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लिवर कमजोर होने पर हो सकती हैं कई गंभीर समस्याएं


कमजोर लिवर अंधेपन का भी कारण बन सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक लिवर की कमजोरी पेट व आंखों को ही नहीं बल्कि किडनी व दिमाग के रोगों और डायबिटीज समेत कई समस्याओं को जन्म देती है। जानें लिवर में होने वाली दिक्कतें हमारे शरीर के किन अंगों को और कैसे प्रभावित करती हैं।

ये अंग होते हैं प्रभावित -
1. आंख: आंखों में कमजोरी या अंधेपन के कई मामलों में विल्संस डिजीज जिम्मेदार है। यह बीमारी आनुवांशिक होती है। जिसका कारक प्रोटीन है। इसके अलावा शरीर में काफी कम मात्रा में कॉपर तत्त्व की जरूरत होती है। जिसकी मात्रा अधिक होने पर यह आंख, लिवर व मस्तिष्क में इकट्ठा होने लगता है जिसे शरीर बाहर नहीं निकाल पाता। इससे आंखों में रोशनी का घटना, लिवर की कमजोरी और मस्तिष्क से जुड़ी दिक्कतें सामने आती हैं। समय पर डॉक्टरी सलाह न लेने पर अंधेपन और लिवर ट्रांसप्लांट की नौबत आ सकती है।

2. किडनी : हिपैटो रीनल सिंड्रोम लिवर की क्रॉनिक डिजीज में से एक है। इसके लिए सिरोसिस डिजीज जिम्मेदार होती है। सिरोसिस में लिवर कमजोर हो जाता है। इसका सीधा असर किडनी पर होता है और शरीर में विषैले पदार्थों की मात्रा बढ़ने लगती है। लंबे समय तक अनदेखी करने पर किडनी फेल भी हो सकती है।

3. मस्तिष्क : लिवर फेल होने पर शरीर में मौजूद विषैले पदार्थ मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं। इनमें अमोनिया प्रमुख है। बॉडी से बाहर न निकल पाने के कारण यह ब्लड के साथ शरीर में प्रवाहित होता है और मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाता है। इसे हिपैटिक एनसेफैलोपैथी कहते हैं। इसमें मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियों के लक्षण जैसे बेहोशी और मरीज के कोमा में जाने की आशंका रहती है।

ये हैं कारण -
लिवर को कमजोर करने में अल्कोहल का अहम रोल होता है। बचपन से शरीर में पोषण की कमी लिवर को कमजोर करती है।
हेपेटाइटिस-बी- इसमें लिवर में सूजन आ जाती है व यह हेपेटाइटिस-बी वायरस के कारण होता है।
सिरोसिस -इसमें लिवर ऊत्तक क्षतिग्रस्त हो जाते हैं जिससे पोषण और हार्मोन प्रभावित होते हैं।
इसके अलावा स्टूल पास करने में अनियमितता, लिवर में कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड का इकट्ठा हो जाना, लिवर में खून का प्रवाह बाधित होना और डाइट में अधिक मात्रा में विटामिन-ए लेना प्रमुख कारण हैं।

इतना काम करता है -
लिवर शरीर की कई गतिविधियों में अहम रोल अदा करता है। यह शुगर, वसा और कोलेस्ट्रॉल के उत्पादन, स्टोरेज व उत्सर्जन को नियमित व नियंत्रित करके पाचन और मेटाबॉलिज्म की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लिवर एंजाइम, हार्मोन्स, रक्त प्रोटीन, क्लॉटिंग पैदा करने वाले कारक और प्रतिरक्षा कारकों सहित विभिन्न प्रकार के महत्त्वपूर्ण प्रोटीन पैदा करता है। यह विषैले पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने का भी काम करता है।

ट्रांसप्लांट : दो तरह के डोनर -
लिवर ट्रांसप्लांट सर्जिकल प्रक्रिया है। अधिकांशत: स्वस्थ लिवर मृत व्यक्ति से प्राप्त किया जाता है, लेकिन कई बार जीवित व्यक्ति भी लिवर दान करते हैं। कई मामलों में पूरा लिवर न बदलकर कुछ हिस्सा ही बदला जाता है। ट्रांसप्लांट उन मरीजों में किया जाता है, जिनका लिवर फेल हो चुका होता है।

यूं पहचानें कमजोरी -
आंखों के नीचे काले घेरे, यूरिन का गहरा रंग, आंखों व त्वचा में पीलापन, पेट में सूजन, पाचनतंत्र की खराबी, उल्टी, खाने का स्वाद न मिलने जैसे लक्षण लिवर का कमजोर होना बताते हैं।

ऐसे स्वस्थ रहेगा -
स्वस्थ लिवर के लिए अपने खानपान का खास ध्यान रखें। डाइट में ताजे फल और सब्जियां शामिल करें। वसायुक्त पदार्थ पाचन को धीमा करते हैं इसलिए ऐेसे पदार्थों से दूरी बनाएं। दिनभर में कम से कम १० गिलास पानी पीएं।

जांच : बायोप्सी बताती है कितना हुआ नुकसान -
लिवर जांच में बिलीरुबिन (सामान्य स्तर 0-1.3 मिलीग्राम), एल्बुमिन (सामान्य स्तर 3.2 - 5 ग्राम) और प्रोथ्रोम्बिन टाइम (रक्त के थक्के का पता लगाने का एक तरीका) शामिल हैं। लिवर में हुई क्षति की सीमा निर्धारित करने का सबसे बेहतर उपाय लिवर बायोप्सी है। यदि हेपेटाइटिस-बी, सी या एचआईवी के मरीज हैं तो ब्लड काउंट की नियमित जांच कराएं।


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पेट के ऊपरी भाग में दर्द-सूजन हैं लिवर कैंसर के लक्षण, जानें इसके बारे में


लिवर से फैलने वाले कैंसर को प्राइमरी कैंसर या हिपैटोमा भी कहते हैं। लिवर विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं से बना होता है जिसमें से लिवर कोशिकाएं 80 प्रतिशत लिवर ऊतकों का निर्माण करती हैं। इस तरह, ज्यादातर प्राइमरी कैंसर लिवर कोशिकाओं से पैदा होते हैं व उन्हें हेपैटोसेलुलर कैंसर (कार्सिनोमा) कहा जाता है।

प्रकार : लिवर कैंसर दो प्रकार का होता है। प्राथमिक जो सीधे लिवर की कोशिकाओं में पनपता है। मेटास्टैटिक कैंसर जो दूसरे अंगों में प्रारंभ होकर लिवर में फैलता है। फेफड़ों, बड़ी आंत, पेट व ब्रेस्ट कैंसर भी लिवर तक फैल जाते हैं। कई मामलों में लिवर कैंसर में जब तक मरीज को रोग का पता चलता है तब तक रोग दूसरे अंगों में भी फैल चुका होता है। इसलिए जिन्हें इस कैंसर की आशंका रहती है वे नियमित जांच करवाते रहें।

कारण : ज्यादातर मामलों में इसकी वजह अज्ञात है। कई बार हिपैटाइटिस वायरस से होने वाले संक्रामण के बढ़ने, शराब पीने, आनुवांशिक लिवर रोग जैसे हेमोक्रोमैटोसिस व विल्सन डिजीज और फैटी लिवर डिजीज से रोग हो सकता है। म्यूटेशन के कारण डीएनए में बदलाव होने से कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से विकसित होने लगती हैं जो इस कैंसर की वजह बनती है।
लक्षण : प्राथमिक स्तर पर इसके लक्षण नहीं दिखते लेकिन बाद में वजन कम होना, पेट के ऊपरी भाग में दर्द, उल्टी, कमजोरी, पेट पर सूजन, नाक से खून आना, त्वचा व आंखों के सफेद भाग का पीलापन व सफेद मल आना जैसी दिक्कतें होती हैं।

क्या है इलाज -
सर्जरी : लिवर में प्रभावित हिस्से के आसपास के ऊत्तकों को ऑपरेशन कर निकालते हैं। लिवर में ट्यूमर किस जगह है उसपर सर्जरी निर्भर करती है।
नॉन सर्जिकल : इसके दो तरीके हैं। पहला कीमो एम्बोलाइजेशन इसमें एंटी-कैंसर ड्रग को सीधे लिवर की रक्तवाहिकाओं में इंजेक्ट करते हैं। दूसरा,रेडियो-फ्रीक्वेंसी एबलेशन इसमें कैंसर टिश्यूज को नष्ट करने या सिकोडऩे के लिए उच्च क्षमता वाली उर्जा की किरणों जैसे एक्स-रे व प्रोटॉन प्रयोग करते हैं। ये किरणें केवल लिवर पर असर करती हैं।

लिवर ट्रांस्प्लांट : खराब लिवर की जगह स्वस्थ लिवर को प्रत्यारोपित करते हैं। जिनके लिवर में छोटे-छोटे ऐसे ट्यूमर जो रक्त नलिकाओं तक न फैले हों उनमें यह ट्रांस्प्लांट होता है।
रोबोटिक सर्जरी : सर्जन कम्प्यूटर से रोबोट को नियंत्रित करते हैं। शरीर में छोटे-छोटे छेद लगाने से दर्द नहीं होता व निशान नहीं दिखते। जटिलताएं कम होने से रिकवरी जल्दी होती है व मरीज को अस्पताल से जल्दी छुट्टी दे देते हैं।


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क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत करती है स्टेम सेल थैरेपी, जानें इसके बारे में


इस थैरेपी से किस तरह के मरीजों का इलाज संभव है ?

इस तकनीक से कई मरीजों का इलाज किया जा चुका है। वे सभी अलग-अलग परेशानियों जैसे मस्कुलोस्केलेटल, न्यूरोलॉजिकल, ऑर्गन डिस्फंक्शन और जेनेटिक डिसऑर्डर से ग्रस्त थे। ये सभी स्थितियां लाइलाज मानी जाती हैं। इस थैरेपी से मरीजों की स्थिति और उनके जीवन में काफी सुधार देखा गया है। रीढ़ की हड्डी में चोट, पार्किंसंस डिजीज, सेरेब्रल पाल्सी, हृदय रोग, किडनी विकार, नहीं भरने वाले घाव आदि बीमारियों से ग्रस्त मरीजों को भी थैरेपी से फायदा हुआ है।

क्या निकट भविष्य में लाइलाज बीमारियों का इलाज स्टेम सेल थैरेपी से संभव होगा?
स्टेम सेल इलाज के महत्त्व को आज पूरी दुनिया स्वीकार रही है। देश के कई संस्थान इस अनुसंधान में जुटे हैं। कई शोधकर्ता शोध के आधार पर इलाज कर रहे हैं। आज जो बीमारी लाइलाज मानी जा रही है, स्टेम सेल थैरेपी से उसका इलाज संभव है।

स्टेम सेल किस तरह से लाइलाज बीमारियों या विकारों का इलाज करता है ?
स्टेम सेल अनेक रूप में खुद को ढाल सकता है। इसकी यही खासियत शरीर के प्राकृतिक घाव भरने की कार्य प्रणाली का आधार है। एम्ब्रियोनिक स्टेम सेल के साथ लाइलाज बीमारियों या विकारों का उपचार करते हुए इसी सिद्धांत का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें रोगी के शरीर में सुई के जरिए स्टेम सेल प्रत्यारोपित किए जाते हैं। ये कोशिकाएं क्षतिग्रस्त या सही काम न करने वाले अंगों या स्थान में गहराई से अपनी पकड़ बना लेती हैं ताकि क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत की जा सके।

स्टेम सेल थैरेपी को कहां-कहां इस्तेमाल किया जा रहा है और भारत या अमरीका में पेटेंट दिलवाने में सफल हो पाएंगी ?
इस थैरेपी को भारत सहित यूएस, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, जापान, कोरिया सहित 66 देशों में प्रयोग में लिया जा रहा है। भारत और अमरीका में इसके पेटेंट को लेकर काम जारी है।


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फिंगरप्रिंट बताएगा भविष्य में होने वाली दांतों की बीमारी के बारे में


बच्चों में होने वाली दांत की बीमारियों का पता अब बचपन में ही चल जाएगा। इसकी जानकारी बच्चे के फिंगरप्रिंट से ली जा सकेगी। यह जानकारी लखनऊ स्थित किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में किए गए एक शोध में सामने आई है। इस शोध के मुताबिक, दांत से जुड़ी गंभीर बीमारियां जेनेटिक होती हैं और इन फिंगरप्रिंट का सीधा संबंध जीन से होता है।

तीन तरह के होते हैं फिंगर प्रिंट -
फिंगरप्रिंट पैटर्न तीन प्रकार के होते हैं। इनमें ट्रू वर्ल, लूप्स और प्लेन आर्च हैं। अध्ययन में पाया गया है कि ट्रू वर्ल वाले बच्चों के दांत सामान्य जबकि लूप्स फिंगरप्रिंट वाले बच्चों का ऊपरी जबड़ा आगे की तरफ व प्लेन आर्च वाले बच्चों का निचला जबड़ा आगे की तरफ निकलता है।

बचपन के फिंगरप्रिंट कारगर -
बच्चों के दांत और जबड़े में बदलाव एक साल से लेकर वयस्क होने तक जारी रहता है। ऐसे में तीन-चार साल की उम्र में फिंगरप्रिंट लिए जाएं तो किशोरावस्था या वयस्क होने पर होने वाली दांत की बीमारियों का पता चल जाएगा। शोध 12 से 16 वर्ष की उम्र के 237 बच्चों पर किया गया है।


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कमरदर्द बन सकता है कई रोगों का कारण


स्पाइनलडिस्क प्रोलैप्स युवावस्था से ही रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करने लगती है और भविष्य में स्पाइनल आर्थराइटिस का कारण बनती है। हर वर्ग व उम्र के लोगों को परेशान करने वाली समस्या है कमरदर्द जो खासकर निचले हिस्से में ज्यादा होती है। यह दर्द लंबे समय तक बना रहे तो रीढ़ की हड्डी में आर्थराइटिस का रूप ले लेता है। लेकिन बार-बार यदि कोई इससे पीडि़त होता है तो यह आर्थराइटिस के साथ किडनी या अन्य अंगों से जुड़े रोगों की आशंका को भी बढ़ा देता है।

प्रमुख वजह -
कभी-कभार होने वाला कमरदर्द बैठने, उठने, चलने व सोने के गलत तरीके व अचानक अधिक वजन उठाने से होता है, जो 10-15 दिन तक सावधानी बरतें तो ठीक भी हो जाता है। लेकिन यदि इन आदतों के अलावा शारीरिक गतिविधियों का अभाव बना रहे तो स्पाइनलडिस्क प्रोलैप्स (रीढ़ कीडिस्क पीछे की तरफ बढऩा) की समस्या हो सकती है।

लक्षण -
कमर की मांसपेशियों में खिंचाव, अकड़न, चुभन, चलने-उठने-बैठने में परेशानी और कमर के आसपास के अंगों में दर्द के साथ मांसपेशी मेंं ऐंठन।

ज्यादा प्रभावित -
लंबे समय तक सिटिंग जॉब या भार उठाने का काम करने वालों को यह दिक्कत ज्यादा होती है। 60 से अधिक उम्र के लोगों, महिलाओं में मेनोपॉज के बाद, अधिक मोटे व्यक्तिया जिनमें विटामिन-डी की अत्यधिक कमी हो, उनमें भी यह परेशानी होती है।

रोगों का संकेत -
कई मामलों में किडनी का संक्रमण या पथरी के दर्द की शुरूआत कमरदर्द से होती है। नर्वस सिस्टम संबंधी परेशानियों और रीढ़ की हड्डी में होने वाले इंफेक्शन से भी कमरदर्द की शिकायत रहती है। कम्प्यूटर के सामने लंबे समय तक बैठे रहने या झुककर बैठने से आजकल यह समस्या बच्चों को भी होने लगी है।

बरतें सावधानी -
बैठने के दौरान कमर सीधी रखें ताकि रीढ़ की हड्डी पर जोर न पड़े। भारी वस्तु को उठाने के लिए अचानक न झुकें और काम के दौरान सही पॉश्चर का ध्यान रखें। रीढ़ की हड्डी की मजबूती के लिए विशेषज्ञ की सलाह से कमर से जुड़े वर्कआउट में स्पाइनल स्टेटिक एक्सरसाइज को शामिल करें।


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World AIDS Vaccine Day 2019 – जानिए AIDS से जुड़ी ये खास बातें


World AIDS Vaccine Day, World AIDS Vaccine Day 2019, AIDS Vaccine Day, AIDS Vaccine - वर्ल्ड एड्स वैक्सीन डे हर साल 18 मई को मनाया जाता है। इस दिसव को मनाने का उद्देश्य लोगों को एड्स के प्रति जागरुक करना है। इस दिन को एचआईवी वैक्सीन अवेयरनेस डे भी कहा जाता है। इस दिन को मनाने की शुरुआत पहली बार 18 मई 1997 से की गई। आइए वर्ल्ड एड्स वैक्सीन डे के मौके पर जानते हैं एड्स के बारे में कुछ खास बातें।

क्या है एड्स -

एड्स का मतलब है - AIDS यानि एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशियेंसी सिंड्रोम ये HIV वायसर से फैलने वाली बीमारी है।

एक्वायर्ड का मतलब होता है कि व्यक्ति वायरस से इंफेक्टेड है।

इम्यूनो का अर्थ होता है कि वायरस एचआईवी व्यक्ति के इम्यून सिस्टम को एफेक्ट करता है।

डेफिशियेंसी का मतलब होता है कि व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो गई है और ठीक से काम नहीं कर रही है।

सिंड्रोम का अर्थ है कि कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण एड्स से पीड़ित व्यक्ति को अन्य बीमारियों के होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

HIV और AIDS में क्या होता है फर्क -

एचआईवी मतलब ह्यूमन इम्यूनोडिफिशिएंसी वायरस है ये व्यक्ति के इम्यून सिस्टम के T-Cells को प्रभावित करता है। वहीं एड्स यानि एक्वायर्ड इम्‍यूनो-डिफिशिएंसी सिंड्रोम एक मेडिकल सिंड्रोम है, जो एचआईवी संक्रमण के बाद सिंड्रोम के रूप में सामने आता है। एचआईवी वायरस ही एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलता है जिससे एड्स होता है।यदि कोई एचआईवी वायसर से संक्रमित है तो यह जरूरी नहीं कि उसे एड्स हुआ हो। हालांकि एचआईवी संक्रमित व्यक्ति में एड्स होने की संभावना बहुत ज्यादा होती है। किसी व्‍यक्ति के एचआईवी पॉजिटिव होने का मतलब यह बिल्‍कुल नहीं है कि उसे एड्स है। एचआई संक्रमण और एड्स होना दोनों अलग स्‍टेज हैं। चिकित्‍सक के अनुसार, एचआईवी पॉजिटिव होने का पता चलते ही यदि सावधानी बरती जाए और सही इलाज लिया जाए तो काफी हद तक एड्स से बचा जा सकता है।

बचाव -

शरीर में एचआईवी वायरस के ज्यादा हावी होने पर इसे कंट्रोल करना काफी मुश्किल हा जोता है। एड्स के उपचार में एंटी रेट्रोवाइरल थेरपी और दवाइयों का उपयोग किया जाता है। इन दवाइयों का मुख्य उद्देश्य एचआईवी के प्रभाव को काम करना, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना और इससे होने वाले रोगों को ठीक करना होता है।


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World Hypertension Day 2019 – जानिए महिलाओं में होनी वाली हाइपर टेंशन की समस्या के बारे में


World hypertension day 2019, World Hypertension Day, Hypertension Day, World Hypertension - महिलाएं अपने से ज्यादा घर-परिवार पर अधिक समय देती हैं । यही कारण हैं कि वह अपनी सेहत पर ध्यान नहीं दे पाती हैं। उम्र के साथ शारीरिक, मानसिक व हार्मोनल बदलाव होते हैं। शरीर में हार्मोनल बदलाव से बीमारियों की आशंका बढ़ती है। सही दिनचर्या, व्यायाम व पौष्टिक खानपान स्वस्थ रखते हैं। यह तभी संभव है जब महिलाएं अपने लिए समय निकालें। महिलाओं को स्वस्थ रहने के दिनचर्या ठीक रखनी चाहिए। इस कारण से महिलाओं में हाइपर टेशन की समस्या होती है। महिलाएं काम की व्यस्तता के चलते एक्ससाइज पर ध्यान नहीं देतीं, इससे उनका वजन बढ़ने लगता है। सामान्यत: वजन बढ़ने से ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। वजन बढ़ने से सोते समय श्वास में रुकावट होती है इसे स्लीप ऐप्निया कहते हैं। शरीर को वजन कम करने से ब्लड प्रेशर को नियंत्रित किया जा सकता है। नियमित शारीरिक गतिशीलता रखनी चाहिए। रोजाना 30 मिनट तेज कदमों से चलना, जोगिंग, साइकिलिंग, तैराकी आदि करने से ब्लड प्रेशर 4-9 (एमएमएचजी) तक कम हो जाता है। हाइपरटेंशन की प्रारम्भिक अवस्था में प्रतिदिन व्यायाम करने से लाभ होता हैं। World Hypertension Day के मौके पर आइये जानते हैं इससे जुड़ी कुछ खास बातें।

उम्र के साथ बढ़ती हैं समस्याएं -
महिलाओं की जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, समस्याएं भी बढ़ती हैं। हार्मोनल बदलाव से अनियमित पीरियड्स की शिकायत होना।

कमजोरी के कारण उनमें थकान और चिड़चिड़ापन होना ।
ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और हाइपरटेंशन की तकलीफ होना।
कैल्शियम की कमी से हड्डियों की समस्या, कमर-जोड़ोंं में दर्द होना।
एस्ट्रोजन कम बनने से साइकोलॉजिकल समस्याएं होती हैं ।
गर्भाशय और ब्रेस्ट से संबंधित बीमारियों की आशंका बढ़ती है ।
मेनोपॉज शुरू होने से हृदय रोग का खतरा बढ़ने लगता है ।
थायरॉइड के कारण वजन अधिक होना और अन्य समस्याएं होती ।

महिलाओं में बीमारियों के कारण -
महिलाओं में अधिकतर बीमारियां लापरवाही से होती हैं। घर-परिवार में व्यस्त रहने से डाइट पर ध्यान नहीं देतीं है। कुछ बीमारियों का कारण हार्मोनल बदलाव भी होता है। खानपान की गड़बड़ी से कमजोरी और खराब इम्युनिटी की समस्या होती है। मोटापा व बढ़ा हुआ वजन, पर्यावरण में बदलाव और प्रदूषण भी बीमारी का कारण होते हैं। धूम्रपान, जंक फूड और तनाव बीमारियों का प्रमुख कारण हैं।

ऐसे फिट रहें महिलाएं -
नियमित रूप से हैल्दी और संतुलित डाइट लें, बासी खाना न खाएं ।
हैल्दी डाइट और बेहतर लाइफ स्टाइल की शुरुआत बचपन से हो, इसके लिए हरी पत्तेदार सब्जियां और मौसमी फल खूब खाएं ।
कैल्शियम, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स युक्त चीजें ज्यादा लें ।
दूध पीने की आदत डालें, 35-40 साल की उम्र से ज्यादा लें।
हर उम्र की महिलाएं फिटनेस के लिए 45 मिनट निकालें।
एक्सरसाइज से बीमारियों की आशंका कम हो जाती है।
स्विमिंग, एरोबिक्स, साइक्लिंग, रस्सी कूद, वॉक-जॉगिंग करें।
तनाव से बचने के लिए योग, प्राणायाम और ध्यान करना जरूरी हैं।
समय पर नाश्ता व खाना लेंं, खाली पेट रहना नुकसानदायक है।
कोई समस्या हो तो डॉक्टर को दिखाएं, छिपाएं नहीं, समस्या बढ़ेगी।
वजन न बढ़ने दें, अगर वजन बढ़ता है तो डॉक्टर से संपर्क करें ।

35-40 वर्ष की उम्र के बाद कराएं रुटीन टैस्ट -
एक उम्र के बाद महिलाएं 6 माह में एक बार डॉक्टर को दिखाएं। जरूरत पड़े तो डॉक्टरी सलाह पर कुछ रुटीन टेस्ट भी कराते रहें। 35-40 की उम्र के बाद ब्लड प्रेशर की समस्या होने लगती है। 45 वर्ष के बाद हार्मोनल बदलाव से गंभीर बीमारियों की आशंका होती है। ब्रेस्ट कैंसर का पता लगाने के लिए मेमोग्राफी टेस्ट करवाते हैं । गर्भाशय कैंसर से बचाव के लिए पैप स्मियर टेस्ट हर 3 साल में जरूरत पर थायरॉइड टेस्ट और शरीर में कैल्शियम की जांच करवाएं।


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World Hypertension Day 2019 - साइलेंट किलर है हाइपर टेंशन, जानें इसके बारे में


World hypertension day 2019, World Hypertension Day, Hypertension Day, World Hypertension - एक अनुमान कि अनुसार 50 वर्ष की आयु से पूर्व पुरुषों में पचीस प्रतिशत और महिलाओं सोलह प्रतिशत हाइपर टेंशन की समस्या होती है। पुरुषों में हाइपर टेंशन के ज्यादा दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं क्योंकि कुछ पुरुषों में धूम्रपान एवं शराब का सेवन आम है। हाइपरटेंशन एक गम्भीर बीमारी है जो एक साइलेंट किलर की तरह काम करती है। World Hypertension Day के मौके पर आइये जानते हैं इससे जुड़ी कुछ खास बातें।

हाइपर टेंशन के कारण -

हृदय शरीर के सभी अंगो को रक्त को पहुंचाने का कार्य करता है। इसी रक्त प्रवाह के समय हृदय एक दबाव पैदा करता है। इस दबाव को ब्लड प्रेशर कहते हैं। एक सेहतमंद आदमी के लिए ब्लड प्रेशर सिकुड़ने (सिस्टालिक) के समय 120 (एमएमजीएच) होता है और आराम (डाइयस्टॉलिक) कि स्थिति में 80 होता है। जब आपका सिस्टालिक ब्लड प्रेशर140 या इससे ऊपर और डाइयस्टॉलिक ब्लड प्रेशर 90 या इससे ऊपर हो जाता है, तब उसे हाइपर टेन्शन कहते है। प्रत्येक व्यक्ति का ब्लड प्रेशर प्रतिदिन और प्रति घंटे बदलते रहता है। ज्यादा काम करने, भय, चिंता, शोक, क्रोध, व्यायाम इत्यादि अवस्था में रक्तचाप कुछ समय के लिए बढ़ जाता है। इसीलिए यदि किसी व्यक्ति का रक्तचाप, सामान्य स्थिति में नियमित रूप से ज्यादा आता है तब डॉक्टर उसे हाइपर टेंशन कहते हैं। हाइपरटेंशन एक गम्भीर बीमारी है जो की एक साइलेंट किलर की तरह काम करता है।

हाइपर टेंशन लक्षण -
सरदर्द होना, धुंधला दिखाई देना, गर्दन में दर्द, चक्कर आना, शरीर में गर्मी का एहसास, जी घबराना, उल्टी आना, नकसीर आना, सांस फूलना, अनियमित धड़कन, गुर्दो का काम कम करना आदि प्रमुख लक्षण है। इन सभी के साथ लम्बे समय तक ब्लड प्रेशर बढ़े रहने से रक्त नालिकाओ की दीवारें मोटी एवं कठोर हो जाती है। उनमें कोलेस्टरॉल का जमाव बढ़ जाता है जिससे हार्ट अटैक का अंदेशा बढ़ जाता है। दिमाग की रक्त नालिकाओ में दबाव बढ़ जाने से स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। दिमागी पक्षाघात होने की रिस्क बढ़ जाती है। तीस वर्ष कि आयु के बाद और यदि आपका वजन ज्यादा है या आपके परिवार में किसी को उच्च रक्तचाप है, तो 20 वर्ष आयु के बाद साल में कम से कम एक बार अपने रक्तचाप कि जांच डॉक्टर से करवाएं।

हाइपर टेंशन से बचाव -
जीवन शैली में कुछ बदलाव करके हाइपरटेंशन से बचाव किया जा सकता है। साथ ही स्वस्थ जीवन शैली को अपना कर हाइपर टेंशन के लिए ली जाने वाली दवाओं को बंद किया जा सकता है या उनकी मात्रा को कम किया सकता है। कुछ आसान उपाय जिनसे आसानी से ब्लड प्रेशर को नियंत्रित किया जा सकता है, इस तरह से हैं।

- सामान्यत: शरीर का वजन बढ़ने से ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। अधिक वजन हो जाने से सोते समय श्वास में रुकावट पैदा करता है जिसे स्लीप ऐप्निया भी कहते है। यह भी ब्लड प्रेशर बढ़ाने का एक मुख्य कारण होता है। इसलिए शरीर का वजन काम करने से ब्लड प्रेशर को नियंत्रित किया जा सकता है। साथ ही कमर पर ज्यादा चरबी जमा होने से भी ब्लड प्रेशर बढ़ने का रिस्क बढ़ जाती है।
- नियमित शारीरिक गतिशीलता रोजाना 30 मिनट, हफ्ते के अधिकतर दिन क़ायम रखने से हमारा ब्लड प्रेशर 4-9 (एमएमजीएच) तक काम हो जाता है। परंतु इसे लगातार बनाए रखना जरूरी है। यदि हाइपर टेंशन की प्रारम्भिक अवस्था में हैं, तो प्रतिदिन व्यायाम करने से हाइपर टेन्शन होने से बचा जा सकता है। तेज कदमो से चलना, जोगिंग, साइक्लिंग, तैराकी आदि करने से लाभ होता हैं।
-स्वस्थ आहार जिसने भरपूर मोटा अनाज, फल, सब्जियां होने चाहिए तथा वसा युक्त खाद्य पदार्थ कम मात्रा में होने चाहिए। इस तरह के आहार से लगभग 14 (एमएमजीएच) तक तक ब्लड प्रेशर काम किया जा सकता है।
- आहार में नमक की मात्रा को नियंत्रित करके 2-8 (एमएमजीएच) तक ब्लड प्रेशर को कम किया जा सकता है। सामान्यत: प्रतिदिन 5 ग्राम से कम तथा हाइपर टेंसिव मरीजों को प्रतिदिन 2 ग्राम से कम मात्रा में नामक का उपयोग आहार में करना चाहिए।
- धूम्रपान ब्लड प्रेशर को बढ़ा देता है अत: धूम्रपान को पूरी तरह बन्द कर के ब्लड प्रेशर कम किया जा सकता है।
- लम्बे समय से चल रहा मानसिक अवसाद भी हाई ब्लड प्रेशर का एक प्रमुख कारण है। इसके लिए जरूरी है कि अवसाद की अवस्था से बचा जाए। प्रतिदिन योग अभ्यास एवं गहरी श्वास की प्रक्रिया को दुहराना चाइए। साथ ही जीवन में स्ट्रेस को दूर रखे। खेल व मनोरंजन में रुचि बढ़ायें।
- घर पर नियमित रूप से अपना ब्लड प्रेशर नापते रहें।


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डायरिया होने पर रखें इन बातों का ध्यान


गर्मी शुरू होते ही बच्चों (02 से 11 साल) में डायरिया की समस्या आम हो जाती है। इसके पीछे की वजह दूषित खानपान के कारण फूड पॉइजनिंग है। अक्सर लोग डायरिया को हल्के में लेते हैं। उन्हें नहीं पता होता कि डायरिया के चलते शरीर के कई महत्त्वपूर्ण अंग प्रभावित होते हैं। किडनी इनमें से एक है। गंभीर डायरिया में एक्यूट रिनल फेल्योर हो जाता है।

किडनी पर असर कैसे -
किडनी का काम खून बनाने के साथ शरीर में मौजूद हानिकारक तत्त्वों को यूरिन के रास्ते बाहर निकालना भी है। डायरिया में बच्चे को बार-बार दस्त होते हैं जिससे शरीर से 24 घंटे में ही करीब पांच से दस लीटर पानी और आवश्यक लवण निकल जाते हैं। यूरिन बनना बंद हो जाता है। यूरिया व क्रिएटनिन का स्तर बढ़ जाता है। शरीर में मौजूद हानिकारक तत्त्व बाहर नहीं निकल पाते हैं। यह स्थिति किडनी के फेल होने पर बनती है।

दूषित खानपान है कारण -
डायरिया दूषित व बासी खानपान से होता है। दूषित खानपान में शिगैला, सालमोनेला व कॉलरा जैसे बैक्टीरिया रहते हैं जो शरीर में पहुंचकर डायरिया करते हैं। भारत में शिगैला के कारण सबसे अधिक बच्चे डायरिया की चपेट में आते हैं। ये बैक्टीरिया नालियों या मल-मूत्र वाले गंदे स्थानों में पाए जाते हैं।

खूब पानी पिलाएं -
बच्चे के शरीर में पानी व लवण की मात्रा बनी रहे इसके लिए उसे लगातार पानी पिलाएं। यूरिन सामान्य होने तक खूब पानी पिलाएं। बच्चा सुस्त दिखे तो डॉक्टर को दिखाएं। डॉक्टर ड्रिप लगवाने को कह सकते हैं। ब्लड प्रेशर की जांच करवाते रहें।

यूरिमिक सिंड्रोम की आशंका -
डायरिया (दस्त) के साथ अगर बच्चे को झटके आ रहे हैं तो यह हिमोलेटिक यूरिमिक सिंड्रोम (एचयूएस) हो सकता है। एचयूएस भी डायरिया करने वाले बैक्टीरिया के कारण होता है। इसमें दस्त के साथ बुखार, मिर्गी की तरह झटके और स्टूल में ब्लड आता है। एचयूएस से पीडि़त अधिकतर बच्चों की किडनी खराब हो जाती है। इसके पीछे जागरुकता की कमी है। डायरिया से पीडि़त करीब 7.8 प्रतिशत बच्चों को डायलिसिस की जरूरत पड़ती है जबकि एचयूएस से पीडि़त लगभग 50 फीसदी बच्चों को डायलिसिस की जरूरत पड़ती है।

 

सब बरतें सावधानी -
घर के आसपास सफाई रखें, दूषित और बासी भोजन न लें, बाहर के खाने की आदत न डालें, जंकफूड से दूर रहें, हरी सब्जियां और फल को अच्छे से साफ कर प्रयोग में लें। खुले में बिक रहे जूस और मिठाइयां न खाएंं।

ऐसे जांचें यूरिन की मात्रा -
बच्चों में प्रति मिनट लगभग एक मिलिलीटर यूरिन बनता है। डायरिया के दौरान यूरिन बनना कम हो जाता है। अगर बच्चा 24 घंटे में 400 मिलिलीटर से कम यूरिन करता है तो चिंताजनक है। इलाज के दौरान पीडि़त बच्चे के यूरिन की मात्रा नापी जाती है।। सामान्य बच्चा एक घंटे में लगभग 60 मिलिलीटर यूरिन करता है। इलाज के दौरान अगर बच्चा एक घंटे में 60 मिलिलीटर यूरिन करता है तो वह स्वस्थ हो चुका है। अगर ऐसा नहीं है तो खूब पानी पिलाते रहें। शरीर में पानी की उचित मात्रा पहुंचने से डायरिया पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। उसके बाद दोबारा यूरिन की जांच करें।

गंभीर डायरिया के लक्षण -
दस्त, बच्चे में सुस्ती, अद्र्ध चेतन अवस्था में जाना, आंखें अंदर की तरफ धंसना, खुश्क त्वचा, ब्लड प्रेशर कम होना, यूरिन बंद होना या इसकी मात्रा में कमी।

 

जरूरी जांचें -
डायरिया में खून की जांच होती है जिससे क्रिएटनिन, ब्लड काउंट, यूरिया-सीरम कराया जाता है। वायरस की मौजूदगी देखने के लिए स्टूल कल्चर कराते हैं।


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यूं रहेगी दांतों की चमक बरकरार


दो बार ब्रश जरूरी
कुछ भी खाने-पीने के कुछ देर बाद दांतों को अच्छी तरह से साफ करना न भूलें। चमकदार दांतों के लिए सुबह व रात को खाने के बाद रोजाना ब्रश करें।
ब्रश का सही तरीका
ब्रश करने का सही तरीका भी स्वस्थ दांतों के लिए जरूरी है। अच्छी सफाई के लिए ब्रश हर दांत पर कम से कम तीन बार घूमना चाहिए। ऊपर के मसूढ़े के लिए मसूढ़े पर दबाव देते हुए नीचे ब्रश लाना और नीचे के मसूढ़े के लिए ऊपर। इससे प्लाक हट जाता है और दांत खराब होने से बचते हैं साथ ही इनकी चमक बरकरार रहती है।
फ्लॉसिंग है फायदेमंद
ब्रश दांतों की जड़ों में जमी गंदगी को साफ नहीं कर पाता। ऐसे में फ्लॉसिंग दांतों की अंदरूनी सफाई का एक बेहतर तरीका हो सकता है। इसके लिए डॉक्टर के निर्देशानुसार फ्लॉसिंग करें।
इनसे आता पीलापन: गुटखा, पान, तंबाकू, सिगरेट, शराब आदि दांतों की चमक खत्म करने के साथ जड़ों को भी कमजोर करते हैं। उम्र के साथ कई बार दांतों पर इनेमल की परत जमती चली जाती है, जिस कारण दांत पीले हो जाते हैं। चाय, कॉफी, सॉफ्ट ड्रिंक्स अधिक लेने से भी दांत पीले पड़ जाते हैं। विटामिन-डी की कमी भी एक कारण है।
इनसे मजबूत होंगे दांत
दूध : इसमें विटामिन डी और कैल्शियम की पर्याप्त मात्रा होती है जो दांतों को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है। लेकिन रात को सोने से एक घंटा पहले दूध न पीएं। इससे दांतों में कैविटी हो सकती हैं।
सब्जियां : इसमें पाया जाने वाला फाइबर मुंह में एसिडिक लेवल को कम कर देता है और जब एसिड कम बनेगा तो दांतों को नुकसान भी कम होगा। इस तरह सब्जियां दांतों को मजबूत और सफेद बनाने में मददगार होती हैं।
सिट्रिक फल : स्ट्रॉबेरी, नींबू और संतरा आदि फलों में सिट्रिक एसिड होने के कारण इन्हें प्राकृतिक वाइटनिंग एजेंट माना जाता है। यह मसूढों को साफ करके मुंह की बदबू को रोकता है।
डॉ. राजेश गुप्ता, दंत रोग विशेषज्ञ


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National Dengue Day – डेंगू के बारे में जानिए खास बातें जो आप जानना चाहते हैं


National dengue Day, Dengue Day, Dengue- डेंगू से बचाव के लिए जागरूकता जरूरी है। लोगों के डेंगू के प्रति जागरुक करने के लिए16 मई को National Dengue Day मनाया जाता है। डेंगू डे के मौके पर हम आपको बता रहे हैं इससे जुड़ी कुछ खास व अहम बातें।

डेंगू के लक्षणों को इस तरह पहचानें -
रोगी को करीब पांच दिनों तक तेज बुखार के साथ अधिक सर्दी लगती है । सिरदर्द, कमरदर्द, जोड़ों का दर्द, थकावट और कमजोरी महसूस होती है। हल्की खांसी, गले में खराश और उल्टी के साथ ही लाल रंग के दाने दिखें । ये दाने दो चरणों में, पहले शुरू के 2-3 दिन और बाद में 6-7वें दिन दिखता है। प्लेटलेट्स तेजी से गिरती हैं, इसे कंट्रोल करना ? जरूरी होता है। प्लेटलेट्स कम होने के साथ शरीर के किसी भी अंग से रक्त बहना। खून की उल्टियां व मल में भी ब्लड आने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

जानें क्या होती हैं प्लेटलेट्स -
प्लेटलेट्स ब्लड का ही एक हिस्सा होती हैं जो रोजाना बनती व नष्ट होती हैं। इसकी औसत आयु 4-7 दिन मानी जाती है, यह ब्लड का मुख्य हिस्सा है । प्लेटलेट्स का काम शरीर में ब्लड को नियंत्रित रखना है ।प्लेटलेट्स की संख्या कम होने पर खून का थक्का नहीं बनता है। शरीर के अंगों से ब्लड बाहर आने लगता है (अंदरूनी रक्तस्राव होना) । इसकी जांच के लिए कंप्लीट ब्लड काउंट (सीबीसी) टेस्ट कराते हैं।

डेंगू का इस तरह किया जाता है इलाज -
साधारण डेंगू बुखार है तो इलाज व देखभाल घर पर भी हो सकती है। डॉक्टर की सलाह लेकर पैरासिटामोल ( कॉसिन आदि) ले सकते हैं। कोई भी दर्द निवारक दवा न लें, इनसे प्लेटलेट्स कम हो सकती हैं। अगर बुखार 102 डिग्री से ज्यादा है तो शरीर पर पानी की पट्टियां रखें। सामान्य रूप से खाना देना जारी रखें, बुखार में ज्यादा खाने की जरूरत
डेंगू के मरीज को ज्यादा से ज्यादा तरल चीजें भी देनी चाहिए । डेंगू में मरीज को अधिक से अधिक आराम करना चाहिए।

डेंगू में बरतें ये सावधानियां -
मरीज को ठंडा पानी न पीने को देंं, मैदा और बासी खाना न खाएं। खाने में हल्दी, अजवाइन, अदरक, हींग का ज्यादा इस्तेमाल करें। इस मौसम में मिलने वाली पत्तेदार सब्जियां, अरबी, फूलगोभी न खाएं। हल्का खाना खाएं जो आसानी से पच सके और पर्याप्त नींद लें । मिर्च मसाले और तला हुआ खाना न खाएं, भूख से कम खाएं। खूब पानी या कोई भी लिक्विड लें और पानी को उबालकर ही पीएं । डेंगू के मरीजों को छाछ, नारियल पानी, नीबू पानी आदि देना लाभकारी होता है।

डेंगू का खतरा इन्हें अधिक रहता है -
कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले जल्द बीमार पड़ते हैं। डेंगू में भी ऐसे लोग जल्दी ही चपेट में आ जाते हैं, इससे बचें
इसके साथ बच्चों, बुर्जुर्गों और गर्भवती महिलाओं को अधिक खतरा होता है। इसकी वजह इन लोगों की इम्यूनिटी अन्य की तुलना में कमजोर रहती है।

मच्छरों से बचने के उपाय -
किसी भी खुले बर्तन व गड्ढे में पानी एकत्र नहीं होने दें।
बाल्टी या किसी बर्तन में पानी एकत्र करते हैं तो इसे ढकना नहीं भूलें।
कूलर की नियमित रूप से सफाई करवाएं, नालियां भी बहती रहनी चाहिए।
मच्छरों को मारने के लिए कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करें।
खिड़की व दरवाजों में जाली लगाकर रखें।
मच्छरों से बचने के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करें ।


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National Dengue Day – जानिए डेंगू के इलाज के लिए आयुर्वेेदिक और होम्योपैथिक तरीके


National dengue Day, Dengue Day, Dengue - डेंगू एडीज मच्छर (टाइगर) के काटने से होने वाला रोग है। ये मच्छर साफ पानी में पनपते हैं जो दिन के समय ज्यादा काटते हैं। इस मच्छर के काटने पर 3-14 दिनों में इसके लक्षण दिखने लगते हैं। डेंगू की तीन अवस्थाएं होती हैं, क्लासिकल, हेमरेजिक फीवर और शॉकिंग सिंड्रोम। पहली अवस्था क्लासिकल स्टेज सामान्य है जबकि दूसरी व तीसरी अवस्था खतरनाक होती है। हेमरेजिक फीवर में प्लेटलेट्स तेजी से गिरने पर शरीर में आंतरिक रक्तस्त्राव की आशंका रहती है। शॉकिंग सिंड्रोम में ब्लड प्रेशर तेजी से गिरता, इससे जान को भी खतरा होता है। 16 मई को National Dengue Day मनाया जाता है। इस मौके पर हम आपको Dengue के आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक इलाज के बारे में बता रहे हैं।

आयुर्वेदिक नुस्खे -

खाने में विटामिन सी युक्त पदार्थों का सेवन करें। सब्जी या दाल में हल्दी का प्रयोग करें। दूध में हल्दी डालकर कर पिएं ।तुलसी, शहद भी है फायदेमंद, काढ़ा या चाय में तुलसी का प्रयोग करें। पपीते के पत्ते का रस निकालकर दिन में दो बार 2-3 चम्मच लेने से मिलेगा लाभ मिलेगा। अनार, मेथी, बकरी का दूध, जवारे का रस, सूप का सेवन करें।

प्लेटलेट्स बढ़ाने के आयुर्वेदिक नुस्खे -

गिलोय के 5-7 पत्तों या छह इंच की टहनी का जूस निकालकर पिएं। इस जूस को 10 एमएल सुबह खाली पेट और रात को सोने से पहले लें। इसके नियमित सेवन से शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से बढ़ती है।प्लेटलेट्स बढ़ाने के लिए घर में बना 200 एमएल सेब का जूस रोगी को दें। पपीते के 2-3 पत्तों का रस निकालकर मरीज को देने से लाभ मिलता है। लंच के दो घंटे के बाद 300 एमएल अनार का जूस पीने प्लेटलेट्स बढ़ती हैं । हरसिंगार के 5-6 पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से बुखार में राहत मिलती है।

होम्योपैथिक इलाज -

डेंगू से बचाव के होम्योपैथिक तरीके -
प्लेटलेट्स में गिरावट आ रही हो तो 'कोरिका पोपाया एक्सट्रेक्ट लें। इसके साथ 'आर्सेनिक एल्बुयम का प्रयोग करना चाहिए। इसकी 10-10 बूंद दवा या 10-10 गोली ली जा सकती है। 'यूपाटोरियम पफलेटम दवा पांच दिन तक लें।इससे भी डेंगू में फायदा मिलेगा।


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मलेरिया से मुकाबले की तैयारी


मलेरिया रोग प्लाजमोडियम समूह के प्रोटोजोआ परजीवी से फैलता है
गर्मी तेवर दिखा रही है। मलेरिया रोग प्लाजमोडियम समूह के प्रोटोजोआ परजीवी से फैलता है। इसका वाहक मादा एनाफिलीज मच्छर होता है। स्वच्छता ही इसे रोकने का एकमात्र उपाय है। मलेरिया, प्लाजमोडियम परजीवी की पांच प्रजातियों (प्ला. वाइवेक्स, प्ला. फैल्सीपैरम, प्ला. मलेरी, प्ला. ओवेल व प्ला. नोलेसी) से फैलता है। इनमें सबसे खतरनाक वाइवेक्स और फैल्सीपैरम हैं जो फेफड़ों और किडनी को प्रभावित करने के अलावा रक्त में प्लेटलेट्स की मात्रा घटाकर जानलेवा तक हो सकते हैं। मलेरिया से पीडि़त व्यक्ति को काटने से उसके शरीर में मौजूद प्लाजमोडियम परजीवी मच्छर की लार में आ जाता है और स्वस्थ व्यक्ति को काटने पर यह उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है।
रक्त में लार के प्रवेश करने के 48-72 घंटे बाद लिवर को नुकसान होता है। प्लाजमोडियम परजीवी लिवर के बाद दोबारा रक्त वाहिकाओं में फैलने लगता है। संख्या के बढ़ऩे से शरीर के अन्य अंग जैसे किडनी, फेफड़े व दिमाग पर असर दिखने लगता है। परजीवी लाल रक्त कणिकाओं पर हमला कर उन्हें नष्ट कर अपनी संख्या बढ़ाते हैं।

होम्योपैथी में प्रिवेंटिव डोज की सलाह
जिस समय मलेरिया के मच्छरों का प्रकोप ज्यादा हो या व्यक्ति को सर्दी लगने के साथ कंपकंपी व हल्का बुखार जैसा महसूस हो तो विशेषज्ञ मलेरिया ऑफिसिनेलिस और आर्स एल्ब दवा प्रिवेंटिव रूप से लेने की सलाह देते हैं। दोनों में किसी एक दवा को हफ्ते में एक बार ले सकते हैं।
डॉ. एम. एल. जैन होम्योपैथी विशेषज्ञ
बरतें सावधानी : मच्छर काटने के 10-21 दिन बाद दिखते हैं लक्षण
तीन तरह का होता मलेरिया : कई अंगों को करता प्रभावित
सामान्य मलेरिया : इसमें मच्छर के काटने के 10-21 दिनों में लक्षण दिखने लगते हैं। मरीज को अत्यधिक सर्दी लगना, कंपकंपी, सिरदर्द, उल्टी, बदनदर्द व तेज बुखार के साथ पसीना आता है। दवा देने पर 5-10 दिन में मरीज ठीक हो जाता है। लेकिन यदि परजीवी की वाइवेक्स या मलेरी प्रजाति शरीर में फैल रही है तो ठीक होने के बाद लक्षण दोबारा दिखने लगते हैं।
गंभीर मलेरिया : शरीर में परजीवी की संख्या बढऩे से लाल रक्त कणिकाओं की संख्या कम होने लगती है। इससे प्लेटलेट्स की संख्या 50 हजार से भी कम हो जाती है। कई बार विभिन्न अंग प्रभावित होते हैं। दिमाग पर असर होने से बेहोशी, कोमा, दौरे या न्यूरोलॉजिकल डिस्ऑर्डर हो सकते हैं। किडनी को नुकसान होने से पेशाब न बन पाना और किडनी फेल होने से शरीर में गंदगी इकट्ठी होने लगती है। फेफड़ों में पानी भरने व इस अंग में संक्रमण की आशंका बढ़ती है जिसे पल्मोनरी एडीमा कहते हैं। सांस लेने में तकलीफ होती है और लिवर की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने से लिवर एंजाइम्स नहीं बन पाते व पीलिया की शिकायत रहती है। मरीज को भर्ती कर बुखार उतारने के बाद रेडिकल केयर के रूप में 24 दिन तक प्राइमाक्यूनीन दवा देते हैं ताकि यह दोबारा न हो।
क्रॉनिक मलेरिया : अफ्रीका व दक्षिण पूर्वी इलाकों में मलेरिया के परजीवियों का घनत्व ज्यादा होने के साथ सालभर प्रकोप रहता है। यहां क्रॉनिक मलेरिया के मरीज ज्यादा होते हैं, इन्हें तिल्ली के बढऩे व एनीमिया की दिक्कत रहती है।
डॉ. रामजी शर्मा, फिजिशियन

जांच : मलेरिया का पता लगाने के लिए पहले रेपिड एंटीजन टैस्ट करते हैं। फिर पैरिफेरल ब्लड फिल्म (पीबीएफ) टैस्ट होता है जिसमें परजीवी के प्रकार की पहचान होती है।
इलाज : आर्टिसुनेट, क्लोरोक्यूनीन, आर्टिमीथीर व क्यूनीन दवा देते हैं। यदि मरीज दवा न खा सके तो इन्ट्रावीनस (आईवीएम) या इन्ट्रामस्कुलर इंजेक्शन से दवा देते हैं।

खानपान: मरीज को लिक्विड डाइट के अलावा मौसमी फल, दलिया या खिचड़ी दें। तली-भुनी, मसालेदार व ठंडी चीजें न दें।
ऐसे करें रोकथाम
मच्छरदानी का प्रयोग, आसपास गंदा पानी जमा न होने देना मलेरिया से बचाता है। इसके अलावा प्राकृतिक तरीकों से मच्छरों से बचाव के साथ इनके प्रभाव को सावधानी बरतकर कम कर सकते हैं।
बचाव के तरीके
धुआं करें : कर्पूर, जटामासी, नीम, तुलसी व जामुन की पत्तियों को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में मिलाकर जला लें व घर में सूर्यादय/सूर्यास्त के समय धुआं करें। मच्छर दूर भागेंगे।
मालिश : नीम व नारियल का तेल और कर्पूर को मिलाकर त्वचा के खुले हिस्सों पर मालिश करें।
चटनी के रूप में : आधा चम्मच कलौंजी के पाउडर को एक चम्मच शहद के साथ दिन में 3-4 बार चाटें।
फिटकरी : अत्यधिक ठंड व बुखार लगे तो फूली हुई फिटकरी की 1/4 चम्मच की मात्रा को एक चम्मच चीनी के साथ खा लें। इसके लिए फिटकरी को पीसकर तवे पर सेकें। इससे लिवर व आंतों की कार्यप्रणाली में सुधार होने के साथ कोई संक्रमण है भी तो उसका असर कम होगा। आंतों में घाव या अल्सर वाले इसे न खाएं।
नैचुरोपैथी : उपाय
काढ़ा : गिलोय (10 ग्राम), तुलसी (5-10 पत्ते), कुटकी, चिरायता, हल्दी व सौंठ (चुटकीभर) व 5 कालीमिर्च को दो गिलास पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। आधा बचने पर इसे गुनगुना पिलाएं। रोजाना दिन में 3-4 बार करें।
गर्मपादस्नान : इसे हॉट फुट बाथ भी कहते हैं। एक बाल्टी में सहने योग्य गर्म पानी में एक चम्मच फिटकरी मिलाकर रोगी को घुटनों से नीचे के हिस्से को डुबाने के लिए कहें। इस दौरान शरीर का ऊपरी हिस्सा अच्छे से ढका होना चाहिए।
वैद्य भानु प्रकाश शर्मा, नेचुरोपैथी विशेषज्ञ
आयुर्वेदिक उपचार
अक्सर इस्तेमाल होने वाले रेपलेंट क्रीम, कॉइल, लिक्विड फिलर व कीटनाशक का छिड़काव मच्छरों से बचाव तो करते हैं। लेकिन इनके लंबे समय तक प्रयोग से इनमें मौजूद कैमिकल शरीर के साथ दिमाग की कोशिकाओं पर भी बुरा असर डालते हैं। इस असर को रोकने के लिए सरसों, नीम व नमक को बराबर मात्रा में मिलाकर पाउडर बना लें। एक लोहे के बर्तन में कोयला/गोबर के कंडे जलाकर उसपर यह पाउडर छिड़क कर धुआं करने से मच्छर भाग जाएंगे। जिन्हें इन चीजों से एलर्जी हो, वे सावधानी से इन्हें उपयोग में लें। घर में तुलसी, लेमनग्रास, लेवेंडर आदि पौधे मच्छरों से बचाव करते हैं।
डॉ. प्रताप चौहान, आयुर्वेद विशेषज्ञ


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पब्लिक हैबिट्स और एक्सपर्ट ओपिनियन: कॉर्न सीरप से बढ़ता फैट का खतरा


घर में बनें पेयपदार्थ देते राहत
गर्मी में लोग वजन घटाने और शरीर में पानी की कमी पूरी करने के लिए लिक्विड डाइट का सहारा लेते हैं। मार्केट में मिलने वाले शरबत, कोल्ड ड्रिंक, आइसक्रीम, ठंडाई में स्वीटनर के तौर पर कॉर्न सीरप का इस्तेमाल होने से अक्सर वजन बढऩे की समस्या सामने आती है। ऐेसे में अगर घर में बनें पेयपदार्थ का इस्तेमाल करें तो फैट बढऩे की समस्या के साथ डायबिटीज में भी राहत मिलती है।
इसलिए कॉर्न सीरप से बनाएं दूरी : कॉर्न सीरप हाई कैलोरी फ्रक्ट्रोज शुगर है जो आसानी से पच जाता है। इसलिए इसका इस्तेमाल ज्यादा किया जाता है। इससे बॉडी को मिलने वाली अत्यधिक ऊर्जा का इस्तेमाल न हो पाने पर लिवर इसे फैट में बदल देता है। जो मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और ट्राई ग्लिसराइड का स्तर बढ़ाता है।
घर में तैयार करें पेयपदार्थ : घर मेंं मौजूद शक्कर के अलावा मार्केट में उपलब्ध मेपल सीरप, सैक्रीन, रॉ हनी, स्टीविया एक्सटै्रक्ट को पेय पदार्थ बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह शुगर लो कैलोरी होने के कारण पचने में समय लेती है। धीरे पचने के कारण ये शरीर को आसानी से प्रयोग होने वाली ऊर्जा को सीमित मात्रा में उपलब्ध कराती है। मेपल सीरप और रॉ हनी लो शुगर होते हैं जो ब्लड ग्लूकोज शुगर को बढऩे से रोकते हैं।
डायबिटिक पेशेंट्स ध्यान रखें : डायबिटिक पेशेंट्स पेय पदार्थों में सैक्रीन व स्टीविया एक्सटै्रक्ट का इस्तेमाल कर सकते हैं। नैचुरल शुगर होने के साथ इसमें जीरो कैलोरी होती है। इसे दिन में दो से तीन बार ही लें। जिनका वजन अधिक है वे कॉर्न सीरप इस्तेमाल न करें।

गिरिजा काबरा, न्यूट्रीशियन


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युवाओं में भी बढ़ रहे हैं पार्किंसंस के मामले


पार्किंसंस दिमाग से जुड़ी बीमारी
पार्किंसंस में दिमाग स्रद्ध कोशिकाएं बनना बंद हो जाती हैं। शुरुआती सालों में इसके लक्षण काफी धीमे होते हैं जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। विशेषज्ञ आम लक्षणों से इस बीमारी की पहचान करते हैं जिसमें कांपना, शारीरिक गतिविधियों का धीरे होना (ब्राडिकिनेसिया), मांसपेशियों में अकडऩ, पलकें न झपका पाना, बोलने व लिखने में दिक्कत होना शामिल हैं। यह बीमारी कुछ साल पहले तक बुजुर्गों में देखने को मिलती थी, लेकिन आजकल युवाओं में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं। विश्व में एक करोड़ से ज्यादा लोग इस रोग से ग्रस्त हैं।
पार्किंसंस बीमारी का प्रमुख लक्षण हाथ-पैरों में कंपन होना है। लेकिन बीस प्रतिशत रोगियों में ये दिखाई नहीं देते। यह बीमारी शारीरिक व मानसिक रूप से रोगी को प्रभावित करती है। अक्सर डिप्रेशन, दिमागी रूप से ठीक न होना, चिंता व मानसिकता को इस बीमारी से जोड़कर देखा जाता है। इसके कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हुए हैं लेकिन इसका कारण आनुवांशिक हो सकता है।
इलाज
इससे जुड़ा कोई टैस्ट उपलब्ध न होने के कारण निदान और कारण बता पाना मुश्किल है। लक्षण देखकर इस रोग की जानकारी दी जाती है। शुरुआती स्टेज में दवाओं का सहारा लिया जाता है। लेकिन एक समय के बाद दवाओं का असर कम होकर साइड इफेक्ट ज्यादा होता है।
डीबीएस थैरेपी : इस बीमारी में डीप बे्रन स्टीमुलेशन (डीबीएस) थैरेपी कारगर साबित होती है और सर्जरी से दवाइयां कम हो जाती हैं। इसमें दिमाग का कुछ हिस्सा तरंगित किया जाता है। दिमाग की कोशिकाओं को स्टीमुलेट करने से शरीर के अंगों को कंट्रोल करने में मदद मिलती है।
डॉ. सुषमा शर्मा, न्यूरोलॉजिस्ट


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किडनी को स्वस्थ रखते हैं गोखरू और पुनर्नवा


गोखरू और पुनर्नवा को किडनी के मरीज और सामान्य व्यक्ति दोनों ले सकते हैं
एल्कोहल पीने की आदत और पथरी की शिकायत होने पर किडनी फेल होने का खतरा रहता है। ऐसी स्थिति में गोखरू और पुनर्नवा लाभकारी साबित होते हैं। इसे किडनी के मरीज और सामान्य व्यक्ति दोनों ले सकते हैं। गोखरू का चूर्ण एक-एक चम्मच सुबह, दोपहर, शाम गुनगुने दूध के साथ लिया जा सकता है।
ये होते हैं लक्षण : चेहरे व पैरों में सूजन और आंखों में भारीपन रहना। थोड़ी दूर चलने पर सांस फूलना, थकान और बेचैनी महसूस होना।
यह होता है उपाय : गोखरू और पुनर्नवा में किडनी को पुन: स्वस्थ करने की क्षमता होती है। इसके लिए 50 ग्राम गोखरू और 50 ग्राम पुनर्नवा को पांच लीटर पानी में डालकर चौथाई रहने तक उबालें। फिर इसकी 40 एम एल मात्रा सुबह, दोपहर और शाम को रोगी को पिलाएं। इससे किडनी को लाभ मिलेगा।
डॉ. सीताराम गुप्ता, आयुर्वेद चिकित्सक


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90 फीसदी कैंसर की वजह खराब लाइफस्टाइल


भ्रम: परिवार में कैंसर है तो अन्य को भी हो सकता है।
सच: केवल पांच से दस फीसदी कैंसर ही आनुवांशिक होते हैं जैसे ब्रेस्ट, ओवेरियन और कोलोन कैंसर। जबकि 90 फीसदी कैंसर व्यक्ति की लाइफस्टाइल के कारण होते हैं। इनमें तंबाकू, शराब और मांसाहार शामिल हैं। जिनमें आनुवांशिक कैंसर की आशंका है उन्हें समय-समय पर जांच करवानी चाहिए। महिलाओं को 21 साल की उम्र के बाद पेप्समीयर और 40 साल के बाद मेमोग्राफी करवानी चाहिए। 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को सिरम पीएसए (प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन) जांच करवानी चाहिए।
भ्रम: एक उम्र के बाद नहीं हो सकता कैंसर का इलाज।
सच: ऐसा नहीं है। कैंसर का इलाज किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति में किया जा सकता है। पहले डॉक्टर अधिक उम्र के लोगों का इलाज करने से बचते थे। इसकी वजह अधिक उम्र और कमजोर लोगों में कीमोथैरपी का साइड इफेक्ट होना था। अब नई टारगेटेड थैरेपी से हर उम्र के मरीज के इलाज में मदद मिलती है।
भ्रम: कैंसर के मरीजों में इलाज के दौरान बालों का झडऩा जरूरी है।
सच: पहले ये दिक्कत आती थी। कैंसर के मरीजों में इलाज के दौरान बाल गिरना आम था। लेकिन नई टारगेटेड थैरेपी से इस दिक्कत से बचा जा सकता है। यह थैरेपी सीधे कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करती है जिससे बाल गिरने की समस्या नहीं होती।
भ्रम: कैंसर की वजह से शरीर में असहनीय दर्द होता है।
सच: कुछ प्रकार के कैंसर जैसे ब्रेस्ट, फेफड़ें, कोलोन और जीभ आदि में पहली व दूसरी स्टेज में दर्द नहीं होता है। इसी तरह अन्य कैंसर में भी होता है, लेकिन इलाज के अभाव में यदि कैंसर एडवांस स्टेज में पहुंच जाए तो असहनीय दर्द होता है।
भ्रम: कैंसर की कोई वैक्सीन नहीं है।
सच: केवल बच्चेदानी के मुंह (सर्विक्स) और लिवर कैंसर के लिए वैक्सीन मौजूद हैं। सर्विक्स कैंसर से बचाव के लिए महिलाओं को एचपीवी (हृयूमन पैपिलोमा वायरस) वैक्सीन 9 से 25 वर्ष के बीच लगवानी चाहिए। लिवर कैंसर से बचाव के लिए हेपेटाइटिस-बी का टीका लगवाएं। हेपेटाइटिस-बी के 5 से 10 फीसदी मरीजों को लिवर कैंसर की आशंका रहती है। ऐसे में इन टीकों से 85 फीसदी तक कैंसर से बचाव हो सकता है।
भ्रम: कैंसर से जुड़ी जांचें कराने से फैलती है यह बीमारी।
सच: लोगों में डर है कि कैंसर की जांच (बायोप्सी) करवाने से बीमारी शरीर में फैल जाती है। यह धारणा गलत है। बायोप्सी में कैंसर की आशंका वाले हिस्से से एक छोटा मांस का टुकड़ा लिया जाता है। इससे बीमारी फैलती नहीं है बल्कि सूक्ष्म स्तर पर इसकी जांच करने में आसानी होती है।
भ्रम: कम या अधिक उम्र में कैंसर ज्यादा खतरनाक होता है।
सच: कैंसर के फैलाव का उम्र से कोई सम्बंध नहीं है। रोग की गंभीरता उसके प्रकार, स्टेज और किस जगह पर कैंसर है उसपर निर्भर करती है। शुरुआती स्टेज में बीमारी की पहचान होने पर कम समय और खर्च में सफल इलाज हो जाता है। इसके लिए जरूरी है कि समय पर जांच कराएं। कम उम्र में अधिकतर मामले ब्लड और बोन कैंसर के होते हैं जिनके लक्षण जल्द ही दिखने लगते हैं और ऐसे में इलाज के बाद रिकवरी कम समय लेती है।
भ्रम: पुरुषों को नहीं होता ब्रेस्ट कैंसर।
सच: ब्रेस्ट कैंसर होने की आशंका पुरुषों में भी होती है। यह एक हजार महिलाओं की तुलना में एक पुरुष को हो सकता है। ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं में तेजी से बढ़ रहा है जिसका कारण खराब लाइफ-स्टाइल और अधिक उम्र में शादी है। यह हार्मोंस में बदलाव की वजह से भी हो सकता है। महिलाओं में पांच फीसदी मामले आनुवांशिक होते हैं।
भ्रम: काफी महंगा है कैंसर का इलाज।
सच: कैंसर की शुरुआती अवस्था में इलाज कराएं तो कम खर्च आता है। कैंसर का इलाज उसके प्रकार, स्थान और स्टेज पर निर्भर करता है।
डॉ. उमेश खंडेलवाल, कैंसर एवं रक्त रोग विशेषज्ञ


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आनुवांशिक कारणों से होती है हीमोफीलिया की समस्या


हीमोफीलिया क्या है ?

हीमोफीलिया रक्त संबंधी विकार है जो खून का थक्का बनने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है। यह महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में आम है। जो लोग इससे पीडि़त होते हैं उनमें चोट लगने या सर्जरी के दौरान रक्तस्त्राव अधिक मात्रा में और काफी देर तक होता है। कभी-कभी तो रक्तस्त्राव बिना चोट लगे भी हो जाता है, लेकिन यह समस्या सामान्य हीमोफीलिया में नहीं बल्कि गंभीर हीमोफीलिया से पीडि़त लोगों में दिखाई देती है।

कौन से लक्षण हीमोफीलिया के संकेत हो सकते हैं ?
अगर मरीज की स्थिति गंभीर है तो स्वत: रक्तस्त्राव हो सकता है। जिसके लक्षण हैं चोट या कट लगने या सर्जरी के बाद से अत्यधिक रक्तस्त्राव होना। जोड़ों जैसे घुटनों, कोहनियों और कंधों में गर्माहट, सूजन और दर्द का अनुभव होना। यह बच्चों में ज्यादा देखने को मिलता है। टीकाकरण के बाद असामान्य रक्तस्त्राव, मूत्र या मल में रक्त, अज्ञात कारण से नकसीर, नवजात शिशुओं में अतिसंवेदनशीलता विकसित होना आदि।

इसके क्या कारण हैं ?
जब रक्तस्त्राव होता है, तब हमारे शरीर की लाल रक्त कणिकाएं एक साथ आकर इस ब्लड को रोकने के लिए एक थक्का बना लेती हैं। यह प्रक्रिया कुछ निश्चित रक्त कणिकाओं द्वारा होती है। हीमोफीलिया तब होता है जब इन क्लॉटिंग फैक्टर्स में से किसी की कमी होती है। यह एक आनुवांशिक रोग है, जो बच्चों को उनके माता-पिता से होता है। इसके 70 फीसदी मामले आनुवांशिक होते हैं। लेकिन लगभग 30 प्रतिशत लोगों में यह डिस्ऑर्डर जेनेटिक चेंज (स्वत: म्यूटेशन) के कारण होता है।

हीमोफीलिया को नियंत्रित रखने के लिए कारगर उपाय ?

अभी तक इसका कोई स्थायी उपचार नहीं है। लेकिन कुछ सावधानियां बरतकर हीमोफीलिया से पीडि़त लोग सक्रिय जीवन जी सकते हैं। नियमित रूप से एक्सरसाइज, स्वीमिंग, साइक्लिंग और पैदल चलने से मांसपेशियां मजबूत होती हैं और जोड़ों की सुरक्षा होती है। फुटबॉल, हॉकी या पहलवानी, उन लोगों के लिए सुरक्षित नहीं है जिन्हें हीमोफीलिया है। कुछ निश्चित दर्द निवारक और रक्त को नियंत्रित करने वाली दवाएं लेने के साथ चोट से बचाव जरूरी हैं।


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इन कारणों से होता है सडन कार्डियक अरेस्ट, जा सकती है जान, जानें लक्षण


सडन कार्डियक अरेस्ट (एससीए) हृदय की ऐसी स्थिति है जिसमें धड़कनें सामान्य (60-100 प्रति मिनट) से 300-400 तक हो जाती हैं और ब्लड प्रेशर अचानक गिरने लगता है। साथ ही हृदय की विद्युतीय तरंगों में अनियमितता आ जाती है। ऐसे में हृदय की पंपिंग प्रक्रिया प्रभावित होने से रक्त अन्य अंगों तक नहीं पहुंचता है।

प्रमुख कारण -
हार्ट अटैक के ज्यादातर मामलों में एससीए वजह नहीं होता लेकिन एससीए (सडन कार्डियक अरेस्ट) के अधिकतर केस हार्ट अटैक के कारण हो सकते हैं। रोग का कारक हृदय की धमनियों में असमानता है।

इन्हें खतरा -
आनुवांशिक रूप से यदि किसी के परिवार में 50 से कम उम्र में ही एससीए की वजह से मौत हुई हो उनमें इसकी आशंका ज्यादा होती है। जिन्हें कोरोनरी आर्टरी डिजीज (हृदय की धमनियों में ब्लॉकेज) की वजह से हार्ट अटैक हुआ हो या डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, धूम्रपान व शराब पीने वालों को इसका अधिक खतरा रहता है।

मुख्य लक्षण-
10% हार्ट पेशेंट्स या अन्य लोगों में दिल की धड़कन बढऩे, चक्कर, बेहोशी या पसीना आने, घबराहट, हृदय के अचानक सिकुडऩे से सांस लेने में तकलीफ, आंखों के सामने अंधेरा छाने, सीने में दर्द जैसी परेशानियां होने लगती हैं।

ऐसे करें बचाव -
ध ड़कनों के अनियमित होने की स्थिति में हृदय को इलेक्ट्रिक शॉक देकर इन्हें नियंत्रित किया जाता है। इसके अलावा जिन लोगों को एससीए का खतरा ज्यादा होता है, बचाव के रूप में उनके लिए आईसीडी काफी उपयोगी होती है। इनर्ट मैटल से तैयार यह डिवाइस त्वचा को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाती। इसे सीने की वॉल पर त्वचा में लगाया जाता है जिसके तारों को हृदय से जोड़ दिया जाता है। इस डिवाइस में एक चिप होती है जो दिल की हर धड़कन को मॉनिटर करती है। जैसे ही दिल की धड़कनें असामान्य होने लगती हैं यह हृदय को तुरंत एक झटका देकर उन्हें सामान्य कर देती है। यह झटका सामान्य रूप से 40 जूल का होता है।

सतर्कता है जरूरी-
आईसीडी डिवाइस लगने के बाद मरीज खेलों, एक्सरसाइज या भारी वजन उठाने से बचें वर्ना डिवाइस पर चोट लगने से रक्त के थक्के जमने की आशंका बढ़ जाती है।

सावधानी -
डॉक्टर से नियमित चेकअप कराते रहें व दवाएं व एक्सरसाइज को न छोड़ें। डाइट में अखरोट, बादाम, मौसमी फल व हरी पत्तेदार सब्जियां, दूध, दही आदि लें।

संकेतों पर रखें नजर -
एससीए से पहले कोई खास संकेत नजर नहीं आते और मरीज की धड़कनें किसी भी समय अनियमित हो सकती हैं। एससीए के तुरंत बाद 3-6 मिनट में सीपीआर (हाथों से दबाव बनाना) या इलेक्ट्रिक शॉक न दिया जाए तो अवस्था जानलेवा हो सकती है। 80% से अधिक लोग इस रोग को गंभीरता से नहीं लेते व हृदय गति तेज होने पर हार्ट अटैक समझ लेते हैं जो गलत है।

कौनसी जांच जरूरी -
कमजोर हृदय या पूर्व में हार्ट अटैक झेल चुके मरीजों को समय-समय पर नियमित ईकोकार्डियोग्राफी (हृदय की अल्ट्रासाउंड) जांच करवानी चाहिए। जिन्हें एससीए हो चुका हो वे ईकाकार्डियोग्राफी व ईसीजी जांच करवाएं। हृदय की पंपिंग की सामान्य क्षमता 60% होती है व ईकोकार्डियोग्राफी जांच में यदि यह क्षमता 35% या कम आए तो एससीए की आशंका अधिक रहती है।


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इन सवालों के जवाब से जानिए क्या आप सेहत को सुविधा के अनुसार चलाते हैं ?


सेहत यदि सुविधा के अनुसार हो तो नुकसानदायक होना तय है। क्या आप भी ऐसा सोचते हैं? नीचे दिए सवालों के जवाब देकर खुद ही परख लीजिए ।
1. आप मानते हैं कि सेहत बनाए रखने के लिए सुविधाएं या साधन के बहाने ढूंढना ठीक नहीं हैं ?
अ: सहमत

ब: असहमत

2. आपके बाकी कामों में भी सुविधाजनक होने की झलक मिलती है, मनचाहे नतीजे भी नहीं मिलते ?
अ: सहमत

ब: असहमत

3. अपनी सुविधा की जिद के कारण कई मौके आपके हाथ से निकल जाते हैं और फिर पछताते हैं?
अ: सहमत

ब: असहमत

4. आपको कई बार इस आदत के कारण लोगों के उलाहने और डांट-फटकार भी सुननी पड़ती है?
अ: सहमत

ब: असहमत

5. आप ऐेसे नहीं हैं लेकिन दूसरों को देखकर ऐसी आदत पड़ गई है?

अ: सहमत

ब: असहमत

6. सुबह जल्दी उठ सकते हैं लेकिन आराम के बहाने ऐसा नहीं करते ?
अ: सहमत

ब: असहमत

7. सुबह बिस्तर छोडऩे का मन नहीं करता। बस, पड़े रहना चाहते हैं?
अ: सहमत

ब: असहमत

8. सेहत सुधारने की समझ आपके अंदर है लेकिन आराम के नाम पर उसे दबाए रखते हैं?
अ: सहमत

ब: असहमत

9. अपनी सुविधा परस्त आदत पर गुस्सा भी आता है लेकिन कोई बहाना करके शांत हो जाते हैं?
अ: सहमत

ब: असहमत

स्कोर और एनालिसिस -
आप 'सुविधा' में सुख ढूंढ़ते हैं : अगर आप ऊपर दिए छह या उससे ज़्यादा विचारों से सहमत हैं तो आप ऐसे आराम पसंद लोगों में हैं जो कुछ भी करने से पहली अपनी सुविधा ढूंढ़ते हैं। आपके लिए सबसे अच्छा यही होगा कि अपने आराम के कोने से बाहर निकलें, सुविधाएं पाने की बजाय खुद को सुविधाजनक बनाएं।

आपके लिए सेहत ही सुविधा है : यदि आप छह या उससे ज्यादा बातों से असहमत हैं तो मानना पड़ेगा कि आपने सेहत को अच्छी तरह से साधा है। आपके लिए सेहत बनाए रखना कोई बोझ या बोरिंग काम नहीं है।


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