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बुद्ध पूर्णिमा : पूजा विधि एवं शुभ मुहूर्त, बुद्धं शरणं गच्छामि 18 मई 2019


आज 18 मई 2019 को वैशाख मास की पूर्णिमा है, इसी दिन भगवान विष्णुजी के नवम अवतार भगवान बुद्ध जयंती बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती है। इस दिन दान-पुण्य और धर्म-कर्म के अनेक कार्य किये जाते हैं। इसे सत्य विनायक पूर्णिमा भी कहा जाता है। जाने बुद्ध पूर्णिमा का महत्व एवं पूजा शुभ मुहूर्त। ऐसे करें भगवान बुद्ध की पूजा अपने घर में भी।

 

वैशाख बुद्ध पूर्णिमा तिथि और पूजा शुभ मुहूर्त


- पूर्णिमा तिथि आरंभ 18 मई दिन शनिवार को ब्राह्म मुहूर्त में प्रातःकाल 4 बजकर 10 मिनट से हो गया है।
- पूर्णिमा तिथि समापन 19 मई दिन रविार को को रात्रि 2 बजकर 41 मिनट पर होगा।

ऐसे करें अपने घर पर भी बुद्ध पूर्णिमा के दिन पूजन
- सुबह गंगा में स्नान करें या फिर सादे जल में गंगाजल मिलकार स्नान करें।
- पूजा घर को फूलों और बंदवार से भी सजा सकते है।
- घर के मंदिर में भगवान विष्णु जी पूजन भगवान बुद्ध का ध्यान करते हुये करें।
- एक गाय के घी का दीपक जलायें।
- घर के मुख्य द्वार पर हल्दी, रोली या कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं और गंगाजल का छिड़काव पूरे घर में भी करें।
- बोधिवृक्ष का ध्यान करते हुए घर के तुलसी पेड़ के आस-पास दीपक जलाएं और उसकी जड़ों में दूध विसर्जित कर फूल चढ़ाएं।
- अगर आपके घर में कोई पक्षी हो तो आज के दिन उन्हें आज़ाद जरूर करें।
- सूर्यास्त के बाद उगते चंद्रमा को जल अर्पित करें।

 

बुद्ध पूर्णिमा का महत्व

- माना जाता है कि वैशाख की पूर्णिमा को ही भगवान विष्णु ने अपने नौवें अवतार के रूप में जन्म लिया।
- मान्यता है कि भगवान कृष्ण के बचपन के दोस्त सुदामा वैशाख पूर्णिमा के दिन ही उनसे मिलने पहुंचे थे। इसी दौरान जब दोनों दोस्त साथ बैठे तब कृष्ण ने सुदामा को सत्यविनायक व्रत का विधान बताया था। सुदामा ने इस व्रत को विधिवत किया और उनकी गरीबी नष्ट हो गई।
- इस दिन धर्मराज की पूजा करने की भी मान्यता है, कहते हैं कि सत्यविनायक व्रत से धर्मराज खुश होते हैं। माना जाता है कि धर्मराज मृत्यु के देवता हैं इसलिए उनके प्रसन्‍न होने से अकाल मौत का डर कम हो जाता है।

 

बुद्ध पूर्णिमा के दिन इन कामों को भूलकर भी न करें-

- बुद्ध पूर्णिमा के दिन मांस ना खाएं।
- घर में किसी भी तरह का कलह ना करें।
- किसी को भी अपशब्द ना कहें।
- झूठ बोलने से बचें।
- सबसे प्रेम भाव रखें।
- दूसरों की सेवा सहायता करने के अवसर ढुंडे

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वैशाख बुद्ध पूर्णिमा शनिवार को एक बार कर लें यह काम, बरसने लगेगा धन, 7 पीढ़ियों तक नहीं होगी धन की कमी


पूर्णिमा तिथि वैसे तो हर माह आती है, लेकिन कुछ महीनों की पूर्णिमा बहुत ही खास एवं धन प्राप्ति के लिए अति लाभकारी मानी जाती है। 18 मई 2019 को वैशाख मास की पूर्णिमा इसी दिन भगवान बुद्ध जयंती बुद्ध पूर्णिमा भी मनाई जाती है। इस दिन दान-पुण्य और धर्म-कर्म के अनेक कार्य किये जाते हैं। इसे सत्य विनायक पूर्णिमा भी कहा जाता है। अगर कोई इस दिन इन सरल किंतु अचुक उपाय को एक बार कर लेता है, उनके जीवन में धन की वर्षा होने लगती है, उनकी 7 पीढ़ियों तक धन की कमी नहीं रहती।

 

वैशाख पूर्णिमा व्रत

वैशाख पूर्णिमा के दिन सुबह सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी, जलाशय, कुआं या बावड़ी में स्नान करके सूर्य मंत्र का उच्चारण करते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की विशेष पूजा करनी चाहिए। इस दिन धर्मराज के निमित्त जल से भरा कलश और पकवान का दान करने से गोदान के समान पुण्यफल फल मिलता है। शक्कर के साथ तिल देने से पापों का क्षय होता है। इस दिन तिल के तेल के दीपक घर में जलाना चाहिए एवं पित्रों के निमित्त तिलों का तर्पण करना चाहिए।

 

वैशाख पूर्णिमा का महत्व

वैशाख पूर्णिमा पर धर्मराज की पूजा करने का विधान है, इसलिए इस व्रत के प्रभाव से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण के बचपन के साथी सुदामा जब द्वारिका उनके पास मिलने पहुंचे थे, तो भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें सत्य विनायक पूर्णिमा व्रत का विधान बताया। इसी व्रत के प्रभाव से सुदामा की सारी दरिद्रता दूर हुई।

 

वैशाख पूर्णिमा के दिन करें ये आसान उपाय

1- वैशाख बुद्ध पूर्णिमा के दिन अपार धन की प्राप्ति के लिए सुबह उठकर पीपल के पेड़ के सामने कुछ मीठा चढ़ाकर जल अर्पित करके दीपक जलाएं।
2- सफल दाम्पत्य जीवन के लिए वैशाख बुद्ध पूर्णिमा के दिन पति-पत्नी दोनो मिलकर पूर्ण चन्द्रमा को गाय के दूध का अर्ध्य दें। इससे दाम्पत्य जीवन में जीवन भर मधुरता बनी रहेगी ।
3- जिस भी व्यक्ति को जीवन में धन सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ता है वे वैशाख बुद्ध पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय के समय पूरण चन्द्रमा को गाय के कच्चे दूध में चीनी और चावल मिलाकर इस मंत्र- "ॐ स्रां स्रीं स्रौं स: चन्द्रमासे नम:" का उच्चारण करते हुये अर्घ्य दें ।
4- वैशाख बुद्ध पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी के चित्र पर 11 कौड़ियां चढ़ाकर उन पर हल्दी से तिलक करें। अगले दिन सुबह सभी कौड़ियों को लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें, इस उपाय से घर में धन की कोई भी कमी जीवन भर नहीं रहेगी।

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महर्षि भृगु जयंती 18 मई : केवल एक बार इस स्तुति का पाठ करने से एक साथ सैकड़ों मनोकामना हो जाती है पूरी


हर साल वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि को महर्षि भृगु की जंयती मनाई जाती है। महर्षि भृगु का जन्म 5000 ईसा पूर्व ब्रह्मलोक-सुषा नगर (वर्तमान ईरान) में हुआ था। इनके परदादा का नाम मरीचि ऋषि, दादाजी का नाम कश्यप ऋषि, दादी का नाम अदिति एवं इनके पिता प्रचेता-विधाता एवं माता का नाम वीरणी देवी था। जो ब्रह्मलोक के राजा बनने के बाद प्रजापिता ब्रह्मा कहलाये। महर्षि भृगु ने अपने समय में एक दिव्य स्तुति की रचना की थी, जिसके बारे में कहा जाता है कि पूर्णिमा तिथि को इसका केवल एक बार पाठ करने से व्यक्ति का समस्त मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।

 

। । महर्षि भृगु साठिका । ।

1- जिनके सुमिरन से मिटै, सकल कलुष अज्ञान।
सो गणेश शारद सहित, करहु मोर कल्यान।।
वन्दौं सबके चरण रज, परम्परा गुरुदेव।
महामना, सर्वेश्वरा, महाकाल मुनिदेव।।
बलिश्वर पद वन्दिकर, मुनि श्रीराम उर धारि।
वरनौ ऋषि भृगुनाथ यश, करतल गत फल चारि।।
जय भृगुनाथ योग बल आगर। सकल सिद्धिदायक सुख सागर।।

2- विश्व सुमंगल नर तनुधारी। शुचि गंग तट विपिन विहारी।।
भृगुक्षेत्र सुरसरि के तीरा। बलिया जनपद अति गम्भीरा।।
सिद्ध तपोधन दर्दर स्वामी। मन-वच-क्रम गुरु पद अनुगामी।।
तेहि समीप भृग्वाश्रम धामा। भृगुनाथ है पूरन कामा।।
स्वर्ग धाम निकट अति भाई। एक नगरिका सुषा सुहाई।।
ऋषि मरीचि से उद्गम भाई। यहीं महॅ कश्यप वंश सुहाई।।
ता कुल भयऊ प्रचेता नेमी। होय विनम्र संत सुर सेवी।।

 

3- तिनकी भार्या वीरणी रानी। गाथा वेद-पुरान बखानी।।
तिनके सदन युगल सुत होई। जन्म-जन्म के अघ सब खोई।।
भृगु अंगिरा है दोउ नामा। तेज प्रताप अलौकिक धामा।।
तरुण अवस्था प्रविसति भयऊ। गुरु सेवा में मन दोउ लयऊ।।
करि हरि ध्यान प्रेम रस पागो। आत्मज्ञान होन हैं लागे।।
परम वीतराग ब्रह्मचारी। मातु समान लखै पर नारी।।
कंचन को मिट्टी करि जाना। समदर्शी तुम्ह ज्ञान निधाना।।
दैत्यराज हिरण्य की कन्या। कोमल गात नाम था दिव्या।।

4- भृगु-दिव्या की हुई सगाई। ब्रह्मा-वीरणी मन हरसाई।।
दानव राज पुलोम भी आया। निज सुता पौलमी को लाया।।
सिरजनहार कृपा अब किजै। भृगु-पौलमी ब्याह कर लीजै।।
ब्रह्मलोक में खुशियां छाई। तीनों लोक बजी शहनाई।।
दिव्या-भृगु के सुत दो होई। त्वष्टा,शुक्र नाम कर जोई।।
भृगु-पौलमी कर युगल प्रमाना। च्यवन,ऋचीक है जिनके नामा।।
काल कराल समय नियराई। देव-दैत्य मॅह भई लड़ाई।।
ब्रह्मानुज विष्णु कर कामा। देव गणों का करें कल्याना।।

 

5- भृगु भार्या दिव्या गई मारी। चारु दिशा फैली अॅधियारी।।
सुषा छोड़ि मंदराचल आये। ऋषिन जुटाय यज्ञ करवाये।।
ऋषियन मॅह चिन्ता यह छाई। कवन बड़ा देवन मॅह भाई।।
ऋषिन-मुनिन मन जागी इच्छा। कहे, भृगु कर लें परीक्षा।।
गये पितृलोक ब्रह्मा नन्दन। जहाॅ विराज रहे चतुरानन।।
ऋषि-मुनि कारन देव सुखारी। तिनके कोऊ नाहि पुछारी।।
श्राप दियो पितु को भृगुनाथा। ऋषि-मुनिजन का ऊॅचा माथा।।
ब्रह्मलोक महिमा घटि जाही। ब्रह्मा पूज्य होहि अब नाही।।

6- गये शिवलोक भृगु आचारी। जहां विराजत है त्रिपुरारी।।
रुद्रगणों ने दिया भगाई। भृगुमुनि तब गये रिसिआई।।
शिव को घोर तामसी माना। जिनसे हो सबके कल्याना।।
कुपित भयउ कैलाश विहारी। रुद्रगणों को तुरत निकारी।।
कर जोरे विनती सब कीन्हा। मन मुसुकाई आपु चल दीन्हा।।
शिवलोक उत्तर दिशि भाई। विष्णु लोक अति दिव्य सुहाई।।
क्षीर सागर में करत विहारा। लक्ष्मी संग जग पालनहारा।।
लीला देखि मुनि गए रिसियाई। कैसे जगत चले रे भाई।।

 

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7- विष्णु वक्ष पर कीन्ह प्रहारा। तीनहूं लोक मचे हहकारा।।
विष्णु ने तब पद गह लीन्हा। कहानाथ आप भल कीन्हा।।
आत्म स्वरुप विज्ञ पहचाना। महिमामय विष्णु को माना।।
दण्डाचार्य मरीचि मुनि आये। भृगुमुनि को दण्ड सुनाये।।
तुम्हने कियो त्रिदेव अपमाना। नहि कल्यान काल नियराना।।
पाप विमोचन एक अधारा। विमुक्ति भूमि गंगा की धारा।।
हाथ जोरि विनती मुनि कीन्हा। विमुक्ति भूमि का देहू चीन्हा।।
मुदित मरिचि बोले मुसकाई। तीरथ भ्रमन करौं तुम्ह सांई।।

 

8- जहां गिरे मृगछाल तुम्हारी। समझों भूमि पाप से तारी।।
भ्रमनत भृगुमुनि बलिया आये। सुरसरि तट पर धूनि रमाये।।
कटि से भू पर गिरी मृगछाला। भुज अजान बाल घुंघराला।।
करि हरि ध्यान प्रेम रस पागे। विष्णु नाम जप करन लागे।।
सतयुग के वह दिन थे न्यारे। दर्दर चेला भृगु के प्यारे।।
दर्दर से सरयू मंगवाये। यहाॅ भृगुमुनि यज्ञ कराये।।
गंगा-सरयू संगम अविनाशी। संगम कार्तिक पूरनमासी।।
जुटे करोड़ो देव देह धारी। अचरज करन लगे नर-नारी।।
जय-जय भृगुमुनि दीन दयाला। दया सुधा बरसेहूं सब काला।।

 

9- सब संकट पल माॅहि बिलावैं। जे धरि ध्यान हृदय गुन गावैं।।
सब संकल्प सिद्ध हो ताके। जो जन चरण-शरण गह आके।।
परम दयामय हृदय तुम्हारो। शरणागत को शीघ्र उबारो।।
आरत भक्तन के हित भाई। कौशिकेय यह चरित बनाई।।
भृगु संहिता रची करि, भक्तन को सुख दीन्ह।
दर्दर को आशीष दे, आपु गमन तब कीन्ह।।
पावन संगम तट मॅह कीन्ह देह का त्याग।
शिवकुमार इस भक्त को देहू अमित वैराग्य।।
दियो समाधि अवशेष की भृग्वाश्रम निजधाम।
दर्शन इस धाम के, सिद्व होय सब काम।।

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कूर्म जयंती 18 मई : भगवान कच्छप की पूजा के बाद इस मंत्र का जप करेगा हर मनोकामना पूरी, बना देगा मालामाल


वैशाख मास की पूर्णिमा 18 मई 2019 दिन शनिवार को भगवान विष्णु के कूर्म (कच्छप) अवतार यानी की कूर्म जयंती का पर्व मनाया जायेगा। हिंदू धार्मिक मान्यता अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने कूर्म(कछुए) का अवतार लिया था और मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण कर समुद्र मंथन में देवताओं एवं दानवों की विशेष सहायता की थी। इस भगवान के कच्छप रूप की पूजा कर उनके मंत्र का जप करने से मां लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न हो जाती है और उनकी कृपा से व्यक्ति धन धान्य से परिपूर्ण हो जाता है।

 

कच्छप अवतार की पौराणिक कथा

हिन्दू धर्म के ग्रंथों में वर्णित पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्री हरि विष्णुजी ने देवताओं के आवाहन पर कच्छप रूप धारण कर समुद्र मंथन के समय अपने पीठ पर मंदराचल पर्वत को धारण किया था तभी समुद्र मंथन का प्रयोजन संभव हो पाया था। कथानुसार दैत्यराज बलि के शासन में असुर दैत्य व दानव बहुत शक्तिशाली हो गए थे और उन्हें दैत्यगुरु शुक्राचार्य की महाशक्ति भी प्राप्त थी, जिस कारण देवता असुरों को पराजित नहीं कर पा रहे थे। साथ ही एक बार देवराज इन्द्र को किसी कारण से नाराज़ हो महर्षि दुर्वासा ने श्राप देकर श्रीहीन कर दिया था जिस कारण इन्द्र शक्तिहीन हो गये थे। इसी अवसर का लाभ उठाकर दैत्यराज बलि नें तीनों लोकों पर अपना राज्य स्थापित कर लिया और इन्द्र सहित सभी देवतागण यहां वहां भटकने लगे।

 

इस समस्या के समाधान के लिए सभी देवता प्रजापिता ब्रह्मा जी के पास जाकर प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें इस संकट से बाहर निकालें। देवताओं के साथ ब्रह्मा जी भी इस संकट से मुक्ति के लिए भगवान श्री विष्णु जी के पास जाकर सहायता मांगते हैं। देवगणों की विपदा सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें दैत्यों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के कि सलाह दी। क्षीर सागर को मथ कर देवता उसमें से अमृत निकाल कर उस अमृत का पान कर लें और अमृत पीकर सभी देवगण अमर होकर दैत्यों की मारने में शक्तिशाली बन जायेंगे। समुद्र मंथन से निकले अमृत को पीकर सभी देवता अमर हो गये और उन्होंने असुरों का अंत कर पुनः स्वर्ग लोक प्राप्त किया।

kurma avatar jayanti

इस मंत्र का करें जप

शास्त्रों नें इस दिन की बहुत महत्ता बताई गई है, इस दिन से निर्माण संबंधी कार्य शुरू किया जाना बेहद शुभ माना जाता है। कूर्म जयंती के दिन वास्तु दोष के विशेष उपाय भी किये जाते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के कूर्म (कछुए) रूप का षोडषोपचार पूजन करने के बाद नाचे दिये गये मंत्रों का जप करने से मां लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होकर व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी कर देती हैं।

 

कूर्म मंत्र

।। ॐ कूर्माय नम: ।।
।। ॐ हां ग्रीं कूर्मासने बाधाम नाशय नाशय ।।
।। ॐ आं ह्रीं क्रों कूर्मासनाय नम: ।।
।। ॐ ह्रीं कूर्माय वास्तु पुरुषाय स्वाहा ।।

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नृसिंह जयंती : पूजा विधि एवं शुभ मुहूर्त, आज ऐसे करें नृसिंह भगवान की आराधना


आज हैं भगवान श्री नृसिंह की जयंती, आज ही के दिन भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए खंबे से प्रकट हुये थे भगवान नारायण के अवतार श्री नृसिंह भगवान। प्रत्येक वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान नृसिंह की जयंती एक उत्सव के रूप में मनाई जाती है। शक्ति एवं पराक्रम के प्रमुख देवता भगवान श्री नृसिंह कहे जाते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इसी तिथि को इस विश्व के पालनहार भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य व आधा पशु अर्थात सिंह के रूप में नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध कर धरती से अधर्म का नाश किया था। इस वर्ष 2019 में नृसिंह जयन्ती 17 मई दिन शुक्रवार को मनाई जाएगी।

 

हिन्दू पंचांग के अनुसार नरसिंह जयंती का व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है। पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी पावन दिवस को भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में अवतार लेकर असुरों का अंत कर धर्म कि रक्षा क थी। तभी से भगवान नृसिंह की जयंती संपूर्ण भारत वर्ष में धूम धाम से मनायई जाती है।

 

ऐसे करें भगवान नृसिंह का पूजन

- इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।
- भगवान नृसिंह तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति स्थापित करना चाहिए।
- भगवान नृसिंह जयंती के दिन व्रत-उपवास रखकर विधि विधान से विशेष पूजा अर्चना करना चाहिए।
- भगवान नृसिंह का वेदमंत्रों से आवाहन् कर प्राण-प्रतिष्ठा करने के बाद षोडशोपचार से पूजन करना चाहिये।
- भगवान नरसिंह जी का ऋतुफल, पुष्प, पंचमेवा, कुमकुम केसर, नारियल, अक्षत, पीताम्बर, गंगाजल, काले तिल, पञ्चगव्य आदि से पूजन करने के बाद हवन सामग्री से हवन भी करना चाहिए।

 

इस मंत्र का जप करने से हो जाती मनोकामना पूरी

- भगवान नरसिंह को प्रसन्न करने के लिए उनके नरसिंह गायत्री मंत्र का जप 108 बार तो करना ही चाहिए।
- उपरोक्त विधि से पूजा करने के बाद एकांत में कुश के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से इस नृसिंह भगवान जी के मंत्र का जप करना चाहिए।
- इस दिन व्रती को सामर्थ्य अनुसार तिल, स्वर्ण तथा वस्त्रादि का दान देना चाहिए।
- इस व्रत करने वाला व्यक्ति लौकिक दुःखों से मुक्त हो जाता है।
- भगवान नृसिंह अपने भक्त की रक्षा करते हैं व उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

 

नरसिंह मंत्र

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्I
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम्II
ॐ नृम नृम नृम नर सिंहाय नमः।

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नृसिंह जयंती : इस विधान से पूजन कर जपे यह मंत्र, भगवान नृसिंह कर देंगे हर मनोकामना पूरी


प्रत्येक वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान नृसिंह की जयंती एक उत्सव के रूप में मनाई जाती है। शक्ति एवं पराक्रम के प्रमुख देवता भगवान श्री नृसिंह कहे जाते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इसी तिथि को इस विश्व के पालनहार भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य व आधा पशु अर्थात सिंह के रूप में नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध कर धरती से अधर्म का नाश किया था। इस वर्ष 2019 में नृसिंह जयन्ती 17 मई दिन शुक्रवार को मनाई जाएगी।

 

नृसिंह जयंती

हिन्दू पंचांग के अनुसार नरसिंह जयंती का व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है। पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी पावन दिवस को भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में अवतार लेकर असुरों का अंत कर धर्म कि रक्षा क थी। तभी से भगवान नृसिंह की जयंती संपूर्ण भारत वर्ष में धूम धाम से मनायई जाती है।

 

ऐसे करें भगवान नृसिंह का पूजन

- इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।
- भगवान नृसिंह तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति स्थापित करना चाहिए।
- भगवान नृसिंह जयंती के दिन व्रत-उपवास रखकर विधि विधान से विशेष पूजा अर्चना करना चाहिए।
- भगवान नृसिंह का वेदमंत्रों से आवाहन् कर प्राण-प्रतिष्ठा करने के बाद षोडशोपचार से पूजन करना चाहिये।
- भगवान नरसिंह जी का ऋतुफल, पुष्प, पंचमेवा, कुमकुम केसर, नारियल, अक्षत, पीताम्बर, गंगाजल, काले तिल, पञ्चगव्य आदि से पूजन करने के बाद हवन सामग्री से हवन भी करना चाहिए।

 

इस मंत्र का जप करने से हो जाती मनोकामना पूरी

- भगवान नरसिंह को प्रसन्न करने के लिए उनके नरसिंह गायत्री मंत्र का जप 108 बार तो करना ही चाहिए।
- उपरोक्त विधि से पूजा करने के बाद एकांत में कुश के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से इस नृसिंह भगवान जी के मंत्र का जप करना चाहिए।
- इस दिन व्रती को सामर्थ्य अनुसार तिल, स्वर्ण तथा वस्त्रादि का दान देना चाहिए।
- इस व्रत करने वाला व्यक्ति लौकिक दुःखों से मुक्त हो जाता है।
- भगवान नृसिंह अपने भक्त की रक्षा करते हैं व उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

 

नरसिंह मंत्र

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्I
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम्II
ॐ नृम नृम नृम नर सिंहाय नमः।

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narasimha jayanti

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pradosh : आज शाम इस उपाय को करने वाले पर शिवजी करेंगे धन और अमृत की वर्षा


आज 16 मई दिन गुरुवार को वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि है, इस दिन किये जाने वाले व्रत को गुरुवारी प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस दिन व्रत करने वाले को भगवान शिवजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ऐसी मान्यता है कि त्रयोदशी प्रदोष व्रत करने से अनेक मनोकामनाओं की पूर्ति भगवान शंकर पूरी कर देते हैं। इस दिन जरूर करें यह रामबाण उपाय।

 

करें यह उपाय

आज के दिन श्रद्धा भाव से शाम के समय शिव मंदिर में जाकर शिवजी का शुद्ध जल से 108 बार ऊँ नमः शिवाय मंत्र का जप करते अभिषेक करना चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति को अपार धन की प्राप्ति होने के साथ अमृत्तव भी प्राप्त होता है। कहा जाता हैं कि प्रदोष का व्रत रखने वालें व्यक्ति को 2 गायों के दान करने के बराबर पुण्यफल मिलता है।

 

प्रदोष व्रत कथा

प्रदोष व्रत के बारे शास्त्रों में कथा आती हैं की एक दिन जब चारों दिशाओं में अधर्म का बोलबाला नजर आयेगा, अन्याय और अनाचार अपना चरम सीमा पर होगा, व्यक्ति में स्वार्थ भाव बढ़ने लगेगा, और व्यक्ति सत्कर्म के स्थान पर छुद्र कार्यों में आनंद लेगा, और इस कारण ऐसे लोग जो पाप के भागी बनेंगे, अगर वे प्रदोष का व्रत करने के साथ भगवान शिवजी की विशेष पूजा करेगा उसके इस जन्म ही नहीं बल्कि अन्य जन्म- जन्मान्तर के पाप कर्म भी नष्ट हो जाते हैं औऱ उत्तम लोक की प्राप्ति के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 

प्रदोष व्रत पूजा विधि

प्रदोष व्रत के दिन व्रती को प्रात:काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिये। पूरे दिन मन ही मन “ऊँ नम: शिवाय” मंत्र का जप करना चाहिए। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त से तीन घड़ी पहले शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7 बजे के बीच की जाती है। व्रती को चाहिये की शाम को दुबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करें एवं शिव मंदिर में जाकर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करने के बाद “ऊँ नम: शिवाय” बोलते हुए शिव जी को शुद्धजल से अभिषेक करें।

 

इस मंत्र का जप करें

शिवजी का शुद्ध जल से अभिषेक करने के बाद इस मंत्र का 108 बार शिवजी के सामने बैठकर जप करें। भगवान शिवजी आपकी सभी मनोकामना पूरी कर देंगे।
मंत्र- “ऊँ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा।

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Pradosh Vrat

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केवट जयंती : वो राम का ही नाम हैं जो सब की नैया पार लगा देता है


हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को उसी केवट राज की जयंती मनाई जाती है, जिन्होंने त्रेतायुग में भगवान रामचन्द्र जी को बनवास के दौरान गंगा जी के इस तट से उस तट पर नाव सं पार कराया था। जानिएं केवट जयंती पर रामचरित्र मानस में वर्णित केवट और राम जी के प्रेरक प्रसंग को।

 

उतरि ठाढ़ बए सुरसरि रेता। सीय रामु गुह लखन समेता।।
केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।।
इस चौपाई में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि निषादराज और लक्ष्मण जी श्री सीता जी और श्री राम जी नाव से उतर कर रेत में खड़े हो गए। तब केवट ने उतरकर प्रभु को दंडवत प्रणाम किया।

 

केवट की अकड़
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि गंगा जी के उस पार तो केवट बड़ी अकड़ दिखा रहा था।
जासु नाम सुमरित एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।।
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।।

इस चौपाई में आगे कहते हैं एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य भवसागर से पार उतर जाते हैं और जिन्होंने वामनावतार में संसार को तीन पग से भी छोटा कर दिया था, अर्थात् दो ही पग में त्रिलोकी को नाप लिया था, वही कृपालु श्री राम चन्द्र जी गंगा पार उतरने के लिए केवट का निहोरा कर रहे हैं।

 

लेकिन गंगा जी के इस पार आकर केवट ने प्रभु को दंडवत की है। इसका क्या कारण था ? कारण यह था कि गंगा जी के उस पार केवट ने प्रभु के चरण नहीं पकड़े केवल धोये ही थे, इसलिए वह अकड़ दिखा रहा था। लेकिन जब प्रभु के चरण पकड़ धोकर केवट गंगा जी के इस पार आया तो उसे यह अहसास हो गया कि अब अकड़ने से नहीं, बल्कि अब तो चरण पकड़ कर रखने से ही काम चलेगा।


केवट उतरि दंडवत कीन्हा।
प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।।

प्रभु ने जब केवट को दंडवत करते देखा तो प्रभु को मन में संकोच हुआ कि इसे कुछ नहीं दिया। यह निश्चित बात है कि जब हम अपनी अकड़ (अहंकार) छोड़ कर सच में प्रभु के चरण पकड़ कर (प्रभु की शरण हो कर) प्रभु को दंडवत करते हैं (प्रभु के आगे शीश झुकाते हैं तो प्रभु को भी संकोच होता है कि मैंने इसे कुछ दिया नहीं है।

पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।।
कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरण गहे अकुलाई।।

 

पति के हृदय को जानने वाली सीता जी ने आनन्द भरे मन से अपनी रत्नजटित अंगूठी उतारी और प्रभु को दे दी।
माताओं-बहनों के लिए इस चौपाई में बड़ी उत्तम शिक्षा है कि पत्नी सीता जी की तरह ही अपने पति के मन की बात को बिना उसके (पति के) कहे ही जानने वाली होनी चाहिए।

प्रभु ने केवट से कहा- नाव की उतराई लो, तभी केवट ने व्याकुल होकर प्रभु के चरण पकड़ लिए और कहा कि हे प्रभु आज मैंने क्या नहीं पाया मेरे दोष, दुख और दरिद्रता की आग आज बुझ गयी।

 

पहले केवट के दोषों की बात करते हैं। तो हर मनुष्य के लिए सबसे बड़ा दोष पितृदोष होता है। हमें सबको अपने पितृॠण से मुक्त होना ही पड़ता है। जिस किसी व्यक्ति के पितृ तृप्त नहीं होते हैं, उसके घर में कभी भी शांति और खुशहाली नहीं रहती है। तो केवट कहता है कि मेरा एक तो पितृदोष समाप्त हो गया है। वास्तव में हमें कितनी बड़ी शिक्षा देता है रामायण का यह छोटा सा केवट प्रसंग।

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अगर आपने रखा है आज व्रत तो राम जी के सामने इतना करना न भूले, जो चाहे वो मिलेगा


आज वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी तिथि है, इस दिन भावनाओं और मोह से मुक्ति की इच्छा रखने वालों लोग वैशाख मास की एकादशी का का व्रत जरूर करते हैं। मोहिनी एकादशी के दिन विशेषकर भगवान के राम स्वरुप की पूजा आराधना करने का विधान है, अगर व्रत करने वाला इस राम जी के सामने यह काम कर लें तो राम जी उसकी सभी मनचाही इच्छाएं पूरी कर देते हैं।

 

मोहिनी एकादशी पर मिलने वाले लाभ-


1- मोहिनी एकादशी के व्रती की चिंताएं और मोह माया का प्रभाव कम होता है।
2- मोहिनी एकादशी के व्रती को ईश्वर की कृपा का अनुभव होने लगता है।
3- मोहिनी एकादशी के व्रती के पाप प्रभाव कम होता है और मन शुद्ध होता है।
4- मोहिनी एकादशी के व्रती हर तरह की दुर्घटनाओं से सुरक्षित रहता है।
5- मोहिनी एकादशी के व्रती को गोदान का पुण्य फल प्राप्त होता है।

 

मोहिनी एकादशी पूजन


इस दिन भगवान राम को पीले फूल,पंचामृत तथा तुलसी दल अर्पित करें, फल भी अर्पित कर सकते हैं। इसके बाद भगवान राम का ध्यान करें तथा उनके मन्त्रों का जप करें। इस दिन पूर्ण रूप से जल पर उपवास रखना चाहिए। इस दिन मन को ईश्वर में लगायें, क्रोध न करें, असत्य न बोलें। इस दिन भगवान राम के सामने कुछ देर जरूर बैठना चाहिए। श्रीराम रक्षा स्तोत्र का पाठ करें। राम जी के इस मंत्र का जप 108 बार जरूर करें- मंत्र "ॐ राम रामाय नमः"।।

शास्त्रों में सभी तिथियों में सर्वश्रेष्ठ तिथि (ग्यारस) एकदशी तिथि को माना गया है, इस दिन किये गए जप-तप, यज्ञ, दान और सेवा का बहुत अधिक महत्तव बताया गया हैं, (ग्यारस एकादशी तिथि के दिन इन कामो को गलती से भी नहीं करना चाहिए। इन्हें शास्त्रों में सर्वथा वर्जित माना गया है ।

 

1- जुआ खेलना
2- रात में सोना
3- पान खाना
4- दातून करना
5- दूसरों की बुराई से बचना
6- चुगली करना
7- चोरी करना
8- हिंसा करना
9- स्त्रीसंग
10- क्रोध
11- झूठ बोलना

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12 मई मां बगलामुखी जयंती पर दिन में केवल 2 बार पढ़ लें माता की यह स्तुति, तुरंत दिखाई देते हैं चमत्कार


बैशाख मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि यानी की 12 मई 2019 रविवार को मां बगलामुखी की जयंती मनाई जाती है। कहा जाता है कि पूरी श्रद्धा, विश्वास के साथ माता बगलामुखी की इस चमत्कारी चालीसा का पाठ जयंती के दिन केवल2 बार दोनों संध्याओं में करता है तो, मां उनकी सभी इच्छाओं की पूर्ति करने के साथ उनके शत्रुओं का भी नाश कर देती है।



।। अथ श्री बगलामुखी चालीसा ।।

 

1- नमो महाविधा बरदा, बगलामुखी दयाल।
स्तम्भन क्षण में करे, सुमरित अरिकुल काल।।
नमो नमो पीताम्बरा भवानी, बगलामुखी नमो कल्यानी।
भक्त वत्सला शत्रु नशानी, नमो महाविधा वरदानी।।

2- अमृत सागर बीच तुम्हारा, रत्न जड़ित मणि मंडित प्यारा।

स्वर्ण सिंहासन पर आसीना, पीताम्बर अति दिव्य नवीना।।
स्वर्णभूषण सुन्दर धारे, सिर पर चन्द्र मुकुट श्रृंगारे।
तीन नेत्र दो भुजा मृणाला, धारे मुद्गर पाश कराला।।

 

3- भैरव करे सदा सेवकाई, सिद्ध काम सब विघ्न नसाई।
तुम हताश का निपट सहारा, करे अकिंचन अरिकल धारा।।
तुम काली तारा भुवनेशी, त्रिपुर सुन्दरी भैरवी वेशी।
छिन्नभाल धूमा मातंगी, गायत्री तुम बगला रंगी।।

4- सकल शक्तियाँ तुम में साजें, ह्रीं बीज के बीज बिराजे।
दुष्ट स्तम्भन अरिकुल कीलन, मारण वशीकरण सम्मोहन।।
दुष्टोच्चाटन कारक माता, अरि जिव्हा कीलक सघाता।
साधक के विपति की त्राता, नमो महामाया प्रख्याता।।

 

5- मुद्गर शिला लिये अति भारी, प्रेतासन पर किये सवारी।
तीन लोक दस दिशा भवानी, बिचरहु तुम हित कल्यानी।।
अरि अरिष्ट सोचे जो जन को, बुध्दि नाशकर कीलक तन को।
हाथ पांव बाँधहु तुम ताके, हनहु जीभ बिच मुद्गर बाके।।

6- चोरो का जब संकट आवे, रण में रिपुओं से घिर जावे।
अनल अनिल बिप्लव घहरावे, वाद विवाद न निर्णय पावे।।
मूठ आदि अभिचारण संकट, राजभीति आपत्ति सन्निकट।
ध्यान करत सब कष्ट नसावे, भूत प्रेत न बाधा आवे।।

 

7- सुमरित राजव्दार बंध जावे, सभा बीच स्तम्भवन छावे।
नाग सर्प ब्रर्चिश्रकादि भयंकर, खल विहंग भागहिं सब सत्वर।।
सर्व रोग की नाशन हारी, अरिकुल मूलच्चाटन कारी।
स्त्री पुरुष राज सम्मोहक, नमो नमो पीताम्बर सोहक।।

8- तुमको सदा कुबेर मनावे, श्री समृद्धि सुयश नित गावें।
शक्ति शौर्य की तुम्हीं विधाता, दुःख दारिद्र विनाशक माता।।
यश ऐश्वर्य सिद्धि की दाता, शत्रु नाशिनी विजय प्रदाता।
पीताम्बरा नमो कल्यानी, नमो माता बगला महारानी।।

 

9- जो तुमको सुमरै चितलाई, योग क्षेम से करो सहाई।
आपत्ति जन की तुरत निवारो, आधि व्याधि संकट सब टारो।।
पूजा विधि नहिं जानत तुम्हरी, अर्थ न आखर करहूँ निहोरी।
मैं कुपुत्र अति निवल उपाया, हाथ जोड़ शरणागत आया।।

10- जग में केवल तुम्हीं सहारा, सारे संकट करहुँ निवारा।
नमो महादेवी हे माता, पीताम्बरा नमो सुखदाता।।
सोम्य रूप धर बनती माता, सुख सम्पत्ति सुयश की दाता।
रोद्र रूप धर शत्रु संहारो, अरि जिव्हा में मुद्गर मारो।।

 

11- नमो महाविधा आगारा, आदि शक्ति सुन्दरी आपारा।
अरि भंजक विपत्ति की त्राता, दया करो पीताम्बरी माता।।
रिद्धि सिद्धि दाता तुम्हीं, अरि समूल कुल काल।
मेरी सब बाधा हरो, माँ बगले तत्काल।।

।। इति श्री बगलामुखी चालीसा समाप्त।।

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गंगा सप्तमी आज : ऐसे करें मां गंगा पूजन, शाम को अपने घर में यहां जला दें एक दीपक, हो जायेगी मन की हर मुराद पूरी


आज 11 मई शनिवार को गंगा सप्तमी का पर्व है। प्रत्येक वर्ष वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गंगा सप्तमी का पर्व मनाया जाता है। इस साल गंगा सप्तमी का त्यौहार पूरे देश में 11 मई दिन शनिवार मां गगां का विशेष पूजन अर्चन करके मनाया जा रहा है। अपने घर में भी ऐसे करे मां पूजन।

 

गंगा सप्तमी पूजन का शुभ मुहूर्त
- गंगा सप्तमी मध्याह्न मुहूर्त- सुबह 10 बजकर 58 मिनट से दोपहर 1 बजकर 38 मिनट तक।
- सप्तमी तिथि का आरंभ- 10 मई दिन शुक्रवार को रात 9 बजकर 41 मिनट से हो जायेगा।
- सप्तमी तिथि का समापन 11 मई दिन शनिवार को शाम 7 बजकर 44 मिनट पर होगा।
- आज के दिन अपने घर के पूजा स्थल पर एक कटोरी में गंगाजल मिले जर को भरकर उसी जल के बीच में गंगा मैया के निमित्त घी का एक दीपक जलाने से मां मन की हर मुराद को पूरी कर देती है।


गंगा सप्तमी पर विशेष पूजन
दोपहर के समय अपने घर में ही उत्तर दिशा में एक लाल कपड़े पर गंगा जल मिले कलश की स्थापना करें। ऊँ गंगायै नमः मंत्र का उच्चारण करते हुए जल में थोड़ा सा गाय का दुध, रोली, चावल, शक्कर, इत्र एवं शहद मिलाएं। अब कलश में अशोक या फिर आम के 5-7 पत्ते डालकर उस पर एक पानी वाला नारियल रख दें। अब उक्त कलश का पंचोपचार पूजन करें। गाय के घी का दीपक, चंदन की सुगंधित धूप, लाल कनेर के फूल, लाल चंदन, ऋतुफल एवं गुड़ का भोग लगावें।

 

उपरोक्त विधि से पूजन करने के बाद मां गंगा के इस मंत्र- ऊँ गं गंगायै हरवल्लभायै नमः का 108 बार जप जरूर करें। इस दिन अपने सभी तरह के दुखों एवं पापों से मुक्ति पाने के लिए अपने ऊपर से 7 लाल मिर्ची बहते हुये जल में प्रवाहित कर दें।

 

ganga saptami

इसलिए मनाया जाता है गंगा सप्तमी का पर्व

शास्त्रों में कथा आती है कि एक बार सगर वंसज ऋषि भगीरथ ने अपने कुल के 60 हजार पूर्वजों की आत्मा की मुक्ति और शांति सद्गति की कामना से मां गंगा को स्वर्ग लोग से धरती पर लाने के लिए कठोर तप किया था। भगीरथ के कठोर तप से मां गंगा धरती पर आने के लिए तैयार हो गई, और मां गंगा के तीव्र वेग को भगवान शंकर अपनी जटा में धारण कर लिया था। लेकिन गंगा जी का वेग इतना तीव्र था कि शंकर जी के धारण करने के बाद भी गंगा की तेज धार के कारण महर्षि जाह्नु का आश्रम बर्बाद हो गया, और क्रोध में आकर महर्षि जाह्नु ने गंगा के जल को पूरा पी लिया।

 

बाद में भगीरथ एवं देवताओं के निवेदन पर महर्षि जाह्नु ने गंगा को मुक्त कर दिया। जिस दिन गंगा मुक्त हुई उस दिन वैशाख मास की सप्तमी तिथि थी, तभी से गंगा सप्तमी का पर्व मनाया जाने लगा, और मां गंगा को एक नया नाम भी दिया गया- "जाह्न्वी" इस तरह गंगा जाह्न्वी भी कहलाने लगी।

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चित्रगुप्त जयंती : इनकी दृष्टि से कोई नहीं बच पाता, जानें कैसे हुई भगवान चित्रगुप्त की उत्पत्ति


धर्म शास्त्रों के अनुसार, जो भी प्राणी धरती पर जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है क्योकि यही विधि का विधान है। विधि के इस विधान से स्वयं भगवान भी नहीं बच पाये चाहे भगवान राम हो, कृष्ण हो, बुध और जैन सभी को निश्चित समय पर धरती लोक को त्यागना ही पड़ता है। जानें चित्रगुप्त जयंती मनाने के पीछे का उद्देश्य और महत्व।

 

मृत्युपरान्त क्या होता है और जीवन से पहले क्या है यह एक ऐसा रहस्य है जिसे कोई नहीं सुलझा सकता। लेकिन हमारे वेदों एवं पुराणों में लिखा है कि जन्म लेने वाले सभी जीवों के अच्छे और बूरे सभी कर्मों का लेखा जोखा रखने का जो काम करते हैं, उन्हें चित्रगुप्त कहा जाता है, जिनकी नजरों से कोई भी नहीं बच पाता। हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को चित्रगुप्त जयंती मनाई जाती है। इस साल 2019 में 11 मई को मनाई जायेगी।

 

यमराज के दरवार में उस जीवात्मा के कर्मों का लेखा जोखा होता है। कर्मों का लेखा जोखा रखने वाले भगवान हैं चित्रगुप्त। यही भगवान चित्रगुप्त जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त जीवों के सभी कर्मों को अपनी पुस्तक में लिखते रहते हैं और जब जीवात्मा मृत्यु के पश्चात यमराज के समझ पहुचता है तो उनके कर्मों को एक एक कर सुनाते हैं और उन्हें अपने कर्मों के अनुसार क्रूर नर्क में भेज देते हैं।

 

भगवान चित्रगुप्त की उत्पत्ति

भगवान चित्रगुप्त परमपिता ब्रह्मा जी के अंश से उत्पन्न हुए हैं और यमराज के सहयोगी है। सृष्टि के निर्माण के उद्देश्य से जब भगवान विष्णु ने अपनी योग माया से सृष्टि की कल्पना की तो उनकी नाभि से एक कमल निकला और कमल पर प्रजापिता ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई जो ब्रह्माण्ड की रचना और सृष्टि के निर्माता कहलाये। ब्रह्मा जी ने सृष्ट की रचना के क्रम में देव-असुर, गंधर्व, अप्सरा, स्त्री-पुरूष पशु-पक्षी को जन्म दिया।

 

इसी क्रम में यमराज का भी जन्म हुआ जिन्हें धर्मराज की संज्ञा प्राप्त हुई क्योंकि धर्मानुसार उन्हें जीवों को सजा देने का कार्य प्राप्त हुआ था। धर्मराज ने जब एक योग्य सहयोगी की मांग ब्रह्मा जी से की तो ब्रह्मा जी ध्यानलीन हो गये और एक हजार वर्ष की तपस्या के बाद एक पुरुष उत्पन्न हुआ। इस पुरूष का जन्म ब्रह्मा जी की काया से हुआ था अत: ये कायस्थ कहलाये और इनका नाम चित्रगुप्त पड़ा। भगवान चित्रगुप्त जी के हाथों में कर्म की किताब, कलम, दवात और करवाल है। ये कुशल लेखक हैं और इनकी लेखनी से जीवों को उनके कर्मों के अनुसार न्याय मिलती है।


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Ganga saptami: गंगा सप्तमी के दिन सुबह सबसे पहले करें ये काम, हजारों गुना मिलेगा फल


वैसाख मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को गंगा सप्तमी मनाई जाती है। इस साल गंगा सप्तमी 11 मई 2019 को मनाई जाएगी। गंगा सप्तमी को उत्तर भारत में खास तरह से मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार माना जाता है की इस दिन गंगा मैय्या जान्हु ऋषि के कान से प्रवाहित हुई थी। इसलिए गंगा सप्तमी को जान्हु सप्तमी भी कहा जाता है। इस दिन गंगा पूजन किया जाता है और नदी में स्नान भी किया जाने का विधान है। दान-पुण्य की दृष्टि से भी गंगा सप्तमी बहुत ही फालदायनी मानी जाती है।

गंगा सप्तमी के दिन स्नान व पूजा का मुहूर्त

गंगा सप्तमी मध्याह्न मुहूर्त - 10:58 से 13:38 बजे तक

सप्तमी तिथि आरंभ - 21:41 (10 मई 2019)

सप्तमी तिथि समाप्त - 19:44 (11 मई 2019)

 

ganga saptami

गंगा सप्तमी पर क्या करें

- गंगा सप्तमी एक प्रकार से गंगा मैया के पुनर्जन्म का दिन होता है, इसलिये इस दिन को गंगा जयंती के रूप में मनाया जाता है।

- गंगा सप्तमी के दिन गंगा स्नान का बहुत महत्व है। यदि गंगा जी में स्नान करना संभव नहीं होता है तो घर में ही नहाने के पानी में गंगा जल की कुछ बूंदे मिलाकर उससे स्नान कर सकते हैं।

- स्नानादि के बाद गंगा मैया की प्रतिमा का पूजन करें।

- इस दिन भगवान शिव की आराधना करने से भी शुभ फल की प्राप्ति होती है।

- इसके अलावा गंगा को अपने तप से पृथ्वी पर लाने वाले भगीरथ की पूजा करें।

- गंगा पूजन के साथ-साथ दान-पुण्य करने का भी फल मिलता है।

 

ganga saptami

इस दिन हुई थी गंगा जी की उत्पत्ति

गंगा सप्तमी के दिन ही गंगा जी की उत्पत्ति हुई थी। इस दिन मां गंगा स्वर्ग लोक से शिव जी की जटा में पहुंची थीं। इसलिए इस गंगा-पूजन का विशेष महत्व है। गंगा जयंती के दिन गंगा में स्नान करने तथा पूजन से सभी दुख-क्लेश दूर होते हैं। इस दिन गंगा स्नान का खास महत्व है। अगर आप गंगा नदी में स्नान न कर सकें तो गंगा के जल की कुछ बूंदें पानी में डाल कर स्नान करें। इस प्रकार के स्नान से भी सिद्धि प्राप्त होती है। यश-सम्मान की भी प्राप्ति होती है। मांगलिक दोष से ग्रस्त व्यक्तियों को गंगा जयंती के अवसर पर गंगा-स्नान और पूजन से विशेष लाभ मिलता है।


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गंगा सप्तमी : स्नान ही नहीं गंगा मैया के ध्यान मात्र से हो जाता है उद्धार, ऐसे मिलती है छोटे बड़े पापों से मुक्ति


गंगा एक नदी नहीं बल्की करोड़ों लोगों को जीवन दायनी आस्था और श्रद्धा का प्रतिक मानी जाती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गंगा सप्तमी का पर्व मानाया जाता है, जो इस साल 2019 में 11 मई दिन शनिवार को मनाई जायेगी। इस दिन गंगा स्नान करने से छोटे बड़े ज्ञात अज्ञात जो भी जाने अंजाने में पाप कर्क हो गये हो उनसे मुक्ति मिल जाती है। जानें गंगा सप्तमी का महत्व।

 

 

गंगा सप्तमी एक प्रकार से गंगा मैया के पुनर्जन्म का दिन है, इसलिये इसे कई स्थानों पर गंगा जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। गंगा सप्तमी के दिन गंगा स्नान का बहुत महत्व है। यदि गंगा मैया में स्नान करना संभव न भी हो तो गंगा जल की कुछ बूंदे साधारण जल में मिलाकर उससे स्नान किया जा सकता है। स्नानादि के पश्चात गंगा मैया की प्रतिमा का पूजन कर सकते हैं। भगवान शिव की आराधना भी इस दिन शुभ फलदायी मानी जाती है। इसके अलावा गंगा को अपने तप से पृथ्वी पर लाने वाले ऋषि भगीरथ की पूजा भी की जाती है। इस दिन गंगा पूजन के साथ दान-पुण्य करने का भी विधान है। अगर किसी से जाने अंजाने में किसी भी तरह के पाप कर्म हो गये हो तो वे इस मां गंगा से छपा मांगते हुए गंगा जी या गंगाजल मिले जल से स्नान अवश्य करें।

 

Ganga Saptami

जब नाराज होकर महर्षि जाह्नु पी गये थे गंगा का सारा पानी

ऋषि भगीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिये कड़ा तप कर गंगा मैया को पृथ्वी पर लेकर आये थे, तब भगवान शिव ने अपनी जटाओं में लपेट कर गंगा के अनियंत्रित प्रवाह को नियंत्रित कर लिया था। लेकिन बावजूद उसके भी गंगा मैया के रास्ते में आने वाले बहुत से वन, आश्रम नष्ट हो रहे थे। चलते-चलते वह जाह्नु ऋषि के आश्रम में पंहुच गई, जिससे उनके आश्रम में भारी नुक्सान हो गया। ऋषि जाह्नु इस कारण बहुत ही क्रोधित हो गए एवं गंगा मैया के सारे पानी को पी गये।

 

और गंगा बन गई जाह्न्वी

ऋषि जाह्नु के द्वारा गंगा का पूरा जल पी लेने से ऋषि भगीरथ को अपना प्रयास विफल दिखाई देने लगा। वह जाह्नु ऋषि को प्रसन्न करने के लिये तप पर बैठ गये। देवताओं ने भी महर्षि से अनुरोध कर गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होने के महत्व के बारे में बताया। तब जाकर ऋषि जाह्नु का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने अपने कान से गंगा मैया को मुक्त कर दिया, तभी से गंगा मैया को जाहन्वी भी कहा जाने लगा। जिस दिन ऋषि जाह्नु ने गंगा को मुक्त किया वह दिन था उस दिन वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि थी। इसलिये इसे गंगा सप्तमी और जाह्नु सप्तमी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन गंगा में स्ना करना चाहिए अगर संभव न हो तो घर में ही स्नान करते हुए गंगा मैया का ध्यान करने से भी गंगा स्नान का फल मिल जाता है।

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Akshay tritiya: अक्षय तृतीया पर 3 ग्रहों का सर्वश्रेष्ठ योग, इस शुभ योग में जरुर करें ये काम


अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर किए हुए हर कार्य का शुभ परिणाम मिलता है और इस दिन किए हुए पूण्य कर्म का भी कभी समाप्त ना होने वाला फल प्राप्त होता है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन सोना-चांदी के आभूषण खरीदे जाते हैं। कहा जाता है घर में बरकत बनी रहे इसलिए अक्षय तृतीया पर दान-पूण्य भी किया जाता है। इस बार अक्षय तृतीया 7 मई 2019, मंगलवार के दिन पड़ रही है। इस दिन अक्षय तृतीया के साथ-साथ कई शुभ संयोग बन रहे हैं। पंडित रमाकांत मिश्रा ने बताया की इस बार अक्षय तृतीया के शुभ योग के साथ ही एक सर्वश्रेष्ठ योग भी बन रहा है। आइए जानते हैं इस क्या करें...

akshay tritiya 2019

सूर्य, चंद्रमा और शुक्र का सर्वश्रेष्ठ योग

पंडित जी के अनुसार इस दिन तीन प्रमुख ग्रहों का गोचर उच्च राशि में रहेगा। सूर्य मेष, चंद्रमा वृषभ, शुक्र मीन राशि में रहेंगे। ये तीनों ग्रह अपनी-अपनी उच्च राशि में रहेंगे। यदि आपने सालभर दान नहीं किया है, तो इस दिन दान जरुर करना चाहिए, क्योंकि इस दिन दान करने से अक्षय फल प्राप्त होता है। इस दिन विष्णु भगवान और पितरों के लिए दान-पुण्य करना चाहिए।

बन रहा बुधादित्य योग

सूर्य के साथ बुध की युति होने से बुधादित्य योग बनेगा। देव, ऋषि, पितरों के लिए ब्रह्म यज्ञ, पिंड दान, अन्नदान करना चाहिए। इस दिन पानी का दान या मटके का दान जरूर करें। अक्षय तृतीया पर रोहिणी नक्षत्र और रवियोग का संयोग बन रहा है। इस शुभ मुहूर्त में गृह निर्माण, नवीन गृह में प्रवेश, दुकान लेना, प्रतिष्ठान का शुभारंभ, आभूषण खरीदी, नए व्यापार की शुरुआत, मुंडन, विवाह संस्कार आदि किए जा सकते हैं।

अक्षय तृतीया का बहुत अधिक महत्व

अक्षय तृतीया के दिन का कई कारणों से बहुत अधिक महत्व माना जाता है। इस दिन भगवान परशुराम का जन्मोत्सव होता है साथ ही हिंदूओं के प्रमुख तीर्थस्थल चारधाम में से भगवान बद्रीनाथ के कपाट भी इसी दिन खुलते हैं। इस शुभ दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि पूर्वक पूजा करनी चाहिए।


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Ramdan: पाक महीने रमजान में ये गलतियां करने से बचें, वरना किसी काम का नहीं रहेगा रोजा


रमजान का महीना इस्लाम धर्म में सबसे पवित्र महीना माना जाता है। इन दिनों में मुस्लिम धर्म के लोग एक माह तक रोजा रखते हैं और अल्लाह की इबादत करते हैं। रमजान के महीने में ज्‍यादा से ज्‍यादा इबादत करके अल्‍लाह को राजी किया जाता है। हदीस के मुताबिक इस महीने में किया जाने वाला हर नेक काम का सवाब 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। नए चांद के साथ शुरू होने वाले रोजे रखने पर कई तरह के नियमों का पालन करना होता है। इस दौरान सबसे ज्यादा ध्यान रखना होता है, हर तरह की बुरी आदत से दूर रहकर खुदा की इबादत करना होता है। इस बार रमजान की तारीख संभावित 6 मई हो सकती है। दरअसल, रमजान की तारीख चांद की स्थिति पर तय की जाती है। रोजे रखने के कई नियम होते हैं आइए जानते हैं उन नियमों के बारे में...

ramzan 2019

1. इस्लाम धर्म में बताए नियमों के अनुसार पांच बातें करने पर रोजा टूट जाता है। वे हैं- झूठ बोलना, बदनामी करना, पीठ पीछे किसी की बुराई करना, झूठी कसम खाना और लालच करना।

2. अगर कोई शख्‍स सहरी के वक्‍त रोजे की नियत करें और सो जाएं, फिर यदि नींद सूर्यास्त के बाद खुले तो उसका रोजा नहीं माना जाता है और यह रोजा किस भी मायनों में स्वीकार नहीं किया जाता है।

3. रमजान के महीने में इंसान बुरी लतों से दूर रहता है, सिगरेट की लत छोड़ने के लिए रमजान का महीना बहुत अच्‍छा है। रोजा रखकर सिगरेट या तंबाकू खाने से रोजा टूट जाता है।

4. रोजे के दौरान खुद की आंख, कान और जीभ का भी रोज़ा रखा जाता है। यानि न बुरा देखें, न बुरा सुनें और न ही बुरा कहें। इसके साथ ही इस बात का भी ध्‍यान रखें कि आपके द्वारा बोली गई बातों से किसी की भावनाएं आहत न हों।

5. हर मुसलमान के लिए जरूरी है कि वह रोजे के दौरान सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के बीच खान-पान न करें। यहां तक कि सेक्स या इससे संबंधित बुरी सोच से भी दूर रहने की हिदायत दी जाती है।

6. रोजे की सबसे अहम परंपराओं में शामिल है सहरी। सहरी का नियम है कि सूर्योदय से पहले उठकर रोजेदार खाना-पीना कर लेते हैं। इसे ही सहरी कहते हैं जिसके बाद सूर्यास्त तक खाने-पीने की मनाही होती है। सूर्यास्त के बाद रोजा खोला जाता है जिसे इफ्तार कहते हैं।

7. मानसिक आचरण भी शुद्ध रखते हुए पांच बार की नमाज और कुरान पढ़ी जाती है। इस दौरान मन में किसी भी प्रकार के बुरे विचार या मन में किसी के भी प्रति गलत भावना नहीं लानी चाहिए।

 


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रमजान के पाक महीने में भूलकर भी न करें ये काम, नहीं तो टूट जाएगा रोजा


मुस्लिम धर्मावलंबियों का पवित्र महीना रमजान सोमवार या मंगलवार से शुरू होगा। हिजरी कैलेंडर के अनुसार, यह 9वां महीना है। कहा जाता है कि रमजान के महीने में किए गए हर नेका काम का पुण्य 70 गुना मिलता है। इस महीने में हर मुस्लिम ज्यादा से ज्यादा नेक काम करते हैं।

रमजान के पाक महीने में रोजे रखें जाते हैं। कुअरान में रमजान के पवित्र महीने में रखे जाने वाले रोजा को विशेष महत्व प्रदान किया गया है। रमजान में रोजे के दौरान मुसलमान सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक बिना पानी के रहते हैं। माना जाता है कि पवित्र रमजान के महीने में रोजे रखने से पाप धुल जाते हैं।

रोजे के दौरान कई सावधानियां भी बरती जाती है। इस दौरान की गई छोटी सी भी गलती आप पर भारी पड़ सकती है। कहा जाता है कि रोजे के दौरान तमाम गलत काम करने से बचना चाहिए।

इसके अलावा रमजान के महीने में रोजा रखने के दौरान लोगों को कई कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। इस दौरान किसी से लड़ाई-झगड़ा भी नहीं करना चाहिए और सादगी से रहना चाहिए।

इन कामों को करने से टूट जाता है रोजा

  1. झूठी कसम खाना
  2. झूठ बोलना
  3. लालच करना
  4. बदनामी करना
  5. किसी के पीछे उसकी बुराई करना

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Akshay tritiya: अक्षय तृतीया से हर दिन सात बार करें यह उपाय, चमक उठेगी किस्मत


अक्षय तृतीया के दिन घर में बरकत बनी रहे इसके लिए कई तरह के उपाय किए जाते हैं। कहा जाता है इस दिन कभी खत्म ना होने वाले पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए भी उत्तम माना जाता है। इसलिए यदि आप घर में हमेशा बरकत चाहते हैं तो अक्षय तृतीया के दिन सोने या चांदी के लक्ष्मी की चरण पादुका लाकर घर के मंदिर में रख दें, इसके बाद नियमित रुप से इनकी हर दिन पूजा करें। माना जाता है की जिस घर में लक्ष्मी जी का वास होता है वहां कभी धन की कमी नहीं होती है। तो यदि आप धन की कामना रखते हैं और अपना सोया हुआ भाग्य जगाना चाहते हैं तो अक्षय तृतीया के दिन कुछ ये खास उपाय जरुर करें...

 

akshay tritiya 2019

अक्षय तृतीया के दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर तांबे के बर्तन में शुद्ध जल लेकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान सूर्य को चढ़ाएं। जल चढ़ाते समय निम्म मंत्रों का जाप करें, इस मंत्र का जाप आपके सोए हुए भाग्य को चमका सकता है।

पढ़ें पावन सूर्य मंत्र :

'ॐ भास्कराय विग्रहे महातेजाय धीमहि, तन्नो सूर्य: प्रचोदयात्।'

हर दिन सात बार इस प्रक्रिया को दोहराएं। आप देखेंगे कि कुछ ही दिनों में आपका भाग्य चमक उठेगा। अक्षय तृतीया के दिन किया हुआ यह उपाय आपको बहुत लाभ पहुंचायेगा इसके साथ ही इस दिन सोने-चांदी की चीजें खरीदें। इससे भी घर में बरकत आती है। याद रखें की यह उपाय आप सूर्योदय के एक घंटे के अंदर करें, इससे आपको शीघ्र फल मिलने लगेगा।


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हर साल बदल रहा रमजान का समय, पहले सर्दियों में अब गर्मियों में क्यों आते हैं रोजे


रमजान का पाक महीना चंद दिनों बाद शुरू होगा। पहले रमजान का महीना सर्दियों में आता था, लेकिन अब यह महीना भीषण गर्मी में आता है। गर्मियों में रोजे रखना भी आसान नहीं है। जबकि पहले सर्दियों के महीने में रोजे आता थे। सर्दियों में रोजे रखना असना होता था।

गर्मियों में कड़ी गर्मी के बीच 14 से 15 घंटे भूखे-प्यासे रहकर रोजेदार को कड़ी परीक्षा देनी पड़ती है। अफ्रीका के कई मुस्लिम देशों में, गर्मियों में तापमान बहुत अधिक होता है। यहा रमज़ान के महीने में रोजेदारों की हालत बहुत ही गंभीर हो जाती है। अब सवाल उठता है कि सर्दियों के मौसम में आनेवाला रमजान गर्मियों में क्यों आता है?

दरअसल, मुस्लिम धर्म में चांड कैलेंडर को फॉलो किया जाता है। इसे इस्लामी पंचाग भी कहते हैं। इस कैलेंडर में चांद दिखाई देने के अनुसार तिथि तय होती है। इस कैलेंडर में 12 महीने लगभग 354 दिन के होते हैं। यानि कि ग्रेगोरियन कैलेंडर के 365 दिनों की तुलना में 11 दिन कम होता है।

यही कारण है कि इस्लामिक चांद कैलेंडर ग्रेगोरियन कैलेंडर कैलेंडर से हर साल लगभग 11 दिन पीछे चला जाता है। तो इससे साफ है कि रमजान के महीने का पहला दिन जो इस्लामी कैलेंडर के 9वां महीना, लगभग हर साल 11 दिन पीछे जाता है। यही कारण है कि सर्दियों में पड़नेवाला रमजान अब गर्मियों में पड़ने लगा।


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मई महीने के चार बड़े पर्व-त्यौहार, देखें पूरी लिस्ट


मई महीना हिन्दू कैलेंडर के अनुसार वैशाख का महीना कहा जाता है। इस महीने को दान, पुण्य और अध्यात्म के दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इस महीने में कई महत्वपूर्ण पर्व और त्यौहार हैं। आइये जानते हैं इस महीने के चार बड़े पर्व और त्यौहार...

शनैश्चरी अमावस्या

हिन्दू धर्म में अमावस्या औप पूर्णिमा का बहुत ही महत्व है। 4 मई को शनैश्चरी अमावस्या है। इस दिन गंगा स्नान और दान का बड़ा ही महत्व है। शनि दोष से पीड़ित जातकों के लिए यह दिन बहुत ही महत्वपूर्ण है।

अक्षय तृतीया

हिन्दुओं के लिए यह दिन बहुत ही शुभ दिन होता है। 7 मई को अक्षया तृतीया मनाई जाएगी। इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा करना और सोना खरीदना शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन किया गया शुभ कार्य का कभी क्षय नहीं होता है। यही कारण है कि इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।

मुस्लिमों के पाक महीने की शुरुआत

मुस्लिमों के पाक महीना रमजान की शुरुआत 6-7 मई से हो रहा है। इस महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग एक महीने तक अल्लाह की इबादत करते हुए रोजा रखते हैं। महीने के अंत में चांद के दीदार होने का साथ ही पाक महीना खत्म हो जाएगा, उसके बाद ईद मनाई जाएगी।

बुद्ध पूर्णिमा

भगवान बुद्ध का जन्म वैशाख महीने की पूर्णिमा के दिन हुआ था। 18 मई को बुद्ध पूर्णिमा मनाई जाएगी। कहा जाता है कि गौतम बुद्ध का जन्म, सत्य का ज्ञान, महापरिनिर्वाण की प्राप्ति वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। ***** धर्म और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए बुद्ध पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है।


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