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Patrika : Leading Hindi News Portal - Disease and Conditions

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साफ-सुथरा खानपान बनता है टायफॉइड से दूरी


दूषित खानपान से होने वाली एक खतरनाक संक्रामक बीमारी है टायफॉइड। यह सेलमोनैला टाइफी नाम के बैक्टीरिया से होती है।आइए जानते हैं इसके लक्षण के बारे में -

तेज बुखार:
टायफॉइड के बैक्टीरिया शरीर में जाने के बाद अपनी संख्या को बढ़ाते हैं। ऐसे में शरीर उन्हें नष्ट करने के लिए तापमान बढ़ा लेता है। इससे पीड़ित को बुखार महसूस होता है। पहले ठंड लगती है फिर तापमान बढ़ना शुरू होता है। ये तापमान 103-104 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंच जाता है। शरीर का तापमान बढऩे से पाचन संंबंधी एंजाइम्स निष्क्रिय होने लगते हैं।

सिरदर्द:
ऐसे में पीड़ित को दिनभर बुखार चढ़ने के साथ-साथ तेज सिरदर्द की शिकायत होती है।

लिवर का आकार बढ़ना :
करीबन एक हफ्ता टायफॉइड रहने के बाद लिवर का आकार बढ़ जाता है। यह खासतौर पर बच्चों में देखने को मिलता है। इस बीमारी में सीने और पेट पर लाल चकते दिखाई देने लगते हैं।

दस्त:
टायफॉइड के अधिकतर मरीजों को दस्त और उल्टी की शिकायत होती है। अक्सर इसे आंत की समस्या समझा जाता है। लेकिन इसकी पहचान है स्टूल का रंग गहरा होना। खून की शिकायत व उल्टी भी हो सकती है।

पेटदर्द:
दस्त और उल्टी के साथ पेट में ऐंठन व दर्द की समस्या हो जाती है। पेट में रोगाणुओं के कारण काफी दर्द हो सकता है। इससे कई बार पेट में सूजन भी आ जाती है।

सावधानी:
बचाव के लिए साफ-सुथरा खानपान लें। मरीज हैं तो बिना मिर्च-मसाले वाला भोजन करें और डॉक्टर की सलाह से दवाएं लें।


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लगातार पीठ दर्द हाे सकता है स्पाइनल स्टेनोसिस का संकेत


आजकल पीठदर्द आम बात है। किशोर से लेकर वृद्ध तक किसी न किसी रूप में पीठदर्द से परेशान हैं। ऐसा ही एक दर्द स्पाइनल स्टेनोसिस है। इस रोग की वजह से हमारे शरीर की डिसक उभरने लगती है और ऊत्तक मोटे हो जाते हैं जिससे रीढ़ नलिका से जाने वाली नस सिकुडऩे लगती है व पीठ में दर्द होता है।

यह है समस्या
स्पाइनल स्टेनोसिस में हमारी रीढ़ की हड्डी में मौजूद खुले स्थान बंद होने लगते है जिससे स्पाइनल कॉर्ड और नसों पर दबाव पड़ता है। ज्यादातर मामलों में स्पाइन का सिकुड़ना, स्टेनोसिस होने के कारण ही होता है जिससे नर्व रूट दबने से पैरों में दर्द, थकान, अकड़न व झनझनाहट महसूस होने लगती है।

अचानक पीठदर्द
इसका इलाज मुश्किल हो सकता है क्योंकि इस तरह के लक्षण किसी अन्य कारण से भी हो सकते हैं। जिन लोगों को स्टेनोसिस हो यह जरूरी नहीं की उन्हें पहले कभी पीठ में दर्द हो या कभी किसी तरह की चोट लगी हो। स्पाइनल स्टेनोसिस में अचानक पीठदर्द होता है जो आराम करने पर चला जाता है। अगर रोग अधिक न बढ़ा हो तो सर्जरी से उपचार संभव है। इसके लिए जरूरी है कि शारीरिक रूप से सक्रिय रहा जाए क्योंकि इससे रोग जल्दी ठीक होता है। छोटे-छोटे बदलाव जैसे स्ट्रेट जैकेटेड कुर्सी की जगह झुकने वाली चेयर से अच्छे परिणाम मिलते हैं।

सर्जरी में सावधानी
एपिडरल इंजेक्शन से मरीजों को ठीक किया जा सकता है। जिन लोगों को सर्जरी करानी पड़ती है उनके जल्दी ठीक होने में भी यह इंजेक्शन मददगार होता है। जब सभी प्रयास विफल हो जाते हैं तो सर्जरी ही विकल्प होती है। हालांकि सर्जरी से पहले मरीज के शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखना जरूरी होता है। फिर डॉक्टर को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह क्षतिग्रस्त नब्ज को पहचानकर उसका उपचार करे। इलाज करते समय पूरी सावधानी बरती जानी चाहिए कि किसी और नस को नुकसान न पहुंचे।


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विटामिन 'ए' की कमी से हो सकती है किडनी में पथरी


गलत खानपान, अनियमित दिनचर्या व अन्य कर्इ शारीरिक परेशानियाें की वजह से किडनी में पथरी समस्या हाे सकती है। कर्इ बार ताे यह पेशाब के जरिए अपने आप निकल जाती है, लेकिन कर्इ शरीर के अंदर ही रहकर गंभीर रूप ले लेती है। आइए जानते हैं किडनी की पथरी के बारे में :-

किडनी में पथरी किस उम्र में होती है ?
इस अंग में पथरी किसी भी उम्र में हो सकती है। लेकिन यह मध्य उम्र के लोगों में अधिक होती है। विशेषकर अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में।

इसकी वजह क्या है?
किडनी में पथरी होने के मुख्य कारण हैं विटामिन-'ए' की कमी, डिहाइड्रेशन, पेशाब में संक्रमण या रुकावट, शरीर के आधे हिस्से में लकवा, हाइपर पैराथायरॉइडिज्म, लिवर रोग आदि।

मुख्य लक्षण क्या होते हैं?
पेट में दायीं व बायीं ओर दर्द होना, उल्टी, पेशाब में जलन व टीस उठना, पेशाब का रुकना/खून/मवाद, बुखार व हाइपरटेंशन आदि।

इसका जल्द से जल्द पता कैसे किया जाए?
साधारण जांच से पथरी का पता लगाया जा सकता है। एक्स-रे या सोनोग्राफी व पेशाब की जांच से इसका पता लगाया जाता है।

इलाज कैसे संभव है?
किडनी की पथरी के इलाज के लिए कई तकनीकें उपलब्ध हैं। जैसे अधिक मात्रा में पानी पीने व दवा से एक सेमी से छोटी पथरी निकल जाने की संभवना होती है। तीन सेमी से छोटी पथरी बिना चीरे के आसानी से टुकड़े करके निकाली जा सकती है।

इलाज न लेने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं?
स्टोन साइलेंट भी हो सकता है जिसमें लक्षण कभी-कभी ही सामने आते हैं। इसके अलावा किडनी खराब होना या इसमें मवाद पडऩा और इस अंग के फेल होने की आशंका रहती है। साथ ही कैंसर भी हो सकता है।

पथरी की रोकथाम के लिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
प्रर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। लिवर रोगों का इलाज लें। अधिक चाय, कोल्ड ड्रिंक, अल्कोहल, खट्टे फल आदि से परहेज करें। दूध व दूध से बने पदार्थ, स्ट्रॉबेरी व मांस आदि का प्रयोग कम से कम करें।


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मेटाबॉलिक सिंड्रोम यानि कई रोगों की मार


मेटाबॉलिक सिंड्रोम कोई बीमारी नहीं बल्कि ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर में कई प्रकार के रोग उत्पन्न करने वाले कारक बढ़ जाते हैं जो हमें अधिक नुकसान पहुंचाते हैं।

हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और अनियंत्रित कोलेस्ट्रॉल इन चारों के संयुक्त रूप को मेटाबॉलिक सिंड्रोम कहते हैं। इसे सिंड्रोम एक्स भी कहा जाता है। लेकिन इन चारों में से यदि कोई एक ही कारक शरीर में मौजूद हो तो इसे मेटाबॉलिक सिंड्रोम नहीं कहा जाएगा। एक से अधिक रोगों की मौजूदगी में ही इसे सिंड्रोम माना जाता है। इन रोगों की वजह से शरीर में हार्ट डिजीज और स्ट्रोक जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ने लगता है।

एेसे करें बचाव
मेटाबॉलिक सिंड्रोम की बीमारी से बचाने के लिए लिए हमें अपनी डाइट में बदलाव और नियमित व्यायाम की जरूरत होती है।इस बीमारी काे कंट्राेल करने के लिए खानपान में संतुलित आहार जिसमें प्राेटिन, फाइबर अच्छी मात्रा में हाे , का सेवन करना चाहिए। किसी प्रकार के नशे दूर रहना भी जरूरी है। राेज सुबह-शाम तेज पैदल चाल, ब्रिक्स वाॅॅॅक जैसी हेल्दी एक्टिविटी करते रहें।

 


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एचआईवी संक्रमण में लाभ देता है विटामिन-डी


विटामिन-डी की हाई डोज (अधिक मात्रा) शरीर को एचआईवी संक्रमण से लड़ने में मदद करने के साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ा सकती है। पेन स्टेट यूनिवर्सिटी में हुए शोध के अनुसार विटामिन-डी, एचआईवी-1 के खतरे को घटाने और रोग को आगे बढ़ने से रोकने के लिए सामान्य व सस्ता उपाय है।

शाेध के अनुसार सूर्य की किरणों को प्राप्त कर हमारा शरीर विटामिन-डी का निर्माण करता है या फिर इस पोषक तत्त्व को हम खाद्य पदार्थों से प्राप्त करते हैं। इसकी हाई डोज हमें रक्त संबंधी कई प्रकार के संक्रमणों से लड़ने में मदद करती हैं।

शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि सर्दी के दिनों में धूप का स्तर कम होने से शरीर को विटामिन-डी कम मिल पाता है जिससे इस मौसम में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में विशेषज्ञ मरीजों को संक्रमण से बचाव के लिए विटामिन-डी के सप्लीमेंट लेने की सलाह देते हैं।


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हेल्दी लाइफस्टाइल से कम हाेता है स्ट्रोक का खतरा


इंसानों की मौत और उनकी विकलांगता का बड़ा कारण बनने वाले ब्रेन स्ट्रोक के बारे में लोग आज भी कम ही जानते हैं। इस बीमारी के बारे में अनभिज्ञता के चलते यह तेजी से अपने पैर पसारती जा रही है।

स्ट्रोक क्या है?
स्ट्रोकया ब्रेन अटैक दो प्रकार के होते हैं। 'इसकेमिक' ब्रेन अटैक मस्तिष्क में रक्तकी आपूर्ति कम होने के कारण होता है जिसकी वजह रक्तकी आपूर्ति करने वाली आर्टरी में ब्लॉकेज या रुकावट होना है। यह ब्लॉकेज शरीर में कहीं भी रक्तका थक्का बन जाने से हो सकती है जो धीरे-धीरे मस्तिष्क की आर्टरी तक पहुंच जाती है। वहीं एथेरोस्क्लेरोटिक गंदगी के कारण रक्तनलिका (आर्टरी) संकीर्ण होने के बाद हुई ब्लॉकेज से होता है। वहीं हेमोरेजिक ब्रेन अटैक मस्तिष्क में रक्तस्राव के कारण होता है जिसकी वजह हाइपरटेंशन, धमनियों की कमजोर दीवारों में दरार और विकृत रक्तनलिकाएं फूलने से बना क्षेत्र आदि होता है।

स्ट्रोक के लक्षण क्या होते हैं?
- चेहरा, बाजू, पैर (खासकर शरीर के एक तरफ) में अचानक संवेदनशून्यता या कमजोरी। अचानक भ्रम की स्थिति, बोलने या किसी बात को समझने में दिक्कत।
- एक या दोनों आंखों से देखने में अचानक से दिक्कत, चलने में तकलीफ, चक्कर आना और संतुलन का अभाव।
- आमतौर पर सब्राकनोइड हेमरेज में बिना वजह अचानक भयंकर सिरदर्द होने लगता है। साथ ही उल्टी, दौरा या मानसिक चेतना का अभाव जैसी शिकायतें भी होती हैं। इन मामलों में नॉन-कॉन्ट्रास्ट सीटी जांच तत्काल करा लेनी चाहिए।

कितनी खतरनाक है यह बीमारी?
स्ट्रोक के कारण मस्तिष्क में नुकसान से पूरा शरीर प्रभावित हो सकता है- जिसके परिणामस्वरूप आंशिक से लेकर गंभीर विकलांगता तक हो सकती है। इनमें पक्षाघात, सोचने व बोलने में समस्या और भावनात्मक दिक्कतें शामिल हैं। भारत जैसे निम्न आय और मध्य आय वर्ग वाले देश में असमय मौत और विकलांगता के लिए स्ट्रोक एक अहम कारण बनता जा रहा है।

भारतीय युवा इसके शिकार ज्यादा क्यों?
स्ट्रोक झेलने वाले 15 प्रतिशत लोगों की आयु 50 वर्ष या इससे कम होती है। युवाओं में स्ट्रोक के मामले बढ़ते जा रहे हैं। डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, धूम्रपान तथा शराब का सेवन युवाओं के लिए स्ट्रोक का सबब बन सकता है।

स्ट्रोक की वजह क्या है?
- इसके कई खतरे हो सकते हैं जैसे उम्र बढ़ने के साथ ही खतरा भी बढ़ जाता है।
- पारिवारिक पृष्ठभूमि।
- 140/90 एमएमएचजी से अधिक रक्तचाप।
- एट्रियल फाइब्रिलेशन जैसे हृदय रोग व अन्य डिसऑर्डर।
- कैरोटिड आर्टरी रोग, दरअसल कैरोटिड (ग्रीवा) धमनियां मस्तिष्क को रक्तकी पूर्ति कराती हैं। लेकिन जब ये धमनियां संकुचित हो जाती हैं तो अटैक की आशंका बढ़ जाती है।
- हाई कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान और मादक पदार्थों का अधिक सेवन। डायबिटीज, अधिक वजन खासकर कमर के आसपास और व्यायाम न करने से भी स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।

स्ट्रोक से बचे रहने के लिए क्या सावधानी बरतें ?
उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक का सबसे बड़ा खतरा है। जो ब्लॉकेज (इसकेमिक स्ट्रोक) के कारण 50 प्रतिशत स्ट्रोक की वजह बनता है। रक्तचाप पर नियंत्रण और आर्टरी पर जमाव रोकने में जीवनशैली में बदलाव मददगार होते हैं।नमक कम लें। प्रतिदिन कम से कम पांच प्रकार की सब्जियों और फलों का सेवन करें।वजन कम करें। वसायुक्त भोजन कम खाएं।
मीठी चीजें सीमित मात्रा में खाएं। धूम्रपान त्याग दें। अल्कोहल का सेवन न करें। अधिक सक्रिय रहें। तनाव का स्तर कम करें और शरीर को पूरी तरह से आराम दें।

छोटा स्ट्रोक झेल चुका शख्स स्वस्थ जीवन किस तरह जी सकता है?
स्ट्रोक झेल चुके लोगों को चलने-फिरने और संतुलन बनाने में फिजिकल थैरेपिस्ट मददगार होता है। ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट स्ट्रोक सर्वाइवर को खाने, नहाने, कपड़े पहनने जैसी दैनिक गतिविधियों के तौर-तरीके बताता है। स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट भाषाई दक्षता में मदद करता है। अंत में न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट ऐसे मरीजों का इलाज करता है जिन्हें स्ट्रोक के बाद सोचने, याद रखने व व्यवहार में बदलाव का सामना करना पड़ सकता है। चाँद मोहम्मद शेख

इस बीमारी से बचने के लिए एक्सरसाइज या घूमना कितना फायदेमंद है?
एक ही जगह स्थूल होकर न बैठें। अपने डॉक्टर से नियमित व्यायाम के गुर जानें। शुरुआती दौर में प्रतिदिन 30 मिनट का हल्का-फुल्का व्यायाम कारगर रहता है। ज्यादातर डॉक्टर आपको टहलने की सलाह देंगे ताकि आप खुली हवा में सांस ले सकें और दिल तक ताजा रक्त का संचार हो सके। नियमित व्यायाम से आपका वजन घटेगा और रक्तचाप भी कम होगा।


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क्या बदलते मौसम में आप भी एलर्जी से परेशान होते हैं?


बदलते मौसम में एलर्जी की दिक्कत बढ़ जाती है। सर्दी की शुरुआत व अंत में संक्रमण, एलर्जी की दिक्कत ज्यादा होती है। इस समय दिन का तापमान ज्यादा व रात का कम होता है। इस तापमान में बैक्टीरिया व वायरस तेजी से बढ़ते हैं। फूलों के परागकण भी एलर्जी का बड़ा कारण है। इससे छींक आना, लाल चकत्ते, बुखार जैसे लक्षण दिखते हैं। जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है उनको दिक्कत ज्यादा होती है। युवाओं के मुकाबले बच्चों व अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा होती है।
रोग प्रतिरोधक तंत्र संवेदनशील हो जाता
कभी-कभी शरीर धूल, धुआं, परफ्यूम, किसी खास तरह की खुशबू, दवा आदि को लेकर संवेदनशील हो जाता है। रोग प्रतिरोधक तंत्र इसे स्वीकार नहीं करता है। इसकी प्रतिक्रिया त्वचा पर सबसे पहले दिखती है। त्वचा पर लाल चकत्ते, सांस तेज चलना, बुखार आना प्रमुख लक्षण हैं। धूल में मौजूद सूक्ष्मजीवी एलर्जी का कारण बनते हैं जिससे छींक, आंख व नाक से पानी आता है।
डॉ. सी.एल.नवल, सीनियर फिजिशियन, सवाईमानसिंह मेडिकल कॉलेज, जयपुर


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डॉक्टर खाली पेट या खाने के बाद दवा लेने को क्यों कहते हैं?


क्या आपने कभी सोचा कि डॉक्टर दवाएं खाली पेट या कुछ खाने के बाद लेने के लिए क्यों कहते हैं? इसके फायदे और नुकसान क्या हैं? चिकित्सक रोग की प्रकृति व साल्ट के आधार पर दवा लेने की सलाह देते हैं, क्योंकि हर दवा की शरीर में घुलने की क्षमता अलग होती है। इसीलिए चिकित्सक किसी दवा को खाना खाने से पहले, किसी को खाने के दौरान तो किसी को खाना खाने के बाद लेने की सलाह देते हैं।
घुलनशील दवाएं खाली पेट
खाने के बाद पेट में एसिड बनते हैं। कुछ दवाएं जो पानी में जल्द घुलने वाली होती हैं उन्हें खाली पेट लेनी होती हैं। बाद में लेने से इनका असर कम होता है।
खाने से आधा घंटा पहले : पेट की गतिविध तेज करने वाली दवाएं खाने से आधे घंटे पहले लेते हैं।
खाने के बाद : ऐसी दवाएं (पेनकिलर) जो पेट में एसिडिटी, अल्सर जैसी बीमारियों का कारण बनती हैं। खाने के कुछ समय बाद लेने की सलाह दी जाती है।

इसलिए शेक करना जरूरी
सिरप में लिक्विड भाग फ्लेवर व गाढ़ा भाग दवा के कणों का होता है जो प्रयोग नहीं होने से सतह पर बैठ जाते हैं। इसलिए पीने से पहले शेक (हिलाना) करना जरूरी है।
- डॉ. प्रियंका राठी फार्माकोलॉजिस्ट, आरयूएचएस, जयपुर


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दिल की बीमारी से मधुमेह राेगियाें काे ज्यादा खतरा


टाइप 2 मधुमेह के मरीजों में 58 फीसदी मौतें दिल संबंधी रोगों की वजह से होती हैं।मेक्सिकन डायबिटीज फेडरेशन की आेर से ये खुलासा किया गया है।

मेक्सिकन डायबिटीज फेडरेशन की अध्यक्ष हेक्टर सांचेज मिजंगोस के अनुसार इस बीमारी के शिकार लोगों में असमय मौत या दिल संबंधों रोगों की वजह से अक्षमता का ज्यादा खतरा होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मधुमेह से जुड़ा शर्करा का उच्च स्तर रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और इससे रक्तचाप, दृष्टि व जोड़ों में दर्द व अन्य दिक्कतें पैदा होती हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों से पता चलता है कि टाइप2 मधुमेह से 44.2 करोड़ लोग पीड़ित हैं।

मेक्सिको के स्वास्थ्य सचिवालय ने पाया कि एज्टेक राष्ट्र के 1.3 करोड़ लोग मधुमेह के साथ जी रहे हैं और इन प्रभावितों में आधे लोगों को ही पता है कि उन्हें बीमारी है।

मिजंगोस के अनुसार, 2015 में अकेले मेक्सिको में 98,000 से ज्यादा लोगों की मौत मधुमेह से हुई और मरने वालों की औसत आयु 66.7 साल रही।

उन्होंने कहा, ''यह अफसोसजनक है क्योंकि ये लोग 15 साल और जीवित रह सकते थे।" उपचार के विकल्पों में सुधार के लिए मेक्सिको के स्वास्थ्य अधिकारियों ने जनवरी में कैनाग्फ्लिोजिन के इस्तेमाल को मंजूरी दी।

मिजंगोस ने कहा, ''इस दवा के साथ एक व्यक्ति 100 मिलीग्राम शर्करा प्रतिदिन कम कर सकता है, जिससे रोजाना 4000 कैलोरी कम होगी जो वजन घटाने में सहायता करती है।


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नाखून के नीचे की गांठ निकली ग्लोमस ट्यूमर


नाखून के नीचे दर्द था
पचास साल की उम्र के आसपास के इस मरीज को पिछले कई महीनों से नाखून के नीचे दर्द था। दर्द होने पर वे दर्द निवारक गोली खा लेते थे। लेकिन जब दर्द बढ़ता गया तो डॉक्टर को दिखाया। जांच में यह ग्लोमस ट्यूमर निकला। यह ट्यूमर नाखून के नीचे की तरफ होता है और ट्यूमर के कारण इसमें तेज दर्द होता है।

क्या है ग्लोमस ट्यूमर
यह नाखून के पीछे या उसके पास होता है। इसमें एक गांठ बन जाती है। अब चूंकि यह गांठ त्वचा के अंदर होती है इसलिए सामान्यत: मरीज का एकदम से इसपर ध्यान नहीं जाता है। लगातार दर्द नहीं होने के कारण भी लोग अक्सर इसे अनदेखा कर देते हैं और डॉक्टर के पास देर से जाते हैं। इसका दर्द नाखून से किसी भी चीज के टच होने या ठंडे पानी में अंगुली डालने पर होता है।

हड्डी को भी हो सकता है नुकसान
यदि ग्लोमस ट्यूमर बढ़ जाता है तो अंगुली को नुकसान पहुंच सकता है। यदि लंबे समय तक (जो कि कई साल तक हो सकता है) इस दर्द की अनदेखी की जाए तो बीमारी बढ़ सकती है। ट्यूमर के आसपास मवाद होने से अंंगुली की हड्डी में छेद भी हो सकता है। ट्यूमर को सर्जरी से हटाते हैं। यह ट्यूमर चोट लगने के कारण भी हो सकता है।

डॉ. सी.एस. चतुर्वेदी
आर्थोपेडिक सर्जन,
जयपुर


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आपको गंभीर त्वचा रोग का शिकार बनाता है धूम्रपान


स्मोकिंग से कैंसर, स्ट्रोक या हृदयरोग का खतरा ही नहीं बढ़ता बल्कि इससे त्वचा को भी भारी नुकसान पहुंचता है और हमारा शरीर जल्दी बूढ़ा हो जाता है।आइए जानते हैं आपके लिए कितनी नुकसानदायक है स्मोकिंग करना :-

त्वचा का लटकना
- धूम्रपान से झुर्रियां बढ़ती हैं। ऐसा करने वाले लोगों की आंखों व मुंह के आसपास की फाइन लाइंस कम उम्र में गड़बड़ा जाती हैं।

- स्मोकिंग से एक एंजाइम बनता है जो त्वचा के इलास्टिक फाइबर को क्षति पहुंचाता है।फ्री रेडिकल्स नाम का मॉलिक्यूल त्वचा की बनावट व कार्यक्षमता को बिगाड़ता है।

- अल्ट्रावॉयलेट रेडिएशन के प्रभाव से स्मोकिंग शरीर के लिए अधिक खतरनाक हो जाती है।धमनियां सिकुड़ने से रक्तप्रवाह घटता है जिससे त्वचा के कनेक्टिव टिश्यूज को नुकसान होता है।

सोरायसिस (त्वचा रोग)
निकोटिन सीधे इम्युन सिस्टम को प्रभावित करता है इसलिए धूम्रपान करने वालों को सोरायसिस का खतरा ज्यादा होता है।

लुपुस
20-40 वर्ष की महिलाओं को यह त्वचा रोग होता है। इसमें गाल व नाक के आसपास घाव हो जाते हैं। धूम्रपान न करने वालों की तुलना में ऐसा करने वालों को इसका खतरा 10 गुना ज्यादा होता है। इसके अलावा इसकी लत वाले लोगों पर दवाओं का असर भी नहीं होता। धूम्रपान करने से गुप्तांग में मस्सों का खतरा भी बढ़ जाता है।

घाव भरने में देरी
धूम्रपान से सर्जरी या अन्य घावों को भरने में समय लगता है। इससे घावों में संक्रमण या ऊत्तक नष्ट हो सकते हैं। साथ ही रक्त के थक्के बनने लगते हैं जिसकी निम्न वजह हैं :
निकोटिन से रक्तप्रवाह 30-4० प्रतिशत घट जाता है। इससे त्वचा को ऑक्सीजन व अन्य पोषक तत्त्व कम मिलते हैं।
धूम्रपान से प्लेटलेट्स चिपचिपे हो जाते हैं जिससे रक्तके छोटे-छोटे थक्के बन जाते हैं। ये थक्के घाव तक ऑक्सीजन नहीं जाने देते और उन्हें सूखने में देरी होती है। तंबाकू फाइब्रोब्लाट्स सेल्स को प्रभावित करता है। इनका काम घाव भरने के दौरान जलन को घटाना है।धूम्रपान से रक्तनलिकाओं को बनने में बाधा पहुंचती है जिससे घाव देरी से भरते हैं।


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दो एंजाइम कम कर सकते हैं पैंक्रियाटिक कैंसर का खतरा


एक नए शोध में पैंक्रियाटिक कैंसर के मरीजों में पीएचएलपीपी1 व पीकेसी एंजाइम के स्तरों के इस्तेमाल से लाभ मिलने की बात कही गई है। इससे शोधकर्ता नई चिकित्सकीय दवाएं विकसित कर सकते है, जो दोनों एंजाइमों के संतुलन को बदलेगा। इस प्रकिया से पैंक्रियाटिक कैंसर से जूझ रहे लोगों के इलाज में सहयोग मिलेगा।इस शोध का प्रकाशन 'मॉलिक्यूलर सेल' में किया गया है। इस शोध को सैन डिएगो के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के फॉर्माकोलॉजी विभाग के एलेक्जेंड्रा न्यूटन व टिमोथी बाफी ने किया है।

नया शोध साल 2015 के टीम वर्क पर आधारित है, जिसमें पाया गया कि एंजाइम पीकेसी वास्तव में पैंक्रियाटिक कैंसर को रोकने का कार्य करता है। इसके पिछले अध्ययन में माना गया था यह ट्यूमर की वृद्धि को बढ़ाता है।

हालिया शोध में पता चला है कि कोशिकाएं कैसे पीकेसी को नियंत्रित करती है और पीकेसी की ज्यादा सक्रियता का पता लगाती हैं।

न्यूटन ने कहा, ''इसका मतलब है कि पीएचएलपीपी1 आपकी कोशिकाओं में पीकेसी की मात्रा तय करता है।यह पैंक्रियाटिक कैंसर के लिए एंजाइम स्तरों में बदलाव लाता है।"


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पैरालाइसिस के इलाज में अहम होते हैं शुरू के 4-5 घंटे


पेरालाइसिस या स्ट्रोक मौत का चौथा महत्त्वपूर्ण कारण है। इसके लक्षण अचानक आते हैं जो दिमाग के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग होते हैं। रक्तधमनी में आए थक्के को जल्द से जल्द हटाना जरूरी होता है क्योंकि हर एक सेकंड इससे दिमाग की कोशिकाओं को नुकसान होता है। यदि रोगी जल्दी अस्पताल पहुंचता है तो उसे एक इंजेक्शन दिया जाता है।

यह विधि थ्रोम्बोलाइटिस या क्लॉट डिजॉल्व होती है। इससे बंद हुई धमनी को खोला जाता है जिससे मरीज तुरंत पहले जैसी अवस्था में आ जाता है।

महत्त्वपूर्ण घंटे:
इस प्रभावी इंजेक्शन को 4-5 घंटे में ही दिया जा सकता है। इसलिए लकवे को पहचानना जरूरी है। अगर आप इस तरह का मरीज देखें तो उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाएं। आमतौर पर अस्पताल पहुंचने के बाद ही डॉक्टर, मरीज को देख पाते हैं जिसमें समय लगता है। इसलिए अस्पताल को पहले से ही फोन पर सूचित कर दें। इससे इलाज में आसानी होती है क्योंकि यदि सुविधा वाली एम्बुलेंस हो तो केबूला लगाना, नापना आदि काम रास्ते में किए जा सकते हैं।


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सिर्फ 20 सैकंड करें यह काम, आपके हाथों को देखकर दूर भागेंगी खतरनाक बीमारियां


इन खतरनाक बीमारियों से बचेंगे
आप सोच रहे होंगे कि ऐसा कौनसा काम है जो रोज सिर्फ 20 सैकंड सही तरीके से किया जाए तो आप कई तरह की खतरनाक बीमारियों से बच सकते हैं। यह काम कोई मुश्किल भी नहीं है। दरअसल यहां बात हो रही है हमारे हाथ धोने के तरीके को लेकर। संक्रामक रोगों पर अध्ययन से जुड़े अमरीका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक यदि सही तरीके से 20 सैकंड तक हाथों को धोया जाए तो सर्दी-जुकाम, फेफड़ों का संक्रमण, डायरिया, हेपेटाइटिस, मेनेनजाइटिस जैसी खतरनाक बीमारियां फैलाने वाले जम्र्स (रोगाणुओं) के संक्रमण को काफी हद तक कम किया जा सकता है। हेपेटाइटिस व दिमागी बुखार मेनेनजाइटिस का कारण बैक्टीरिया और वायरस भी होते हैं।

ऐसे रगड़ें दोनों हाथों को
सेंटर के विशेषज्ञों का कहना है कि साबुन या हैंडवाश को हाथ में अच्छे से लगा लें और फिर गर्म या ठंडे पानी से अच्छी तरह से रगड़कर धोएंं। हाथों को इस तरह रगड़ें कि अंगुलियों के आगे का हिस्सा (पोरे), नाखून के बाहर व अंदर का हिस्सा, अंगुलियों के बीच में और हथेली व पीछे की तरफ 20 सैकंड तक घुमाकर साफ करें। इसके बाद इसे अच्छी तरह से धोकर सुखाना भी चाहिए। हाथ सूखने के बाद पौंछें। सुनने में भले ही यह अजीब लगे लेकिन 2013 में जर्नल ऑफ एनवायर्नमेंट हैल्थ की एक रिसर्च में कहा गया था कि केवल पांच फीसदी लोग ही सही तरीके से हाथ धोते हैं जिससे बीमारी फैलाने वाले जम्र्स और बैक्टीरिया खत्म होते हैं।

हाथों से संक्रमण इस तरह फैलता है
विभिन्न अध्ययनों में भी कहा गया है कि हमारे हाथों में सैकड़ों ई-कोली बैक्टीरिया मौजूद रहते हैं। यह बैक्टीरिया पेट में कई तरह के घातक संक्रमण का कारण माना जाता है। यदि अच्छे से हाथ नहीं धोते हैं तो उसपर मौजूद ये बैक्टीरिया या जम्र्स हाथ को खुद के शरीर पर छूने से या दूसरे व्यक्ति से हाथ मिलाने-गले मिलने पर अपना संक्रमण दूसरी जगह आसानी से फैला देते हैं। इन्हीं हाथों को घर के दरवाजे, मोबाइल, कंप्यूटर या अन्य घरेलू चीजों को छूने से इनका संक्रमण दूसरों में होने का खतरा बढ़ जाता है। जम्र्स या बैक्टीरिया वाले हाथों से खाना खाने पर इनका संक्रमण शरीर में अंदर फैलकर बीमार करता है। हमारे देश में प्राचीन काल से कोई भी काम शुरू या खत्म करने के वक्त लंबे समय तक हाथ धोने की आदत शुमार रही है। तब साबुन वगैरहा तो थे नहीं और लोग मिट्टी या राख से हाथों को अच्छी तरह से मसलकर काफी देर तक धोते थे। घर-मोहल्ले से शौचालय से जुड़ी साफ-सफाई को लेकर केंद्र सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान भी चला रखा है।


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मेनोपॉज के बाद इस तरह जीएं सेहतमंद जिंदगी


सभी महिलाओं को उम्र के एक पड़ाव के बाद रजोनिवृत्ति से गुजरना होता है। जब माहवारी बंद हो जाती है तो अंडाशय में अंडे बनने की प्रक्रिया बंद होने के साथ एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर भी कम हो जाता है। आमतौर पर भारतीय महिलाओं में अमरीकी व यूरोपीय देशों की अपेक्षा जल्दी (औसतन 46-47 वर्ष में) मेनोपॉज होता है और इस पूरे बदलाव में 2 से 10 वर्ष तक लग सकते हैं। ऐसे में कई बार बहुत सी महिलाओं को एस्ट्रोजन का स्तर गिरने के कारण बेचैनी, चिंता व अन्य परेशानियों का सामना करना पड़ता है।आइए जानते है इनके बारे में-

मानसिक बदलाव
नींद में कमी, उदासीनता, वैवाहिक संबंधों में अनिच्छा व स्मरणशक्ति का कमजोर होना, रजोनिवृत्ति के साथ हुए मानसिक बदलाव के संकेत हैं।

हो सकती हैं ये परेशानियां
- जोड़ों में दर्द व मांंसपेशियों में जकड़न।
- अनियमित मासिक रक्तस्राव।
- हॉट फ्लैशिज होना।
- सुकून की नींद न आना।
- दिल की अनियमित धड़कन।
- चक्कर आना व सिरदर्द।
- बार-बार पेशाब आने की समस्या।
- चिड़चिड़ापन।
- अवसाद, बेचैनी और चिंता।
- एकाग्रता में कमी, अत्यधिक थकान।
- वजन बढ़ना व शरीर में सूजन।

ऐसे रखें मानसिक स्वास्थ्य दुरुस्त
शोध बताते हैं कि मानसिक, शारीरिक व सामाजिक गतिविधियों के साथ अच्छे पोषण से मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है।
- जैतून के तेल के साथ एंटीऑक्सीडेंट व मेडिटेरियन आहार जैसे फल, सब्जियां, साबुत अनाज, सूखे मेवे आदि से मानसिक स्वास्थ्य सही रहता है।
- विटामिन-डी व बी से भरपूर खाद्य पदार्थ और व्यायाम करने से भी मानसिक स्वास्थ्य में सुधार की संभावना होती है।
- अन्य पूरक आहार जैसे सोया आइसो-फ्लेवन्स् (सोयाबीन, सोयाबीन आटा, दूध व पनीर) से याददाश्त बढ़ती है।
- शारीरिक गतिविधियां जैसे तेज चलने, जॉगिंग व ऐरोबिक्स आदि से डिमेंशिया के जोखिम को कम किया जा सकता है।
- ध्यान और योग से मन शांत होता है साथ ही याददाश्त में कमी की समस्या दूर करने में मदद मिलती है।
- शराब, धूम्रपान व अन्य नशीलेपदार्थों से बचकर मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रखा जा सकता है।
- मानसिक गतिविधियां मस्तिष्क की उत्तेजना को बढ़ाने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

हार्मोन थैरेपी
मेनोपॉज हार्मोन थैरेपी से भी रजोनिवृत्ति के लक्षण व प्रभावों को कम करने के साथ भविष्य में होने वाली अन्य बीमारियों से बचा जा सकता है। इसमें गोलियों व क्रीम आदि के माध्यम से शरीर में एस्ट्रोजन के स्तर को बनाए रखा जाता है। चिकित्सक की सलाहानुसार आप इस थैरेपी का विकल्प चुन सकती हैं।

सामाजिक संपर्क बढ़ाएं
मस्तिष्क के प्रभावों को रोकने के लिए अकेले रहने के बजाय लोगों के बीच समय बिताएं। संगीत सुनें, वाद्ययंत्र बजाएं व सामाजिक कार्यों में हिस्सा लें। इससे आपमें आत्मविश्वास बढ़ेगा। साथ ही मानसिक गतिविधियां जैसे शतरंज खेलना, साहित्य पढ़ना आदि से मानसिक रूप से स्वस्थ रहने में मदद मिलेगी।

विशेषज्ञ की राय
तनावरहित जीवनशैली अपनाकर मानसिक संतुलन बनाए रखें और अवसाद से बचें। नए शौक अपनाएं, सामाजिक कार्यों में रुचि रखें। बढ़ती आयु के प्रति सकारात्मक सोच बनाएं। अपनी पुरानी बीमारियों की नियमित जांच व इलाज करवाएं, स्वयं रिपोर्ट देखकर इलाज बंद न करें। आत्मविश्वास बनाए रखें। आप अपनी सोच में यह बदलाव लाएं कि मेनोपॉज अभिशाप नहीं वरदान है। यह कोई बीमारी नहीं बल्कि बदलाव है।


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गॉलब्लैडर में पथरी बनता है अधिक कोलेस्ट्रॉल


गरिष्ठ भोजन के बाद कई बार लोगों को एसिडिटी, अपच, पेटदर्द आदि की शिकायत हो जाती है। लेकिन अगर ऐसा बार-बार हो तो यह पित्ताशय (गॉलब्लैडर) में पथरी का संकेत है। यह तकलीफ सिर्फ वयस्कों में ही नहीं बल्कि बच्चों में भी हो सकती है। लंबे समय तक इसकी अनदेखी सेहत संबंधी मुश्किलें बढ़ा सकती है। हाल ही एसएमएस अस्पताल में दो वर्षीय बच्चे के पित्ताशय को ऑपरेशन से निकाला गया। उसके पित्ताशय में 9-10 स्टोन पाए गए थे।

पित्ताशय का काम
लिवर के ठीक नीचे थैलीनुमा अंग होता है। यह शरीर में पित्त इकट्ठा करता है। लिवर से निकलने वाला 70 प्रतिशत पित्त सीधे छोटी आंत में जाता है व 30 प्रतिशत पित्ताशय में जमा होता है। अधिक तला-भुना व मसालेदार भोजन लेने पर पित्ताशय में जमा पित्त छोटी आंत में जाकर गरिष्ठ भोजन को पचाने में मदद करता है।

समस्या इसलिए
इसका सबसे बड़ा कारण पित्ताशय में कोलेस्ट्रॉल की अधिकता होता है। अधिक तलाभुना व मसालेदार भोजन करने से लिवर द्वारा रिलीज कोलेस्ट्रॉल की मात्रा पित्त में बढ़ती जाती है जो पथरी का कारण बनती है। इसके अलावा कई बार पित्त में बिलरुबीन व नमक की अधिक मात्रा, शरीर में खून की कमी व आनुवांशिक कारणों से भी यह समस्या हो सकती है। छोटे बच्चों में यह समस्या ज्यादातर आनुवांशिक कारणों से या पोषक तत्वों के अभाव में खून की कमी यानी एनीमिया से होती है।

दर्द दबाना घातक
इस परेशानी को लंबे समय तक दर्दनिवारक दवा खाकर दबाना नहीं चाहिए क्योंकि पथरी का आकार 3 सेंटीमीटर से अधिक होने या फिर परेशानी को 10 वर्ष से अधिक समय बीतने पर यह कैंसर का रूप ले सकती है।

ये हैं प्रमुख लक्षण
शुरुआत में इसके लक्षण अपच, एसिडिटी, जी घबराना व उल्टी आदि के रूप में सामने आते हैं। जिससे इसकी पहचान नहीं हो पाती। जब पथरी बढऩे लगती है तो पित्ताशय की परत बढ़ जाती है। इससे पेट में नाभि के ऊपर दायीं ओर दर्द होता है। कई बार अधिक समय तक इसकी अनदेखी से पथरी पित्ताशय से निकलकर पाइपलाइन में फंस जाती है जिससे रोगी पीलिया से ग्रसित हो जाता है।

इन्हें है खतरा
मोटापे में कोलेस्ट्रॉल की अधिकता। गर्भनिरोधक दवाओं, हार्मोन संबंधी रोगों व प्रेग्नेंसी में इलाज के दौरान एस्ट्रोजन की अधिकता। तेजी से वजन कम होने की स्थिति में लिवर ज्यादा कोलेस्ट्रॉल रिलीज करने लगता है जिससे गॉलब्लैडर में इसकी मात्रा बढ़ जाती है।

महत्त्वपूर्ण जांचें
सामान्यत: इसका पता सोनोग्राफी से चल जाता है। अधिक परेशानी होने पर कई बार डॉक्टर एमआरसीपी जांच (एक तरह की एमआरआई) करवाते हैं।

सर्जरी है इलाज
पित्ताशय में पथरी एक हो या अधिक, इलाज सर्जरी ही है। इसमें पित्ताशय को बाहर निकाल दिया जाता है जिससे स्वास्थ्य पर फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इसके बाद लिवर का पित्त सीधे छोटी आंत में पहुंचने लगता है जिससे भोजन पचाने का काम सामान्य रूप से होता है। सर्जरी के बाद पथरी की पैथोलॉजी जांच करानी चाहिए क्योंकि कैमिकल एनालिसिस से पथरी के कारण का पता लगाकर भविष्य में अन्य रोगों के खतरे को कम किया जा सकता है।

बचाव के उपाय
- अधिक तले-भुने व गरिष्ठ भोजन के बजाय हल्का व संतुलित आहार लें। नियमित योग व व्यायाम करें।
- अधिक वजन वाले लोग घी, मक्खन आदि से परहेज करें व फैट फ्री दूध लें।
- शरीर में पानी की कमी न होने दें। इसके लिए दिनभर में 3-4 लीटर पानी पिएं।
- अंकुरित अनाज, दालें, राजमा, सेब, पपीता, केला आदि फाइबरयुक्त चीजें लें।


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कम करना है घुटनों का दर्द तो करें ये उपाय


कम उम्र के ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो घुटने के दर्द से पीड़ित हैं। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब लंबे समय तक ध्यान न देने से मामला सर्जरी तक पहुंच जाता है।

निवारण के घरेलू उपाय
ऐसे कामों से बचें जो दर्द बढ़ाते हैं, जैसे वजन उठाने वाले काम। दर्द वाली जगह दिन में कम से कम चार बार बर्फ का सेंक करें। सूजन को कम करने के लिए घुटने को क्षमतानुसार ऊपर उठाकर रखें। घुटनों के बीच में तकिया रखकर सोएं।

हड्डियां होती हैं कमजोर
धूप व विटामिन-डी की कमी और दूध न पीने से हड्डियां कमजोर होती हैं। यही नहीं धूम्रपान या तंबाकू की लत से फेफड़ों, हड्डियों व जोड़ों को नुकसान होता है।

पीएस-150 सर्जरी
घुटनों में दर्द से राहत के लिए पीएस-150 सर्जरी उपलब्ध है। इससे प्रत्यारोपित घुटना प्राकृतिक घुटने की तरह काम करता है। अक्सर गठिया में कू्रसिएट लिगामेंट खराब हो जाते हैं और कैल्शियम डिपॉजिट होने से ऑस्टियोफाइट्स से घुटना पूरा नहीं मुड़ता। इस तकनीक में घुटना अपने विशिष्ट डिजाइन के कारण कू्रसिएट लिगामेंट की कार्यक्षमता पर निर्भर नहीं करता और पूरा मुड़ता है।

इसे प्रत्यारोपित करते समय रोटेटिंग प्लेटफॉर्म व हाइली पॉलिश्ड कोबाल्ट क्रोम ट्रे को इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे प्रत्यारोपित घुटने की घिसने की गति व मात्रा कम हो जाती है। सर्जरी के बाद पैर 150-155 डिग्री तक घूम सकता है इसलिए इसे पीएस-150 सर्जरी कहते हैं।

क्रॉस कंसल्ट करें
घुटने के दर्द में फिजियोथैरेपिस्ट, फिटनेस ट्रेनर व योग गुरु की मदद से राहत मिलती है। दर्द असहनीय हो तो विशेषज्ञ से परामर्श लें। डॉक्टर यदि सर्जरी की सलाह दें तो क्रॉस कंसल्ट जरूर करें। वैसे घुटने के दर्द में घरेलू उपाय भी लाभकारी होते हैं।

दूध पीना जरूरी
माना जाता है कि व्यक्ति दिन में दो गिलास दूध पीता है इसलिए हड्डियों की बीमारी की आशंका कम होती है। लेकिन इन दिनों कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब व्यक्ति दूध पर्याप्त मात्रा में पीता तो है मगर उसकी हड्डियां कमजोर हो जाती हैं।लिहाजा ऐसे में गाय का दूध फायदेमंद होता है क्योंकि इसमें अधिक मात्रा में पौष्टिक तत्त्व होते हैं।


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डायबिटीज का खतरा बढ़ा सकती है एंटीबायोटिक


कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी में हुए शोध के अनुसार अधिक एंटीबायोटिक दवाओं के सेवन से टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। इस शोध में जिन लोगों को 15 वर्षों या उससे अधिक समय तक एंटीबायोटिक दवाएं लेने की सलाह दी गई उन्हें अन्य लोगों की तुलना में टाइप-2 डायबिटीज होने का खतरा 53 प्रतिशत अधिक था।

अध्ययन के लिए लगभग दो लाख एेसे मरीजों को शामिल किया गया जो 15 सालों से भी अधिक समय से एंटीबायोटिक ले रहे थे और 13 लाख एेसे लोगों को भी इसका आधार बनाया गया जिन्हें डायबिटीज नहीं थी। स्टडी में डायबिटीज होने का रिस्क उन लोगों में अधिक पाया गया जिन्हें एंटीबायोटिक दवाएं दी गई थीं। यह शोध भारत के लिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहां डायबिटीज के मरीज अधिक हैं।

बुखार, खांसी या जुकाम होने पर एंटीबायोटिक्स से परहेज करना चाहिए। इनका बार-बार इस्तेमाल करने से डायबिटीज का खतरा 53 फीसदी तक बढ़ जाता है।दुनियाभर में सबसे ज्यादा डायबिटीज के मरीज भारत में हैं। ऐसे में हमें एंटीबायोटिक्स पर काफी गंभीरता से विचार करना होगा।


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जानें मानसिक रोगों से जुड़े भ्रम और सच्चाई


शराब या अफीम जैसे पदार्थों के नशे से रोगी कुछ समय के लिए रोग के लक्षणों को भूल अवश्य जाता है लेकिन भविष्य में उसकी बीमारी के लक्षण अधिक तीव्र होकर सामने आते हैं।

भ्रांति : मानसिक रोगों का उपचार केवल बाबाओं व तांत्रिकों द्वारा ही संभव है।
तथ्य : मानसिक रोगों का उपचार तांत्रिकों, बाबाओं आदि के पास नहीं होता, बल्कि वे महज हमारी भावनाओं व आस्था का अनावश्यक फायदा उठाते हैं। सही पहचान और उचित मार्गदर्शन से मनोचिकित्सक मनोरोगों का उपचार करने में सक्षम होता है।

भ्रांति : सभी मानसिक रोगों में उम्रभर दवा लेनी पड़ती है।
तथ्य : बहुत कम रोगियों को लंबे समय तक उपचार लेना पड़ता है। लेकिन मानसिक परेशानी के अलावा ऐसे कई शारीरिक रोग जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, अस्थमा भी हैं जिनमें लंबे समय तक या ताउम्र दवा लेनी पड़ सकती है। रोगी इन बीमारियों की चिकित्सा में खुद को प्रताडि़त महसूस नहीं करता।

भ्रांति : इलेक्ट्रिक शॉक थैरेपी घातक चिकित्सा है। इससे रोगी की याददाश्त चली जाती है।
तथ्य : मानसिक रोगों में दी जाने वाली विद्युत चिकित्सा विधि कुछ प्रकार के गंभीर मनोरोगों जैसे उन्माद व आत्महत्या का विचार रखने वाले अवसाद के रोगियों में आश्चर्यजनक परिणाम लाती है। इस चिकित्सा में व्यक्ति की याददाश्त पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कुछ रोगी 24-36 घंटे तक के लिए कुछ भूल भले ही सकते हैं। विद्युत चिकित्सा कुछ विशेष प्रकार के मनोरोगों में अत्यधिक प्रभावी व सुरक्षित चिकित्सा है।

भ्रांति : मनोरोगी की संतान भी मनोरोगी ही होती है।
तथ्य : यह पूर्ण सत्य नहीं है। कुछ मनोरोगों में आनुवांशिक कारणों से बच्चों में इसकी आशंका हो सकती है। लेकिन उचित पारिवारिक वातावरण से इससे बचा जा सकता है।

भ्रांति: मनोरोग होने पर व्यक्ति की बुद्धि घट जाती है।
तथ्य : मनोरोग होने पर व्यक्ति की बुद्धि के स्तर में गिरावट नहीं आती, बल्कि उसके विचारों में परिवर्तन आता है। इन्हीं परिवर्तन से वह कुछ अजीब बातें अथवा हरकतें करता है।

भ्रांति : एक बार मनोरोग होने पर रोगी सदैव इससे पीड़ित रहता
है। इसका पूर्ण उपचार संभव नहीं है।
तथ्य : वक्त के साथ मनोचिकित्सा विज्ञान में भी बहुत से परिवर्तन हुए हैं। आज कई तरह की नई औषधियों व चिकित्सा विधियों का विकास हो चुका है, जो मानसिक रोग के मरीज को प्रभावी तरीके से ठीक कर देती हैं।

भ्रांति : अवसाद, अकारण भय (फोबिया), चिंता आदि में शराब, अफीम आदि का सेवन रोग से मुक्ति दिलाता है।
तथ्य : इन पदार्थों से नशा करने के कारण रोगी चिंता के लक्षण कुछ समय के लिए अवश्य भूल जाता है लेकिन भविष्य में यह लक्षण और अधिक तीव्र होकर उभरते हैं। जिसे रोगी पुन: अधिक सेवन करके ठीक करने का प्रयास करता है। इस प्रकार मरीज धीरे-धीरे अपने मनोरोगों के अलावानशे का रोगी भी बनने लगता है।

भ्रांति : यदि परिवार के एक सदस्य को मानसिक रोग हो जाए तो घर के अन्य लोगों को भी हो जाता है।
तथ्य : मनोरोग कोई संक्रामक रोग नहीं है जो एक व्यक्तिको होने पर दूसरे को भी हो जाए। यह व्यक्तिमें आनुवांशिक, दूषित वातावरण के प्रभाव तथा जीवन में घटित दबावपूर्ण व तनावपूर्ण घटनाओं के मिले-जुले प्रभाव के कारण होता है।

भ्रांति : अत्यधिक लाड़-प्यार व रोगी को कुछ न कहने से वह ठीक हो जाता है।
तथ्य : दोनों ही प्रकार के व्यवहार मनोरोगी के लिए सही नहीं होते। इसके लिए जरूरी है कि परिवार वाले मनोरोगी के साथ सामान्य व्यवहार अपनाएं।


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जानिए महिलाओं में अनिद्रा से जुड़ी इन खास बातों के बारे में


नींद न आना, बार-बार टूटना, गहरी नींद की कमी आदि अनिद्रा के लक्षण हैं। अनिद्रा किसी भी आयुवर्ग के लोगों में हो सकती है लेकिन महिलाओं में यह समस्या पुरुषों के मुकाबले ज्यादा देखी गई है। कई बार उम्र के साथ भी यह परेशानी बढ़ जाती है। ऐसे में थकान व व्याकुलता महसूस होती है जिसका सीधा असर न केवल दिनभर के कामकाज पर पड़ता है बल्कि कई अन्य तरह की परेशानियां भी घेर सकती हैं।

कारण : तनाव, शारीरिक व मानसिक रोग, अनियमित जीवनशैली और डर आदि।

गर्भावस्था व मासिक धर्म में : इस दौरान हार्मोन में बदलाव होता है, ऐसे में नींद न आने की समस्या ज्यादातर महिलाओं के सामने आती है। कई बार मासिक धर्म से पहले भी महिलाओं में नींद न आने, नींद के बार-बार टूटने, डर लगने, उठने-बैठने में तकलीफ व दिन में नींद की झपकी आने की शिकायत देखी जाती है। इसी तरह गर्भावस्था के पहले तीन माह के दौरान महिलाएं जहां अधिक नींद की जरूरत महसूस करती हैं और उनमें दिन में सोने की इच्छा रहती है, वहीं अंतिम तीन महीनों में कई बार तनावग्रस्त होने से बार-बार पेशाब आना, छाती में जलन, दर्द, डर, बेचैनी, पैरों में दर्द आदि लक्षण आ जाते हैं। इस वजह से उनका ज्यादातर समय जागते हुए बीतता है और वे सुबह थका हुआ महसूस करती हैं।

बढ़ती उम्र में : उम्र बढ़ने के साथ ही शरीर के हार्मोन में बदलाव होता है। इससे अक्सर गहरी नींद की कमी हो जाती है। कई बार मैनोपॉज के दिनों के आसपास भी महिलाएं कम सोती हैं, बार-बार रात में उठती हैं और सुबह खुद को स्वस्थ महसूस नहीं कर पातीं।

उपाय यह -
सोते समय कमरे में अंधेरा या मंद रोशनी रखें।
बिना किसी कारण के चिंता या भय मन में न आने दें।
सोने से पहले हल्का भोजन करें व शराब, सिगरेट व कॉफी जैसे पदार्थों से पूरी तरह दूरी रखें।
अगर नींद न आने की वजह कोई शारीरिक या मानसिक परेशानी है तो उसका उपचार तुरंत करवाएं।


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