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खाने के शौकीन हो जाएं सावधान, अगर बरती लापरवाही तो जा सकती है जान


नई दिल्ली। आज की दुनिया में लोगों में बाहर के खाने का क्रेज़ बढ़ता ही जा रहा है। स्ट्रीट फूड, फास्ट फूड की साम्राज्य काफी तेज़ी से फैल रहा है। ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ किसी चुनिंदा देशों में ही है, बल्कि विश्वभर में लोग ऐसे खाने को पसंद कर रहे हैं। इसके साथ ही लोगों में ड्राई फ्रूट्स को लेकर भी काफी सजगता आ रही है। दुनियाभर में प्रसिद्ध ज़्यादा पसंद किए जाने वाले खाने में भारतीय खाने की डिमांड में भी तेज़ी से उछाल आया है। जिससे देश की संस्कृति को बाहर के देशों में बड़े स्तर पर पहचान मिल रही है।

लेकिन खाने-पीने की शौकीन दुनिया अब बाहर की चीज़ें ज़रुरत से ज़्यादा खाने लगे हैं, जिनकी वजह से उनकी जान पर खतरा बना रहता है। अगर आपने अपने खाने-पीने में कुछ सावधानियां नहीं बरती तो आपकी जान भी जा सकती है। आपकी सेहत का ख्याल हमें भी है इसलिए हम आपके लिए कुछ ऐसी जानकारियां लेकर आए हैं। जो आपके खाने-पीने में काफी बदलाव भी लाएगा और आपकी जान पर बने खतरे को भी टाल देगा।

आपको जानकर हैरानी होगी कि फुगू नाम की मछली विश्व की सबसे जहरीली मछली मानी गई है। फुगू मछली के बारे में कहा जाता है कि ये मछली साइनाइड से भी 1200 गुना ज़्यादा खतरनाक होती है। लेकिन बड़ी ही चौंकाने वाली बात है कि जापान के लोग जान की रिस्क लेते रहते हैं। दक्षिण एशिया में पैंजियम एडुले नाम के पेड़ मिलते हैं। कहा जाता है कि इसके फल बेहद ज़हरीले होते हैं। इसके अलावा कसावा भी खतरनाक चीज़ों में गिना जाता है। आमतौर पर इसे अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के प्रांतों में खाया जाता है। कसावा खाने के लिए काफी सावधानियां बरतनी पड़ती है, नहीं तो इससे जान भी जा सकती है।

भारत में बड़े स्तर पर खाए जाने वाला ड्राई फ्रूट काजू भी खतरनाक होता है। बता दें कि बाज़ारों में मिलने वाला कच्चा काजू आपकी जान लेने के लिए काफी है। कच्चे काजू के साथ लाल रंग के फूल और उनके फल में भी खतरनाक अम्ल मिलते हैं। इसके अलावा कई बार जंगली मशरूम भी बेहद ज़हरीले होते हैं, जिनसे आपकी जान पर खतरा मंडराने लगता है।


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यहां मिलते हैं ठग्गू के लड्डू तो बदनाम है कुल्फी


कानपुर.कंपू वाले बड़े दिलवाले, अतिथि की खातिरदारी में नंबर वन हैं। बाहरी शहरों से लोग जब अपने रिश्तेदारों के किसी समारोह में आते हैं तो वह सबसे पहले कानपुर के लजीज व्यंजन का स्वाद चखने के लिए निकल पड़ते हैं। शहर में  घूमने के लिए भले ही ज्यादा जगह न हो, लेकिन खाने के मामले में एक से बढ़कर एक लजीज व्यंजन मौजूद हैं। 54 साल की चाहे बनारसी चाय हो या चटपटी चाट फिर खस्ता कचौडी, यार ठग्गू के लड्डू की मिठास लाजवाब। सभी डिसेज इतने टेस्टी हैं कि लोग चटखारे लगाकर इनका स्वाद लेते हैं | 

साहू की कचौड़ी का अपना अलग ही स्वाद

आर्य नगर में करीब 30, साल पहले एक ठेले में कचौड़ी बनती थी, लोग सुबह नाश्ते के लिए राजू के ठेले के पास लाइन पर खड़े हो जाते है। इतने साल बीत जाने के बाद भी साहू की कचौड़ी ग्राहकों की आज भी सुबह की पहली पसंद बनी हुई है। रीजू साहू ने न कचौड़ी बनाने का तरीका बदला और न ही ठेला। यहां के लोगों का कहना है कि अगर सुबह का नाश्ता अगर साहू कचौड़ी वाले के यहां न होतो दिन अधूरा सा लगता है। आलू के स्पेशल मसाला भरी, कचौड़ी और छोले की चटपटी सब्जी और सलाद के साथ कचौड़ी का स्वाद ही कुछ और है। गर्मा-गर्म स्पेशल कचौडिय़ों की बात ही कुछ और है।

गोपाल के भरवां खस्ते का टेस्ट कुछ अलग

खस्ते तो कई तरह के होते हैं लेकिन नरौना चौराहे स्थित गोपाल के स्पेशल भरवां खस्तों की तो बात ही कुछ और है। मैदा के बने छोटे-छोटे खस्तों में चटपटे आलू भरकर उसमें छोटे-छोटे दही बड़े भरकर जब पुदीने, हरी मिर्च और खटाई की जायकेदार चटनी से भीगी हरी मिर्च के साथ खाते हैं तो मजा आ जाता है | 

आम-ओ-खास, यहां की नमकीन लाजवाब 

असलम खान निवासी नेहरु नगर और आंनद निगम जवाहर नगर के परिजनों का कहना है कि जब भी हमारे बेटे दुबई से आते हैं तो आदर्श की नमकीन ले जाना नहीं भूलते। असलम के पिता साजिद ने बताया कि हम 20 साल से यहीं से नमकीन खरीदते हैं, क्योंकि टेस्ट के साथ क्वालिटी आदर्श नमकीन की अलग ही है। बिरहाना रोड की आदर्श नमकीन तो पूरे प्रदेश में फेमस है। हर आम-ओ-खास यहां का स्पेशल ढोकला नाश्ते में खाए बिना रह नहीं पाता है। बिल्कुल स्पंजी ढोकला, राई और नमक के घोल से छुकी हुई मोटी हरी मिर्च के साथ ढोकले का स्वाद ही निराला लगता है। यहां मिलने वाली स्पेशल पंचम दालमोठ भी बेहद जायकेदार है। 

बनारसी की चाय में है गजब कि मिठास 

कानपुर आने वाले ने शख्स ने अगर बनारसी टी स्टॉल की स्पेशल चाय की चुस्कियां नहीं लीं तो फिर कुछ नहीं किया। जी हां, मोतीझील चौराहे पर 1953 में खुली बनारसी टी स्टॉल पर दिनभर में 7000 से ज्यादा स्पेशल चाय की बिक्री होती है। चाय में पका हुआ लाल दूध, स्पेशल चाय मसाला और दानेदार चाय की पत्ती का यूज होता है। ओनर अनिल गुप्ता का कहना है कि दादा जी की खोली दुकान आज उनके बेटे चला रहे हैं। जब उनसे पुरानी दुकान के राज के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि पुरानी दुकान को सही करवाने के लिए दो-तीन महीने का टाइम चाहिए। ये टाइम नहीं मिल पा रहा है क्योंकि एक दिन भी दुकान बंद रहती है तो कस्टमर घर आकर चाय पिलाने को कहते हैं।

कचहरी के राजकुमार के छोले-भठूरे

चटपटे स्पेशल छोले-भठूरे खाने के लिए शहर वाले कचहरी रोड स्थित राजकुमार की दुकान पर ही लोग पहुंचते हैं। तेज मसालेदार छोले खाकर मजा आ जाता है। छोले-भठूरे के साथ स्पेशल चटपटा आचार और सूखे आलू जायके को और बढ़ाते हैं। कचहरी में राजकुमार के छोले का अगर लुफ्त उठाना है तो साहब आपको एक घंटे पहले टोकन लेना होगा, जब नंबर आएगा, तभी छोले - भटूरे का स्वाद चख पाएंगे।

बदनाम कुल्फी

40 साल से शहर के लोगों के जुबान पर राज करने वाली बदनाम  बदनाम कुल्फी के टेस्ट का क्या कहना। खोया, मेवा और खोए से निर्मित ये स्पेशल कुल्फी बनाने में कई घंटे लगते हैं। इसको जमाने के लिए भी स्पेशल टेक्निक का यूज किया जाता है इस स्पेशल कुल्फी की बात निराली है।

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खास है ये लड्डू, सर्दियों में इसे न चखा तो क्या चखा



लखनऊ.
मुरमुरे यानी लाई के लड्डू बहुत ही आसानी से बन जाते हैं और लोगों को भी बहुत पसंद आते है। सर्दी के मौसम के चलते आयरन, कैल्सियम और फाइबर भरपूर इसके लड्डू बहुत स्वाद और सेहत के लिये पसंद किये जाते हैं। बेहद हल्के फुल्के ये लड्डू मकर संक्रांति के मौके पर खास तौर से बनाए जाते हैं। मुरमुरे के लड्डू (Murmure Ke Laddu) के लिए सामग्री भी बहुत कम लगती है।

विधि


लाई को कढ़ाई में डालकर मीडियम आग पर 2-3 मिनिट भून लीजिये और अलग प्याले में निकाल लीजिये, लाई क्रिस्प हो जायेगी।

कढ़ाई में घी डालकर गरम कीजिये, गैस मीडियम और धीमी रखिये, घी मेल्ट होने के बाद गुड़ डालिये और गुड़ को चलाते रहें जब तक कि गुड़ पूरी तरह से मेल्ट न हो जाय।

गुड़ मेल्ट होने पर गैस एकदम धीमी कर दीजिये और लाई को गुड़ के ऊपर डालिये और अच्छी तरह से गुड़ और लाई को मिला लीजिये। गैस बन्द कर दीजिये और कढ़ाई को गैस से उतार लीजिये।

murmure

एक प्याली में थोड़ा पानी ले लीजिये। मिश्रण को थोड़ा ठंडा होने दीजिये, हाथ पर थोड़ा सा पानी लगाकर हाथ को गीला कर लीजिये, थोड़ा सा मिश्रण हाथ में उठा लीजिये और दोंनो हाथों से थोड़ा दबाव देते हुये गोल लड्डू बना लीजिये, बने लड्डू को प्लेट में रख दीजिये और सारे लड्डू इसी तरह बना कर तैयार कर लीजिये।

लाई के लड्डू बनकर तैयार हैं, बहुत अच्छे लड्डू बने हैं, लड्डू को 3-4 घंटे के के लिये खुले हवा में छोड़ दीजिये, लड्डू खुश्क हो जायेंगे, अब लड्डू को कन्टेनर में भर कर रख लीजिये और 2-3 महिने तक खाते रहिये।

सुझाव:

    लाई के लड्डू के लिये गुड़ नरम और अच्छी वैराइटी का लीजिये. गुड़ और लाई का अनुपात सही रखें.
    गुड़ और लाई के मिश्रण को ज्यादा ठंडा न होने दें, हल्का गरम गरम में लड्डू बनाकर तैयार कर लीजिये.


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अंगूर खाना शुरू करें, ताकि किडनी रहे HEALTHY



लखनऊ.अगर आप कोल्डड्रिंक्स पीने के शौकीन हैं। रोजाना सॉफ्ट ड्रिंक पीते हैं और इसकी लत लग गई है। तो आपको सावधान होने की जरूरत है। यह शौक आपकी किडनी को खराब कर सकता है। अब कोल्डड्रिंक्स पीने के बजाए आप अंगूर खाना शुरू कर दें। अंगूर आपकी किडनी को सेहतमंद रखने में मददगार साबित होगा।

केजीएमयू के ट्रामा सेंटर प्रभारी और यूरोलॉजिस्ट डॉ.एसएन शंखवार ने बताया कि अपने खान पान और रहन सहन में बदलाव लाकर लोग अपनी किडनी को स्वस्थ रख सकते हैं। लापरवाही के कारण आज लोग किडनी रोग के मरीज बनते जा रहे हैं।

किडनी की समस्या की शुरूआती लक्षण
पैरों और आंखों के नीचे सूजन
चलने पर जल्दी थकान, सांस फूलना
रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना
भूख न लगना, हाजमा ठीक न रहना
खून की कमी से शरीर पीला पड़ना

किडनी को दुरूस्त रखने के लिए यह करें
रोजाना आठ से 10 गिलास पानी पीएं
फल और हरी सब्जियां ज्यादा खाएं
अंगूर खाएं क्योंकि ये किडनी से फालतू यूरिक एसिड निकालते हैं
मैग्नीशियम वाली चीजें जैसे हरी सब्जियां खूब खाएं 
खाने में नमक, सोडियम और प्रोटीन की मात्रा घटा दें
35 की उम्र पार कर चुके हैं तो ब्लड प्रेशर और शुगर की जांच कराएं
न्यूट्रीशन से भरपूर खाना, कसरत, वजन कंट्रोल में रखना जरूरी 

यह आदतें खराब कर रही हैं किडनी
पेशाब रोकना
कम पानी पीना
बहुत ज्यादा नमक खाना
हाई बीपी को नजरअंदाज करना
डायबिटीज मेंटेन नहीं रखना
मांस का सेवन अधिक करना
दर्द निवारक दवाओं का इस्तेमाल करना
शराब पीना
सॉफ्ट ड्रिंक्स और सोडा लेना


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मां के हाथ का खाना छूटा, सेहत से नाता टूटा



केस 1- अमन मथुरा का रहने वाला है और आगरा में रूम लेकर रहता है। उसे यहां खाने की समस्या का सामना करना पड़ता है। कुछ समय तक वह रेस्त्रां व होटलों में दोस्तों के साथ खाना खा लेता था, लेकिन खाना उसे रास नहीं आया। फिर उसने टिफिन लगा लिया, लेकिन तब भी उसे खाने में संतुष्टि नहीं मिली। खान-पान सही न होने और बाहर का खाने से वह अक्सर बीमार हो जाता है ।

केस2- रागिनी आगरा में द्वितीय वर्ष की छात्रा है और हॉस्टल में रहती है। यूं तो हॉस्टल में खाना समय पर मिलता है लेकिन खाना इतना पौष्टिक व स्वाद वाला ना होने से वह भी बाहर का खाना आए दिन खाती है। एसे में खाने-पीने का संतुलन बिगडऩे से उसका वजन दिन-ब-दिन घटता जा रहा है। आज उसे अपने मां के हाथ से बने खाने का महत्व पता चल रहा है।

घर का खाना ही बेस्ट
आगरा. मां के हाथ के खाने की कोई होड़ नहीं होती। जब तक घर में रहते हैं, तब तक इस बात का अंदाजा नहीं होता कि मां के हाथ का बना खाना सेहत के लिए वरदान है, लेकिन जैसे ही पांव घर से बाहर पड़ते हैं, इसका मूल्य पता चल जाता है। डॉक्टर्स भी इस बात को मानते हैं कि मां के हाथ का खाना या कहें घर का खाना ही बेस्ट होता है। लेकिन, जो लोग घरों से दूर रह रहे हैं, उनके लिए ये संभव नहीं होता। ऐसे में वे जल्द बीमारियों की चपेट में आते हैं और उनकी सेहत भी बिगड़ जाती है। इसके अलावा फास्ट फूड का कल्चर भी लोगों की विशेषकर युवाओं की सेहत को बिगाड़ रहा है। 

आता है बहुत याद
आगरा के कई युवा जो अपने-अपने घरों से दूर रह रहे हैं, वे यह मानते हैं कि उनकी फूड हैबिट्स खराब हो चुकी हैं। वे यहां घर के बने खाने को मिस करते हैं।  शहर के सरकारी चिकित्सालय के सीनियर फिजीशियन डॉ. अमित महाजन के अनुसार के अनुसार, मां के हाथ का खाना या घर का बना खाना सेहत के लिए बेस्ट होता है। लेकिन, अब लोग ज्यादातर पति-पत्नी जॉब में होते हैं, बच्चे कहीं दूर शहरों में पढ़ाई कर रहे होते हैं तो इससे घर के बने खाने में अंतराल आ जाता है। वे कभी जहां साल भर घर का खाना खाते होते हैं, वहीं अब कुछ महीने ही घर का खाना खा पाते हैं। 

हावी है फास्ट फूड कल्चर
अधिकतर बाहर का खाना खाने से सेहत खराब हो जाती है। वहीं, अभी जो फास्ट फूड का कल्चर हावी है, उससे भी स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। विशेषकर, बच्चे और युवा क्रॉनिकल इलनेस का शिकार हो रहे हैं। बीमारियां उन्हें तुरंत पता नहीं पड़ती लेकिन बाद में जाकर इसका पता चलता है। गर्मियों में सबसे ज्यादा उल्टी-दस्त के मरीज आते हैं। इसमें या तो वो गलत खान खा लेते हैं या फिर खाने के प्रति लापरवाही या किसी चीज में मिलावट उनको अपनी चपेट में ले लेती है।


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अपने भोजनालय पर हर अपने को मिलता है खाना


आगरा. आज समय वो आ चुका है कि गरीब को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं हो रही है। ऐसे में भूखे गरीबों को खाना खिलाकर बेहद पुण्य का काम किया जा रहा है धनौली रोड स्थित अपना भोजनालय पर। यहां प्रतिदिन 200 लोगों को निशुल्क खाना खिलाया जाता है। कुछ लोग तो ऐसे हैं, जिनका प्रतिदिन का पेट पालन यहीं पर हो रहा है।

धनौली रोड पर है अपना भोजनालय
केदारनाथ बद्रीनाथ सेवा संस्थान द्वारा गरीबों के पेट भरने का काम किया जा रहा है। अपना भोजनालय की स्थापना छह माह पूर्व धनौली रोड पर अजीत नगर के पास की गई थी। यहां पर ऐसे गरीब बच्चे, जो दिनभर रोड पर घूमते हैं, बुजुर्ग जो बेघर हो चुके हैं, ऐसी महिलाएं जो काम नहीं कर सकती, भीख मांगती हैं, उनके लिए दो वक्त के भोजन की व्यवस्था रहती है।

थोड़े से प्रयास से बन गया कारवां
श्रीकेदारनाथ बद्रीनाथ धर्मार्थ सेवा संस्थान के सचिव शम्भू दयाल शर्मा ने बताया कि थोड़े से प्रयास से यह कारवां बनता चला गया। संस्थान के अध्यक्ष डॉ. महेन्द्र कुमार पाराशर का इसमें बडा सहयोग रहा है। जब हम दोनों सड़क पर घूमने वाले इन गरीबों को भूखे पेट भटकते देखते थे, तो बड़ी पीड़ा होती थी। वहीं से संकल्प लिया, कि अब इन गरीबों को भूखे पेट रात  नहीं काटनी पड़ेगी। जब अपना भोजनालय की शुरुआत की, तो कुछ लोग खाने के लिए आते थे, लेकिन आज 200 लोगों को खाना खिलाते हैं।

समाजसेवियों की मदद
अपना भोजनालय चलाने के लिए समाजसेवियों की मदद ली जाती है। जिस माह दानियों की   कमी होती हैं, उस माह का खर्चा डॉ. महेन्द्र कुमार पाराशर और शम्भू दयाल शर्मा अकेले ही करते हैं, लेकिन भोजन खिलाने का यह सिलसिला टूटने नहीं देते हैं।

पांच गांवों को गोद लेने की तैयारी
संस्थान के अध्यक्ष डॉ. महेन्द्र कुमार पाराशर ने बताया कि जल्द ही संस्थान द्वारा पांच ग्राम पंचायतों को गोद लिया जा रहा है। संस्था द्वारा गोद ली जाने वाली ग्रांम पंचायतों में शौचालय, स्वास्थ केन्द्र, स्कूल, रोजगार केन्द्र, सोलर स्ट्रीट लाइट लगवाई जाएंगी।, गांव के लोगों के लिए मिनरल वाटर की व्यवस्था भी कराई जाएगी। ये कार्य वर्ष 2015-16 में ही कराए जाएंगे।


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ये हैं गरीबों के सैंटा, लोगों का भरते हैं पेट


नोएडा।  महंगाई के इस जमाने में पांच रुपए में पेटभर खाने की बात बेमानी सी लगती है, लेकिन नोएडा में समाजसेवी अनूप खन्ना ने इस सपने को सच करने का बीड़ा उठाया है। गरीब लोगों को पेटभर खाना खिलाने की चाहत रखने वाले समाजसेवी अनूप खन्ना ने नोएडा के सेक्टर 29 स्थित गंगा कांप्लेक्स में महज पांच रुपए में गरीबों को सस्ता खाना खिलाने का बीड़ा उठाया है। जिस वजह से लोगो को खन्ना किसी सैंटा से कम नहीं लगते हैं।

अनूप खन्ना ने दादी की रसोई के नाम से इस सराहनी कदम की शुरुआत अगस्त 2015 में  की थी। अनूप खन्ना बताते हैं कि उनकी दादी हमेशा खिचड़ी खाती थीं और उनसे कहती थी कि मैं तो सिर्फ खिचड़ी खाती हूं। ऐसे में मेरे खाने के खर्च में काफी कमी आई होगी। लिहाजा मेरे खाने से हो रही बचत से गरीबों को खाना खिलाने की शुरुआत करो। 

dadi ki rasoi

दूसरे शहरों में भी शुरू करने की है योजना

दादी की इसी प्रेरणा से प्रभावित होकर अनूप खन्ना ने इस सामाजिक सरोकार के कदम को उठाते हुए नोएडा में इसकी शुरुआत की। अनूप बताते है कि आने वाले समय में इसे अन्य शहरों में भी शुरु करेंगे। 

पांच रुपये में देते हैं देसी घी के तड़के वाली दाल

महज पांच रुपये में अनूप गरीबों को देसी घी के तड़के वाली दाल, चावल, अचार, रोटी और सब्जी सहित अन्य खाद्य सामग्री भी परोसते हैं।

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क्रिसमस में खाएं अदरक केक, दूर रहेंगी बीमारियां


लखनऊ. क्रिसमस के त्योहार में केक का खास महत्व होता है। इस मौके पर लोग केक काट के खुशियां मनाते हैं। इस मौके पर केक की खास मांग होती है। इसके चलते लखनऊ में केक की दुकानें सज गई हैं। लखनऊ की तमाम दुकानों पर कई तरह के केक मिल जाएंगे।

केक के महत्व को समझते हुए लखनऊ की दुकानों पर इस समय तमाम तरह के केक उपलब्ध हैं, लेकिन इस बार बाजार में एक खास केक अदरक का केक मिल रहा है। इस केक की खास बात ये है कि ये केक स्वादिष्ट होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हैं क्योंकि इस केक में उचित मात्रा में अदरक व ठंड़ के मौसम में फायदा पहुंचाने वाले पदार्थ डाले जाते हैं जो हमें स्वाद देने के साथ हमारे शरीर को भी फायदा पहुंचाते हैं।

अदरक के केक को लेकर ये भ्रांति हो जाती है कि ये केक बाकी केकों की तरह स्वादिष्ट नहीं होता है क्योंकि इस केक के साथ अदरक का नाम जुड़ा होता है। इसका स्वाद तीखा होता है, लेकिन ऐसा नहीं है। लखनऊ के एक प्रतिष्ठित दुकान के मालिक मनोज ने बताया कि ये केक खाने में वैसा ही स्वादिष्ट होता है, जैसा बाकी केक होते हैं।

इस केक की खास बात ये है कि ये आप को सर्दी में होने वाले रोगों से भी बचाता है क्योंकि इसमें उचित मात्रा में अदरक के पेस्ट को डाला जाता है जो ठंड से बचाने के साथ-साथ केक के स्वाद को भी बढ़ाता है। लखनऊ के बाजार में ये केक पांच सौ रूपए से लेकर हजार रूपए की कीमत में मिल रहा है।

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सैंटा केक खास बनाएगा आपका क्रिसमस


नोएडा। क्रिसमस डे में सिर्फ एक दिन बाकी है। इसके लिए मार्केट में चारों तरफ तैयारियां जोरों से चल रही हैं। चर्च से लेकर मार्केट तक हर तरफ रौनक है। घरों में बच्चे सिर पर सैंटा की टोपी लगाए घूम रहे हैं। बच्चों को सालों भर इस त्योहार का इंतजार रहता है। दरअसल इस दिन सभी बच्चों को सरप्राइज गिफ्ट जो मिलते हैं। उन्हें इंतजार रहता है कि सैंटा रात को आएंगे और भर-भर के उनका मनचाहा गिफ्ट लाल मोजे में रखकर चले जाएंगे। बच्चों के साथ ही बड़ों को भी गिफ्ट के अलावा क्रिसमस केक का इंतजार रहता है।

क्रिसमस में केक का काफी महत्व होता है। इसके लिए मार्केट भी पूरी तरह से तैयार रहता है। काफी समय पहले से ही बेकर्स अलग-अलग प्रकार के केक बनाने की तैयारियों में लग जाते हैं। इसमें लाल रोशनी में सैंटा क्लाॅज की टोपियां, ड्रेसेज, स्वीट्स, टॉफीज, गिफ्ट्स, कुकीज, मास्क, घंटियां, स्टार और बॉल के आकार वाले केक की सबसे ज्यादा डिमांड होती है।

अट्टा मार्केट है बेस्ट अाॅप्शन

अगर आप नोएडा में रह रहे हो तो अट्टा मार्केट बेस्ट ऑप्शन है। यहां पर आपको सैंटा पेंसिल, सैंटा कैप और सैंटा मास्क के आकार में कई प्रकार के केक मिल जाएंगे। अगर आपका बजट थोेड़ा ज्यादा है तो इसमें कई फ्लेवर और सजावट वाले केक नोएडा स्थित किसी भी मॉल में मिल जाएंगे। इनकी कीमत 250 रुपए से हजारों तक है।

घर में बनाते हैं केक


क्रिसमस-डे पर बच्चों के साथ बड़ों में भी केक खाने की एक्साइमेंट होती है। कुछ लोग जहां बेकर्स से रेडिमेट केक बनवाते हैं तो वहीं, कुछ लोग इसे घर में ही अपने अंदाज में बनाना पसंद करते हैं। इसके लिए सामान मार्केट में आसानी से मिल जाता है।

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ये हैं यूपी के 10 स्वादिष्ट व्यंजन, आप भी लीजिए मजा



लखनऊ.
अच्छे और लजीज खाने की चाह सभी की होती है। स्वाद के मामले में यूपी भी किसी से पीछे नहीं है। यहां हर कोने में एक से बढ़कर एक लजीज व्यंजन मिलते हैं। इनका स्वाद भी ऐसा कि नाम लेते ही मुंह में पानी आ जाए। इसे यहां खानपान की संस्कृति की विरासत ही कहेंगे कि देश-विदेश के सैलानी यूपी के जिस भी हिस्से में जाते हैं, वहां के मशहूर व्यंजन का आनंद जी भर के लेते हैं। पत्रिका उत्तर प्रदेश आपको यूपी के दस लजीज खाने के बारे में बताने जा रहा है।

लखनऊ की शान टुंडे कबाब
बात यदि नवाबों की नगरी लखनऊ की खासियत की हो और टुंडे कबाब का नाम नहीं लिया जाए तो बईमानी होगी। टुंडे कबाब का स्वाद सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर है। टूंडे कबाब की रेसिपी ऐसी होती है कि इसे मुंह में डालते ही घुल जाता है। राजधानी में टुंडे कबाब की सबसे पुरानी दुकान चौक में अकबरी गेट के पास एक गली में है। दुकान पर बैठने वाले अबु बकर बताते हैं कि उनके पुरखे भोपाल से करीब 200 साल पहले आए थे। उनके नाना के वालिद हाजी मुराद अली भोपाल के नवाब के बावर्ची थे। नवाब को खाने-पीने का बहुत शौक था लेकिन बुढ़ापे की वजह से उनके दांत चले गए थे। इस वजह से वह नॉनवेज नहीं खा पाते थे। इस वजह से

नवाब ने उनके नाना से कुछ ऐसा बनाने की फरमाइश की, जिसे खाने में दांतों का इस्तेमाल न करना पड़े। बस फिर क्या था, बावर्ची ने मांस को बारीक पीसकर अच्छे-अच्छे मसालों और पपीता डालकर ऐसा कबाब बनाया गया जो मुंह में रखते ही घुल गया। कबाब में

बड़े यानी भैंस और छोटे यानी बकरे, दोनों के गोश्त का इस्तेमाल होता है। इसमें कई तरह की जड़ी-बूटियों के साथ 135 तरह के मसालों का इस्‍तेमाल होता है।इसे ही गिलावटी कबाब कहते हैं, जो आज टूंडे कबाब के नाम से अवध की शान है।

मेरठ की घेवर
यूपी का मेरठ जिला घेवर मिठाई के लिए भी मशहूर है। सावन के मौसम में यह सबसे ज्यादा बिकने वाली मिठाई होती है। यह छोटे-बड़े साइज के ज्यादातर तीन तरह के घेवर मिलते हैं। सादा घेवर, मसाला घेवर और मावा वाला घेवर। इसमें मिलने वाली सभी सामग्री शुद्ध होती है। यह मिठाई जुलाई से बिकना शुरू हो जाती है और सितंबर के पहले हफ्ते तक बिकती है। यहां के घेवर का स्वाद ऐसा होता है कि जो भी एक बार चख ले, वो इसका दीवाना हो जाता है।

मक्खन मलाई
सर्दियों में राजधानी में मक्‍खन मलाई की भी अपनी अलग पहचान होती है। इस मिठाई का नाम भले ही मक्खन मलाई है लेकिन इसे सिर्फ दूध के झाग को अच्छे से फेंटकर बनाया जाता है। इसके बाद दबाकर इसे गाढ़ा किया जाता है। इसे बनाने के लिए दूध में में सबसे पहले थोड़ा ताजा सफेद मक्खन मिला देते हैं। इसके बाद इसे रात में खुले में रख देते हैं, ताकि मक्खन मलाई ठंडी हो सके। सुबह तड़के ही दूध-मक्खन के इस मिश्रण को मथना शुरू किया जाता है। धीरे-धीरे इसमें झाग उठने लगता है। इसे दबाया जाता है। इस प्रक्रिया को

कई बार दोहराया जाता है। जब काफी मात्रा में झाग जमा हो जाता है तो इसे ओस में रखा जाता है। ओस में नमी में पाकर झाग फूलने लगता है। इस तरह मक्खन मलाई तैयार हो जाती है। इसके बाद आखिर में इसमें केवड़ा, इलायची और चीनी डाली जाती है।

आगरा का पेठा
पूरी दुनिया में आगरा सिर्फ ताजमहल के लिए ही मशहूर नहीं है, बल्कि यहां का पेठा की भी अपनी खासियत है। बताया जाता है कि 1940 के दशक में दो तरह के पेठे बनते थे। अब 50 से ज्‍यादा तरह के पेठे बन रहे हैं। गर्मियों के दिनों में यह पेठा पानी के साथ खाया जाता है। इसका स्वाद भी लाजवाब होता है। आगरा में पेठे बनाने का शुरुआत ताजमहल निर्माण के दौरान हुई थी। उस समय जब काम करते-करते थक जाते थे तो वे पेठा खाने के बाद थोड़ा आराम करके अपनी थकान मिटाते थे।

शीरमाल
टूंडे कबाब की तरह ही शीरमाल लखनऊ की पहचान से जुड़ा है। कहा जाता है कि साल 1830 में नवाब नसरुद्दीन के खानसामा (रसोईया) जानाशीन अली हुसैन� थे। एक दिन नवाब ने उनसे कुछ खास बनाने को कहा, जिसकी स्वाद अब तक सबसे अलग

हो और जिसे नजराने में हिंदुओं को दिया जा सके। यह सुनकर जानाशीन अली हुसैन ने ईरान से एक तंदूर मंगाया। इसका नाम बाकरखानी (बड़ी गोल रोटी) था। इसे बनाने में मैदा, मेवे, जाफरान, देसी घी और दूध का इस्तेमाल हुआ था। नवाब ने जब बाकरखानी को तोड़कर चखा तो वो इसके मुरीद हो गए। उन्होंने कहा कि यह सबसे बेहतरीन है। नवाब द्वारा रोटी को चीरने के कारण इसे चीरमाल कहा जाने लगा, जो बाद में शीरमाल हो गया।

वाराणसी की लस्सी
वाराणसी की लस्सी की भी काफी मशहूर है। वाराणसी में लस्सी के कुल 75 फ्लेवर मिलते हैं। इसमें चॉकलेट, मिक्स फ्रूट, ऑरेंज, चटपटी लस्सी, मिर्ची वाली लस्सी और आम वाली लस्सी शामिल है। भारत यात्रा के दौरान विदेशी सैलानी बनारसी लस्सी का

लुत्फ लेना नहीं भूलते। बनारसी खानपान पूरी दुनिया में मशहूर है। वाराणसी की हर गली में लस्सी की दुकानें हैं। यहां पर रोजाना लस्सी पीने वालों की भीड़ लगी रहती है। इसमें देशी विदेशी सैलानी भी होते हैं। इसके अलावा यहां की ठंडई भी काफी मशहूर है।

उरई के गुलाब जामुन
उरई रेलवे स्टेशन पर मिलने वाले गुलाब जामुन भी काफी मशहूर हैं। यहां रेलवे स्टेशन पर उतरने वाला यात्री उरई के रसगुल्ले का स्वाद लेना नहीं भूलता था। स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके पूर्वजों के अनुसार उरई रेलवे स्टेशन पर आजादी से पहले गुलाब जामुन बिकते थे। उन्होंने बताया कि साल 1936-37 में हलवाई शंकर ठेकेदार ने उरई रेलवे स्टेशन पर गुलाब-जामुन बनाकर बेचने की शुरूआत की। अंग्रेजों के जमाने में झांसी से आने वाली ट्रेन उरई तक आती थी। फिर, यहीं से वापस झांसी लौट जाती थी। वहीं, कानपुर से आनी वाली टेन उरई तक होकर वापस लौट जाती थी।

बनारसी पान
खानपीन की बात चले और बनारसी पान का जिक्र न हो, ऐसा तो मुमकिन नहीं है। बनारसी पान काशी की पहचान है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि फिल्म डॉन का लोकप्रिय गाना खाइके पान बनारस वाला आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। काशी में पान की दुकान हर नुक्कड़ मिल जाएगी। इसके अलावा वाराणसी के बाहर भी ज्यादातर पान की दुकानों पर बनारसी पान भंडार लिखा हुआ मिला जाएगा।

मथुरा के पेड़े
मथुरा के पेड़े भी पूरी दुनिया में मशहूर है। जो स्वाद यहां के पेड़े में है, वह कहीं नहीं मिलेगा। मथुरा का एक पेड़ा भी चखते हैं तो कम से कम चार पेड़े खाए बिना नहीं रह पाएंगे। पारंपरिक मथुरा के पेड़े गाय के दूध से बनाए जाते थे। हालांकि, आजकल भैंस के दूध से भी पेड़े बनाए जाते हैं। इसे बनाने के लिए मावा और तगार का भी उपयोग किया जाता है।

ठग्गू के लड्डू
कानपुर के ठग्गू के लड्डू और बदनाम कुल्फी का स्वाद पूरे देश-दुनिया में मशहूर है। यह लड्डू शुद्ध खोये, रवा और काजू से बनते हैं। साथ ही कानपुर की इस दुकान का साइन बोर्ड भी काफी मजेदार है। इसमें ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं लिखा है। यह दुकान यूपी के साथ-साथ पूरे देश में मशहूर है। ठग्गू के लड्डू के अलावा बदनाम कुल्फी भी मिलती है। दुकान के मालिक प्रकाश पांडेय बताते हैं कि ठग्गू के लड्डू की कहानी करीब 50 साल पुरानी है। उनके पिता राम अवतार पांडेय घाटमपुर ब्लॉक के परौरी गांव रहने वाले थे। 1968 में उनके पिता ने कानपुर के फाइव स्टार होटल लैंडमार्क के सामने लड्डू की दुकान खोली। उन्होंने सोचा कि इन लड्डूओं के जरिए वह इंसान से स्वाद और पैसे दोनों ठगते हैं। इसके बाद उन्हें अपने में एक ठग नजर आया। इसके बाद उन्होंने दुकान का नाम रखा ठग्गू के लड्डू दिया।


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दुनिया भर में फेमस है इलाहाबादी अमरूद, सेब के बराबर हैं दाम



इलाहाबाद.
इलाहाबादी अमरूद की खुशबू यूपी के साथ-साथ अन्य प्रदेशों में भी पहुंचने लगी है। विश्वप्रसिद्व इलाहाबादी अमरूद का जादू लोगों के सिर चढकर बोल रहा है। यहां के अमरूद ने अपनी मिठाव व रंग के कारण लोगों के बीच खासी पहचान बनाई है।

इलाहाबादी अमरूद से में सबसे ज्यादा डिमांड सुर्खा या सुर्खाब अमरूद की है। इसकी पहचान अपनी विशेष लाल रंगत व लाजबाव स्वाद के कारण बना रखा है। मार्केट में इसकी डिमांड सर्वाधिक रहती है। मार्केट में यह करीब 70 से 80 रुपए प्रति किलो बिक रहा है। वहीं, इलाहाबाद स्टेशन पर इसे 90 से 100 रुपए या अधिक में भी बेच रहे हैं।

इसके अलावा स्थानीय भाषा में लाल बीजी नामक अमरूद भी लोगों के  सिर चढ कर बोल रहा है। इस अमरूद की खासियत यह है कि यह उपर से हरा होता है जब कि अंदर का हिस्सा पूरा लाल होता है। इसका स्वाद भी काफी लाजवाब होता है। यह सुर्खा से करीब दो गुना महंगा होता है। बाजार में इसकी कीमत 120 से 130 रुपए प्रति किलो है।

इसके अलावा इलाहाबादी सफेदा अमरूद 40 से 40 रुपए किलो बिक रहा है। इन अमरूदों की डिमांड काफी है। इलाहाबादी अमरूद का सीजन फरवरी अंत तक रहेगा। सीजन खत्म होते ही इसकी रंगत भी चलेगी। इलाहाबादी अमरूद इलाहाबाद के आसपास क्षेत्रों के साथ-साथ दिल्ली, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी भेजे जाते हैं। साथ ही कई देशों में भी इसकी सप्लाई की जाती है।

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फूड स्पेशल: बहुत बिकती है इन केपी सक्सेना की चाय



लखनऊ.
राजधानी में अलग-अलग स्थानों पर खाने पीने की चीजें मश्हूर हैं। इन्हीं में एक है केपी सक्सेना की चाय और समोसे। दिन भर युवकों की भीड इस दुकान में लगी रहती है। आईटी और टेलीकॉम की दुनिया के युवकों को यहां आना ज्यादा भाता है।

निशातगंज पुल से जब हजरतगंज की तरफ बढिए तो बाई तरफ एक रास्ता कृषि भवन की ओर जाता है, इसी मोड पर आपको भीड दिखेगी। यहीं किनारे है केपी सक्सेना की चाय की दुकान। यह दुकान मुन्नी लाल की है। लोग इन्हें केपी सक्सेना इसलिए कहते हैं क्योंकि इनकी शक्ल मश्हूर हास्य एवं आमिर खान की फिल्म लगान के डायलॉग लेखक केपी सक्सेना से बहुत मिलती है।

केपी सक्सेना की इस दुकान में चाय, समोसा, पूड़ी कचौड़ी और छोले दिन में 11 बजे के बाद से शाम को आठ बजे तक मिलते हैं। इस दुकान में टेलीकॉम कम्पनी में काम करने वाली नम्रता सिंह ने समोसे की बाइट के बाद चाय की चुस्की मारी और बोलीं कि केपी सक्सेना के इस टेस्ट की मैं दीवानी हूं। अगर बाहर टूर पर न गई और आफिस आई हूं तो इस दुकान के खाने का लुत्फ जरूर लेती हूं।

ऐसा ही कुछ मो. इकबाल कहते हैं। वे वहीं पास में एक आईटी कम्पनी में काम करते हैं और यहां छोले कचौड़ी खाने जरूर आते हैं। केपी सक्सेना की यह दुकान 1970 से यहां चल रही है। वे कहते हैं कि वास्तव में पहले लोग धोखा खा जाते थे कि यहां केपी सक्सेना चाय समोस बेच रहे हैं क्या?



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नोएडा में एमपी के पोहे ने मन मोहा


नोएडा। अगर आपको मीलो दूर इंदौरिया पोहा का मजा नोएडा में मिल जाए तो...आया ना मुंह में पानी? जी हां, नोएडा-ग्रेनो एक्सप्रेसवे की सर्विस रोड पर सेक्टर-142 में एडवंट टाॅवर के सामने रेढ़ी पर बेच रहे एमपी के लजीज पोहे का मजा उठा सकते हैं। सर्दियों की हल्की धुंध में गर्मागम चटपटे पोहे के साथ जलेबी और कुल्हड़ वाली चाय हाथ लग जाए तो मजा ही आ जाए।

ऐसा ही नजारा रोज सुबह एमपी के पोहे वाले रेढ़ी के सामने नजर आता है। भइया खट्टा ज्यादा... और हां अनारदाना भूलना नहीं। इसी तरह की डिमांड होती है लोगों की। सुबह का नाश्ता इससे बेहतर और क्या हो सकता है। पोहा बनाने वाले का कहना है कि आजकल की भाग-दौड़ भरी लाइफ में लोग फास्ट फूड पर ही निर्भर हो गए हैं। ऐसे में पोहा के लिए अपनी जगह बनाना थोड़ा मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं। यह आप यहां की रोज की भीड़ से अंदाजा लगा सकते हैं। यहां आपको मात्र 20 रुपए में हाफ और 30 रुपए फूल प्लेट पोहा मिल जाएगा। कुछ घंटों में तो पूरा बर्तन खाली हो जाता है। आखिर लोगों की इतनी डिमांड जो है।

वैसे आप चाहें तो इस पोहे का मजा आप घर पर भी  उठा सकते हैं। आइए जानें इसे बनाने की विधि-  

आवश्यक सामग्री-


पोहा -150 ग्राम (ढार्इ कप)
शक्कर - 1 चम्मच
नमक स्वादानुसार (3/4छोटी चम्मच)
तेल -  1 से 2 टेबल स्पून
राई - 1/4 छोटी चम्मच
करी पत्ता - 4 से 5
हल्दी पाउडर - 1/4 छोटी चम्मच
हरी मिर्च - 1  से 2
मटर या मूंगफली के दाने - 1 से 2  टेबल स्पून
नींबू -एक
हरा धनिया - एक टेबल स्पून बारीक कटा हुआ
अनार दाना - 20 से 25 दाने
रतलामी सेंव- एक छोटी प्याली, नुक्ती, जीरा

सबसे पहले पोहे को साफ कर लीजिए। यदि पतला पोहा है तो इसे छलनी में पानी से धो लीजिए। मोटे पोहे को कुछ मिनटो के लिए पानी में भिगोएं फिर तुरंत छान लें। भीगे हुये पोहे में एक चम्मच शक्कर एवं नमक मिला कर 15 मिनट के लिए फैला कर छोड़ दीजिए। कढा़ई में तेल गर्म कर लें। तेल गर्म होने पर राई के दाने डालिये, दाने चटकने पर करी पत्ता डाल कर भून लीजिए। फिर प्याज, हल्दी और बारीक कटी हरी मिर्च डालें। इसके बाद मटर और मूंगफली के दाने, आलू के पतले और छोटे तुकड़े भी डाल सकते हैं। मसाला तैयार है। अब इस तड़के में शक्कर-नमक मिला हुआ पोहा डाल दें। पोहे को मसाले में अच्छी तरह मिलाएं। दो से तीन मिनट गैस पर पकाएं। आपका पोहा तैयार है। अब इसमें नींबू निचौड़ दें और आधा कटा धनिया मिला दें। अब पोहे को सर्विंग प्लेट में निकालें। ऊपर से बारीक कटा हरा धनिया, सेंव, जीरा, नुक्ती और अनारदाना डालकर परोसें।

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गरम-गरम पूड़ियां खायें, ठंड दूर भगायें


वाराणसी. खाने की खुशबू,स्वाद का तड़का और ठंड का मौसम। ऐसे में  अगर थाली में पूड़ी सब्जी हो तो क्या कहने।
यही कारण है कि बनारस मेहर सुबह, गली से लेकर चौरोहे तक की हर दुकानों में, भठ्ठियों पर लगी कड़ाही, औरउसमें पकती गर्म पूड़ियां सबके मन को ललचा जाती है। यहां से गुजरने वाला हर शख्सइस सुगंध को खुद से जोड़ना चाहता है और शुरू हो जाती है यहां कि दुकानों परग्राहकों की भीड़।

कैसे बनायें

आटा में मोयम ,उड़द कीदाल, पीठी, जीरा, हींग, कश्मीरी मेथी, देशी घी ,अजवाइन, आदि सामान मिलाकर गुथाजाता है। मला हुआ आटा तैयार होने पर उसे छोटे छोटे भागों में लेकर बेलन सेपूड़ियां बना लेते हैं। इसके बाद कड़ाही में तेल को गरम कर तैयार करते हैं। कड़ाहीमें तेल पक जाने के बाद इन्हे पकाया जाताहै जिसके बाद खूश्बूदार स्वादिष्ट पूड़ियां बनकर तैयार हो जाती हैं।

ठंड के मौसम में मन कोखूब भाती हैं ताजी पूड़ियां
ठंड के मौसम में हर कोईगर्म की ओर खिंचता जाता है। ऐसे में गरम पूड़ियां सबके मन को खूब भा जाती है। ताजीपूड़ियां खाकर भूख तो शान्त होती ही है मन को भी आनन्दित कर देती है। जानकार कहतेहैं कि ये पूड़ियां इस मौसम में लोगों को बीमार होने से भी बचाती हैं।
बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता
डाक्टरों का मानना है किकि इसे बनाने में इतने पदर्थों को मिलाया जाता है जिससे स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिएभी पूड़ियां बहुत लाभप्रद होती है देशी घी समेत कई चीजों के मिलाये जाने के कारणइसमें रोगों से लड़ने की क्षमता अधिक होती है। जिसका सेवन करने से लोग बीमार होनेसे बच सकते हैं।
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ठंड में सब्जी के साथसेवन ज्यादा लाभप्रद
ठंड के मौसम में पूड़ियोंके साथ खाने के लिए विशेष रूप से सब्जी तैयार की जाती है। इसमें आलू, गोभी, लहसन,अदरक धनियां, मिर्च, हरी मटर, पनीर, स्पेशल गरम मसाला, आदि मिलाकर विशेष रूप से तैयारकिया जाता है। जिसके साथ खाने से ठंड में बचाव होता है और शरीर में गर्मी का अहसासहोने लगता है। इसलिए लोगों को इस कड़कड़ाती ठंड से बचने के लिए पूड़ी-सब्जी कासेवन लाभप्रद है।

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आगरा की बेड़ई संग कदमताल कर रहा गुजराती ढोकला


आगरा. मुगलिया शहर आगरा का पसंदीदा नाश्ता बेड़ई कचौड़ी है, लेकिन अब गुजरात का ढोकला आगरावासियों के बीच अपनी जगह बना रहा है। सुबह नाश्ते की बात हो, तो बेड़ई के साथ ढोकले का नाम जुड़ने लगा है। ढोकले की डिमांड इस कदर बढ़ी है कि सिटी की विभिन्न बेड़ई की दुकानों पर अब ढोकले की प्लेट भी सजी नजर आती हैं।

महंगा है ढोकला
बेड़ई की अपेक्षा ढोकला काफी महंगा पड़ता है। विभिन्न प्रतिष्ठानों पर इसके रेट 160 रुपये से 200 रुपये किलो तक के हैं। बेसन से बनाए जाने वाला ढोकला स्वास्थ के लिए हानिकारक नहीं होता है क्योंकि न तो इसे तला जाता है और न ही इसमें कुछ चिकना डला होता है। इसे विशेष प्रकार के बर्तन में डालकर तैयार किया जाता है, जो हर किसी के बस की बात नहीं है, इसलिए इसके रेट भी काफी ज्यादा होते हैं।

कोई भी खा सकता है

ढोकले की एक खास बात यह है कि इसे कोई भी खा सकता है, यानि किसी भी बीमारी में इसको खाने का परहेज नहीं है। बेड़ई की बात करें, तो इसे खाने के शौकीन लोग विशेष एहतियात बरतते हैं कि पेट खराब न हो जाए, मोटापा बढेगा, या फिर अन्य कारण रहते हैं, लेकिन ढोकला इन कारणों को जन्म ही नहीं देता है। यह बेसन के घोल को भाप से पकाया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए बिलकुल भी हानिकारक नहीं है

चटनी भी स्वादिष्ट
ढोकले को हरी चटनी के साथ परोसा जाता है, यह चटनी भी बेहद स्वादिष्ट होती है। इस चटनी में हरे धनिया के साथ जीरा, हींग, गिरी, खटाई का प्रयोग किया जाता है। इस चटनी में भी ऐसा कुछ नहीं होता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो। जैन स्वीट्स हाउस मदिया कटरा के रोहित जैन ने बताया कि ढोकला की चटनी बनाना भी आसान नहीं है। इसमें मिर्च मसाले का विशेष ध्यान रखा जाता है। चटनी भी ऐसी बनाई जाती है कि उसमें धनियां की महक ढोकले को और स्वादिष्ट बना दे।

ऑफिस पार्टी में ढोकला की धाक
पहले ऑफिस पार्टियों में बेड़ई, जलेबी, पेटीज, बर्गर का चलन हुआ करता था, लेकिन अब ढोकला ने ऑफिस पार्टियों में धाक जमा ली है। लोग सुबह के समय यदि हल्का फु ल्का खाने के बारे में सोचते भी हैं, तो उसमें बेड़ई के साथ ढोकला  भी मंगाया जाता है. भगत हलवाई के मालिक शिशिर भगत ने बताया कि अब ढोकले की डिमांड विभिन्न कार्यालयों के अलावा बर्थ डे पार्टी या ऑफिस पार्टी में होने लगी है।


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मौसम हुआ ठंडा तो तिल के लड्डू, मूंगफली, गुड़ से मिलने लगी गर्माहट


लखनऊ. इस ठंड में यदि आपको सर्दी से दूर रहना है तो आप गुड़ खाकर अपनी सेहत को गुड बना सकते हैं। सर्दी में शरीर को ऊर्जा देने के साथ ही यह गर्माहट भी देता है। इसके अलावा तिल के लड्डू, गजक, मूंगफली और मेवे को अपने खानपान में शामिल करके ठंड से लड़ सकते हैं। शहर का बाजार भी मौसम के सर्द मिजाज को देखते हुए तैयार हो चुका है। जगह-जगह तिल के लड्डू और गजक बिक रहे हैं, जिसकी खरीददारी खूब हो रही है।
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मैदानी इलाकों में बढ़ते ठंड के साथ ही खाने के शौकीनों के लिए बाजार में खानपान की वैरायटी मिलनी शुरू हो गई है। शहर में शाम को केसरिया दूध का मजा लोग ले रहे हैं तो दोपहर को मूंगफली और चटनी के चटकारों के संग गुनगुनी धूप का लुत्फ उठा रहे हैं। मक्खन मलाई का स्वाद को किसी भी वक्त लोग लेने को तैयार हैं।

दिसंबर शुरू और तिल के लड्डू की डिमांड बढ़ी

काले तिल के लड्डू. 200 रुपये किलो

सफेद तिल के लड्डू.200 रुपये किलो

रेवड़ी 100 रुपये किलो

मूंगफली गुड़ पट्टी 120 रुपये किलो

गजक 100 से 500 रुपये किलो

बादाम 800 से 1000 रुपये किलो

काजू 600 से 800 रुपये किलो

अखरोट 1500 रुपये किलो

किशमिश 350 रुपये किलो

मसाला गुड़ 50 रुपये किलो

सादा गुड़ 40 रुपये किलो

केसरिया दूध 30 रुपये गिलास

मूंगफली 120 रुपये किलो

मक्खन मलाई 40 का 100 ग्राम

अण्डे के बढ़े दाम, बढ़ी खपत

अण्डा विक्रेता महेश जायसवाल ने बताया कि एक क्रेट का दाम 150 रुपये है। एक दर्जन अण्डा 60 रुपये में बिक रहा है। ठंड शुरू होते ही एक क्रेट अण्डे के दाम में 10 रुपये की बढ़ोतरी हो गई है। 10 दिन पहले तक शहर में 15000 अंडों की खपत प्रतिदिन थी, लेकिन सर्दी शुरू होते ही यह खपत बढ़कर 18000 प्रतिदिन हो गई है।

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शरीर को चुस्त दुरूस्त बना रहा है यह खानपान

तिल और गुड़ से बने लड्डू- काले या सफेद तिल से बने लड्डू ठंड के मौसम में स्वास्थ्य के लिए बेहद मुफीद होते हैं। इनका सेवन रोजाना करने से हाई ब्लडप्रेशर कंट्रोल होता है। खून की कमी है तो खून की मात्रा बढ़ती है। एसिडिटी है तो गुड़ खाने से दूर होती है। तिल में पेट के रोगों को दूर करने का गुण होता है। इसकी तासीर गर्म होती है इसलिए इसे ठंड में जरूर खाना चाहिए।

गुड़ में सुक्रोज, ग्लूकोज, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन के साथ ही एंटीऑक्सीडेंट गुण पाया जाता है। गुड़ रोजाना खाने से यह हर मौसम में आपको मौसमी बीमारी से बचाता है।

यदि आप दिन में एक मुट्ठी मूंगफली खा लेते हैं तो आपको अण्डे और दूध के बाराबर की प्रोटीन मिल जाती है। मूंगफली में प्रोटीन, कैलरीज विटामिन के, विटामिन ई पाई जाती है। इसे खाने से पाचन शक्ति बढ़ती है।

अण्डे की तासरी गर्म होती है। इसमें विटामिन ए, डी, ई, बी़1ए बी2ए बी12 के अलावा कैल्शियम, आयरन और जिंक पाया जाता है। अण्डे में जितना एंटीऑक्सीडेंट होता है उतना ही एक सेब में पाया जाता है।


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सावधान: कही आपके दूध में बर्फ तो नहीं मिली


लखनऊ. ठंडी जगहों पर बर्फ आसमान से गिरती है, लेकिन सोचिए यदि बर्फ आपके दूधवाले के केन में गिरे? जी हां, यह सच है। शहरभर की दूध मंडियों में दूध के केन में सिल्ली वाली बर्फ मिलाना एक ट्रेंड सा हो गया है। इससे दूध की गुणवत्ता तो कम होती है। साथ ही आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी है। 

ग्रंथों में शुद्ध सेहतमंद और तंदुरूस्ती की मिसाल कहा जाने वाला दूध अपने साथ कई बीमारियों घर लाता है। सर्दियों के मौसम में बर्फ डालकर दूध बेचा जा रहा है। यह गुणवत्ता के साथ बीमारी को बढ़ावा दे रहा है। वहीं, बर्फ की आड़ में बासी दूध भी बेच दिया जाता है।

मौके पर मौजूद एक सूत्र ने बताया कि यह काम काफी दिनों से किया जा रहा है। दूध में बर्फ फ्रिज का काम करती है। दूध को ठंडा रहने से देर तक खराब नहीं होता है। बिक्री बढ़ाने और नुकसान को कम करने की चाह में ऐसी मिलावट को अंजाम दिया जाता है।

शिशुओं के आहार पर पड़ता है खास असर 
मिलावटखोरों कि इस तरह की हरकत का सबसे अधिक असर बच्चों पर पड़ता है। अधिक पैसा चुकाने के बाद भी बच्चों के जीवन के साथ ऐसा खिलवाड़ किया जा रहा है। मिलावटी दूध पीने से बच्चों की ग्रोथ पर खासा असर पड़ता है। कई केसों में देखा गया है कि बच्चा जब मां का दूध नहीं पीता तो उसे गाय का दूध पिलाने की सलाह दी जाती है।

बताते चलें कि राजधानी में बर्फ फैक्ट्री में इस्तेमाल होने वाले पानी की क्वालिटी बहुत खराब होती है। बर्फ बनने वाली फैक्ट्रियों में प्रदूषित जल का उपयोग किया जा रहा है। इसके सेवन से पीलिया, डायरिया, डिसेंट्री और टायफाइड जैसी घातक बीमारियां होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

डॉक्टर देते हैं संभल के प्रयोग करने की सलाह
डायटीशियन किरण शर्मा ने बताया कि गंदगी युक्त बर्फ दूध में इस्तेमाल करने से निमोनिया को बढ़ावा मिलता है। साथ ही पाचनतंत्र भी प्रभावित होता है। इसके कारण डायरिया, दस्त, कोलाइटिस और उल्टी भी हो सकती है। कई दिनों तक गला भी खराब हो सकता है। बताते चलें कि हाल ही में एम्स इण्डिया की सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में हर 100 में से 30 लोगों को पेय पदार्थों में बर्फ इस्तेमाल करने से नुकसान पहुंचता है।

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पाइनएप्पल व आलू रायता खाइए आैर मोटापे की चिंता छोड़िए


नोएडा। सर्दियां आते ही सबसे बड़ी टेंशन होती है कि अब तो मोटापा बढ़ना ही है। पर आपको बता दें कि कुछ छोटी बातों का ध्यान रख आप अपने बढ़ते मोटापे पर काबू पा सकते हैं। हेल्दी फूड में लोग सोचते हैं यार ऑप्शन ही कुछ नहीं है, वहीं ओट्स, सलाद, दलिया और कॉर्नफ्लैक्स। आपको बता दें कि रायता भी एक बेहतर ऑप्शन है।

अगर इसमें कुछ फेरबदल किया जाए तो ये आपके लिए बेहतर ऑप्शन हो सकता है। हम आपको बता रहे हैं आलू-पाइनएप्पल रायता बनाने की रेसिपी, जो आपको रखेगी फिट।

दो से चार लोगों के लिए, बनाने में लगेंगे 20 मिनट

आवश्यक सामग्रियां

दो कप दही
एक कप अनानास (पाइनएप्पल) छिलकर कटा हुआ
एक आलू उबला हुआ
एक छोटा चम्मच चाट मसाला
स्वादानुसार नमक

गार्निशिंग के लिए

हरे धनिया की पत्तियां

बनाने की विधि-

- उबले आलू को छीलकर चौकोर टुकड़ों में काट लें।
- एक बर्तन में दही डालकर, एक चम्मच से अच्छी तरह फेंट लें।
- अब दही में अनन्नास (पाइनएप्पल), आलू, चाट मसाला और नमक डालकर मिक्स करें।
- बस तैयार हो गया आलू-पाइनएप्पल रायता, कुछ देर के लिए इसे फ्रिज में रखकर ठंडा करें और फिर कटोरी में डालकर कटी हरे धनिया की पत्ती डालकर सर्व करें।


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स्वाद का खजाना है बनारसी बाटी-चोखा


वाराणसी. जंक  फ़ूड के दौर में भी पारम्परिक व्यजनों के स्वाद का कुछ ऐसा रिश्ता है की लोगों को अपने करीब खींच लाता है, ऐसे में बनारस का जिक्र हो और बाटी -चोखा का नाम न आये तो यह बनारस के स्वाद से बेमानी होगी। बनारस के व्यंजनों में मशहूर बाटी चोखा के स्वाद का कुछ कमाल ही ऐसा है कि सुबह से शाम तक दुकानें सजी ही रहती हैं।

कैसे तैयार होता है बाटी चोखा

इस व्यंजन को भरपूर स्वाद देने के लिए अच्छे कारीगरों द्वारा तैयार किया जाता है। जैसे बाटी में चने का सत्तू ,अजवाइन ,अमचुर ,जीरा मरीच,सरसो तेल आचार नीबू का रस आदि मिलाकर तैयार किया जाता है और इसे कोयले या उपली के आंच पर पकाया जाता है। इसी तरह चोखा बनाने के लिए ,आलू ,बैगन टमाटर ,को पकाकर इसमें अदरक लहसन धनिया ,मिर्च, सरसो तेल आदि लजीज सामग्री मिलाकर तैयार किया जाता है।

स्वाद का चटपटा संगम है यह बाटी-चोखा

इस बाटी को मक्खन में डुबोकर चोखा के साथ आचार सलाद आदि स्वादिष्ट चीजों से सजाकर लोगो को परोसा जाता है, स्वाद का ऐसा मिश्रण लोगो को खाने तो क्या उँगलियाँ चाटने को भी मजबूर कर देगी। मजे की बात ये है कि बनारस की बाटी एक बार जो भी खता है वो इस लजीज स्वाद का फैन बन जाता है।

आयुर्वेद के लिहाज से भी हैं फायदे

बाटी-चोखा भून कर पकाया जाता है इसमें सभी चीजें स्वाद के साथ सेहत के लिए भी लाभकरी होती है जिससे लोगों की भूख तो मिटती ही है ,पर सेहत पर किसी भी तरह का बुरा प्रभाव नहीं पड़ता ,इस भोजन में मिलायी जाने वाले सभी चीजें आयुर्वेद के लिहाज से लाभप्रद होती है जिसकी वजह से भी लोग इस खाने को खूब पसन्द करते हैं।


गांव के भोजन ने ले लिया बाजार का रूप

इस बाटी चोखा की शुरुआत बहुत साल पहले  उत्तर भारत के गॉवों से हुई थी,पर इसके चटपटे स्वाद का रस लोगों के जुबान पर ऐसा लगा की आज बाटी-चोखा ने अपनी जगह शहर बाजार, बड़े-बड़े रेस्टोरेंट में बना ली । प्राकृतिक तरीके से बनाये जाने के कारण यह व्यंजन लोगों को खूब भा रहा है।

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मिलावट से होने वाली बीमारियों से है बचना तो अपनाए ये घरेलू नुस्खे


लखनऊ. आज बाजार में खाद्य पदार्थों से लेकर सौन्दर्य प्रसाधन तक की तमाम चीजों में मिलावट पाई जाती है, जो कई मायनों में स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। इन मिलावटों की सबसे गंभीर बात ये है कि ये मिलावट आसानी से पहचान में भी नहीं आती है और लोग बिना पहचाने इन प्रोडक्टों का लगातार उपयोग करते रहते हैं। यदि कुछ बातों पर ध्यान दिया जाए और किसी भी प्रोडक्ट का प्रयोग करने से पहले उनकी घरेलू जांच कर लें तो मिलावटी प्रोडक्ट के प्रयोग से होने वाले नुकसानों से बचा जा सकता है।

उपयोगी वस्तुओं में मिलावट को पहचनाने के नुस्खे


चावल में रंग की मिलावट
ऊंचे रेट पर चावल बेचने के लिए व्यापारी चावल में रंग की मिलावट करते हैं। इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। इसके लिए दोनों हाथों से चावल को रगड़ें। यदि इसमें पीला रंग होगा तो हाथों में लग जाएगा। चावल को पानी में भिगोएं और उसमें सांद्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल की कुछ बूंदें डालें। पानी का रंग बैंगनी हो जाए तो उसमें पीला रंग मिला हुआ है।

नमक में मिट्टी की हो सकती है मिलावट
नमक में मिट्टी की मिलावट को जनाने के लिए नमक की कुछ मात्रा लेकर कांच के साफ गिलास में पानी लेकर घोल लें। इसके बाद कुछ समय के लिए उसे स्थिर रहने दें। इसके बाद यदि गिलास की तली में रेत या मिट्टी बैठ जाए तो समझ लेना चाहिए कि नमक में मिलावट है।

मावा में स्टार्च की मिलावट
इसकी थोड़ी मात्रा में पानी मिलाकर इस मिश्रण को उबालें। इसमें आयोडीन की कुछ बूंदें डालें। यदि नीले रंग की परत दिखे तो साफ है कि उसमें स्टार्च मौजूद है।

मक्खन, घी में वनस्पति घी मिलावट

घी आजकल सबसे ज्यादा मिलावटी आने लगी है। इसके लिए हाइड्रोक्लोरिक अम्ल 10 सीसी तथा एक चम्मच चीनी मिलाएं। इस मिश्रण में 10 सीसी घी या मक्खन मिलाए। इसे अच्छी तरह हिलाएं। यदि मिलावट होगी तो मिश्रण का रंग लाल हो जाएगा।

हल्दी में रंग की मिलावट
इसकी मिलावट को पकड़ने के लिए आप एक चम्मच हल्दी को एक परखनली में डालकर उसमें सांद्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल की कुछ बूंदें डालें। बैंगनी रंग दिखता है और मिश्रण में पानी डालने पर यह रंग गायब हो जाता है तो हल्दी असली है। रंग बना रहता है तो वह मिलावटी है।

खाने के तेल में आर्जीमोन की मिलावट
इसकी मिलावट की जानकारी पाने के लिए सैंपल में सांद्र नाइट्रिक एसिड मिलाकर मिश्रण को खूब हिलाएं। थोड़ी देर बाद एसिड की परत में अगर लाल, भूरे रंग की परत दिखाई दे तो यह आर्जीमोन तेल की मौजूदगी का द्योतक है।

दूध में पानी की मिलावट
आजकल सबसे ज्यादा दूध की मिलावट परेशान करती है। इससे बचने के लिए लेक्टोमीटर द्वार सापेक्षिक घनत्व को ज्ञात करके दूध की शुद्धता की जांच की जा सकती है। शुद्ध दूध का सापेक्षिक घनत्व 1.030 से 1.034 तक होना चाहिए।

दालों में मिलावट
चने, अरहर की दाल में खेसरी दाल मेटानिल पीला रंग हो सकता है। दाल को एक परखनली में डालकर उसमें पानी डालें तथा हल्के हाइड्रोक्लोरिक अम्ल की कुछ बूंदें डालें हिलाने पर यदि घोल का रंग गहरा लाल हो जाय तो समझना चाहिए कि दाल को मेटानिल पीले रंग से रंगा गया है। खेसरी दाल का परीक्षण दाल को ध्यानपूर्वक देख कर किया जा सकता है। खेसरी दाल नुकीली एवं धंसे हुए आकार की होती है।

मिर्च पाउडर में ईट या बालू का चूर्ण की मिलावट

इसकी मिलावट से बचने के लिए एक चम्मच मिर्च पाउडर को पानी भरे ग्लास में डालें। पानी रंगीन हो जाता है, तो मिर्च पाउडर मिलावटी है। उसमें ईट या बालू का चूर्ण होगा तो वह पैंदे में बैठ जाएगा। अगर सफेद रंग का झाग दिखे तो उसमें सेलखड़ी की मिलावट है।

चाय पत्ती में रंग की मिलावट
इसका पता लगाने के लिए चीनी मिट्टी के किसी बर्तन या शीशे के प्लेट पर नींबू का रस डालकर उस पर चाय पत्ती का थोड़ा सा बुरादा डाल दें। यदि नींबू के रस का रंग नारंगी या दूसरे रंग का हो जाता है तो इसमें मिलावट है। यदि चाय पत्ती असली है तो हरा मिश्रित पीला रंग दिखाई देगा।

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