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आपकी 'भूख' बताती है शरीर में किस तत्व की है कमी, एेसे समझिए


वैज्ञानिक प्रयोगों से पता चला है कि भूख दिमाग से ही शुरू होती है और खत्म भी वहीं होती है, यानी इसका नियंत्रण केंद्र दिमाग है। भूख की अनुभूति दिमाग के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से हाइपोथलेमस से शुरू होती है। शरीर के दो प्रमुख हार्मोन 'लेप्टिन' और 'घ्रेलिन' भूख और तृप्ति के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार होते हैं। 'लेप्टिन' वह हार्मोन है जो आपको तृप्त करता है और खाने से रोकता है। 'घ्रेलिन'हार्मोन भूख का संकेत देता है और खाने के लिए प्रेरित करता है।

कैसे लगती है भूख -
हाइपोथलेमस के नियंत्रण में जब आमाशय भूख का हार्मोन 'घ्रेलिन' छोड़ता है तो सबसे पहले उसकी प्रतिक्रिया लीवर में होती है। भूख का एक आवेग करीब 30 सेकंड तक रहता है और यह लगातार 30 से 45 मिनटों तक होता रहा है। इसके बाद भूख 30-150 मिनटों तक कम हो जाती है। भूख की अनुभूति किए गए भोजन के प्रकार पर निर्भर करती है और उसके पाचन के कुछ घंटों बाद भूख फिर से लगना शुरू हो जाती है।

भोजन में पोषक तत्वों की कमी -
नेशनल न्यूट्रिशन मॉनीटरिंग ब्यूरो का 10 साल का सर्वे दिखाता है कि शाकाहारी होने के बावजूद भारतीयों के भोजन में कैल्शियम, मैग्नीशियम, जिंक, फोलेट, विटामिन बी 6, बी2, बी12, डी और बी जैसे कई जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी है। हम रोजाना जितनी ऊर्जा खर्चते हैं, उतनी की भरपाई भी जरूरी होती है। भारत में 70 से 80 प्रतिशत कैलोरी खाद्य पदार्थ जैसे, दाल, बाजरा और कंद में मिलते हैं। बच्चों एवं किशोरों में प्रतिदिन खर्च होने वाले ऊर्जा का 55 से 60 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट से पा सकते हैं।

जब मन करें कुछ खाने को तो एेसे समझे शरीर में किस तत्व की कमी है....
इच्छा हो चॉकलेट की तो...
आपको चाहिए - : मैग्नीशियम
एेसे करे पूर्ति - : सूखे मेवे, साबूत अनाज से बनी चीजें, हरी सब्जियां और फल आदि खाएं ।
इच्छा हो तली चीजों की तो...
आपको चाहिए : कैल्शियम
एेसे करे पूर्ति -: दूध और उससे बने उत्पाद, मेवे, हरी सब्जियां, मौसमी फल आदि खाएं।
इच्छा हो मीठे खाने की तो...
आपको चाहिए : क्रोमियम, कॉर्बन, फॉस्फोरस, सल्फर और ट्रिप्टोफेन अमीनो एसिड।
एेसे करे पूर्ति - : सेब, केला, पालक अंगूर, ताजे मौसमी फल, अनाज, दूध-दही, डेयरी उत्पाद, सूखे मेवे, साबुत अनाज से बनी चीजें खाएं।
इच्छा हो नमकीन की तो...
आपको चाहिए : सोडियम और सिलीकॉन
एेसे करे पूर्ति - : सूखे मेवे, गिरीदार-बीज वाले अन्न, साबुत अनाज से बनी चीजें, फाइबर वाली हरी सब्जियां और हरे पीले फल खाएं।


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इस तरह से खाएं खाना बनेगी अच्छी सेहत, मिलेंगे कर्इ लाभ


स्वस्थ रहने का बेहतरीन फॉर्मूला है संयमित और अनुशासित भोजन। हैल्दी शरीर के लिए भोजन करते समय मन, वचन और शरीर को मर्यादित रखना चाहिए। प्राचीन इतिहास और वर्तमान में मेडिकल साइंस भी यही कहता है कि मनुष्य को मर्यादित (संयमित), मौनपूर्वक, बैठकर और एकांत में भोजन करना चाहिए।

सात्विक भोजन यानी अच्छी हैल्थ
सात्विक भोजन मनुष्य के शरीर के लिए पौष्टिक और गुणकारी होने के साथ शरीर में होने वाले कीटाणुओं और रोगों से लडऩे की ताकत देता है। अधिक मिर्च-मसाले से बना भोजन स्वादिष्ट तो हो सकता है पर शक्तिवर्धक नहीं। बीमार व्यक्ति को डॉक्टर दवाई के साथ सलाह देते हैं कि अधिक मात्रा में घी, शक्कर, तेल, मिर्च आदि का प्रयोग नहीं करें। मूंग की दाल रोटी, खिचड़ी, हरी सब्जी ज्यादा मात्रा में लें। सात्विक-संयमित भोजन नहीं करने से मोटापा, शुगर, अपच, हृदय रोग, कैंसर जैसे रोग पैदा होने लगते हैं।

मौनपूर्वक भोजन बनाएगा फिट
मौनपूर्वक भोजन पाचक होता है। जिससे गुस्सा शांत होता है और व्यक्ति तनाव मुक्त रहता है। साथ ही मन, वचन और काया स्थिर रहती है।

बैठकर भोजन करने के लाभ
बैठकर भोजन करने से व्यक्ति को मोटापा नहीं आता और आंतों में सूजन नहीं होती। भोजन करते समय रक्त का प्रवाह अधिक होता है। बैठकर भोजन करने से खून का प्रवाह शरीर में समान रूप से प्रवाहित होता है। बैठकर भोजन करने से भोजन शरीर के अनुपात मात्रा में जाता है और पचने में भी आसानी होती है। इससे शरीर को थकान महसूस नहीं होती, जिससे लोग खाने को आराम से चबाकर खा सकते हैं।

एकांत में भोजन देता है मानसिक शांति
दीर्घायु पाने के लिए हमेशा एकांत में और शांत होकर भोजन करना चाहिए। ज्यादा लोगों के साथ सामूहिक भोज में अनेक व्यक्ति एक साथ भोजन करते हैं, जिनके विचार भी अलग-अलग होते हैं। उन सब विचारों का असर भोजन और भोजन करने वाले व्यक्ति पर पड़ता है। किसी का तरीका हमें अच्छा तो किसी का बुरा भी लग सकता है। एकांत में भोजन की गुणवत्ता बढ़ जाती है। प्राचीन आचार्य-मुनियों के अनुसार भोजन की सात्विकता मनुष्य के शरीर को स्वस्थ और दीर्घ जीवन प्रदान करती है व स्वभाव को सरल, सहज, संयमित रखती है। जो मनुष्य जीवन को आनन्द से जीना चाहते हैं तो उनको सात्विक भोजन के साथ मौन, संयमित, एकांत और बैठकर भोजन करना चाहिए।


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Stay Healthy - जानिए सेहतमंद रहने के लिए क्या खाते हैं दुनियाभर के लाेग


पूरी दुनिया के अमूमन 70 प्रतिशत लोगों के लिए अच्छी सेहत के लिए सेहतमंद खाना अभी बेहद खर्चीला और अनुपलब्ध सपने जैसा है।जब इस बारे में दुनियाभर के लोगों से राय पूछी गई तो सबसे चौंकाने वाले जवाब साबुत अनाज और आयोडीन नमक को लेकर थे। दुनियाभर में सेहतमंद आदतों/खरीददारी/उपायों पर एक निजी कंपनी का सर्वेक्षण इस तरह रहाः-

सबसे प्रचलित हैल्थ फूड
- सीरियल्स अतिरिक्त पोषक चीजों के साथ, जैसे -दूध के साथ कैलॉग्स आदि खाते हैं।

- अतिरिक्त विटामिन के साथ ब्रेड लेते हैं।

- अतिरिक्त सप्लीमेंट्स के साथ दूध का प्रयोग।

- सोया मिल्क लेते हैं, फर्मेंटेड ड्रिंक्स पीते हैं, फलों का रस प्रयोग करते हैं।

- कॉलेस्ट्राल कम करने वाले पदार्थ लेते हैं।

- प्रोबॉयोटिक्स / दही/योगर्ट खाते हैं।

- आयोडीन युक्त खाने का नमक प्रयोग करते हैं।

दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों के अनुसार टॉप 3 हैल्थ फूड
विभिन्न देशों के लोगों की सेहतमंद खाने की आदतें रीति-रिवाजों और पसंद-नापसंद से प्रभावित होती है। हैल्दी फूड के लिए लोगों की 3 प्रमुख पसंद है।
उत्तरी अमरीका
साबुत अनाज
मार्गरीन या कोलेस्ट्रॉल कम करने वाला तेल
अतिरिक्त विटामिन के साथ ब्रेड

यूरोप
साबुत अनाज
आयोडीन युक्त खाने का नमक
योगर्ट या दही

लेटिन अमरीका
साबुत अनाज
मार्गरीन या कोलेस्ट्रॉल कम करने वाला तेल
योगर्ट या दही

एशिया -प्रशांत क्षेत्र
योगर्ट या दही
फर्मेंटेड पेय पदार्थ
साबुत अनाज

खाने और चर्बी का चक्कर?
खाने की खराब आदतों से शरीर में जमा होने वाली चर्बी के कारण मोटापा महामारी बन चुका है। हृदय रोग, किडनी, लिवर और तमाम तरह की लाइफ स्टाइल बीमारियों और चर्बी के बीच रिश्ता है। लोगों की प्रतिक्रियाओं के अनुसार दुनियाभर के करीब 53 प्रतिशत लोग मानते हैं कि वे ओवरवेट हैं।

मोटापे का वैश्विक औसत
53 प्रतिशत
उत्तरी अमरीका 63 प्रतिशत
यूरोप 58 प्रतिशत
लेटिन अमरीका 58 प्रतिशत
एशिया प्रशांत 48 प्रतिशत
मध्य पूर्व/अफ्रीका 46 प्रतिशत

वजन घटाने के लिए क्या करते हैं?
लोग एक्सरसाइज और सेहतमंद डाइट को तरजीह देने लगे हैं लेकिन ऐसा बहुत कुछ विकसित देशों में ही हो रहा है। दुनियाभर के लोग कर रहे हैं ऐसा
78 प्रतिशत अपनी डाइट में बदलाव
69 प्रतिशत फिजिकल एक्टिविटी या कोई कसरत
13 प्रतिशत डाइट पिल्स या शेक की मदद से
5 प्रतिशत डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओंं की मदद से


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Gharelu nuskhe - कई रोगों को दूर करता है अशोक का पेड़


अशोक का पेड़ औषधीय गुणों से भरपूर होता है। इसे इस्तेमाल कर हम कई बीमारियों से निजात और राहत पा सकते हैं। अशोक का रस कसेला, कड़वा और ठंडी प्रकृति का होता है। यह रंग निखारने वाला, ऊष्मा नाशक और सूजन दूर करने वाला होता है। यह रक्त विकार, पेट के रोग, बुखार और जोड़ों के दर्द को दूर करता है।

अशोक के बीज पानी में पीसकर लगभग दो चम्मच नियमित रूप से लेने पर मूत्र न आने की शिकायत दूर होती है। इससे पथरी में भी आराम मिलता है। अशोक की छाल के काढ़े में बराबर मात्रा में सरसों का तेल मिलाकर फोड़े-फुंसियों पर लगाने से लाभ मिलता है।

अशोक की छाल के चूर्ण में मिश्री समान मात्रा में मिलाकर,गाय के दूध के साथ एक-एक चम्म्मच दिन में तीन बार कुछ हफ्तों तक लेने से वाइट डिस्चार्ज में लाभ होता है। अशोक की छाल और ब्राह्मी का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर 1-1 चम्मच सुबह-शाम एक कप दूध के साथ नियमित रूप से कुछ माह तक लेने से दिमाग तेज होता है।


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पीलिया दूर करती हैं नीम पत्तियां आैर भी हैं कर्इ फायदे, जानिए क्या


आयुर्वेद में नीम को बहुत ही उपयोगी पेड़ माना गया है। इसका स्वाद तो कड़वा होता है लेकिन इसके फायदे अनेक और बहुत प्रभावशाली है। आइए जानते हैं नीम के गुणाें के बारे में :-

- नीम की पत्तियों का लेप चर्म रोगों दूर करता है।

- नीम की पत्तियों को पीसकर उसे चेहरे पर लेप करने से फुंसियां व मुंहासे दूर होते हैं।

- नीम का दातुन करने से दांत चमकदार व मसूड़े स्वस्थ होते हैं।

- नीम की पत्तियों का रस पीने से खून साफ होता है और चेहरे की चमक बढ़ती है। 2/3 नीम की पत्तियों का रस और 1/3 शहद मिलाकर पीने से पीलिया रोग में काफी फायदा होता है।

- नीम की नई कोपलों को तोड़कर उन्हें हाथ से मसल लें और ताजे पानी के साथ निगल लें, इन्हें चबाएं नहीं। इससे आपको ये कड़वी नहीं लगेंगी।

- यूनानी चिकित्सा के अनुसार नीम की तासीर गर्म होती है। इसके फूलों को गर्म पानी में मसलकर व छानकर रात को पीने से कब्ज दूर होती है।


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इस तरह से पहचानें कहीं मिठाई में मिलावट तो नहीं


मीठा खाने के लिए बाजार में बिकने वाली कई तरह की मिठाईयां हम खरीदते हैं। लेकिन हर किसी के मन में डर रहता है कि कहीं यह मिठाई मिलावटी तो नहीं। मिठाइयों में होने वाली ये मिलावट सेहत को इस तरह से नुकसान पहुंचाती है। आइये जानते हैं कि मिलावटी मिठाई की पहचान कैसे करें।

रंग : मिठाई में इस्तेमाल किए गए रंगों से एलर्जी, अस्थमा, किडनी खराब होने व कैंसर का खतरा रहता है। ज्यादा चटख व गहरे रंग दिखें तो मिलावट का खतरा।

यूरिया : दूध में आमतौर पर यूरिया की मिलावट होती है। इससे पाचनतंत्र व किडनी को नुकसान होता है। किसी समतल साफ सतह पर दूध की एक बूंद टपकाएं, दूध शुद्ध होगा तो वह सीधी पंक्ति में बहेगा और अपने पीछे एक सफेद गाढ़ी छाप छोड़ेगा।

ऐसे जानें शुद्धता -
पनीर या खोए की शुद्धता : खोए से बनी मिठाई या पनीर पर आयोडीन की 5-7 बूंदें डालें। अगर उनका रंग नीला हो जाए तो उनमें मिलावट है वर्ना वे शुद्ध हैं।

चांदी का वर्क : इसमें अक्सर एल्युमीनियम की मिलावट होती है। वर्क को अंगुलियों या हथेली पर मसलें। अगर वह गायब हो जाता है तो समझें कि वह असली है और अगर उसकी गोली बन जाती है तो वह नकली है।


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सेहत के लिए सुरक्षा कवच हैं ये घरेलू नुस्खे


बुखार, जुकाम-खांसी, जोड़ों का दर्द, यह सभी बीमारियां सर्दी के मौसम में आम बात है। इन समस्याओं से बचने के लिए हम कई प्रकार के नुस्खे आजमा सकते हैं। आयुर्वेद में कई ऐसी असरदार हर्बल दवाएं हैं जिनसे इन रोगों में काफी आराम मिलता है।

कच्ची हल्दी और अदरक -
कच्ची हल्दी में फ्लैवेनॉइड्स और एंटीएजिंग तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं। इसके उपयोग से फेफड़ों को ताकत मिलती है।

उपयोग : 50-50 ग्राम की बराबर मात्रा में ताजा कच्ची हल्दी और अदरक को बारीक काट लें। इस मिश्रण में ऊपर से 2-3 नींबू का रस और स्वादानुसार नमक डाल दें। इसे एक डिब्बे में भरकर रख लें। जब भी भोजन करें इसका एक चम्मच खा लें। इसे लेने से शरीर का तापमान सामान्य रहता है और ज्यादा ठंड नहीं लगती।

तुलसी के ताजा पत्ते -
तुलसी के दो पत्ते आधे कप पानी में पीसकर मिला लें। बाद में इस पानी को पी लें। इससे सर्दी से होने वाले जुकाम में फायदा मिलेगा।

अवलेह भी उपयोगी -
आयुर्वेद में डॉक्टर मरीजों को ऐसा अवलेह देते हैं जिसमें 20 ग्राम की मात्रा में हल्दी, अदरक और गुड़ के पेस्ट में थोड़ा सा देसी घी मिलाकर दिया जाता है। इस चटनी को पुरानी खांसी व अस्थमा के रोगी ताजा रूप में खाएं तो लाभ होता है। इसे सिर्फ 2-3 दिन तक ही प्रयोग में लिया जा सकता है।

हर्बल पेय -
आधा चम्मच सूखी हल्दी, दो काली मिर्च, अदरक का टुकड़ा और दो तुलसी के पत्तों को मिलाकर उबाल लें। 2-3 मिनट उबालने के बाद इसे गिलास में छान लें और चीनी व 2-4 बूंद नींबू का रस मिलाएं। इसे हफ्ते में 3-4 बार पीने से बुखार और खांसी-जुकाम में लाभ होता है। जोड़ों के दर्द में इस काढ़े को लगातार हफ्ते में 3 से 4 बार पिएं। दो से तीन महीने तक इसे पीने से लाभ होता है।


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सेहत का खजाना है धनिया, चुटकियाें में दूर हाेगा जाेड़ाें का दर्द, एेसे करें सेवन


भारतीय रसाेर्इ में पाया जाने वाला हरा पत्तीदार व सूखा धनिया सेहत का खजाना है। धनिए में जहां आर्थराइटिस, डायबिटीज दूर करने के गुण हाेते हैं वहीं चेहरे की सुंदरता बढ़ाने आैर पाचन क्रिया सही रखने के पाेषक तत्व भी हाेते हैं। आइए जानते हैं धनिए के सेहत भरे गुणाें के बारे में :-

आर्थराइटिस में उपयाेगी
जो लोग आर्थराइटिस से पीड़ित हैं, उन्हें धनिए के इस्तेमाल से लाभ होता है। इसे भोजन में शामिल करने से जोड़ों की सूजन कम होती है और इस रोग को बढऩे से रोका जा सकता है। आर्थराइटिस में जोड़ों में सूजन और दर्द के लक्षण उभरने लगते हैं। यह सूजन आइनफ्लैमेटरी साइटोकिन्स नामक मेडिएटर पदार्थ के स्राव के कारण होती है, जिससे मरीज को चलने-फिरने और रोजमर्रा के कामों में काफी असहजता महसूस होती है। रोजाना सब्जी या चटनी में इस्तेमाल किया गया धनिया मेडिएटर पदार्थ को शरीर में बनने से रोकता है जिससे आर्थराइटिस के कारण आई सूजन में कमी आती है।

पाचन क्रिया दुरुस्त
रोजाना धनिए की चटनी खाने से पाचन प्रक्रिया दुरुस्त होती है। धनिए में आयरन भरपूर मात्रा में होता है इसलिए इसके रोजाना प्रयोग से एनीमिया की समस्या में लाभ होता है।

झाइयां करे दूर
झाइयां होने पर धनिए को पानी में उबाल लें और उस पानी के ठंडा होने पर चेहरा धोएं। ऐसा दो हफ्ते तक करने से लाभ होगा। यह विटामिन ए से भरपूर होता है जिससे आंखों की रोशनी बढ़ती है।

डायबिटीज में फायदेमंद
धनिया खून में शर्करा के लेवल को कम करता है इसलिए इसका सेवन करने से इंसुलिन का स्तर सही बना रहता है यहीं कारण है कि धनिए का सेवन करना डायबिटीज के रोगियों के लिए फायदेमंद होता है। धनिया खाने से शुगर जैसी समस्या से राहत मिलती है।

वजन कम करें
धनिए के बीज वजन कम करने के लिए उपयोगी होते हैं। गर्म पानी में उबाल कर इनकी चाय बना कर लगातार कुछ दिन पीने से वजन कम होता है।


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क्या आप मीठा देखकर कंट्रोल नहीं कर पाते ? तो जान लें ये बातें


मिठाई खाना अच्छी बात है, लेकिन कहीं आप मनुहार या इच्छा से खाने की अति तो नहीं करते। नीचे दिए गए सवालों के जवाब देकर खुद ही परख लें।

1. मिठाई खाना मुझे बेहद पसंद है। कभी-कभार ज्यादा हो जाए तो हर्ज क्या है।
अ: सहमत

ब: असहमत

2. मैं तो बचपन से ही 'स्वीट टूथ' हूं और मिठाई मेेरी मजबूरी व कमजोरी बन चुकी है।
अ: सहमत

ब: असहमत

3. मैं कम मीठा खाता/खाती हूं लेकिन कोई ज्यादा ही मनुहार करे तो खाना ही पड़ता है।
अ: सहमत

ब: असहमत

4. मैं सिर्फ अच्छी मिठाई खाता/खाती हूं लेकिन चॉकलेट देखकर मन बच्चा बन जाता है।
अ: सहमत

ब: असहमत

5. मुझे ज्यादा मीठा खाने के खतरे पता हैं लेकिन क्या करूं मिठाई मेरे लिए आकर्षण है।
अ: सहमत

ब: असहमत

6. मीठा खाना हमारी संस्कृति व रीति-रिवाजों का हिस्सा है, इससे कैसे बचा जा सकता है।
अ: सहमत

ब: असहमत

7. हमारे घर में खाने के बाद मीठा न हो तो बड़ा हंगामा हो जाता है।
अ: सहमत

ब: असहमत

8. मैं कैलोरी की मात्रा देखकर मीठा नहीं खा सकता/सकती, आखिर ये दिल की पसंद का मामला है। इसमें कंजूसी किस बात की।
अ: सहमत

ब: असहमत

9. ऐसा लगता है कि बहुत ज्यादा मीठा खाना मुझे कमजोर और बीमार कर रहा है। मुझे सचेत होने की जरूरत है।
अ: सहमत

ब: असहमत

स्कोर और एनालिसिस -
'मिठाई' कड़वी लगने लगेगी
यदि आप 7 या उससे ज्यादा सवालों से सहमत हैं तो आप मीठा खाने के लिए अच्छी सेहत के सारे नियमों को तोड़ रहे हैं। यदि आपने मीठा खाने की अति पर लगाम नहीं लगाई तो संभव है कि आपको आगे कड़वी दवाओं से गुजारा करना पड़े। स्वाद के लालच में अपने शरीर को मीठा खाकर नष्ट न करें।

मिठाई और मीठी लगेगी
यदि आप 7 या उससे ज्यादा सवालों से असहमत हैं तो यकीनन आपने अपने 'स्वीट टूथ' पर नकेल कस रखी है। आपने अब तक अपनी इस लत पर काबू किया है तभी आपका शरीर साथ दे रहा है। इस आदत को बनाएं रखें और शक्कर की मिठास की बजाय मन की मिठास को बढ़ाते रहिए। अच्छी सेहत और खुशहाल जिंदगी आपका साथ देगी।


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इस छोटी सी चीज का सेवन करने से नहीं होती गर्भपात और पीरियड्स से संबंधित समस्याएं


सिंघाड़े में कई औषधीय गुण होते हैं इसमें शुगर, अल्सर, हृदय रोग और गठिया जैसे रोगों से बचाव करने की क्षमता होती है। डिटॉक्सिफाइंग गुणों के कारण यह पीलिया ग्रसित लोगों के लिए भी काफी फायदेमंद माना जाता है। पीलिया के मरीज इसे कच्चा या जूस बनाकर ले सकते हैं। यह शरीर से जहरीले पदार्थों को बाहर निकालता है। सर्दियों में होने वाले डिहाइड्रेशन को दूर करने में भी सिंघाड़ा काफी उपयोगी है।

मैंगनीज और आयोडीन की पर्याप्त मात्रा होने के कारण यह थायरॉइड ग्रंथि की कार्यशैली को सुचारू रखने में भी मदद करता है। इसमें कैलोरी की मात्रा काफी कम होती है जिससे वजन भी नहीं बढ़ता। इसमें आयरन काफी मात्रा में होता है जिससे खून की कमी दूर होती है। इसे कच्चा, उबालकर या सब्जी बनाकर किसी भी रूप में खा सकते हैं। अस्थमा के मरीजों के लिए सिंघाड़ा बहुत फायदेमंद होता है। सिंघाड़े खाने से सांस संबधी समस्याओं से भी कम होती है। सिंघाड़ा बवासीर जैसी मुश्किल समस्याओं से भी निजात दिलाता है। प्रेग्नेंसी में सिंघाड़ा खाने से मां और बच्चा दोनों स्वस्थ रहते हैं।

सिंघाड़ें के सेवन से गर्भपात होने का खतरा भी नहीं रहता है। सिंघाड़ा खाने से पीरियड्स से संबंधित समस्याएं भी ठीक होती हैं। सिंघाड़े खाने से रक्त संबंधी समस्याएं भी ठीक हो जाती हैं। मूत्र संबंधी रोगों के उपचार के लिए सिंघाड़े का प्रयोग बहुत फायदेमंद है। दस्त होने पर भी सिंघाड़े का सेवन रामबाण इलाज है।


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क्या पत्तागोभी के इन गुणों के बारे में जानते हैं आप


पत्तागोभी का रोजाना रस पीने से पेट के घावों यानी पेप्टिक अल्सर में लाभ होता है और पेशाब संबंधी परेशानियां दूर होती हैं। पत्तागोभी सलाद के अलावा सब्जी के रूप में भी इस्तेमाल की जाती है। इसमें कई औषधीय गुण होते हैं जो हमें निरोगी बनाते हैं। जानते हैं इसके फायदों के बारे में।

कब्ज से छुटकारा -
पत्तागोभी में मौजूद कुछ सूक्ष्म तत्व शरीर में पाए जाने वाले विषैले पदार्थों को बाहर निकालकर शरीर की चयापचय क्रिया यानी मेटाबॉलिज्म को नियमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ताजा पत्तागोभी को बारीक काटकर उसमें नमक, कालीमिर्च और नींबू का रस मिलाकर रोजाना सुबह के समय खाली पेट खाने से 2-4 सप्ताह में कब्ज की समस्या दूर हो जाती है।

पेट के लिए उपयोगी -
ताजा पत्तागोभी के रस में विटामिन यू नामक एक ऐसा दुर्लभ विटामिन पाया जाता है, जो काफी असरदार अल्सर प्रतिरोधी पदार्थ है। पत्तागोभी का रस पीने से पेप्टिक अल्सर यानी पेट के घाव ठीक हो जाते हैं। विटामिन यू का यू अक्षर लैटिन भाषा के शब्द यूलस से लिया गया है जिसका अर्थ अल्सर होता है। नियमित रूप से रोजाना सुबह-शाम एक-एक कप ताजा पत्तागोभी का रस पीने से अल्सर की बीमारी में आराम मिलता है।

पेशाब संबंधी तकलीफें -
पत्तागोभी में खनिज लवण प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो मूत्र प्रणाली पर नियंत्रण रखने में सहायक होता है। इसलिए रुक-रुक कर पेशाब आने की शिकायत में पत्तागोभी का आधा कप रस पीने से आराम मिलता है।


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हल्दी के साथ ना खाएं ये चीजें नहीं ताे फायदे की जगह हाेगा नुकसान


हल्दी एंटीसेप्टिक, एंटीऑक्सीडेंट, एंटीवायरल व शोथ (सूजन) नाशक गुणों से भरपूर होती है। इसलिए इससे बनी दवाओं का उपयोग करते समय तली, ठंडी व खट्टी चीजें ना लें। 1-2 ग्राम या जरूरत के अनुसार हल्दी का चूर्ण गर्म दूध के साथ लेने से खांसी, जुकाम, दमा और चोट के दर्द में आराम मिलता है।

हल्दी का बाह्य व आंतरिक दोनों प्रकार से उपयोग होता है। आंतरिक रूप में हल्दी से बनी आयुर्वेदिक दवा हरिद्राखंड उपयोगी है। बाह्य प्रयोग में चेहरे से फुंसियां-मुंहासे, झाइयां हटाने व रंगत निखारने के लिए हल्दी को बेसन,चंदन पाउडर, गुलाब जल व दूध के साथ लेप बनाकर 20-25 मिनट तक लगाने से लाभ होता है।

सावधानी बरतें
जुकाम, खांसी व साइनस होने पर हल्दी से बना हरिद्रा आद्रक अवलेह उपयोगी होता है। यह चटनी व पाउडर के रूप में होता है जिसे चाट भी सकते है व सूखे आंवले की तरह खा भी सकते हैं।

ध्यान रहे : हल्दी के ज्यादा उपयोग से एसिडिटी हो सकती है इसलिए इसका प्रयोग डॉक्टरी सलाह से ही करें।


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दाल का पानी आैर चावल का मांड पीजिए, डेंगू बुखार जड़ से दूर कीजिए


आयुर्वेद में मांसपेशियों और जोड़ों का दर्द वात और इंटरनल ब्लीडिंग पित्त के बढ़ने का संकेत माना जाता है। आयुर्वेदिक सिद्धांत के अनुसार वात और पित्त का बढ़ा हुआ रूप ही डेंगू होता है। डेंगू मच्छर के काटने पर इस बीमारी की शुरुआत जठराग्नि (भूख) कम होने और टॉक्सिन यानी शरीर में मौजूद विषैले पदार्थ इकट्ठा होने के कारण होती है। इसके बाद वात और पित्त दोष बढ़ने लगते हैं। शरीर, सिर और मांसपेशियों में दर्द, उल्टी होना व इंटरनल ब्लीडिंग डेंगू बुखार के लक्षण हैं।

वात व पित्त का संतुलन
टॉक्सिन्स यानी विषैले पदार्थों को पचाने, जठराग्नि बढ़ाने, वात और पित्त को संतुलित करने व बुखार को कम करने के लिए गुडुचि, मुस्ता, परपटक, खस, संदल (चंदन), धनवयास और पाठा जैसी जड़ी-बूटियां लाभकारी होती हैं। पित्त को संतुलित करने और खून बहने से रोकने के लिए ठंडक प्रदान करने वाली दवाएं जैसे खस, संदल, कामादुधा रस, चन्द्रकला रस आदि दिया जाता है।

ये भी करें
रोगी को पीने के लिए गुनगुना पानी देना चाहिए और नहाने की जगह शरीर को गीले कपड़े से पोंछना चाहिए।

एक्सपर्ट की राय
डेंगू का वायरस अस्थिमज्जा (बोनमैरो) पर अटैक करता है जिसके कारण प्लेटलेट्स का बनना रुक जाता है। इनकी संख्या में ज्यादा कमी आने से इंटरनल ब्लीडिंग शुरू हो जाती है। तला-भुना, मसालेदार और मांसाहारी भोजन नहीं करना चाहिए। रसदार फल जैसे अंजीर व पपीता खाएं जबकि केला और आम जैसे भारी फलों से परहेज करना चाहिए।
(नोट: आपके लक्षण भिन्न हो सकते हैं इसलिए इन औषधियों का प्रयोग डॉक्टरी सलाह से करें)

दलिया भी उपयोगी
जठराग्नि (भूख) कम होने और पाचन तंत्र में विषैले तत्वों के बढ़ जाने की स्थिति में रोगी को बहुत हल्का भोजन दिया जाना चाहिए। विभिन्न दालों का पानी व चावल का मांड और दलिया संतुलित भोजन हो सकता है। भोजन के मामले में लापरवाही नहीं बरती जानी चाहिए।


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सर्दी में गुनगुना पानी पीने के हैं कई फायदे


जल को जीवन या प्राण भी कहते है। आयुर्वेद में गुनगुने यानी उष्ण जल को अमृत बताया गया है। लेकिन युवा पीढ़ी सर्दी के मौसम में भी फ्रिज में रखा पानी पीना पसंद कर रही है। इससे उनमें सर्दी, जुकाम, खांसी, श्वसन, टॉन्सिल आदि गले के रोग, अपच, गैस, कब्ज, मोटापा एवं डायबिटीज की समस्या हो रही है। ठण्डा पानी हमारी जठराग्नि एवं धात्व अग्नियों के साथ मेटाबोल्जिम को मंद कर देता है। यदि सादा जल या अत्यधिक शीतल जल के स्थान पर उष्ण (गुनगुना) जल का सेवन करते है तो शरीर के लिए कई गुना ज्यादा गुणकारी होता है। आयुर्वेद में गुनगुने पानी को रोग नाशक बताया गया है। जानते हैं इसके लाभ के बारे में-
हमारे भूख एवं बढ़ाने वाले रस (जठराग्नि) को बढ़ाता है और भोजन को पचाने में मदद करता है। इससे अपच, गैस, एसिडीटी, कब्ज एवं पेट के दर्द में लाभ मिलता है।
श्वसन संबंधी परेशानी में भी गुनगुना पानी पीना चाहिए। इससे अंदर जमा कफ बाहर निकलता है। सर्दी, जुकाम, खांसी, सांस लेने में आराम मिलता है।
एक गिलास गुनगुने जल में आधा चम्मच नमक डालकर गरारे करने से गले के रोगों में लाभ होता है। गले की खराश दूर होती है।
हृदय संबंधी परेशानी में गुनगुना पानी पीने से रक्त संचार सही रहता है। ब्लडप्रेशर ठीक रहता है। ब्लड पलता होता है। हानिकारक कोलेस्ट्रोल और ट्राईग्लिसराइडस को धमनियों में जमा नहीं होने देता है।
मूत्र संबंधित परेशानी में गुनगुना पानी पीने से किडनी का फंक्सन अच्छा होता है। जिन व्यक्तियों को रूक-रूक कर यूरिन आता है उन्हें गुनगुना जल पीने से राहत मिलती है। पथरी और यूरिन इंफेक्शन में भी इसका लाभ मिलता है। शरीर से विषैला तत्त्व भी अधिक मात्रा में निकलता है।
वजन व्यक्तियों को भी हमेशा गुनगुना पानी पीना चाहिए। इससे अतिरिक्त चर्बी पेट पर जमा नहीं हो पाती है। वजन कंट्रोल रहता है।
जिनकी रोग रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है उनको भी गुनगने जल का सेवन करना चाहिए। यह शरीर के लिए जरूर चीजों जैसे ऑक्सीजन, विटामिन्स, प्रोटीन्स, कार्बोहाइड्रेट्स एवं मिनरल्स को अंत:स्त्रावी ग्रंथियों व हर कोशिकाओं में पहुंचाकर मेटाबोलिज्म को ठीक रखता है। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
आयुर्वेद के अनुसार गुनगुना जल का हमेशा सेवन करने से निरोगी काया मिलती है। उम्र बढ़ती है।
सावधानी- गुनगुने जल का सेवन सर्दी और बरसात में करना चाहिए। गर्मी और जिनका ब्लड से संबंधी रोग है (त्वचा पर फोड़ा, फूंसी, चकत्तेे हैं), भ्रम (चक्कर आना), शरीर में जलन, थकावट, नाक से खूना आना और पित्त संबंधी परेशानी है उनको गुनगुने पानी की जगह सामान्य पानी पीना चाहिए।
डॉ. चन्दनमल जैन, आयुर्वेद विशेषज्ञ


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दर्द व नींद के लिए फायदेमंद है वनौषधी तगर, जानें इसके बारे में


आधुनिक आयुर्वेद में तगर अत्यंत महत्वपूर्ण औषधि कंद है। तगर औषधि कई तरह के रोगों में लाभकारी है। आइये जानते हैं तगर औषधि से होने वाले फायदों के बारे में

गुण : शीतल, सबके अनुकूल, कड़वेपन के साथ हल्का मीठा स्वाद, विषैले प्रभाव नाशक, सुगंधित, वायु नाशक व स्नायु मंडल को शिथिल कर पीड़ा से राहत देने वाली है।

इन रोगों में फायदा : नेत्र रोग, रक्त विकार, मिर्गी, अनिद्रा, सूखी खांसी, श्वास नलियों की सूजन, पुराने घाव, हड्डी टूटने, गठिया और जोड़ों के दर्द, सिर दर्द, नसों में तनाव होने जैसे रोगों में यह आरामदायक होती है।

इस प्रकार लें -
दिन में बच, कूठ, ब्राह्मी के साथ तीन बार लें। गाय का दूध और घृत आहार में लेने से मिर्गी, हिस्टीरिया और पक्षाघात में लाभ।
पीसकर 3-4 घंटे ठंडे पानी में भिगोकर उस पानी को पीने से दर्द में आराम आता है।
नींद की गोलियां लेने वालों को तगर के कैप्सूल रोज रात को लेने से गहरी स्वप्न व पीड़ारहित नींद आ सकती है।

(नोट : दवाओं का प्रयोग डॉक्टर की सलाह से करें)


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शरीर को डस्टबिन मत बनाइए, संकेतों को समझिए


कल्पना कीजिए कि आप एक छोटे से 10 गुना 10 के कमरे में रहते हैं। आप अपनी दिनचर्या के कारण करीब एक किलो कचरा फैलाते हैं लेकिन उसमें से 100 ग्राम रोज कमरे में ही रह जाता है। क्या होगा जब ऐसी स्थिति एक हफ्ते, एक महीने या सालभर तक बनी रहे। अब कमरे की जगह अपने शरीर को रखकर देखिए। हमारे भोजन और पानी का लगभग 30 प्रतिशत मल-मूत्र के रूप में उत्सर्जित होता है। माना जाता है कि प्रति 1000 ग्राम भोजन पर लगभग 10 ग्राम ऐसा अपशिष्ट बनता है जो शरीर में जमा होता रहता है। यदि अनुमान लगाएं तो महीने में 30 ग्राम कचरा और सालभर में लगभग 3 किलो। यदि ये विषैले तत्व शरीर में बने रहें तो शारीरिक और मानसिक सेहत को बुरी तरह से बिगाड़ सकते हैं। आहार विशेषज्ञ डॉ. कहते हैं कि लोग चाय, कॉफी, सोडा या चॉकलेट जैसी चीजों से खुद को ऊर्जावान बनाने की कोशिश में ज्यादा नुकसान कर बैठते हैं और हमेशा तनाव से घिरे रहते हैं।

पेट से परेशान रहना -
ये आदत बड़ी महत्वपूर्ण है जो वाकई आपको सीधे संकेत देती है कि आप कुछ गलत कर रहे हैं। पेट में गैस, अपच, डकारें, जलन, दर्द, उल्टी-दस्त आदि लक्षण बताते हैं कि शरीर में जो कचरा बन रहा है वह बाहर नहीं निकल रहा है। आहार और आदतों के कारण कचरे पर कचरा जमा होकर विष बनता जा रहा है और शरीर की सफाई व्यवस्था पटरी से उतर चुकी है।
उपाय है : पेट सभी बीमारियों की जड़ है। हम पेट से नहीं, पेट हमसे दु:खी होता है। पेट के साथ प्रयोग मत कीजिए। थोड़ा और अच्छा खाने की आदत डालिए, खासतौर पर रात का भोजन हल्का कीजिए।

बढ़ता वजन -
वजन बढऩा भी शरीर में विषैला कचरा जमा होने का संकेत है। अमूमन खाने की अनहैल्दी व खराब आदतों वाले लोग इस समस्या से पीड़ित हैं। ऐसे लोग खाते-पीते ज्यादा हैं। ये लोग जितनी कैलोरी वाला खाना खाते हैं, उसमें से बहुत कम खर्च कर पाते हैं। नतीजतन शरीर कैलोरी ऊर्जा को चर्बी में के रूप में जमा कर मोटापा बढ़ाता है।

उपाय है
उतना ही खाएं जितना आप खर्च कर सकते हैं। खानपान की चीजों से जुड़े कैलोरी ज्ञान को बढ़ाएं। साथ में खाने के मामले में खुद पर नियंत्रण करना सीखें।

बार-बार भूख लगना -
आप जो खा रहे हैं पता नहीं वह शरीर को लग क्यों नहीं रहा ? कई बार तो लोग इसे भूख न लगने की समस्या मानकर उसका इलाज करवाने लगते हैं लेकिन असल में समस्या भूख की नहीं, शरीर में जमा हो रही गंदगी की है। परेशान लोग ऐसी स्थिति में कुछ भी खाने को दौड़ते हैं। मनोवैज्ञानिक तौर पर भूख से परेशान होकर वे कई बार झगड़ा भी कर सकते हैं। कुछ समय बाद तो वे प्रोसेस्ड फूड, जंक फूड, मीठी और चटखारे वाली चीजों के ऐसे गुलाम हो जाते हैं कि जहां देखा वहां बिना शर्म टूट पड़ते हैं।
उपाय है : अपना डाइट ज्ञान बढ़ाइए और हैबिट्स पर ध्यान दीजिए। डाइटिशियन को समस्या बताकर उनसे अपना डाइट चार्ट बनवाएं और संकल्प के साथ उस पर अमल करें।

कुछ अन्य उपाय
ना कहना सीखें -
हर एक नकली चीज को, कृत्रिम रसायनों से बनी चीजों को और लुभावने प्रलोभनों को।

मेडिटेशन करें -
मन को शांति मिलेगी व एकाग्रता बढ़ेगी। आप तन से अच्छी तरह जुड़ पाएंगे।

बातें करें या लिखें -
अपनी समस्याओं और परेशानियों को बातचीत करके या लिखकर सुलझाएं। ग्रीन टी पिएं
शरीर को शुद्ध करने के लिए दूध की चाय की बजाय ग्रीन टी को अपनी दिनचर्या का अहम हिस्सा बनाएं।

30 मिनट सेहत के नाम -
हर रोज कम से कम 30 मिनट किसी भी तरह की एक्सरसाइज जरूर करें।

बुरी आदतों से तौबा करें -
सिगरेट, शराब पीने और रिफाइंड शुगर खाने जैसी बुरी आदतें छोड़ें।
लिवर, किडनी का रखें ख्याल
लिवर और किडनी की सफाई व उन्हें एक्टिव बनाए रखने के लिए मौसमी फल, नींबू, अदरक, दही व छाछ लें।

खाने में बढ़ाएं रेशों की मात्रा -
अच्छे पाचन और शरीर से कचरे को बाहर करने के लिए अपनी डाइट में रेशों यानी फाइबर्स से भरपूर फल जैसे केला व संतरा, सब्जियां (पालक आदि) और सूखे मेवे (बादाम) जरूर शामिल करें।

हम चाहें तो शरीर के कुछ संकेतों को समझ सकते हैं जो कहते हैं कि बस करो, मेरे अंदर विषैली गंदगी या कचरा जमा हो रहा है। शरीर से ऐसी जहर समान विषैली गंदगी को निकालना डिटॉक्सिफिकेशन कहलाता है।


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Makar Sankranti - जानिए मकर संक्रांति पर क्यों खाते हैं खिचड़ी और तिल


मकर संक्रांति देश में हर साल 14 जनवरी को मनाया जाता है। यह त्योहार पूरे भारत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश कर जाता है। मकर संक्रांति के दिन स्नान, दान, तिल और खिचड़ी सेवन करने का महत्व है। इस दिन लोग चावल से बनी खिचड़ी, उड़द की दाल और तिल से बनी चीजें खाई जाती हैं। मकर संक्रांति को गुड़ तिल से बनी चीजें जैसे तिल के लड्डू, गजक, रेवड़ी, खिचड़ी आदि को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। आइए जानते हैं मकर संक्रांति के अवसर पर तिल और खिचड़ी का सेवन क्यों किया जाता है।

तिल, गुड़ के फायदे -

तिल में फाइबर अधिक मात्रा में होता है, इसकी वजह से पाचन संबंधी समस्याएं जैसे कब्ज, गैस अादि के लिए तिल का सेवन फायदेमंद होता है। तिल में कॉपर होता है जिसमें एंटी इफ्रामेटरी और एंटी ऑक्सीडेंट एंजाइम होते हैं ये गठिया के दर्द और सूजन को कम करते हैं। सर्दियों में गठिया के रोगियों की समस्याएं बढ़ जाती है। तिल में मैग्नीशियम, कॉपर, कैल्शियम, आयरन, जिंक और फाइबर के साथ विटामिन, मिनरल और दूसरे पोषक तत्व भी होते हैं। गुड़ आयरन, फॉस्फोरस,पोटेशियम, कैल्शियम के साथ ही विटामिन ए और बी भी पाया जाता है। यही कारण है कि तिल और गुड़ को मकर संक्रांति पर सेवन के साथ जोड़ दिया गया, ताकि इन चीज़ो को लोग अपनी डाइट में शामिल कर सकें। तिल हड्डियों और जोड़ों को भी मजबूती देता है। तिल में जिंक होता है ये त्वचा के लिए फायदेमंद होता है, इससे स्किन ग्लो करती है और इसकी इलास्टिसिटी भी अच्छी होती है।

खिचड़ी खाने के फायदे -

मकर संक्रांति पर चावल के साथ उड़द का दाल व चावल के साथ कई सीजनल हरी सब्जियों को मिक्स करके खिचड़ी बनाई जाती है। टमाटर, मटर, हरी सब्जियों और दाल के कारण खिचड़ी की पौष्टिकता बढ़ जाती है। खिचड़ी के सेवन से वात, पित्त और कफ से होने वाली शारीरिक समस्याएं भी नहीं होती है। खिचड़ी शरीर को ऊर्जा देती है व शरीर की रोग प्रतिरक्षा तंत्र को भी बूस्ट करती है। सर्दियों में पित्त और गैस की समस्या ज्यादा होती है इसके लिए अच्छे पचाने वाले भोजन खाना चाहिए, ऐसे में खिचड़ी सबसे बेहतर होती है। खिचड़ी में कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, कैल्शियम, फाइबर्स, मैग्नीशियम, पोटैशियम और फॉस्फोरस आदि पाए जाते हैं।

गुड़ खाने के फायदे -

गुड़ एनीमिया में बहुत लाभकारी होता है ये रक्त शोधक का भी काम करता है। गुड़ फेफड़ों के इंफेक्शन और गंदगी को साफ करता है। पॉल्युशन से होने वाली खांसी, जुकाम आदि में गुड़ फायदेमंद होता है। गुड में फास्फोरस में मौजूद गुड़ के सेवन से पाचन तंत्र तुरुस्त रहता है। गुड़ में कैल्सियम होता है जो हड्डीयों की कमजोरी को दूर करता है।


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खाने से ही नहीं, इस कारण से भी हाे जाती है फूड पॉइजनिंग, जानिए क्या


खाद्य जनित बीमारियां या फूड पॉइजनिंग आम तौर पर उन खाद्य पदार्थों को खाने से होती है, जो दूषित बैक्टीरिया या उनके विषाक्त पदार्थों से होती है। चिकित्सकों का कहना है कि वायरस और परजीवी भी फूड पॉइजनिंग का कारण बन सकते हैं।

हार्ट केयर फाउंडेशन (एचसीएफआई) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, ''लोग लंबे समय से जानते हैं कि कच्चे मांस, मुर्गी और अंडे भी रोगाणुओं का कारण बन सकते हैं। हाल के वर्षों में ताजे फल और सब्जियों के कारण खाद्य जनित बीमारियों का सबसे ज्यादा प्रकोप रहा है।"

उन्होंने कहा, ''फलों और सब्जियों की पूरी तरह से धुलाई और उचित तरीके से खाना पकाने से, खाद्य विषाक्तता का कारण बनने वाले अधिकांश बैक्टीरिया समाप्त हो सकते हैं, लेकिन कुछ स्ट्रेन हैं, जो प्रतिरोधी के रूप में उभर रहे हैं।"

उन्होंने कहा, ''इस प्रकार यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि स्रोत पर ही नुकसान को कम किया जाए। खाद्य जनित बीमारियां या फूड पॉइजनिंग आम तौर पर उन खाद्य पदार्थों को खाने से होती है, जो दूषित बैक्टीरिया या उनके विषाक्त पदार्थों से होते हैं। वायरस और परजीवी भी फूड पॉइजनिंग का कारण बन सकते हैं।"

फूड पॉइजनिंग के कुछ लक्षणों में पेट में दर्द, मतली, सिरदर्द, थकान, उल्टी, दस्त और निर्जलीकरण शामिल हैं। ये खराब भोजन लेने के बाद कई घंटों से लेकर कुछ दिन तक दिखाई दे सकते हैं। उदाहरण के लिए, साल्मोनेला बैक्टीरिया 4-7 दिनों के बाद, 12 घंटे से 3 दिन तक बीमारी का कारण बन सकता है।

डॉ. अग्रवाल ने बताया, ''फूड पॉइजनिंग का इलाज करने का सबसे आम तरीका है कि आप बहुत सारे तरल पदार्थ पीएं। बीमारी आमतौर पर कुछ दिनों में कम हो जाती है। हालांकि, कुछ बुनियादी कदमों के साथ स्वच्छता बनाए रखना भी जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण है हाथ धोना। खुले में शौच से बचना चाहिए और उपभोग से पहले फलों और सब्जियों को साफ पानी से धोया जाना चाहिए।"

उन्होंने कहा हालांकि फूड प्वॉइजनिंग के लक्षण लगभग 48 घंटों में गायब हो जाते हैं, लेकिन फिर भी निम्न युक्तियां स्थिति से मुकाबला करने में मदद कर सकती हैं।

डॉ. अग्रवाल ने फूड पॉइजनिंग से बचने के लिए कुछ सुझाव देते हुए कहा, ''अपने पेट को व्यवस्थित होने दें। कुछ घंटों के लिए खाना-पीना बंद कर दें। बर्फ के चिप्स चूसने या पानी के छोटे घूंट लेने की कोशिश करें। जब आप सामान्य रूप से मूत्र त्याग कर रहे होते हैं और आपका मूत्र स्पष्ट और डार्क नहीं होता है, तो इसका मतलब है कि शरीर पर्याप्त हाइड्रेटेड है।"

उन्होंने कहा, ''धीरे-धीरे खाना शुरू करें। कम वसा वाले, आसानी से पचने वाले खाद्य पदार्थ, जैसे कि टोस्ट, केला और चावल खाना शुरू करें। अगर आपको फिर से मतली होने लगे तो खाना बंद कर दें। जब तक आप बेहतर महसूस नहीं करते, तब तक कुछ पेय और खाद्य पदार्थों से बचें। इनमें डेयरी उत्पाद, कैफीन, शराब, निकोटीन, और वसायुक्त या अत्यधिक तले हुए खाद्य पदार्थ शामिल हैं।


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आपकाे सालभर बीमारी से दूर रखेगा सर्दियाें का ये विशेष खानपान, जानिए क्या


सर्दियों में आमतौर पर कार्बोहाइड्रेट्स का सेवन बढ़ जाता है और पानी पीना कम हो जाता है जोकि स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक है। चिकित्सकों का कहना है कि ठंड के मौसम में कुछ आसान चीजों को अपनाकर अच्छे स्वास्थ्य को सुनिश्चित किया जा सकता है।

वरिष्ठ आहार विशेषज्ञ मंजरी चंद्रा का कहना है, ''शारीरिक श्रम की कमी व अस्वस्थ जंक फूड का सेवन करने की वजह से सर्दियों में वजन का बढ़ना बहुत आम बात है। लोगों को अखरोट, हरे पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फलों, शकरकंद और अंडे खाना चाहिए।"

उन्होंने कहा, ''नमक और चीनी का सेवन घटाना और इसके स्थान पर सेंधा नमक, गुड़, शहद आदि लेना बहुत आवश्यक है। साथ ही ठंड में प्रतिदिन के खाने में कम से कम तेल का प्रयोग लोगों और उनके परिवारों के अच्छे स्वास्थ्य को सुनिश्चित करता है।"

वजन न बढ़े इसके लिए दूसरा विकल्प आयुर्वेदिक जीवनशैली अपनाना है। आयुर्वेद के हिसाब से रोग प्रतिकारक क्षमता पाचन से जुड़ी है। जब पाचन मजबूत होगा और भूख अच्छी लगेगी तो रोग प्रतिकारक क्षमता मजबूत रहेगी। जब कभी पाचन कमजोर होता है, रोग प्रतिकारक क्षमता अपने आप कमजोर हो जाती है।

महर्षि आयुर्वेद अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डाक्टर सौरभ शर्मा ने कहा, ''जाड़े का मौसम ऐसा सीजन होता है जब प्रकृति हमारा पोषण करने को तैयार रहती है। पाचन का स्तर बहुत ऊंचा होने की वजह से भूख और पाचन की ताकत अन्य सीजन के मुकाबले अधिक होती है। लोग सोचते हैं कि यह सीजन रोग प्रतिकारक क्षमता के लिए खराब है क्योंकि वे अस्वास्थ्यकर खाना और जल्दी हजम नहीं होने वाला खाना खाते हैं जिससे उनकी रोग प्रतिकारक क्षमता सुस्त हो जाती है।"

उन्होंने कहा, ''जैसे ही भूख बढ़ती है, लोग अधिक जंक फूड, भारी खाना और आसानी से हजम नहीं होने वाली चीजें खाने लगते हैं। लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि खराब रोग प्रतिकारक क्षमता का निर्माण हम स्वयं कर रहे हैं और प्रकृति इसके लिए दोषी नहीं है। इस सीजन के लिए यह अधिक महत्वपूर्ण है कि लोग जाड़े के दौरान रोग प्रतिकारक क्षमता बढ़ाने वाली चीजें खाएं और आयुर्वेद के हिसाब से दिनचर्या अपनाएं।


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शरीर को जल्द ताकतवर बना देती है ये यूनानी चटनी


यूनानी चिकित्सा पद्धति में खमीरा अबरेशम हकीम अर्शदवाला एक ऐसी दवा है जो ब्लड प्रेशर, लंबी बीमारी के बाद व बुजुर्ग व्यक्तियों को होने वाली शारीरिक कमजोरी, हृदय की धड़कनों को नियमित करने, दिल व दिमाग की कमजोरी को दूर करने के लिए प्रयोग की जाती है। यह दवा जड़ी-बूटियों से मिलकर बनी होती है जो चटनी के रूप में तैयार की जाती है। रोगियों को यह दवा नाश्ते के बाद 3 - 6 ग्राम की मात्रा में लेनी होती है। इस दवा का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता और ये दवा लंबे समय तक ली जा सकती है। यह गीली चटनी जैसी होती है जो स्वाद में मीठी होती है।

तासीर होती है गर्म
आमतौर पर यह दवा मरीज को 2-3 माह तक लेनी होती है लेकिन सुधार न होने पर इलाज लंबा भी चल सकता है। यह बच्चों को नहीं दी जाती क्योंकि इसकी तासीर गर्म होती है। इसकी जगह पर उन्हें खमीरा अबरेशम सादा दी जाती है क्योंकि यह पचने में आसान होती है।

नोट: दवाओं का प्रयोग डॉक्टरी सलाह से करें।


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