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एक बंधक की आपबीती, रिहाई कैसे संभव


जोएल सिमॉन की किताब ‘वी वांट टू निगॉशिएट- द सीक्रेट वल्र्ड ऑफ किडनैपिंग हॉस्टेजेस एंड रैनसम’ में अपहरण, फिरौती और बंधक बनाने की कहानी को विस्तार से लिखा है। वे लिखते हैं कि 2014 में जब ईरान के आइएस आतंकियों ने मुझे अगवा किया और 544 दिनों तक बंधक बनाकर रखा तो मैंने इसे व्यक्तिगत नहीं लिया था।

तेहरान के जिन अधिकारियों ने मेरे घर में छापेमारी के बाद मुझे और मेरी पत्नी को गिरफ्तार किया उनकी इसमें कोई रुचि नहीं थी। उन्होंने मुझे सिर्फ इसलिए पकड़ा था क्योंकि मैं ‘वाशिंगटन पोस्ट’ का संवाददाता और अमरीकी नागरिक था। मुझे इसकी उम्मीद भी बहुत कम थी कि अमरीकी सरकार मेरी रिहाई के लिए प्रयास करेगी। बंधक बनाए गए लोग जहां के रहने वाले हैं वहां की सरकार को निर्णय लेना होता है। क्या वे फिरौती देंगे? क्या वे कुछ भी कहने से मना कर देगी या कोई दूसरी रणनीति अपनाएगी? सिमॉन बड़ी बेबाकी से कहते हैं कि बंधक बनाए जाने की स्थिति में निर्णायक मोड़ पर पहुंचना मुश्किल होता है। इसका कोई एक जवाब नहीं है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए। सिमॉन ने बंधकों की सुरक्षित वापसी के लिए तीन प्रमुख कारक बताए हैं।

2012 में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के एंटी टेररिज्म गुरु रहे डेविड एस. कोहेन ने कहा था कि अपहरणकर्ता की मांग को पूरा न किया जाए तो ऐसी घटनाओं में कमी आएगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि कई स्थितियों में पैसा न देना बंधकों की जान खतरे में डालने के समान है। ऐसे में निर्णय महत्वपूर्ण होता है।

पहला क्या अपहृत व्यक्ति का फिरौती बीमा है, दूसरा आपराधिक संगठन अपहरण से जुड़ा है या नहीं? और तीसरा, व्यक्ति क्या ऐसे राष्ट्र का है जो फिरौती देने में सक्षम है? इन तीन में से यदि एक का जवाब हां में है तो सुरक्षित रिहाई संभव है। अगर जवाब ना में है तो अपहृत व्यक्ति का जीवन खतरे में है। वे कहते हैं कि फिरौती देना आपराधिक घटनाओं को बढ़ावा देने के बराबर है।

जेसन रेजैनपुस्तक विश्लेषक वाशिंगटन पोस्ट, वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत


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बिछड़े हुए बच्चों को क्यों न मिले अधिकार


बच्चे सबके प्रिय होते हैं यही कारण है कि जब इन्हें कुछ होता है तो कष्ट सभी को होता है। वलेरिया लुईसेली की किताब ‘लॉस्ट चिल्ड्रेन अर्काइव’ जो चार हिस्सों में विभाजित है जो बच्चों के गुम होने पर आधारित है। इसमें उन्होंने बताया है कि हम बच्चों को बचपन में ही ऐसे हाथों में छोड़ देते हैं जहां से वे कभी लौटकर नहीं आ पाते हैं।

वे लिखती हैं कि बच्चों का खोना हमारे लिए कैसे चुनौतीपूर्ण बनता जा रहा है जिससे दुनिया के हर देश को निपटना है। किताब 40 सवालों पर आधारित है जिसमें ये जानने की कोशिश की गई है कि ‘ये कैसे खत्म हो सकता है’। वलेरिया ने किताब में स्पष्ट लिखा है कि प्रवासी बच्चों की सुरक्षा उस देश की होती है जहां वे रह रहे हैं। ऐसा न होने से बच्चों की जिंदगी तबाह हो गई है।

किताब में प्रवासी बच्चों की परेशानियों के साथ उनके भविष्य के खतरे के बारे में भी बताया गया है। उन अभिभावकों के बारे में भी लिखा है जो किसी कारण से अपना सब सुख चैन त्यागकर शरणार्थी कैंपों में रहते हैं। स्थिति ये है कि इन कैंपों में वे अपने बच्चों से भी बिछड़ जाते हैं और ये परिवार दोबारा कभी मिल नहीं पाता है। इस पीड़ा को सहते हुए बच्चों को अपना जीवन बुरी हालत में गुजारना पड़ता है।

अमरीका में हुए शटडाउन पर राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बयान की आलोचना की है जिसमें उन्होंने प्रवासी लोगों और बच्चों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इसका मकसद सिर्फ जनता का सहयोग पाना था जिससे अमरीका और मेक्सिकों सीमा पर दीवार खड़ी की जा सके। ऐसे कदम से परिवार और बच्चे अलग होते हैं जिसे किसी भी देश की सरकार किसी हाल में सही नहीं कर सकती है।

पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ऐसे बच्चों के लिए नियम बनाया था कि अगर उनका केस लडऩे के लिए 21 दिन के भीतर वकील नहीं मिलता है तो उसे उस देश वापस भेजा जाएगा जहां का वह रहने वाला है। भागे, बिछड़े बच्चे अकेले बसों और ट्रेनों में यात्रा कर मीलों चले जाते हैं पर कोई सुध लेने वाला नहीं है, इसपर सबको ध्यान देना होगा।

क्रिस्टेन मिलर्स पुस्तक विश्लेषक, वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत


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विज्ञान जिसने बसा दी एक नई दुनिया


विज्ञान ने मानव का इतिहास बदल दिया और इसी का नतीजा है कि दुनिया का हर आदमी आगे निकलने की होड़ में लगा है। शेला जैसनॉफ की किताब ‘कैन साइंस मेक सेंस ऑफ लाइफ’ इसी पर केंद्रित है जिसमें बताया है कि 16वीं सदी में विज्ञान की दुनिया में क्रांति हुई जिसने मानव के 500 साल पुराने इतिहास को पूरी तरह बदल कर रख दिया है।

सैन्य ताकत, अर्थव्यवस्था, तकनीक, सामाजिक व सांस्कृतिक बदलाव ने दुनिया को एक सूत्र में पिरोने का काम किया तो विज्ञान ने आधुनिक दुनिया को बसाने का काम किया है जिससे लोगों की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी है। प्राकृतिक संसाधनों पर तकनीक के इस्तेमाल से एक नई दुनिया देखने को मिल रही है। इसी का नतीजा है कि आज स्मार्टफोन, रॉकेट, रोबोट, कार, दवा और अन्य चीजें आज सभी के पास उपलब्ध हैं।

हालांकि विज्ञान के विकास का लाभ सभी को बराबर रूप में नहीं मिला है। विज्ञान से कुछ नुकसान भी हुए हैं जैसे खाद्य पदार्थों में पेस्टीसाइड, परमाणु ऊर्जा और भविष्य के नाम पर गोपनीयता की भावना से मानव को ही नुकसान हुआ है। फायदे और नुकसान को लेकर बहस जारी है। विज्ञान कुछ सच्चाई को छुपाकर रखना चाहता है और उसी आधार पर कुछ नया कर अपनी शक्ति बढ़ाना चाहता है।

20वीं सदी में मानव की सबसे गुप्त बात डीएनए को विज्ञान ने दुनिया के सामने रख दिया है। आइवीएफ तकनीक पर सवाल उठाते हुए कहा है कि क्या भविष्य का मनुष्य तैयार करने की ये नई तकनीक है? इसमें कोई दो राय नहीं की इससे लोगों को संतान सुख मिल रहा है पर क्या इस पर सोचने की जरूरत नहीं है? क्या विज्ञान अकेले जीवन का सार बन सकता है? ऐसा संभव नहीं है। मानव और विज्ञान के बीच संतुलन जरूरी है जिससे ये तय हो कि हम कहां से आए हैं और क्या कर रहे हैं।

डोरोन वेबर, पुस्तक विश्लेषक, वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत


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इंसान आखिर इतना आक्रामक क्यों?


मानव जाति की उत्पत्ति शांति, सद्भाव और प्यार के लिए हुई थी पर हजारों वर्षों से इंसान एक दूसरे का दुश्मन बना हुआ है। रिचर्ड व्रांगहम की किताब द गुडनेस पैराडॉक्स: स्ट्रेंज रिलेशनशिप बिट्वीन वच्र्यु एंड वॉयलेंस इन ह्यूमन इवॉलुशन इसी पर आधारित है जिसमें मानव जाति के रिश्तों पर लिखा है। बीती शताब्दी में लाखों की संख्या में लोग एक दूसरे के हाथों मारे गए, भले ही उसके लिए सिलसिलेवार हत्याएं, युद्ध, परमाणु शक्तियों का इस्तेमाल हुआ हो। उसकी तुलना में आज के समय में हालात बेहतर हैं।

हार्वर्ड के मानव विज्ञानी रिचर्ड का मानना है कि आखिर व्यक्ति कैसे और क्यों अपनों का ही दुश्मन बन जाता है। वे उदाहरण देते हुए समझातें हैं कि कांगों में चिपैंजी और बोनोबोस एक नस्ल के दो जानवर हैं जिनका डीएनए एक दूसरे से काफी मिलता जुलता है। मानव विज्ञान को आधार बनाकर लिखा है कि मनुष्य ने अपनी इच्छाओं को पहले की तुलना में अधिक बड़ा किया जिससे उसके भीतर ईष्र्या का भाव आया है।

इन दोनों जानवरों की प्रकृति इंसानों से मिलती जुलती है। बोनोबॉस शांत प्रिय जंतु है जबकि चिंपैंजी अपने दोस्तों को यहां तक की अपने बच्चों को भी मारने से परहेज नहीं करता है। इसी आधार पर वे कहते हैं कि इंसानों में भी दो तरह की प्रकृति है जिसमें एक शांत तो दूसरा आक्रामक होता है। चिंपैंजी के उग्र होने का कारण उसे गोरिल्लाओं से संसाधनों के लिए युद्ध करना पड़ता है जबकि बोनोबॉस को प्रतिस्पर्धा नहीं करनी पड़ती है और शांत होते हैं। इसी तर्ज पर मनुष्य आगे निकलने और कब्जे की होड़ में वह एक दूसरे का दुश्मन बन बैठा है।

वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत

 


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ढलती उम्र में जिंदगी जीना सीखें महिलाएं


क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट मेरी पिफर की किताब ‘रिवाइविंग ओफेलिया’ 1994 की बेस्ट सेलर बुक थी। किताब में उन्होंने किशोरावस्था में प्रवेश कर चुकी लड़कियों का जिक्र कर उन्हें जिंदगी जीने का तरीका बताया था। अब उनकी नई किताब ‘वीमन रोइंग नॉर्थ’ 60 व इससे अधिक की उम्र में प्रवेश कर चुकी महिलाओं के लिए है जिसमें उन्होंने जिंदगी के अंतिम चरण को बेहतर, खुशनुमा और उत्साह से परिपूर्ण रखने का तरीका बताया है। उन्होंने लिखा है कि बढ़ती उम्र में लचीलापन जरूरी है क्योंकि इसी से जिंदगी संतुलित रहती है। उम्र सेहत की तुलना में अधिक मायने नहीं रखती है। खुशियां बहुत आसानी से नहीं मिलती हैं लेकिन वे बहुत शक्तिशाली होती हैं।

किताब में उन्होंने बढ़ती उम्र की महिलाओं के लिए सोचने के तरीके के बारे में बताया है। उन्होंने लिखा है कि इस उम्र में जो दिल में आए खुलकर करना और कहना चाहिए क्योंकि इसी से शरीर को एक विशेष तरह की ऊर्जा मिलती है। भले ही वे लिखने, घूमने और चॉकलेट खरीदने का शौक क्यों न हो। कहीं नहीं जा सकते तो एक बार डॉक्टर के पास गाड़ी खुद चलाकर जाएं आपको एक अलग तरह की खुशी का अहसास होगा। किताब में लिखा है कि जब किसी असहनीय शारीरिक दर्द से गुजर रहे हैं तो अपना पसंदीदा म्यूजिक सुनें, ध्यान लगाएं। हर तकलीफ कम हो जाएगी। किताब में लिखा है कि ढलती हुई उम्र जिंदगी का वह पड़ाव होता है जिसमें महिला को अपने जीवन के खुशनुमा पलों को भी याद करना चाहिए। ऐसा करने से शरीर और मन को गजब की ऊर्जा मिलती है जिससे कई तरह की परेशानियों दूर होती हैं। मन में कोई भी बात न रखें इससे मानसिक और शारीरिक विकार उत्पन्न होता है जो कई रोगों का कारण है।

निराशा और घबराहट महिलाओं को ताउम्र सताने वाली समस्या है। ऐसी स्थिति ढलती हुई उम्र में न हो इसके लिए खुद का खयाल रखने के साथ तनाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। जब ऐसा कर लेंगी तो सारी चिंता खुशी में बदल जाएगी। जीवन में कड़वी सच्चाई से भी गुजरना पड़ता है इससे पार पाने के लिए हिम्मत जरूरी है।

शिबी ओ सुलिवन, पुस्तक विश्लेषक , वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत


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मीटिंग वही अच्छी जो कम समय में पूरी हो


वर्ष 2019 की शुरुआत हो चुकी है और अगर आप नए साल में एक सेकंड भी फोन और बेवजह की मीटिंग में खराब नहीं करना चाहते हैं तो आपके लिए किताबें पढऩा सबसे अच्छा रहेगा। स्टीवन रॉजलबर्ग की किताब ‘द सरप्राइजिंग साइंस ऑफ मीटिंग्स’ ऐसी ही किताब है जिसमें जिंदगी को सहज ढंग से जीने का तरीका बहुत सलीके से बताया है। किताब में स्टीवन ने लिखा है कि नए साल पर हर किसी को तय करना होगा कि वे खाली बैठने और बेवजह की मीटिंग से बचे। स्टीवन यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना में शोधार्थी हैं और टीमवर्क पर काम कर रहे हैं। किताब में इन्होंने लिखा है कि किसी बात को लेकर जहां भी बैठके होती हैं उसका समय 5 से 10 फीसदी कम होना चाहिए जो समय आपने पहले से तय किया हो। मीटिंग का एजेंडा प्रभावी हो इसके लिए त्वरित फैसले लें और उसे लागू करें। नए आइडिया के लिए चीजों पर गौर करें और उसपर कम से कम समय में चर्चा करें ना कि लंबी प्रेजेंटेशन में समय खराब करें।

किताब में लिखा है कि मीटिंग में समय व्यर्थ करने की बजाए टीम की परफॉर्मेंस बढ़ाने पर जोर दें। इसके लिए बहस की नहीं अच्छी सोच के साथ उसको लागू कराने की हिम्मत होनी चाहिए। किताब में आंकड़े का जिक्र करते हुए लिखा है कि 47 फीसदी कर्मचारी मीटिंग को समय बर्बाद करने का सबसे आसान तरीका मानते हैं। मीटिंग को सफल बनाने के लिए जिस व्यक्ति को बैठक लेनी है उसके पास अच्छी योजना होनी चाहिए। मीटिंग में कम से कम समय लगे इसके लिए स्पष्ट रणनीति होनी चाहिए। मीटिंग से पहले सर्वे रिपोर्ट, एजेंडा और चेकलिस्ट का होना जरूरी है जिससे बाद में ये न लगे कि बैठक बेनतीजा रही। इसका पालन बैठक को सफल बताएगा। किताब में स्टीवन ने सभी को सलाह दी है कि खुद को दिशाहीन न होने दें। कार्यस्थल पर जीवन को नए अंदाज में शुरू करें इसका लाभ आपके साथ कंपनी को भी मिलेगा।

वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत

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किताब की शक्ल में चर्चित हो रहे हैं इस पत्रकार के नोट्स


भारतीय टीवी के मशहूर पत्रकार और इंटरव्यूअर करण थापर अरविंद दास की इस किताब के विमोचन कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि थे। वरिष्ठ आलोचक वीर भारत तलवार और राजस्थान पत्रिका के सलाहकार संपादक ओम थानवी ने इस मौके पर आयोजित चर्चा में शामिल हुए। जबकि कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध लेखक प्रभात रंजन ने किया।

सबाल्टर्न के प्रति संवेदनशील दृष्टि

प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने किताब में लेखक की निम्नवर्गीय चेतना को खास तौर पर रेखांकित किया। उन्होंने कहा- ‘मीडिया के डॉमिनेंट डिसकोर्स में जिसकी बात नहीं की जाती है इस किताब में उस पर बात की गई है।’ उन्होंने लेखक की दलितों-पिछड़ों, सबाल्टर्न के प्रति संवेदनशील दृष्टि की बात की। किताब में मिथिला पेंटिंग, बीबीसी और पीर मुहम्मद मुनिस के ऊपर लेखों का जिक्र किया। साथ ही इन लेखों की तुलना शेखर जोशी की कहानियों से की। उन्होंने कहा कि इस किताब में पत्रकारिता और साहित्य का अदभुत संगम है। जेएनयू में प्रोफेसर रहे वीर भारत तलवार ने किताब में शामिल एक लेख का जिक्र करते हुए कहा कि जेएनयू पर इतना मुक्कमल लेख उन्होंने कहीं और नहीं पढ़ा।

बारीक दृष्टि और सहज भाषा

इस मौके पर किताब की चर्चा करते हुए ओम थानवी ने कहा कि ‘अरविंद शोधार्थी है पर शोध का बोझ इनके लेखन में नहीं है। यह किताब साहित्य के करीब है।’ उन्होंने लेखक की संवेदनशीलता, चीजों को देखने की बारीक दृष्टि और सहज भाषा का उल्लेख किया। उन्होंने किताब में मौजूद यात्रावृतांत का उल्लेख करते हुए कहा कि रघुवीर सहाय ने लिखा है- ‘बोले तो बहुत पर कहा क्या’। उन्होंने कहा कि अरविंद की यात्रा में ज्ञान नहीं है, अनुभव है, स्पंदन हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि कई लेखों में विस्तार की गुजांइश थी, पर चूंकि अखबार के लिखे गए लेख हैं तो एक सीमा हमेशा रहती है। पर उन्होंने अगले संस्करण में लेखक से अपने नोट्स में और भी कुछ जोड़ने की गुजारिश की। वर्तमान मोदी शासन के दौर में ‘गोदी मीडिया’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि लेखक इस किताब में पत्रकारिता पर भीतर से ऊंगुली उठाते हैं।

कार्यक्रम का संलाचन करते हुए प्रभात रंजन ने किताब में संकलित लेखों में साहित्यकता पर जोर दिया। साथ ही निबंधों में मौजूद लालित्य को रेखांकित किया, साथ ही किताब का एक अंश 'सावन का संगीत' पढ़ कर सुनाया। उन्होंने किताब के एक खंड ‘स्मृतियों का कोलाज’ का खास तौर पर जिक्र किया।

किताब के लेखक अरविंद दास ने कार्यक्रम के शुरुआत में पेरिस यात्रा और मैथिली भाषा पर किताब में शामिल लेखों का पाठ किया। किताब में पाँच खंड हैं जो लेखक की देश-विदेश की यात्राओं, मीडिया, कला-संस्कृति , रिपार्ताज और संस्मरण को समेटे हैं।


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आरएसएस और बीजेपी के संबंधों की तह तक ले जाने वाली किताब


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) पर वॉल्टर एंडरसन और श्रीधर डी दामले की नई किताब ‘आरएसएस: अ व्यू टू द इनसाइड’ में संघ के उन भीतर के पहलुओं और उसकी कार्यप्रणाली को जानने का मौका मिलेगा जिससे अधिकतर लोग अनजान हैं। पुस्तक को गहन रिसर्च व केस स्टडी के साथ लिखा गया है। इसमें संघ के शुरुआती दौर से मौजूदा स्वरूप तक पहुंचने की यात्रा, इसके सत्तारूढ़ दल बीजेपी के साथ संबंधों और इसके संबद्ध संगठनों के बारे में विस्तार से बताया गया है। किताब में आरएसएस के संविधान से लेकर उसकी बढ़ती हुई ताकत और राजनीति के साथ देश दुनिया की संस्कृति में बढ़ते दखल के बारे में बताया गया है।

सरकार के निर्णयों में संघ की क्या भूमिका है इसका भी वर्णन है। संघ की उत्त्पत्ति से लेकर एक संगठन के नाते उसके विचारों का वर्णन है। भारतीय जनता पार्टी को 2014 के लोकसभा चुनावों में संघ ने कैसे खड़ा किया और पल-पल बदलते हालात के साथ सरकार का कैसे साथ दिया। यह भी सच्चाई है कि आरएसएस का अपना संविधान है जिसके बारे में उसके नेताओं और करीब से जानने वालों को भी पूरी तरह नहीं पता।

पुस्तक में तीन सवालों पर मुख्य रूप से प्रकाश डाला गया है। पहला कि पच्चीस वर्षों में संघ व इससे संबद्ध संगठनों का इतना तेजी से विस्तार कैसे हुआ? भारत के नए आर्थिक-सामाजिक परिवेश में किस तरह इन्होंने अपने को ढाला है? और इनका तेज विस्तार देश की राजनीति व नीतियों पर क्या असर डालेगा? साथ ही लेखकों की अंदर तक पहुंच के कारण संघ की आंतरिक कार्यप्रणाली को भी समझने में मदद मिलती है।

आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर वर्तमान में बीजेपी व आरएसएस के बीच कैसे संबंध हैं। यदि व्यक्तिगत संबंधों की बात करें तो नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत के संबध कैसे हैं? इसके बारे में उठ रहे सवालों के बीच लेखक के विचार हैं कि संघ के पैतृक संगठन जनसंघ की स्थापना गैर संघी श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी और उन्हें तब संघ प्रमुख गुरु गोवलकर का पूरा समर्थन मिला था। वे इसे केवल राजनीतिक संगठन नहीं बनाना चाहते थे। हालांकि संघ के कार्यकर्ता इसके राजनीतिक स्वरूप के पक्षधर थे। तब समझौते के तहत भारतयी जनसंघ बना जो इमरजेंसी के बाद वाजपेयी - आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी बना।

बीजेपी व आरएसएस के संबंधों पर संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी से अनौपचारिक बातचीत के हवाले से एंडरसन कहते हैं कि उनका मानना है कि हम (संघ) पार्टी नहीं हैं और हम पार्टी बनना भी नहीं चाहते हैं। वर्ष 2014 के चुनावों में संघ प्रमुख के राजनीतिक बयानों के साथ कार्यकर्ताओं को यह संदेश भी स्पष्ट दिया गया था कि वे बीजेपी के लिए काम करते हुए ये बात ध्यान में रखें कि वे पहले संघ के स्वयंसेवक हैं। इस तरह दोनों के बीच अपनी मूल पहचान का स्पष्ट निर्धारण हैं। संघ , बीजेपी की जीत तो चाहता है कि लेकिन वो किस हद तक उसके साथ काम करने का इच्छुक है यह विस्तारित विषय है। 1977 और 2014 की तरह संघ व बीजेपी क्या 2019 के चुनावों में भी मिलकर काम करेंगे? इसके जवाब में एंडरसन का मानना है कि जब तक राजनीतिक रूप से कुछ बड़ा घटित नहीं होता है तो उतनी व्यापकता से ये साथ नहीं आएंगे लेकिन राजनीति में कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। क्या संघ खुद सत्ता में नहीं आना चाहता? क्या वह सत्ता से दूर रहने का दिखावा कर रहा है?

एंडरसन के मुताबिक बीते दो दशक में संघ का फैलाव उस 1990 के दौर में भी हुआ जब बीजेपी सत्ता में नहीं थी बल्कि कांग्रेस का शासन था। संघ की दिलचस्पी गवर्नेन्स और नीतियों में है। पिछले तीस सालों में यह एक बड़ा बदलाव है। संघ से संबद्ध दर्जनों संगठनों का तेजी से विस्तार और समाज में जड़ें ंंमजबूत हुई हैं। क्या मोदी और भागवत के आपसी समीकरणों पर अगले चुनाव के नतीजे निर्भर करेंगे तो एंडरसन कहते हैं कि काफी कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करता है। दोनों उम्र में लगभग समान हैं। दोनों अतीत में साथ काम कर चुके हैं। दोनों एक-दूसरे का काफी सम्मान करते हैं।

भागवत समझते हैं कि नीतियां प्रधानमंत्री व पार्टी के फैसले से जुड़ी हैं। जबकि प्रधानमंत्री भलीभांति जानते हैं कि काडर की ट्रेनिंग के लिहाज से संघ कितना जरूरी है। मौजूदा परिस्थतियों में संघ को भी लगता है कि बीजेपी अपने दम पर जीत सकती है और जहां तक पहले की तरह स्वयंसेवकों को बड़े स्तर पर सक्रिय करने की बात है तो यह स्वत: हो जाता है, मदद मांगने की जरूरत नहीं पड़ती।

एंडरसन ने किताब में लिखा है कि आरएसएस आमने-सामने और विचारों की नीति पर चलता है न कि कागज पर लिखे नियम कानून के अनुसार। किताब में गौ रक्षा, घर वापसी, आर्थिक नीति, श्रम सुधार और विदेशी निवेश पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है। तर्क दिया है कि संघ इसमें मध्यस्थ की भूमिका में है जो भाजपा के कई अहम मुद्दों का नेतृत्व कर रहा है और भविष्य में भी करता रहेगा।

लेखक वाल्टर ए. एंडरसन अमरीका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं। स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज में दक्षिण एशियाई अध्ययन के प्रोफेसर हैं। श्रीधर डी दामले फ्रीलांस पत्रकार हैं और भारतीय मामलों के अमरीकी शोधार्थी हैं। एंडरसन ने भारत में अध्ययन भी किया है। हिंदी बोल व समझ भी लेते हैं। एंडरसन की पत्नी भारतीय (तमिल भाषी) हैं और वे तमिल भी समझ लेते हैं। एंडरसन व दामले इससे पहले संयुक्त रूप से 1987 में - द ब्रदरहुड इन सेफरन: दी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एंड हिंदू रिवाइवलिज्म लिख चुके हैं। संघ पर 50 वर्षों से अध्य्यन कर रहे हैं।


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तल्लीनता से पढऩे वालों की संख्या घट रही है


अमरीकी लोग जो खाली समय में अपनी खुशी के लिए हर दिन कुछ पढ़ते हैं उनका आंकड़ा वर्ष 2004 से तीस फीसदी तक गिर चुका है। इसका खुलासा अमेरीकन टाइम सर्वे के ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स की रिपोर्ट में हुआ है। 2004 में करीब 28 फीसदी अमरीकी जिनकी उम्र 15 वर्ष या इससे अधिक थी वे अपनी खुशी के लिए पढ़ते थे।

पिछले साल ये आंकड़ा 19 फीसदी के करीब पहुंच गया है। समय को लेकर बात करें तो इसमें तेजी से गिरावट दर्ज हो रही है। 2004 में हर अमरीकी व्यक्ति 27 मिनट का समय देता था। जबकि 2017 में ये आंकड़ा 17 फीसदी के करीब पहुंच गया है। पढऩे का शौक पुरुषों में तेजी से गिर रहा है। 2004 में किसी न किसी एक दिन 25 फीसदी लोग पढ़ते थे। 2017 में गिरावट दर्ज की गई और आंकड़ा 15 फीसदी पहुंच गया। पुरुषों में पढऩे की ललक तेजी से कम हुई है। 2004 में रूचि से पढऩे वाले पुरुषों की संख्या 25 फीसदी थी जो 2017 में 15 फीसदी पहुंच गई है। महिलाओं की बात करें तो 2003 में 31 फीसदी से ये आंकड़ा 29 फीसदी जबकि 2017 में 22 फीसदी दर्ज किया गया है।

सर्वे के आंकड़ों की मानें तो फुर्सत में पढऩे वालों की संख्या हर उम्र वर्ग में कम हुई है। 35 से 44 उम्र वर्ग के लोगों में बदलाव अधिक देखा गया है। अमरीकन टाइम सर्वे 26 हजार लोगों पर किया गया जिसमें उनसे बीते दिन जो भी किया उसका ब्यौरा मांगा गया। सर्वे में पता चला है कि 1982 में 57 फीसदी लोग लघु कहानियां, नाटक और कविता पढऩे में दिलचस्पी रखते थे। 2015 में इनका आंकड़ा 43 फीसदी पर सिमट गया। प्यू रिसर्च सेंटर और गैलप के आंकड़ों के अनुसार 1978 से 2014 के बीच तीन गुना किशोरों ने कोई भी किताब नहीं पढ़ी।

फुर्सत में पढऩे वालों की संख्या में कमी का कारण कंप्यूटर, मोबाइल, वीडियो गेम जैसे गैजेट्स को माना गया है। 2017 की अमरीकी रिपोर्ट के अनुसार एक अमरीकी नागरिक दो घंटा 45 मिनट का समय हर दिन टीवी देखने में गुजारता है। दस गुना अधिक समय पढऩे की बजाए टीवी देखने में व्यतीत करते हैं। भारत में फुर्सत में पढऩे वालों की बात करें तो औसतन एक व्यक्ति हफ्ते में दस घंटे का समय ही कुछ न कुछ पढऩे के लिए निकालता है।

(वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत)


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काले धन से पारदर्शी लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना संभव नहीं है


कॉस्ट्स ऑफ डेमोक्रेसी पॉलिटिकल फाइनेंस इन इंडिया पुस्तक में राजनीति और पैसे के गठजोड़ को विस्तार से बताया गया है। 311 पेज की इस किताब में कुल सात अध्याय हैं जिन्हें गहन अध्ययन और शोध के बाद लिखा गया है। विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय राजनीति और चुनावों में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को यह किताब पसंद आएगी। उनके मन में जो भी सवाल होंगे उन सभी के जवाब भी इस किताब से मिल जाएंगे। इसमें मौजूदा समय की स्थिति को दर्शाया गया है कि कैसे पैसा आज के समय में चुनाव लडऩे की जरूरत बन गया है। कालाधन और ब्लैक इकोनॉमी लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं। लिखा है कि ‘पैसा’ भारतीय राजनीति में एक बड़ा मुद्दा है जिसपर अधिक ध्यान देन की जरूरत है। चुनावों के दौरान पैसा रीढ़ की हड्डी की तरह काम करता है जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना होती है। हालांकि ये खोखली परत है जिससे गतिशील और पारदर्शी लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना संभव नहीं है। लेखक किताब में बहस करते हैं कि पैसा राजनीति चलाने के लिए नहीं बल्कि जनतंत्र पर नियंत्रण करने के लिए इस्तेमाल हो रहा है और ये कहां तक सही है ?

किताब में बताया है कि सरकारें राजनीति में पैसे का बोलबाला रोकने में असमर्थ है। सबसे बड़ी खामी यह है कि जो लोग कालाधन बना रहे हैं उनकी पहचान एक साजिश के तहत नहीं होती है। शीर्ष नेतृत्व उन्हीं उम्मीदवारों का चुनाव करता है जिनके पास धनबल है और जो चुनावों में बेशुमार खर्च कर सकते हैं।

अर्थतंत्र और कानून

किताब का पहला अध्याय देश की अर्थव्यवस्था में राज्यों के योगदान पर ध्यान केंद्रित करने के साथ खराब कानून व्यवस्था के बारे में है। लेखक ने कहा है कि कानून एक शब्द बन गया है और जिस दिन ये कमजोर होगा उस दिन भारत में किसी भी काूनन को तोडऩा या खंडित करना संभव होगा। दूसरे अध्याय में निलांजन सिरकार का 2004 से 2014 के बीच हुए चुनावों का विश्लेषण है जिसमें उम्मीदवारों की संपत्ति पर विशेष जोर दिया है जो चुनावों में उनकी किस्मत तय करती है। राजनीतिक पार्टियों के लिए उम्मीदवार और काले धन के रिश्ते को अटूट बताया गया है।

राजनीति और रियल एस्टेट

अध्याय तीन देवेश कपूर और मिलन वैश्णव ने लिखा है और खुलासा किया है कि भारतीय राजनीति में कैसे बिल्डर्स वित्तीय जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। इन्होंने देखा है कि कैसे चुनावों के समय में सीमेंट की खपत कम हो जाती है और एकमुश्त पैसा चुनावों में लगाया जाता है। पर सवाल उठता है कि कैसे चुनावों के खत्म होने के बाद पैसा फिर से रियल एस्टेट और निर्माण क्षेत्र का काम दोबारा शुरू हो जाता है। इसमें बेतहाशा रकम का निवेश कहां से हाने लगता है ? इसका सच ये है कि उस समय चुनावों में फंडिंग के लिए बिलिंग में खेल किया जाता है जिस वजह से खपत कम दिखने लगती है। इसके साथ ही इस बात पर भी बहस होनी चाहिए कि चुनावों से पहले जनहित से जुड़े काम तेजी से शुरू होते हैं तो सीमेंट की खपत तो बढ़ जानी चाहिए पर ऐसा नहीं होता है।

राजनीतिक पार्टियों के आपसी संबंधों का रहस्य भी खोला

ताब में माइकल कॉलिन्स ने छोटी राजनीतिक पार्टियों और बड़ी राजनीतिक पार्टियों के बीच के रहस्य को भी खोला है। तमिलनाडु की एक छोटी राजनीतिक पार्टी वीसीके का वहां के बड़ी पार्टियों के संबंध के बारे में विस्तार से लिखा है कि कैसे दो पार्टियां आपस में मिलकर कैसे रणनीति बनाती हैं और लोकतंत्र का चुनाव करने वाली जनता को इसकी खबर तक नहीं होती है। लिसा, जेफरी विटसो और साइमन चाउचार्ड ने चुनावी रणनीति बनाने के तौर तरीकों पर लिखा है। बहस करते हुए लिखते हैं कि चुनावों से पहले वोट के लिए तोहफा देना आम बात है लेकिन इससे वोट नहीं मिलते हैं। नकदी वितरण ही उम्मीदवारों के पास आखिरी विकल्प होता है जिससे उन्हें बहुत कुछ हासिल होता है। साइमन लिखते हैं कि चुनाव अब बहुत महंगे हो चुके हैं। इसलिए नहीं कि वोटरो को तोहफे देने पड़ते है बल्कि कई तरह के दूसरे खर्चे जुड़ गए हैं। भारत के चुनावों में ये स्थिति आम है। जेनिफर बुसेल ने सवाल उठाया है कि आखिर क्या कारण है कि भारत में ‘ब्लैक इकोनॉमी’ को बढ़ावा मिल रहा है जिसका असर राजनीति पर हो रहा है ? इसका कोई सामान्य जवाब नहीं है।


लेखक परिचय

देवेश कपूर, यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया के सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी इन इंडिया (सीएएसआइ) के निदेशक हैं। पॉलीटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से पीएचडी हैं।

मिलन वैश्णव, कार्नेज इंडाउनमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के साउथ एशिया प्रोग्राम के वाशिंगटन डी.सी में सीनियर फेलो हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी से राजनीति शास्त्र में पीएचडी हैं।


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मिल गया सबूत भारत में ही जन्मा शून्य


नई दिल्ली। हम सभी जानते हैं कि सभी गणितीय सवालों के लिए जरूरी ‘शून्य’ की खोज भारत ने की थी। अब इस पर पश्चिम ने भी मुहर लगा दी है। दरअसल, शून्य के इस्तेमाल के बारे में पहली बार कार्बन डेटिंग के जरिए पता लगाया गया है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने एक भारतीय किताब में दर्ज कॉर्बन डेटिंग से साबित किया है कि तीसरी या चौथी सदी की शुरुआत में ही इसकी खोज हो गई थी। जबकि इतिहासकारों का अभी तक मानना था कि भारत में शून्य का इस्तेमाल पांचवीं सदी से शुरू हुआ था। इसे शून्य के बारे में सबसे पुराना हस्तलिपि साक्ष्य माना जा रहा है। बखशाली हस्तलिपि में यह रिकॉर्ड दर्ज है कि शून्य का उस दौर में बखूबी इस्तेमाल होता था। यह हस्तलिपि 1881 में पाकिस्तान के पेशावर में बखशाली गांव के पास मिली थी, जो 1902 से बोडलियन लाइब्रेरी ऑफ ऑक्सफोर्ड में रखी गई थी।

अभी तक ग्वालियर था सबसे पुराना अभिलेख
अभी तक ग्वालियर में एक मंदिर की दीवार पर शून्य के जिक्र को ही सबसे पुराना अभिलेखीय प्रमाण माना जाता रहा है।


गणित के शुरुआती इतिहास में मिलेगी मदद
माना जा रहा है कि इस नए सबूत से गणित के शुरुआती इतिहास के बारे में मदद मिलेगी।

कई और सभ्यताओं में भी शून्य का इस्तेमाल
माया, बेबीलोन जैसी कई प्राचीन सभ्यताओं में भी शून्य का इस्तेमाल हुआ करता था।

शून्य पर भारत का एकाधिकार मजबूत
यह नई खोज भारत के लिए काफी मायने रखती है। क्योंकि जिस गोल आकृति का इस्तेमाल हम शून्य के तौर पर करते हैं, ठीक वैसा ही बखशाली प्रतिलिपि में भी इस्तेमाल हुआ है। दूसरा यह कि भारत इस तरह के शून्य विकसित करने का अपना दावा बरकरार रख सकता है।

ब्रह्मगुप्त की किताब में था शून्य का जिक्र
628 ईस्वी में भारतीय ज्योतिर्विद और गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने ब्रह्मस्फुटसिद्धांत नाम की किताब लिखी थी, जिसे शून्य के बारे में लिखी पहली किताब माना जाता है।


4 को होगा लंदन में प्रदर्शित
यह नया साक्ष्य लंदन के साइंस म्यूजियम में आगामी चार अक्टूबर को ‘प्रकाशित भारत: 5000 साल का विज्ञान’ आयोजन में प्रदर्शित होगा।


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राम नाम : महात्मा गाँधी हिंदी पुस्तक


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फंडामेंटल्स ऑफ कंप्यूटर्स: शॉर्टकट में कंप्यूटर ज्ञान


नई दिल्ली। बैंक, आरपीएससी व अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए फंडामेंटल्स ऑफ कंप्यूटर नाम से नई बुक आई है। सीआर पब्लिकेशन की इस बुक को प्रकाश परिहार और मदन चौधरी ने लिखा है तथा वीरभद्र सिंह ने संपादित किया है। यह एक ऎसी किताब है जिसमें प्रतियोगी परीक्षाओं में कंप्यूटर विषय से संबंधित आने वाले संभावित महत्वपूर्ण प्रश्नों का समावेश किया गया है। बहुत ही रोचक ढंग से कंप्यूटर विषय से संबंधित प्रश्नों का हल बताने वाली इस बुक में पिछली प्रतियोगी परीक्षाओं में आए महत्वपूर्ण प्रश्नों का भी उत्तर समेत समावेश किया गया है।



96 पेज में संपूर्ण कंप्यूटर ज्ञान
Fundamentals Of Computer बुक में प्रतियोगियों को बहुत ही कुशल ढंग से कंप्यूटर परिचय से लेकर फाइल एक्सटेंशन तक की जानकारियां उपलब्ध कराने की कोशिश की गई है। सरकारी नौकरियों में आवेदन करने वाले प्रतियोगियों समेत कंप्यूटर जनरल नॉलेज के लिए भी यह बुक काम आने वाली है।



11 चैप्टर में सबकुछ
प्रतियोगी परीक्षाओं में कंप्यूटर विषय हेतु यह पुस्तक उपयोगी है। लेखकों ने इस बुक को 11 चैप्टर के तहत शॉर्टकट में संपूर्ण जानकारी समेत लिखा है यानि कंप्यूटर से संबंधित प्रत्येक चीज को सीखने का शॉर्टकट तरीका बताया गया है। फंडामेंटल्स ऑफ कंप्यूटर में विंडोज शॉर्टकट्स से लेकर शब्द संक्षेप दिए गए हैं जिन्हें कोई भी प्रतियोगी बड़ी आसानी से समझकर परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्नों को हल कर सफलता प्राप्त कर सकता है।



इन परीक्षाओं के लिए है उपयोगी
फंडामेंटल्स ऑफ कंप्यूटर बुक बैंक (एसबीआई, आईबीपीएस, आरआरबी), आरपीएससी (आरएएस, अकाउंटेंट) समेत अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले कंप्यूटर विषय के प्रश्नों को हल करने में उपयोगी है।

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The Chaos Within : आशिमा चालिया


अक्सर कॉलेज या स्कूल में आपका दोस्तों का ग्रुप जिंदगी की भागदौड़ में कहीं खो जाता है। कॉलेज खत्म होने के बाद सब अपनी जिंदगी में इतने बिजी हो जाते हैं कि उन लोगों को ही भूल जाते हैं, जिनके साथ उन्होंने इतना वक्त गुजारा था। लेकिन जब वह आपको फिर से मिलते हैं तब तक जिंदगी नई करवट ले चुकी होती है। ऎसी ही कहानी है आशिमा चालिया की "The Chaos Within"

ये बुक 5 दोस्तों कृष, सम्राट, कबीर, माही और कामाक्षी की कहानी है, जो कभी अपने बैच का सबसे कूल और शैतान ग्रुप हुआ करता था। पढ़ाई के बाद सब आगे बढ़ गए और जिंदगी से जो वे चाहते थे पैसा, फेम, पावर, प्यार सब उन्हें मिल गया, लेकिन फिर भी कुछ कमी थी। ये सभी दोस्त जब अपने कॉलेज की रीयूनियन पार्टी में मिलते हैं, तो अपनी-अपनी दास्तान सुनाते हैं। ये दास्तान बताती है कि कौन अपनी जिंदगी में कैसी परस्थिति झेल रहा है।

बुक का कॉन्सेप्ट अच्छा है, कॉलेज का ये ग्रुप आपको भी अपनी कॉलेज के पलों को याद दिला देगा। बुक के कैरेक्टर्स से आप कहीं ना कहीं खुद को रिलेट पाएंगे। उनके बीच की दोस्ती को भी इसमें काफी सहज तरीके से दर्शाया गया है। बुक का सबसे वीक प्वाइंट है, इसका अंत। बुक का एंड काफी स्ट्रेट और फीका किया गया है। बुक पढ़ते-पढ़ते आप इसके अंत को भी इंटरेस्टिंग सोचेंगे, लेकिन एंड में बुक बहुत डल प्वाइंट पर आकर खत्म होती है। लेकिन इसके सारे कैरेक्टर्स बुक को जीवंत बनाते हैं। इन सब में अपना एक अलग चार्म है। बुक दोस्ती जैसे सब्जेक्ट पर है, इसलिए इसे एक बार पढ़ा जा सकता है।

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सर्कल ऑफ फेट : प्रीता वॉरियर


जो बीत गया वो लौट कर नहीं आएगा, लेकिन उसकी यादें जख्मों को फिर से हरा कर जाती है। ये एक सर्कल की तरह चलता रहता है। जिंदगी के कड़े अनुभवों को बताती है प्रीता वॉरियर की "Circle of Fate"। प्रीता का यह बुक लिखने का अंदाज काफी अच्छा और डिफरेंट है। वहीं बुक की कहानी भी यूनिक है।

ये कहानी एक यंग गर्ल शीला की है, जो अपने पैरेंट्स के साथ अमरीका में रहती है। शीला की जिंदगी में उस वक्त भूचाल आ जाता है, जब एक कार एक्सीडेंट में उसके पैरेंट्स की मौत हो जाती है। इसके बाद उसके पास फैमिली के नाम पर केवल दादी रह जाती है, जो उससे बहुत दूर केरल में रहती है। इससे पहले शीला ने अपनी दादी से ना तो कभी बात की है और ना ही कभी मिली है।

किसी कारण के चलते उसके पिता ने दादी से सारे रिश्ते तोड़ दिए थे। जिसके बारे में शीला कुछ नहीं जानती है। अब शीला की दादी देवकी अपनी पोती के घर आने का इंतजार करती है। वहीं दादी को बीते हुए पलों को याद करके सिरहन होने लगती है, क्योंकि वे पल उसे अपनी पोती से हमेशा के लिए दूर कर सकते हैं।

इस बुक की सबसे खास बात इसका डिफरेंट सब्जेक्ट है। इसमें कैरेक्टर्स को बहुत ही अच्छी तरह बयां किया गया है और उनके बीच उठने वाले हर इमोशंस को दर्शाया गया है, चाहे वह प्यार हो या नफरत। अगर आप सामान्य नोवल पढ़कर ऊब चुके हैं तो "सर्कल ऑफ फेट" का सब्जेक्ट आपको नई ताजगी देगा। इस बुक को एक बार पढ़ना तो बनता ही है। मजबूत नरेशन और यूनिक स्टोरी इसकी यूएसपी है।

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मेट्रो डायरीज : नम्रता


प्यार एक ऎसी फीलिंग है जैसे केवल महसूस किया जा सकता है। इसे ना तो कभी भूलाया जा सकता है और ना ही अपने से अलग किया जा सकता है। मूव ऑन की बात तो सब करते हैं, लेकिन दिल के किसी कोने में वह प्यार हमेशा महफूज रहता है। ऎसी ही छोटी-छोटी लव स्टोरीज का कलेक्शन है फेमस ब्लोगर नम्रता की "Metro Diaries"

इस बुक में दिल को छू जाने वाली 17 छोटी-छोटी लव स्टोरीज हैं और ये सभी सच्ची कहानियां हैं। पहचान छिपाने के लिए केवल कैरेक्टर्स और जगह के नाम बदले गए हैं। इस बुक में लव स्टोरीज को इतनी अच्छी तरह से बयां किया गया है कि आप उन कैरेक्टर्स को फील कर सकते हैं। कुछ स्टोरीज का अंत भी नहीं लिखा गया है, लेकिन उन कैरेक्टर्स की जिंदगी को बहुत अच्छे से पेश किया गया है।

साथ ही इस बुक में हर चैप्टर के साथ कविता का तालमेल लाजवाब है। अगर आप काफी इमोशनल पर्सन हैं तो कुछ स्टोरीज पढ़कर आपकी आंख भी नम हो सकती है। इन दिल का छू जाने वाली कहानियों को नम्रता ने बहुत अच्छी तरह अपनी बुक में संजोया है। हालांकि बुक का कवर रीडर को ज्यादा अट्रैक्ट नहीं करता है। लव स्टोरीज होने के बावजूद कवर काफी डार्क दिया गया है। लेकिन रोमांटिक बुक्स के रीडर्स को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कवर चाहे जैसा भी हो, लेकिन बुक आपको प्यार और रोमांस की दुनिया में ले जाएगी। अगर आप लव स्टोरीज पढ़ने के शौकीन हैं तो ये बुक जरूर पढिए।

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वर्ल्ड्स बेस्ट ब्वॉयफ्रेंड : दुर्जोय दत्ता


काफी इंतजार के बाद दुर्जोय दत्ता अपनी 11वीं बुक "वर्ल्ड्स बेस्ट ब्वॉयफ्रेंड" के साथ हाजिर है। ये कहानी एक ऎसी लड़की की है जिसे बीमारी के चलते उसके फैमिली मेंबर्स का प्यार नहीं मिलता है। ये स्टोरी दुर्जोय की अब तक की बुक्स की रेग्यूलर कहानियों से कुछ डिफरेंट है। हालांकि इसमें दुर्जोय की अरबन लैंग्वेंज का टच जरूर मिलता है।

ये कहानी जन्म से ही विटीलिगो बीमारी से ग्रस्त अरण्या की है। जिसे इंटेलीजेंट होने पर भी बीमारी के चलते उसके भाई से कम आंका जाता है और वह अपने पैरेंट्स का प्यार से वंचित रहती है। ऎसे में जब अरण्या की लाइफ में ध्रुव की एंट्री होती है तो दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं। ध्रुव की जिंदगी भी अपने पैरेंट्स के अलग होने के बाद काफी कठिन हो जाती है। एक बार दोनों पकड़े जाते हैं और उन्हें अलग कर दिया जाता है। इसके बाद बहुत सालों बाद अरण्या और ध्रुव मिलते हैं, लेकिन दोनों के बीच प्यार की जगह बेइंतहा नफरत पनपने लगती है। अब क्या ये सच में नफरत है या दोनों ने अपने प्यार को दबाकर नफरत की चादर ओढ़ रखी है।

"वर्ल्ड्स बेस्ट ब्वॉयफ्रेंड" की एक खास बात ये है कि इसे दुर्जोय ने बाकी तरह की तरह को-राइटर्स के साथ नहीं बल्कि अकेले लिखा है। बुक की स्टोरी दुर्जोय की अन्य कहानियों से थोड़ी डिफरेंट हैं, हालांकि इसमें चैप्टर्स को थोड़ा छोटा किया जा सकता था। एक सिंपल सी बात को समझाने के लिए 20 लाइनों का इस्तेमाल करना रिपीटेशन और लैंदी लगने लगता है। लेकिन बुक का टाइटल ही इतना कैची है कि अगर आप लव स्टोरिज पढ़ने के शौकीन है तो आपका ध्यान इस ओर बरबस ही खिंच जाएगा। दुर्जोय यूथ की नस को काफी अच्छे से जानते हैं और इसी हिसाब से बुक लिखते हैं। "वर्ल्ड्स बेस्ट ब्वॉयफ्रेंड" को एक बार जरूर पढ़ा जा सकता है।

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ए हाईपोथिसिस- टू प्रवोक योर थोट्स: प्रांजल राजन


कुछ बुक्स पढ़कर आप खुश हो जाते हैं तो कुछ बुक्स का अंत आपको दुखी कर जाता है, लेकिन बुक्स आपको सोचने पर मजबूर कर जाती है। ऎसी ही एक बुक है प्राजंल राजन की "ए हाईपोथिसिस- टू प्रवोक योर थोट्स"। ये बुक समाज की आपके प्रति सोच और नजरिए को बताती है, क्या वह नजरिया सच में सही होता है। इसी के बारे में प्राजंल ने बताया है।

ये बुक उत्तर-पूर्व भारत में रहने वाले एक लड़के ऋषि की कहानी है। ऋषि बहुत छोटी उम्र में अनाथ हो जाता है और उसके अंकल उसे पालते हैं। ऋषि के अंकल उसका पालन-पोषण कुछ अलग तरीके से करते हैं। वे उसे घर पर लाने की बजाए सरवाइवर कैंप में छोड़ देते हैं। उनके इस व्यवहार से समाज के लोग सवाल उठाते हैं, लेकिन क्या अपने इस तरीके से वे ऋषि के लिए कुछ अच्छा कर रहे है, समाज का नजरिया उनके प्रति गलत है या सही? यहीं स्टोरी है इस बुक की।

प्राजंल ने बहुत अच्छे ढंग से अपनी बात रिडर्स तक पहुंचाई है। उनके बुक लिखने का अंदाज थोड़ा अलग है। ये बुक उन लोगों के लिए बहुत अच्छी है, जो नॉर्मल नोवल्स से कुछ हटके पढ़ना चाहते हैं। इस बुक को पढ़कर आपको जरूर लगेगा कि आपने कुछ नया पढ़ा है।

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वाई द वड़ा सेलर रिफ्यूजड ए सेल: सतीश मंडोरा


जिंदगी में आगे बढ़ने की चाह में ऎसी बहुत सी चीजे हैं जो पीछे छूट जाती है। जो चीजे आपके लिए बहुत महत्व रखती थी, आज आपको उनकी कुछ खबर ही नहीं है। भविष्य को सुधारने के लिए लोग अपने आज को भूल जाते हैं और जिंदगी भागदौड़ में बीता देते हैं। इन्हीं बातों से रूबरू करवाती है सतीश मंडोरा की बुक "वाई द वड़ा सेलर रिफ्यूजड ए सेल"

"वड़ा सेलर..." छोटी-छोटी सिंपल स्टोरीज का कलेक्शन है। जिनमें जिंदगी, काम और रिलेशनशिप में बेस्ट को पाने के बारे में बताया गया है। ये स्टोरीज लोगों की जिंदगियों से कहीं ना कहीं जुड़ी हुई है। इसमें हर स्टोरी एक अलग थीम पर बेस्ड है, जो एक quote के साथ शुरू होती है। बुक के राइटर सतीश ने इस नोवल से उन बातों को याद दिला रहे है, जो हम अपनी बिजी लाइफ के चलते भूलते जा रहे हैं।

बुक की थीम काफी अच्छी है, छोटी-छोटी स्टोरीज बोर होने से बचाती है। लेकिन कहीं-कहीं स्टोरी ढीली पड़ जाती है। वहीं बुक का टाइटल और कवर भी स्टोरीज से अलग लगता है। सतीश मंडोरा की ये बुक एक बार पढ़ी जा सकती है। ये बुक रूटीन नोवल से कुछ हटकर जरूर है, लेकिन राइटर इसे और अच्छा बना सकते थे।

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द फॉल्ट इन आवर स्टार्स: जॉन ग्रीन


कैंसर एक बहुत ही भयानक बीमारी है, अगर ये कम उम्र में किसी को हो जाए तो उसके सारे सपने और इच्छाएं इस बोझ तले दब जाती है। लेकिन जिंदगी में प्यार हो तो वह थोड़ा सा वक्त भी बहुत खूबसूरत लगने लगता है। ऎसी ही एक टीनएज लव स्टोरी है जॉन ग्रीन की "द फॉल्ट इन आवर स्टार्स"। कुछ वक्त पहले इस नोवल पर फिल्म भी बनी है, साथ ही बॉलीवुड में भी इस पर फिल्म बनने की खबरे आई थी।

बुक की कहानी है एक टीनएज लड़की हैजल की, जिसे कैंसर होता है। हैजल एक लड़के अगस्टस से मिलती है और दोनों को प्यार हो जाता है। हैजल और अगस्टस कैंसर और प्यार के बीच उलझ कर रह जाते है और इनके साथ डील करने की कोशिश करते हैं। किसी भी लव स्टोरी की तरह इसमें भी एक लड़का है और एक लड़की है, लेकिन दोनों की कैमिस्ट्री और प्यार का अलग अंदाज इसे अन्य स्टोरिज से अलग बनाता है।

जॉन ग्रीन ने इस बुक को बहुत ही बेहतरीन तरीके से लिखा है। इसका प्लॉट और कैरेक्टर बहुत सधे हुए है, बुक पढ़कर आप इसमें खोते जाएंगे। कहीं भी ये बुक आपको बोझिल नहीं करती है। पिछले साल ही इस नोवल पर इसी टाइटल के साथ फिल्म बनी थी, जो हिट रही थी। इस बुक को आप ना सिर्फ पढ़ना चाहेंगे, बल्कि अपने बेस्ट कलेक्शन में भी सहज कर रखना पसंद करेंगे।

Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/books/book-review-the-fault-in-our-stars-by-john-green-1024908/

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