांस खाने से यह बीमारी हो सकतीहै। मिनेसोटा में भी जॉम्बी डियर बीमारी महामारी के रूप ले चुकी है।
      • यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है हिरणोंमें इस बीमारी के लक्षण तुरंत नजर नहीं आते। ऐसे में इन्हें स्वस्थ्य समझकर भोजना का हिस्सा बनाए जाने का खतरा रहता है।
    1. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, यहां हर चार में से एक हिरण संक्रमित है और ये आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। मिनेसोटा यूनिवर्सिटी की एक खास टीम इसे रोकने के लिए एक डिवाइस विकसित कर रही है जिसकी मदद से इनकी जांच की जा सके। यह डिवाइस जिंदा और मृत दोनों तरह से जानवरों की जांच करने में कारगर होगी।



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        Zombie deer brain disease spreads to 24 US states and Canada

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