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हाइपर एक्टिव है बच्चा, ताे इस तरह से रखें ध्यान


आपका बच्चा बेवजह आपा खोए, हर समय सक्रिय रहे, फोकस न कर पाए, स्कूल में असामान्य हरकत करे, हर समय बोले या दूसरों को न बोलने दे तो विशेषज्ञ की सलाह लें क्योंकि यह एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर हो सकता है। इसकी जांच के लिए कई तरह के ब्लड टेस्ट व हार्मोनल टेस्ट होते हैं। खानपान में गड़बड़ की पड़ताल कर मनोवैज्ञानिक उपचार किया जाता है।आइए जानते हैं इसके बारे में:-

करें खास उपाय
हाइपर एक्टिविटी और उसकी किस्म के हिसाब से दवाएं मौजूद हैं। इनसे भी ज्यादा जरूरी है माता-पिता की सूझबूझ व समझाइश। जैसे-

- माता-पिता को सबसे पहले यह समझना चाहिए कि उनका बच्चा दूसरे बच्चों से अलग है लेकिन असामान्य नहीं। बच्चे की एक्टिविटी को सबसे पहले घरवालों को स्वीकार करना चाहिए लेकिन दूसरों के सामने बार-बार उसे असामान्य न कहें। ऐसा करने से बच्चे में हीन भावना बढ़ने लगती है और वह धीरे-धीरे जिद्दी होकर मनमर्जी करने लगता है।

- उसकी क्षमता पहचानते हुए उसे वही काम करने के लिए प्रेरित करें। बच्चे को ऐसा कोई काम न करने के लिए कहें जो उसकी रुचि या क्षमता के मुताबिक न हो।

- हाइपर एक्टिव बच्चे पर दबाव न डालें। वह जो भी हॉबी करना चाहे उसे रोके नहीं। बल्कि उसका हौंसला बढ़ाने के लिए एक्टिविटी में भाग लें।

- बच्चे की शारीरिक व मानसिक जरूरत को समझें। उसके साथ समय बिताएं व उसकी बातों को ध्यान से सुनें। 10-15 मिनट रोजाना विचार सुनने से हाइपर एक्टिव बच्चे को समझना आसान होगा।

- बच्चे में बेहतर खानपान की आदत डालें। खाने में साबुत अनाज, फल, सब्जियां आदि शामिल करें।

- मित्र या भाई-बहन केे साथ बच्चे की तुलना न करें।

- बच्चे को नियमित एक्सरसाइज कराएं। एरोबिक से तनाव कम होता है और शारीरिक व मानसिक एनर्जी बढ़ती है। एंडॉर्फिन हार्मोन का स्राव होने से बच्चा खुश रहता है और बात-बात पर चिड़चिड़ा महसूस नहीं करता। इसलिए बच्चे को रोजाना 30 मिनट एक्सरसाइज कराएं।

बच्चे को ये सिखाएं
- गहरी सांस का अभ्यास कराएं। गुस्सा या चिड़चिड़ेपन की स्थिति में गहरी सांस उपचार का काम करती है।
- घरेलू काम में बच्चों को शामिल करें। साथ ही उन्हें जिम्मेदारी भी सौंपें।
- बच्चे को घुमाने ले जाएं। उन्हें खेलने दें और स्कूल के काम व खेल के बीच संतुलन बनाना सिखाएं।
- बच्चों की किसी भी हरकत पर फौरन प्रतिक्रिया न दें। उनके साथ खुद भी धैर्यवान बनें।
- बच्चा अगर शर्मीला है तो उसे अपने साथ सामाजिक कार्यक्रमों में लेकर जाएं। उसे गु्रप में रहने के लिए प्रेरित करें। लेकिन यह भी ध्यान रखें कि कोई बच्चे का मजाक न बनाए।
- घर में किसी प्रकार का झगड़ा या कलह है तो इसे बच्चे के सामने न आने दें। इससे बच्चे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

विशेषज्ञ की राय
ऐसे मामले इन दिनों ज्यादा देखने में आ रहे हैं। लेकिन माता-पिता निराश न हों। दवाओं और पर्याप्त चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक परामर्श से बच्चों की एकाग्रता में सुधार किया जा सकता है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को समझें। उन्हें दंड देने या किसी अन्य बच्चे से उसकी तुलना करने से बचें। बच्चे की हिम्मत बढ़ाएं और इसके लक्षण पहचानते ही डॉक्टर से तुरंत परामर्श करें।


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दर्द से दूर रहना है ताे बदले अपनी जीवनशैली


घर में सोते समय गलत तकिया लगाने से गर्दन में दर्द हो सकता है और ऑफिस में गलत कुर्सी पर बैठने से पीठ में। शरीर के कुछ हिस्सों में दर्द को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आपको शरीर में होने वाले दर्द पर पूरी नजर रखनी चाहिए और इसे दूर करने के उपाय पर विचार करना चाहिए। दर्द के माध्यम से शरीर आपको संकेत देता है। इन्हें समझकर अपनी जीवनचर्या में बदलाव करना चाहिए।

गर्दन और कंधे में दर्द
तकनीक के इस युग में ज्यादातर लोगों का समय कम्प्यूटर के मॉनीटर के सामने गुजरता है। अगर आप अपनी कुर्सी पर सही तरह से नहीं बैठते हैं या आपकी कुर्सी कम्प्यूटर के हिसाब से सही नहीं है तो आपको गर्दन और कंधों का दर्द हो सकता है। आपको ऑफिस में काम के दौरान अपने बैठने के तरीके में सुधार करना चाहिए। कुर्सी की पॉजिशन भी ऐसी होनी चाहिए कि आप सीधे बैठ सकें। काम के दौरान बीच-बीच में ब्रेक लें और इधर-उधर कहीं घूमकर ही वापस काम करने लगें। लगातार कम्प्यूटर पर काम करने के दौरान गर्दन को इधर-उधर हिलाते रहें वर्ना गर्दन में दर्द हो सकता है। काम के बाद आपको सालसा जैसे डांस फॉर्म में शामिल होना चाहिए। इससे आपको बॉडी पोश्चर को बेहतर करने में मदद मिलेगी।

पीठ की परेशानी
आजकल कई लोग पीठ के दर्द की शिकायत करते हुए मिल जाते हैं। ज्यादा वजन पीठ पर लादकर चलने, सीधे न बैठने, मोटापा, व्यायाम की कमी, सही तरह से न सोने के कारण पीठ में दर्द हो सकता है। इसलिए मुलायम गद्दों का प्रयोग न करें।जॉगिंग करें और सीधे खड़े होकर पैरों को छूने का व्यायाम करें।

सीने में जलन
क्या आप सीने में दर्द से परेशान हैं? हो सकता है आपको एसिडिटी या हृदय से संबंधित कोई समस्या हो। कई बार एसिडिटी से हार्टबर्न, सिरदर्द व पेटदर्द भी हो सकता है। डाइट में बदलाव करेें। फास्ट फूड व कोल्ड ड्रिंक से परहेज करें। अल्कोहल और धूम्रपान से दूरी बनाएं। नियमित व्यायाम करें।

घुटनों की तकलीफ
घुटनों के दर्द में विशेष सावधानी बरतना बहुत जरूरी है। यह आर्थराइटिस की शुरुआत हो सकती है। लंबे समय तक एक ही अवस्था में बैठने, घुटनों पर ज्यादा जोर देने, झटका या चोट लगने और खून में यूरिक एसिड बढ़ने से घुटनों में दर्द की समस्या हो सकती है। इसलिए खूब पानी पिएं और हरी सब्जियां खाएं। पालक, अंजीर, पनीर, अजवाइन और बादाम का भी भरपूर सेवन करना चाहिए।

कूल्हे में दर्द
हिप्स या कूल्हों में दर्द पेट में गैस बनने, जोड़ों के दर्द, मांसपेशियों के कमजोर होने, गलत तरीके से वजन उठाने या जरूरत से ज्यादा झुकने से हो सकता है। इस दर्द से छुटकारा पाने के लिए नियमित व्यायाम करें और विशेषज्ञ की सलाह से ही योग या अन्य अभ्यास करें।

एड़ियाें का मर्ज
एड़ियाें में दर्द हाई हील पहनने से हो सकता है। इस दर्द को दूर करने के लिए किसी ऊंची जगह पर बैठकर पैरों को लटकाएं और पंजों को गोल-गोल घुमाएं। पैरों की अंगुलियों को अपनी ओर खीचें फिर बाहर की तरफ। आप एक्यूप्रेशर चिकित्सा की भी मदद ले सकते हैं।


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शरीर का सुरक्षा कवच है बेकिंग सोडा


रसाेर्इ में काम अाने वाला बेकिंग सोडा केवल खाने के काम ही नहीं आता बल्कि इसके कर्इ स्वास्थ्य लाभ भी हैं। आइए जानते हैं इसके फायदाें के बारे में :-

बालों के लिए :
शैंपू में एक चौथाई बेकिंग सोडा मिलाकर बाल धोएं। इससे बाल मुलायम होंगे।

दांतों की सफाई :
बेकिंग सोडा बेहद प्रभावी टूथ वाइटनिंग है। टूथब्रश को गीला करें और थोड़ा-सा बेकिंग सोडा लगाकर 2-3 मिनट ब्रश करें। इसके बाद अच्छी तरह कुल्ला करें। चाहें तो बाद में टूथपेस्ट से भी दांत साफ कर लें। इससे दांतों का पीलापन दूर होगा।

दाद :
त्वचा पर जहां दाद हैं, वहां थोड़ा-सा बेकिंग सोडा लगाएं। इससे बैक्टीरिया निष्क्रिय होंगे और दाद मिट जाएंगे।

पैर :
एक बाल्टी गर्म पानी में तीन चम्मच सोडा डालें और इसमें पैर डालकर इनकी मसाज करें। इसके बाद पैरों को सुखाकर क्रीम या लोशन लगाएं। इससे मृत त्वचा हट जाएगी।

हाथ:
इस अंग पर बेकिंग सोडा मलने से बैक्टीरिया मिट जाएंगे और घर पर बैठे ही आपका मैनीक्योर हो जाएगा।

नाखून :
बेकिंग सोडा और सेब का सिरका नाखूनों को फंगल इंफेक्शन से बचाते हैं। टब में एक कप सेब का सिरका डालें व उसमें 15 मिनट तक पैर रखें। इसके बाद तौलिए से पैरों को पोंछ लें। 15 मिनट बाद पैरों को 4-5 टी-स्पून बेकिंग सोडा के पानी में रखें। संक्रमण दूर होकर पैर मुलायम बनेंगे।


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बदलते माैसम से एेसे करें अपना बचाव


इंसानी जिंदगी सांसों पर टिकी है और सांस टिकी है फेफड़ों पर। हमारे फेफड़े जितने मजबूत होंगे, जिंदगी उतनी ही लंबी होगी। मौसम के परिवर्तन से लेकर घर-बाहर के धुएं तक सब हमारे फेफड़ों को प्रभावित करते हैं।

मौसम में बदलाव से सर्दी, जुकाम, छींकें आना, एलर्जी, एलर्जिक राइनाइटिस, आंखों से पानी आना और अस्थमा आदि का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में जरूरी है कि हम अपनी सेहत का खासतौर पर खयाल रखें क्योंकि एलर्जन सबसे पहले हमारी नाक, फिर गले व आखिर में फेफड़ों पर हमला करते हैं।

गीली घास पर न चलें
अस्थमा, साइनस या एलर्जी होने पर सर्दी के मौसम में देर रात तक बाहर न निकलें। साथ ही एकदम सुबह घूमने के लिए न जाएं। गीली घास पर नंगे पांव न चलें वर्ना अस्थमा का अटैक पड़ सकता है। घर की सफाई के लिए डस्टिंग की बजाय गीले कपड़े से पौंछें व मुंह पर कपड़ा रखें। पटाखों के धुएं से भी परेशानी बढ़ सकती है।

बच्चों की देखभाल
बड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है इसलिए इनकी तुलना में बच्चों व वृद्धों पर मौसम के बदलाव का सबसे ज्यादा असर पड़ता है। बच्चों को सर्दी के मौसम में ज्यादा बाहर न लेकर जाएं। उनके सिर को मंकी कैप आदि से कवर करके रखें। उन्हें निक्कर या शॉर्ट ड्रेस पहनाने के बजाय बॉडी को कवर करने वाले गर्म कपड़े पहनाएं। जो बच्चे अस्थमा के मरीज हैं उन्हें डॉक्टरी सलाह से दवाएं दें।

ये हैं प्रमुख वजह
धूल, धुंआ, तापमान में बदलाव, परागकण, त्योहारों के मौसम में साफ-सफाई के दौरान गर्द व सर्दी की शुरुआत में निकाले गए रजाई-गद्दों में मौजूद डस्ट माइट्स।

विशेषज्ञ की राय
छींक आदि के समय मुंह पर कपड़ा या रुमाल रखें।
खानपान: ठंडी व खट्टी चीजें जैसे अमचूर, इमली, अचार व चटनी आदि से परहेज करें। फ्रिज की ठंडी चीजों को उनका तापमान सामान्य होने पर खाएं-पिएं। तला-भुना आदि खाने के बाद फौरन पानी न पिएं वर्ना गले की तकलीफ हो सकती है।

इलाज : रोग होने पर विशेषज्ञ की सलाह से दवाएं लें क्योंकि वे पहले रिलीवर व प्रिवेंटर डोज देते हैं।


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सेहतमंद रहना है तो ऑफिस में ऐसे करें काम


कुछ समय पहले ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने उन लोगों के लिए चेतावनी जारी की थी जो लंबे समय तक लगातार बैठकर काम करते हैं। इन वैज्ञानिकों का कहना है कि एक ही मुद्रा में लंबे समय तक बैठे रहने से शरीर के हर अंग को नुकसान पहुंचता है। आइए जानते हैं इसके बारे में :-

यूं 'बैठ' जाता है शरीर
सिर
: लंबे समय तक बैठने से रक्त के थक्के जम जाते हैं जो मस्तिष्क में पहुंचकर स्ट्रोक का सबब बन सकते हैं।

फेफड़े : दिनभर बैठे रहने से पल्मोनरी एम्बोलिज्म यानी फेफड़ों में रक्त के थक्के जमने की आशंका बढ़ने लगती है।

हाथ : घंटों बैठे रहने की वजह से इस अंग के सुन्न होने या हाई ब्लडप्रेशर का खतरा बढ़ जाता है।

पेट : बैठे रहने से मोटापा, कोलोन कैंसर आदि बीमारियों का खतरा रहता है। इससे रक्तधमनियों में वसा के जमाव को घटाने वाले एंजाइम ठप हो जाते हैं और शरीर की गतिविधि कमजोर पड़ने लगती है।

गर्दन : बैठे रहने से गर्दन की मांसपेशियों में दर्द होने की आशंका भी रहती है।

पांव : हमारे इस अंग में रक्त का संचालन सही न होने से सुन्नता और नसों में क्षति आदि के खतरे की आशंका बढ़ जाती है।

दिल : आलस्यपूर्ण एवं शारीरिक गतिविधि से विहीन जीवनशैली का दुष्परिणाम इंसान को हार्ट अटैक या डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों के रूप में भोगना पड़ सकता है।

पीठ : लगातार बैठे रहने से रीढ़ की हड्डी पर जोर पड़ता है। इस वजह से रीढ़ की हड्डी में दर्द या इंजरी आ सकती है।

पैर : बैठे रहने से पैरों में तरल इकट्ठा हो जाता है। रात को जब हम सोते हैं तो यह गर्दन तक आ जाता है जिससे स्लीप एप्नीया यानी सोते समय सांस में रुकावट की समस्या होने लगती है। वहीं खड़े होने या इधर-उधर टहलते रहने से यह तरल शरीर में चारों ओर फैलता रहता है।

सावधानी बरतें
चिकित्सकों के मुताबिक अगर आप डेस्क जॉब पर हैं या बैठे-बैठे लंबे समय तक काम करते हैं तो दिनभर में तीन से चार घंटे खड़े रहने या टहलने का बहाना खोजें। ऑफिस में लगातार दो-तीन घंटे तक बैठकर काम करने के बाद पांच से दस मिनट के लिए टहल लें। ऑफिस में लिफ्ट के बजाय सीढ़ियाें का प्रयोग करें। कुर्सी पर बैठे- बैठे ही हाथों और पैरों को हिलाएं-डुलाएं ताकि रक्तका प्रवाह सुचारु रूप से बना रहे।


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मन काे शांत व तनाव काे कम करती है बिंदी


हजारों वर्षों से हमारे देश में पुरुष माथे पर तिलक और महिलाएं, बिंदी लगाती आ रही हैं। इससे हमारी सेहत भी जुड़ी हुई है। आइए जानते हैं इसके बारे में:-

- भौंह के बीच दाएं शरीर की सभी नसें मिलती हैं। इसे अग्निचक्र या तृतीय नेत्र भी कहते हैं। बिंदी लगाने से मन शांत व तनाव कम होता है।एक्यूप्रेशर के अनुसार इस बिंदु पर मसाज करने से सिरदर्द में राहत मिलती है। नसें और रक्त कोशिकाएं रिलेक्स हो जाती हैं।

- इस पॉइंट पर मसाज करने से रक्त का संचालन नाक के आसपास अच्छी तरह से होने लगता है। साइनस से होने वाली सूजन कम हो जाती है और बंद नाक खुल जाती है। चेहरे की मांसपेशियां मजबूत होती हैं जिससे झुर्रियों का आना कम होता है। बिंदी रक्त का प्रवाह बढ़ाकर मांसपेशियों को लचीला बनाती है।

- इस पॉइंट पर मसाज करने से चेहरे की नसें सक्रिय होती हैं और चेहरे के पक्षाघात का खतरा घटता है। आयुर्वेद में इसे 'शिरोधारा' कहते हैं। इसमें 40-60 मिनट तक मेडिकेटेड ऑयल से इस बिंदु पर मसाज की जाती है।

- कपाल के मध्य के केंद्र बिंदु की नसें आंखों की मांसपेशियों से संबंधित हैं जो अगल-बगल और स्पष्ट देखने में मदद करती हैं।जो नस चेहरे की मांसपेशियों को उत्तेजित करती है वह कान के भीतर की मांसपेशियों को मजबूत बनाकर कान को स्वस्थ रखने में मदद करती है। भौंह के बीच लाइन कम होती है। मसाज करने पर रक्तप्रवाह बढ़ता है जिससे फाइन लाइंस चली जाती हैं।

- चेहरे, गर्दन, पीठ और शरीर के ऊपरी भाग की मांसपेशियों की उत्तेजना को घटाकर मन को शांत करने का काम बिंदी करती है। इससे अनिद्रा में भी राहत मिलती है।


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पैदल चलने के हैं कर्इ फायदे, जानें रोजाना कितना व किस स्पीड से चलें


पैदल चलना श्रेष्ठ ही नहीं, सहज व सस्ती कसरत है। विशेषज्ञाें के अनुसार नियमित पैदल चलने और सामान्य व्यायाम से ब्रेन स्ट्रोक के खतरे से भी बचा जा सकता है। वॉक के लिए सबसे अहम आपकी गति है।आइए जानते हैं चलने की गति के बारे में :-

घंटेभर में 5 से 9 किमी
- सामान्य कद-काठी और स्वस्थ व्यक्ति एक सेकंड में 1.4 मीटर यानी घंटेभर में 5 किमी चलता है। हालांकि प्रयास करे तो वह प्रति सेकंड 2.5 मीटर यानी एक घंटे में 9 किमी भी चल सकता है। यदि किसी प्रतिस्पर्धा के लिए चल रहे हैं तो दूरी के हिसाब से गति बढ़ जाती है जो प्रति घंटा 9 किमी तक हो सकती है। मार्निंग या ईवनिंग वॉक में पेट्स साथ हो तो व्यक्ति 1 घंटे में अधिकतम 5 किमी चलता है।

घंटेभर में 3.5 किमी
बुजुर्ग या बच्चे 3.5 किमी प्रति घंटे की गति से चलें। रोजाना पैदल चलने की आदत डालने का इच्छुक व्यक्ति 1 घंटे में 5 किमी ही चलें।

घंटेभर में 6.5 किमी
जो लोग पैदल घूमने के अभ्यस्त हैं उन्हें प्रति घंटा 6.5 किमी की गति से चलना चाहिए। वे सप्ताह में 1-2 दिन पैदल चल सकते हैं।

घंटेभर में 7.5 किमी
एडवांस वॉकर बिना कष्ट 7-7.5 किमी प्रति घंटा चल सकते हैं। प्रतिदिन 45 मिनट व सप्ताह में एक बार इस गति को आसानी से बनाए रख सकते हैं।


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क्या आप भी सेहत के नाम पर करते हैं मनमानी, जानिए देकर जवाब


आप हमेशा अपने मन की करते हैं फिर चाहे वह गलत ही क्यों न हो। क्या सेहत को लेकर भी आप यही सोचते हैं? खुद ही परख लीजिए कि आप कितनी मनमर्जी करते हैं?

1. आपकी यह पक्की धारणा बन चुकी है कि जो 'मन' कहे बस वही करना चाहिए?
: सहमत : असहमत

2. कुछ करने को लेकर आप 'मन' की सुनते हैं फिर भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते?
: सहमत : असहमत

3. आपकी कोशिशें ऐसी हैं कि 'तन और मन' दोनों में से किसी एक को ही खुश कर सकते हैं?
: सहमत : असहमत

4. नया करने से पहले आप फायदे-नुकसान को लेकर सजग नहीं बल्कि फिक्रमंद रहते हैं?
: सहमत : असहमत

5. आप 'मन की आवाज' को ईश्वर की आवाज मानते हैं लेकिन उसके अनुसार कर्म करने से बचते हैं?
: सहमत : असहमत

6. आपको अपनी कमजोरियां पता हैं लेकिन आप 'मन' को बहला-फुसला कर उन्हें दबाए रखते हैं?
: सहमत : असहमत

7. कोई 'मनमर्जी' करने का आरोप लगाए तो आप उसे पूरी तरह खारिज कर देते हैं?
: सहमत : असहमत

8. 'तन और मन' के संबंध को समझने के लिए आप केवल धार्मिक बातों को ही महत्त्व देते हैं?
: सहमत : असहमत

9. कई बार आपकी 'मनमर्जी' के नुकसान सेहत पर भारी पड़ते हैं फिर भी आप बदलते नहीं?
: सहमत : असहमत

स्कोर और एनालिसिस
आप केवल मनमर्जी करते हैं:
अगर आप छह या उससे ज्यादा विचारों से सहमत हैं तो आप मनमर्जी करते हैं। आपका अपने परिवार, कार्यक्षेत्र या अन्य जगहों पर दबदबा तो है लेकिन आपका शरीर उसे स्वीकार नहीं करता। आपको मन के साथ, तन को महत्त्व देना शुरू करना होगा वर्ना सेहत से जुड़ी नई-नई समस्याएं परेशान करेंगी। तन व मन दोनों के लिए सहज बनने की कोशिश करें।

आपके 'तन-मन' काबू में हैं:
छह या उससेे ज्यादा बातों से असहमत हैं तो आपने अपने तन व मन दोनों को साध रखा है। आपका मन बहकता है पर अनुशासित आदतों की लगाम लगाना उसे अच्छी तरह आता है। तन व मन के इसी संतुलन से आपको धन की चिंता नहीं करनी पड़ती। अच्छी आदतों को बनाए रखें।


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शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है हरे रंग की बोतल का पानी


इलाज के लिए रंगों का प्रयोग प्राचीनकाल से होता आ रहा है और यह आज भी उपयोगी है। विशेषज्ञ के अनुसार नेचुरोपैथी की सूर्य किरण चिकित्सा में लाल, पीले, नारंगी, हरे, बैंगनी, आसमानी और नीले रंग से इलाज किया जाता है।

अलग - अलग इलाज के लिए इन रंगों की कांच की बोतल में पानी भरकर और उसके ऊपर लकड़ी का कॉर्क (ढक्कन) लगाकर सूर्योदय के समय लकड़ी के पटरे पर रख दिया जाता है और सूर्यास्त के समय इस पानी को उठा लिया जाता है। इस पानी को दिन में कभी भी पी सकते हैं। यह प्रयोग कई तरह के रोगों को दूर करता है।

- अगर सर्दी, जुकाम, खांसी और बुखार है तो लाल, पीले व नारंगी रंग की बोतल में पानी भरकर रखें।
- शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ानी है तो हरे रंग की बोतल का इस्तेमाल करें।
- नीली, आसमानी या बैंगनी रंग की बोतल के प्रयोग से एसिडिटी, अल्सर, ब्लड प्रेशर व पेट संबंधी रोगों में आराम मिलता है।


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कैमिकल से बने रंग बन सकते हैं जान के दुश्मन


आपके लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि बाजार में मिलने वाले सिंथेटिक यानी बनावटी रंगों में कई तरह के रसायन होते हैं। जैसे काले रंग में लेड ऑक्साइड मिला होता है जिससे किडनी रोग हो सकता है। हरे रंग में मौजूद कॉपर सल्फेट से आंखों में एलर्जी और कुछ समय के लिए अंधापन आ सकता है।

नीले रंग को बनाने के लिए प्रशियन ब्लू का प्रयोग होता है जिससे स्किन एलर्जी हो सकती है। लाल रंग में मौजूद मरकरी सल्फेट, स्किन कैंसर और दिमागी विकारों का कारण बनता है। इसी तरह सिल्वर रंग में एल्युमिनियम ब्रोमाइड, कैंसर की वजह बन सकता है।

हर्बल गीला रंग
पलाश और गुड़हल से लाल रंग, अमलतास से पीला और हरसिंगार से केसरिया रंग बनता है। इन फूलों को रात भर पानी में भिगोकर पीस लें, फिर पानी में मिलाकर आवश्यकतानुसार रंग तैयार करें। रंग ज्यादा गहरा चाहिए तो इसमें फिटकरी का पाउडर मिलाएं। इन फूलों के पौधों की पत्तियों को पीसकर हरा रंग बना सकते हैं।


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#Holi - : तन-मन में ऊर्जा भरने का त्योहार है होली, जानें ये खास बातें


holi - रंग हमारे जीवन में अहम भूमिका निभाते हैं। हर रंग का अपना महत्व है। जहां सफेद रंग शांति और सुकून देता है वहीं काला रंग उदासी व हताशा का प्रतीक माना गया है। रंगों के महत्व को महसूस करने के लिए प्रकृति को करीब से निहारिए, आपको खुद ब खुद अहसास हो जाएगा कि रंग हमारे तन व मन में नई ऊर्जा, उमंग और उत्साह का संचार करते हैं।

रंगों की दुनिया मनोवैज्ञानिकों के लिए आज भी पहेली है। वे हजारों वर्षों से इनमें छिपे अर्थ खोज रहे हैं। रंग किस तरह से हमारी जिंदगी को प्रभावित करते हैं इसके लिए विज्ञान की एक अलग शाखा है। इसे एग्रोनॉमिक्स कहा जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में रंगों से उपचार की प्रक्रिया को क्रोमोथैरेपी का नाम दिया गया है। इसमें रोगों के उपचार के लिए दवाओं की बजाय रंगों का प्रयोग किया जाता है। क्रोमोथैरेपी में रंगों को उनके प्रभाव के अनुसार दो भागों में बांटा गया है। पहला, गर्म प्रभाव और दूसरा, ठंडा प्रभाव।

गर्म प्रभाव के रंग -
नेचुरोपैथी विशेषज्ञ के अनुसार क्रोमोथैरेपी में रोगों की प्रकृति से विपरीत रंग का प्रयोग किया जाता है। जैसे अस्थमा, सर्दी-खांसी-जुकाम, मोटापा और हाइपोथायरॉइड जैसी ठंडी प्रकृति की बीमारियों के लिए लाल, पीला, नारंगी और काले रंग जैसे गर्म प्रभाव के रंगों का प्रयोग किया जाता है।

ठंडे प्रभाव के रंग -
इसके अंतर्गत सफेद, नीला, बैंगनी और हरे रंग को महत्व दिया गया है। हाई ब्लड प्रेशर, पेट में जलन, तनाव, अल्सर, गुस्सा और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याओं के लिए इन रंगों को प्रयोग में लिया जाता है।

उपचार का तरीका -
इलाज के लिए रोगी को बीमारी के प्रभाव के अनुसार उससे संबंधित रंग की सब्जी व फल खाने या उस रंग के कपड़े पहनने के लिए कहा जाता है। किसी भी गंभीर रोग होने की स्थिति में रोगी को आराम मिलने में 20 से 30 दिन का समय लग जाता है।

नीला रंग आंखों को आराम प्रदान करता है। मन को शीतलता देकर क्रोध को शांत करता है। इस रंग को ताजगी और स्फूर्ति का भी प्रतीक माना गया है। हरा रंग यह रंग आत्मविश्वास, जीवन जीने की चाह और उत्साह को बढ़ाता है। गुलाबी रंग यह कोमलता और भावुकता का प्रतीक है। वहीं भूरा रंग दृढ़ता का होता है।

पानी व तेल का प्रयोग करें ऐसे -
क्रोमोथैरेपी के अंतर्गत रोगों के उपचार के लिए तेल या पानी को सूर्य की किरणों के माध्यम से चार्ज किया जाता है। इस लिक्विड चार्ज के लिए कांच की एक पारदर्शी बोतल लें। इस बोतल को गर्म या ठंडे प्रभाव के रंगों में से किसी एक रंग की शीट से पूरी तरह कवर कर लें। अब इस बोतल में पानी या तेल डालकर इसके ऊपर लकड़ी का कॉर्क (ढक्कन) लगा दें। इस बोतल को लकड़ी के पट्टे पर 12-24घंटे के लिए धूप में रखें। ध्यान रहे कि शाम होने पर बोतल को उठा लें और अगले दिन फिर से सूरज की रोशनी में रख दें। इस तरह से तैयार हुए पानी को 40 से 50 मिलिलीटर (एक बार में) की मात्रा में सुबह-दोपहर-शाम को पीने से लाभ होगा। इसी तरह से चार्ज हुए तेल से पूरे शरीर की मालिश करने से भी रोगों में आराम मिलता है। किसी भी तरह का प्रयोग विशेषज्ञ की सलाह के बाद ही करें।

भाव-स्वभाव और रंग -
ठंडी प्रकृति के रोग जैसे सर्दी, जुकाम, खांसी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, मोटापा और हाइपोथायरॉइड होने पर लाल, पीले, संतरी या काले रंग के कपड़े पहनकर धूप में बैठ जाएं या इन्हीं रंगों में से किसी एक रंग की चादर ओढ़कर धूप में लेटें। इसके अलावा गर्म प्रभाव के रंगों का साफा या स्टोल भी पहना जा सकता है। इसी तरह गर्म प्रकृति के रोग जैसे हाई ब्लड प्रेशर, अल्सर, पेट में जलन, तनाव आदि होने पर नीले, हरे, सफेद और बैंगनी रंग के कपड़े पहनें या इसी रंग की फल व सब्जियां जैसे खीरा, लौकी, करेला, पालक, नींबू, शिमला मिर्च, धनिया, पुदीना, मैथी, तुरई, ब्रोकली, पत्तागोभी, बैंगन, शलजम, मूली, जामुन, अमरूद और अंगूर आदि खाएं।

सफेद रंग : सहयोग, शांति और निष्ठा का प्रतीक है। यह तन व मन को शांत रखता है।
पीला रंग - ये रंग खुशी का है जो मन में उमंग व उत्साह का संचार करता है।
लाल रंग- हृदय की धड़कन बढ़ाता है। यह शरीर को ऊर्जा देने के साथ-साथ साहसी भी बनाता है।

रंगीन सब्जियां बनाएंगी स्वास्थ्य -
किसी भी सब्जी या फल को प्रयोग करने से पहले उसे अच्छी तरह से धो लें क्योंकि कई बार रसायनों के प्रयोग से भी फलों व सब्जियों को चमकदार व उनका आकार बढ़ाया जाता है। जब भी लौकी, तुरई या कद्दू खरीदें तो इन्हें कटवाकर देख लें अगर इसमें बीज दिखाई ना दें तो समझ लें कि ऑक्सीटॉक्सिन कैमिकल का प्रयोग हुआ है। पपीते को 3-4 घंटे पानी में रखने के बाद साफ कपड़े से पौंछकर खाएं या फ्रिज में रखेंं। लाल, पीले, हरे, नारंगी व नीले रंग के चटक फल व सब्जियों को नेगेटिव कैलोरी फूड भी कहते हैं क्योंकि इनमें मौजूद पानी व फाइबर की मात्रा से शरीर का फैट कम होता है व शरीर स्वस्थ्य रहता है। हमारी रोजाना की डाइट में कुदरती रंगीन खाद्य पदार्थ शामिल होने से शरीर को एंटीऑक्सीडेंट्स मिलते हैं। इन फलों व सब्जियों में मौजूद पोषक तत्व रोगों से बचाने के अलावा उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को भी धीमा करते हैं।


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खुलकर खेलें हाेली, लेकिन इन बाताें का रखें ध्यान


हर साल डॉक्टरों के पास ऐसे मामले आते हैं जिसमें किसी की शरारत से दूसरे की आंख की रोशनी चली जाती है, कान का पर्दा फट जाता है या कई बार जान पर भी बन आती है। इसलिए जरूरी है कि आप सावधानी से होली मनाएं और सभी के साथ होली के हुड़दंग का मजा लें।

होली खेलें लेकिन थोड़ा संभलकर
होली का रंग अगर नाक व मुंह में चल जाए तो इससे अस्थमा और एलर्जी के मरीजों को काफी दिक्कत हो सकती है इसलिए वे होली ना खेलें क्योंंकि ऐसे लोगों को सांस लेने में परेशानी हो सकती है और कई बार हार्ट अटैक भी आ सकता है।

डॉक्टरी सलाह:
ध्यान रखें कि रंग आपके मुंह में ना जाए क्योंकि यह फेफड़ों, हृदय और किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है। गुब्बारे से ना खेलें, इससे कान के पर्दे पर चोट लग सकती है और सुनाई देना बंद हो सकता है। कान में रंग जाने से ईयर ब्लॉकेज, दर्द और सूजन हो सकती है। किसी भी समस्या से बचने के लिए आप कान में रुईं लगाकर होली खेल सकते हैं। कान में रंग जाने पर खुद ही रंग निकालने का प्रयास ना करें, डॉक्टर से संपर्क करें।

ग्रीस से ना खेलें हाेली
हाेली खेलते समय ग्रीस जैसी चीजाें का प्रयाेग बिल्कुल ना करें। इससे आंखाें की राेशनी जाने के खतरा सबसे ज्यादा हाेता है।

डॉक्टरी सलाह :
मिलावटी रंगों से बचें इनमें पिसा हुआ कांच हो सकता है, जो कॉर्निया पर घाव कर सकता है। सूखी होली खेलें और पानी के गुब्बारों का प्रयोग ना करें। आंखों में रंग जाने पर मसले नहीं, ठंडे पानी से धोएं। कॉन्टेक्ट लेंस पहनकर होली ना खेलें, नुकसान हो सकता है।

कैमिकल से बचें
चाइनीज और चमकीले रंगों से कॉन्टेक्ट डर्मेटाइटिस और इरिटेंट डर्मेटाइटिस की समस्या होती है। चेहरे पर लाल धब्बे, जलन व घाव हो सकते हैं। कुछ समय बाद धब्बे काले पड़ जाने की वजह से निशान रह जाते हैं।

डॉक्टरी सलाह :
आप खुद प्राकृतिक रंग खरीद रहे हैं लेकिन जरूरी नहीं कि आपका दोस्त भी वही खरीदे इसलिए रंगों के दुष्प्रभाव से बचने के लिए कपड़ों से खुद को पूरी तरह पैक कर लें। होली से पहले ब्लीचिंग या वैक्सिंग ना कराएं। इससे रंगों का दुष्प्रभाव जल्दी होता है। बार-बार त्वचा से रंग साफ करें। अगर किसी तरह की जलन हो रही हो तो रंग पानी से अच्छी तरह से धो लें। इसके बाद कैलामाइन लोशन लगाएं।


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happy holi - प्रेगनेंसी में थोड़ी सावधानी से खेलें होली


रंगाें के त्याेहार हाेली पर हर काेर्इ मस्ती में सराबाेर हाेता है। आप भी इस त्याेहार का जमकर मजा ले सकती हैं। लेकिन यदि आप मां बनने वाली हाे ताे आपकाे कुछ बाताें का ध्यान रखना जरूरी है। प्रेग्नेंसी में होली खेलने से कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं। इसलिए गर्भवती महिलाएं होली खेलते समय इन बातों का ध्यान जरूर रखें:-

- गुलाल का प्रयोग ना करें क्योंकि कैमिकल युक्त रंगों की वजह से कई प्रकार के त्वचा संबंधी रोग हो सकते हैं जिससे गर्भपात होने व समय से पूर्व प्रसव पीड़ा हो सकती है।

- जहां तक हो फल और फूल से बने प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करें यह महिला और उसके गर्भस्थ शिशु दोनों के लिए काफी सुरक्षित होते हैं। हर्बल डाई जिसमें फूल का निचोड़ होता है वह एंटीऑक्सीडेंट का काम करती है। गीली होली ना खेलें क्योंकि पानी में फिसलने की आशंका रहती है।

- होली में मिठाइयां व तली हुई चीजें कम ही खाएं। भांग और ठंडाई ना पीएं इनसे ब्लड प्रेशर व हार्ट बीट बढ़ सकती है। आपातकालीन किट और डॉक्टर के नंबर तैयार रखेंं।


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Happy holi - स्किन को हानिकारक रंगों से बचाएगी तेल की मालिश


रंगाें में भरा होली का त्योहार आपकाे अपनी मस्ती में समा लेता है आैर आप दिल खाेले के इसका आंनद लेते हैं। लेकिन इस आंनद में स्वास्थ्य आैर साैंदर्य की देखभाल भी जरूरी है। आइए जानते हैं हाेली के त्याेहार पर रखें जाने वाली सावधानियाें के बारे में :-

रंगों से हमारी त्वचा, आंखों और बालों पर किस तरह के दुष्प्रभाव हो सकते हैं?
होली के रंगों में सिंथेटिक डाई मिली होती है। इसी प्रकार गुलाल भी मिट्टी में बनता है। ये त्वचा की ऊपरी सतह को नष्ट करके कीटाणुओं के लिए उपयुक्त बना देता है। ये कीटाणु त्वचा को जला देते हैं। जिससे स्किन में एलर्जी होती है, खुजली होने लगती है, त्वचा पर लाल दाने हो जाते हैं और पानी निकलने लगता है। बालों को काफी नुकसान होता है उनकी जड़ें नष्ट हो जाती हैं और वे झडऩे लगते हैं। इन रंगों से आंखों में एलर्जी और इंफेक्शन भी हो सकता है।

रंगों के इन दुष्प्रभावों से कैसे बचा जा सकता है ?
बाजार में वेजिटेबल डाई उपलब्ध हैं। यह थोड़ी महंगी होती हैं। टेसू के फूलों का रंग और अरारोट के गुलाल का प्रयोग कर इन दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है।

बचाव के लिए घरेलू उपाय क्या किए जा सकते हैं?
घर से बाहर निकलने और रंग लगाने से पहले शरीर पर अच्छी तरह तेल लगा लें। सूखी त्वचा पर एलर्जी और इंफेक्शन ज्यादा होता है। तेल से त्वचा पर प्रोटेक्टिव परत बन जाती है व रंग त्वचा तक नहीं पहुंच पाते। तेल से सिंथेटिक डाई प्रभावहीन हो जाती है।

शरीर से होली के रंगों को किस प्रकार छुड़ाया जाए?
रंगों को हटाने के लिए अधिक मात्रा में साबुन का प्रयोग ना करें। रंगों को छुड़ाने के लिए मिट्टी के तेल का प्रयोग करने से त्वचा के जलने का खतरा और बढ़ जाता है। रंगों को छुड़ाने के लिए कम केमिकल वाले ग्लिसरिन युक्त साबुन का प्रयोग करें। यदि रंग लगने से त्वचा पर कोई एलर्जी, दाने या धब्बे हो जाएं तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।


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#holi - होली पर बच्चों की सेहत का एेसे रखें ध्यान


holi, HOLI, बच्चों की त्वचा सेंसेटिव और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कमजोर होती है। इसलिए इनके साथ होली खेलते समय सावधानी बरतनी चाहिए।

सर्दी-जुकाम : जिन घरों में छोटे बच्चे हों वहां पानी वाली होली खेलने से बचें क्योंकि भीगने के कारण इस बदलते मौसम में वे जल्दी सर्दी-जुकाम का शिकार हो सकते हैं। रंगों से प्रदूषण काफी बढ़ता है जिससे बच्चों को सांस लेने में तकलीफ होती है। जिन बच्चों को सांस संबंधी समस्या या एलर्जी की परेशानी हो उन्हें रंगों से दूर ही रखें। इसके अलावा जिन बच्चों की इम्युनिटी कम हो उन्हें भी होली के कार्यक्रम में शामिल न करें क्योंकि इन दिनों स्वाइन फ्लू का ज्यादा खतरा बना हुआ है।

त्वचा की एलर्जी -
जिन बच्चों को सिंथेटिक एलर्जी होती है उन्हें रंगों की वजह से त्वचा की एलर्जी होने का खतरा भी बढ़ जाता है इसलिए उन्हें होली न खेलने दें। छह माह से कम उम्र के बच्चों की त्वचा काफी कोमल होती है इसलिए उन्हें रंग न लगाएं।


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तन ही नहीं आपका मन भी रंगते हैं रंग


रंगों के अपने मायने और प्रभाव होते हैं। चिकित्सा की दुनिया में लाल, पीले, नीले और हरे रंग को साइकोलॉजिकल प्राइमरी कलर माना गया है। ये रंग तन, मन और भावनाओं के बीच सही संतुलन बनाते हैं।आइए जानते हैं इनके बारे में :-

लाल रंग:
यह रंग शारीरिक साहस, मजबूती, ऊर्जा, उत्तेजना और रोमांच से जुड़ा है। यह रंग तेजी से आगे बढऩे का अहसास भी कराता है इसलिए इसे मित्र रंग भी माना गया है।

नीला रंग:
यह रंग बुद्धिमानी, सकारात्मकता, विश्वास और मन को शांति देने वाला है। गाढ़ा नीला रंग तनाव दूर करता है। वहीं हल्का नीला ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखता है।

पीला और हरा
पीला रंग: यह रंग आत्मसम्मान, दृढ़ता, विश्वास, मित्रभाव व सृजनात्मकता को बढ़ाता है लेकिन इसका गलत प्रभाव भय या चिंता बढ़ाकर आत्मविश्वास पर असर डाल सकता है।

हरा रंग: यह सौहार्द, आत्मीयता, संतुलन, आराम व शांति देता है। इस रंग को देखने से सुकून का अहसास होता है।


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सेहत में खूबसूरत रंग भरती है आर्ट थैरेपी


अगर आप अपने जीवन से किसी भी तरह की मानसिक परेशानी को दूर करना चाहते हैं तो आर्ट थैरेपी अपना सकते हैं। शोध बताते हैं कि बच्चे, बुजुर्ग व महिलाओं के लिए यह थैरेपी काफी उपयोगी साबित हो रही है। आइए जानते हैं कैसे हाेता है फायदा :-
भावनाओं का चित्रण
आमतौर पर देखा गया है कि जो लोग डिप्रेशन या स्ट्रेस से घिरे रहते हैं वे आर्ट के माध्यम से अपनी भावनाओं को बेहतर तरीके से पेश कर पाते हैं। इससे मानसिक स्वास्थ्य में काफी सुधार होता है। आर्ट थैरेपी की जड़ें एंथ्रोपोसोफी में हैं। यह एक आध्यात्मिक अभ्यास है जिसे रुडोल्फ स्टीनर ने शुरू किया था। इसमें कई समूहों के बीच सत्रों का आयोजन किया जाता है, जिसमें थैरेपिस्ट स्ट्रक्चर्ड एक्सरसाइज करवाते हैं।

मानसिक सेहत में सुधार
यह इंसान की शारीरिक-मानसिक व इमोशनल वेल-बीइंग में सुधार के लिए रचनात्मक प्रक्रिया को महत्त्व देती है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति की भावनाओं को सकारात्मक बनाने का सबसे ज्यादा प्रयास किया जाता है।

समस्या का समाधान
आर्ट थैरेपिस्ट शोध, अनुभव व आकलन के आधार पर व्यक्ति की समस्या के अनुरूप समाधान के रूप में उसे चित्र बनाने के लिए कहते हैं। इसके नियमित अभ्यास से नकारात्मक विचारों को सकारात्मक विचारों में बदला जा सकता है। इसके अलावा वे मन की दूसरी बातों को जानने के लिए कई तरह के टेस्ट भी करते हैं।

दिमाग पढ़ने की कोशिश
विशेषज्ञों का मानना है कि आर्ट थैरेपी कई मोर्चों पर सफल साबित हुई है। इंसान के खाने, सोने और सांस लेने से जुड़ी समस्याओं में भी इससे काफी फायदा देखा गया है। आप किस तरह से पेंटिंग करते हैं, यह बेहद महत्त्वपूर्ण है। आर्ट थैरेपिस्ट इसी आधार पर आपके व्यक्तित्व को समझने की कोशिश करता है। वह ब्रश स्ट्रोक, पेंटिंग के रंगों की क्वालिटी व टेक्स्चर के आधार पर आपके सब-कॉन्शियस माइंड में चल रहे विचारों को पढ़ने की कोशिश करता है। पेंटिंग करना ध्यान की तरह है। पेंटिंग के दौरान इंसान खुद को बेहतर तरीके से पेश करने का पूरा प्रयास करता है।


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बिना दवा खाए कंट्रोल हो सकता है बीपी, जानें ये टिप्स


एक अध्ययन के मुताबिक संतुलित डाइट व हैल्दी लाइफस्टाइल से ब्लड प्रेशर की समस्या नियंत्रित हो सकती है। जानते हैं इसके बारे में।

शारीरिक गतिविधि : मोटापा हाई बीपी का एक बड़ा कारण है। मोटापा कम करके आप बीपी की समस्या से छुटकारा पा सकते हैं।

मोटापा कम करने के लिए शारीरिक रूप से सक्रिय रहना जरूरी है। नियमित वॉक व एक्सरसाइज करें। घरेलू कार्य करें। लिफ्ट के बजाए सीढ़ियों का प्रयोग करें। संतुलित आहर लें।

नमक कम खाएं : विशेषज्ञों के अनुसार नमक से हाई बीपी का सीधा संबंध है। इसलिए नमक कम खाएं व भोजन में ऊपर से इसे न डालें।

फल व सब्जी लें : दैनिक खुराक में पर्याप्त मात्रा में फल औऱ सब्जियां खाने की आदत डालें। इनमें पोटेशियम, मैग्नीशियम व फाइबर होते हैं, जो रक्तचाप कम करने में मददगार साबित होते हैं।

शराब-सिगरेट से तौबा : इनसे रक्त धमनियों का लचीलापन कम होकर उनमें सिकुड़न पैदा हो सकती है।


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शराब न पीने वालों को भी हो सकती है ये घातक बीमारी


एक स्वस्थ लिवर के लिए जरूरी है कि उसमें वसा की मात्रा कम से कम हो। जब इसकी कोशिकाओं में वसा की मात्रा अधिक हो जाती है तो इसे नॉन एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) कहते हैं। यह रोग चार तरह से बढ़ता है और यदि समय रहते इसका इलाज न कराया जाए तो लिवर फेल्योर की समस्या भी हो सकती है। आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।

फैटी लिवर -
जब लिवर में वसा की मात्रा कम होती है और कोई लक्षण भी नहीं होते तो यह रोग की शुरुआती अवस्था होती है जिसे फैटी लिवर या स्टेएटोसिस कहा जाता है। जंकफूड की अधिकता और शारीरिक गतिविधियों के अभाव से यह समस्या आम हो गई है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि व्यक्ति दवा, सही खानपान और व्यायाम को अपनाए तो लिवर छह माह में सामान्य हो जाता है। रोग गंभीर होने पर लिवर ट्रांसप्लांट भी कराना पड़ सकता है।

नॉन एल्कोहॉलिक स्टेएटो हेपेटाइटिस -
फैटी लिवर की समस्या से पीड़ित बहुत कम लोग एनएएसएच से प्रभावित होते हैं। इस रोग में मरीज को पेट के ऊपरी भाग में हल्का दर्द व लिवर में सूजन हो जाती है। सामान्यत: इसके लक्षण सामने नहीं आते और रुटीन टेस्ट से भी इसका पता नहीं चल पाता। इसके लिए विशेषज्ञ कुछ विशेष प्रकार के टेस्ट करवाते हैं।

लिवर का काम -
यह ग्लाइकोजेन को इक्कठा कर इसे ग्लूकोज में तोड़ने के बाद रक्त शिराओं में उस समय प्रवाहित करता है जब शरीर को ऊर्जा की जरूरत होती है।
प्रोटीन और वसा की पाचन प्रक्रिया को आसान बनाता है।
रक्त में थक्के बनाने वाले प्रोटीन का निर्माण।
शराब, ड्रग्स और अन्य दूषित पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने का काम करता है।
भोजन को पचाने के लिए बाइल (पाचक रस) का निर्माण करता है।
हम जो भी खाते व पीते हैं उन्हें लिवर एंजाइम्स द्वारा पचाने के बाद शरीर की मरम्मत के लिए ऊत्तकों तक पहुंचता है।

ध्यान रहे : भारत में होने वाली लिवर की समस्याओं में एनएएफएलडी आम है जिससे देश में 30 से 40 प्रतिशत लोग प्रभावित हैं।
भ्रम न पालें : नॉन एल्कोहॉलिक फैटी लिवर की समस्या शराब से नहीं होती लेकिन इसका सेवन रोग को अधिक गंभीर बना सकता है। इससे लिवर खराब होने की आशंका दोगुनी हो सकती है।

पहचान -
इसकी जांच लिवर फंक्शनिंग टेस्ट (ब्लड टेस्ट) से की जाती है। कई बार टेस्ट रिपोर्ट सामान्य आने पर भी यह बीमारी हो सकती है।

इन्हें है खतरा -
बच्चे हों या वयस्क यदि वे मोटे हैं तो उन्हें लिवर संबंधी समस्या की आशंका रहेगी। धूम्रपान करने वाले, 50 से अधिक आयु के लोग, हाई कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज होने पर भी खतरा होता है।

फाइब्रोसिस -
लिवर रोग से पीड़ित कुछ लोगों में एनएएसएच की समस्या फाइब्रोसिस में तब्दील हो जाती है। इससे लिवर के ऊत्तक प्रभावित होने लगते हैं लेकिन कुछ स्वस्थ ऊत्तक इस अंग को काम करने के लिए मदद करते रहते हैं।

लिवर सिरोसिस -
यह रोग की गंभीर अवस्था होती है जहां पर ऊत्तक क्षतिग्रस्त होने लगते हैं और लिवर कोशिकाआें के गुच्छे बनने लगते हैं। यह समस्या 50 से 60 साल की आयु के बाद होती है। जिन्हें टाइप-२ डायबिटीज होती है उन लोगों में इसका खतरा अधिक होता है।

ऐसे घटाएं वजन -
व्यायाम करें : इससे बचने के लिए व्यायाम करना जरूरी है। इससे लिवर की कोशिकाओं पर जमी अतिरिक्त वसा को हटाने में मदद मिलेगी व स्ट्रोक और हार्ट अटैक का खतरा घटेगा।

धूम्रपान छोड़ें : अगर धूम्रपान की लत है तो इससे तौबा करना ही बेहतर होगा क्योंकि इसे छोड़कर ही स्ट्रोक या हार्ट अटैक के खतरे को कम किया जा सकता है।
उपचार : इसके लिए फिलहाल कोई दवा उपलब्ध नहीं है लेकिन हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज की कुछ दवाएं लिवर के लिए फायदेमंद हो सकती हैं।


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अगर दिखाई दें ये लक्षण तो हो सकती है डिप्रेशन की समस्या


प्रत्येक व्यक्ति समय-समय पर सीमित अवधि के लिए उदासी का अनुभव करता है। लेकिन जब लंबे समय तक लगातार नकारात्मक सोच, दुखी मनोदशा या पसंदीदा गतिविधियों में भी दिलचस्पी न लेने जैसे लक्षण सामने आने लगें तो यह डिप्रेशन हो सकता है। जानते हैं इसके बारे में-

डिप्रेशन के कारण -
आनुवांशिक : परिवार में माता-पिता या कोई अन्य सदस्य डिप्रेशन (अवसाद) से पीडि़त होता है तो बच्चों में ऐसा होने का खतरा रहता है।

कमजोर व्यक्तित्व : बचपन में मां-बाप के प्यार का अभाव, कठोर अनुशासन, तिरस्कार, सामथ्र्य से अधिक अपेक्षा या ईष्र्या कई बार मस्तिष्क को ठेस पहुंचाती हैं। जो बड़े होने पर विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति के लिए डिप्रेशन का कारण हो सकती है।

मानसिक आघात : बार-बार असफलता, नुकसान या किसी प्रियजन की मृत्यु आदि से भी ऐसा हो सकता है।

शारीरिक रोग : एड्स, कैंसर, नि:शक्तता या कोई अन्य मर्ज जिसमें रोगी लंबे समय तक बिस्तर पर रहता है। वह इस परेशानी से ग्रसित हो सकता है।

अन्य कारण : पारिवारिक झगड़े, अशांति, संबंध-विच्छेद, व आर्थिक परेशानी आदि वजहों से भी ऐसा हो सकता है।

ये हैं लक्षण -
मानसिक : दो सप्ताह से ज्यादा लगातार उदासी, असंगत महसूस करना, मिजाज में उतार-चढ़ाव, भूलना, एकाग्र न हो पाना, गतिविधियों में रुचि न लेना, चिंता, घबराहट, अकेलापन, शारीरिक देखभाल में अरुचि, नशे की इच्छा होना आदि।

विचार व अनुभूति : असफलता संबंधी विचार, स्वयं को कोसना, शीघ्र निराश होना, असहयोग, निकम्मेपन के विचार, दुर्भाग्यपूर्ण कार्य के लिए स्वयं को जिम्मेदार ठहराना, भविष्य के लिए नकारात्मक व निराशावादी दृष्टिकोण, आत्महत्या के विचार आदि।

शारीरिक : सामान्य नींद की प्रक्रिया में विघ्न, नींद न आना व सुबह जल्दी उठ जाना, किसी काम को धीरे-धीरे करना, भूख में कमी, लगातार वजन कम होना, थकान महसूस होना, अपच, मुंह सूखना, कब्ज, अतिसार, मासिक धर्म की अनियमितता, सिर, पेट, सीने, पैरों, जोड़ों में दर्द, भारीपन, पैरों में पसीना, सांस लेने में दिक्कत आदि।

कई तरह के अवसाद -
इसके दो मुख्य प्रकार हैं पहला एंडोजीनस (यह आंतरिक कारणों से होता है)। दूसरा न्यूरोटिक (आमतौर पर यह बाहरी कारणों से होता है)। इनके अलावा डिसथीमिया, मौसम प्रभावित डिप्रेशन (सीजनल इफेक्टिव डिसऑर्डर), मनोविक्षप्ति (साइकोटिक),छिपा (मास्कड) व प्रसन्नमुख (स्माइलिंग) डिप्रेशन इसके अन्य प्रकार हैं।

इलाज व बचाव -
इलाज : डॉक्टर मरीज की काउंसलिंग करके रोग की वजह समझने का प्रयास करते हैं। इसके बाद आवश्यकता के अनुरूप 6-8 माह तक एंटीडिप्रेसेंट दवाएं देते हैं। दवाओं के साथ-साथ मनोचिकित्सा व व्यवहारिक चिकित्सा द्वारा रोगी की निराशाजनक सोच को बदलने का प्रयास किया जाता है। इस दौरान मरीज को पारिवारिक सहयोग जरूरी होता है।

बचाव : प्रतिदिन व्यायाम करें। शराब और सिगरेट से दूरी बनाएं। सकारात्मक सोच को अपनाएं। रोजाना पूरी नींद लें। परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताकर डिप्रेशन से लड़ा जा सकता है।


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