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लगातार पीठ दर्द हाे सकता है स्पाइनल स्टेनोसिस का संकेत


आजकल पीठदर्द आम बात है। किशोर से लेकर वृद्ध तक किसी न किसी रूप में पीठदर्द से परेशान हैं। ऐसा ही एक दर्द स्पाइनल स्टेनोसिस है। इस रोग की वजह से हमारे शरीर की डिसक उभरने लगती है और ऊत्तक मोटे हो जाते हैं जिससे रीढ़ नलिका से जाने वाली नस सिकुडऩे लगती है व पीठ में दर्द होता है।

यह है समस्या
स्पाइनल स्टेनोसिस में हमारी रीढ़ की हड्डी में मौजूद खुले स्थान बंद होने लगते है जिससे स्पाइनल कॉर्ड और नसों पर दबाव पड़ता है। ज्यादातर मामलों में स्पाइन का सिकुड़ना, स्टेनोसिस होने के कारण ही होता है जिससे नर्व रूट दबने से पैरों में दर्द, थकान, अकड़न व झनझनाहट महसूस होने लगती है।

अचानक पीठदर्द
इसका इलाज मुश्किल हो सकता है क्योंकि इस तरह के लक्षण किसी अन्य कारण से भी हो सकते हैं। जिन लोगों को स्टेनोसिस हो यह जरूरी नहीं की उन्हें पहले कभी पीठ में दर्द हो या कभी किसी तरह की चोट लगी हो। स्पाइनल स्टेनोसिस में अचानक पीठदर्द होता है जो आराम करने पर चला जाता है। अगर रोग अधिक न बढ़ा हो तो सर्जरी से उपचार संभव है। इसके लिए जरूरी है कि शारीरिक रूप से सक्रिय रहा जाए क्योंकि इससे रोग जल्दी ठीक होता है। छोटे-छोटे बदलाव जैसे स्ट्रेट जैकेटेड कुर्सी की जगह झुकने वाली चेयर से अच्छे परिणाम मिलते हैं।

सर्जरी में सावधानी
एपिडरल इंजेक्शन से मरीजों को ठीक किया जा सकता है। जिन लोगों को सर्जरी करानी पड़ती है उनके जल्दी ठीक होने में भी यह इंजेक्शन मददगार होता है। जब सभी प्रयास विफल हो जाते हैं तो सर्जरी ही विकल्प होती है। हालांकि सर्जरी से पहले मरीज के शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखना जरूरी होता है। फिर डॉक्टर को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह क्षतिग्रस्त नब्ज को पहचानकर उसका उपचार करे। इलाज करते समय पूरी सावधानी बरती जानी चाहिए कि किसी और नस को नुकसान न पहुंचे।


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डियाे नहीं, सिरके से जाएगी पसीने की बदबू


अंडरआर्म्स की बदबू गंदगी भी है और शर्मिंदगी भी। इससे व्यक्तित्व प्रभावित होता है। बचाव के लिए लोग डियो या परफ्यूम का इस्तेमाल करते हैं जिनके कई दुष्प्रभाव होते हैं। इस समस्या से छुटकारे का घरेलू उपाय है सेब का सिरका।अाइए जानते हैं इसके बारे में:-

सेब का सिरका पीएच स्तर कम करता है और त्वचा के पोर भी खोलता है। त्वचा का पीएच स्तर गिरने से बदबू पैदा करने वाले बैक्टीरिया नहीं होते। सेब के सिरके के एस्ट्रीजेंट पसीना कम करते हैं। इसके लिए सिरके को कॉटन में भिगोएं और इसे अंडरआर्म्स पर लगाएं। दिन में दो बार इसका इस्तेमाल करें। सिरके की गंध 15 मिनट में अपने आप दूर हो जाएगी। ऐसा करने से आप दिनभर तरोताजा महसूस करेंगे।

बालाें के लिए भी फायदेमंद
एक साधारण सा विनेगर और पानी का मिश्रण भी बालों को नरम बनाने और उन्हें मजबूत बनाने में बहुत कारगर है। शैम्पू के बाद एप्पल साइडर विनेगर का उपयोग उनके टेक्सचर को सुधारने के लिए काफी है।


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हाइपर एक्टिव है बच्चा, ताे इस तरह से रखें ध्यान


आपका बच्चा बेवजह आपा खोए, हर समय सक्रिय रहे, फोकस न कर पाए, स्कूल में असामान्य हरकत करे, हर समय बोले या दूसरों को न बोलने दे तो विशेषज्ञ की सलाह लें क्योंकि यह एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर हो सकता है। इसकी जांच के लिए कई तरह के ब्लड टेस्ट व हार्मोनल टेस्ट होते हैं। खानपान में गड़बड़ की पड़ताल कर मनोवैज्ञानिक उपचार किया जाता है।आइए जानते हैं इसके बारे में:-

करें खास उपाय
हाइपर एक्टिविटी और उसकी किस्म के हिसाब से दवाएं मौजूद हैं। इनसे भी ज्यादा जरूरी है माता-पिता की सूझबूझ व समझाइश। जैसे-

- माता-पिता को सबसे पहले यह समझना चाहिए कि उनका बच्चा दूसरे बच्चों से अलग है लेकिन असामान्य नहीं। बच्चे की एक्टिविटी को सबसे पहले घरवालों को स्वीकार करना चाहिए लेकिन दूसरों के सामने बार-बार उसे असामान्य न कहें। ऐसा करने से बच्चे में हीन भावना बढ़ने लगती है और वह धीरे-धीरे जिद्दी होकर मनमर्जी करने लगता है।

- उसकी क्षमता पहचानते हुए उसे वही काम करने के लिए प्रेरित करें। बच्चे को ऐसा कोई काम न करने के लिए कहें जो उसकी रुचि या क्षमता के मुताबिक न हो।

- हाइपर एक्टिव बच्चे पर दबाव न डालें। वह जो भी हॉबी करना चाहे उसे रोके नहीं। बल्कि उसका हौंसला बढ़ाने के लिए एक्टिविटी में भाग लें।

- बच्चे की शारीरिक व मानसिक जरूरत को समझें। उसके साथ समय बिताएं व उसकी बातों को ध्यान से सुनें। 10-15 मिनट रोजाना विचार सुनने से हाइपर एक्टिव बच्चे को समझना आसान होगा।

- बच्चे में बेहतर खानपान की आदत डालें। खाने में साबुत अनाज, फल, सब्जियां आदि शामिल करें।

- मित्र या भाई-बहन केे साथ बच्चे की तुलना न करें।

- बच्चे को नियमित एक्सरसाइज कराएं। एरोबिक से तनाव कम होता है और शारीरिक व मानसिक एनर्जी बढ़ती है। एंडॉर्फिन हार्मोन का स्राव होने से बच्चा खुश रहता है और बात-बात पर चिड़चिड़ा महसूस नहीं करता। इसलिए बच्चे को रोजाना 30 मिनट एक्सरसाइज कराएं।

बच्चे को ये सिखाएं
- गहरी सांस का अभ्यास कराएं। गुस्सा या चिड़चिड़ेपन की स्थिति में गहरी सांस उपचार का काम करती है।
- घरेलू काम में बच्चों को शामिल करें। साथ ही उन्हें जिम्मेदारी भी सौंपें।
- बच्चे को घुमाने ले जाएं। उन्हें खेलने दें और स्कूल के काम व खेल के बीच संतुलन बनाना सिखाएं।
- बच्चों की किसी भी हरकत पर फौरन प्रतिक्रिया न दें। उनके साथ खुद भी धैर्यवान बनें।
- बच्चा अगर शर्मीला है तो उसे अपने साथ सामाजिक कार्यक्रमों में लेकर जाएं। उसे गु्रप में रहने के लिए प्रेरित करें। लेकिन यह भी ध्यान रखें कि कोई बच्चे का मजाक न बनाए।
- घर में किसी प्रकार का झगड़ा या कलह है तो इसे बच्चे के सामने न आने दें। इससे बच्चे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

विशेषज्ञ की राय
ऐसे मामले इन दिनों ज्यादा देखने में आ रहे हैं। लेकिन माता-पिता निराश न हों। दवाओं और पर्याप्त चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक परामर्श से बच्चों की एकाग्रता में सुधार किया जा सकता है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को समझें। उन्हें दंड देने या किसी अन्य बच्चे से उसकी तुलना करने से बचें। बच्चे की हिम्मत बढ़ाएं और इसके लक्षण पहचानते ही डॉक्टर से तुरंत परामर्श करें।


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विटामिन 'ए' की कमी से हो सकती है किडनी में पथरी


गलत खानपान, अनियमित दिनचर्या व अन्य कर्इ शारीरिक परेशानियाें की वजह से किडनी में पथरी समस्या हाे सकती है। कर्इ बार ताे यह पेशाब के जरिए अपने आप निकल जाती है, लेकिन कर्इ शरीर के अंदर ही रहकर गंभीर रूप ले लेती है। आइए जानते हैं किडनी की पथरी के बारे में :-

किडनी में पथरी किस उम्र में होती है ?
इस अंग में पथरी किसी भी उम्र में हो सकती है। लेकिन यह मध्य उम्र के लोगों में अधिक होती है। विशेषकर अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में।

इसकी वजह क्या है?
किडनी में पथरी होने के मुख्य कारण हैं विटामिन-'ए' की कमी, डिहाइड्रेशन, पेशाब में संक्रमण या रुकावट, शरीर के आधे हिस्से में लकवा, हाइपर पैराथायरॉइडिज्म, लिवर रोग आदि।

मुख्य लक्षण क्या होते हैं?
पेट में दायीं व बायीं ओर दर्द होना, उल्टी, पेशाब में जलन व टीस उठना, पेशाब का रुकना/खून/मवाद, बुखार व हाइपरटेंशन आदि।

इसका जल्द से जल्द पता कैसे किया जाए?
साधारण जांच से पथरी का पता लगाया जा सकता है। एक्स-रे या सोनोग्राफी व पेशाब की जांच से इसका पता लगाया जाता है।

इलाज कैसे संभव है?
किडनी की पथरी के इलाज के लिए कई तकनीकें उपलब्ध हैं। जैसे अधिक मात्रा में पानी पीने व दवा से एक सेमी से छोटी पथरी निकल जाने की संभवना होती है। तीन सेमी से छोटी पथरी बिना चीरे के आसानी से टुकड़े करके निकाली जा सकती है।

इलाज न लेने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं?
स्टोन साइलेंट भी हो सकता है जिसमें लक्षण कभी-कभी ही सामने आते हैं। इसके अलावा किडनी खराब होना या इसमें मवाद पडऩा और इस अंग के फेल होने की आशंका रहती है। साथ ही कैंसर भी हो सकता है।

पथरी की रोकथाम के लिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
प्रर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। लिवर रोगों का इलाज लें। अधिक चाय, कोल्ड ड्रिंक, अल्कोहल, खट्टे फल आदि से परहेज करें। दूध व दूध से बने पदार्थ, स्ट्रॉबेरी व मांस आदि का प्रयोग कम से कम करें।


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मेटाबॉलिक सिंड्रोम यानि कई रोगों की मार


मेटाबॉलिक सिंड्रोम कोई बीमारी नहीं बल्कि ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर में कई प्रकार के रोग उत्पन्न करने वाले कारक बढ़ जाते हैं जो हमें अधिक नुकसान पहुंचाते हैं।

हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और अनियंत्रित कोलेस्ट्रॉल इन चारों के संयुक्त रूप को मेटाबॉलिक सिंड्रोम कहते हैं। इसे सिंड्रोम एक्स भी कहा जाता है। लेकिन इन चारों में से यदि कोई एक ही कारक शरीर में मौजूद हो तो इसे मेटाबॉलिक सिंड्रोम नहीं कहा जाएगा। एक से अधिक रोगों की मौजूदगी में ही इसे सिंड्रोम माना जाता है। इन रोगों की वजह से शरीर में हार्ट डिजीज और स्ट्रोक जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ने लगता है।

एेसे करें बचाव
मेटाबॉलिक सिंड्रोम की बीमारी से बचाने के लिए लिए हमें अपनी डाइट में बदलाव और नियमित व्यायाम की जरूरत होती है।इस बीमारी काे कंट्राेल करने के लिए खानपान में संतुलित आहार जिसमें प्राेटिन, फाइबर अच्छी मात्रा में हाे , का सेवन करना चाहिए। किसी प्रकार के नशे दूर रहना भी जरूरी है। राेज सुबह-शाम तेज पैदल चाल, ब्रिक्स वाॅॅॅक जैसी हेल्दी एक्टिविटी करते रहें।

 


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खानपान व बदलती जीवनशैली के कारण गर्भवती महिलाओं में बढ़ रही दिक्कत


प्रेग्नेंसी केयर
अनियमित जीवनशैली व गलत खानपान के कारण गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को ब्लडप्रेशर, डायबिटीज व थायरॉयड की दिक्कत होती है। इसका शिशु के स्वास्थ्य पर भी गलत असर पड़ता है। गर्भावस्था के शुरुआती तीन माह में मधुमेह का स्तर 80/100-110 मि.ग्रा. से ज्यादा हो तो डॉक्टर की सलाह लें। इसे जैस्टेशनल डायबिटीज कहते हैं। गर्भवती का ब्लड शुगर ज्यादा रहने से शिशु का लिवर ठीक से विकसित नहीं होता है। शिशु का वजन ज्यादा हो सकता है। डिलीवरी के बाद मधुमेह की समस्या खत्म हो जाती है।

गर्भावस्था में शुगर लेवल अनियंत्रित होने से गर्भपात, समय से पहले बच्चे का जन्म, प्रसव में दिक्कत होती है। गर्भावस्था में हाइपोथायराडिज्म होने से बच्चे का ठीक से विकास नहीं होता है। डायबिटीज व हाइपरथायराडिज्म की वहज से गर्भवती में रेटिनोपैथी (आंख की बीमारी) और नेफ्रोपैथी (किडनी की बीमारी) होने का खतरा बढ़ जाता है। थायरॉयड के हार्मोन टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों में इंसुलिन के प्रभाव को भी कम करते हैं। इससे ब्लड शुगर अनियंत्रित होता है।

20वें सप्ताह में इलाज
गर्भावस्था के 20वें सप्ताह तक हाई ब्लडप्रेशर से प्री-एकलैमप्सिया की दिक्कत होती है। यूरिन के जरिए प्रोटीन निकलता है। प्लेसेंटा में रक्त का प्रवाह सही नहीं होने से शिशु को कम ऑक्सीजन मिलने से बच्चे का सम्पूर्ण विकास होने में परेशानी हो सकती है। जुड़वां बच्चे, ज्यादा उम्र में गर्भधारण, तनाव प्रमुख कारण हैं। प्रसव के बाद कई बार डायबिटीज, ब्लडप्रेशर सामान्य हो जाता है। समय-समय पर जांच कराते रहें।

दूध संग लें खरेटी के बीज का चूर्ण
आयुर्वेद के अनुसार डायबिटीज से बचने के लिए खरेटी के बीज (बला) चूर्ण 3-3 ग्राम दिन में दो बार सिर्फ दूध लें। गर्भावस्था में कब्ज की समस्या हो तो सुबह-शाम आधा चम्मच पानी के साथ आंवला चूर्ण, कच्चा आंवला फायदेमंद रहता है। डायबिटीज है तो आंवले का मुरब्बा न लें।

गर्भधारण से पहले
आयुर्वेद के अनुसार महिलाओं को गर्भधारण की तैयारी तीन माह पहले शुरू हो जाती है। पहले शरीर की शुद्धिकरण के लिए पंचकर्म कराना चाहिए। मासिक धर्म के शुरू के तीन दिन चावल या जौ का दलिया, खीर खाएं। ज्यादा नमक, खट्टी चीजें न खाएं। तनाव न लें। चार से 10 दिन तीन चम्मच जौ का सत्तू, दो चम्मच घी, एक चम्मच शहद (असमान मात्रा में) सुबह गाय के दूध में डालकर पीएं।

दोपहर में आराम
गर्भावस्था के पहले माह में उबला हुआ दूध लेें। हाई ब्लडप्रेशर की शिकायत है तो नमक की बजाए सेंधा नमक लें। बिना नमक के आटे की रोटी खाएं। दोपहर में 45 मिनट से डेढ़ घंटे तक सोएं। बाएं करवट सोएं। इससे शिशु को भरपूर पोषक तत्व मिलते हैं। भूख से ज्यादा न खाएं। चटनी, नमकीन, अचार और पापड़ खाने से परहेज करें। नाश्ता समय से लें। बासी खाना न खाएं।

हल्के व्यायाम करें
गर्भावस्था के दौरान योग-ध्यान व हल्का व्यायाम जरूर करें। इससे जोड़ों में कसाव और मांसपेशियों में लचीलापन बढ़ता है। शरीर में ऐंठन, कमर दर्द, वेरिकोज वेन के दर्द से बच सकते हैं। गर्भवती महिला को उष्ट्रासन, तितली आसन, अुनलोम-विलोम व शवासन करना चाहिए। सुबह-शाम टहलें। डॉक्टर की सलाह बिना कोई व्यायाम, आसन न करें।

 

डॉ. मंजू शर्मा
वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ

डॉ. हेतल एच. दवे.
आयुर्वेद स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ


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एचआईवी संक्रमण में लाभ देता है विटामिन-डी


विटामिन-डी की हाई डोज (अधिक मात्रा) शरीर को एचआईवी संक्रमण से लड़ने में मदद करने के साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ा सकती है। पेन स्टेट यूनिवर्सिटी में हुए शोध के अनुसार विटामिन-डी, एचआईवी-1 के खतरे को घटाने और रोग को आगे बढ़ने से रोकने के लिए सामान्य व सस्ता उपाय है।

शाेध के अनुसार सूर्य की किरणों को प्राप्त कर हमारा शरीर विटामिन-डी का निर्माण करता है या फिर इस पोषक तत्त्व को हम खाद्य पदार्थों से प्राप्त करते हैं। इसकी हाई डोज हमें रक्त संबंधी कई प्रकार के संक्रमणों से लड़ने में मदद करती हैं।

शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि सर्दी के दिनों में धूप का स्तर कम होने से शरीर को विटामिन-डी कम मिल पाता है जिससे इस मौसम में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में विशेषज्ञ मरीजों को संक्रमण से बचाव के लिए विटामिन-डी के सप्लीमेंट लेने की सलाह देते हैं।


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अचानक खुजली, चकत्ते व जुकाम की वजह क्या है?


बदलते मौसम में एलर्जी की दिक्कत बढ़ जाती है। धूल, धुआं, परफ्यूम, किसी खास तरह की खुशबू, दवा आदि को लेकर संवेदनशील हो जाता है। रोग प्रतिरोधक तंत्र इसे स्वीकार नहीं करता है। इसकी प्रतिक्रिया त्वचा पर सबसे पहले दिखती है। त्वचा पर लाल चकत्ते, सांस तेज चलना, बुखार आना प्रमुख लक्षण हैं।

खाने की चीजें
दूध, अंडा, मूंगफली आदि चीजों से भी लोगों को एलर्जी होती है। इन्हें खाने के बाद त्वचा पर लाल दाने दिखते हैं।
बदलता मौसम
बदलते मौसम में अधिकांश लोगों को खुजली, चकत्ते की समस्या होती है। इस मौसम में परागकण एलर्जी की बड़ी वजह होते हैं।
खुशबू या गंध
कई लोगों को खुशबू व गंध से दिक्कत होती है। इसके सबसे ज्यादा मामले आते हैं। सिरदर्द, उल्टी जैसी दिक्कत होती है।
पालतू जानवर
पालतू जानवर भी एलर्जी का कारण बनते हैं। इनके बाल, लार से एलर्जी होती है। इससे त्वचा पर दाने, चकत्ते आते हैं।
बच्चों को दिक्कत ज्यादा : बदलते मौसम में बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। बच्चों में शारीरिक बदलाव, किसी बीमारी के इलाज और आनुवांशिक कारण प्रमुख हैं। 60 प्रतिशत मामलों में धूल-धुआं हंै और पौष्टिक खानपान की कमी होती है।
दवाएं
दर्दनिवारक व एंटीबायोटिक दवाओं का लंबे समय तक प्रयोग करने से मरीजों में एलर्जी की दिक्कत होती है।
स्किन प्रिक टेस्ट (एसपीटी)
जिन चीजों से एलर्जी की आशंका होती है उसका नमूना स्किन पर पैच के जरिए लगाते हैं। इस जांच से एलर्जी वाली चीजों की आसानी से पहचान होती है। इस टेस्ट से 60 तरह की एलर्जी की जानकारी की जाती है। कुछ मामलों में पैच टेस्ट के अलावा ब्लड टेस्ट से भी एलर्जी के तत्वों की पहचान की जाती है।
इलाज
नियमित दिनचर्या व खानपान के साथ आदतों में बदलाव कर एलर्जी से बचा सकता है।
मरीज की जांच के बाद एलर्जी की स्थिति व कारण की पहचान करते हैं। उसी आधार पर इलाज करते हैं। यदि दवाओं से आराम नहीं मिलता तो इम्यूनोथैरेपी देते हैं।

- डॉ. सी.एल.नवल, सीनियर फिजिशियन, सवाईमानसिंह मेडिकल कॉलेज, जयपुर


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हेल्दी लाइफस्टाइल से कम हाेता है स्ट्रोक का खतरा


इंसानों की मौत और उनकी विकलांगता का बड़ा कारण बनने वाले ब्रेन स्ट्रोक के बारे में लोग आज भी कम ही जानते हैं। इस बीमारी के बारे में अनभिज्ञता के चलते यह तेजी से अपने पैर पसारती जा रही है।

स्ट्रोक क्या है?
स्ट्रोकया ब्रेन अटैक दो प्रकार के होते हैं। 'इसकेमिक' ब्रेन अटैक मस्तिष्क में रक्तकी आपूर्ति कम होने के कारण होता है जिसकी वजह रक्तकी आपूर्ति करने वाली आर्टरी में ब्लॉकेज या रुकावट होना है। यह ब्लॉकेज शरीर में कहीं भी रक्तका थक्का बन जाने से हो सकती है जो धीरे-धीरे मस्तिष्क की आर्टरी तक पहुंच जाती है। वहीं एथेरोस्क्लेरोटिक गंदगी के कारण रक्तनलिका (आर्टरी) संकीर्ण होने के बाद हुई ब्लॉकेज से होता है। वहीं हेमोरेजिक ब्रेन अटैक मस्तिष्क में रक्तस्राव के कारण होता है जिसकी वजह हाइपरटेंशन, धमनियों की कमजोर दीवारों में दरार और विकृत रक्तनलिकाएं फूलने से बना क्षेत्र आदि होता है।

स्ट्रोक के लक्षण क्या होते हैं?
- चेहरा, बाजू, पैर (खासकर शरीर के एक तरफ) में अचानक संवेदनशून्यता या कमजोरी। अचानक भ्रम की स्थिति, बोलने या किसी बात को समझने में दिक्कत।
- एक या दोनों आंखों से देखने में अचानक से दिक्कत, चलने में तकलीफ, चक्कर आना और संतुलन का अभाव।
- आमतौर पर सब्राकनोइड हेमरेज में बिना वजह अचानक भयंकर सिरदर्द होने लगता है। साथ ही उल्टी, दौरा या मानसिक चेतना का अभाव जैसी शिकायतें भी होती हैं। इन मामलों में नॉन-कॉन्ट्रास्ट सीटी जांच तत्काल करा लेनी चाहिए।

कितनी खतरनाक है यह बीमारी?
स्ट्रोक के कारण मस्तिष्क में नुकसान से पूरा शरीर प्रभावित हो सकता है- जिसके परिणामस्वरूप आंशिक से लेकर गंभीर विकलांगता तक हो सकती है। इनमें पक्षाघात, सोचने व बोलने में समस्या और भावनात्मक दिक्कतें शामिल हैं। भारत जैसे निम्न आय और मध्य आय वर्ग वाले देश में असमय मौत और विकलांगता के लिए स्ट्रोक एक अहम कारण बनता जा रहा है।

भारतीय युवा इसके शिकार ज्यादा क्यों?
स्ट्रोक झेलने वाले 15 प्रतिशत लोगों की आयु 50 वर्ष या इससे कम होती है। युवाओं में स्ट्रोक के मामले बढ़ते जा रहे हैं। डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, धूम्रपान तथा शराब का सेवन युवाओं के लिए स्ट्रोक का सबब बन सकता है।

स्ट्रोक की वजह क्या है?
- इसके कई खतरे हो सकते हैं जैसे उम्र बढ़ने के साथ ही खतरा भी बढ़ जाता है।
- पारिवारिक पृष्ठभूमि।
- 140/90 एमएमएचजी से अधिक रक्तचाप।
- एट्रियल फाइब्रिलेशन जैसे हृदय रोग व अन्य डिसऑर्डर।
- कैरोटिड आर्टरी रोग, दरअसल कैरोटिड (ग्रीवा) धमनियां मस्तिष्क को रक्तकी पूर्ति कराती हैं। लेकिन जब ये धमनियां संकुचित हो जाती हैं तो अटैक की आशंका बढ़ जाती है।
- हाई कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान और मादक पदार्थों का अधिक सेवन। डायबिटीज, अधिक वजन खासकर कमर के आसपास और व्यायाम न करने से भी स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।

स्ट्रोक से बचे रहने के लिए क्या सावधानी बरतें ?
उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक का सबसे बड़ा खतरा है। जो ब्लॉकेज (इसकेमिक स्ट्रोक) के कारण 50 प्रतिशत स्ट्रोक की वजह बनता है। रक्तचाप पर नियंत्रण और आर्टरी पर जमाव रोकने में जीवनशैली में बदलाव मददगार होते हैं।नमक कम लें। प्रतिदिन कम से कम पांच प्रकार की सब्जियों और फलों का सेवन करें।वजन कम करें। वसायुक्त भोजन कम खाएं।
मीठी चीजें सीमित मात्रा में खाएं। धूम्रपान त्याग दें। अल्कोहल का सेवन न करें। अधिक सक्रिय रहें। तनाव का स्तर कम करें और शरीर को पूरी तरह से आराम दें।

छोटा स्ट्रोक झेल चुका शख्स स्वस्थ जीवन किस तरह जी सकता है?
स्ट्रोक झेल चुके लोगों को चलने-फिरने और संतुलन बनाने में फिजिकल थैरेपिस्ट मददगार होता है। ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट स्ट्रोक सर्वाइवर को खाने, नहाने, कपड़े पहनने जैसी दैनिक गतिविधियों के तौर-तरीके बताता है। स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट भाषाई दक्षता में मदद करता है। अंत में न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट ऐसे मरीजों का इलाज करता है जिन्हें स्ट्रोक के बाद सोचने, याद रखने व व्यवहार में बदलाव का सामना करना पड़ सकता है। चाँद मोहम्मद शेख

इस बीमारी से बचने के लिए एक्सरसाइज या घूमना कितना फायदेमंद है?
एक ही जगह स्थूल होकर न बैठें। अपने डॉक्टर से नियमित व्यायाम के गुर जानें। शुरुआती दौर में प्रतिदिन 30 मिनट का हल्का-फुल्का व्यायाम कारगर रहता है। ज्यादातर डॉक्टर आपको टहलने की सलाह देंगे ताकि आप खुली हवा में सांस ले सकें और दिल तक ताजा रक्त का संचार हो सके। नियमित व्यायाम से आपका वजन घटेगा और रक्तचाप भी कम होगा।


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टीबी से हर साल होती हैं लाखों लोगों की मौत, आज मानते हैं टीबी डे


टीबी (टयूबरकोलोसिस) एकहैं गंभीर संक्रामक बीमारी है। टीबी से हर वर्ष विश्वभर में लाखों लोगों की मौत होती है। WHO के मुताबिक 2017 में विश्व में एक करोड़ से अधिक नए मरीजों की पहचान हुई थी। वर्ष 2017 में विश्व में 16 लाख से अधिक लोगों की मौत टीबी से हुई थी। भारत मेंं करीब 25 करोड़ लोगों को टीबी स्क्रीनिंग की जरूरत है। 2030 तक WHO की ओर से विश्व को टीबी मुक्त करने की योजना है जबकि भारत सरकार ने इस लक्ष्य को 2025 तक पाने का निर्णय लिया है। दुनियाभर में 24 मार्च को विश्व क्षय रोग (टीबी) दिवस मनाते हैं। 2019 की थीम 'इट इज टाइम... है।

क्या है टीबी (क्षय रोग)
टीबी बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है। इसमें लापरवाही जानलेवा हो सकती है। फेफड़ों से शुरू होकर ब्रेन, मुंह, लिवर, किडनी, गले, हड्डी तक फैलती है। खांसने और छींकने से निकलीं बूंदों से इसका इन्फेक्शन होता है। इसे प्रारंभिक अवस्था में न रोका जाए तो जानलेवा हो सकती है। टीबी की दवा समय पर न लेने से बीमारी का स्वरूप बदल जाता है। बीमारी बिगड़कर एमडीआर और एक्सडीआर टीबी का रूप ले लेती है।

ऐसे पहचानें टीबी को
शुरू में इसके मरीज को हल्का बुखार रहता और थकान होती है। दो हफ्ते से ज्यादा खांसी होना, तेज बुखार आना और कमजोरी भी हो सकती है। शुरुआत में रोगी के कंधे व पसलियों में दर्द और रात में बुखार आना। खांसते समय खून आना, कई बार पूरे लक्षण सामने नहीं आते हैं। भूख न लगना, लगातार वजन कम होना और सीने में दर्द होता है। सर्दी में भी पसीना आना, सांस उखड़ना या सांस लेने में परेशानी हो सकती है।

लापरवाही से डीआर टीबी का खतरा
टीबी का इलाज आसानी से होता, लेकिन लापरवाही खतरनाक है। टीबी का इलाज शुरुआती चरण में न होने से डीआर टीबी होती है। डीआर (ड्रग रेजिस्टेंस) टीबी कई प्रकार की, इससे खतरा बढ़ता है। डीआर टीबी में दवाइयोंं का असर नहीं होता है। इसका इलाज जटिल होता है। शुरुआती स्टेज में मोनो रेजिस्टेंस (एक दवा का असर न होना), इसके बाद पॉली रेजिस्टेंस, इसमें दो दवाइयां भी काम नहीं करती हैं। तीसरा एमडीआर (मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस), कई दवाएं भी बेअसर और चौथे रिफॉपीसिन रेजिस्टेंस टीबी में मुख्य दवा भी काम नहीं करती हैं। अंतिम स्टेज एक्सडीआर यानी एक्सटेंसिव ड्रग रेजिस्टेंस की बीमारी है। अगर किसी मरीज को एक्सडीआर होने पर इलाज बहुत मुश्किल होता है।

किन्हें टीबी का अधिक खतरा
जिन लोगों की इम्युनिटी कम होती है, उन्हें टीबी का खतरा अधिक रहता है। एचआईवी मरीजों की इम्युनिटी कमजोर होती है, इन्हें भी ज्यादा खतरा रहता है। नशा करने या ड्रग्स लेने वालों को आशंका 2-3 गुना अधिक होती है। रोगी के संपर्क में आने से टीबी के संक्रमण का खतरा अधिक रहता है साथ गर्भवती महिला और स्मोकिंग करने वाले को टीबी का खतरा सबसे अधिक है ।

टीबी होने के संभावित कारण
गलत और दूषित खानपान, संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से होता है। साथ ही धूल भरे वातावरण और टीबी के मरीजों के बीच रहने से भी खतरा रहता है। इसके बैक्टीरिया शरीर में होते हैं, लेकिन अच्छी इम्युनिटी से दबे रहते हैं।

टीबी की जांचें और इलाज
टीबी की जांच के लिए एक्सरे, ब्लड व बलगम टेस्ट कराते हैं। जरूरत पड़ने पर कुछ मरीजों का स्किन टेस्ट भी कराते हैं। टीबी से बचाव के लिए कई प्रकार के टीके लगाए जाते हैं। टीबी के इलाज के लिए सरकार की तरफ से डॉट्स सेंटर बनाये हैं। डॉट्स सेंटर पर जांच और इलाज मुफ्त में उपलब्ध होता है। किसी को इसकी आशंका है तो तत्काल सरकारी हॉस्पिटल जाएं।

इस तरह टीबी से करें मुकाबला
इम्युनिटी को बढ़ाने के लिए प्रोटीन डाइट भरपूर मात्रा में लें। दाल, अंडा, पनीर, बीन्स ज्यादा मात्रा में लेना फायदेमंद होता है। भीड़भाड़ वाली और गंदी व बिना धूप वाली जगहों पर न रहें। टीबी के मरीज से थोड़ा दूर रहें, कम-से-कम एक मीटर की दूरी रखें। मरीज को हवादार और अच्छी रोशनी वाले कमरे में रहना चाहिए। पंखा चलाकर खिड़कियां खोल दें ताकि बैक्टीरिया बाहर निकल जाएं। मरीज मास्क पहने, मास्क नहीं है तो खांसते समय मुंह को ढकें। मरीज यहां-वहां थूके नहीं, थूकने के लिए प्लास्टिक बैग पास रखें।

डॉ. विनोद कुमार गर्ग, टीबी एक्सपर्ट


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शरीर को मजबूत बनाए रखने के लिए मिनरल्स हैं जरूरी


शरीर के लिए खनिज तत्त्व (मिनरल्स) अनिवार्य हैं। ये ऐसे तत्त्व होते हैं जिनका निर्माण शरीर स्वयं नहीं करता, इसकी पूर्ति हमें बाहरी स्रोतों से करनी पड़ती है।

इसलिए होती है जरूरत
हड्डियों के लिए कैल्शियम, त्वचा को जिंक, आंतों को कॉपर, फेफड़ों के लिए आयोडीन, हृदय को मैगनीशियम व अन्य अंगों को सेहतमंद रखने के लिए पोटेशियम, बोरोन, कोबाल्ट आदि खनिज पदार्थों की जरूरत होती है। इनकी कमी से थकान, आलस, चिड़चिड़ापन और पैरों में दर्द जैसे लक्षण होते हैं। जो आगे चलकर मधुमेह, हृदय रोग, मोटापा, कैंसर, जोड़ों के दर्द, सिरदर्द, दमा, अस्थमा, कमरदर्द, लकवा, अनिद्रा, पीलिया, टीबी, अल्सर, गैस, कब्ज, गंजापन और एसिडिटी का रूप ले सकते हैं।

शुद्धता का अभाव
फल व सब्जियों को उगाने के लिए आजकल पैस्टिसाइट्स का इस्तेमाल होता है। जिससे इनमें खनिज तत्त्वों की कमी हो जाती है। इसके अलावा पीने के पानी को फिल्टर करने की प्रक्रिया से भी इन तत्त्वों की कमी हो जाती है।

पूर्ति के लिए
इन खनिजों की पूर्ति के लिए नेचुरोपैथी में ठंडे पानी में मिनरल ड्रॉप दी जाती है। मरीज को देखने के बाद ही डॉक्टर इस ड्रॉप की बूंदें मरीज के लिए तय करते हैं। इसे लेने के बाद शरीर की सफाई होती है इसलिए पेशाब अधिक आता है।


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दिल-दिमाग दुरुस्त रखने के लिए खाएं फाइबर


रेशेदार भोजन का नियमित सेवन समय पूर्व मृत्यु की आशंका को 10 फीसदी कम कर देता है। शरीर के कई अंगों को फाइबर से फायदा होता है। रोजाना कम से कम 25 ग्राम फाइबर भोजन में होना चाहिए।

दिमाग :
रोजाना की डाइट में सात ग्राम फाइबर और जोड़ लेंगे तो ब्रेन स्ट्रोक का खतरा सात फीसदी कम हो सकता है।

दिल :
सात ग्राम फाइबर के सेवन से हार्ट डिजीज का खतरा नौ फीसदी कम हो जाता है क्योंकि फाइबर में कोलेस्ट्रॉल घटाने की शक्ति होती है।

कमर :
जो लोग 30 ग्राम या इससे ज्यादा फाइबर रोजाना डाइट में शामिल करते हैं उनकी कमर के आसपास का घेरा नहीं बढ़ता।

किडनी :
रोजाना 21 ग्राम से ज्यादा फाइबर से भरपूर डाइट लेने से किडनी स्टोन की आशंका को 22 फीसदी तक घटाया जा सकता है।

फेफड़े :
फाइबर से ब्रोंकाइटिस, अस्थमा एवं फेफड़े संबंधी कई रोगों का खतरा कम होता है।

प्रमुख स्रोत :
बादाम, टमाटर, ब्रोकली, पालक, दालें, राजमा, पॉपकॉर्न, अंजीर, नाशपाती, खजूर, खोपरा, अलसी के बीज, मूली और शकरकंदी आदि।


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5 गिलास दूध जितनी ताकत देती है 100 ग्राम सहजन


सहजन के फली और फूल से होने वाले स्वास्थ्य लाभ के बारे में तो सभी जानते हैं लेकिन इसकी पत्तियों में मौजूद पौष्टिक तत्वों के बारे में आपको शायद ही पता हो। विशेषज्ञों की मानें तो सहजन की पत्तियां इसके फल और फूलों की तुलना में अधिक पौष्टिक होती हैं।

पोषक तत्त्व हैं कई
महज 100 ग्राम सहजन की पत्तियों में 5 गिलास दूध के बराबर कैल्शियम होता है। वहीं, एक नींबू के रस की तुलना में इससे पांच गुना अधिक विटामिन-सी मिलता है। सहजन की पत्तियों में कैल्शियम और विटामिन-सी के अलावा प्रोटीन, पोटेशियम, आयरन, मैगनीशियम और विटामिन-बी कॉम्पलैक्स भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

इनमें भी लाभदायक
- हैजा, दस्त, पेचिश, पीलिया और कोलाइटिस रोगों में सहजन की पत्तियों का रस फायदेमंद होता है।
- गर्भवती महिला को इसकी पत्तियों का रस देने से डिलीवरी में आसानी होती है।
- सहजन की पत्तियों को पानी में उबाल लें। अब इस पानी को ठंडा होने पर पिएं। इससे कफ में आराम मिलता है।

ये भी हैं फायदे
सहजन की पत्तियां वैसे तो सभी आयु वर्ग के लिए लाभदायक हैं। लेकिन बच्चों व महिलाओं को विशेष लाभ होता है। इसमें कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है जिससे हड्डियां मजबूत बनती हैं। आयरन, मैगनीशियम, जिंक और विटामिन की उपलब्धता से शरीर में खून की कमी नहीं होती व मानसिक स्वास्थ्य सुधरता है। इन फलियों से कुपोषण भी दूर होता है। इनमें मौजूद जिंक डायबिटीज के मरीजों के लिए भी लाभकारी है। इसके अलावा हड्डियों में सूजन व दर्द में इसकी पत्तियों को पीसकर लेप करने से आराम मिलता है।

ऐसे करें प्रयोग
इसकी पत्तियों का प्रयोग सब्जी या सांभर में और रस को पानी में उबालकर काढ़े के रूप में किया जाता है।


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दर्द से दूर रहना है ताे बदले अपनी जीवनशैली


घर में सोते समय गलत तकिया लगाने से गर्दन में दर्द हो सकता है और ऑफिस में गलत कुर्सी पर बैठने से पीठ में। शरीर के कुछ हिस्सों में दर्द को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आपको शरीर में होने वाले दर्द पर पूरी नजर रखनी चाहिए और इसे दूर करने के उपाय पर विचार करना चाहिए। दर्द के माध्यम से शरीर आपको संकेत देता है। इन्हें समझकर अपनी जीवनचर्या में बदलाव करना चाहिए।

गर्दन और कंधे में दर्द
तकनीक के इस युग में ज्यादातर लोगों का समय कम्प्यूटर के मॉनीटर के सामने गुजरता है। अगर आप अपनी कुर्सी पर सही तरह से नहीं बैठते हैं या आपकी कुर्सी कम्प्यूटर के हिसाब से सही नहीं है तो आपको गर्दन और कंधों का दर्द हो सकता है। आपको ऑफिस में काम के दौरान अपने बैठने के तरीके में सुधार करना चाहिए। कुर्सी की पॉजिशन भी ऐसी होनी चाहिए कि आप सीधे बैठ सकें। काम के दौरान बीच-बीच में ब्रेक लें और इधर-उधर कहीं घूमकर ही वापस काम करने लगें। लगातार कम्प्यूटर पर काम करने के दौरान गर्दन को इधर-उधर हिलाते रहें वर्ना गर्दन में दर्द हो सकता है। काम के बाद आपको सालसा जैसे डांस फॉर्म में शामिल होना चाहिए। इससे आपको बॉडी पोश्चर को बेहतर करने में मदद मिलेगी।

पीठ की परेशानी
आजकल कई लोग पीठ के दर्द की शिकायत करते हुए मिल जाते हैं। ज्यादा वजन पीठ पर लादकर चलने, सीधे न बैठने, मोटापा, व्यायाम की कमी, सही तरह से न सोने के कारण पीठ में दर्द हो सकता है। इसलिए मुलायम गद्दों का प्रयोग न करें।जॉगिंग करें और सीधे खड़े होकर पैरों को छूने का व्यायाम करें।

सीने में जलन
क्या आप सीने में दर्द से परेशान हैं? हो सकता है आपको एसिडिटी या हृदय से संबंधित कोई समस्या हो। कई बार एसिडिटी से हार्टबर्न, सिरदर्द व पेटदर्द भी हो सकता है। डाइट में बदलाव करेें। फास्ट फूड व कोल्ड ड्रिंक से परहेज करें। अल्कोहल और धूम्रपान से दूरी बनाएं। नियमित व्यायाम करें।

घुटनों की तकलीफ
घुटनों के दर्द में विशेष सावधानी बरतना बहुत जरूरी है। यह आर्थराइटिस की शुरुआत हो सकती है। लंबे समय तक एक ही अवस्था में बैठने, घुटनों पर ज्यादा जोर देने, झटका या चोट लगने और खून में यूरिक एसिड बढ़ने से घुटनों में दर्द की समस्या हो सकती है। इसलिए खूब पानी पिएं और हरी सब्जियां खाएं। पालक, अंजीर, पनीर, अजवाइन और बादाम का भी भरपूर सेवन करना चाहिए।

कूल्हे में दर्द
हिप्स या कूल्हों में दर्द पेट में गैस बनने, जोड़ों के दर्द, मांसपेशियों के कमजोर होने, गलत तरीके से वजन उठाने या जरूरत से ज्यादा झुकने से हो सकता है। इस दर्द से छुटकारा पाने के लिए नियमित व्यायाम करें और विशेषज्ञ की सलाह से ही योग या अन्य अभ्यास करें।

एड़ियाें का मर्ज
एड़ियाें में दर्द हाई हील पहनने से हो सकता है। इस दर्द को दूर करने के लिए किसी ऊंची जगह पर बैठकर पैरों को लटकाएं और पंजों को गोल-गोल घुमाएं। पैरों की अंगुलियों को अपनी ओर खीचें फिर बाहर की तरफ। आप एक्यूप्रेशर चिकित्सा की भी मदद ले सकते हैं।


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शरीर का सुरक्षा कवच है बेकिंग सोडा


रसाेर्इ में काम अाने वाला बेकिंग सोडा केवल खाने के काम ही नहीं आता बल्कि इसके कर्इ स्वास्थ्य लाभ भी हैं। आइए जानते हैं इसके फायदाें के बारे में :-

बालों के लिए :
शैंपू में एक चौथाई बेकिंग सोडा मिलाकर बाल धोएं। इससे बाल मुलायम होंगे।

दांतों की सफाई :
बेकिंग सोडा बेहद प्रभावी टूथ वाइटनिंग है। टूथब्रश को गीला करें और थोड़ा-सा बेकिंग सोडा लगाकर 2-3 मिनट ब्रश करें। इसके बाद अच्छी तरह कुल्ला करें। चाहें तो बाद में टूथपेस्ट से भी दांत साफ कर लें। इससे दांतों का पीलापन दूर होगा।

दाद :
त्वचा पर जहां दाद हैं, वहां थोड़ा-सा बेकिंग सोडा लगाएं। इससे बैक्टीरिया निष्क्रिय होंगे और दाद मिट जाएंगे।

पैर :
एक बाल्टी गर्म पानी में तीन चम्मच सोडा डालें और इसमें पैर डालकर इनकी मसाज करें। इसके बाद पैरों को सुखाकर क्रीम या लोशन लगाएं। इससे मृत त्वचा हट जाएगी।

हाथ:
इस अंग पर बेकिंग सोडा मलने से बैक्टीरिया मिट जाएंगे और घर पर बैठे ही आपका मैनीक्योर हो जाएगा।

नाखून :
बेकिंग सोडा और सेब का सिरका नाखूनों को फंगल इंफेक्शन से बचाते हैं। टब में एक कप सेब का सिरका डालें व उसमें 15 मिनट तक पैर रखें। इसके बाद तौलिए से पैरों को पोंछ लें। 15 मिनट बाद पैरों को 4-5 टी-स्पून बेकिंग सोडा के पानी में रखें। संक्रमण दूर होकर पैर मुलायम बनेंगे।


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बदलते माैसम से एेसे करें अपना बचाव


इंसानी जिंदगी सांसों पर टिकी है और सांस टिकी है फेफड़ों पर। हमारे फेफड़े जितने मजबूत होंगे, जिंदगी उतनी ही लंबी होगी। मौसम के परिवर्तन से लेकर घर-बाहर के धुएं तक सब हमारे फेफड़ों को प्रभावित करते हैं।

मौसम में बदलाव से सर्दी, जुकाम, छींकें आना, एलर्जी, एलर्जिक राइनाइटिस, आंखों से पानी आना और अस्थमा आदि का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में जरूरी है कि हम अपनी सेहत का खासतौर पर खयाल रखें क्योंकि एलर्जन सबसे पहले हमारी नाक, फिर गले व आखिर में फेफड़ों पर हमला करते हैं।

गीली घास पर न चलें
अस्थमा, साइनस या एलर्जी होने पर सर्दी के मौसम में देर रात तक बाहर न निकलें। साथ ही एकदम सुबह घूमने के लिए न जाएं। गीली घास पर नंगे पांव न चलें वर्ना अस्थमा का अटैक पड़ सकता है। घर की सफाई के लिए डस्टिंग की बजाय गीले कपड़े से पौंछें व मुंह पर कपड़ा रखें। पटाखों के धुएं से भी परेशानी बढ़ सकती है।

बच्चों की देखभाल
बड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है इसलिए इनकी तुलना में बच्चों व वृद्धों पर मौसम के बदलाव का सबसे ज्यादा असर पड़ता है। बच्चों को सर्दी के मौसम में ज्यादा बाहर न लेकर जाएं। उनके सिर को मंकी कैप आदि से कवर करके रखें। उन्हें निक्कर या शॉर्ट ड्रेस पहनाने के बजाय बॉडी को कवर करने वाले गर्म कपड़े पहनाएं। जो बच्चे अस्थमा के मरीज हैं उन्हें डॉक्टरी सलाह से दवाएं दें।

ये हैं प्रमुख वजह
धूल, धुंआ, तापमान में बदलाव, परागकण, त्योहारों के मौसम में साफ-सफाई के दौरान गर्द व सर्दी की शुरुआत में निकाले गए रजाई-गद्दों में मौजूद डस्ट माइट्स।

विशेषज्ञ की राय
छींक आदि के समय मुंह पर कपड़ा या रुमाल रखें।
खानपान: ठंडी व खट्टी चीजें जैसे अमचूर, इमली, अचार व चटनी आदि से परहेज करें। फ्रिज की ठंडी चीजों को उनका तापमान सामान्य होने पर खाएं-पिएं। तला-भुना आदि खाने के बाद फौरन पानी न पिएं वर्ना गले की तकलीफ हो सकती है।

इलाज : रोग होने पर विशेषज्ञ की सलाह से दवाएं लें क्योंकि वे पहले रिलीवर व प्रिवेंटर डोज देते हैं।


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ओटमील से चमकाए त्वचा, झुर्रियां करें दूर


रोजाना सुबह नाश्‍ते में ओटमील खाने के फायदे ताे आप जानते ही हाेगें। लेकिन क्या आपकाे ये पता है कि आेटमील केवल हमारी सेहत के लिए नहीं त्वचा के लिए भी बहुत फायदेमंद है। यदि आप किसी पार्टी में जाने की तैयारी में हैं आैर चाहते हैं कि पार्टी में आपकी खूबसूरती की तारीफ हाे, ताे आेटमील फेस मास्क त्वचा की खूबसूरती बढ़ाने के लिए एक अच्छा तरीका है।आइए जानते हैं कैसे बनाएं आेटमील फेस मास्क :-

- 1/2 कप गर्म पानी में 1/3 कप दलिया डाल दें।5 मिनट बाद इसमें 2 बड़े चम्मच सादा दही, 2 बड़े चम्मच शहद और एक छोटे अंडे के सफेद भाग काे मिलाकर पेस्ट तैयार करलें।फिर अपने चेहरे पर इस पेस्ट की पतली परत लगा लें। आैर 15 से 20 तक सूखने के लिए छाेड़ दें। फिर हल्के गुनगुन पानी से चेहरा धाे लें। इस फेस मास्क काे लगाने से आपकी त्वचा में कसावट आ जाएगी। आैर चेहरा बेदाग हाे कर चमकने लगेगा।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/beauty-news/oatmeal-facial-mask-for-shiny-fair-skin-4315963/

पौरुष ग्रन्थि में संक्रमण से बुखार के साथ रुक सकता है यूरिन


50 वर्ष की आयु के बाद बढ़ता प्रोस्टेट का आकार

जैसे-जैसे पुरुषों की आयु बढ़ती है, उनके शरीर में कई तरह के परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों में से अधिकांश की पौरुष ग्रंन्थि (प्रोस्टेट) बढ़ जाती है। सामान्यत: 50 वर्ष की आयु के बाद प्रोस्टेट का आकार बढ़ता है। प्रोस्टेटाइटिस, बीपीएच (बेनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया), कैंसरप्रोस्टेट में विकसित होने वाले रोग हैं। बीपीएच को पौरुष ग्रंथि विस्तार भी कहा जाता है। बुजुर्गों में बीपीएच सबसे ज्यादा होता है। यह प्रोस्टेट की परेशानी की लंबे समय तक अनदेखी और इलाज में लापवाही से किडनी में स्टोन व किडनी तक खराब हो सकती है। तकलीफ होने पर चिकित्सक की परामर्श से जांचों से इसकी पहचान होती है।
पौरुष ग्रंथि में यदि संक्रमण हो तो बुखार आ सकता है। ऐसे में यूरिन नहीं आ रहा है या तेज दर्द के साथ यूरिन बूंद-बूंद आ रहा है तो इससे ब्लैडर में यूरिन भर जाता है। पीडि़त को उल्टियां भी आ सकती है। यह पौरुष ग्रंथि से जुड़ा रोग है। इस तरह का संक्रमण 30-35 वर्ष की उम्र में भी हो सकता है। बड़े आकार के प्रोस्टेट वाले कुछ पुरुषों में ज्यादा लक्षण हो सकते हैं, जबकि बहुत बड़े प्रोस्टेट वाले पुरुषों में कम लक्षण हो सकते हैं। कुछ पुरुषों में यूरिन का बूंद-बूंद टपकना लंबे समय तक हो सकता है। बढ़ा प्रोस्टेट यूरिन को सीधे प्रभावित करता है, क्योंकि ब्लेडर पर दबाव होता है या ब्लेडर संवेदनशील हो जाता है। इससे यूरिन के निकलने को लेकर तीव्र इच्छा होती है। ब्लैडर में खुद को खाली करने की क्षमता नहीं होती है। इसलिए थोड़ी-थोड़ी देर में यूरिन आने जैसा महसूस होता है। बीपीएच आयु के साथ बढ़ता है। 70 वर्ष और इससे अधिक आयु के पुरुषों में यह दिक्कत सबसे अधिक होती है। एक अध्ययन के अनुसार भारत में आयु के हिसाब से बीपीएच की समस्या 40-49 वर्ष में 25%, 50-59 में 37%, 60-69 वर्ष में 37% और 70-79 वर्ष में 50% होती है। इससे पुरुषों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। संक्रमण बढ़ जाए व मवाद ज्यादा हो तो सर्जरी से इलाज करते हैं।

यह सावधानियां बरतें
कई पुरुषों का प्रोस्टेट आयु के साथ बढ़ता है, क्योंकि यह ग्रंथि जीवनभर वृद्धि करना बंद नहीं करती है। पैल्विक फ्लोर मसल्स को मजबूत करने के लिए व्यायाम करने से आराम मिल सकता है। तरल पदार्थों का रात के समय कम प्रयोग करेंं। कैफीन और एल्कोहल से बचें।

नींद में हो सकती समस्या
लंबे समय तक नींद में रुकावट से अनिद्रा की शिकायत हो सकती है। 50 वर्ष की आयु के बाद, प्रोस्टेट कैंसर के परिवारिक इतिहास वाले 40 वर्षीय लोगों जिनमें यूरिन संबंधी समस्या है उन्हें पीएसए टेस्ट और डिजिटल रेक्टल परीक्षण करवाना चाहिए।
बीपीएच के लक्षण
बार-बार और जल्दी यूरिन आना
रात में बार-बार यूरिन आना
यूरिन करने में कठिनाई
यूरिन करने में कमजोरी या रूक-रूक कर आना
ब्लेडर पूरी तरह खाली न होना
यूरिन में संक्रमण व खून आना


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सेहतमंद रहना है तो ऑफिस में ऐसे करें काम


कुछ समय पहले ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने उन लोगों के लिए चेतावनी जारी की थी जो लंबे समय तक लगातार बैठकर काम करते हैं। इन वैज्ञानिकों का कहना है कि एक ही मुद्रा में लंबे समय तक बैठे रहने से शरीर के हर अंग को नुकसान पहुंचता है। आइए जानते हैं इसके बारे में :-

यूं 'बैठ' जाता है शरीर
सिर
: लंबे समय तक बैठने से रक्त के थक्के जम जाते हैं जो मस्तिष्क में पहुंचकर स्ट्रोक का सबब बन सकते हैं।

फेफड़े : दिनभर बैठे रहने से पल्मोनरी एम्बोलिज्म यानी फेफड़ों में रक्त के थक्के जमने की आशंका बढ़ने लगती है।

हाथ : घंटों बैठे रहने की वजह से इस अंग के सुन्न होने या हाई ब्लडप्रेशर का खतरा बढ़ जाता है।

पेट : बैठे रहने से मोटापा, कोलोन कैंसर आदि बीमारियों का खतरा रहता है। इससे रक्तधमनियों में वसा के जमाव को घटाने वाले एंजाइम ठप हो जाते हैं और शरीर की गतिविधि कमजोर पड़ने लगती है।

गर्दन : बैठे रहने से गर्दन की मांसपेशियों में दर्द होने की आशंका भी रहती है।

पांव : हमारे इस अंग में रक्त का संचालन सही न होने से सुन्नता और नसों में क्षति आदि के खतरे की आशंका बढ़ जाती है।

दिल : आलस्यपूर्ण एवं शारीरिक गतिविधि से विहीन जीवनशैली का दुष्परिणाम इंसान को हार्ट अटैक या डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों के रूप में भोगना पड़ सकता है।

पीठ : लगातार बैठे रहने से रीढ़ की हड्डी पर जोर पड़ता है। इस वजह से रीढ़ की हड्डी में दर्द या इंजरी आ सकती है।

पैर : बैठे रहने से पैरों में तरल इकट्ठा हो जाता है। रात को जब हम सोते हैं तो यह गर्दन तक आ जाता है जिससे स्लीप एप्नीया यानी सोते समय सांस में रुकावट की समस्या होने लगती है। वहीं खड़े होने या इधर-उधर टहलते रहने से यह तरल शरीर में चारों ओर फैलता रहता है।

सावधानी बरतें
चिकित्सकों के मुताबिक अगर आप डेस्क जॉब पर हैं या बैठे-बैठे लंबे समय तक काम करते हैं तो दिनभर में तीन से चार घंटे खड़े रहने या टहलने का बहाना खोजें। ऑफिस में लगातार दो-तीन घंटे तक बैठकर काम करने के बाद पांच से दस मिनट के लिए टहल लें। ऑफिस में लिफ्ट के बजाय सीढ़ियाें का प्रयोग करें। कुर्सी पर बैठे- बैठे ही हाथों और पैरों को हिलाएं-डुलाएं ताकि रक्तका प्रवाह सुचारु रूप से बना रहे।


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क्या बदलते मौसम में आप भी एलर्जी से परेशान होते हैं?


बदलते मौसम में एलर्जी की दिक्कत बढ़ जाती है। सर्दी की शुरुआत व अंत में संक्रमण, एलर्जी की दिक्कत ज्यादा होती है। इस समय दिन का तापमान ज्यादा व रात का कम होता है। इस तापमान में बैक्टीरिया व वायरस तेजी से बढ़ते हैं। फूलों के परागकण भी एलर्जी का बड़ा कारण है। इससे छींक आना, लाल चकत्ते, बुखार जैसे लक्षण दिखते हैं। जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है उनको दिक्कत ज्यादा होती है। युवाओं के मुकाबले बच्चों व अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा होती है।
रोग प्रतिरोधक तंत्र संवेदनशील हो जाता
कभी-कभी शरीर धूल, धुआं, परफ्यूम, किसी खास तरह की खुशबू, दवा आदि को लेकर संवेदनशील हो जाता है। रोग प्रतिरोधक तंत्र इसे स्वीकार नहीं करता है। इसकी प्रतिक्रिया त्वचा पर सबसे पहले दिखती है। त्वचा पर लाल चकत्ते, सांस तेज चलना, बुखार आना प्रमुख लक्षण हैं। धूल में मौजूद सूक्ष्मजीवी एलर्जी का कारण बनते हैं जिससे छींक, आंख व नाक से पानी आता है।
डॉ. सी.एल.नवल, सीनियर फिजिशियन, सवाईमानसिंह मेडिकल कॉलेज, जयपुर


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