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Kumbh mela 2019: माघ मास में प्रयाग की पावन भूमि पर करें इन चीजों का दान, मिलेगा अक्षय फल


प्रयागराज कुंभ शुरु हो चुका है, कुंभ माघ माह में लगता है और इस माह में दान, स्नान का बहुत अधिक महत्व माना जाता है। प्रयाग पवित्र स्थान माना जाता है, क्योंकि प्रयाग की पावन धरती पर भगवान ब्रह्मा नें विशाल यज्ञ करवाया था और इसी स्थान पर श्री राम, सीता और लक्ष्मण ने स्नान कर पूजा की थी। आज भी प्रयाग नगरी में स्नान और दान का विशेष महत्व माना जाता है। लेकिन जब यहां कुंभ मेला लगता है तो इस पावन स्थान का महत्व अधिक बढ़ जाता है। तो आइए जानते हैं प्रयाग में किन चीज़ों का दान करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है...

prayagraj kumbh 2019

1. प्रयाग में गोदान का महत्व
प्रयागराज को तीर्थों का राजा माना जाता है। इसलिए प्रयाग में किये हुए दान का अक्षय फल प्राप्त होता है। इन्हीं दानों में से एक प्रमुख दान गोदान माना जाता है, गोदान का विशेष महत्व होता है। ऋग्वेद के अनुसार जो जातक गाय का दान करता है, उसे बैकुंठ में स्थान प्राप्त होता है।

2. प्रयाग में दीपदान का विशेष महत्व
पुराणों में त्रिवेणी संगम यानी प्रयाग पर स्नान-दान का वर्णन मिलता है। पुराणों के अनुसार माना जाता है की गंगा-यमुना और सरस्वती के संगम स्थान पर माघ महीने में दान करना बहुत पुण्यदायी माना जाता है, इस जगह दीपदान देने से व्यक्ति के पापों का नाश हो जाता है। इसके साथ ही उसे अक्षय पुण्य की प्रप्ति होती है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है की दीपदान से बीत चुकी दस पीढ़ियों और आने वाली दस पीढ़ियों का उद्धार होता है।

3. प्रयाग में फल दान का महत्व
कुंभ में फलदान का विशेष महत्व होता है यह विशेष फलदायी भी माना जाता है। फलदान करने से पुत्र प्राप्त होता है। फलदान करने के लिए नारियल, नारंगी, खजूर, अनार, सुपारी, तरबूज, कोल्हा, ककड़ी, जायफल, केला, आम, जामुन, नींबू, बेल और दूसरे मीठे फल का प्रयोग किया जा सकता है।


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Makar sankranti 2019: मकर संक्रांति पर भूलकर भी ना करें ये काम, सालभर होगी बर्बादी


मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी। संक्रांति के दिन तिल, गुड़, चूड़ा-दही, खिचड़ी खाऩे की परंपरा है। कई जगहों पर इसे खिचड़ी भी कहा जाता है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होने पर मकर संक्रांति का त्यौहार मनाया जाता है। हर्षोल्लास, दान-पूण्य का त्यौहार मकर संक्रांति हिंदू मान्यता के अनुसार बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार माना जाता है। इस दिन नदी में स्नान करने से कई हज़ार पूण्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में मकर संक्रांति का उल्लेख मिलता है कहा जाता है की इस दिन महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का त्यागने का निर्णय लिया था। उनका श्राद्ध संस्कार भी सूर्य की उत्तरायण गति में हुआ था। इस दिन का बहुत विशेष महत्व माना जाता है, कहा जाता है की इस दिन किया हुआ दान पूण्य 100 गुना फल प्रदान करता है। लेकिन इसके विपरित यदि इस दिन कुछ गलतियां होती है तो इसका फल आपको नहीं मिलता। इसलिए मकर संक्रांति के दिन कुछ विशेष बातों का ध्यान जरुर रखना चाहिए, आइए जानते हैं कौन सी हैं वो बातें....

makar sankranti 2019

1. मकर संक्रांति के दिन सुबह उठकर बिस्तर पर कभी चाय नहीं पीन चाहिए। ऐसा करने से घर में बरकत नहीं रहती। इसलिए इस दिन गंगा या किसी अन्य नदी में स्नान और दान करके ही कुछ खाना चाहिए लेकिन अगर आपके आस-पास कोई नदी नहीं है तो आप घर पर ही नहाकर दान कर उसके बाद खाना खाएं।

2. मकर संक्रांति के दिन अगर आपके घर पर कोई भिखारी, साधु या बुजुर्ग आता है तो उसे घर से खाली हाथ न जाने दें। आपसे जो कुछ हो सके उसके अनुसार ही उसे कुछ न कुछ दान देकर विदा करें क्योंकि इस दिन दान का बहुत महत्व होता है। एक बात का ख्याल रखें, दान में देने के लिए अगर तिल का कोई भी सामान हो तो और भी अच्छा होगा।

3. मकर संक्रांति के दिन किसी पेड़ पौधे की कटाई-छंटाई नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से बुरा होता है, वहीं इस दिन महिलाओं को बाल भी नहीं धोने चाहिए। साथ ही पुण्यकाल में दांत साफ नहीं करने चाहिए।

4. इस दिन गलती से भी लहसुन, प्याज और मांस का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा अपनी वाणी को भी पवित्र रखें। पूरा दिन किसी को अपशब्द न कहें और न ही गुस्सा करें। सभी के साथ मधुरता से पेश आएं।

5. अगर सूर्य देव की कृपा पाना चाहते हैं तो इस दिन संध्या काल यानी सूरज ढलने के बाद अन्न का सेवन न करें।


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Lohri 2019: लोहड़ी पर नवजात बच्चे और मां को आग में क्यों तपाया जाता है, जानिए इससे जुड़ी विशेष मान्यताएं


लोहड़ी पंजाबी समुदाय का विशेष और प्रमुख त्यौहार है, इस त्यौहार को आपस में खुशियां बांंटने के लिए मनाया जाता है। सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में आने का पर्व भी माना जाता है। इसे बड़ी धूमधाम से ना सिर्फ पंजाब बल्कि हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल और कश्मीर में भी मनाया जाता है। वैसे तो यह त्यौहार बहुत ही खास और उल्लास भरा होता है। लेकिन जिनके घरों में शादी होती है चाहे बेटी विदा हो या घर में बहू आए उस दौरान लोहड़ी का मज़ा दोगुना हो जाता है। वहीं यदि घर में बच्चे का जन्म हुआ हो तब भी लोहड़ी का पर्व ज्यादा उल्लास भरा हो जाता है। इस बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। आइए जानते हैं लोहड़ी से जुड़ी कुछ अन्य विशेष परंपराएं....

 

lohri 2019

शादी के बाद पहली लोहड़ी पर मायके से आते हैं उपहार

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार राजा दक्ष ने अपने यहां यज्ञ कराया था, जिसमें उन्होंने अपनी पुत्री और अपने दामाद भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया था, लेकिन पिता के यहां यज्ञ होता देख सती वहां चली गईं। जहां दक्ष ने भगवान शिव का बहुत अपमान किया, जिससे दुखी होकर सती ने अग्नि कुंड में खुद को भस्म कर लिया। राजा दक्ष के किए का प्रायश्चित करने के लिए हर घर में मांएं अपनी बेटियों के घर उपहार भिजवाती हैं। शादी के बाद बेटी की पहली लोहड़ी पर मायके से उसकी ससुराल उपहार भेजे जाने की परंपरा है। बेटी की मां कपड़े, मिठाइयां, गज‍क, रेवड़ी अपनी बेटी के लिए भिजवाती है।

 

lohri 2019

नवजात बच्चों और उनकी मां को आग में तपाया जाता है

मान्‍यताओं के अनुसार लोहड़ी पर नवजात बच्‍चे को उनकी माताएं अपनी गोद में लेकर बैठती हैं और उन्‍हें आग से तपाया जाता है। कहा जाता है की ऐसा करने से लोहड़ी की आग बच्चों को बुरी नजरों से बचाती है, बच्चा हमेशा स्वस्थ्य रहता है।

एक मान्यता यह भी, दुल्ला भट्टी

दुल्ला-भट्टी का पंजाबियों के इतिहास में खास महत्व है। लोहड़ी में आपने दुल्ला भट्टी का जिक्र जरूर किया जाता है। मुगल काल में सुंदरी और मुंदरी नाम की दो अनाथ लड़कियां थीं। लड़कियों का चाचा उन्‍हें किसी अमीर साहूकार को बेच देना चाहता है। मगर दुल्‍ला भट्टी नाम के एक दिल डाकू ने उन लड़कियों को दुष्‍ट चाचा के चंगुल से छुड़ाकर उनकी शादी करवा दी और दोनों का कन्‍यादान लिया। तभी से पंजाब में लोहड़ी का त्‍योहार मनाया जाने लगा।


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मकर संक्रांति 2019: यदि आपके घर की छत पर गिरे कटी पतंग तो समझो आपके साथ भी होने वाला है कुछ ऐसा


मकर संक्रांति का पर्व हिंदू धर्म का महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस पर्व को हर राज्य में अलग तरह से मनाया जाता है। इस त्यौहार को लेकर कई मान्यताएं भी हैं। संक्रांति के दिन तिल गुड़ खाने की परंपरा है तो कहीं दान और स्नान करने की परंपरा है। इसके अलावा कहीं मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने की भी परंपरा निभाई जाती है। जी हां, लेकिन क्या आपको यह पता है की कर संक्रांति का पर्व सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि चीन में भी मनाया जाता है। जी हां, मकर संक्रांति के दिन चीन में पतंग उड़ाने की परंपरा है। इस दिन लोग सुबह से ही छत पर पतंग उड़ाने पहुंच जाते हैं। पतंग उड़ाते समय एक दूसरे की पतंग काटकर लोग खुशी मनाते हैं तो कुछ लोग कटी हुई पतंग को लुटने का आनंद उठाते हैं। लेकिन पतंग को लेकर कुछ शगुन और अपशगुन जुड़े हैं आइए जानते हैं उनके बारे में....

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1. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चीन में पतंगों की डोर पृथ्वी को स्वर्ग से मिलाने का एक जरिया मानी जाती है। इसलिए इस दिन पतंग उड़ाई जाती है।

2. मकर संक्रांति के अवसर पर किसी घर में पतंग कटकर आना चीन में सुख-समृद्धि का प्रतिक माना जाता है।

3. चीन के लोगों का मानना है कि यदि पतंग को ऊंची कर उसे आसमान में उड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है तो पतंग उड़ाने वाले का दुर्भाग्य पतंग के साथ आसमान में गुम हो जाता है।

4. यदि कोई कटी हुई पतंग उनके घर में गिरती है तो यह उनके लिए बहुत ही शुभ संयोग होता है, इसी कारण यहां पतंग को सुख-समृद्धि का प्रतिक माना जाता है।


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मकर संक्रांति 2019: इस मकर संक्रांति पर राशि अनुसार करें दान, कई हज़ार गुना मिलेगा पुण्य फल


मकर संक्रांति का त्योहार सूर्य देव को समर्पित होता है। इस दिन दान करने से पूण्य फल की प्राप्ति होती है। कहा जाता है की मकर संक्रांति के दिन सूर्यदवता अपनी विशेष कृपा बरसाते हैं। मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन से हिंदू धर्म के शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है और मांगलिक कार्य इस दिन से शुरु हो जाते हैं। संक्रांति के पवित्र दिन नदी में स्नान कर सूर्यदेवता को अर्घ्य दिया जाता है। पंडित रमाकांत मिश्रा बताते हैं की मकर संक्रांति के दिन दान करने से पुण्य फल कई हज़ार गुना मिलता है। हिंदू पंचांग और ज्योतिष गणना के अनुसार मकर संक्रांति का पर्व मंगलवार 15 जनवरी को मनाया जाएगा। मकर संक्रांति के दिन तिल का दान या तिल से बने व्यंजन यानी लड्डू खाने से से ग्रहों के कष्टों से छुटकारा मिलता है। आइए जानते राशि अनुसार किन चीज़ों का दान बहुत करना शुभ माना जाता है...

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मेष राशि: मकर संक्रांति के दिन सूर्य को जल में पीले फूल, हल्दी और तिल मिलाकर अर्घ्य दें। इसके अलावा इन्हें तिल-गुड़ का दान दें।

वृषभ राशि: मकर संक्रांति के दिन सूर्य को जल में सफेद चंदन, दूध, सफेद फूल और तिल डालकर अर्घ्य दें। इश दिन वस्त्र एवं तिल का दान करें।

मिथुन राशि: मकर संक्रांति के दिन जल में तिल डालकर सूर्य को अर्घ्य दें। इस दिन छाते का दान करना करें आपके लिए लाभकारी रहेगा।

कर्क राशि: मकर संक्रांति के दिन जल में दूध, चावल, तिल मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें। संकटों से मुक्ति मिलेगी। तेल या उड़द की दाल दान करें।

सिंह राशि: मकर संक्रांति के दिन जल में कुमकुम तथा रक्त पुष्प, तिल डालकर सूर्य को अर्घ्य दें। इसके साथ ही आप कंबल का दान करें।

कन्या राशि: संक्रांति के दिन इस राशि के जातक जल में तिल, दूर्वा, पुष्प डालकर सूर्य को अर्घ्य दें और मूंग की दाल की खिचड़ी दान करें।

तुला राशि: मकर संक्रांति के दिन जल में सफेद चंदन और तिल डालकर अर्घ्य दें, इसके साथ ही दूध, चावल का दान करना आपके लिए लाभकारी रहेगा।

वृश्चिक राशि: इस पवित्र दिन आप जल में कुमकुम, रक्तपुष्प तथा तिल मिश्रित सूर्य को अर्घ्य दें। गुड़ और खिचड़ी का दान करें।

धनु राशि: मकर संक्रांति के दिन जल में हल्दी, केसर और पीले फूल मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें। इसके साथ ही चने की दाल का दान करें।

मकर राशि: मकर संक्रांति के दिन जल में काले-नीले पुष्प, तिल मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें और पुस्तक का दान करें।

कुंभ राशि: मकर संक्रांति के दिन जल में नीले-काले पुष्प मिलाकर अर्घ्य दें और काली उड़द या अन्न का दान करें।

मीन राशि: मकर संक्रांति के दिन हल्दी, केसर, पीले फूल मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें। वहीं सूती वस्त्र और चादर का दान करें।


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इस दिन कुंभ में होगा पहला शाही स्नान और सभी तीर्थ यात्राओं की होगी शुरुआत


मकर संक्रांति का दिन हिंदू धर्म के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है। इस दिन से सभी मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है साथ ही तीर्थ स्थान में दर्शन भी शुरु हो जाते हैं। वहीं इस वर्ष प्रयागराज में कुंभ मेला लगने वाला है जिसमें पहला शाही स्नान मकर संक्रांति यानी 15 जनवरी को किया जाएगा। ज्योतिष गणना के अऩुसार जब बृहस्पति मेष राशि में और सूर्य, चंद्र मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन प्रयागराज में कुंभ का आयोजन होता है। मकर संक्रांति के दिन सामान्यतः स्नान करने की परंपरा है लेकिन कुंभ में इस दिन पहला स्नान होता है जिसे शाही स्नान कहा जाता है। कई जगहों पर संक्रांति को खिचड़ी पर्व भी कहा जाता है, इसलिए इस दिन खिचड़ी खाने व दान करने की परंपरा निभाई जाती है।

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केरल में सबरीमाला के दर्शन के लिए उमड़ती है भीड़

देश में विभिन्न तीर्थ स्थान है, जहां मकर संक्रांति के मौके पर ही तीर्थ की शुरुआत मानी गई है। उत्तर प्रदेश में कुंभ मेले की शुरुआत हो जाती है तो केरल में सबरीमाला में दर्शनों के लिए लोग उमड़ पड़ते हैं। इसी दिन नर्मदा ताप्ति नदियों में डुबकी भी लगाना शुभ माना गया है। प्राचीन मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान से सभी पाप धुल जाते हैं।

मान्यता है कि सूर्य का मकर राशि में प्रवेश शाम या रात्रि को होगा, तो इस स्थिति में पुण्यकाल अगले दिन स्थानांतरित हो जाता है। शास्त्रों में उदय काल (सूर्योदय) को ही महत्व दिया गया है। ऐसे में उदयकालीन तिथि की मान्यता के अनुसार 15 जनवरी को ही सूर्योदय से लेकर दोपहर 11.28 बजे तक मकर संक्रांति पर्व का पुण्य काल रहेगा। इस दिन गंगा स्नान के लिए तीर्थ स्थल और संगम तटों पर श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़कर स्नान-दान का पुण्य लाभ अर्जित करता है। सूर्य के उत्तरायण होने से मनुष्य की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। उदयकालीन तिथि के अनुसार 15 जनवरी को ही सूर्योदय काल से दोपहर 11.28 बजे तक मकर संक्रांति के पुण्य काल में स्नान दान किया जाना लाभदायक है।


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Makar sankranti 2019: इस मकर संक्रांति पर जरूर करें यह उपाय, बढ़ जाएगा धन, सालभर रहेगी बरकत


मकर संक्रांति हिंदू धर्म का खास पर्व माना जाता है। इस पर्व पर सूर्य उपासना का विशेष महत्व माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य को जल चढ़ाने के साथ-साथ स्नान, दान का भी अधिक महत्व होता है। सूर्य की कृपा पाने के लिए इस दि कई उपाय भी किए जाते हैं। पंडित रमाकांत मिश्रा बताते हैं की इस साल मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी। मान्यताओं के अऩुसार मकर संक्रांति के दिन तिल का भी बहुत महत्व माना जाता है। तिल का दान और तिल से बने व्यंजन खाए जाते हैं। संक्रांति का त्यौहार सब अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार मनाते हैं। लेकिन इस दिन पूण्य व सूर्य की विशेष कृपा पाने के लिए कुछ उपाय बताए गए हैं, जिनसे घर में हमेशा बरकत बनी रहती है और धन वृद्धि के योग बनेंगे...

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1. मकर संक्रांति के दिन तिल के तेल से मालिश करें, इसके बाद स्नान करें। इसे धार्मिक दृष्टिकोण से शुभ माना जाता है और वैज्ञानिक दृष्टि से इससे शरीर की सारी गंदगी साफ हो जाती है।

2. शास्‍त्रों में तिल के लाभ के बारे में उल्लेख किया गया है, मकर संक्रांति के दिन पानी में काले तिल डालकर स्नान करना चाहिए। यह उपाय व्यक्ति की बुरी नजर से रक्षा करता है।

3. संक्रांति पर तिल का दान जरुर करना चाहिए। तिल का दान करने से शनि दोषों से मुक्ति तो मिलती ही है इसके साथ ही राहु-केतु के बुरे प्रभाव भी नष्ट हो जाते हैं। पंडित जी बताते हैं की संक्रांति के दिन तिल का दान करने से कालसर्प योग, साढ़ेसाती, ढय्या, पितृदोष आदि में भी छुटकारा मिलता है।

4. संक्रांति के दिन स्नान के बाद सूर्यदेव को तांबे के लोटे से जल चढ़ाएं और जल में थोड़े से काले तिल भी मिला लें। इस उपाय को करने से सूर्यदेव की विशेष कृपा मिलती है।

5. मकर संक्रांति पर तिल के बने व्यंजन खाने की परंपरा है। तो इस दिन तिल के बने लड्डू जरुर खाना चाहिए, आपके स्वास्थ्य के लिए भी काफी फायदेमंद रहता है।


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मकर संक्रांति 2019: इस साल 15 जनवरी को मनाई जाएगी मकर संक्रांति, ये है इसका कारण


मकर संक्रांति पर्व को लेकर पिछले कई सालों से अस्मंजस्य की स्थिति बनी रहती है। कुछ लोग परंपरा अनुसार 14 तारीख को ही मकर संक्रांति मनाते हैं तो कुछ लोग पंचांग अनुसार 15 जनवरी को मकर संक्रांति को मनाते हैं। इस साल भी यही अस्मंजस्य की स्थिति बनी हुई है। कई पंडित और हिंदू कैलेंडर के अनुसार मकर संक्रांति 14 तारीख की बता रहे हैं, तो कई 15 जनवरी को बता रहे हैं। लेकिन यदि ज्योतिष के अनुसार बात करें तो मकर संक्रांति तब मनाई जाती है जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। उस दिन मकर संक्रांति मनाई जाती है और इस साल तो सूर्य मकर राशि में 14 जनवरी की शाम को 7 बजकर 28 मिनट पर प्रवेश करेगा। इसलिए इस बार मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी। क्योंकि माना जाता है की जब भी सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है उसके दूसरे दिन मकर संक्रांति मनाई जाती है।

 

makar sankranti 2019

मकर संक्रांति का महत्व

सूर्य के राशि परिवर्तन को संक्रांति कहते हैं। यह परिवर्तन एक बार आता है। सूर्य के धनु राशि से मकर राशि पर जाने का महत्व इसलिए अधिक है कि इस समय सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायन हो जाता है। उत्तरायन देवताओं का दिन माना जाता है। उत्तरायन का समय देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन का समय देवताओं की रात्रि होती है, वैदिक काल में उत्तरायन को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा गया है। मकर संक्रांति के बाद माघ मास में उत्तरायन में सभी शुभ कार्य किए जाते हैं।

मकर संक्रांति पर दान,स्नान के लिए हैं विशेष

मान्यता है कि सूर्य का मकर राशि में प्रवेश शाम या रात्रि को होगा, तो इस स्थिति में पुण्यकाल अगले दिन स्थानांतरित हो जाता है। शास्त्रों में उदय काल (सूर्योदय) को ही महत्व दिया गया है। ऐसे में उदयकालीन तिथि की मान्यता के अनुसार 15 जनवरी को ही सूर्योदय से लेकर दोपहर 11.28 बजे तक मकर संक्रांति पर्व का पुण्य काल रहेगा। इस दिन गंगा स्नान के लिए तीर्थ स्थल और संगम तटों पर श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़कर स्नान-दान का पुण्य लाभ अर्जित करता है। सूर्य के उत्तरायण होने से मनुष्य की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। उदयकालीन तिथि के अनुसार 15 जनवरी को ही सूर्योदय काल से दोपहर 11.28 बजे तक मकर संक्रांति के पुण्य काल में स्नान दान किया जाना लाभदायक है।


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मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव के सामने बोल दें ये दो नाम, पूरी होगी हर मनोकामना


हर व्यक्ति अपने जीवन में तरक्की, समाज में मान-सम्मान और वरचस्व चाहता है। व्यक्ति की चाहत होती है की जब भी वह कहीं समाज में रहे तो वह सबके आकर्षण का केंद्र रहे और कुछ लोगों की यह इच्छा पूरी भी होती है। लेकिन कुछ लोग इससे कोसो दूर होते हैं। ज्योतिष के अनुसार इसका सबसे बड़ा कारण कुंडली में सूर्य की स्थिति का गलत जगह होना दर्शाता है। ज्योतिषशास्त्र के अऩुसार सूर्य को आकर्षण, प्रभाव, सरकारी नौकरी और व्यक्ति के तेज का कारक ग्रह माना जाता है। इसी के साथ सूर्य पूजा करने से व्यक्ति को हर जगह मान-सम्मान, आकर्षण और वर्चस्व बना रहता है। वैसे सूर्य आराधना के लिए रविवार का दिन माना जाता है, लेकिन इसके अलावा हिंदू पंचांग के अनुसार सालभर में आने वाले प्रमुख त्यौहारों में से एक त्यौहार मकर संक्रांति भी सूर्य पूजा-आराधना, उपाय के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन माना जाता है। पंडित रमाकांत मिश्रा के अऩुसार संक्रांति के दिन सूर्योदय होते ही सूर्यदेव के सामने दो नाम बोल देने से सूर्य देवता प्रसन्न हो जाते हैं, वहीं कुंडली में सूर्य की अशुभ स्थिति को शुभता प्रदान करते हैं। व्यक्ति के कार्यों में आ रही रुकावटें दूर होती है। तो आइए जानते हैं मकर संक्रांति के दिन किन दो नामों को सूर्य देव के सामने बोलना चाहिए...

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सूर्यदेव के सामने 3 बार करें इस मंत्र का जाप

पंडित जी बताते हैं की संक्रांति के दिन सूर्यदेव को जल चढ़ाते समय 'ओउम कुबेर सूर्य आदिव्योम' नाम का 3 बार जाप कर लें। इस मंत्र का जाप करने से आपको सकारात्मक उर्जा प्राप्त होगी। जो आपके कार्यों में आ रही बाधाओं को दूर कर देगी। इसके अलावा इस मंत्र को सूर्यदेव के सामने बोलने से आपकी मनोकामनाएं भी जल्द पूरी होंगी। वहीं घर में क्लेश खत्म होकर सुख-शांति बनी रहेगी।


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Makar sakranti 2019: मकर संक्रांति पर सूर्य देव को ऐसे करें प्रसन्न, मिलेगा सरकारी नौकरी का वरदान


हिंदू पंचांग के अनुसार साल 2019 में मकर संक्रांति का त्यौहार 15 जनवरी को मनाया जाएगा। मकर संक्रांति के दिन सूर्य की उपासना का विधान माना जाता है, इस दिन सूर्य को प्रसन्न करने के लिए कई उपाय किए जाते हैं, वहीं सूर्य से वरदान भी पाते हैं। सूर्यदेव सभी नौ ग्रहों के राजा कहलाते हैं क्योंकि सूर्य बहुत सभी ग्रहों में ज्यादा शक्तिशाली और प्रभवी ग्रह हैं। इसके अलावा ज्योतिष के अनुसार सूर्य को शनिदेव के पिता माने जाते हैं और किसी भी जातक की कुंडली में सूर्यदेव की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण होती है। माना जाता है की जातक को सरकारी नौकरी दिलाने में सूर्यदेव एक अहम योगदान प्रदान करते हैं। वहीं व्यक्ति के वरचस्व और यश किर्ती का कारक ग्रह भी सूर्य को ही माना जाता है।

 

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सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए करें ये उपाय

1. यूं तो सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए रविवार का दिन सर्वोत्तम माना जाता है, लेकिन इसके अलावा साल में एक दिन मकर संक्रांति के दिन सूर्य उपासना, उपाय सूर्य से संबंधित दान-पूण्य कर उन्हें जल्दी प्रसन्न किया जा सकता है। इस दिन गेहूं और गुड़ गाय को खिलाने या किसी ब्राहमण को दान देने से पुण्य की प्राप्ति होती है। साथ ही कुण्डली का सूर्य मजबूत होता है। इसके साथ ही इस दिन सूर्य देव को उनके पसंदीदा आक का फूल चढ़ाने से व्यक्ति को 10 अशर्फियां मिलने जैसा फल प्राप्त होता है। इसके साथ ही यदि आप सूर्यदेव को मकर संक्रांति के दिन पूरी श्रद्धा से कदंब औऱ मुकुर के फूल अर्पित करता है तो उसकी सरकारी नौकरी, वर्चस्व में वृद्धि सहित कई मनोकामनाएं पूरी होती है।


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Makar sakranti 2019: मकर संक्रांति पर भूलकर भी ना करें ये काम, वरना सालभर होगा आर्थिक नुकसान


मकर संक्रांति का पर्व सूर्य देवता को समर्पित होता है और जब सूर्य गोचर करते हुए धनु राशि से मकर में प्रवेश करते हैं तो मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। मकर संक्रांति का पर्व हिंदुओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि इस दिन से सभी शुभ कार्यों पर लगी रोक खत्म हो जाती है। वहीं इस दिन दान-स्नान कर पूण्य की प्राप्ति होती है। यूं तो मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को मनाया जाता है, लेकिन इस बार 2019 में यह पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा। पंडित रमाकांत मिश्रा बताते हैं की मकर संक्रांति में कुछ कामों को करना बहुत शुभ माना गया है, वहीं कुछ कार्यों को वर्जित किया गया है। आइए जानते हैं इस दिन किन कार्यों को भूलकर भी नहीं करना चाहिए...

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कभी ना करें ये काम

1. मकर संक्रांति के दिन भूलकर भी लहसुन, प्याज और मांस का सेवन नहीं करना चाहिए।

2. मकर संक्रांति के दिन अपनी वाणी पर संयम रखें और गुस्सा ना करें, किसी को बुरे बोल ना बोलें सबके साथ मधुरता का व्यवहार करें।

3. मकर संक्रांति के दिन बिना स्नान किए भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन गंगा या किसी नदी में जाकर स्नान करना चाहिए। इसलिए गंगा या पवित्र नदी ना सही लेकिन कम से कम घर पर स्नान जरूर करना चाहिए।

4. मकर संक्रांति के दिन पुण्यकाल में महिलाओं को बाल नहीं धुलना चाहिए। ना ही दांत मांजने चाहिए।

5. इस दिन घर के अंदर या बाहर किसी पेड़ की कटाई-छंटाई भी नहीं करनी चाहिए।

6. मकर संक्रांति के दिन आप किसी भी तरह का नशा नहीं करें। शराब, सिगरेट, गुटका आदि जैसे सेवन से आपको बचना चाहिए। इस दिन मसालेदार भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन तिल, मूंग दाल की खिचड़ी इत्यादि का सेवन करना चाहिए और इन सब चीजों का यथाशक्ति दान करना चाहिए।

7. अगर सूर्य देव की कृपा पाना चाहते हैं तो संध्या काल में अन्न का सेवन न करें।

8. यह प्रकृति का त्योहार है और हरियाली का उत्सव। अत: इस दिन फसल काटने के काम को टाल देना चाहिए।

9. मकर संक्रांति के दिन अगर कोई भी आपके घर पर भिखारी, साधु या बुजुर्ग आए तो उसे खाली हाथ ना लौटा दें। जो अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ ना कुछ दान अवश्य करें।


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मकर संक्रांति 2019: तीन साल बाद इस तारीख को मनाई जाएगी मकर संक्रांति, बन रहा बेहद शुभ संयोग


हिंदू मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति को साल का पहला त्यौहार माना जाता है। मकर संक्रांति का पर्व हिंदुओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि इस दिन से सभी शुभ कार्यों पर लगी रोक खत्म हो जाती है। वहीं इस दिन दान-स्नान कर पूण्य की प्राप्ति होती है। यूं तो मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को मनाया जाता है, लेकिन इस बार 2019 में यह पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन को लेकर कई लोगों के मन में बहुत सी दुविधाएं रहती है की आखिर यह किस दिन मनाया जायेगा। वहीं पंडित रमाकांत मिश्रा बताते हैं की मकर संक्रांति का पर्व सूर्य देवता को समर्पित होता है और जब सूर्य गोचर करते हुए धनु राशि से मकर में प्रवेश करते हैं तो मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है।

makar sakranti 2019

शुरु होंगे शुभ व मांगलिक कार्य

नवग्रहों राजा सूर्यदेव 14 जनवरी की शाम को करीब 7:52 बजे मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इसी के साथ ही मकर संक्रांति की शुरुआत हो जाएगी। पंडित जी बताते हैं कि 14 जनवरी को दाेपहर 1:28 बजे से 15 जनवरी सुबह 11:52 बजे तक मकर संक्रांति का पुण्य काल रहेगा। इसके कारण लोग दोनों दिन ही दान-पुण्य और स्नान कर सकेंगे। लोगाें के लिए इस दिन का दान अत्यंत कल्याणकारी साबित होगा। अतः इस बाह दो दिन मकर संक्रांति मनाई जाएगी। वहीं शुभ कार्यों की फिर से शुरुआत हो जाएगी। 16 दिसंबर को सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करने के बाद से ही धनु पौष मास शुरू हो गया था। जिसके कारण सभी शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित थे। इसलिए एक महीने बाद सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही मांगलिक कार्यों का शुभारंभ होगा।


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11 दिसंबर को अंगारक चतुर्थी, श्री गणेश को प्रसन्न करने के लिए इस विधि से करें व्रत


हिंदू पंचांग के अनुसार हर माह शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायकी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन महिलाएं अपने परिवार, संतान की सुख-शांति के लिए व्रत रखती है। चतुर्थी तिथि श्री गणेश को समर्पित होती है और इस दिन उन्हें प्रसन्न करने के लिए व्रत, उपवास और विधि विधान से पूजा-पाठ की जाती है। पंडित रमाकांत मिश्रा बताते हैं की इस माह चतुर्थी 11 दिसंबर, मंगलवार को पड़ रही है। मंगलवार को चतुर्थी पड़ने से यह अंगारक गणेश चतुर्थी कहलाती है। इस बार व्रत मंगलवार को किया जाएगा। इस दिन पूरे विधि-विधान से पूजा करने से व्रती की हर मनोकामना पूरी होती है। आइए जानते हैं अंगारक गणेश चतुर्थी व्रत विधि....

vinayki chaturthi

अंगारक चतुर्थी व्रत विधि

सुबह जल्दी उठकर दैनिक कार्यों से निवृत हो जाएं। उसके बाद पूजन करने के लिए गणेश जी की प्रतिमा को तैयार कर लें। इसके बाद दोपहर के समय अपनी इच्छानुसार सोने, चांदी, तांबे, पीतल या मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा को स्थापित कर लें। प्रतिमा स्थापित करने के बाद संकल्प कर लें। संकल्प मंत्र के बाद श्री गणेश की षोड़शोपचार पूजन करें और आरती करें। गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं, फूल चढ़ाएं और ये सभ चढ़ाते समय साख में गणेश मंत्र ऊँ गं गणपतयै नम: का जाप करें।

गणेश जी को बूंदी के 21 लड्डुओं का भोग लगाएं। इनमें से 5 लड्डू मूर्ति के पास रख दें और 5 ब्राह्मणों को लड्डू दान कर दें। शेष लड्डू प्रसाद के रूप में बांट दें। पूजा में श्रीगणेश स्त्रोत, अथर्वशीर्ष, संकटनाशक स्त्रोत आदि का पाठ करें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा देने के बाद शाम को स्वयं भोजन ग्रहण करें। संभव हो तो उपवास करें। इस व्रत का आस्था और श्रद्धा से पालन करने पर भगवान श्रीगणेश की कृपा से मनोरथ पूरे होते हैं और जीवन में निरंतर सफलता प्राप्त होती है।


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kaal Bhairav ashtami: शिव ने इस दिन लिया था दुष्टों को दंड देने के लिए भैरव अवतार, जानें महत्व


शिव जी के कई स्वरुप हैं। वैसे तो भोलेनाथ जी अपने नाम के अऩुसार भोले हैं और वे हमेशा शांत ही रहते हैं। लेकिन कहा जाता है की जब भी भोलेनाथ जी को गुस्सा आता है तो वह विनाशकारी आता है। वहीं शव जी के दो रुपों का शास्त्रों व पुराणों में उल्लेख है। उनका पहला रुप विश्वेश्वर स्वरुप बहुत ही सौम्य और शान्त है जो की भक्तों का उद्धार करने वाला रुप माना जाता है। वहीं दूसरा काल भैरव स्वरुप दुष्टों को दंड देने वाला रौद्र, भयानक, विकराल रुप माना जाता है। शिवपुराण के अनुसार मार्गशीर्ष अगहन माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भैरवअष्टमी पड़ती है। अगहन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भैरव रूप का अवतार हुआ था। अतः उन्हें साक्षात् भगवान शिव ही मानना जाता है।

kaal bhairav ashtami

कालाअष्टमी का महत्व

शिव पुराण में कहा हैं कि काल भैरव भोलेनाथ की ही स्वरुप हैं। भगवान शिव ने काल भेरव के अवतार को कालाष्टमी के दिन लिया था इसलिए इस दिन इनकी पूजा अर्चना की जाती है। दुष्टों का नाश करने के लिए भगवान शिव को अपना रौद्र रुप भैरव अवतार लेना पड़ा। घर में नकारत्मक ऊर्जा, जादू-टोने, भूत-प्रेत आदि का भय नहीं रहता। कालभैरव भगवान शिव के अंश होने के कारण भैरव अष्टमी पर बाबा भैरव की पूजा करने से सारे कष्ट मिट जाते है और जाने -अनजाने में हुए सारे पापों से मुक्ति मिल जाती हैं। ऐसी मान्यता हैं काल भैरव की पूजा करने और व्रत रखने से सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्ति मिल जाती हैं साथ ही भूत पिशाच का कभी डर नहीं रहता हैं। इस दिन साधक भैरव जी की पूजा व अर्चना करके तंत्र-मंत्र की विद्याओं को हासिल करने के लिए तांत्रिक पूजा भी करते हैं।


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कालाष्टमी पर भूलकर भी ना करें ये काम, वरना हो सकता है बड़ा नुकसान


कालाष्टमी को काल भैरव भगवान की पूजा की जाती है। काल भैरव को भगवान शिव का रुप माना जाता है, कालाष्टमी जयंती 29 नंवबर, गुरुवार को मनाई जाएगी। इस दिन कुठ कार्यों को करने की मनाही होती है। भैरव जी की पूजा व भक्ति से भूत, पिशाच एवं काल भी दूर रहते हैं। शुद्ध मन एवं आचरण से जो भी कार्य करते हैं, उनमें इन्हें सफलता मिलती है। कालाष्टमी का व्रत धार्मिक ग्रन्थ के अनुसार जिस दिन अष्टमी तिथि रात्रि के दौरान बलवान होती है उस दिन कालाष्टमी का व्रत करना चाहिए। कालाष्टमी जयंती के दिन कई ऐसे काम हैं जिन्‍हें करने से पूजा का पूरा फल नहीं मिलता। आइए जानते हैं कालाष्टमी के दिन कौन से काम नहीं करना चाहिए....

 

kalashtami

1. काल भैरव जयंती यानी कालाष्टमी के दिन झूठ बोलने से बचें, झूठ बोलने से नुकसान आपको होगा।

2. कालाष्टमी के दिन अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिएष व्रत के दौरान आप फलाहार कर सकते हैं।

3. काल भैरव की पूजा कभी भी किसी के नाश के लिए न करें।

4. आमतौर पर बटुक भैरव की ही पूजा करनी चाहिए क्योंकि यह सौम्य पूजा है।

5. नमक न खाएं। नमक की कमी महसूस होने पर सेंधा नमक खा सकते हैं।

6. माता-पिता और गुरु का अपमान न करें।

7. बिना भगवान शिव और माता पार्वती के काल भैरव पूजा नहीं करना चाहिए।

8. गृहस्थ लोगों को भगवान भैरव की तामसिक पूजा नहीं करनी चाहिए।

9. गंदगी न करें। घर की साफ-सफाई करें।

10. कुत्ते को मारे नहीं। संभव हो तो कुत्ते को भोजन कराएं।


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Kartik purnima: कार्तिक पूर्णिमा के दिन जरुर करें ये एक काम, होगी हर मनोकामना पूरी


कार्तिक मास का विशेष महत्व माना जाता है, यह माह विष्णु जी को प्रिय होता है। इसलिए इस माह में विष्णु पूजा की जाती है और उन्हें प्रसन्न किया जाता है। इस दिन माह की पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा कहलाती है और इस पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन दीप दान व स्नान किया जाता है। पुराणों के अनुसार इस दिन दीपदान करने व नदी में स्नान करने से पूण्य की प्राप्ति होती है और पापों से मुक्ति मिलती है। कहा जाता है की जो मनुष्य कार्तिक मास में व्रत व तप करता है उसे मोक्ष मिलता है। कार्तिक मास में कुछ नियमों का पालन करना बहुत जरुरी बताया गया है, जिनका पालन करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। आइए जानते हैं वे नियम...

kartik purnima 2018

1. इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले अपने घर और गलियों की सफाई करना चाहिए। ऐसा करने वालों पर पूरे साल मां लक्ष्मी की कृपा रहती है।

2. कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपदान का अधिक महत्व माना जाता है। इस दिन शाम को तुलसी के नीचे घी का दीया अवश्य जलाएं और सुबह-शाम जल अर्पण करते हुए तुलसी की परिक्रमा अवश्य करें। इस दिन पुण्य कर्म करने वालों पर मां लक्ष्मी की कृपा भी बनी रहती है।

3. कार्तिक पूर्णिमा के दिन तुलसी पूजन करना बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। वैसे तो हर मास में तुलसी का सेवन व आराधना करना श्रेयस्कर होता है, लेकिन कार्तिक में तुलसी पूजा का महत्व कई गुना माना गया है।

4. भूमि पर सोना कार्तिक मास का तीसरा प्रमुख काम माना गया है। भूमि पर सोने से मन में सात्विकता का भाव आता है तथा अन्य विकार भी समाप्त हो जाते हैं।

5. कार्तिक पूर्णिमा के दिन व्रत, उपवास का अधिक महत्व माना जाता है। व्रती को इस पत्तों पर भोजन करना चाहिए, इससे व्रत का फल पूरा मिलता है।

6. कार्तिक महीने में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई आदि नहीं खाना चाहिए।

7. संयम रखें - कार्तिक मास का व्रत करने वालों को चाहिए कि वह तपस्वियों के समान व्यवहार करें अर्थात कम बोले, किसी की निंदा या विवाद न करें, मन पर संयम रखें आदि।


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कार्तिक पूर्णिमा के दिन इस चीज़ का दान होता है अनंत पुण्यदायी, जानें क्या करें दान


कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा कहा जाता है। हिंदू धर्म के अऩुसार कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान, दान व पूजा-पाठ का अधिक महत्व माना जाता है। इस बार कार्तिक पूर्णिमा 23 नवंबर 2018, शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी। हालांकि स्नान 22 नवंबर से ही प्रारंभ हो जाएंगे। इस पूर्णिमा को कई जगहों पर त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहा जाता है, पुराणों के अनुसार इस दिन महादेव ने त्रिपुरासुर नामक असुर का वध किया था। यही कारण है की इसे त्रिपुरी पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन ध्यान, धर्म, दान, स्नान अधिक किया जाता है। दान-पूण्य करने से अक्षय पूण्य की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं इस दिन क्या दान करना बहुत लाभकारी होता है और अनंत पुण्य प्रदान करता है....

kartik purnima

कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन विशेष पुण्यफल प्राप्ति के लिए करें इन चीज़ों का दान

1. कार्तिक पूर्णिमा के दिन गो दान का विशेष महत्व माना जाता है, गौ दान का अनंत पुण्यदायी फल प्राप्त होता है।

2. कार्तिक पूर्णिमा पर गरीबों को चावल दान करना बहुत शुभ होता है, चावल को चंद्रमा का कारक माना जाता है इस दिन चावल दान करने से चंद्र ग्रह से शुभ फल प्राप्त होते हैं।

3. पूर्णिमा के दिन पत्नी, बच्ची, माता को उपहार भेंट करें, इससे चंद्रमा की स्थिति ठीक होती है।

4. इसी तरह शिवलिंग पर कच्चा दूध, शहद व गंगाजल मिला कर चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते है।

5. कार्तिक पूर्णिमा के दिन अपने घर के मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण जरुर बांधें, इससे नकारात्मकता घर से खत्म हो जाती है।

6. कार्तिक पूर्णिमा पर अपने आंगन में रंगोली बनाएं व घर को फूलों से सजाएं। इससे घर में सदा ही सुख-समृद्धि बनी रहती है और नवग्रह भी प्रसन्न होते हैं।

7. पूर्णिमा पर चन्द्रमा के उदय होने के पश्चात खीर में मिश्री व गंगा जल मिलाकर मां लक्ष्मी को भोग लगाएं।


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देवउठनी ग्यारस के दिन इस समय जागेंगे श्री विष्णु, जानें मांगलिक कार्यों की कब होगी शुरुआत


देवउठनी एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष को देवउठनी एकादशी पड़ती है। इस दिन का हिंदू धर्म में बहुत महत्व माना जाता है, क्योंकि भगवान श्री विष्णु इस दिन चार माह की नींद के बाद जागते हैं। यह एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष को पड़ती है। इसके पहले आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी पड़ती है, जिस दिन श्री विष्णु क्षीरसागर में 4 माह के लिए शयन के लिए चले जाते हैं। मान्यताओं के अनुसार इन चार महिनों में बीच कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। वहीं देवउठनी ग्यारस के दिन भगवान विष्णु के जागने के साथ ही मांगलिक कार्यों की शरुआत हो जाती है।

देवउठनी एकादशी पारण मुहूर्त : 20 नवंबर को सुबह 06:47:17 से 08:55:00 तक

devuthni ekadashi

देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह का महत्व

देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह की मान्यता मानी जाती है। इस दिन हर घर, हर मंदिर में तुलसी जी का विवाह किया जाता है और इसी दिन से हिंदू धर्म में शादियों की शुरुआत हो जाती है। लेकिन शादियों से पहले तुलसी जी की शादी करवाई जाती है। देवउठनी एकादशी के दिन धूमधाम से तुलसी विवाह का आयोजन होता है। तुलसी विवाह में तुलसी के पौधे और विष्णु जी की मूर्ति या शालिग्राम पाषाण का पूर्ण वैदिक रूप से विवाह कराया जाता है। दिवाली के ठीक 11 दिन बाद यह आयोजन किया जाता है। इस तुलसी विवाह का 19 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन यह भी माना जाता है की जिन दंपत्ति को पुत्री नही हैं वे तुलसी पूजा के दिन कन्यादान का सुख प्राप्त कर सकते हैं।


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Chhath pooja 2018: छठ पर्व के पीछे छिपा है हैरान कर देने वाला वैज्ञानिक महत्व, यहां पढ़ें पूरी खबर


कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की छठ तिथि को छठ पूजा यानी सूर्य आराधना का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व चार दिन तक मनाया जाता है और पूरे भारत में इस पूजा का आयोजन एक साथ किया जाता है। भगवान सूर्य को समर्पित इस पूजा में सूर्य को अध्र्य दिया जाता है और छठी मैय्या की पूजा भी की जाती है। संतान की लंबी उम्र की कामना के लिए किया जाने वाला व्रत छठ पर्व बड़ी धूम-धाम व आस्था से मनाया जाता है। इस पर्व को हठ योग भी कहा जाता है, क्योंकि शीतकाल में आने वाले इस पर्व में शरीर को पूरी तरह साधने की जरुरत होती है। छठ पूजा व व्रत करने के पीछे पौराणिक महत्वों के साथ-साथ वैज्ञानिक महत्व भी बताए गए हैं। आइए जानते हैं छठ पर्व का वैज्ञानिक और पौराणिक महत्व के बारे में....

 

chhath parv

छठ पर्व का वैज्ञानिक महत्व जानें

क्या आप जानते हैं छठ पर्व के पीछे वैज्ञानिक महत्व भी छिपा हुआ है, छठ पर्व की परंपरा में छिपा विज्ञान बहुत ही गहरा है। देखा जाए तो छठ तिथी एक विशेष खगोलीय अवसर है। उस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में इकट्ठा होती हैं। इस पर्व के दौरान इकट्ठा हुई किरणों से सूर्य संभावित कुप्रभावों से मानव की रक्षा करने का सामर्थ्‍य रखते हैं। इस परंपरा में छठ पर्व का पालन करने से सूर्य इन किरणों (पराबैंगनी किरण) के हानिकारक प्रभावों से सभी जीवों की रक्षा करते हैं।

chhath parv

जानें छठ पूजा का पौराणिक महत्व

पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब राम-सीता 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया। पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया । मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगा जल छिड़क कर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। जिसे सीता जी ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।

एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। इसकी शुरुआत सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वो रोज घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है। छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा राजपाठ जुए में हार गए तब दौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था। लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।

वहीं छठ पर्व को लेकर ऐतिहासिक कहानियां भी प्रचलित हैं। पुराण में छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है। कहते हैं राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा। राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी और तभी से छठ पूजा होती है।


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Chhath 2018: नहाय खाय के साथ हुआ शरु हुआ छठ महापर्व, जानें महत्व


सूर्यदेव की उपासना का पर्व छठपर्व हिंदू धर्म का प्रमुख पर्व माना जाता है। चार दिन अलग-अलग रिवाजों के साथ मनाया जाने वाला पर्व कार्तिक मास की छठ के दिन से मनाया जाता है और इस वर्ष 11 नवंबर यानी आज से नहाय-खाय से शुरू हो चुका है और 14 नवंबर को समाप्‍त होगा। नहाय खाय के दिन व्रत रखने वाले श्रृद्धालु कुछ विशेष रीति रिवाजों और नियमों का पालन करके स्नान करते हैं। छठ मौय्या सूर्य की बहन हैं लेकिन छठ व्रत कथा के अनुसार छठ देवी ईश्वर की पुत्री देवसेना बताई गई हैं। देवसेना प्रकृति की मूल प्रवृति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं। देवी कहती हैं कि यदि तुम योग्य संतान चाहते हो तो मेरी विधिवत पूजा करो। पूजा करने के बाद व्रती भोजन ग्रहण करते हैं।

chhath

संतान की लंबी आयु की कामना के लिए होती है पूजा

छठ पूजा करने या उपवास रखने वाले लोग अपने-अपने कारण से पूजा करते हैं लेकिन मुख्य रुप से यह पूजा सूर्य देव की उपासना कर उनकी कृपा पाने के लिये की जाती है। महिलाएं अपने बच्चे की लंबी उमर के लिए तो पुरुष घर की खुश शांति के लिए यह पूजा करते हैं। सूर्य देव की कृपा से घर में धन धान्य के भंडार भरे रहते हैं। छठ माई संतान प्रदान करती हैं। सूर्य सी श्रेष्ठ संतान के लिये भी यह उपवास रखा जाता है। अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये भी इस व्रत को रखा जाता है।

 

chhath

इस दिन पालन किए जाने वाले रिति-रिवाज़

नहाय खाय पर्व छठ पर्व का पहला दिन होता है। इस दिन व्रत रखने वाले श्रृद्धालु नदी में डुबकी लगाते हैं और सूर्य देवता व छठ मैय्या का ध्यान करते हैं। इस दिन आत्मशुद्धि के लिए व्रती स्नान करते हैं, क्योंकि इस पर्व में पवित्रता का अधिक महत्व माना जाता है। कहा जाता है की इस दिन व्रत करके भोजन ग्रहण करने का विधान हैं और इस दिन से ही सूर्य साधना आरंभ होती है। नहाय खाय के दिन कच्चा यानी अरवा चावल को पकाकर कद्दू की सब्जी के साथ खाया जाता है। इस दिन चने की दाल को खाना भी शुभ माना जाता है। नहाय खाय के दूसरे दिन व्रती को खरना के समय भूखे रहकर प्रसाद तैयार करना होता हैं, प्रसाद में गुड़ से बनी चीज़ों को प्रमुखता से रखना होता है।


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