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छोटे नवजातों के लिए मालिश कितनी जरूरी है, यहां जानें


बच्चों की हड्डियों व मांसपेशियों की मजबूती और विकास के लिए मां के दूध के अलावा शरीर पर की जाने वाली तेल मालिश भी जरूरी होती है। वैसे तो हर मौसम में यह लाभदायक होती है लेकिन सर्दियों में इसकी जरूरत अन्य मौसम की तुलना में अधिक होती है। क्योंकि इस दौरान त्वचा शुष्क हो जाती है। साथ ही मांसपेशियों को लचीला बने रहने व जोड़ों की मजबूती के लिए अतिरिक्त पोषण की जरूरत होती है। जानते हैं बच्चों की तेल मालिश से जुड़े विभिन्न तथ्य-

ये तेल उपयोगी
नारियल, सरसों, जैतून, तिल, बादाम, सूरजमुखी आदि के तेल बहुगुणी होते हैं। इनके अलावा कुछ लोग देसी घी और मक्खन से भी मालिश करते हैं। इनमें एंटीबायोटिक, एंटीबैक्टीरियल, विटामिन-ए व ई जैसे गुण पाए जाते हैं।

लचीला व ऊर्जावान शरीर
इससे शरीर मजबूत होने के साथ त्वचा में नमी बनी रहती है। शरीर में लचीलापन आता है व ऊर्जा मिलती है। मालिश से शरीर का विकास करने वाले जरूरी हार्मोन स्त्रावित होते हैं। इन तेलों में मौजूद एंटीबायोटिक, एंटीफंगल, एंटीबैक्टीरियल और विटामिन-ए व ई जैसे गुण रोगों से बचाव करने के साथ रक्तसंचार दुरुस्त कर अंगों की जरूरत को पूरा करने में मदद करते हैं। इस दौरान मां के स्पर्श से बच्चे का भावनात्मक रूप से जुड़ाव बढ़ता है।

एक साल तक मालिश जरूरी
तेल मालिश कितनी भी उम्र तक की जा सकती है लेकिन जन्म से लेकर एक साल तक का समय शरीर के विकास व हड्डियों की मजबूती के लिहाज से अहम होता है। ध्यान रखें ठंडी हवा या खुले वातावरण के बजाय कमरे में २६-२७ सेल्सियस के तापमान यानी गर्म तापमान में मालिश करें।

ध्यान रखें
मालिश करते समय हल्के दबाव के साथ हाथों से थोड़ा अधिक प्रेशर भी दें। इसके अलावा वातावरण के अनुरूप ही मालिश करें। कुछ मांएं मालिश के बाद बच्चे के हाथ-पैरों को इस तरह बांध देती है जैसे कि वह गर्भ में होता है। उनका तर्क रहता है कि वह उस स्थिति में आराम से सो जाएगा, हड्डियां मजबूत होंगी व मांसपेशियों में लचीलापन आएगा। ऐसा करना उन मामलों में सही है जिसमें बच्चा सामान्य स्थिति में पैदा हुआ हो। लेकिन बच्चा कमजोर या जन्मजात विकृति के साथ पैदा हुआ हो तो इससे दिक्कत बढ़ सकती है।

धूप से मिलती विटामिन-डी की खुराक
सर्दियों में धूप में लिटाकर बच्चे की मालिश करने से उसे विटामिन-डी व अन्य जरूरी पोषण भी मिलता है। इससे बच्चा हष्ट-पुष्ट रहता है। यदि धूप हल्की हो व हवा भी चल रही हो तो खुले में मालिश न करें। बच्चा लगातार रोए, चिड़चिड़ाए या किसी रोग से पीडि़त हो तो मालिश न करें। मालिश के दौरान यदि हर बार त्वचा पर लाल दाने उभरें तो डॉक्टरी सलाह जरूर लें। हो सकता है बच्चे को विशेष तेल से एलर्जी हो या किसी अंदरुनी चोट के कारण वह रो रहा हो।

डॉ. अशोक गुप्ता, अधीक्षक व शिशु रोग विशेषज्ञ, जे. के. लोन अस्पताल, जयपुर


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बच्चे के टिफिन में न रखें कटे हुए फल 


गर्मी के इस मौसम में 1-5 साल के बच्चों में उल्टी व दस्त की शिकायत ज्यादा होने लगती है। ऐसा ज्यादातर फूड पॉइजनिंग के कारण होता है, विस्तार से जानते हैं इसकी वजह और सावधानियों के बारे में।

ये हैं वजह
गर्मी में खाने-पीने की चीजों में बैक्टीरिया जल्दी पनपते हैं, जिससे फूड पॉइजनिंग होती है। बाजार में बिकने वाली फू्रट चाट या पहले से पड़ा हुआ जूस। इस मौसम में मक्खियां ज्यादा बढ़ जाती हैं, जो गंदगी पर बैठकर खाने को दूषित कर देती हैं। जब हम उस भोजन को खाते हैं, तो कीटाणु हमारे  शरीर में चले जाते हैं। बाजार में बर्फ के गोले या जूस में बर्फ की सिल्ली को तोड़कर प्रयोग किया जाता है, जो साफ पानी से तैयार नहीं की जाती और उसमें ई-कोली नामक कीटाणु पाया जाता है। 

जब इस दूषित बर्फ से तैयार चीजों को बच्चे खाते या पीते हैं, तो रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने की वजह से वे जल्दी बीमार हो जाते हैं। नुकसान है ज्यादा बड़ों की तुलना में बच्चों को दस्त या उल्टी होने पर डिहाइड्रेशन की समस्या ज्यादा हो जाती है।

बच्चे को हमेशा ताजा फल व ताजा खाना खिलाएं। खाने-पीने की चीजों को ढंककर रखें। बच्चे को कुछ भी खिलाने से पहले उनके हाथ जरूर धुलवाएं। बाजार का जूस या बर्फ का गोला आदि बच्चे को ना दें। टिफिन में बच्चे को कटे फल ना दें क्योंकि 4-5 घंटे में इनमें बैक्टीरिया पनपने का डर रहता है। स्कूल के लिए पानी की बोतल घर से भरकर दें।

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कहीं आपके बच्चे में बहरापन तो नहीं?


बच्चा जिस परिवेश में भाषा सुनता है, अपने आप उसी तरह बोलने लगता है। लेकिन यदि उसे सुनाई ही न दे तो स्वरयंत्र दुरुस्त होते हुए भी वह मूक रह जाता है। इन बच्चों को समय रहते सुनाई देने लगे तो वे बोलने लगते हैं। इसके लिए गौर करें कि आपके बच्चे को सुनाई दे रहा है या नहीं।

इलाज : कान की कुछ जंाचों के बाद हिअरिंग एड लगाकर बच्चे को समझने व बोलने का अभ्यास कराया जाता है। यह तरीका कारगर न होने पर कॉक्लीयर इम्प्लांट सर्जरी की जाती है। इसमें कृत्रिम रूप से प्रत्यारोपित उपकरण कान के अंदरुनी भाग कॉक्लीया का काम करता है। 

इन बातों पर ध्यान दें
शुरुआती छह माह में बच्चा तेज शोर की ओर ध्यान न दे, आवाज करने वाले खिलौनों में दिलचस्पी न ले, 6 माह से 15 माह तक माता-पिता की आवाज पर खुश न  हो और न ही कोई प्रतिक्रिया देता हो, सामान्य शब्दों को भी न समझ सके और 1 से 3 साल तक सरल शब्द जैसे मामा, दादा और पापा भी न बोल पाता हो।


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बच्चों के नाखून चबाने की आदत पर नजर रखें


बच्चों में नाखून चबाने की आदत को माता-पिता यह सोचकर नजरअंदाज कर देते हैं कि एक उम्र बाद वह इस आदत को छोड़ देगा। लेकिन ऐसा नहीं है नाखून चबाने के दौरान उसके शरीर में नाखून के जरिए कीटाणु पहुंचते रहते हैं जो संक्रमण, दांतों के घिसने व आगे-पीछे होने का कारण बनते हैं। 

मेडिकली यह हैबिट डिस्ऑर्डर है जिसमें आदत के लंबे समय तक बने रहने से छुड़ाना मुश्किल होता है। कारण: इसकी कोई निश्चित वजह नहीं है। कुछेक मामलों में तनाव के कारण भी बच्चा नाखून चबाता है।

ऐसे छुड़ाएं आदत 
यदि बच्चे में यह आदत लंबे समय तक बनी रहे तो तो धीरे-धीरे इस आदत को छुड़वाएं। सबसे पहले माता-पिता जानने की कोशिश करें कि बच्चा किन स्थितियों में नाखून चबाता है जैसे टीवी देखने या खाली बैठने के दौरान। साथ ही उससे बात कर तनाव के कारण को जानें। बार-बार टोकने के बजाय बच्चे को किसी खेल या काम में व्यस्त रखें। 

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बच्चों के गले में दर्द का कारण हो सकते हैं बैक्टीरिया


अक्सर 5-15 साल के बच्चों को गले में बैक्टीरियल इंफेक्शन की दिक्कत होती है। फेफड़े, लिवर व हृदय की क्रॉनिक बीमारी से पीडि़त बच्चों को भी यह ज्यादा प्रभावित करता है। इसे सोर थ्रॉट या स्ट्रेप थ्रॉट कहते हैं। 

लक्षण : बुखार, गले में दर्द व सूजन प्रमुख हैं। इसके अलावा मरीज को भूख कम लगने, कुछ भी खाने की चीज को निगलने में परेशानी होने के साथ दिक्कतें बढऩे पर सांस लेने में भी तकलीफ होने लगती है। कई बार इस बैक्टीरिया के विरुद्ध काम करने वाले शरीर के एंडीबॉडीज स्वस्थ कोशिकाओं को भी नष्ट करने लगते हैं हृदय के कार्य पर भी असर होता है। इस अवस्था को एक्यूट रुमेटिक फीवर कहते हैं। 

कारण : साफ-सफाई के अभाव के अलावा बैक्टीरिया की वजह से यह होता है। खांसने या छींकने के जरिए यह फैलता है। 
जांच : ब्लड जांच में यदि डब्ल्यूबीसी की संख्या ज्यादा पाई जाए जिसमें भी विशेषकर न्यूरोफिल्स सेल्स ज्यादा हो जाएं तो बैक्टीरियल इंफेक्शन की पुष्टि कर रोग की पहचान की जाती है। 

इलाज : एंटीबायोटिक दवा देते हैं। मरीज को लिक्विड डाइट जैसे जूस, नारियल पानी पीते रहने की सलाह देते हैं। 


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शिशु पर भारी पड़ती मां की बुरी आदतें


कनाडा की टोरंटो यूनिवर्सिटी के शोध के मुताबिक प्रेग्नेंसी में शराब पीना शिशु में फीटल अल्कोहोल स्पेक्ट्रम डिस्ऑर्डर (एफएएसडी) के खतरे को बढ़ाता है। इसको आधार मानकर किए गए 127 शोधों के मुताबिक यह दिक्कत बच्चों में मानसिक व देखने-सुनने की क्षमता, रक्तप्रवाह, पाचन संबंधी गड़बड़ी, श्वसन प्रक्रिया में बाधा, मांसपेशियों और हड्डियों से जुड़े लगभग 428 रोगों के खतरे को बढ़ाती है। जानते हैं मां की कौनसी आदतें बच्चे पर बुरा असर डालती हैं।

अधिक चाय-कॉफी
इन्हें अधिक मात्रा में पीने से कई बार आंवलनाल कमजोर हो जाती है।
असर : इनमें मौजूद कैफीन प्लेसेंटा के जरिए बच्चे के शरीर में पहुंचकर उसके मेटाबॉलिज्म व हार्ट रेट को बढ़ा देते हैं। कई बार इनसे श्वसन तंत्र भी कमजोर हो सकता है।

कोल्डड्रिंक्स
कोल्डड्रिंक्स, भूख को मारती हैं। इन्हें नियमित पीने से अपच की परेशानी होती है। 
असर : इसे अधिक पीने से मोटापा, डायबिटीज, दांत संंबंधी समस्याएं और पोषक तत्त्वों की कमी होने लगती है जो मां व बच्चे के शारीरिक विकास पर असर डालती है।

चॉक-चूना खाने की आदत
कैल्शियम की कमी से कई बार गर्भवती महिला का मिट्टी, चॉक, चूना आदि खाने का मन करता है। धीरे-धीरे स्थिति आदत में बदल जाती है और शरीर आयरन, विटामिन व मिनरल्स को एब्जॉर्ब नहीं कर पाता। 
असर : गर्भस्थ शिशु को जरूरी पोषण नहीं मिल पाता और वह कमजोर पैदा होता है। मां के पेट में कीड़ों की समस्या बच्चे में टायफॉइड, पीलिया का कारण बनती है। 

उपाय : देसी डाइट करें फॉलो
नाश्ता: दलिया, राबड़ी, रोटी-सब्जी, हलवा, पोहा, ढोकला, छाछ, दही, आमरस, शिकंजी, दाल का पानी, सत्तू या सूप लें। 
लंच-डिनर: दही/छाछ, दाल, सब्जी, मक्का/बाजरा/मिस्सी रोटी, अचार, हरा धनिया, पुदीना या इमली की चटनी, गुड़ लें।

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जीका से घबराएं नहीं, मच्छरों से बनाएं दूरी, इन बातों का रखें ध्यान 


कई देश जीका वायरस की चपेट में आ चुके हैं। डब्ल्यू. एच.ओ.भी इस बारे में दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। वैज्ञानिकों का कहना है, जीका वायरस एडीज मच्छरों के काटने से फैलता है। सबसे ज्यादा असर गर्भवती महिलाओं पर होता है और बच्चे में न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर का खतरा पैदा कर सकता है और ब्रेन के विकास पर नकारात्मक असर डालता है। 

पुराना है वायरस
पहली बार युगांडा में 1947 में बंदरों के अंदर इसका वायरस मिला था। जीका के पहले मरीज का मामला 1954 में नाइजीरिया में सामने आया था। धीरे-धीरे यह अफ्रीका, एशिया और प्रशांत द्वीपों में फैलता चला गया। इसके कारण ब्राजील में छोटे सिर व अविकसित दिमाग के बच्चे पैदा हो रहे हैं।

मच्छरों से बनाएं दूरी
इससे बीमारी से बचने के लिए मच्छरों से बचें। गमले, बाल्टी, कूलर में भरा पानी निकाल दें। बुखार, गले में खराश, जोड़ों में दर्द, आंखें लाल होने जैसे लक्षण नजर आने पर जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करें।

क्या हैं लक्षण
जीका वायरस से संक्रमित हर पांच में से एक व्यक्ति में ही इसके लक्षण दिखते हैं। यह वायरस शरीर में हल्का बुखार, त्वचा पर दाग-धब्बे और आंखों में जलन पैदा करता है। मरीज में मांसपेशियों व जोड़ों में दर्द के साथ बेचैनी की शिकायत भी रहती है। जीका वायरस का पता लगाने के लिए पॉलिमीरेज चेन रिएक्शन (पीसीआर) व खून टैस्ट करा सकते हैं। एलोपैथी के अलावा होम्योपैथी व आयुर्वेद में इसका इलाज संभव है।

ऐसे करें बचाव
इसे लडऩे के लिए अब तक इलाज या टीका उपलब्ध नहीं है। अगर आपको इसके लक्षण नजर आएं तो तुरंत डॉक्टर से मिलें। बीच में इलाज न छोड़ें। ज्यादा से ज्यादा पेय पदार्थ लें। तनाव बिल्कुल भी न लें।

रखें सावधानी
जीका वायरस का प्रभाव 2 से 7 दिन बाद दिखता है। इससे बचने के लिए शरीर को ढककर रखें। हल्के रंगों के कपड़े पहनें। सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें। 

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3 साल तक के बच्चों की होनी चाहिए खास टाइट


0-6 माह 
जन्म के समय से छह माह तक सिर्फ ब्रेस्ट फीडिंग कराएं। किसी भी तरह का खाद्य या पेय पदार्थ, यहां तक कि पानी भी न दें।

6-12 माह
छह माह के बाद थोड़ी मात्रा में बच्चे को अनाज, दालें, सब्जियां व फल खिलाएं। भूखे होने के संकेत को समझकर कम से कम 4-5 बार खिलाएं व ब्रेस्ट फीडिंग भी कराएं।

1-2 वर्ष की उम्र
बच्चे को चावल, रोटी, हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, पीले फल और दूध से बने पदार्थ खिलाएं। दिन में कम से कम 5 बार थोड़ा-थोड़ा करके ये आहार दें। खाते समय उसके साथ बैठें और उसे खाने के लिए प्रोत्साहित करें। दो साल की उम्र तक खाने के अलावा उसे फीड भी करवाएं। अगर मुमकिन हो तो इसे आगे भी जारी रखें।

यह भी ध्यान रखें
बच्चा बीमार हो तो भी फीड कराएं। यदि वह सुस्त दिखे तो उसे अधिक भोजन कराएं। फर्क दिखाई न दे तो विशेषज्ञ से संपर्क करें। 

2-3 साल की उम्र
दिन में 5 बार बच्चे को घर का बना खाना खिलाएं। उसे खुद ही खाना सिखाएं और खाते समय उसके साथ बैठें। खाने से पहले हाथ धुलवाएं।

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शिशु को इन चीजों से रखें दूर, जानें ये खास बातें 


घर में नए मेहमान के आने पर माता-पिता वॉकर, फीडिंग बोतल और डाइपर आदि ले लेते हैं। लेकिन इनका प्रयोग शिशु के लिए नुकसानदेह भी हो सकता है। इसके बारे में बता रहे हैं शिशु रोग विशेषज्ञ 

टीथर और चुसनी : 5-6 माह की उम्र में बच्चा हर चीज मुंह में लेना चाहता है। ऐसे में चुसनी व टीथर की ठीक से सफाई न हो पाने सेे इंफेक्शन का डर रहता है। इनकी जगह पर बच्चे को अच्छी क्वालिटी व गहरे रंग के टीथिंग रिंग या प्लास्टिक की चूडिय़ां दे सकते हैं। लेकिन देने से पहले हर बार इन्हें अच्छे से धोएं।

ग्राइप वॉटर : इसके फायदे या नुकसान का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है इसलिए इन्हें न देना ही बेहतर है। 

वॉकर: छोटे बच्चों को वॉकर देने से पूरी तरह बचें। इससे उनका संतुलन बिगड़कर गिरने का डर रहता है साथ ही उसके प्राकृतिक रूप से चलने में बाधा आती है जिससे कई बार वह देर से चलना सीखता है। 

सॉफ्ट टॉय
ये भी ठीक से साफ नहीं हो पाते इसलिए इनसे बच्चे को एलर्जी या संक्रमण हो सकता है। कई बार इससे सडन इन्फेंट डेथ सिंड्रोम भी हो सकता है। इसकी जगह बच्चे को ऐसे खिलौने दें जो वॉशेबल हों।

फीडिंग बोतल: ठीक से सफाई न हो पाने के कारण बच्चे को पेट में दर्द या संक्रमण हो सकता है। इनसे बचना ही बेहतर है। अगर फिर भी देना पड़े तो हर बार फीड कराने से पहले इसे 10 मिनट पानी में उबालकर प्रयोग करें।

फैंसी कपड़े: हाईनेक व फैंसी कपड़े न लें। इनसे चुभन और बेचैनी हो सकती है। छोटे कपड़े भी न पहनाएं इससे उनको घुटन महसूस होती है। कॉटन के झबले बच्चे के लिए सबसे बेहतर हैं। 

इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स: इनसे बच्चे के मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। इनकी जगह उन्हें कहानी सुनाएं या चित्रों के माध्यम से कुछ सिखाएं व बच्चों के साथ समय बिताएं।

डायपर: इसकी जगह कॉटन के कपड़े का प्रयोग बेहतर है। यदि डायपर पहना भी रहे हैं तो हैवी होते ही बदल दें। पहनाते समय स्किन पर थोड़ा तेल लगाने से त्वचा को सीधे नुकसान नहीं पहुंचता।

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बच्चों में बुखार व तेज दर्द को न करें इग्नोर


बच्चों में सर्दी के साथ तेज बुखार, किसी विशेष अंग में तेज दर्द, सूजन व अंग लाल हो जाए तो यह ओस्टिओमाइलाइटिस (हड्डी का संक्रमण) की समस्या हो सकती है। देर किए बगैर चिकित्सक से परामर्श करें। यदि समय रहते इसकी पहचान कर इलाज करा लिया जाए तो दवाओं से ठीक हो सकती है। लेकिन अधिक समय तक अनदेखी करने या सही इलाज न मिल पाने की स्थिति में हड्डी में विकृति भी आ सकती है।  

हालांकि विकृति के बाद भी कई तकनीकों से इलाज संभव है। इनमें से एक एडवांस्ड तकनीक है ऑर्थो एसयूवी (एक कम्प्यूटर बेस्ड  प्रोग्राम)। इसका प्रयोग हाथ पैरों की विकृति ठीक करने के लिए किया जाता है। हाल ही एक 13 वर्षीय किशोर के पैर की विकृति ठीक करने के लिए एसएमएस में इसका पहली बार प्रयोग किया गया। इसमें रोगी को एसयूवी फ्रेम पहनाया जाता है। इस फ्रेम में छह डिस्टे्रक्टर (रॉड) होते हैं जो हड्डी का आकार बढ़ाने-घटाने में सहायक होते हैं। फ्रेम पहनाकर मरीज की मौजूदा स्थिति की पूरी जांच की जाती है व सारी जानकारी जैसे अंग कितना बड़ा-छोटा है या कितना टेढ़ा है आदि सॉफ्टवेयर में फीड कर दी जाती है। 

सामान्यत: करीब एक इंच हड्डी को बढ़ाने, सीधा व मजबूत करने में तीन माह का समय लगता है। मरीज को फ्रेम कब तक पहनना है, जरूरत के हिसाब से विशेषज्ञ इस का निर्धारण करते हैं। इस बीच मरीज को डिस्ट्रेक्टर का आकार बढ़ाना-घटाना होता है। किस डिस्टे्रक्टर को कब और कितना बड़ा-छोटा करना है यह जानकारी सॉफ्टवेयर में फीड डाटा से मिलती है। चिकित्सक इसका विस्तृत ब्योरा प्रिंटआउट के रूप में मरीज को देकर घर भेज देते हैं। इस बीच कोई परेशानी न हो इसके लिए उसे कुछ समय के अंतराल पर फॉलोअप के लिए बुलाते हैं। एक बार पूरी तरह ठीक होने के बाद वह सामान्य जीवन जी सकता है।

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मानसून में ऐसे करेंगे अपने नवजात बच्चे की देखभाल, तो नहीं प​ड़ेगा बीमार


मानसून का मौसम अपने साथ ढ़ेर सारी ​बीमारियों को आमंत्रण देता है। ऐसे में अपने आप का अच्छे ढ़ंग से ख्याल रख लेते है लेकिन छोटे बच्चे की देखभाल में हम लापरवाही बरत लेतें है जिसका कई बार तो बड़ा खामियाजा भी उठाना पड़ जाता है। तो यदि आप यह चाहते है कि मानसून के मौसम में आपका बच्चा स्वस्थ रहे तो इन टिप्सों को ध्यान से पढ़े। 

1. सफाई का विशेष ध्यान रखें
मौनसून में शिशु की सफाई का पूरा ख्‍याल रखना चाहिये। इस समय उनको पसीना बहुत होता है इसलिये यह जरुरी है कि उन्‍हें एन्टिसेप्‍टिक साबुन से रोज एक बार जरुर नहलाया जाए। अगर सफाई का ध्‍यान नहीं दिया गया तो बाद में यही पसीना फंगल इन्‍फेक्‍शन, रैश और एलर्जी का रूप ले लेगी।

घर पर बच्चों के बिस्तर आदि की साफ-सफाई का भी ध्यान रखें और उन्हें बाहर की हवा लगवाते रहें। बच्चा जहां सोता है वह जगह सूखी और साफ होनी चाहिए। अगर आप का बच्चा बहुत छोटा है और रात में नींद में पेशाब करता है तो बेहतर होगा कि इन दिनों उसे डायपर बांध कर सुलाएं।

2. बच्चों को पूरे कपड़े पहनाएं
बारिश के मौसम में कीड़े-मकाड़े काफी अधिक बढ़ जाते है, ​इसलिए बच्चों को सोते समय पूरा ढ़ककर रखे। इसके अलावा दिन में उसे शार्ट कपड़े न पहनाए। चूंकि इस मौसम में पसीना ज्यादा आता है इसलिए उन्हें सूती कपड़े पहनाए जिन से उन की त्वचा को हवा लग सके। बच्चे घर से बाहर जाएं तो उन्हें जूते भी पहनाएं ताकि कीड़े-मकौड़ों के अलावा घास व पौधों से निकलने वाले रसायनों से उन्हें बचाया जा सके। यह भी ध्यान रखें कि बच्चों के कपड़े और जूते पूरी तरह से सूखे हों।

3. आहार- मौनसून में ज्‍यादातर बीमारियां केवल पानी से ही होती हैं। इस समय अपने बच्‍चे का खाने-पीने के मामले में बहुत ख्‍याल रखें नहीं तो उसे पेट संबंधी बीमारी हो सकती है। इस मौसम बच्चे को उबला पानी ही पिलाएं और उसके दूध पीने की बोतल को गर्म पानी से धोकर रखें। 

4. मच्‍छरों से बचाएं- शिशु को खतरा पहुंचाने वाले मच्‍छरों से बचाए क्‍योंकि यह अपने साथ कई बीमारियां ले कर आते हैं। बच्‍चे के पैर और हाथ पूरी तरह से कपड़े से ढंक दें तथा रात में सुलाते वक्‍त मच्‍छरदानी में ही सुलाएं। बच्‍चे के कमरे में कभी भी कोई हानिकारक कीटनाषक ना छिड़के। 

5. सामान्य देखभाल- इन दिनों आपको हमेशा ख्‍याल रखना होगा कि कभी भी आपका बच्‍चा गीली नैपी में ना रहे वरना उसे रैश की समस्‍या हो जाएगी। हफ्ते में एक बार उसमें नाखूनों को जरुर काटें। अपने घर को साफ-सुथरा और मच्‍छरों से मुक्‍त रखें।


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पैदा होते ही इस बच्चे को मिला गजब का तौहफा, जीवन भर करेगा मुफ्त में हवाई यात्रा


दुनिया में आने वाला हर बच्चा अपने किस्मत खुद लिखाकर लाता है। सऊदी अरब से भारत आने वाली जेट एयरवेज की फ्लाइट में जन्में उस बच्चे का कहां पाता था कि उसकी किस्मत अचानक इस तरह बदल जाएगी। जेट एअरवेज ने अपने विमान की उड़ान में बच्चे का जन्म से खुश होकर शिशु को आजीवन विमान में मुफ्त यात्रा करने का तोहफा दिया है। 

बता दें शनिवार देर रात 2.55 बजे जेट एयरवेज के विमान 9W-569 ने सऊदी अरब के दम्माम से कोच्चि के लिए उड़ान भरी थी। उस विमान में सी. जोस नाम की 29 वर्षीय गर्भवती महिला भी यात्रा कर रही थी। इस दौरान वह अकेले ही सफर कर रही ​थी। उड़ान के दौरान ​महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। इसके बाद पायलट ने चिकित्सा आपात की घोषणा कर दी।

इसके बाद विमान पायलट  ने विमान को कोच्चि की बजाए मुंबई ले जाने का फैसला किया लेकिन 162 यात्रियों को लेकर हवा में उड़ रहा विमान बोइंग 737 जब अरब सागर के ऊपर ही था तभी शिशु का जन्म हो गया। जेट एयरवेज़ के अनुसार इस बच्चे का जन्म 35 हज़ार फीट की ऊंचाई पर हुआ। मुंबई एयरपोर्ट पर लैंडिंग के बाद जच्चा और बच्चा दोनों को होली स्पिरिट अस्पताल में भर्ती करवाया गया। 

अपने विमान में बच्चे के पैदा होने की खुशी में जेट एयरवेज ने इस बच्चे का एक फ्री पास जारी कर दिया, जिसका इस्तेमाल यह बच्चा भविष्य में जेट एयरवेज की यात्राओं के दौरान कर सकेगा। जेट एयरवेज ने कहा इस पास के ​जरिए यह बच्चा मुक्त मे कितनी यात्राएं कर सकता हैै। वैसे आपको बता दें जेट एयरवेज की फ्लाइट में ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी बच्चे ने उड़ान भरे जाने के दौरान जन्म लिया है।

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किस देश के बच्चे सबसे ज्यादा रोते है और किस देश के सबसे कम, ऐसा क्यो ? यहां जानें


नई दिल्ली। छोटे बच्चों का रोना एक आम बात होती है। छोटे बच्चों की किसी भी तरह की कोई तकलीफ होती है तो वे रोने लग जाते है। लेकिन क्या आपको इस बात की जानकारी है कि किस देश के बच्चे अधिक रोते है। बता दें यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक में इस बात का पता लगाने के लिए किस देश के बच्चे अधिक रोते है, वैज्ञानिको ने एक अनोखा अध्ययन किया। आप विश्वास नहीं करेंगे लेकिन इसमे कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आए।

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अध्ययन में 8700 नवजातों को शामिल किया गया
इस अध्ययन में मनोवैज्ञानिकों ने दुनियाभर के 8700 नवजातों को शामिल किया। अध्ययन रिपोर्ट में यह सामने आया कि अन्य देशों की तुलना में ब्रिटेन, कनाडा और इटली में पैदा हुए बच्चे सबसे ज्यादा रोते है। इसके साथ इस रिसर्च में मनावैज्ञानिको ने यह भी पता लगाया कि 3 महीने का एक सामान्य बच्चा कितना रोता है। अध्ययन में पता चला कि पैदा होने के बाद पहले दो सप्ताह बच्चे हर दिन कम से कम 2 घंटे रोते हैं जबकि 6 सप्ताह के बच्चे 2 घंटे 15 मिनट और 12 सप्ताह के हो जाने पर उनके रोने की अवधि घटकर 1 घंटा 10 मिनट हो जाती है। 

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इन देशों के बच्चे सबसे कम रोते है
अध्ययन में यह बात सामने आई किन-किन देशों के बच्चे सबसे कम रोते है। मनोवैज्ञानिकों ने पाया कि अन्य देशों की तुलना में डेनमार्क, जर्मनी और जापान के बच्चें कम रोते है। यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक के डिपार्टमेंट ऑफ साइकोलॉजी के प्रोफेसर डायटर वोल्के ने दुनिया का पहला यूनिवर्सल चार्ट बनाया है जिसमें पहले तीन महीनों के दौरान बच्चों के रोने के घंटों का रिकॉर्ड दिखाया गया है। 


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पैदा होते ही चलने वाले बच्चे के वायरल वीडियो का सच जान खड़े हो जाएंगे रोंगटे


नई दिल्ली। सोशल मीडिया किस दिन क्या चीज वायरल हो जाएं कुछ कहा नहीं जा सकता। इन दिनों सोशल मीडिया में एक ऐसा वीडियो वायरल हो रहा है जिसे देख आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। वीडियो में एक बच्चा अपनी माँ के पेट से निकलने के कुछ देर बाद अपने पैंरों पर चलता हुआ नजर आ रहा है। आपको बता दें इस वीडियों को 31 मई तक 9 करोड़ से ज्यादा लोग देख चुके है। 

वीडियो में एक नर्स अपने हाथ में एक छोटे से बच्चे को पकड़ हुए नजर आ रही है। नर्स ने बच्चों को आगे की तरफ से पकड़ रखा है और बच्चा अपने आप पैरों का आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। हैरान करने वाले इस वीडियो में बच्चा लगातार चलने की कोशिश कर रहा है। नर्स उसे खींच रही है लेकिन फिर भी बच्चा दोबारा उठकर चलना शुरू कर देता है। आपको बता दे नार्मल रूप कोई बच्चा अपने जन्म 9-10 महीने बाद चलने लगता है लेकिन इस बच्चे के वीडियो को देख सब लोग हैरान है। 

लेकिन जब इस बारे में शिशु विशेषज्ञ डॉक्टर से बात की गई तो उन्होंने बताया कि , ये मुमकिन है। नार्मल बच्चों का ये रिफ्लेक्स है और इसको स्टेपिंग रिफ्लेक्स कहते हैं। वीडियो में बच्चे को सर्पोट किया जा रहा है। नर्स ने अपने हाथों से बच्चे का पकड़ रखा है जिससे उसे सपोर्ट मिल रहा है। जैसे ही बच्चे के पैरों पर प्रेशर पड़ता है वो कदम आगे बढ़ाने लगता है। इसे प्रीमिटिव रिफ्लेक्स कहते हैं। उन्होंने बताया, 38-40 हफ्ते का बच्चा ये रिफ्लेक्स करता है। इसको चलना नहीं कह सकते, चलना तब कहते जब वो बिना किसी सपोर्ट के चलता है।

चलने वाले बच्चे की वीडियो यहां देखें:



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सावधान, इन खिलौनों से बच्चों में हो सकता है कैंसर का खतरा


नई दिल्ली। हर मां-बाप के लिए अपने बच्चे की खुशी से बढ़कर कोई चीज नहीं होती है। वे खुद चाहे कितना ही दुख: उठा ले लेकिन अपने बच्चों को तकलीफ में नहीं देख सकते है। लेकिन ध्यान रहे है कई आप अपने बच्चों की खुशी खातिर उनकी जान को खतरे में तो नहीं डाल रहे है। अब आप यह सोच रहे होंगे कि हम आपको ऐसा क्यों कह रहे हैं। आप अपने बच्चों के लिए मार्केट से खिलौने तो अक्सर खरीदते ही होंगे लेकिन क्या आपको पता है उनमें से कुछ खिलौना बच्चों में कैंसर जैसी घातक बीमारी का कारण भी बन सकते है। 

जी हां, यदि आप भी अपने बच्चों के लिए मुंह के द्वारा फुलाए जाने वाले खिलौने खरीदकर लाते है तो सावधान हो जाइए। एक ताजा शोध पता चला है कि ऐसे खिलौने छोटे बच्चों में कैंसर का कारण बन सकते हैं। जर्मनी स्थित फ्रॉनहोफर इंस्टीट्यूट फॉर प्रोसेस इंजीनिर्यंरग एंड पैकेजिंग के शोधकर्ताओं ने बीच बॉल, स्वीमिंग आर्म बैंड और बाथिंग रिंग्स पर किए अध्ययन में इस बीमारी का पता लगाया। 

शोध में पता चला कि इस तरह के खिलौने पॉली विनाइल क्लोराइड (PVC) से तैयार किए जाते है। शोधकर्ता क्रिस्टोफ विडमोर ने कहा, इस तरह के खिलौनों को तैयार करने में कई रासायनिक और भौतिक प्रक्रियाओं का प्रयोग होता है। इनमें प्रयुक्त सभी पदार्थों को पहचानना और उनके गुणधर्म समझना मुश्किल है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इनमें बहुत से ऐसे रसायन प्रयोग किए जाते हैं, जिनके लगातार संपर्क में रहने से कैंसर का खतरा बढऩे की संभावना प्रबल हो जाती है। 

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बच्चों की स्कीन में प्रोटीन की कमी से होती है एक्जिमा बीमारी


लंदन। वैज्ञानिकों ने हाल ही में किए एक शोध में पाया है कि त्वचा में एक खास प्रोटीन की कमी के कारण एक्जिमा या खाज होता है। एटोपिक एक्सिमा (चकत्ते वाली खुजली) त्वचा की एक आम स्थिति है और अक्सर यह बच्चों में उनके जीवन के पहले साल में पायी जाती है। यह उनके वयस्क होने पर भी बनी रहती है। इसके गंभीर प्रभाव के रूप में स्वास्थ्य और नींद संबंधी विकार सामने आते हैं।

शोध के निष्कर्षो से पता चलता है कि प्रोटीन फिलाग्रीन के प्रभाव से त्वचा के दूसरे प्रोटीनों व कार्यप्रणाली पर असर पड़ता है, नतीजतन खाज हो जाती है। इंग्लैंड के न्यूकैसल विश्वविद्यालय के चर्म रोग के प्रोफेसर निक रेनॉल्डस ने कहा, हमे पहली बार पता चला है कि फिलाग्रीन प्रोटीन की क्षति के कारण दूसरे प्रोटीन भी प्रभावित होते हैं, जो अंतत: एक्जिमा को जन्म देता है।

उन्होंने कहा, इस अध्ययन से फिलाग्रीन प्रोटीन की कमी के महत्व का पता चलता है, जिससे त्वचा के कार्यो में बाधा आ सकती है और कोई एक्जिमा से पीड़ित हो सकता है। इस शोध का प्रकाशन 'एलर्जी एंड क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी' में किया गया। इस दल ने एक मानव प्रारूप प्रणाली विकसित की है। इस प्रारूप से शोधकर्ता प्रोटीन और संकेत के रास्तों को जान सकेंगे।

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छोटे बच्चों के लिए बहुत लाभकारी होती है मां की झप्पी


प्रत्येक का अपने बच्चे का पालने का तरीका अलग-अलग होता है, जहां घरेलू मां दिनभर अपने बच्चे के साथ रहती है वहीं ऑफिशिल मां के साथ अपनी बच्चे के साथ ज्यादा टाइम बिताने की दिक्कत होती है। लेकिन कुछ विशेषज्ञों का ऐसा मानना है कि प्रत्येक मां को अपने बच्चे का प्यार भरी झप्पी देना नहीं भूलना चाहिए। यह आपके बच्चे की सेहत के लिए काफी फायदेमंद है। बच्चों के डायपर बनाने वाली कंपनी 'हगीस' के साथ जुड़ी क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट प्रेरणा कोहली बताती है कि मां की झप्पी में भावनात्मक के साथ ही सेहत से जुड़े कई फायदे छिपे हुए है। 

नींद के लिए बेहतर झप्पी
अगर आप अपने बच्चे को उसके नींद आने के बाद भी अपने शरीर से चिपका कर रखते है तो उसकी नींद के लिए बहुत फायदेमंद है। आपकी झप्पी की गरमाहट उसे आराम देती है जो बच्चे को बेहतर रूप से सोने में मदद करती है।

बच्चे की इम्यूनिटी बढ़ती है
मांओं द्वारा अपने बच्चों को सीने से लगाना, उन्हें पुचकारना बच्चे के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है। इससे बच्चे की उनकी श्वेत रक्त कणिकाएं यानी डब्ल्यूबीसी बढ़ती है, जो आपके बच्चों को काफी हद तक बीमारियों से बचाए रख सकती हैं।

बीमारी दूर भागती है झप्पी
आपकी प्यार भरी झप्पी बच्चों की बीमारी में काफी मदद करती है। यह उनके शरीर से ऑक्सिटॉक्सिन को अलग करती है। इसकी सलाह विशेषज्ञ भी देते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 90 प्रतिशत चिकित्सकों और विशेषज्ञों का मानना है कि एक नवजात शिशु अपनी मां की पहचान उसकी झप्पी से ही करता है। मां के तन की खुशबू और छुअन ही उसे एहसास दिलाती है कि वह अपनी मां की गोद में है।

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अपने बच्चे को होम्योपैथी दवा देने से पहले पढ़ लें ये खबर


बच्चों के जब दांत निकलते हैं तब वे सबसे ज्यादा तकलीफ में होते हैं। ऐसे में बुखार आना, बच्चे का चिड़चिड़ा हो जाना या उसे उल्टी दस्त होना आम बात है। कुछ लोग इसमें बच्चों को होम्योपैथी दवाएं देने लगते हैं, लेकिन आपको बता दें कि अमरीकी खाद्य एंव औषधि प्रशासन (एफडीए) ने इन दवाओं को शिशुओं के लिए हानिकारक बताया है।

अमरीकी दवा नियामक ने अपने बयान में कहा है कि बच्चों के दांत निकलने के दौरान दी जाने वाली गोलियां और जैल को सीवीएस, हेलंड्स और अन्य कंपनियां रिटेल या ऑनलाइन बेच रही हैं। एफडीए की चेतावनी के बाद सीवीएस ने रिटेल और सीवीएस डॉट कॉम पर ऑनलाइन बिकने वाले सभी उत्पादों को वापस लेने की घोषणा की है।

एफडीए ने कहा कि इन दवाओं को लेने के बाद बच्चों में सांस लेने में दिक्कत, सुस्ती, बहुत ज्यादा नींद आना, वीक मसल्स, कब्ज और यूरिन पास होने जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। अगर कभी ऐसा हो तो तुरंत डॉक्टर से चैकअप करवाना चाहिए। फिलहाल एफडीए इस मुद्दे की जांच कर रही है।

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अगर आपका बच्चा भी तुतलाता है तो जरूर आजमाएं एक बार यह तरीका


बच्चे जब एक या दो साल के होते हैं तो उनकी तोतली जुबान बहुत ही प्यारी लगती है। उनकी बातें इतनी मीठी लगती हैं कि दिल करता है सिर्फ सुनते ही रहें। उन्हें सुधारने का ख्याल तक किसी को नहीं आता है। यहां त‍क की मां-बाप और दूसरे रिश्तेदार भी बच्चे से उसी तरीके से बातें करना शुरू कर देते हैं, लेकिन एक समय के बाद ये आदत परेशानी का कारण बन जाती है।

बहुत से बच्चे ऐसे हैं जो इस आदत को छोड़ नहीं पाते और बड़े होने पर भी तुतलाते ही रहते हैं। ऐसे बच्चों को घर और समाज में कई बार शर्मिंदगी उठानी पड़ती है। स्कूल में दूसरे सहपाठियों के सामने और कॉलेज में दोस्तों के साथ।

पर सबसे बड़ा नुकसान करियर में उठाना पड़ता है। जहां कई इंटरव्यू में ये आदत कमी के रूप में देखी जाती है। ऐसे में अगर आपके बच्चे को भी ये परेशानी है तो अभी से उस पर ध्यान दें। सबसे पहले डॉक्टर की सलाह लें, उसके साथ ही इन घरेलू उपायों को आजमाना भी फायदेमंद रहेगा।

- बच्चे को हरा आंवला चबाने के लिए दें। आंवले के सेवन से आवाज साफ होती है।

- बादाम के सात टुकड़े और उतनी ही मात्रा में काली मिर्च को पीसकर एक चटनी जैसा पेस्ट तैयार कर लें। इसमें शहद मिलाकर बच्चे को चाटने के लिए दें।

- काली मिर्च चूसना भी बहुत फायदेमंद रहेगा.

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आपके नवजात के कपड़े खरीदने से पहले ध्यान रखें ये बातें


नवजात शिशुओं की त्वचा बेहद नाजुक होती है। ऐसे में उनक लिए कपड़ों का चुनाव बहुत समझदारी से करना जरूरी है। हालांकि यह काम इतना भी मुश्किल नहीं है। इन कुछ आसान टिप्स से आप आसानी से अपने नन्हे मेहमान के लिए कंफर्टेबल कपड़े खरीद सकेंगे।

- गर्मियों के मौसम में शिशु को ठंडक देने वाले सूती कपड़े पहनाएं। सिंथेटिक कपड़े इस्तेमाल न कीजिए, क्योंकि वे गर्माहट को अंदर ही रोकते हैं और बच्चे के लिए बहुत तकलीफदेह हो सकते हैं। इनके कारण घमौरियां भी हो सकती हैं।  धूप में बाहर निकलते समय शिशु के लिए लंबी बाजू के हल्के कपड़े चुनें।
- शिशु को धूप से बचाने के लिए टोपी या हैट पहना सकते हैं। मगर, सुनिश्चित करें कि वह चौड़े रिम वाली टोपी है और आराम से फिट होती है। इलास्टिक पट्टी के सपोर्ट वाली हैट न पहनाएं, क्योंकि वह तंग हो सकती हैं और इनसे रक्त परिसंचारण पर दबाव पड़ सकता है।
- कपड़े की नैपियां शिशु के लिए ज्यादा आरामदायक हो सकती हैं। ये गर्मी और डिस्पोजेबल नैपी पहनने से होने वाले ददोरों (नैपी रैश) से भी बचाएंगी। अगर आपको डायपर पहनाना ही पड़े, तो शिशु को ठंडे वातावरण में रखें और तापमान के अनुसार उचित कपड़े पहनाएं।
- सर्दियों में शिशु के कपड़े गरम, नरम और आरामदेह होने चाहिए, जिन में कोई जिप या टैग न लगा हो। बच्चे के हाथपैर गरम रखने के लिए उसे दस्ताने और मोजे पहनाने चाहिए और उस का सिर टोपी से ढकना चाहिए।
- बच्चे को कई बार ऊनी कपड़ों से ऐलर्जी हो जाती है जिस से उस के शरीर पर रैशेज हो जाते हैं।  इसलिए कपड़े तापमान के हिसाब से ही पहनाने चाहिए। बच्चे को सीधा ऊनी कपड़ा पहनाने के बजाय पहले एक सूती कपड़े पहनानी चाहिए।
- शिशु के कपड़े अच्छी क्वालिटी के होने चाहिए और ज्यादा तंग नहीं होने चाहिए। बच्चे के कपड़े धोने का डिटर्जैंट माइल्ड होना चाहिए।

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