Patrika : Leading Hindi News Portal - Disease and Conditions #educratsweb
HOME | LATEST JOBS | JOBS | CONTENTS | STUDY MATERIAL | CAREER | NEWS | BOOK | VIDEO | PRACTICE SET REGISTER | LOGIN | CONTACT US

Patrika : Leading Hindi News Portal - Disease and Conditions

http://api.patrika.com/rss/disease-and-conditions 👁 798

हर बार डॉक्टर से फोन पर न पूछें दवाइयां


इमरजेंसी में तो यह बात समझ में आती है कि आपने डॉक्टर को फोन करके तात्कालिक राहत के लिए दवा और उपचार के बारे में पूछ लिया। लेकिन कुछ लोग बुखार, चोट, घबराहट, सीने में दर्द या अन्य तरह के दर्द के लिए डॉक्टर को दिखाने के लिए जाने से कतराते हैं और अपने फैमिली फिजिशियन से फोन पर ही दवाएं पूछ लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार फोन पर इलाज लेना तब ठीक रहता है जब डॉक्टर आपकी मेडिकल हिस्ट्री पहले से जानते हों। उस स्थिति में भी दवाएं 1-2 बार ही लेनी चाहिए, उसके बाद फौरन डॉक्टर से मिलें।

सिम्टोमेटिक ट्रीटमेंट -
फोन पर बताए गए इलाज को सिम्टोमेटिक ट्रीटमेंट कहते हैं जिसमें डॉक्टर मरीज की उम्र व उसके बताए लक्षणों जैसे सीने में दर्द, हाथ-पैरों का सुन्न होना, सांस लेने में दिक्कत होना, चक्कर आना, दौरे पड़ना आदि के आधार पर ये बताते हैं कि मरीज को डॉक्टर के पास ले जाने तक क्या-क्या एहतियात बरतनी चाहिए लेकिन इस दौरान डॉक्टर किसी भी तरह की दवाएं नहीं बताते।

रिपोर्ट संभालकर रखें -
रात बे रात या डॉक्टर तक न पहुंच पाने की स्थिति में फौरन राहत के लिए भले ही एक्सपर्ट से दवा पूछ ली हो लेकिन अगले दिन जब भी उन्हें दिखाने जाएं तो अपनी पुरानी मेडिकल रिपोर्ट भी साथ लेकर जाएं। अक्सर लोग ऐसी मेडिकल रिपोर्ट संभालकर रखने को तवज्जो नहीं देतेे जिसमें चीजें नॉर्मल आई हों। लेकिन इन्हें रखना जरूरी होता है क्योंकि डॉक्टर पिछली और मौजूदा रिपोर्ट का मिलान कर यह पता लगाते हैं कि अब बीमारी के हिसाब से लाइन ऑफ ट्रीटमेंट क्या रखना है।

सही माप जानना जरूरी -
आजकल लोग घर पर ही ब्लड प्रेशर नापने के लिए इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस खरीद लाते हैं। लेकिन इनके साथ प्रामाणिकता का मुद्दा रहता है। जब मरीज इन उपकरणों से बीपी नापकर डॉक्टर से फोन पर दवाएं पूछते हैं तो वे ज्यादा प्रभावी नहीं होतीं। बीपी, डायबिटीज या थायरॉइड ऐसी बीमारियां है जिनकी सही माप जाने बिना डॉक्टर के लिए दवाएं देना संभव नहीं होता। इन समस्याओं में फोन पर दवाएं लेने की बजाय डॉक्टर को दिखाना ही ठीक रहता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/do-not-ask-doctor-on-the-phone-about-medicines-4011860/

B Alert - ब्लू बेबी लक्षणों की शीघ्र पहचान जरूरी


नवजात शिशुओं और नन्हे बच्चों में आम जन्मजात विकार उसके दिल से जुड़ा होता है। शिशु के जन्म के बाद बाल रोग विशेषज्ञ बच्चे के दिल की जांच करते हैं कि उसमें से बुदबुदाहट जैसी मंद ध्वनि तो नहीं आ रही? शक होने पर ईको कार्डियोग्राम किया जाता है। यदि गड़बड़ पाई जाती है, तो अक्सर वह दिल की ऐसी स्थिति होती है जिसमें तुरंत इलाज या सर्जरी की जरूरत नहीं होती। लेकिन कभी-कभी ऐसी गड़बड़ी होती है कि तुरंत हस्तक्षेप या सर्जरी करनी पड़ती है।

दिल में छेद
मुख्यत: दो किस्म के हृदय रोग होते हैं। एक वे जिसमें बच्चे के शरीर का रंग नीला पड़ने लगता है और दूसरा जिसमें उसके रंग में बदलाव नहीं होता। वे सभी स्थितियां जिनमें शिशु नीला पड़ जाता है, उनमें सर्जिकल इलाज की जरूरत होती है। वहीं दूसरी स्थिति में बैलून एंजियोप्लास्टी या डिवाइस क्लोजर से भी ठीक किया जा सकता है। दिल में छेद होना सबसे सामान्य है। बड़ी विकृतियों में सर्जरी की जरूरत पड़ती है। दिल में पृथक छेद वेंट्रीक्यूलर (दिल के निचले हिस्से में मौजूद कोष्ठक) या एट्रियल (दिल के ऊपरी हिस्से में मौजूद प्रकोष्ठ) हो सकता है जिसके लिए इलाज की जरूरत पड़ती है। जैसे वयस्कों में स्टंट लगाकर उपचार किया जाता है उसी तरह शिशुओं मे इस समस्या को खत्म करने के लिए एंजियोप्लास्टी तकनीक का प्रयोग किया जाता है।

यह स्थिति है घातक
- बच्चे का बहुत ज्यादा नीला पड़ जाना।
- बच्चे का ब्लड प्रेशर बहुत ज्यादा कम होना।
- लगातार तेज सांस चढ़ना या फिर सांस लेने में परेशानी होना।
यह बहुत ही खतरनाक बीमारी है जो जीवन में खतरे का संकेत देती है। यह एक दिल की इलेक्ट्रिकल समस्या है। छोटा बच्चा अपनी समस्या को बताने में सक्षम नहीं होता है। इसलिए माता-पिता को अपने बच्चे की असहजता से जुड़े लक्षणों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।


ट्यूब की अदला-बदली
बच्चों के दिल में छेद से जुड़ी ही एक समस्या है निचले चौबर (प्रकोष्ठ) में छेद होना जिसे वेंट्रीक्यूलर सैप्टल डिफेक्ट (वी.एस.डी.) कहते हैं। ऊपरी एट्रियल सैप्टल डिफेक्ट (ए.एस.डी.) और निचले वी.एस.डी के बीच मौजूद दीवार लाल रक्त को नीले रक्त से अलग करती है। छेद की वजह से फेफड़ों में रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है। इससे बच्चे को छाती में संक्रमण ज्यादा होता है, बच्चे का वजन बढऩा परेशानी बन जाता है। यदि दिल में छेद होने के साथ फेफड़ों की ओर होने वाले रक्त प्रवाह में रुकावट हो तो यह बच्चे के नीला पडऩे की दूसरी आम स्थिति है। इन परिस्थितियों में सर्जरी की आवश्यकता होती है। अन्य विकार जिनमें बच्चा नीला पड़ जाता है, उसमें फेफड़ों से ऑक्सीजन युक्त खून नीले रक्त में बदलने लगता है या दिल से लाल व नीला रक्त लेकर आने वाली ट्यूब की अदला-बदली हो जाती है।

नजर आने वाले लक्षण
- बच्चा फीड लेने में बहुत देर लगाए। फीड लेते हुए बच्चे को पसीना आए या फीडिंग के बावजूद उसका वजन न बढ़े।
- तेजी से सांस लेना।
- कभी-कभार बच्चा एकदम से नहीं बल्कि धीरे-धीरे नीला पडऩे लगता है और उस स्थिति में पहुंच जाता है कि किसी तरह की कोई हरकत भी नहीं करता।
- कभी-कभी बच्चे की हालत गंभीर हो जाती है। यह नवजात आयु वर्ग के समूह में अधिक होता है।

प्रेग्नेंसी में ही जांच
वर्तमान टेक्नोलॉजी से गर्भस्थ शिशु के हृदय रोग की जांच गर्भावस्था के 18वें हफ्ते में की जा सकती है। इस टेस्ट को फेटल ईको कार्डियोग्राम कहते हैं। इस टेस्ट के लिए विशेष हार्ट अल्ट्रासाउंड मशीनें इस्तेमाल की जाती हैं और इसमें एस.टी.आई.सी. या फेटल नेविगेशन जैसे हाईटेक फीचर होते हैं। एक बार डायग्नोस होने के बाद परिवार को भावी इलाज के लिए परामर्श दिया जाता है और अगर स्थिति ऐसी हो कि इलाज में मुश्किल आए तो उस हिसाब से प्रेग्नेंसी को लेकर उचित सलाह दी जाती है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/quick-identification-of-blue-baby-signs-is-important-4007455/

डाॅॅॅक्टर ही नहीं नाखून भी बता देते हैं आपकी सेहत का हाल


अमरीका में हुए शोध के अनुसार यह प्रमाणित हो चुका है कि नाखूनों को देखकर बीमारियों का अंदाजा लगाया जा सकता है। जैसे सफेद रंग के नाखून लिवर संबंधी रोगों जैसे हेपेटाइटिस, पीले नाखून फेफड़े संबंधी, आधे सफेद और आधे गुलाबी नाखून गुर्दे से संबंधित बीमारियों के संकेत देते हैं। यदि नाखूनों का रंग पीला है या उनकी परत सफेद है तो यह शरीर में खून की कमी का लक्षण है।

नाखून देते हैं स्वास्थ्य का संकेत
कमजोर नाखून :
कमजोर या नाजुक नाखून शरीर में कैल्शियम की कमी को दर्शाते हैं। अगर ये सूखे हों या बहुत जल्दी टूट जाएं, तो आपको थायराइड की समस्या हो सकती है।

उभारयुक्त नाखून :
आपको किडनी से संबंधित बीमारी हो सकती है। ये विटामिन ए और प्रोटीन की कमी को भी दर्शाते हैं।

नाखूनों में पीलापन :
आपको सांस संबंधी समस्या, क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस हो सकती है। इस स्थिति में नाखून मोटे हो जाते हैं और उनकी वृद्धि रुक जाती है।

गहरे किनारे के सफेद नाखून :
ऐसे नाखून पीलिया की निशानी हो सकते हैं। इस अवस्था में लीवर में शिकायत हो सकती है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/know-what-nail-colours-tells-you-about-your-health-4007152/

'लीच थैरेपी' से शरीर का दूषित रक्त दूर कर किया जाता है कई बीमारियों का इलाज


यूनानी चिकित्सा पद्धति में लीच थैरेपी के जरिए कई बीमारियों का इलाज किया जाता है। इसमें मेडिसिनल लीच (एक प्रकार की जोंक) से रोग दूर किए जाते हैं। इस जोंक की लार में 100 से ज्यादा जैविक तत्व होते हैं जो एंटीबायोटिक, दर्दनाशक व रक्त धमनियों को खोलने वाले होते हैं।

उपयोगी : जोड़ों का दर्द, त्वचा, कान, नाक व गले संबंधी रोग, डायबिटीज से पैरों में हुए जख्म, पाचन क्रिया व रक्तसंचार में गड़बड़ी, कफ व गंजेपन के लिए।

थैरेपी : शरीर के जिस हिस्से में यह थैरेपी करनी होती है वहां जोंक को छोड़ दिया जाता है। दूषित रक्त चूसने के बाद जोंक त्वचा से खुद ही अलग हो जाती है। इसमें मरीज को दर्द नहीं होता बल्कि जोंक के रैंगने का अहसास होता है।

उपचार - इस थैरेपी में इलाज एक से डेढ़ महीने तक चलता है जिसमें हफ्ते में 1-3 बार डॉक्टर को दिखाना पड़ता है। लंबी बीमारी में 3-4 माह तक इलाज चलता है। इस पद्धति में उपचार के बाद अक्सर रोगी को शरीर में खुजली महसूस होने लगती है जो 3-4 दिन में खुद ही ठीक हो जाती है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/know-about-leech-therapy-4002539/

साइटिका यानी दबे पांव आने वाला खतरनाक दर्द, जानें इसके बारे में


अनियमित जीवनशैली और उठने-बैठने के गलत तरीकों के कारण होता है साइटिका। ऐसे लोग जिन्हें पहले से पीठ का दर्द है, उन्हें साइटिका (शियाटिका) होने की आशंका ज्यादा होती है। साइटिका का दर्द आमतौर पर शरीर के आधे हिस्से में ज्यादा परेशान करता है।

क्या है साइटिका ?
नसों में खिंचाव और दर्द संबंधी समस्या को साइटिका कहा जाता है। जो कूल्हों और जांघ के पिछले हिस्से में होती है। यह दर्द तब शुरू होता है, जब कूल्हे की साइटिक नस को क्षति पहुंचती है। इसलिए इसे साइटिका का दर्द कहा जाता है। लोअर बैक पैन की तुलना में इस दर्द में पैरों में असहनीय खिंचाव और पीड़ा होती है। साइटिका के साथ पैरों में होने वाली अकड़न और झनझनाहट पीड़ा को और ज्यादा बढ़ा देती है। साइटिका अगर गंभीर हो जाए तो खड़े रहना और चलना मुश्किल हो जाता है।

क्या है साइटिका के कारण ?
'डिस्क हर्निएशन'
यह सबसे प्रमुख कारण है और सामान्य बोलचाल की भाषा में इसे 'स्लिप डिस्क' कहते हैं।
स्पाइनल स्टेनोसिस
बढ़ती उम्र और दुर्घटनाओं के कारण स्पाइनल कॉर्ड या इससे आने वाली नसों में तनाव के कारण यह समस्या होती है।
बढ़ती उम्र के कारण हड्डियां कमजोर पड़ने लगती हैं और उनमें टूट-फूट की आशंका होती है। इसके अलावा उठने-बैठने की गलत मुद्राएं और खराब जीवनशैली भी इसका प्रमुख कारण है।

 

कुछ उदाहरण-
चीजों को गलत ढंग से झुककर उठाना
लंबे समय तक बैठे रहना/लंबे समय तक ड्राइविंग करना
मोटापा बढ़ना

 

धूम्रपान -
कभी गलती से कोई इंजेक्शन कूल्हे पर लगाया जाए और वह साइटिक नस को प्रभावित करे।
ऐसे काम करना जिसमें हाथ-पैरों को झुकाना, खींचना, मोड़ना या घुमाना आदि शामिल है।
आपको कब डॉक्टर से सम्पर्क करना चाहिए ?

आपको तुरंत सम्पर्क करना चाहिए यदि...
कमर के निचले हिस्से या पैरों में अचानक तेज दर्द हो और साथ में अकड़न या खिंचाव महसूस हो।
यदि आपको पेट में या ब्लैडर की परेशानी हो।
किसी दुर्घटना के कारण पैरों के निचले हिस्से में चोट लगने पर।

वैकल्पिक उपाय -

प्रमुख योगासन - भुजंगासन, मकरासन, मत्स्यासन, क्रीडासन, वायुमुद्रा और वज्रासन।

एपीड्यूरल इंजेक्शन : साइटिका में एपीड्यूरल इंजेक्शन के एक कोर्स से राहत मिल सकती है। इस थैरेपी में रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले जोड़ के पास नसों में इंजेक्शन लगाया जाता है जो जोड़ के क्षतिग्रस्त होने के कारण नसों में आयी सूजन को कम करता है। जिससे स्पाइनल कैनाल का व्यास बढ़ने से नसों के रक्त संचार में बढ़ोतरी होती है और मरीज को असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिलती है।

एक्यूप्रेशर : इस रोग का एक एक्यूप्रेशर बिन्दु टखने के नीचे होता है। यह केंद्र संवेदनशील होता है इसलिए रोगी की सहनशक्ति के अनुसार प्रेशर देना चाहिए। पैरों की सारी अंगुलियों विशेषकर अंगूठे के साथ वाली दो अंगुलियों पर मालिश की तरह प्रेशर देने से तुरंत आराम मिलता है। रोगी के पिछले भाग में व पिण्डलियों पर उल्टे लिटा कर हाथ के अंगूठे से प्रेशर देने से भी जल्द आराम मिलता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/learn-about-sciatica-4001467/

इन खास टिप्स काे अपनाकर ड्राई आई सिंड्रोम से बच सकते हैं आप


लगातार कम्प्यूटर मोबाइल जैसे डिजिटल मीडियम पर काम करने से आंखों में ड्राई आई सिंड्रोम की समस्या हो जाती है। आंखों को लंबे समय तक पूरी नमी न मिले तो उनमें खुजली और पानी आना जैसी समस्या होने लगती है। इसे ड्राई आई सिंड्रोम कहते हैं।हॉर्मोंस में बदलाव की वजह से महिलाओं में यह दिक्कत ज्यादा होती है। यह दिक्कत ज्यादा होती है।नेत्र रोग विशेषज्ञाें के अनुसार लंबी सिटिंग में थोड़ी देर के बाद आंखों में पानी के छींटे देंं। खाने में हरी सब्जियां, फल और दूध लें। कम्प्यूटर पर काम करते समय पलकें झपकाते रहें। कम्प्यूटर स्क्रीन पर एंटीग्लेयर स्क्रीन लगाएं। कम्प्यूटर की स्क्रीन से आपकी आंखें कुछ दूरी पर हों क्योंकि कम्प्यूटर का आंखों पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

ड्राई आई सिंड्रोम के लक्षण
- आंख का लाल हो जाना
- धुंधलापन होना
- रोशनी में आंख खुलने में दिक्कत
- आंखों में खुजली
- बहुत ज्यादा पानी आना

समस्या के कारण
- डिजिटल डिवाइसों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल
- बहुत ज्यादा किताबें पढ़ना
- लगातार एसी में रहना
- लगातार कॉन्टैक्ट लेंस पहनना
- कुछ दवाएं जैसे कि बर्थ कंट्रोल पिल्स, एलर्जी की दवाएं, बीटा ब्लॉकर, डाययूरेटिक्स
- ऐसा भोजन खाना जिसमें फैटी एसिड्स न हों
- आंसू बनाने वाले ग्लैंड्स न होना
- लेसिक सर्जरी होना

ऐसे करें समाधान
- कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी या टैबलट को देखते हुए हर 5 सेकंड में पलक झपकाएं।
- आंखों को रगड़ें नहीं, इससे आंख को नुकसान हो सकता है।
- अगर किसी दवा को खाने या डालने से परेशानी लग रही है तो उसके बारे में डॉक्टर से राय लें।
- आंखों में नमी बनाए रखने के लिए अच्छे ब्रैंड की लुब्रिकेटिंग ड्रॉप्स डालें।
- कॉन्टैक्ट लेंस साफ रखें और उन्हें हमेशा पहने न रखें।
- कोशिश करें कि आंखों पर सीधी हवा न लगे।
- हेल्दी खाना खाएं, ज्यादा साबुत अनाज, दूध, फल-सब्जियाें का सेवन करें।
- डॉक्टर की सलाह के बगैर आंख में कोई भी दवा न डालें।
- आंख की कोई दवा खोलने के महीने भर में खत्म कर लें। महीना बीत जाने पर इस्तेमाल न करें।
- बहुत स्वीमिंग के दौरान चश्मा जरूर पहनें और कोशिश करें कि आंखों में पानी न जाए।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/follow-these-special-tips-to-avoid-dry-eye-syndrome-4000865/

मस्तिष्क की सुरक्षा के लिए कारगर है क्रेनियोप्लास्टी


हादसा, बीमारी या संक्रमण होने पर सिर के कपाल (स्कल बोन) के ऑपरेशन के दौरान इसमें छेद छोड़ा जाता है। इस छेद (विंडो) को भरने के लिए कुछ समय बाद फिर से ऑपरेशन किया जाता है, इसे के्रनियोप्लास्टी कहते हैं। जो कि मस्तिष्क की हिफाजत के लिए जरूरी होती है। इससे पता भी नहीं चलता कि कभी मरीज का ऑपरेशन भी हुआ था। सिर में चोट लगने के बाद हुए डिफेक्ट को दूर करने के लिए क्रेनियोप्लास्टी का सही समय 3-6 माह है। क्रेनियोप्लास्टी मैटीरियल्स के प्रमुख प्रकार इस तरह से हाेते हैं :-

कैल्शियम फास्फेट बोन सीमेंट:
फायदे: यह स्कल बोन के साथ मिल जाता है व वृद्धि करने की क्षमता भी रखता है। इससे इंफ्लेमेट्री रिएक्शन नहीं होता है।
नुकसान: इसे शेप या आकार देने में मुश्किल होती है और यह कमजोर होता है।

मिथाईल मिथएक्रीलेट:
यह एक्रीलिक एसिड का पोलीमराइज्ड इस्टर है, जो पाउडर के रूप में होता है। इसे पहले बेन्जोइल पर ऑक्साइड के साथ मिलाकर गुंथे हुए आटे जैसी स्थिति में लाया जाता है, जिस शेप का डिफेक्ट होता है ये वैसी शेप लेने में सक्षम होता है। यह 10-15 मिनट बाद हड्डी जैसा सख्त हो जाता है।
फायदे: सर्जन द्वारा प्रयोग करने में आसानी, बढिय़ा आकार, कम खर्च।
नुकसान: इन्फेक्शन व फे्रक्चर होने का खतरा अधिक रहता है। निर्जीव होने के कारण उम्र के साथ वृद्धि नहीं करता, इंफ्लेमेट्री रिएक्शन का खतरा रहता है।

टाइटेनियम मेश:
इससे बनी हुई जाली डिफेक्ट पर माइक्रो स्कू्र की मदद से लगा दी जाती है।
फायदा: रिएक्शन नहीं होता और इंफेक्शन कम होता है।
नुकसान: खर्चा अधिक होता है, आकार देने में मुश्किल होती है और यह समय के साथ ढीली हो जाती है।

ऑटोलोगस बोन
इसमें मरीज के खुद की कपाल को मरीज के पेट (एबडोमिनल वॉल) में पहले ऑपरेशन के दौरान रख दिया जाता है। तीन से चार महीने के बाद यही हड्डी फिर से अपनी जगह पर स्थापित कर दी जाती है।
फायदा : खुद की कपाल सजीव रहती है और इसमें वृद्धि करने की क्षमता भी होती है।
नुकसान : पेट में पड़ी रहने से यह बोन अक्सर छोटी हो जाती है, इंफेक्शन का खतरा अधिक रहता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/cranioplasty-is-effective-for-the-protection-of-brain-3996549/

कमजाेर है नजर ताे इस तरह से पकड़ें पेन, जल्द मिलेगा फायदा


अगर कभी ऐसा अंदेशा हो कि आपको एक आंख से कुछ कम दिखने लगा है तो सचेत हो जाएं। एक आंख कमजोर हो या उससे कम दिखे और उस की सही देखभाल न की जाए तो नजर दोष बढ़ जाता है।

इसलिए होता है ऐसा :
पोषक तत्वों की कमी, एक आंख में ट्यूमर होने, आंख के लेंस में गड़बड़ी, मोतियाबिंद या कोई चोट लगने से भी हो सकता है।

व्यायाम से लाभ: नाक की सीध में पेन या पैंसिल पकड़ें। पेन की नोक पर नजर टिकाकर उसे फिर धीरे-धीरे नाक के पास लगभग 10 सेंटीमीटर दूर तक ले आएंं। जिस आंख से ठीक दिख रहा है, उसे हाथ से बंद करके जिससे कम दिख रहा है उसे देखें। इस प्रक्रिया को 10 बार दोहराएं। यह एक्सरसाइज दिन में दो से तीन बार की जा सकती है।

जरूरी है जांचें
बचपन में कई बार माता-पिता बच्चों की आंख संबंधी परेशानी की शिकायत पर ध्यान नहीं देते। इसलिए कई बार उन्हें पता ही नहीं चलता कि बच्चे की एक आंख कमजोर है। ऐसे में सही नजर वाली आंख पर देखने का सारा दारोमदार आ जाता है और दूसरी आंख हमेशा के लिए सुस्त हो जाती है इसे एंबायलोपिया कहते हैं। इसलिए आंखों की जांच तीन साल की उम्र में जरूर करानी चाहिए, फिर हर दो साल के बाद आंखों की जांच कराते रहना चाहिए। डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर होने पर हर साल आंखों की जांच कराएं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/do-jump-convergence-for-better-eyesight-3996247/

पीपल के ताजा हरे पत्ते शरीर की कई समस्याओं में आते हैं काम, एेसे करें इस्तेमाल


पीपल के पत्ते सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं। जानते हैं इनके फायदों के बारे में।

हृदय रोग : इसके तीन ताजा पत्तों के आगे-पीछे के कोनों को तोड़कर रोज सुबह खाली पेट चबाने से खून साफ होता है। ये धमनियों में जमे हुए कोलेस्ट्रॉल को दूर कर ऑक्सीजन का संचार करते हैं।

बुखार : इसके तीन ताजा पत्ते एक गिलास पानी में उबालें, पानी जब आधा रह जाए तो गुनगुना होने पर पी लें। तेज बुखार में ऐसा दिन में 2-3 बार करने से लाभ होता है।

खुजली : पीपल की कुछ पत्तियों को घिसकर दिन में 3-4 बार खुजली या कीड़े के काटने वाली जगह पर लगाने से आराम मिलता है।

ध्यान रहें ये बातें -
पीपल को उपयोग में लेने से एक घंटा पहले और बाद में कुछ न खाएं। इसकी तासीर गर्म होती है इसलिए इसके प्रयोग के बाद जंक फूड, तली-भुनी व मसाले वाली चीजें न खाएं। साफ व धुले हुए पीपल के बड़े पत्तों से बनी पत्तल पर रखे भोजन को खाने से शरीर को ऑक्सीजन और एंटीऑक्सीडेंट मिलते हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/peepal-s-fresh-green-leaves-benefits-3996190/

क्या आवाजें सुनकर बेचैन हो जाते हैं आप ? कहीं आपको भी तो नहीं ये बीमारी


कुछ लोगों को किसी भी तरह के शोर से अक्सर चिढ़ होती है। शोर हुआ नहीं कि उन्हें गुस्सा आने लगता है। अपना आपा खोकर वे कई बार आसपास के किसी व्यक्ति या लोगों के साथ मारपीट भी कर बैठते हैं। दरअसल यह एक प्रकार की मानसिक बीमारी है, जिसे मीजोफोनिया कहते हैं। आइए जानते हैं इसके बारे में।

यह है मीजोफोनिया -
यह एक साउंड डिसऑर्डर है। जिसमें मरीज किसी भी प्रकार की आवाज से बेचैन हो उठता है। जरूरी नहीं कि तेज आवाज से ही ऐसा होता हो। इस परेशानी में रोगी को खाना खाते समय आने वाली 'चप-चप' या पानी पीने की 'गट-गट' की आवाज से भी चिढ़ होती है। बर्तन गिरने, बढ़ई या मिस्त्री की ठक-ठक, जमीन पर कुछ रगड़ने और ट्रैफिक की आवाज भी परेशान करती है।

ऐसे होती है बेचैनी -
ट्रिगर अर्थात् जिस आवाज से समस्या होती है, उसे सुनते ही व्यक्ति काफी अलग तरह का व्यवहार करता है। उसकी सांसें तेज हो जाती हैं, चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है। वह अपने हाथ-पैर सिकोड़ने लगता है। ऐसी स्थिति होने पर व्यक्ति उस आवाज से काफी दूर अकेले में चला जाता है और घंटों एकांत में बैठा रहता है या फिर उन आवाजों से परेशान होकर आवाज करने वाले व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है। लेकिन आवाज खत्म होने के कुछ समय बाद व्यक्ति सामान्य हो जाता है।

इलाज व सावधानी -
इस बीमारी के इलाज के लिए मनोचिकित्सक से मिलें। इसका उपचार किसी दवा से नहीं बल्कि बिहेवियरल थैरेपी से किया जाता है। ट्रीटमेंट के साथ-साथ मरीज के घरवालों को भी उसे पूरी तरह से सहयोग करना चाहिए। उसकी इन हरकतों का बिल्कुल भी मजाक न उड़ाएं। इसके अलावा अगर आपको अपने किसी परिजन की ऐसी बीमारी के बारे में पता है तो कोशिश करें कि उसे ऐसी आवाजों का सामना न करना पड़े। अगर काम रोकना संभव न हो तो मरीज को कहीं दूर भेज दें।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/are-you-restless-when-you-hear-voices-3993175/

दांतों में इन तीन जगह पर लगते हैं कीड़े, एेसे करें इलाज


दांतों में कीड़े लगने की समस्या तब होती है जब जड़ों में लंबे समय तक खाने के अवशेष जमा रहते हैं। ये कीड़े दो दांतों के बीच, मसूड़ों के पास और उनकी जड़ों में लगते हैं। इस समस्या को दूर करने के लिए होम्योपैथी में कारगर दवाएं उपलब्ध हैं।

दांत की जड़ों में कीड़ा लगने पर होम्योपैथी दवा थूजा 30 पोटेंसी में दिन में 3 बार दी जाती है।
दो दांतों के बीच या किनारों में कीड़े लगना, दांत दर्द और गैप का कारण बन सकता है। इसके लिए स्टेफिसेग्रिया दवा 30 पोटेंसी में दिन में 3 बार लेनी होती है।
मसूड़ों के किनारों में कीड़े लगने पर थूजा व सिफीलिनम 30 पोटेंसी में दिन में 3 बार देते हैं।

कुल्ला करना जरूरी -
खाना खाने के बाद दांतों के बीच प्लाक 16 घंटे में बनता है इसलिए 12 घंटे के अंतराल में ब्रश कर लें। कुछ भी खाने के बाद कुल्ला करना न भूलें। यहां बताई गई दवाओं के प्रयोग से 5 मिनट पहले और बाद में कुछ न खाएं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/tooth-worms-treatment-3993023/

इस वजह से भी बह सकता है आपके बच्चे का कान, जानिए क्या


कान बहना एक आम समस्या है। किसी भी आयुवर्ग के लोग इससे पीड़ित हो सकते हैं। ज्यादातर मामलों में कान में संक्रमण, पर्दे में छेद या हड्डी में गलाव पाया जाता है। इसकी मुख्य वजह लंबे समय तक जुकाम बने रहना होता है। बच्चों में कई बार नाक के पीछे एडिनोइड्स के बढऩे से भी ऐसा होता है। नाक व कान के मध्य स्थित यूस्टेकियन ट्यूब के ठीक से काम न करने से भी कई समस्याएं होने लगती हैं।

इसके उपचार के क्या तरीके हैं?
इलाज रोग की दशा व कई बार मरीज की उम्र पर भी निर्भर करता है। शुरुआत में कुछ लोगों में सही इलाज से यह ठीक हो जाता है। लेकिन ज्यादातर में कान के पर्दे में छेद या हड्डी का गलाव ठीक करने के लिए सर्जरी करनी पड़ती है क्योंकि समय गुजरने पर पर्दे के छेद के सिरे स्थिर हो जाते हैं, जो दवाओं से नहीं भरते। दवा केवल कुछ समय के लिए मवाद बंद करती है। हड्डी में गलाव होने पर सर्जरी जरूरी हो जाती है।

लंबे समय तक कान बहने से क्या क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं?
जिन लोगों का कान लंबे समय से बहता है, उनमें हड्डी का गलाव इसके पास स्थित कई महत्वपूर्ण संरचनाओ को नुकसान पहुंचा सकता है। सुनाई कम देने के अलावा दिमाग में संक्रमण का खतरा रहता है, चेहरे की नस प्रभावित होने पर चेहरा टेढ़ा हो सकता है। चक्कर आ सकते हैं, कान के पास फोड़ा बन सकता है।

कान बहने वाले मरीजों को क्या क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
समय पर उचित इलाज लें। कान में कोई द्रव्य जैसे गर्म तेल आदि न डालें। नहाते समय कान में पानी न जाने दें, इसके लिए तेल से चिकनी की हुई रुई लगाई जा सकती है। जुकाम व एलर्जी को नियंत्रण में रखें और इन्हें बढ़ने न दें।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/adenoids-can-cause-middle-ear-infections-3992942/

Menopause - महिलाओं में मेनोपॉज से जुड़ी इन खास बातों को जरूर जानें


रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) महिलाओं के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है, जिसका सामना हर किसी को करना ही पड़ता है। भारतीय महिलाओं में औसतन 46 साल की उम्र में रजोनिवृत्ति हो जाती है। यह प्रजनन क्षमता के अंत का समय है। जब सेक्स हार्मोन कम होने के कारण मासिक रक्तस्राव बंद हो जाता है। लेकिन कई बार अप्राकृतिक रजोनिवृत्ति कम उम्र में भी हो जाती है, जिसके प्रमुख कारण हैं- ऑपरेशन (गर्भाश्य/अंडाश्य निकालने), कैंसर का इलाज या कीमोथैरेपी। कुछ महिलाओं में इस दौरान अन्य प्रतिकूल लक्षण भी हो सकते हैं।

मोटापे पर लगाम लगाएं -
रजोनिवृत्त महिलाओं में पेट के मोटापे के अलावा बढ़ती उम्र की अन्य बीमारियां जैस हार्ट अटैक, याददाश्त में कमी और स्तन कैंसर आदि हो सकते हैं। मोटापा कम करने के लिए कार्यशैली में परिवर्तन, कम कैलोरी का आहार और बेरियाट्रिक सर्जरी आदि मुख्य विकल्प हैं। मेनोपॉज के दौरान व्यायाम काफी उपयोगी होता है। एक्सरसाइज से मोटापे के अलावा हृदय रोग और ऑस्टियोपोरोसिस की आशंका कम हो जाती है। एक्सरसाइज से मूड बेहतर होता है और टेंशन कम होती है। इससे एंडोर्फिन एक्टिविटी बढ़ जाती है जिससे रात में सोने के दौरान आने वाला पसीना कम हो जाता है और महिलाएं ठीक से नींद नहीं ले पातीं। उचित डॉक्टरी सलाह और सही देखरेख से मेनोपॉजल हार्मोन थैरेपी का उपयोग कर डायबिटिज के जोखिम को कम किया जा सकता है। लेकिन 60 वर्ष की उम्र के बाद हार्मोन थैरेपी शुरू नहीं करनी चाहिए।

लक्षण -
अनियमित, अत्याधिक रक्तस्त्राव।
हॉट फ्लेशेज
रात को पसीना आना।
नींद से जुड़ी परेशानियां।
जोड़ों व मांसपेशियों में दर्द।
अचानक धड़कन का तेज हो जाना।
पेशाब का जल्दी- जल्दी आना।
मानसिक बदलाव जैसे - चिड़चिड़ापन या अवसाद, ध्यान न लगना, आत्म विश्वास में कमी।

डरें नहीं, समझें -
मेनोपॉज एक प्राकृतिक बदलाव है जिससे बचा नहीं जा सकता लेकिन इससे सम्बंधित बीमारियों से बचाव करके आयु दर और जीवन की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है। मेनोपॉज एक अवसर है जिसके दौरान सम्पूर्ण स्वास्थ्य जांच (मोटापा, डायबिटीज, ऑस्टियोपोरोसिस, आर्थराइटिस, मानसिक अवसाद, अल्जाइमर व कैंसर) कराकर भविष्य की बीमारियों से दूर रहा जा सकता है।

हार्मोन थैरेपी का प्रयोग -
मे नोपॉज के कारण शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी हो जाती है, जिससे शरीर के सभी अंग प्रभावित होने लगते हैं। इस प्रभाव को कम करने के लिए महिला को हार्मोन थैरेपी दी जाती है। इस थैरेपी में शरीर में जिस हार्मोन की कमी होती है, डॉक्टरी देखरेख में उसकी पूर्ति कराई जाती है ताकि भविष्य में होने वाली बीमारियों के खतरे को कम किया जा सके। आपकी उम्र 60 साल से कम है या मेनोपॉज को 10 साल से कम हुए हैं तो हार्मोन थैरेपी के फायदे ज्यादा और जोखिम कम हैं। रजोनिवृत्ति से जुड़ी हड्डियों की कमजोरी को दूर करने के लिए यह थैरेपी काफी उपयोगी होती है।

रजोनिवृत्ति के बाद रोगों से बचाव के लिए प्रथम दस वर्ष अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है जिसमें -
धूम्रपान बिल्कुल न करें
शराब से दूरी बनाएं
नियमित एरोबिक एक्सरसाइज करें
रेगुलर बैलेंस डाइट लें
वजन पर नियंत्रण रखें
दिमाग तेज करने वाली गतिविधियों में हिस्सा लें
विशेष समय अंतराल में आवश्यक जांचें कराएं

इस दौरान शारीरिक बदलावों की वजह से महिलाएं अक्सर अपने लुक को लेकर तनाव में आ जाती हैं। इससे बचने के लिए किताबें पढ़ें, बागवानी करें, घूमने जाएं, अपने पसंदीदा काम करें और किसी भी तरह की परेशानी को अपने साथी या दोस्त के साथ जरूर शेयर करें।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/learn-these-specific-things-related-to-menopause-in-women-3992830/

इस हार्मोन की कमी से कमजाेर हाेता है लाेगाें का गणित, जानिए क्या


ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि गर्भावस्था में अगर किसी महिला में थायरॉक्सिन हार्मोन का स्तर कम है तो उसकी होने वाली संतान गणित में कमजोर होगी। यह हार्मोन बच्चे के दिमागी विकास के लिए जरूरी होता है। शोधकर्ताओं ने 12 हफ्तों तक गर्भवती महिलाओं और बाद में बच्चों पर भी जन्म से लेकर पांच साल की उम्र तक शोध करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है।

थायरायड ग्रंथि गर्दन के सामने की ओर,श्वास नली के ऊपर एवं स्वर यन्त्र के दोनों तरफ दो भागों में बनी होती है। इसका आकार तितली की तरह होता है। एक स्वस्थ व्‍यक्ति में थायरायड ग्रंथि का भार 25 से 50 ग्राम तक होता है | यह ‘ थाइराक्सिन ‘ नामक हार्मोन बनाती है।

थायरायड ग्रंथि से थाईराक्सिन कम बनने की अवस्था को ‘हायपोथायराडिज्म’ कहते हैं, इस से निम्न रोग के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं -

- शारीरिक व मानसिक विकास धीमा हो जाता है।
- इसकी कमी से बच्चों में क्रेटिनिज्म (CRETINISM ) नामक रोग हो जाता है |
- 12 से 14 साल के बच्चे की शारीरिक वृद्धि रुक जाती है और 4 से 6 साल के बच्चे जितनी ही रह जाती है |
- शरीर का वजन बढ़ने लगता है एवं शरीर में सूजन भी आ जाती है |
- सोचने व बोलने की क्रिया धीमी हो जाती है।
- शरीर का ताप कम हो जाता है, बाल झड़ने लगते हैं तथा ‘गंजेपन’ की स्थिति आ जाती है |


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/thyroxine-hormone-in-balance-necessary-for-proper-brain-development-3989372/

स्वस्थ जीवनशैली व पोषक आहार से राेके जा सकते हैं मुंहासे


महिलाओं के चेहरे पर मुंहासे और बाल वर्तमान में एक आम समस्या बन गए हैं इससे उनका भावनात्मक तनाव और अवसाद की चपेट में आने का खतरा रहता है। इस समस्या को पॉलीसिस्टिक ओवरियन सिन्ड्रोम (पीसीओएस) कहा जाता है, जिसका जल्दी ही उचित उपचार मिलने से भावनात्मक तनाव कम हो सकता है।

पॉलीसिस्टिक ओवरी सिन्ड्रोम वास्तव में एक मेटाबोलिक, हार्मोनल और साइकोसोशल बीमारी है, जिसका प्रबंधन किया जा सकता है, लेकिन ध्यान नहीं दिये जाने से रोगी के जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। एक अध्यनन के मुताबिक, भारत में पांच में से एक वयस्क महिला और पांच में से दो किशोरी पीसीओएस से पीड़ित हैं। मुंहासे और हिरसुटिज्म पीसीओएस के सबसे बुरे लक्षण हैं।

पीसीओएस का प्रमुख लक्षण है हाइपरएंड्रोजेनिज्म, जिसका मतलब है महिला शरीर में एंड्रोजन्स (पुरुष सेक्स हॉर्मोन, जैसे टेस्टोस्टेरोन) की उच्च मात्रा। इस स्थिति में महिला के चेहरे पर बाल आ जाते हैं।

दिल्ली में ऑब्स्टेट्रिक्स एवं गायनेकोलॉजी की निदेशक व दिल्ली गायनेकोलॉजिस्ट फोरम (दक्षिण) की अध्यक्ष डॉ. मीनाक्षी आहूजा ने कहा, ''त्वचा की स्थितियों, जैसे मुंहासे और चेहरे पर बाल को आम तौर पर कॉस्मेटिक समस्या समझा जाता है। महिलाओं को पता होना चाहिए कि यह पीसीओएस के लक्षण है और हॉर्मोनल असंतुलन तथा इंसुलिन प्रतिरोधकता जैसे कारणों के उपचार हेतु चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।"

मुंहासे और हिरसुटिज्म के उपचार के बारे में डॉ. मीनाक्षी आहूजा ने कहा, पीसीओएस एक चुनौतीपूर्ण सिन्ड्रोम है, लेकिन जोखिमों का प्रबंधन करने के पर्याप्त अवसर हैं। पीसीओएस के बारे में बेहतर जागरूकता की आवश्यकता है, ताकि महिलाएं लक्षणों को पहचानें और सही समय पर सही मेडिकल सहायता लें।

उन्होंने कहा, ''स्वस्थ जीवनशैली, पोषक आहार, पर्याप्त व्यायाम और उपयुक्त उपचार अपनाने से पीसीओएस के लक्षण नियंत्रित हो सकते हैं। पीसीओएस के कारण होने वाला हॉर्मोनल असंतुलन उपचार योग्य होता है, ताकि मुंहासे और हिरसुटिज्म को रोका जा सके। गायनेकोलॉजिस्ट से उपयुक्त मेडिकल मार्गदर्शन प्रभावी उपचार के लिए महत्वपूर्ण है।"

देश में पांच से आठ प्रतिशत महिलाएं हिरसुटिज्म से पीड़ित हैं। हार्मोन के असंतुलन के कारण मुंहासे भी होते हैं और यह पीसीओएस का लक्षण है। यह दोनों लक्षण महिला की शारीरिक दिखावट को प्रभावित करते हैं और इनका उपचार न होने से महिला का आत्मविश्वास टूट जाता है और उनका अपने प्रति आदर कम होता है। मुंहासे से पीड़ित 18 प्रतिशत रोगियों में गंभीर डिप्रेशन और 44 प्रतिशत में एन्ग्जाइटी देखी गई है।

डॉ. आहूजा ने कहा, ''पीसीओएस से पीडि़त महिलाओं की भलाई सुनिश्चित करने के लिए समाज और परिवारों को साइकोलॉजिकल तनाव को समझने और साथ ही पूरे आत्मविश्वास के साथ दुनिया का सामना करने के लिए उन्हें सहयोग देने के लिए प्रयास करने की जरूरत है।"

उन्होंने कहा, ''अधिकांश महिलाओं को इन स्थितियों का बोध नहीं है और वे चिकित्सकीय मार्गदर्शन के बिना सामयिक उपचार लेती हैं, जिससे त्वचा खराब हो सकती है। यह जानना महत्वपूर्ण है कि अगर आप लक्षणों का उपचार नहीं करेंगे, तो मुंहासे और चेहरे पर बाल दोबारा आ जाएंगे।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/healthy-lifestyle-and-nutritional-supplements-can-be-prevented-by-acne-3988098/

इन तरीकों से दूर होगी आस्टियोआर्थराइटिस की समस्या


बुजुर्गों की बीमारी के नाम से जानी जाने वाली आस्टियोआर्थराइटिस के मामले अब 20 से 50 वर्ष की आयु वर्ग वाले लोगों में काफी बढ़ रहे हैं। घुटनों के जॉइंट के घिसने की आशंका मोटापे और जीवनशैली में गड़बड़ी से ज्यादा बढ़ जाती है। घुटनों को स्वस्थ रखने के लिए उठने-बैठने के तरीकों व व्यायाम के साथ विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

उठने-बैठने के तरीके -

अपने घुटनों को स्वस्थ रखने के लिए आपको सही तरीके से उठना-बैठना होगा, विशेष रूप से कार्यस्थल पर। आपको अपनी कुर्सी पर काफी ध्यान देना होगा। अगर आपकी कुर्सी बहुत नीची है तो घुटने हमेशा मुड़े रहते हैं, जो घुटनों के लिए अच्छा नहीं है। वहीं कुर्सी बहुत ऊंची होने पर आपको जमीन पर पैर रखने में कठिनाई होती है। इसलिए अपनी लंबाई के अनुसार कुर्सी पर इस तरह बैठें कि आपके घुटने एक आरामदायक कोण पर हों और आपको उठने और बैठने में भी आसानी रहे। पैर के ऊपर पैर चढ़ाकर बैठने और कम ऊंचाई वाले फर्नीचर पर बैठने से समय के साथ-साथ आपके घुटनों में दर्द की समस्या बढ़ सकती है।

स्वस्थ घुटनों के लिए व्यायाम -
घुटनों को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए व्यायाम बेहद जरूरी है। व्यायाम में भी तैराकी सबसे बेहतरीन तरीका है। अगर आपको तैरना पसंद नहीं है तो आप साइक्लिंग भी कर सकते हैं। शरीर में अतिरिक्त वसा कम करने और घुटनों के अनुकूल व्यायाम के तौर पर यह बेहतर तरीका है। इसके अलावा घुटनों व जांघों की मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए कुर्सी पर बैठकर टांगों को कुर्सी के बराबर लाने का प्रयास करें। दौडऩे, कूदने, ज्यादा प्रभाव वाला ऐरोबिक डांस करने व पालथी मारकर बैठने से घुटनों के लिए जोखिम बढ़ सकता है।

संभव है शुरुआती इलाज -
युवावस्था में खेल के दौरान घुटने या अस्थिबंध (एसीएल, पीसीएल) में लगी चोट भविष्य में आर्थराइटिस की वजह हो सकती है। घुटनों के जॉइंट को लिगामेंट मेनिस्कस और कार्टिलेज जैसे महत्वपूर्ण ढांचों की मदद से सुरक्षित रखा जाता है। एमआरआई, आर्थरोस्कोपी जैसी जांच व थैरेपैटिक मॉडल विकसित होने से इस बीमारी का इलाज और आर्थराइटिस की रोकथाम संभव है। आर्थरोस्कोपी का इस्तेमाल अस्थिबंध, कार्टिलेज और मेनिस्कस की मरम्मत करने या चोटिल कोशिकाओं को निकालने (मेनिसेक्टोमी, घुटनों के क्षतिग्रस्त हिस्से को निकालने) में किया जा सकता है। इसके लिए आपके घुटनों के आसपास के इलाकों में छोटे-छोटे अन्य सर्जिकल उपकरण अंदर डाले जाते हैं।

तनाव से बढ़ती है परेशानी -

एक सुकून भरा दिमाग और शांत चित्त घुटनों की समस्या रोकने में मदद कर सकता है। लंबे समय तक तनाव की स्थिति में रहने से हमारे शरीर का प्रतिरोधी तंत्र कमजोर हो जाता है और इससे अन्य गंभीर समस्याओं के साथ ही घुटनों पर भी प्रभाव पड़ता है। व्यायाम, ध्यान और संगीत आपको शांत और तनाव मुक्त रखने में मदद कर सकते हैं। आर्थराइटिस की संभावना आयु के तीसरे और चौथे दशक में कदम रखने पर शुरू होती है। इसे बढ़ावा देने वाले कई कारणों को हम नियंत्रित कर सकते हैं। वजन, काफी समय तक एक ही जगह बैठे रहने वाली हमारी जीवनशैली, उठने-बैठने की खराब मुद्राएं और तनाव ऐसी बातें हैं, जिन पर काबू पा सकते हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/problems-of-osteoarthritis-will-be-overcome-by-these-methods-3983953/

एक एेसी बीमारी जिसमें अापका हाथ ही बन जाता है 'दुश्मन'


कल्पना कीजिए, आप आराम से कुर्सी पर लेटे हैं। आंख लगी है कि गले पर किसी के हाथ की जकडऩ महसूस कर आप जाग जाते हैं। कोई आपका गला घोंट रहा है। जागकर देखते हैं कि जो आपने महसूस किया वह सच है लेकिन आश्चर्य कि गला घोंटने वाला हाथ आपका अपना बायां हाथ है। आप चाहकर भी उसे रोक नहीं पा रहे, वह आपके कहे में नहीं, आपके बस में नहीं। बड़ी मुश्किल से आप अपने सीधे हाथ से गले से एक-एक अंगुली हटाकर मुक्त करते हैं, जैसे किसी दूसरे के हाथ से अपना गला छुड़ाया हो।

ऐसा होता है मस्तिष्क के अग्र भाग फ्रंटल लोब के निचले हिस्से के क्षतिग्रस्त होने पर। साथ में कॉर्पस केलोसम के आगे के भाग की भी क्षति होती है। कॉर्पस केलोसम नर्व फाइबर्स का सेतु होता है जो दाएं व बाएं सेरीब्रल हेमिसफियर्स को आपस में जोड़ता है, आपस में सूचनाओं का आदान प्रदान होता है। कार्य समन्वय होता है। सेतु के क्षतिग्रस्त होने पर यह सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है और अपना हाथ ही पराया हो जाता है। इसे एलियन हैन्ड सिंड्रोम कहते हैं। मरीज ऑफिस टेबल पर बैठा दाएं हाथ से कलम से कुछ लिख रहा है। तभी बिना उसकी इच्छा के, बिना उसको भान हुए, उसका बायां हाथ आता है और टेबल पर रखे पानी के गिलास को जकड़ लेता है। वह हाथ पराए हाथ की तरह काम करता है। गला दबाने की विकृत क्रिया इसी का प्रारूप है। कुछ मरीजों में तो हाथों का यह परायापन इस हद तक होता है कि एक दूसरे के विपरीत काम करते हैं। दायां हाथ कमीज के बटन लगा रहा है तो बायां हाथ बटन खोल रहा है। दायां हाथ गिलास उठाने की कोशिश कर रहा है तो बायां हाथ रोक रहा है। सही हाथ मौजा पहनाता है तो पराया बना हाथ उसे उतार देता है। ऐसी विरोधी प्रक्रियाएं अमूमन कॉर्पस केलोसम के क्षतिग्रस्त होने पर होती हैं। एक महिला को बचपन से मिर्गी के भीषण दौरे पड़ते थे। जब दवाओं से दौरे काबू में नहीं आए तो डॉक्टर ने ऑपरेशन कर कॉर्पस केलोसम को काट दिया। मिर्गी के दौरे ठीक हो गए। डॉक्टर को दिखाने गई थी। हटात् डॉक्टर 'अरे! यह तुम क्या कर रही हो? ब्लाउज के बटन क्यों खोल रही हो? महिला को भान ही नहीं था कि उसका एक हाथ बटन खोल रहा है। झेंपते हुए उसने दूसरे हाथ से बटन बंद किए। डॉक्टर से मुखातिब हुई तब तक तो उसका पहला हाथ फिर बटन खोलने लगा।

मस्तिष्क के इस भाग को एन्टीरियर सेरिब्रल आर्टरी रक्त सप्लाई करती है जिसके अवरुद्ध होने पर (थ्रोम्बोसिस) इस भाग का मस्तिष्क घात होता है जिसके फलस्वरूप होता है एलियन हैन्ड सिंड्रोम। दाएं ओर के मस्तिष्क घात में बायां हाथ और बाएं ओर के घात में दायां हाथ। (लेखक वरिष्ठ चिकित्सक हैं।)


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/alien-hand-syndrome-3982709/

जानिए फर्स्ट एड बॉक्स में क्या-क्या चीजें रखनी चाहिए


सड़क हादसों के समय लोगों को फस्र्ट एड (प्राथमिक उपचार) की जरूरत पड़ती है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि हमारे फर्स्ट एड बॉक्स में कौन-कौन सी चीजें, दवाएं व उपकरण होने चाहिए जिससे घायल का उचित प्राथमिक उपचार किया जा सके।

ध्यान रहे -
आपका फर्स्ट एड बॉक्स साफ-सुथरा और वाटरप्रूफ होना चाहिए।

ये चीजें रखना है जरूरी -
खून रोकने या घाव साफ करने के लिए रुई अथवा साफ कपड़ा।
चोट पर लगाने के लिए एंटीबायोटिक ट्यूब।
पट्टी, एडहेसिव बैंडेज और स्टिकिंग प्लास्टर।
बैंडेज को बांधने के लिए सेफ्टी पिन्स।
(ये चीजें कार, ऑटो रिक्शा, बाइक और स्कूटर चालक के फस्र्ट एड बॉक्स में होनी चाहिए।)

कार वालों के लिए एडवांस किट -
आयोडीन सॉल्यूशन : खून बहने से रोकने के लिए।
पट्टी : विभिन्न आकार के गॉज पैड्स (जालीदार कपड़े की पट्टी)
एंटी फगल क्रीम, एलोवीरा जैल, बर्न क्रीम : त्वचा संबंधी समस्याओं व जलने की स्थिति में उपयोगी।
दर्द निवारक दवाएं : डॉक्टर की सलाह से किट में शामिल करें और इमरजेंसी में ही लें।
इसके अलावा डिस्पोजेबल ग्लव्ज, पॉकेट मास्क, प्लास्टिक की चिमटी, एंटीसेप्टिक वाइप्स (पट्टी), थर्मामीटर व हाथ धोने का साबुन भी इस किट में रख सकते हैं।

स्पाइनल बोर्ड भी हो -
सड़क हादसों में 10-15 फीसदी मामले गर्दन या रीढ़ की हड्डी में चोट के होते हैं। ऐसे में स्पाइनल बोर्ड (लकड़ी का बोर्ड) भी रखना चाहिए। इसके सहारे घायल को ठीक से उठाकर अस्पताल पहुंचा सकते हैं।

डेट चेक करते रहें -
सॉल्यूशन, क्रीम व अन्य दवाओं की एक्सपायरी डेट चैक करें।
रुई, पट्टी, बैंडेज आदि को भी छह महीने या सालभर में बदल लें।
जहां तक संभव हो प्लास्टिक के उपकरण रखें।

हमारे यहां सड़क हादसों में अधिकांशत : नो ऑर्गेनाइजेशन सिस्टम फॉलो होता है जिसमें घटनास्थल के आसपास के लोग बिना किसी उपचार के घायल को अस्पताल पहुंचाते हैं। हाइवे पर होने वाली दुर्घटनाओं में लोगों को बचाने के लिए गांव वालों व ढाबे वालों को प्री हॉस्पिटल केयर के प्रति जागरूक व प्रशिक्षित करने और उन्हें फर्स्ट एड किट उपलब्ध कराने की जरूरत है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/what-things-should-be-kept-in-the-first-aid-box-3978859/

इस कारण महिलाओं में हो सकती है गर्भपात और बांझपन की समस्या, जानिए इसके बारे में


एडिनोमायोसिस क्या है ?

एडिनोमायोसिस महिलाओं में होने वाली ऐसी बीमारी है जिसमें गर्भाशय की मांसपेशियों के भीतर के लाइनिंग टिश्यू (एंडोमीट्रियम) का स्थानान्तरण गलत जगह पर होने से गर्भाशय की मांसपेशियों में सूजन आ जाती है।

इससे कैसे बांझपन पैदा हो सकता है ?
इसमें भ्रूण की ग्रहणशीलता में कमी और उच्च गर्भपात होने से बांझपन की समस्या हो सकती है।

इसके लक्षण क्या हैं ?
माहवारी लंबे समय तक (लगभग 8-14 दिन तक) होना, रक्त स्राव ज्यादा होना, अंडोत्सर्ग में दर्द का बढऩा, ब्लड के बड़े क्लॉट्स बनना, पेट में ऐंठन आदि।
यह समस्या किस उम्र में महिलाओं को होने की संभावना रहती है?
आमतौर पर यह समस्या 35 से 50 वर्ष की उम्र की महिलाओं में होती है।

इसका मुख्य कारण क्या है ?
एडिनोमायोसिस का कारण अज्ञात है। हालांकि गर्भाशय ट्रोमा को इस प्रकार के साथ संबद्ध किया गया है कि गर्भाशय की भीतर लाइनिंग और मांसपेशियों के बीच की बाधा को तोड़ सकते हैं जो सिजेरियन, ट्यूबल बंधाव, गर्भावस्था समाप्ति के रूप में होता है।

इसके क्या उपचार उपलब्ध हैं ?
महिला की माहवारी को रोकने के लिए 3 से 6 महीने की अवधि तक जीएनआरएचए एगोनिस्ट इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इससे गर्भाशय की सूजन को कम किया जाता है। यदि समस्या अधिक हो तो दूरबीन द्वारा सर्जरी करके सूजन आई मांसपेशियों को निकाल लिया जाता है परंतु गर्भाशय सुरक्षित रूप से रख लिया जाता है जिससे महिला आगे जाकर भविष्य में बिना रुकावट गर्भधारण कर सकती है। इसके उपरान्त टेस्ट ट्यूब बेबी (आई.वी.एफ) प्रक्रिया की जा सकती है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/for-this-reason-women-may-have-a-problem-of-abortion-and-infertility-3978656/

कैल्शियम के कण दे सकते हैं दिल के रोग का संकेत


दिल की धमनी की दीवारों में चिपके कैल्शियम के कण, दिल से जुड़ी बीमारियों का संकेत दे सकते हैं, खासतौर से भारत सहित दक्षिण एशियाई देशों के पुरुषों में।

कैलिफोर्निया-सैन फ्रांसिस्को विश्वविद्यालय (यूसीएसएफ) के शोधकर्ताओं के दल के अनुसार, दक्षिण एशिया के लोगों में दिल संबंधी बीमारियां (कार्डियोवेस्कुलर डिजीज) होने की आशंका ज्यादा रहती है। दुनियाभर में दिल से जुड़ी बीमारियों के 60 फीसदी से ज्यादा मरीज इस क्षेत्र से आते हैं।

दिल से जुड़ी बीमारियां अन्य नस्ल व जातीय समूहों की तुलना में कम उम्र के लोगों में उच्च रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल व मधुमेह जैसे दूसरे जोखिम कारक भी विकसित करती हैं। इसके अलावा दक्षिण एशियाई पुरुषों (8.8 फीसदी) में अपनी महिला समकक्षों (3.6 फीसदी) की तुलना में कैल्शियम के जमा (कैल्शिफिकेशन) होने की उच्च दर पाई गई है।

यूसीएसएफ की प्रोफेसर के अनुसार, ''कोरोनरी धमनी में कैल्शियम की मौजूदगी व बदलाव सजातीय जनसंख्या में जोखिम कारकों के पूर्व सूचना में सहायक हो सकती है व स्टेटिन व दूसरी रोकथाम उपचार के विवेकपूर्ण इस्तेमाल को गाइड कर सकती है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/disease-and-conditions/calcium-particles-can-give-heart-disease-signs-3978329/

SHARE THIS


Subscribe via Email


Explore Jobs/Opportunities
Jobs Jobs / Opportunities / Career
Haryana Jobs / Opportunities / Career
Bank Jobs / Opportunities / Career
Delhi Jobs / Opportunities / Career
Sarkari Naukri Jobs / Opportunities / Career
Uttar Pradesh Jobs / Opportunities / Career
Himachal Pradesh Jobs / Opportunities / Career
Rajasthan Jobs / Opportunities / Career
Scholorship Jobs / Opportunities / Career
Engineering Jobs / Opportunities / Career
Railway Jobs / Opportunities / Career
Defense & Police Jobs / Opportunities / Career
Gujarat Jobs / Opportunities / Career
West Bengal Jobs / Opportunities / Career
Bihar Jobs / Opportunities / Career
Uttarakhand Jobs / Opportunities / Career
Punjab Jobs / Opportunities / Career
Admission Jobs / Opportunities / Career
Jammu and Kashmir Jobs / Opportunities / Career
Madhya Pradesh Jobs / Opportunities / Career
Explore Articles / Stories
Education
Government Schemes
News
Career
Admit Card
Bihar
State Government Schemes
Study Material
Technology
DATA
Public Utility Forms
Travel
Sample Question Paper
Exam Result
Employment News
Scholorship
Syllabus
Festival
Business
Wallpaper
Explore more
Main Page
Register / Login
Like our Facebook Page
Follow on Twitter
Subscrive Our Newsletter Via Nuzzle
Get Updates Via Rss Feed
Sarkari Niyukti
Free Online Practice Set
Latest Jobs
Feed contents
Useful Links
Photo
Video
Post Jobs
Post Contents
Supremedeal : India Business Directory
Find IFSC Code
Find Post Office / Pincode
Contact us
Best Deal

Disclaimer: we only provide job information. we are not associated with any job website. Although we take extreme care for accuracy of the information provided, but you must check the authenticity of the website before applying for the job. We are not responsible for your operation , once you leave our website and apply thereafter. Please recheck the genuineness of the job website from yourself also.

Copyright © 2018. Website template by WebThemez.com