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सुबह-सुबह इस मंत्र को बोलने से मिलता है राजयोग


सूर्य और चंद्रमा ही ऐसे देवता हैं, जिन्हें हम प्रत्यक्ष देखते हैं और उनकी पूजन करते हैं। इसका उल्लेख हमारे शास्त्रों में भी किया गया है। शास्त्रों के मुताबिक, अगर हम सबुह-सुबह सूर्य की पहली किरण के साथ भगवान भास्कर को अर्ध्य देते हैं, तो जीवन में कभी भी किसी प्रकार की बाधा नहीं आती है।

मान्यता है कि अर्ध्य देने का साथ-साथ जो लोग भगवान भास्कर के लिए हर दिन सुबह में इस मंत्र का जाप करते हैं, उन्हें राजयोग की प्राप्ति होती है। अगर इसे सही तरीके से नहीं करेंगे तो इसका कोई फायदा भी नहीं होगा। अर्ध्य देने से पहले सूर्य को प्रणाम करें फिर इस मंत्र का जाप करें....

कनकवर्णमहातेजं रत्नमालाविभूषितम्
प्रातः काले रवि दर्शनं सर्व पाप विमोचनम्

इसके बाद हर दिन सुबह-शाम माता-पिता के चरण स्पर्श करें और उनका आशीर्वाद लें। इसके अलावे अगर आप सूर्य ग्रह की शांति चाहते हैं तो बिल्व पत्र की जड़ को रविवार को गुलाबी धागे से पीली धातु के कवर में धारण करें। ऐसा माना जाता है कि जिस व्यक्ति की कुंडली में सूर्य नीच का होता है, उसे ये काम अवश्य ही करना चाहिए।

सुब उठकर क्या करें

  • सूर्य ग्रह की शांति के लिए बिल्व पत्र की जड़ को रविवार को गुलाबी धागे से पीली धातु के कवर में धारण करें।
  • घर की पूर्व दिशा में किसी प्रकार का वास्तुदोष नहीं होना चाहिए। उसे साफ और सुंदर रखें।
  • बंदर और गाय को भोजन कराएं।
  • गुड़ का दान अवश्य ही करें।
  • हर दिन सुबह-शाम माता-पिता का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।

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कम सैलरी की वजह से हैं परेशान, तो करें ये उपाय


हम में से बहुत से ऐसे लोग हैं जो पहले रोजगार के लिए परेशान रहते हैं। जब रोजगार मिल जाता है, तब सैलरी को लेकर परेशान रहते हैं। उनका मानना होता है कि कम सैलरी की वजह से गुजारा नहीं हो पा रहा है। अगर आपके साथ भी इसी तरह की समस्या है तो हम आज आपको ऐसे उपाय बताएंगे, जिससे आपकी समस्या खत्म हो सकती है, सैलरी बढ़ सकती है।

अगर आप इस समस्या को जड़ से खत्म करना चाहते हैं, तो राशि के अनुसार उपाय करने होंगे। आइये जानते हैं राशि के अनुसार उपाय...

मेष : सैलरी मिलने पर गरीब और जरूरतमंद लोगों को खाने-पीने की चीजें दान करें। ऐसा करने से तनाव कम होगा और ऑफिस में मन लगाकर काम करेंगे।

वृषभ : सैलरी मिलने के बाद, उन रुपयों में से कुछ का फल खरीदें। कोशिश करें की केला और सेब ही खरीदें। इन फलों को गाय और मरीज को खिलाएं। ऐसा करने से रोजगार मिलने की बाधा दूर होगी।

मिथुन : सैलरी मिलने के बाद उसके कुछ हिस्से से कपड़े और सौंदर्य प्रसाधन खरीदें और इसे सुहागिनों को दान कर दें। ऐसा करने से वैवाहित जीवन सुखमय रहेगा।

कर्क : सैलरी मिलने पर कपड़े व जूते खरीदे और इसे वृद्ध को दान कर दें। ऐसा करने से आपके काम में उन्नती होगी और स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा।

सिंह : सैलरी मिलने पर फूलों का पौधा खरीदें और अपने पड़ोसियों में बांट दें। ऐसा करने से बॉस से तालमेल अच्छा रहेगा।

कन्या : सैलरी मिलने पर मिठाई और चॉकलेट खरीदे और पड़ोसियों में बांट दें। ऐसा करने से बार-बार नौकरी छूटना बंद हो जाएगा।

तुला : सैलरी के कुछ भाग से मरीज का इलाज कराएं या अस्पताल में दान कर दें। ऐसा करने से नौकरी बिना बाधा के चलती रहेगी।

वृश्चिक : सैलरी के कुछ हिस्से से लोगों के लिए पीने की पानी का व्यवस्था कराएं। ऐसा करने से आर्थिक तनाव कम होगा।

धनु : सैलरी मिलने पर पढ़ने-लिखने का सामान खरीदें और गरीब बच्चों में बांट दें। ऐसा करने से नौकरी के लिए बार-बार स्थान परिवर्तन नहीं करना पड़ेगा।

मकर : सैलरी के कुछ हिस्से से खाने-पीने की चीजें खरीदें और सोमवार को गरीबों में बांट दें। ऐसा करने पर खर्च में कटौती होगी और मनचाही नौकरी मिल जाएगी।

कुंभ : सैलरी के कुछ हिस्से से लोगों का इलाज करवाएं। हो सके तो दवाइयां भी बांट दें। ऐसा करने से सेहत ठीक रहेगा और धन की कमी नहीं होगी।

मीन : सैलरी के पैसों से पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करें। ऐसा करने से आपका व्यवहार उत्तम रहेगा।


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होने वाले पति के बारे में जानना है कोई भी राज, तो ये है उपाय


शादी से पहले लड़की के मन में कई सवाल उठते रहते हैं। खासकर होने वाले पति के बारे में जानने की इच्छा होती है। हर लड़की की चाहत होती है कि उसका होने वाला पति उससे बेइंतहा प्यार करे, किसी चीज की कमी न रखे, हर मांग को पूरा करे। इस तरह के कई सवाल लड़की के मन में उठता रहता है।

अब सवाल है कि शादी से पहले कोई भी लड़की होने वाले पति के बारे कैसे जान सकती है? हम बताते हैं कैसे जान सकती है। हमारे शास्त्रों में सभी बातों की जानकारी दी गई है। अगर आपको होने वाले पति के बारे में जानना है तो उसकी हाथों की बनावट को देखना होगा, क्योंकि आपके होने वाले पति के हाथों की बनावट में सभी राज छिपा हुआ है तो आइये जानते हैं...

  1. जिस व्यक्ति के हाथ की तर्जनी उंगली बाकी उंगलियों के मुकाबले लंबी है तो समझ जाइये कि उसका व्यवहार महिला प्रति उग्र होगा।
  2. जिनकी उंगलियों के ऊपरी हिस्से मोटे होते हैं, वैसे लोग महिलाओं से बहुत बातें छुपाते हैं। कभी भी वो खुलकर कुछ नहीं बोलते हैं।
  3. जिनकी रिंग फिंगर और तर्जनी उंगली की लंबाई बराबर होती है, वैसे लोग चार्मिंग होते हैं। वैसे लोग महिलाओं के साथ 'मतलब' की दोस्ती करते हैं। काम निकल जाने के बाद वे छोड़ भी सकते हैं।
  4. जिन लोगों की रिंग फिंगर लंबी होती है, वैसे लोग बहुत ही एग्रेसिव होते हैं। वैसे लोग अलग पर्सनालिटी बना लेते हैं। माना जाता है कि वैसे लोग शादीशुदा जिंदगी में परेशानी पैदा कर सकते हैं।

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नारायण-नारायण जपने वाले देवर्षि नारद ब्रह्मांड के पहले पत्रकार हैं


पौराणिक कथाओं मेंं देवर्षि नारद को देवताओं के मुख्य दूत के तौर पर बताया गया है। माना गया है कि देवर्षि नारद का मुख्य कार्य देवताओं के बीच सूचना पहुंचाना है। कथाओं के अनुसार, देवर्षि नारद तीनों लोक से (पृथ्वी, आकाश और पाताल) हर प्रकार की खबरों का आदान-प्रदान देवताओं को करते हैं। यही कारण है कि उन्हें ब्रह्मांड का प्रथम पत्रकार कहा गया है। माना जाता है कि ब्रह्मांड की बेहतरी के लिए तीनों लोक का भ्रमण करते रहते हैं।

नारायण-नारायण उच्चारण करते पहुंचते हैं देवर्षि नारद

कहा जाता है कि देवर्षि नारद वीणा वादन करते हुए और नारायण-नारायण का उच्चारण करते हुए जब भी किसी सभा में पहुंचते हैं तो उनको देखते ही अर्थ लगा लिया जाता है कि देवर्षि नारद जरूर कोई संदेश लेकर आए हैं।

तीनों लोक में कहीं भी, कभी भी प्रकट हो सकते हैं नारद

भगवान विष्णु के परम भक्त देवर्षि नारद को अमरत्व का वरदान प्राप्त है। कहा ये भी जाता है कि देवर्षि नारद तीनों लोक में कहीं भी, कभी भी और किसी भी वक्त प्रकट होने का भी वरदान प्राप्त है।

देवर्षि नारद के नाम का अर्थ

माना जाता है कि देवर्षि नारद भगवान विष्णु के परम भक्त हैं। कहा जाता है कि उनका मुख्य उद्देश्य भक्तों की पुकार भगवान विष्णु तक पहुंचाना है। दरअसल, देवर्षि नारद के नाम के पीछे भी अर्थ छिपा हुआ है। नार का अर्थ होता है जल और द का मतलब दान। कहा जाता है कि ये सभी को जलदान, ज्ञानदान और तर्पण करने में मदद करते थे। यही कारण है कि वे नारद कहलाए।

वीणा दान करना श्रेष्ठ माना गया है

हम उन्हें हर वक्त वीणा बजाते देखते हैं। हमारे शास्त्रों में वीणा का बजना शुभता का प्रतिक माना गया है। कहा जाता है कि नारद जयंती पर वीणा का दान अन्य किसी दान से श्रेष्ठ है। यही कारण है कि नारद जी के जयंती पर वीणा दान ही करना चाहिए। इससे शुभ लाभ की प्राप्ति होती है। गौरतलब है कि 20 मई को नारद जयंती है।


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जयंती विशेष : देवर्षि नारद के नाम का क्या है अर्थ


20 मई (सोमवार) को देवर्षि नारद की जयंती मनाई जाएगी। देवर्षि नारद को ब्रह्मा जी के सात मानस पुत्रों में से एक माना गया है। नारद को देवर्षि इसलिए कहा जाता है कि उन्हें देवताओं का ऋषि माना गया है। यही कारण है कि उन्हें देवर्षि नारद कहा जाता है। मान्यता है कि देवर्षि नारद तीनों लोक में विचरण करते रहते हैं और देवताओं के पास सूचनाएं पहुंचाते रहते है।

देवर्षि नारद के नाम का अर्थ

माना जाता है कि देवर्षि नारद भगवान विष्णु के परम भक्त हैं। कहा जाता है कि उनका मुख्य उद्देश्य भक्तों की पुकार भगवान विष्णु तक पहुंचाना है। दरअसल, देवर्षि नारद के नाम के पीछे भी अर्थ छिपा हुआ है। नार का अर्थ होता है जल और द का मतलब दान। कहा जाता है कि ये सभी को जलदान, ज्ञानदान और तर्पण करने में मदद करते थे। यही कारण है कि वे नारद कहलाए।

तीनों लोक में कहीं भी, कभी भी प्रकट हो सकते हैं नारद

भगवान विष्णु के परम भक्त देवर्षि नारद को अमरत्व का वरदान प्राप्त है। कहा ये भी जाता है कि देवर्षि नारद तीनों लोक में कहीं भी, कभी भी और किसी भी वक्त प्रकट होने का भी वरदान प्राप्त है।

नारायण-नारायण उच्चारण करते पहुंचते हैं देवर्षि नारद

कहा जाता है कि देवर्षि नारद वीणा वादन करते हुए और नारायण-नारायण का उच्चारण करते हुए जब भी किसी सभा में पहुंचते हैं तो उनको देखते ही अर्थ लगा लिया जाता है कि देवर्षि नारद जरूर कोई संदेश लेकर आए हैं।

वीणा दान करना श्रेष्ठ माना गया है

हम उन्हें हर वक्त वीणा बजाते देखते हैं। हमारे शास्त्रों में वीणा का बजना शुभता का प्रतिक माना गया है। कहा जाता है कि नारद जयंती पर वीणा का दान अन्य किसी दान से श्रेष्ठ है। यही कारण है कि नारद जी के जयंती पर वीणा दान ही करना चाहिए। इससे शुभ लाभ की प्राप्ति होती है।


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19 मई : रविवार को बन रहे दो दुर्लभ संयोग, केवल एक बार का उपाय बना देगा करोड़पति


19 मई रविवार को एक साथ दो संयोग बन रहे है, एक तो भगवान श्री हरि के प्रिय देवर्षि नारद जयंती एवं दूसरा शुभ अनुराधा नक्षत्र। रविवार सूर्य आराधना का दिन होने से इस शुभ संयोग में धन प्राप्ति के लिए जो भी उपाय, टोने टोटके किये जाये उनका शीघ्र सकारात्मक परिणाम मिलता है। तंत्र शास्त्र के अनुसार रविवार यानी की नौ ग्रहों के राजा आदि देव भगवान श्री सूर्य नारायण के दिन ये छोटा सा उपाय कर लिया जाए तो व्यक्ति के जीवन से दुर्भाग्य और ग्रहों की अशुभ स्थिति ठीक होने के साथ व्यक्ति को एक बड़ा धनपति भी बना देता है।

 

तंत्र शास्त्र में इस उपाय को धन प्राप्ति के लिए एक बहुत ही सरल एवं रामबाण उपाय बताया गया है। अगर किसी व्यक्ति को अपने जीवन से दुर्भाग्य को नष्ट करने की इच्छा है, अपार धन समृद्धि की कामना हो तो 19 मई के रविवार को देशी गाय के दुध का यह छोटा सा उपाय एक बार जरूर करें। यह एक अनुभूत सफल उपाय है, इसे अब तक जिसने भी आजमाया है, वह सूर्य भगवान की कृपा से उसके जीवन की धन संबंधित सभी समस्याएं शीघ्र ही खत्म हो गई है। उनके जीवन में अपार धन-धान्य, सुख-समृद्धि, यश-वैभव, ऐश्वर्य और संपन्नता तेजी बढ़ते देखी गई है।



19 मई रविवार को करें ये आसान उपाय
रविवार के दिन देशी गाय का एक गिलास कच्चा दुध सूर्यास्त के समय अपने घर के पूजा स्थल में रख दें। अब रात्रि में सोते समय उस एक गिलास दूध अपने सिरहाने पंलग के नीचे थोड़े चावल या गेहूं की ढेरी रखकर उस पर दुध वाली गिलास रख दें एवं सो जाएं।

 

सुबह 4 बजे सोकर उठें एवं नहा धोकर धुले हुये श्वेत कपड़े पहनकर सूर्योदय से पहले ही उस एक गिलास दुध को लेकर आसपास अगर कोई बबूल का पेड़ हैं तो वहां जाकर पहले दो अगरबत्ती जला दें, और बाद में बहुल की जड़ में गिलास का पूरा दुध चढ़ा दें। दुध चढ़ाते समय अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करें। चमत्कार से भरे परिणाम कुछ ही दिनों में आपके सामने होंगे। अगर संभव हो तो इस उपाय को कम से कम तीन रविवार अवस्य करें। ऐसा करने से आजीवन कभी भी पैसों से जुड़ी समस्या नहीं सतायेंगी।

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भगवान का मन है पत्रकारिता के पितृ पुरुष देवर्षि नारद, चारों दिशाओं में घूमते हुए करते हैं संवादों का आदान-प्रदान


ज्येष्ट मास की द्वतीया तिथि जो कि इस साल 2019 में 20 मई दिन सोमवार को भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाने वाले देवर्षि नारद जी की जयंती है। हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्माजी के मानस-पुत्र देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं, इसलिए शास्त्रों में नारद जी को भगवान का मन कहा गया है।

 

सभी युगों में, सभी लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारद जी का सदैव से एक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन् दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर किया है। समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के 26वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने नारद जी की महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है- देवर्षीणाम् च नारद:। देवर्षियों में मैं नारद हूं।

 

देवर्षि नारद दुनिया के प्रथम पत्रकार या पहले संवाददाता हैं, क्योंकि देवर्षि नारद ने इस लोक से उस लोक में परिक्रमा करते हुए संवादों के आदान-प्रदान द्वारा पत्रकारिता का प्रारंभ किया। इस प्रकार देवर्षि नारद पत्रकारिता के प्रथम पुरुष/पुरोधा पुरुष/पितृ पुरुष हैं। जो इधर से उधर घूमते हैं तो संवाद का सेतु ही बनाते हैं। जब सेतु बनाया जाता है तो दो बिंदुओं या दो सिरों को मिलाने का कार्य किया जाता है। दरअसल देवर्षि नारद भी इधर और उधर के दो बिंदुओं के बीच संवाद का सेतु स्थापित करने के लिए संवाददाता का कार्य करते हैं।

 

नारद जी इधर से उधर चारों दिशाओं में घूमकर सीधे संवाद करते हैं और सीधे संवाद भेजते हैं, इसलिए नारद जी सतत सजग-सक्रिय रहते हुए 'स्पॉट-रिपोर्टिंग' करते हैं जिसमें जीवंतता है। देवर्षि नारद इधर-उधर घूमते हुए जहां भी पाखंड देखते हैं उसे खंड-खंड करने के लिए ही तो लोकमंगल की दृष्टि से संवाद करते हैं।


त्रेतायुग के रामावतार से लेकर द्वापर युग के कृष्णावतार तक नारद की पत्रकारिता लोकमंगल की ही पत्रकारिता और लोकहित का ही संवाद-संकलन है। उनके 'इधर-उधर' संवाद करने से जब राम का रावण से या कृष्ण का कंस से दंगल होता है तभी तो लोक का मंगल होता है। इसलिए तो देवर्षि नारद दिव्य पत्रकार के रूप में लोकमंडल के संवाददाता माने जाते हैं।

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हनुमान चालीसा लाइफ मैनेजमेंट की पाठशाला, इस तरह से पढ़ने वाला हो जाता है मालामाल


हनुमान चालीसा सिखाती है जीवन जीने की कला, अनेक हनुमान भक्त अपनी दिनचर्या की शुरुआत हनुमान चालीसा के पाठ से ही करते हैं। हनुमान चालीसा में कुल 40 चौपाइयां है और ये सभी उस क्रम में लिखी गई है जो एक मनुष्य की जिंदगी का क्रम होता है और इसे शायद बहुत ही कम लोग जानते होंगे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा की रचना श्री रामचरित्र मानस की रचना से पूर्व की थी। ऐसा इसलिए क्योंकि वे श्रीहनुमान को गुरु बनाकर भगवान श्रीराम को पाना चाहते थे। अगर आप भी जीवन में सफल और मालामाल होना चाहते हैं तो इस तरह करें रोज हनुमान चालीसा पाठ।

 

जो हनुमान चालीसा पढ़ते है उनके भीतरी शक्ति तो स्वतः ही आ जाती है, लेकिन अगर आप इसके अर्थ में छिपे जिंदगी के सूत्र समझ लें तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं। हनुमान चालीसा की शुरुआत से अंत तक सफलता के कई सूत्र हैं। जानें हनुमान चालीसा से अपने जीवन में क्या-क्या बदलाव लाया जा सकता है।

 

इस तरह हनुमान चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति हो सकता है मालामाल

 

हनुमान चालीसा की शुरुआत गुरु से हुई हैं..

श्रीगुरु चरन सरोज रज।
निज मनु मुकुरु सुधारि।।

अर्थात - अपने गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को साफ करता हूं- गुरु का महत्व चालीसा की पहले दोहे की पहली लाइन में लिखा गया है। जीवन में गुरु नहीं है तो आपको कोई भी आगे नहीं बढ़ा सकता। गुरु ही आपको सही रास्ता दिखा सकते हैं। इसलिए तुलसीदास ने लिखा है कि गुरु के चरणों की धूल से मन के दर्पण को साफ करता हूं। आज के दौर में गुरु हमारा मेंटोर भी हो सकता है, बॉस भी। माता-पिता को पहला गुरु ही कहा गया है। समझने वाली बात ये है कि गुरु यानी अपने से बड़ों का सम्मान करना जरूरी है। अगर तरक्की की राह पर आगे बढ़ना है तो विनम्रता के साथ बड़ों का सम्मान करें।

 

hanuman chalisa

1- पहनावें का रखें ख्याल..

कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा।।

अर्थात - हनुमान जी के शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है, सुवेष यानी अच्छे वस्त्र पहने हैं, कानों में कुंडल हैं और बाल संवरे हुए है। आज के दौर में व्यक्ति की तरक्की इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह रहता और दिखता कैसे है। फर्स्ट इंप्रेशन अच्छा होना चाहिए। अगर कोई बहुत गुणवान भी हैं लेकिन अच्छे से नहीं रहते हैं तो ये बात व्यक्ति के करियर को प्रभावित कर सकती है। इसलिए, रहन-सहन और पहनावा हमेशा अच्छा रखें।

 

2- सिर्फ डिग्री काम नहीं आती..

विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।

अर्थात - हनुमान जी विद्यावान हैं, गुणों की खान हैं, चतुर भी हैं। राम के काम को करने के लिए सदैव आतुर रहते हैं। आज के दौर में एक अच्छी डिग्री होना बहुत जरूरी है। लेकिन चालीसा कहती है सिर्फ डिग्री होने से व्यक्ति सफल नहीं होंगे। विद्या हासिल करने के साथ उसे अपने गुणों को भी बढ़ाना पड़ेगा, बुद्धि में चतुराई भी लानी होगी। हनुमान में तीनों गुण हैं, वे सूर्य के शिष्य है, गुणी भी हैं और चतुर भी।

 

3- अच्छा स्रोता बनें..

प्रभु चरित सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।

अर्थात - हनुमान जी राम चरित यानी राम की कथा सुनने में रसिक है, राम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही हनुमान जी के मन में वास करते हैं। जो व्यक्ति की प्रायोरिटी है, जो काम है, उसे लेकर सिर्फ बोलने में नहीं, सुनने में भी व्यक्ति को रस आना चाहिए। अच्छा श्रोता होना बहुत जरूरी है। अगर किसी के पास सुनने की कला नहीं है तो वह कभी भी अच्छे लीडर नहीं बन सकते।

 

4- कहां, कैसे व्यवहार करना है ये ज्ञान जरूरी है..

सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रुप धरि लंक जरावा।।

अर्थात - हनुमान जी ने अशोक वाटिका में सीता को अपने छोटे रुप में दर्शन दिए, और लंका जलाते समय हनुमान जी ने बड़ा स्वरुप धारण किया। व्यक्ति को कब, कहां, किस परिस्थिति में खुद का व्यवहार कैसा रखना है, ये कला हनुमानजी से सीखी जा सकती है। सीता जी से जब अशोक वाटिका में मिले तो उनके सामने छोटे वानर के आकार में मिले, वहीं जब लंका जलाई तो पर्वताकार रुप धर लिया। अक्सर लोग ये ही तय नहीं कर पाते हैं कि उन्हें कब किसके सामने कैसा दिखना है।

hanuman chalisa

 

5- अच्छे सलाहकार बनें...

तुम्हरो मंत्र बिभीसन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना।।

अर्थात - विभीषण ने हनुमान जी की सलाह मानी, और वे लंका के राजा बने ये सारी दुनिया जानती है। हनुमान जी सीता की खोज में लंका गए तो वहां विभीषण से मिले, विभीषण को राम भक्त के रुप में देख कर उन्हें राम से मिलने की सलाह दे दी। विभीषण ने भी उस सलाह को माना और रावण के मरने के बाद वे राम द्वारा लंका के राजा बनाए गए। किसको, कहां, क्या सलाह देनी चाहिए, इसकी समझ बहुत आवश्यक है। सही समय पर सही इंसान को दी गई सलाह सिर्फ उसका ही फायदा नहीं करती, आपको भी कहीं ना कहीं फायदा पहुंचाती है।

 

 

6- आत्मविश्वास की कमी ना हो...

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही।
जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।।

अर्थात - हनुमान जी ने राम नाम की अंगुठी को अपने मुख में रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई अचरज नहीं है। अगर किसी व्यक्ति में खुद पर और अपने परमात्मा पर पूरा भरोसा है तो वह कोई भी मुश्किल से मुश्किल समय को आसानी से पूरा कर सकते हैं। आज के युवाओं में एक कमी ये भी है कि उनका भरोसा बहुत टूट जाता है। आत्मविश्वास की कमी भी बहुत है। प्रतिस्पर्धा के दौर में आत्मविश्वास की कमी होना खतरनाक है, इसलिए खुद पर पूरा भरोसा रखें।

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जब शनिदेव पर गुस्से से लाल हो गए थे महाबली हनुमान जी


शनि देव को सबसे क्रोधित देवता माना जाता है। कहा जाता है कि इनकी बुरी दृष्टि किसी व्यक्ति पर पड़ जाए तो उसके जीवन में परेशानियां आने लगती है। हमारे हिन्दू ग्रंथों में माना गया है जो भी व्यक्ति भगवान हनुमान जी की भक्ति करता है, उस पर शनि देव का प्रकोप नहीं रहता है। कहा जाता है कि महाबली हनुमान के आगे शनि देव भी कुछ नहीं कर पाते हैं।

ये भी पढ़ें- इस अनोखे मंदिर में महाबली हनुमान जी के चरणों में नारी रूप में हैं शनि देव

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार धरती पर शनि देव प्रकोप कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था। शनि देव की बुरी दृष्टि से मानव तो मानव देवता भी बहुत परेशान हो गए थे। इसके बाद सभी ने शनि देव के प्रकोप से बचने के लिए महाबली हनुमान जी को याद किया और उनसे रक्षा की गुहार लगाई। भक्तों की गुहार पर हनुमान जी ने शनि देव को सजा देने के लिए निकल पड़े।

ये भी पढ़ें- शनिवार को भूलकर भी न करें इन चीजों का सेवन, नहीं तो शनि देव हो जाएंगे नाराज

जब इस बात की जानकारी शनि देव को लगी तो वो भयभीत हो गए। क्योंकि उन्हें पता था कि हनुमान जी के गुस्से से कोई रक्षा नहीं कर पाएगा। कथाओं के अनुसार, शनि देव हनुमान जी के गुस्से बचने के लिए उपाय निकाला और नारी का रूप धारण कर लिया।

ये भी पढ़ें- स्त्रियों के बारे में ये गुप्त बातें जानते हैं क्या? जान लीजिए नहीं तो बाद में माथा पीटेंगे

सभी जानते हैं कि हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं और वे किसी स्त्री पर हाथ नहीं उठाते, ना ही बुरा बर्ताव करते। बस यही सोच कर शनि देव ने हनुमान जी से बचने के लिए नारी का रूप धराण कर लिए और भगवान हनुमान से उनके चरणों में शरण मांग ली। हनुमान जी को इस बात की जानकारी हो गई थी शनि देव ही स्त्री का रूप धारण किए हुए हैं। इसके बावजूद हनुमान जी ने शनि देव को नारी रूप में माफ कर दिया। उसके बाद शनि देव ने हनुमान जी के भक्तों पर से अपना प्रकोप हटा लिया।


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गुरु गोरक्षनाथ जयंती 18 मई : तंत्राधिपति भगवान शिव के साक्षात योगावतार गुरु गोरक्षनाथ


गुरु का जीवन में बहुत ही अधिक महत्व है चाहे वो लोग सांसारिक हो चाहे सन्यासी गुरु सबको बनाना चाहिए। गुरु का महत्व इसी बात से लगाया जा सकता है कि भगवान ने जितने भी अवतार लिए उन्होंने भी गुरु का रूप ही धारण किया है। गुरु के बिना जीवन उसी प्रकार है जैसे पानी बिना घड़ा। ऐसे भगवान शिव ने साक्षात योगावतार परम गुरु भगवान गोरक्षनाथ के रूप में जन्म लिया था। गुरु गोरक्षनाथ की अक्षय जयंती 18 मई 2019 दिन शनिवार को मनाई जायेगी। पूरे देश में भगवान गुरु गोरक्षनाथ की जयंती पर दिव्य झांकी, शोभा यात्रा, पुष्पार्चन, दीप ज्योति, पूजा, प्रार्थना, चालीसा एवं भव्य आरती करके एक बहुत बड़े त्यौहार के रूप में भी अनुयायी मनाते हैं।

 

अदीक्षिता य कुर्वन्ति,जप पूजा दिका क्रिया।
निष्फलं तत प्रिये तेषां,शिलायाम मुप्त बीजवत्।
अर्थात- बिना गुरू दीक्षा लिए हम जो भी जप पूजन दान और कर्म करते हैं वह निष्फल हो जाता है जैसे पत्थर में बीज डालने से अन्न की प्राप्ति नहीं होती ।

 

गर्गसंहिता के अनुसार भगवान महादेव शिव ने देवताओं के प्रश्न का उत्तर देते हुये कहा कि-
अहमेवास्मि गोरक्षो, मदरूपं तन्निबोधत।
योग मार्ग प्रचाराय मया रूपमिदं धृतम।।

अर्थात:- मैं ही गोरक्षनाथ हूं, मेरा ही रूप गोरक्षनाथ को जानों, लोककल्याणकारी योग मार्ग का प्रचार करने के लिये मैंने ही गोरक्षनाथ के रूप में अवतार लिया है।

 

जिस दिन भगवानन शिव का गोरक्षनाथ रूप में प्राकटय हुआ, उसको गोरक्षनाथावतार कथा ग्रन्थ के श्लोक में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है-
वैशाखी-शिव-पूर्णिमा-तिथिवरे वारे शिवे मंगले ।
लोकानुग्रह-विग्रह: शिवगुरुर्गोरक्षनाथो भवत ।।

 

योगी प्रवर नरहरिनाथ जी के अनुसार, महायोगी गोरक्षनाथ का प्रकटीकरण वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि मंगलवार को हुआ था। यह वैशाख पूर्णिमा किस युग, कल्प, काल, वर्ष की है, यह अज्ञात होने से भगवान गोरक्षनाथ जी की यह अक्षय - जयंती ही मानी जाती है। गुरु गोरक्षनाथ ने नाथ पंथ के योग दर्शन में भारतीय धर्म साधना का एक ऐसा मिला जुला साधनामार्ग प्रस्तुत किया। गुरु गोरखनाथ द्वारा स्थापित चारों दिशाओं के सुदूर विदेशों तक अनेकानेक देवालय, मठ-मंदिर, धुनी-गुफाए, चरण पादुकाये, तप:स्थली आदि सर्वत्र मिलते है। लेकिन उनका समाधी मंदिर कही पर भी नहीं है, इनके प्रादुर्भाव और अवसान का कोई लेख अब तक प्राप्त नही हुआ।

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शनिवार को भूलकर भी न करें इन चीजों का सेवन, नहीं तो शनि देव हो जाएंगे नाराज


शनि देव को न्याय का देवता माना जाता है। शनिवार के दिन सभी लोग इनको प्रसन्न करने के लिए पूजा-अर्चना करते हैं, कई उपाय करते हैं। माना जाता है शनि देव बहुत ही गुस्सैल देवता हैं, अगर वे किसी पर नाराज हो जाते हैं तो उसके जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। यही कारण है कि सभी लोग शनि देव को खुश करने की कोशिश करते हैं।

माना जाता है कि शनि देव अच्छे कर्म करने वालों को शुभ फल प्रदान करते हैं। जो लोग बुरे काम करते हैं उनको शनिदेव के प्रकोप का सामना करना पड़ता है। कहा जाता है कि अगर शनिदेव किसी व्यक्ति के ऊपर प्रसन्न हो जाएं तो उस व्यक्ति का जीवन पूरी तरह बदल जाता है, व्यक्ति कम प्रयास में लगातार उन्नति करने लगता है।

यही कारण है कि हमरे शास्त्रों में शनिवार को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। कहा जाता है कि अगर शनिवार के दिन हमलोग कुछ चीजों का ध्यान रखेंगे तो शनि देव के प्रकोप से बच सकेंगे। हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि शनिवार के दिन कछ चीजों का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिएस क्योंकि इन चीजों के खाने से शनि देव नाराज हो जाते हैं। आइये जानते हैं शनिवार के दिन किन चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए...

मदिरापान नहीं करना चाहिए

शनिवार के दिन भूलकर भी मदिरापान नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि अगर शनिवार को मदिरापान करते हैं तो शनि देव नाराज हो जाएंगे। अगर शनि शुभ स्थिति में हैं, तब भी आपतो शुभ फल प्राप्त नहीं होंगे।

मसूर दाल नहीं खाएं

संभव हो तो शनिवार को मसूर दाल का सेवन नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि मसूर दाल मंगल ग्रह को प्रभावित करता है, जो कि शनि देव की क्रूर नजर को बढ़ाने का कार्य करता है। माना जाता है कि शनिवार को मसूर दाल का सेवन करने पर शनि देव का बुरा प्रभाव आप पर पड़ सकता है।

आम का आचार न खाएं

माना जाता है कि शनि देव को खट्टा और कसैली चीजें पंसद नहीं। इसलिए संभव हो तो शनिवार को आम का आचार नहीं खाएं।

लाल मिर्च न खाएं

शनिवार के दिन लाल मिर्च भूलकर भी न खाएं, ना ही इसका इस्तेमाल करें। कहा जाता है कि लाल मिर्च से शनि देव नाराज हो जाते हैं।

दूध-दही का सेवन न करें

हो सके तो शनिवार के दिन दूह-दही का सेवन न करें। अगर इस दिन सेवन करते हैं तो सादा न खाएं, इसमें हल्दी या गुड़ मिलाकर खा सकते हैं।


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buddh purnima 18 मई : ऐसे थे भगवान बुद्ध अपनी शरण में आने वाले के सारे दुख आज भी हर लेते थे


एक ऐसा व्यक्ति जिसने सत्य की खोज के लिये राजसी ठाठ बाट छोड़कर कठोर तपस्या कर स्वयं सत्य की खोज कर पूरी दुनिया को मानवता और सत्य का पाठ पढ़ाया जिसे हम सब भगवान बुद्ध के नाम से जानते ही नहीं बल्कि उन्हें अपना आदर्श मानकर उनके बतायें सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हैं। जौ भी उस युग में जो भी भगवान बुद्ध की शरण में गया उनके दु:खों का कारण और निवारण भी किया। पूरी दुनिया में वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में बहुत ही धुम-धाम से मनाया जाता है। इस साल 209 में 18 मई को मनाया जायेगा बुद्ध पूर्णिमा पर्व।

 

सत्य का ज्ञान

भगवान बुद्ध का जन्म वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि को ही हुआ था। भगवान बुद्ध ऐसी महान दिव्य आत्मा थी जिन्हें आज भी लोग भगवान के रूप में पूजते हैं। इसी कारण वैशाख मास की इस पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है। लेकिन बुद्ध पूर्णिमा का संबंध बुद्ध के साथ केवल जन्म भर का नहीं है बल्कि इसी पूर्णिमा तिथि को कई वर्षों तक वन में भटकने व कठोर तपस्या करने के बाद बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध को सत्य का ज्ञान हुआ था।

 

बुद्धत्व की प्राप्ति एवं महापरिनिर्वाण
इसी दिन यानी वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि को बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। इसके बाद ही महात्मा बुद्ध ने अपने ज्ञान के प्रकाश से पूरी दुनिया में एक नई रोशनी पैदा की और पूरी दुनिया को सत्य एवं सच्ची मानवता का पाठ पढ़ाया। वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि के दिन ही कुशीनगर में भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण भी हुआ था। यह अपने आप में सबसे दुर्लब संयोग ही था की उनका जन्म, उन्हें सत्य का ज्ञान और उनका महापरिनिर्वाण एक ही तिथि वैशाख पूर्णिमा को हुआ।

 

buddh purnima

बुद्ध भगवान विष्णु के नौंवे अवतार

भगवान बुद्ध केवल बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिये आराध्य नहीं है बल्कि उत्तरी भारत में गौतम बुद्ध को हिंदुओं में भगवान श्री विष्णु का नौवां अवतार भी माना जाता है। विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण माने जाते हैं। हालांकि दक्षिण भारत में बुद्ध को विष्णु का अवतार नहीं माना जाता है। दक्षिण भारतीय बलराम को विष्णु का आठवां अवतार तो श्री कृष्ण को 9वां अवतार मानते हैं। हिंदुओं में भी वैष्णवों में बलराम को 8वां अवतार माना गया है। बौद्ध धर्म के अनुयायी भी भगवान बुद्ध के विष्णु के अवतार होने को नहीं मानते। लेकिन इन तमाम पहुओं के बावजूद वैशाख पूर्णिमा का दिन बौद्ध अनुयायियों के साथ-साथ हिंदुओं द्वारा भी पूरी श्रद्धा व भक्ति के लिये भी बुद्ध पूर्णिमा खास पर्व मनाया जाता है।

 

बुद्ध जयंती

वर्तमान में पूरी दुनिया में लगभग 180 करोड़ लोग बुद्ध के अनुयायि हैं। भारत के साथ साथ चीन, नेपाल, सिंगापुर, वियतनाम, थाइलैंड, जापान, कंबोडिया, मलेशिया, श्रीलंका, म्यांमार, इंडोनेशिया, पाकिस्तान जैसे दुनिया के कई देशों में बुद्ध पूर्णिमा के दिन बुद्ध जयंती मनाई जाती है। बौद्ध अनुयायी इस दिन अपने घरों में दिये जलाते हैं, फूलों से घर सजाते हैं। प्रार्थनाएं करते हैं, बौद्ध धर्म ग्रंथों का पाठ किया जाता है।


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अगर आपके हाथों से गिरने लगे ये चीज, तो समझ लीजिए आप होने वाले हैं कंगाल!


सभी लोग चाहते हैं जीवन में कभी भी कोई मुसीबत न आए। सबकी कोशिश होती है कि जीवन में कभी भी कठिन परिस्थितियों से सामना न हो। इसके लिए हम लोग हर तरह के प्रयत्न भी करते हैं लेकिन अनजाने में ही सही, कभी न कभी हमलोगों से ऐसी गलतियां हो जाती है जो मुसीबत का कारण बन जाता है। दरअसल, जब हमलोग काम करते हैं तो अक्सर हमारे हाथों से कोई न कोई चीज गिर ही जाता है, जिसे हमें हल्के में लेकर टाल देते हैं क्योंकि हम सोचते हैं कि अमूमन ऐसा होते रहता है लेकिन कुछ चीजों का गिरना हमें संकेत की ओर इशारा भी करता है।


दरअसल, शास्त्रों के मुताबिक कुछ ऐसी चीजें होती हैं, जिनका गिरना किसी ना किसी प्रकार के संकेत की ओर इशारा करता है। हमारे शास्त्रों ऐसी बहुत सी चीजें बताई गई हैं, जिनका गिरना अशुभ माना गया है। इन चीजों की गिरने की वजह से आपको धन संकट का सामना भी करना पड़ सकता है। ज्योतिष शास्त्र और वास्तु शास्त्र में उल्लेख किया गया है कि अगर यह चीजें आपके हाथ से गिरती हैं तो यह आने वाले समय में आपके लिए परेशानी का सबब बन सकता है। तो आइये जानते हैं कि किन चीजों का गिरना अशुभ है, जो भविष्य में मुसिबत आने के संकेत देते हैं...

दूध का गिरना

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, दूध का गिरना अशुभ माना जाता है। वास्तु शास्त्र में भी दूध का गिरना अच्छा नहीं माना गया है। माना गया है कि अगर किसी व्यक्ति के हाथ से दूध गिरता है तो उसके परिवार के सदस्यों के बीच मानसिक परेशानियां और क्लेश बढ़ सकता है।

काली मिर्च का गिरना

अगर किसी के हाथ से काली मिर्च गिर जाती है तो माना जाता है कि आने वाले समय में उसका किसी के साथ संबंध खराब हो सकता है। संभावना ये भी है कि आने वाले समय में उसका किसी से झगड़ा हो सकता है।

अनाज का गिरना

अगर किसी के हाथ से चावल, गेहूं आदि का गिरना भी अशुभ माना जाता है। माना जाता है कि अगर किसी के हाथ से अनाज गिरता है तो माता अन्नपूर्णा नाराज हो जाती हैं। ज्योतिष के अनुसार, आने वाले समय में आपको धन अभाव का सामना करना पड़ सकता है।

नमक का गिरना

ज्योतिष शास्त्र में नामक का गिरना भी अशुभ माना गया है। माना जाता है कि अगर किसी के हाथ से नमक गिरता है तो ये आर्थिक नुकसान की ओर संकेत करता है। ऐसे में अगर आपके हाथ से नमक गिरता है तो आपको समझ लेना चाहिए कि आनेवाले वक्त में आपको धन संबंघित कोई बड़ा नुकसान होने वाला है।


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अगर आप भी रात में लगाते हैं परफ्यूम तो हो जाएं सावधान, नहीं तो...


अक्सर जब भी हमलोग घर से बाहर निकलते हैं तो कपड़ों पर परफ्यूम लगा लेते हैं। यही नहीं, रात में भी किसी विशेष काम से भी बाहर निकलते हैं तो परफ्यूम का इस्तेमाल करते हैं। खासकर जब हम शादी या पार्टी में जाते हैं तो परफ्यूम लगाना नहीं भूलते हैं। लेकिन क्या आपको पता है रात में परफ्यूम नहीं लगाना चाहिए, जानें क्यों....

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दरअसल, रात में परफ्यूम लगाना हमारे शास्त्रों में मना किया गया है। माना जाता है कि रात के समय नकारात्मक शक्तियों का समय होता है। यही कारण है कि रात में शास्त्रों में परफ्यूम लगाना वर्जित बताया गया है। माना जाता है कि रात के समय में ये शक्तियां सक्रिय होती हैं और किसी को भी अपने वश में कर लेती हैं।

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शास्त्रों के अनुसार, रात के समय खुशबूदार चीजों का इस्तेमाल करने से शरीर जल्दी ही नकारात्मक शक्तियों के वश में हो जाता है। माना गया है कि अगर कोई व्यक्ति रात के समय परफ्यूम लगाता है तो उसके शरीर की खुशबू से नकारात्मक शक्तियां (भूत-प्रेत) उसकी ओर आकर्षित होने लगती हैं। कहा जाता है कि ये शक्तियां व्यक्ति के शरीर की सकारात्मक ऊर्जा को खत्म कर उसके शरीर में प्रवेश कर जाती हैं।

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इसके बाद वह इंसान नकारात्मक शक्तियों से परेशान रहने लगता है। यही कारण है कि हिन्दू शास्त्रों में रात के समय परफ्यूम या अन्य खुशबूदार चीजों को शरीर पर लगाने से मना किया गया है। अगर आप भी इन चीजों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहते हैं तो रात में परफ्यूम न लगाएं।


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अहिल्याबाई होलकर जंयती 17 मई 2019, अन्याय, अंधविश्वासों और रूढ़ियों का अंत करने वाली भारत की वीर बेटी


मरते दम तक तक न्याय के लिए जीती रही

महान देश भारत की महान बेटी अहिल्याबाई ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भारत-भर के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर बनवाए, घाट बंधवाए, कुओं और बावड़ियों का निर्माण किया, मार्ग बनवाए-सुधरवाए, भूखों के लिए अन्नसत्र (अन्यक्षेत्र) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाईं, मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन हेतु की, और, आत्म-प्रतिष्ठा के झूठे मोह का त्याग करके सदा न्याय करने का प्रयत्न करती रहीं-मरते दम तक।

 

चिरस्मरणीय कार्य

ये उसी परंपरा में थीं जिसमें उनके समकालीन पूना के न्यायाधीश रामशास्त्री थे और उनके पीछे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हुई। अपने जीवनकाल में ही इन्हें जनता ‘देवी’ समझने और कहने लगी थी। इतना बड़ा व्यक्तित्व जनता ने अपनी आंखों देखा ही कहां था। जब चारों ओर गड़बड़ मची हुई थी। शासन और व्यवस्था के नाम पर घोर अत्याचार हो रहे थे। प्रजाजन-साधारण गृहस्थ, किसान मजदूर-अत्यंत हीन अवस्था में सिसक रहे थे। उनका एकमात्र सहारा-धर्म-अंधविश्वासों, भय त्रासों और रूढि़यों की जकड़ में कसा जा रहा था। न्याय में न शक्ति रही थी, न विश्वास। ऐसे काल की उन विकट परिस्थितियों में अहिल्याबाई ने जो कुछ किया-और बहुत किया वह चिरस्मरणीय है।

 

जीवित रहते ही देवी बन गई

अहिल्याबाई के संबंध में दो प्रकार की विचारधाराएं रही हैं। एक में उनको देवी के अवतार की पदवी दी गई है, दूसरी में उनके अति उत्कृष्ट गुणों के साथ अंधविश्वासों और रूढ़ियों के प्रति श्रद्धा को भी प्रकट किया है। वह अंधेरे में प्रकाश-किरण के समान थीं, जिसे अंधेरा बार-बार ग्रसने की चेष्टा करता रहा। अपने उत्कृष्ट विचारों एवं नैतिक आचरण के चलते ही समाज में उन्हें देवी का दर्जा मिला।

 

मानवता की भलाई के लिए अलख जगाई

स्‍वतंत्र भारत में अहिल्‍याबाई होल्‍कर का नाम बहुत ही सम्‍मान के साथ लिया जाता है। इनके बारे में अलग अलग राज्‍यों की पाठय पुस्‍तकों में अध्‍याय मौजूद हैं। स्‍कूली बच्‍चे अहिल्‍याबाई के बारे में चाव से पढ़ते हैं और उन से प्रेरणा लेते हैं। चूंकि अहिल्‍याबाई होल्‍कर को एक ऐसी महारानी के रूप में जाना जाता है, जिन्‍होंने भारत के अलग अलग राज्‍यों में मानवता की भलाई के लिये अनेक कार्य किये थे। इसलिये भारत सरकार तथा विभिन्‍न राज्‍यों की सरकारों ने उनकी प्रतिमायें बनवायी हैं और उनके नाम से कई कल्‍याणकारी योजनाओं भी चलाया जा रहा है।

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...तो क्या लड़कियां लड़कों से ज्यादा समझदार होती हैं?


अक्सर शादी के वक्त जब लड़की के लिए लड़के की तलाश होती है, तो उस वक्त कोशिश की जाती है कि लड़का का उम्र लड़की से ज्यादा हो। माना जाता है कि लड़का अगर लड़की से बड़ा होगा तो वह ज्यादा समझदार होगा और वह लड़की को सहयोग करेगा। यही नहीं कुछ लोग तो यहां तक तर्क देते हैं कि लड़कियां भावुक होती है। यदि लड़के की उम्र लड़की से ज्यादा होगा तो वह उसे भावनात्मक सहारा दे सकता है।

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कुछ लोगों का कहना है कि अगर दोनों के उम्र में अंतर रहेगा तो संबंधों में संतुलन बना रहेगा। कहा जाता है कि उम्र के साथ व्यक्ति की सोच विकसित होती है। वह चीजों को अच्छे से समझता है और किसी चीज में वह अच्छी तरह से संतुलन बना सकता है। कहा तो ये भी जाता है कि अगर दोनों की उम्र समान हो या लड़की की उम्र ज्यादा हो तो लड़की लड़के को उस तरह सम्मान नहीं देगी, जैसा कि पति को मिलना चाहिए। माना जाता है कि अगर ऐसा नहीं होता है तो दोनों में अहम की लड़ाई शुरू हो जाएगी और दोनों में अक्सर लड़ाई-झगड़े शुरू हो जाएंगे। माना जाता है कि अगर लड़के की उम्र लड़की से ज्यादा होगा तो लड़की लड़के का पूरा सम्मान करेगी।

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जबकि वेदों के अनुसार, स्त्री को पुरुष की सहचरणी, अर्धांगिनी और मित्र माना गया है। इसी आधार पर दोनों की उम्र में अंतर संतुलित होना जरूरी है। वहीं जैविका रूप से देखा जाए तो पुरुष अपनी उम्र से 2 वर्ष कम समझदार होते हैं। जबकि महिलाएं अपनी उम्र से 2 वर्ष अधिक समझदार होती हैं। यही कारण है कि शादी के वक्त लड़की और लड़के की उम्र में फासला रखने की सलाह दी जाती है। सामाजिक रूप से देखा जाए तो पुरुष को घर का मुखिया भी माना जाता है।


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नृसिंह जयंती उत्सव : ये हैं भगवान नृसिंह का वास्तविक स्वरूप, अपने भक्तों पर नहीं आने देते कोई कष्ट


हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नृसिंह जयंती मनाई जाती है। इस जयंती का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। भगवान श्रीनृसिंह शक्ति एवं पराक्रम के प्रमुख देवता माने जाते हैं। हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने अपने भक्त के कष्टों का नाश करने के लिए 'नृसिंह अवतार' लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस साल 19 2019 को मनाई जायेगी नृसिंह जयंती। जानें कैसे उत्पत्ति हुई भगवान नृसिंह की।

 

कथा
नृसिंह अवतार भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक है। नरसिंह अवतार में भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य व आधा शेर का शरीर धारण करके दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। प्राचीन काल में कश्यप नामक ऋषि हुए थे, उनकी पत्नी का नाम दिति था। उनके दो पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम 'हरिण्याक्ष' तथा दूसरे का 'हिरण्यकशिपु' था। हिरण्याक्ष को भगवान विष्णु ने पृथ्वी की रक्षा हेतु वराह रूप धरकर मार दिया था। अपने भाई कि मृत्यु से दुखी और क्रोधित हिरण्यकशिपु ने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए अजेय होने का संकल्प किया। सहस्त्रों वर्षों तक उसने कठोर तप किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे अजेय होने का वरदान दिया। वरदान प्राप्त करके उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। लोकपालों को मारकर भगा दिया और स्वत: सम्पूर्ण लोकों का अधिपति हो गया। देवता निरूपाय हो गए थे। वह असुर हिरण्यकशिपु को किसी प्रकार से पराजित नहीं कर सकते थे।

 

राक्षस कुल में एक संत का जन्म
अहंकार से युक्त हिरण्यकशिपु प्रजा पर अत्याचार करने लगा। इसी दौरान हिरण्यकशिपु कि पत्नी कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम 'प्रह्लाद' रखा गया। एक राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी प्रह्लाद में राक्षसों जैसे कोई भी दुर्गुण मौजूद नहीं थे तथा वह भगवान नारायण का भक्त था। वह अपने पिता हिरण्यकशिपु के अत्याचारों का विरोध करता था।

 

खंभे को चीरकर नृसिंह भगवान प्रकट हो गए और हिरण्यकशिपु को पकड़कर अपनी जांघों पर रखकर उसकी छाती को नखों से फाड़ डाला और उसका वध कर दिया। नृसिंह ने प्रह्लाद की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि आज के दिन जो भी मेरा व्रत करेगा, वह समस्त सुखों का भागी होगा एवं पापों से मुक्त होकर परमधाम को प्राप्त होगा। अत: इस कारण से इस दिन को "नृसिंह जयंती-उत्सव" के रूप में पूरे देश में मनाया जाता है।

narasimha jayanti

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शादी के लिए लड़के और लड़कियों के बीच क्या जरूरी है उम्र का फासला?


जब लड़की की उम्र शादी करने के लायक हो जाती है तो घरवाले उसके लिए वर यानि दूल्हे की तलाश शुरू कर देते हैं। अक्सर हम सुनते और देखते हैं कि लड़की के लिए जब लड़के की तलाश की जाती है, तो उसके उम्र को कुछ ज्यादा तरजीह दी जाती है। माना जाता है कि लड़के की उम्र लड़की से बड़ी होनी चाहिए। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि क्या शादी के समय लड़के और लड़कियों के बीच उम्र का फासला होना चाहिए?

शायद इसका जवाब हां और ना दोनों में हो, इसके पीछे तर्क भी दिए जाएंगे। तर्क से साबित भी कर दिया जाएगा कि लड़के का उम्र लड़की की उम्र से ज्यादा होनी चाहिए। यही नहीं, भारत में कानूनी तौर पर विवाह के लिए लड़की की उम्र 18 वर्ष तो लड़के की उम्र 21 वर्ष तय किए गए हैं। जबकि बायोलॉजिकल रूप से देखा जाए तो लड़का और लड़की 18 वर्ष की उम्र से शादी योग्य हो जाते हैं।

वहीं, कानून और पंरपार का हिन्दू धर्म से कोई संबंध नहीं हैं। पहले बचपन में ही शादी कर दी जाती थी, जिसे हम बाल विवाह कहते हैं। कहा जाता है कि शादी के वक्त अजीबोगरीब परंपराएं भी होती थी, जबकि इसका संबंध हिन्दू धर्म से नहीं था। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, 16 संस्कारों में विवाह भी एक है। यदी कोई संन्यास नहीं लेता है, तो उसे शादी करना जरूरी है और उसे गृहस्थ जीवन व्यतीत करना होगा। माना जाता है कि विवाह करने के बाद पितृऋण चुकाया जा सकता है। विवाह वि+वाह से बना है। इसका मतलब होता है विशेष रूप से वहन करना। यानि उत्तरदायित्व का वहन करना। विवाह को पाणिग्रहण भी कहा जाता है।

हिन्दू दर्शन के मुताबिक आश्रम प्रणाली में विवाह की उम्र 25 वर्ष थी। दरअसल, विवाह संस्कार हिन्दू धर्म संस्कारों में 'त्रयोदश संस्कार' है। स्नातकोत्तर जीवन विवाह का समय होता है। माना जाता था कि विद्या प्राप्त करने के बाद ही विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना होता है। शिक्षा विज्ञान के अनुसार, 25 साल की उम्र तक शरीर में वीर्य, विद्या, शक्ति और भक्ति का पर्याप्त संचय हो जाता है। इस संचय के आधार पर ही व्यक्ति गृहस्थ आश्रम की सभी छोटी-बड़ी जिम्मेदारियों को निभा पाने में सक्षम होता है।

वहीं, श्रुति वचन के अनुसार, हिन्दू संस्कृति में विवाह कभी ना टूटने वाला एक परम पवित्र धार्मिक संस्कार है, यज्ञ है। वर-वधू का जीवन सुखी बना रहे इसके लिए विवाह पूर्व लड़के और लड़की की कुंडली का मिलान कराया जाता है।

जहां तक उम्र के फासला का सवाल है तो ऐसा हिन्दू धर्म कोई खास हिदायत नहीं देता है। लड़की की उम्र ज्यादा हो, समान हो या कम, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। हिन्दू धर्म के अनुसार. अगर दोनों संस्कारवान हैं तो दोनों में समझदारी होगी, अगर नहीं हैं तो शादी एक समझौताभर है और यह समझौता कब तक कायम रहेगा, यह कोई नहीं कह सकता है।


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मां बगलामुखी का यह मंत्र एक साथ 1000 मनोकामना 9 दिन में कर देता है पूरी, मंत्र जप के बाद कर लें यह काम


अगर किसी के जीवन कितनी ही जटिल समस्या क्यों न हो, अगर वह मां बगलामुखी की शरण में जाकर माता से प्रार्थना करें एवं मां बगलामुखी के इस सरल मंत्र का केवल 9 दिनों तक हर रोज हल्दी की माला से 3 माला जप करना है। जप के बाद आखरी दिन नीचे बताई गई सामग्रियों से 251 मंत्रों का हवन करना है। हवन में गाय का घी एवं आम, पीपल, पलाश गुलर एवं अकाव की लकड़ी ही प्रयोग करना है।


इस मंत्र का जप 9 दिनों तक एक अनुष्ठान के रूप में करना है। 9 दिनों तक संभव हो तो भूमि पर शयन करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें। अपने काम स्वयं करें। नाखुन एवं सिर का बाल न काटे। जप सुबह 4 बजे से लेकर 8 बजे से पहले ही एक निर्धारित समय पर ही करना है। जप के समय गाय के घी का दीपक जलते रहना चाहिए। पूजा में 9 दिनों तक धुले हुये सफेद या पीले वस्त्र पहने।


मंत्र-

ऊँ श्री हृीं ऐं भगवती बगले मे श्रियं देहि-देहि स्वाहा।।
इस मंत्र के प्रयोग से साधक कभी दरिद्र नहीं होता।

 

1- संतान प्राप्ति के लिए: अशोक के पत्ते, कनेर के पुष्प, तिल व दुग्ध मिश्रित चावल से हवन करना चाहिए।

2- अत्यधिक धन प्राप्ति के लिए चंपा के पुष्प से हवन करना चाहिए।

3- देव-स्तवन एवं तंत्र-सिद्धि के लिए नमक, शक्कर, घी से हवन करना चाहिए।

4- आकर्षण के लिए सरसों से हवन करना चाहिए।

5- वशीकरण एवं उच्चाटन के लिए गिद्ध एवं कौए के पंख, तेल, राई, शहद, शक्कर से हवन करना चाहिए।

6- शत्रु नाश के लिए शहद, घी, दुर्वा से हवन करना चाहिए।

7- रोग नाश के लिए गुग्गल, घी से हवन करना चाहिए।

8- राजवश्यता के लिए गुग्गल व तिल से हवन करना चाहिए।

9- जेल से मुक्ति व गृह-शांति के लिए पीली सरसों, काले तिल, घी, लोभान, गुग्गल, कपूर, नमक, काली मिर्च, नीम की छाल से हवन करना चाहिए।

 

माता बगलामुखी की साधना जिस घर में होती है उस घर के लोग शत्रु, रोग, दुख-दारिद्रय, कलह आदि से मुक्त रहते हैं।

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आज 15 मई को सूर्य ने किया वृष राशि में प्रवेश, इन सात राशि के 20 से 40 साल तक के लोगों की लगने वाली है लॉटरी


आज 15 मई को सुबह 11 बजकर 2 मिनट पर सूर्य वृषभ राशि में प्रवेश कर चूका है। सूर्य का राशि परिवर्तन करना ज्योतिष के अनुसार एक अहम घटना माना जाता है। सूर्य के राशि परिवर्तन से जातकों के राशिफल पर तो असर पड़ता ही है साथ ही सूर्य के इस परिवर्तन से सौर वर्ष के मास की गणना भी की जाती है। सूर्य के राशि परिवर्तन को संक्रांति कहा जाता है। ज्योतिषाचार्य पं. अरविंद ने बताया कि मेष राशि से वृषभ राशि में सूर्य का संक्रमण वृषभ संक्रांति कहलाता है जो कि आज 15 मई को हो चूका है। इस दौरान देश में राजनीति से लेकर कई तरह के उलट फेर भी हो सकते हैं।

 

इस वृषभ संक्रांति काल में मेष से लेकर मीन तक के सभी 12 राशियों के जातक अपनी सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अपनी राशि के अनुसार ये उपाय जरूर करें। ऐसा करने आप बन सकते हैं मालामाल।

 

1- मेष राशि- अधिकतर जातकों के कार्य में वृद्धि होने लगेगी। कोई बड़ी सफलता भी मिल सकती है। इस दिन दर्पण, मच्छरदानी, काले तिल का दान जरूर करें।

2- वृषभ राशि- घर- परिवार और कार्य स्थल पर परिस्थितियां आपके पक्ष में रहेंगी । इस दिन ऊनी वस्त्र एवं अन्न का दान गरीबों के करें ।

3- मिथुन राशि- आने वाले 30 दिनों तक धैर्य से काम करेंगे तो मालामा बन सकते है। अपनी राशि लाभानुसार कंबल, तिल के लड्डू का दान जरूर करें।

4- कर्क राशि- समाज में मान-सम्मान मिलने से अनेक परेशानियां दूर होगी। मेष संक्रांति के दिन शहद का दान अवश्य करें।

5- सिंह राशि- अचानक धन प्राप्ति हो सकती है। चने की पीली दाल या फिर घी का दान करें।

6- कन्या राशि- संतानों की मदद बहुत सारी परेशानियां दूर होगी। मंदिर में या गरीबों को लाल मटके का दान करें।

7- तुला राशि- अधिकतर जातकों को अपनी माता की वजह से सुख के साथ कोई बड़ा खजाना भी मिल सकता है। सफेद चावल का दान जरूर करें।

8- वृश्चिक राशइ- अचानक किसी मित्र का सहयो मिलेगा जिससे बड़ा धन लाभ भी हो सकता है। दही या दही से बने पदार्थों का दान करें।

9- धनु राशि- पैत्रक संपत्ति से जुड़े विवाद समाप्त हो सकते सकता है। गाय को हरा चारा या फिर मंदिर में हल्दी का दान करें।

10- मकर राशि- आपके जीवन कोई बड़ा बदलाव हो सकता हैं। सरसों का तेल एवं राई का दान किसी बटुक ब्राह्मण को करें।

11- कुंभ राशि- कुछ जातकों के रूके कार्य पूरे होने के साथ धन खर्च भी बढ़ सकता है। शनि मंदिर में काले तिल एवं तेल का दान करें।

12- मीन राशि- आपके अच्छे कामों की वजह से तरक्की के साथ धन लाभ के योग भी बन रहे है। गेहूं एवं गुड़ का दान जरूर करें।

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