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मिट्टी में गौमूत्र मिलाकर लगाने से त्वचा रोगों में होगा फायदा


सोरायसिस (त्वचा रोग) एक जटिल बीमारी है जो आसानी से ठीक नहीं होती है। आयुर्वेद चिकित्सा में गौमूत्र स्नान से इसका उपचार संभव है।

रोग का कारण : आजकल विपरीत आहार के प्रयोग से यह बीमारी ज्यादा हो रही है जैसे दूध व मूली का प्रयोग एकसाथ, दूध के साथ मांसाहार का सेवन, फास्ट फूड और जंक फूड आदि खाना।

लक्षण : रोगी की त्वचा मछली की त्वचा के समान फटने जैसी हो जाती है जिसमें मवाद या कभी-कभी खून निकलने लगता है।

इलाज : रोजाना स्वस्थ देसी गाय के गौमूत्र से स्नान करना चाहिए। साफ मिट्टी में गौमूत्र मिलाकर लेप भी कर सकते हैं। ऐसा करने के बाद पानी में नीम की पत्तियां उबालकर उस पानी से नहाएं।

परहेज भी जरूरी -
गौमूत्र स्नान की विधि से उपचार के समय रोगी को परहेज करना भी जरूरी होता है। ऐसे में रोगी को खट्टी चीजें, अधिक मिर्च-मसाला, तला-भुना व सफेद चीजें जैसे दूध-दही आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ में डॉक्टर की सलाह से खून साफ करने वाली औषधियां भी ले सकते हैं।


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ऑफिस में आजमाएं ये खास टिप्स, मिनटों में दूर होगी थकान


ऑफिस में लगातार 8-10 घंटे बैठे रहना सामान्य बात है। लंबी सिटिंग से जोड़ों, कमर व गर्दन में दर्द के साथ सूजन और खून जमने जैसी शिकायतें आम हो गई हैं। ये आगे चलकर हृदय रोग व अन्य असाध्य बीमारियों का कारण बन सकती हैं। ऐसी कई एक्सरसाइज हैं जिन्हें हम रुटीन में करके खुद को फिट रख सकते हैं।

बैठने का तरीका सही हो
गलत सिटिंग से कई तरह के दर्द व खून का संचार गड़बड़ाने से रक्तवाहिकाओं में खून जमने की शिकायत हो सकती है। इसलिए सीधा बैठें, कंधे रिलेक्स रखें, पांव जमीन पर टिकाकर सीधे रखें, रीढ़ की हड्डी के अनुरूप घुमाव वाली कुर्सी पर बैठें, कम्प्यूटर स्क्रीन आंखों के लेवल में हो और कोहनी, हाथ व की-बोर्ड एक लेवल में रखें।

गर्दन
आराम से और ध्यानपूर्वक हल्के से गर्दन को आगे-पीछे करें। किसी भी मूवमेेंट में दर्द हो तो जबरदस्ती न करें। यह स्पोंडेलाइटिस से बचाएगी।

ऐसा न करें: गोल घुमाने का और कटका निकालने का प्रयास न करें क्योंकि इससे चक्कर आ सकता है या दर्द बढ़ सकता है।

कमर
सीधा बैठें और पेट को 10 सेकेंड के लिए अंदर की ओर खींचकर रोकें। इससे पेट की मांसपेािशयां मजबूत होती हैं और कमर दर्द की समस्या नहीं होती। फाइल देने और प्रिंटर तक खुद ही जाएं ताकि बॉडी मूवमेंट बना रहे और दर्द की आशंका न रहे।

हाथ-पांव के लिए यह जरूरी
पूरे पंजे को टखने से हिलाएं। हाथ को सही सपोर्ट दें और लटकाकर न रखें जिससे कंधे रिलेक्स रहें और दर्द न हो। इससे खून का दौरा सामान्य रहेगा, सूजन, ऐठन और रक्तके जमने की परेशानी में काफी फायदा मिलेगा। पांव में होने वाली ऐंठन को दूर करने के लिए दूध-दही-छाछ, नींबू-नारियल पानी और केला डाइट में शामिल करें। केला पैरों का भड़कना और ऐठन दूर करने में मददगार होता है।

ज्यादा मालिश ना करें
एक घंटे के काम के बाद शरीर को 5-10 मिनट आराम दें। दो कप से ज्यादा चाय न पिएं, पीनी भी पड़े तो साथ में कुछ हल्का खाएं। चाय में चीनी ज्यादा न लें, इससे एसिडिटी व पाचन मेंं गड़बड़ी होती है। थोड़े-थोड़े अंतराल में ठंडे पानी से आंखों को धोएं। गर्दन व कमर दर्द में तौलिए को गर्म पानी में भिगोकर, निचोड़कर दर्द की जगह रखें, उस पर हल्के गर्म पानी से भरा हॉट बैग रखें व 10-15 मिनट बाद हटा दें। जैल या ऑइंटमेंट से जोड़ों पर ज्यादा देर न तो मालिश करें और न ही रगड़ें। इससे मांसपेशियां फट सकती हैं और सूजन व दर्द बढ़ सकता है।


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उम्र के नाजुक पड़ावों में संभालें हड्डियों की ताकत, जानें ये खास बातें


विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में करीब 30 करोड़ लोग ऑस्टियोपोरोसिस से पीड़ित हैं। यानी हर चार में से एक भारतीय को ऑस्टियोपोरोसिस की बीमारी किसी न किसी रूप में है। यदि ऐसी ही स्थितियां रहीं तो मात्र एक दशक में ऑस्टियोपोरोसिस भारत की लगभग आधी जनसंख्या को अपना शिकार बना लेगा। आइए जानते हैं इससे बचने के उपायों के बारे में।

हमारे देश में हर एक सेकंड में किसी न किसी को ऑस्टियोपोरोसिस यानी हड्डियों के भुरभुरेपन के कारण फ्रैक्चर होता है। हड्डियों की सेहत और उम्र के पड़ाव के संबंध पर एक नजर।

बचपन से जवानी (0 से 20 वर्ष)
विटामिन डी और कैल्शियम की कमी से बच्चों की हड्डियां नरम या कमजोर हो जाती हैं। जिससे उन्हें सूखा रोग या रिकेट्स हो जाता है।

लक्षण और खतरे -
गड़बड़ी : पैरों और मेरुदंड का असामान्य टेढ़ा होना, छाती की हड्डियों का बाहर आना।
दांतों की समस्या : दांतों में कैविटी या उनका देर से विकास होना।

बचाव और उपचार -
शिशु और बच्चों को गुनगुनी धूप में ले जाएं, जिससे विटामिन डी का निर्माण हो।
बच्चों को पर्याप्त मात्रा में दूध दें। बच्चे जब मां के दूध के अलावा खाना भी खाने लगे तो उसे कैल्शियम युक्त पदार्थ जैसे दूध से बनीं चीजें पनीर, दही और अंजीर आदि खाने को दें।

वयस्कता की उम्र : (21 से 30 वर्ष)
लगभग 30 वर्ष की उम्र के बाद बोन डेंसिटी (हड्डियों का घनत्व) घटने लगती है। यदि इस उम्र में इन पर ध्यान नहीं दिया जाए तो आने वाले सालों में हड्डियां सबसे बड़ी समस्या बन सकती हैं। ऐसे में व्यायाम पर विशेष ध्यान दें, खानपान में सावधानी बरतें और कैल्शियम से भरपूर चीजें जैसे दूध, दही, पनीर, अंजीर, तिल, बादाम, टोफू, संतरा आदि को अपनी डाइट का हिस्सा बनाएं।

उठाएं जरूरी कदम -
हर रोज कम से कम 700 मिलीग्राम कैल्शियम और मैग्नीशियम हड्डियोंं के लिए जरूरी है।
विटामिन डी के लिए रोजाना कम से कम 15 मिनट धूप जरूर लें।
प्रतिदिन 6 ग्राम से ज्यादा नमक न लें इससे शरीर के कैल्शियम का नुकसान होगा और हड्डियां कमजोर पड़ेंगी।
मजबूत हड्डियों के लिए व्यायाम जरूरी है। इसके लिए आप साइक्लिंग, स्वीमिंग या एरोबिक्स कर सकते हैं।

रोकने के लिए ये उपाय -
जब हमारी उम्र बढ़ती है तो हड्डियां भी बूढ़ी होने लगती हैं। भुरभुरी हुई हड्डियों में फै्रक्चर की आशंका भी बढऩे लगती है। ऑस्टियोपोरोसिस या अस्थि भंगुरता के कारण सबसे सामान्य फै्रक्चर कूल्हे, कलाइयों और रीढ़ में होते हैं। 50वर्ष से ज्यादा उम्र की हर तीन में से एक महिला को ऑस्टियोपोरोसिस से फै्रक्चर की आशंका होती है जबकि 50 वर्ष से ज्यादा उम्र के हर पांच में से एक पुरुष को फ्रै क्चर का खतरा रहता है।

इनसे करें तौबा :
शराब, सिगरेट और तंबाकू हमारे खून में हड्डियों के लिए जरूरी कैल्शियम के स्तर को घटा देते हैं।
स्टेरॉयड युक्त दवाएं न लें, इनसे भी खून में कैल्शियम का स्तर कम होता है।
खून में कैल्शियम की जांच नियमित रूप से कराएं।
हर छह महीने में बीएमडी टेस्ट कराएं, ऑस्टियोपोरोसिस की जांच के लिए बोन मिनरल डेंसिटी टेस्ट हर छह महीने में कराएं और ऑर्थोपेडिक डॉक्टर से उचित सलाह लें।


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मस्तिष्क की सुरक्षा के लिए कारगर है क्रेनियोप्लास्टी


हादसा, बीमारी या संक्रमण होने पर सिर के कपाल (स्कल बोन) के ऑपरेशन के दौरान इसमें छेद छोड़ा जाता है। इस छेद (विंडो) को भरने के लिए कुछ समय बाद फिर से ऑपरेशन किया जाता है, इसे के्रनियोप्लास्टी कहते हैं। जो कि मस्तिष्क की हिफाजत के लिए जरूरी होती है। इससे पता भी नहीं चलता कि कभी मरीज का ऑपरेशन भी हुआ था। सिर में चोट लगने के बाद हुए डिफेक्ट को दूर करने के लिए क्रेनियोप्लास्टी का सही समय 3-6 माह है। क्रेनियोप्लास्टी मैटीरियल्स के प्रमुख प्रकार इस तरह से हाेते हैं :-

कैल्शियम फास्फेट बोन सीमेंट:
फायदे: यह स्कल बोन के साथ मिल जाता है व वृद्धि करने की क्षमता भी रखता है। इससे इंफ्लेमेट्री रिएक्शन नहीं होता है।
नुकसान: इसे शेप या आकार देने में मुश्किल होती है और यह कमजोर होता है।

मिथाईल मिथएक्रीलेट:
यह एक्रीलिक एसिड का पोलीमराइज्ड इस्टर है, जो पाउडर के रूप में होता है। इसे पहले बेन्जोइल पर ऑक्साइड के साथ मिलाकर गुंथे हुए आटे जैसी स्थिति में लाया जाता है, जिस शेप का डिफेक्ट होता है ये वैसी शेप लेने में सक्षम होता है। यह 10-15 मिनट बाद हड्डी जैसा सख्त हो जाता है।
फायदे: सर्जन द्वारा प्रयोग करने में आसानी, बढिय़ा आकार, कम खर्च।
नुकसान: इन्फेक्शन व फे्रक्चर होने का खतरा अधिक रहता है। निर्जीव होने के कारण उम्र के साथ वृद्धि नहीं करता, इंफ्लेमेट्री रिएक्शन का खतरा रहता है।

टाइटेनियम मेश:
इससे बनी हुई जाली डिफेक्ट पर माइक्रो स्कू्र की मदद से लगा दी जाती है।
फायदा: रिएक्शन नहीं होता और इंफेक्शन कम होता है।
नुकसान: खर्चा अधिक होता है, आकार देने में मुश्किल होती है और यह समय के साथ ढीली हो जाती है।

ऑटोलोगस बोन
इसमें मरीज के खुद की कपाल को मरीज के पेट (एबडोमिनल वॉल) में पहले ऑपरेशन के दौरान रख दिया जाता है। तीन से चार महीने के बाद यही हड्डी फिर से अपनी जगह पर स्थापित कर दी जाती है।
फायदा : खुद की कपाल सजीव रहती है और इसमें वृद्धि करने की क्षमता भी होती है।
नुकसान : पेट में पड़ी रहने से यह बोन अक्सर छोटी हो जाती है, इंफेक्शन का खतरा अधिक रहता है।


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अगर आप भी करते हैं प्लास्टिक के बर्तन और एल्युमीनियम फॉइल का इस्तेमाल तो हो जाएं सावधान


एक नए शोध के खाना खाने आदि में प्लास्टिक के बर्तनों के इस्तेमाल से कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं। इन बर्तनों में खाना खाने से गर्भवती महिलाओं और उनके भू्रण पर असर पड़ता है। बच्चे के थायरॉयड हॉर्मोन का स्तर गिरता है और उसके दिमाग का विकास भी रुक सकता है। इसी तरह एल्युमीनियम फॉइल भी हमारे स्वास्थ्य को काफी नुकसान पहुंचाते हैं।

महिलाओं के लिए नुकसानदायी -
खाने-पीने के सामान के डिब्बों, कंटेनर्स, सीडी, डीवीडी और बोतलों आदि के निर्माण के लिए पॉलीकार्बोनिक प्लास्टिक का प्रयोग किया जाता है। इसमें बाइफेनोल-ए (बीपीए) कैमिकल होता है जो महिलाओं में बांझपन का एक प्रमुख कारण है। शिकागो की बायोसाइंटिस्ट डॉ. जॉडी फ्लॉज ने जब बीपीए के महिलाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर अध्ययन शुरू किया तो पता चला कि इससे उनके अंडाशय पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इस बात को प्रमाणित करने के लिए डॉ. फ्लॉज ने चुहिया को बीपीए सोल्यूशन की खुराक दी और उन्होंने पाया कि अन्य चुहियाओं की तुलना में बीपीए खुराक लेने वाली चुहिया का अंडाशय छोटा था। सामान्य प्रजननीय विकास के लिए जिम्मेदार हार्मोन्स भी सामान्य से कम स्रावित हो रहे थे।

एल्युमीनियम फॉइल हानिकारक -
एल्युमीनियम फॉइल ऑक्सीजन और प्रकाश को पूरी तरह अवरुद्ध कर देता है, जिससे हमारे खाने में बैक्टीरिया नहीं पनपता। एल्युमीनियम फॉइल से 2-6 मिलीग्राम तक एल्युमीनियम का अंश खाने में पहुंच जाता है। जिससे कैंसर, पाचन तंत्र की गड़बड़ी, याददाश्त कमजोर होना और बांझपन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इन समस्याओं से बचने के लिए कभी भी गर्म-गर्म चपाती को फॉइल में ना लपेटें। रखना भी हो तो पहले टिश्यू पेपर और फिर फॉइल का प्रयोग करें वर्ना कैमिकल कम्पाउंड पाचनतंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं। चपाती को प्लास्टिक की बजाय स्टील के कंटेनर में रखें। जहां तक हो सके ताजा बना खाना ही खाएं।

नॉन स्टिक कुकवेयर खतरनाक -
इनके निर्माण में एक खास कैमिकल का प्रयोग होता है, जिसे पीएफओए कहते हैं। ऐसे बर्तनों के लगातार इस्तेमाल से पैंक्रियाज, लिवर और टेस्टिस (पौरुष ग्रंथि) संबंधी कैंसर, कोलाइटिस, प्रेग्नेंसी में हाइपरटेंशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। नॉनस्टिक कुकवेयर की कोटिंग निकलने या उसमें कोई स्के्रच आने पर जब इनमें खाना बनाया जाता है तो हीट से निकलने वाले विषैले पदार्थ खाने को दूषित करते हैं। इसलिए किसी साधारण पैन में थोड़ा-सा नमक डालकर दो मिनट गर्म करें। अब यह बर्तन भी नॉन स्टिक की तरह ही काम करेगा।


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कमजाेर है नजर ताे इस तरह से पकड़ें पेन, जल्द मिलेगा फायदा


अगर कभी ऐसा अंदेशा हो कि आपको एक आंख से कुछ कम दिखने लगा है तो सचेत हो जाएं। एक आंख कमजोर हो या उससे कम दिखे और उस की सही देखभाल न की जाए तो नजर दोष बढ़ जाता है।

इसलिए होता है ऐसा :
पोषक तत्वों की कमी, एक आंख में ट्यूमर होने, आंख के लेंस में गड़बड़ी, मोतियाबिंद या कोई चोट लगने से भी हो सकता है।

व्यायाम से लाभ: नाक की सीध में पेन या पैंसिल पकड़ें। पेन की नोक पर नजर टिकाकर उसे फिर धीरे-धीरे नाक के पास लगभग 10 सेंटीमीटर दूर तक ले आएंं। जिस आंख से ठीक दिख रहा है, उसे हाथ से बंद करके जिससे कम दिख रहा है उसे देखें। इस प्रक्रिया को 10 बार दोहराएं। यह एक्सरसाइज दिन में दो से तीन बार की जा सकती है।

जरूरी है जांचें
बचपन में कई बार माता-पिता बच्चों की आंख संबंधी परेशानी की शिकायत पर ध्यान नहीं देते। इसलिए कई बार उन्हें पता ही नहीं चलता कि बच्चे की एक आंख कमजोर है। ऐसे में सही नजर वाली आंख पर देखने का सारा दारोमदार आ जाता है और दूसरी आंख हमेशा के लिए सुस्त हो जाती है इसे एंबायलोपिया कहते हैं। इसलिए आंखों की जांच तीन साल की उम्र में जरूर करानी चाहिए, फिर हर दो साल के बाद आंखों की जांच कराते रहना चाहिए। डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर होने पर हर साल आंखों की जांच कराएं।


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पीपल के ताजा हरे पत्ते शरीर की कई समस्याओं में आते हैं काम, एेसे करें इस्तेमाल


पीपल के पत्ते सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं। जानते हैं इनके फायदों के बारे में।

हृदय रोग : इसके तीन ताजा पत्तों के आगे-पीछे के कोनों को तोड़कर रोज सुबह खाली पेट चबाने से खून साफ होता है। ये धमनियों में जमे हुए कोलेस्ट्रॉल को दूर कर ऑक्सीजन का संचार करते हैं।

बुखार : इसके तीन ताजा पत्ते एक गिलास पानी में उबालें, पानी जब आधा रह जाए तो गुनगुना होने पर पी लें। तेज बुखार में ऐसा दिन में 2-3 बार करने से लाभ होता है।

खुजली : पीपल की कुछ पत्तियों को घिसकर दिन में 3-4 बार खुजली या कीड़े के काटने वाली जगह पर लगाने से आराम मिलता है।

ध्यान रहें ये बातें -
पीपल को उपयोग में लेने से एक घंटा पहले और बाद में कुछ न खाएं। इसकी तासीर गर्म होती है इसलिए इसके प्रयोग के बाद जंक फूड, तली-भुनी व मसाले वाली चीजें न खाएं। साफ व धुले हुए पीपल के बड़े पत्तों से बनी पत्तल पर रखे भोजन को खाने से शरीर को ऑक्सीजन और एंटीऑक्सीडेंट मिलते हैं।


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सेहत का खजाना है धनिया, चुटकियाें में दूर हाेगा जाेड़ाें का दर्द, एेसे करें सेवन


भारतीय रसाेर्इ में पाया जाने वाला हरा पत्तीदार व सूखा धनिया सेहत का खजाना है। धनिए में जहां आर्थराइटिस, डायबिटीज दूर करने के गुण हाेते हैं वहीं चेहरे की सुंदरता बढ़ाने आैर पाचन क्रिया सही रखने के पाेषक तत्व भी हाेते हैं। आइए जानते हैं धनिए के सेहत भरे गुणाें के बारे में :-

आर्थराइटिस में उपयाेगी
जो लोग आर्थराइटिस से पीड़ित हैं, उन्हें धनिए के इस्तेमाल से लाभ होता है। इसे भोजन में शामिल करने से जोड़ों की सूजन कम होती है और इस रोग को बढऩे से रोका जा सकता है। आर्थराइटिस में जोड़ों में सूजन और दर्द के लक्षण उभरने लगते हैं। यह सूजन आइनफ्लैमेटरी साइटोकिन्स नामक मेडिएटर पदार्थ के स्राव के कारण होती है, जिससे मरीज को चलने-फिरने और रोजमर्रा के कामों में काफी असहजता महसूस होती है। रोजाना सब्जी या चटनी में इस्तेमाल किया गया धनिया मेडिएटर पदार्थ को शरीर में बनने से रोकता है जिससे आर्थराइटिस के कारण आई सूजन में कमी आती है।

पाचन क्रिया दुरुस्त
रोजाना धनिए की चटनी खाने से पाचन प्रक्रिया दुरुस्त होती है। धनिए में आयरन भरपूर मात्रा में होता है इसलिए इसके रोजाना प्रयोग से एनीमिया की समस्या में लाभ होता है।

झाइयां करे दूर
झाइयां होने पर धनिए को पानी में उबाल लें और उस पानी के ठंडा होने पर चेहरा धोएं। ऐसा दो हफ्ते तक करने से लाभ होगा। यह विटामिन ए से भरपूर होता है जिससे आंखों की रोशनी बढ़ती है।

डायबिटीज में फायदेमंद
धनिया खून में शर्करा के लेवल को कम करता है इसलिए इसका सेवन करने से इंसुलिन का स्तर सही बना रहता है यहीं कारण है कि धनिए का सेवन करना डायबिटीज के रोगियों के लिए फायदेमंद होता है। धनिया खाने से शुगर जैसी समस्या से राहत मिलती है।

वजन कम करें
धनिए के बीज वजन कम करने के लिए उपयोगी होते हैं। गर्म पानी में उबाल कर इनकी चाय बना कर लगातार कुछ दिन पीने से वजन कम होता है।


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रोजाना दो बॉडी पार्ट्स का व्यायाम करती हैं नेहा धूपिया


बॉलीवुड अभिनेत्री नेहा धूपिया अपनी बॉडी को फिट रखने के लिए जिम एक्सरसाइज करती हैं। नेहा जिम में एक्सरसाइज करके घंटों पसीना बहाती हैं। नेहा जिम एक्सरसाइज के साथ ही योगा व अन्य तरह के व्यायाम भी करती हैं।

नेहा के मुताबिक वे अपनी फिटनेस के लिए हफ्ते में पांच दिन वर्कआउट करती हैं। वे हर दिन शरीर के दो हिस्सों के लिए व्यायाम करती हैं जैसे चेस्ट और बैक, कंधे और टांगे, ट्राईसेप्स और बाईसेप्स की एक्सरसाइज के लि अलग-अलग दिन निर्धारित करके एक्सरासाइज करती हैं।

इसके अलावा नेहा रोजाना कम से कम 20मिनट साइक्लिंग व कार्डियो एक्सरसाइज करती हैं। नेहा हफ्ते में एक दिन योगा और तीन दिन पिलेट्स करती हैं। उन्हें स्वीमिंग और स्क्वैश खेलने का भी शौक है। शहर से बाहर शूटिंग के लिए जाते समय वे स्नीकर्स और योगा मैट हमेशा अपने साथ रखती हैं।

नेहा का खानपान -
नाश्ता : अंडे, बादाम, दूध, कॉर्नफ्लेक्स, इडली और वेजीटेबल सूप
लंच : रोटी, दाल, चावल, सब्जी व दही
डिनर : सूप, सलाद, ग्रिल्ड सब्जी


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क्या आप मीठा देखकर कंट्रोल नहीं कर पाते ? तो जान लें ये बातें


मिठाई खाना अच्छी बात है, लेकिन कहीं आप मनुहार या इच्छा से खाने की अति तो नहीं करते। नीचे दिए गए सवालों के जवाब देकर खुद ही परख लें।

1. मिठाई खाना मुझे बेहद पसंद है। कभी-कभार ज्यादा हो जाए तो हर्ज क्या है।
अ: सहमत

ब: असहमत

2. मैं तो बचपन से ही 'स्वीट टूथ' हूं और मिठाई मेेरी मजबूरी व कमजोरी बन चुकी है।
अ: सहमत

ब: असहमत

3. मैं कम मीठा खाता/खाती हूं लेकिन कोई ज्यादा ही मनुहार करे तो खाना ही पड़ता है।
अ: सहमत

ब: असहमत

4. मैं सिर्फ अच्छी मिठाई खाता/खाती हूं लेकिन चॉकलेट देखकर मन बच्चा बन जाता है।
अ: सहमत

ब: असहमत

5. मुझे ज्यादा मीठा खाने के खतरे पता हैं लेकिन क्या करूं मिठाई मेरे लिए आकर्षण है।
अ: सहमत

ब: असहमत

6. मीठा खाना हमारी संस्कृति व रीति-रिवाजों का हिस्सा है, इससे कैसे बचा जा सकता है।
अ: सहमत

ब: असहमत

7. हमारे घर में खाने के बाद मीठा न हो तो बड़ा हंगामा हो जाता है।
अ: सहमत

ब: असहमत

8. मैं कैलोरी की मात्रा देखकर मीठा नहीं खा सकता/सकती, आखिर ये दिल की पसंद का मामला है। इसमें कंजूसी किस बात की।
अ: सहमत

ब: असहमत

9. ऐसा लगता है कि बहुत ज्यादा मीठा खाना मुझे कमजोर और बीमार कर रहा है। मुझे सचेत होने की जरूरत है।
अ: सहमत

ब: असहमत

स्कोर और एनालिसिस -
'मिठाई' कड़वी लगने लगेगी
यदि आप 7 या उससे ज्यादा सवालों से सहमत हैं तो आप मीठा खाने के लिए अच्छी सेहत के सारे नियमों को तोड़ रहे हैं। यदि आपने मीठा खाने की अति पर लगाम नहीं लगाई तो संभव है कि आपको आगे कड़वी दवाओं से गुजारा करना पड़े। स्वाद के लालच में अपने शरीर को मीठा खाकर नष्ट न करें।

मिठाई और मीठी लगेगी
यदि आप 7 या उससे ज्यादा सवालों से असहमत हैं तो यकीनन आपने अपने 'स्वीट टूथ' पर नकेल कस रखी है। आपने अब तक अपनी इस लत पर काबू किया है तभी आपका शरीर साथ दे रहा है। इस आदत को बनाएं रखें और शक्कर की मिठास की बजाय मन की मिठास को बढ़ाते रहिए। अच्छी सेहत और खुशहाल जिंदगी आपका साथ देगी।


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इस छोटी सी चीज का सेवन करने से नहीं होती गर्भपात और पीरियड्स से संबंधित समस्याएं


सिंघाड़े में कई औषधीय गुण होते हैं इसमें शुगर, अल्सर, हृदय रोग और गठिया जैसे रोगों से बचाव करने की क्षमता होती है। डिटॉक्सिफाइंग गुणों के कारण यह पीलिया ग्रसित लोगों के लिए भी काफी फायदेमंद माना जाता है। पीलिया के मरीज इसे कच्चा या जूस बनाकर ले सकते हैं। यह शरीर से जहरीले पदार्थों को बाहर निकालता है। सर्दियों में होने वाले डिहाइड्रेशन को दूर करने में भी सिंघाड़ा काफी उपयोगी है।

मैंगनीज और आयोडीन की पर्याप्त मात्रा होने के कारण यह थायरॉइड ग्रंथि की कार्यशैली को सुचारू रखने में भी मदद करता है। इसमें कैलोरी की मात्रा काफी कम होती है जिससे वजन भी नहीं बढ़ता। इसमें आयरन काफी मात्रा में होता है जिससे खून की कमी दूर होती है। इसे कच्चा, उबालकर या सब्जी बनाकर किसी भी रूप में खा सकते हैं। अस्थमा के मरीजों के लिए सिंघाड़ा बहुत फायदेमंद होता है। सिंघाड़े खाने से सांस संबधी समस्याओं से भी कम होती है। सिंघाड़ा बवासीर जैसी मुश्किल समस्याओं से भी निजात दिलाता है। प्रेग्नेंसी में सिंघाड़ा खाने से मां और बच्चा दोनों स्वस्थ रहते हैं।

सिंघाड़ें के सेवन से गर्भपात होने का खतरा भी नहीं रहता है। सिंघाड़ा खाने से पीरियड्स से संबंधित समस्याएं भी ठीक होती हैं। सिंघाड़े खाने से रक्त संबंधी समस्याएं भी ठीक हो जाती हैं। मूत्र संबंधी रोगों के उपचार के लिए सिंघाड़े का प्रयोग बहुत फायदेमंद है। दस्त होने पर भी सिंघाड़े का सेवन रामबाण इलाज है।


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क्या आवाजें सुनकर बेचैन हो जाते हैं आप ? कहीं आपको भी तो नहीं ये बीमारी


कुछ लोगों को किसी भी तरह के शोर से अक्सर चिढ़ होती है। शोर हुआ नहीं कि उन्हें गुस्सा आने लगता है। अपना आपा खोकर वे कई बार आसपास के किसी व्यक्ति या लोगों के साथ मारपीट भी कर बैठते हैं। दरअसल यह एक प्रकार की मानसिक बीमारी है, जिसे मीजोफोनिया कहते हैं। आइए जानते हैं इसके बारे में।

यह है मीजोफोनिया -
यह एक साउंड डिसऑर्डर है। जिसमें मरीज किसी भी प्रकार की आवाज से बेचैन हो उठता है। जरूरी नहीं कि तेज आवाज से ही ऐसा होता हो। इस परेशानी में रोगी को खाना खाते समय आने वाली 'चप-चप' या पानी पीने की 'गट-गट' की आवाज से भी चिढ़ होती है। बर्तन गिरने, बढ़ई या मिस्त्री की ठक-ठक, जमीन पर कुछ रगड़ने और ट्रैफिक की आवाज भी परेशान करती है।

ऐसे होती है बेचैनी -
ट्रिगर अर्थात् जिस आवाज से समस्या होती है, उसे सुनते ही व्यक्ति काफी अलग तरह का व्यवहार करता है। उसकी सांसें तेज हो जाती हैं, चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है। वह अपने हाथ-पैर सिकोड़ने लगता है। ऐसी स्थिति होने पर व्यक्ति उस आवाज से काफी दूर अकेले में चला जाता है और घंटों एकांत में बैठा रहता है या फिर उन आवाजों से परेशान होकर आवाज करने वाले व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है। लेकिन आवाज खत्म होने के कुछ समय बाद व्यक्ति सामान्य हो जाता है।

इलाज व सावधानी -
इस बीमारी के इलाज के लिए मनोचिकित्सक से मिलें। इसका उपचार किसी दवा से नहीं बल्कि बिहेवियरल थैरेपी से किया जाता है। ट्रीटमेंट के साथ-साथ मरीज के घरवालों को भी उसे पूरी तरह से सहयोग करना चाहिए। उसकी इन हरकतों का बिल्कुल भी मजाक न उड़ाएं। इसके अलावा अगर आपको अपने किसी परिजन की ऐसी बीमारी के बारे में पता है तो कोशिश करें कि उसे ऐसी आवाजों का सामना न करना पड़े। अगर काम रोकना संभव न हो तो मरीज को कहीं दूर भेज दें।


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दांतों में इन तीन जगह पर लगते हैं कीड़े, एेसे करें इलाज


दांतों में कीड़े लगने की समस्या तब होती है जब जड़ों में लंबे समय तक खाने के अवशेष जमा रहते हैं। ये कीड़े दो दांतों के बीच, मसूड़ों के पास और उनकी जड़ों में लगते हैं। इस समस्या को दूर करने के लिए होम्योपैथी में कारगर दवाएं उपलब्ध हैं।

दांत की जड़ों में कीड़ा लगने पर होम्योपैथी दवा थूजा 30 पोटेंसी में दिन में 3 बार दी जाती है।
दो दांतों के बीच या किनारों में कीड़े लगना, दांत दर्द और गैप का कारण बन सकता है। इसके लिए स्टेफिसेग्रिया दवा 30 पोटेंसी में दिन में 3 बार लेनी होती है।
मसूड़ों के किनारों में कीड़े लगने पर थूजा व सिफीलिनम 30 पोटेंसी में दिन में 3 बार देते हैं।

कुल्ला करना जरूरी -
खाना खाने के बाद दांतों के बीच प्लाक 16 घंटे में बनता है इसलिए 12 घंटे के अंतराल में ब्रश कर लें। कुछ भी खाने के बाद कुल्ला करना न भूलें। यहां बताई गई दवाओं के प्रयोग से 5 मिनट पहले और बाद में कुछ न खाएं।


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कब्ज के लिए फायदेमंद है इस तरह की 'रोटी'


जिन लोगों को कब्ज की समस्या रहती है, उन्हें गेहूं की चोकर युक्त रोटी खानी चाहिए। चोकर की रोटी पानी ज्यादा सोखती है और पेट में मल को सूखने नहीं देती। दरअसल गेहूं के चोकर में अघुलनशील फाइबर होता है, जिसे सैल्यूलोज कहते हैं। इसमें कैल्शियम, सिलीनियम, मैगनीशियम, पोटेशियम, फॉस्फोरस जैसे खनिजों के साथ-साथ विटामिन ई और बी कॉम्प्लेक्स भी पाए जाते हैं।

चोकर आंतों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ कैंसर से भी रक्षा करता है। यह अमाशय के घाव को ठीककर टीबी से भी रक्षा करता है। चोकर हृदय रोग से बचाने के साथ-साथ कोलेस्ट्रोल की समस्या नहीं होने देता। नहाने के पानी में आधा कटोरी चोकर मिलाकर स्नान करने से चर्मरोग में भी राहत मिलती है।

ऐसे करें प्रयोग -
गेहूं के एक किलो आटे में 100 ग्राम चोकर मिला लें और इस आटे की रोटी बनाकर खाएं। इससे खाना न पचने की समस्या दूर होगी और आपको कब्ज से छुटकारा मिलेगा।

5 कप पानी में 25 ग्राम चोकर, तुलसी के 10-11 पत्ते व मुनक्के के 10-11 दाने डालकर अच्छी तरह उबालें। मीठा करने के लिए इसमें शक्कर डाल लें। चोकर वाली स्वादिष्ट चाय लाभ देगी।

जितना चोकर लें, उससे दोगुना पानी डालकर एक घंटे के लिए रखे दें। नहाने से पहले इसे पूरे शरीर पर मसलने से त्वचा मुलायाम व चमकदार होगी।


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इस वजह से भी बह सकता है आपके बच्चे का कान, जानिए क्या


कान बहना एक आम समस्या है। किसी भी आयुवर्ग के लोग इससे पीड़ित हो सकते हैं। ज्यादातर मामलों में कान में संक्रमण, पर्दे में छेद या हड्डी में गलाव पाया जाता है। इसकी मुख्य वजह लंबे समय तक जुकाम बने रहना होता है। बच्चों में कई बार नाक के पीछे एडिनोइड्स के बढऩे से भी ऐसा होता है। नाक व कान के मध्य स्थित यूस्टेकियन ट्यूब के ठीक से काम न करने से भी कई समस्याएं होने लगती हैं।

इसके उपचार के क्या तरीके हैं?
इलाज रोग की दशा व कई बार मरीज की उम्र पर भी निर्भर करता है। शुरुआत में कुछ लोगों में सही इलाज से यह ठीक हो जाता है। लेकिन ज्यादातर में कान के पर्दे में छेद या हड्डी का गलाव ठीक करने के लिए सर्जरी करनी पड़ती है क्योंकि समय गुजरने पर पर्दे के छेद के सिरे स्थिर हो जाते हैं, जो दवाओं से नहीं भरते। दवा केवल कुछ समय के लिए मवाद बंद करती है। हड्डी में गलाव होने पर सर्जरी जरूरी हो जाती है।

लंबे समय तक कान बहने से क्या क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं?
जिन लोगों का कान लंबे समय से बहता है, उनमें हड्डी का गलाव इसके पास स्थित कई महत्वपूर्ण संरचनाओ को नुकसान पहुंचा सकता है। सुनाई कम देने के अलावा दिमाग में संक्रमण का खतरा रहता है, चेहरे की नस प्रभावित होने पर चेहरा टेढ़ा हो सकता है। चक्कर आ सकते हैं, कान के पास फोड़ा बन सकता है।

कान बहने वाले मरीजों को क्या क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
समय पर उचित इलाज लें। कान में कोई द्रव्य जैसे गर्म तेल आदि न डालें। नहाते समय कान में पानी न जाने दें, इसके लिए तेल से चिकनी की हुई रुई लगाई जा सकती है। जुकाम व एलर्जी को नियंत्रण में रखें और इन्हें बढ़ने न दें।


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वजन घटाने के लिए जानें 'GI' के बारे में


मोटापे की समस्या को लेकर आजकल हर उम्र का इंसान परेशान है और इसे नियंत्रित करने के लिए न्यूट्रिशनिस्ट ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जी आई ) कम करने पर जोर दे रहे हैं। ये जानना जरूरी है कि जी आई होता क्या है? हमारे भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं। कार्बोहाइड्रेट शरीर को ऊर्जा देने का सबसे बढ़िया स्रोत है। ये दिमाग, मांसपेशियों और दूसरे जरूरी अंगों के लिए बहुत फायदेमंद है। जब खाना पाचनतंत्र में जाता है तो कार्बोहाइड्रेट शुगर में टूट जाता है और रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ जाता है। ये गतिविधियां कितनी तेजी से होती हैं, इसकी माप जी आई के माध्यम से की जाती है।

जीआई वाला खाना -
अगर कार्बाेहाइड्रेट युक्त खाना बहुत जल्दी टूटकर ग्लूकोज बन जाए और तेजी से रक्त में मिल जाए तो वह ज्यादा जीआई वाला खाना है। वहीं, अगर खाना धीरे-धीरे टूटकर ग्लूकोज में परिवर्तित होता है और धीमी गति से रक्त में मिलता है तो वह कम जीआई वाला खाना है। ऑल इंडिया इंस्टटयूट ऑफ् मेडिकल साइंसेज की डाइटीशियन के अनुसार जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों जैसे मोटापा, डायबिटीज और बीपी आदि को रोकने व उन्हें नियंत्रित करने के साथ सेहतमंद रहने के लिए कम जीआई वाले खाने को डाइट का हिस्सा बनाना चाहिए। ज्यादा जीआई वाले खाने की बजाय कम जीआई वाला खाना खाएं, जैसे सफेद पॉलिश चावल की बजाए ब्राउन राइस लें। बादाम, चना दाल, दही, दूध, पनीर, संतरा, पपीता, आम, तरबूज, केला आदि कम जीआई वाले खाद्य पदार्थ हैं।

खाने पर ध्यान दें -
वजन कम करने के लिए कम जी आई वाला भोजन काफी महत्त्वपूर्ण होता है। किसी भी खाने का जीआई 55 या इससे कम है तो वह खाना धीरे-धीरे पचता है और इससे ज्यादा समय तक पेट भरे होने का एहसास रहता है। अगर किसी खाने का जीआई 70 या इससे अधिक है तो जल्दी भूख लगती है और इससे ज्यादा खाना खाया जाता है। भरवां परांठे के बदले भरवां रोटी खाएं। समोसे/पकौड़े की बजाय इटली/उपमा/पोहा लें। मिठाई के बदले गुड़/सूखे मेवे। कोल्ड ड्रिंक की जगह नारियल, नींबू पानी। दूध वाली चाय के बदले हर्बल टी या लेमन टी लें। जूस की जगह संतरा/मौसमी खाएं।


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Menopause - महिलाओं में मेनोपॉज से जुड़ी इन खास बातों को जरूर जानें


रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) महिलाओं के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है, जिसका सामना हर किसी को करना ही पड़ता है। भारतीय महिलाओं में औसतन 46 साल की उम्र में रजोनिवृत्ति हो जाती है। यह प्रजनन क्षमता के अंत का समय है। जब सेक्स हार्मोन कम होने के कारण मासिक रक्तस्राव बंद हो जाता है। लेकिन कई बार अप्राकृतिक रजोनिवृत्ति कम उम्र में भी हो जाती है, जिसके प्रमुख कारण हैं- ऑपरेशन (गर्भाश्य/अंडाश्य निकालने), कैंसर का इलाज या कीमोथैरेपी। कुछ महिलाओं में इस दौरान अन्य प्रतिकूल लक्षण भी हो सकते हैं।

मोटापे पर लगाम लगाएं -
रजोनिवृत्त महिलाओं में पेट के मोटापे के अलावा बढ़ती उम्र की अन्य बीमारियां जैस हार्ट अटैक, याददाश्त में कमी और स्तन कैंसर आदि हो सकते हैं। मोटापा कम करने के लिए कार्यशैली में परिवर्तन, कम कैलोरी का आहार और बेरियाट्रिक सर्जरी आदि मुख्य विकल्प हैं। मेनोपॉज के दौरान व्यायाम काफी उपयोगी होता है। एक्सरसाइज से मोटापे के अलावा हृदय रोग और ऑस्टियोपोरोसिस की आशंका कम हो जाती है। एक्सरसाइज से मूड बेहतर होता है और टेंशन कम होती है। इससे एंडोर्फिन एक्टिविटी बढ़ जाती है जिससे रात में सोने के दौरान आने वाला पसीना कम हो जाता है और महिलाएं ठीक से नींद नहीं ले पातीं। उचित डॉक्टरी सलाह और सही देखरेख से मेनोपॉजल हार्मोन थैरेपी का उपयोग कर डायबिटिज के जोखिम को कम किया जा सकता है। लेकिन 60 वर्ष की उम्र के बाद हार्मोन थैरेपी शुरू नहीं करनी चाहिए।

लक्षण -
अनियमित, अत्याधिक रक्तस्त्राव।
हॉट फ्लेशेज
रात को पसीना आना।
नींद से जुड़ी परेशानियां।
जोड़ों व मांसपेशियों में दर्द।
अचानक धड़कन का तेज हो जाना।
पेशाब का जल्दी- जल्दी आना।
मानसिक बदलाव जैसे - चिड़चिड़ापन या अवसाद, ध्यान न लगना, आत्म विश्वास में कमी।

डरें नहीं, समझें -
मेनोपॉज एक प्राकृतिक बदलाव है जिससे बचा नहीं जा सकता लेकिन इससे सम्बंधित बीमारियों से बचाव करके आयु दर और जीवन की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है। मेनोपॉज एक अवसर है जिसके दौरान सम्पूर्ण स्वास्थ्य जांच (मोटापा, डायबिटीज, ऑस्टियोपोरोसिस, आर्थराइटिस, मानसिक अवसाद, अल्जाइमर व कैंसर) कराकर भविष्य की बीमारियों से दूर रहा जा सकता है।

हार्मोन थैरेपी का प्रयोग -
मे नोपॉज के कारण शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी हो जाती है, जिससे शरीर के सभी अंग प्रभावित होने लगते हैं। इस प्रभाव को कम करने के लिए महिला को हार्मोन थैरेपी दी जाती है। इस थैरेपी में शरीर में जिस हार्मोन की कमी होती है, डॉक्टरी देखरेख में उसकी पूर्ति कराई जाती है ताकि भविष्य में होने वाली बीमारियों के खतरे को कम किया जा सके। आपकी उम्र 60 साल से कम है या मेनोपॉज को 10 साल से कम हुए हैं तो हार्मोन थैरेपी के फायदे ज्यादा और जोखिम कम हैं। रजोनिवृत्ति से जुड़ी हड्डियों की कमजोरी को दूर करने के लिए यह थैरेपी काफी उपयोगी होती है।

रजोनिवृत्ति के बाद रोगों से बचाव के लिए प्रथम दस वर्ष अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है जिसमें -
धूम्रपान बिल्कुल न करें
शराब से दूरी बनाएं
नियमित एरोबिक एक्सरसाइज करें
रेगुलर बैलेंस डाइट लें
वजन पर नियंत्रण रखें
दिमाग तेज करने वाली गतिविधियों में हिस्सा लें
विशेष समय अंतराल में आवश्यक जांचें कराएं

इस दौरान शारीरिक बदलावों की वजह से महिलाएं अक्सर अपने लुक को लेकर तनाव में आ जाती हैं। इससे बचने के लिए किताबें पढ़ें, बागवानी करें, घूमने जाएं, अपने पसंदीदा काम करें और किसी भी तरह की परेशानी को अपने साथी या दोस्त के साथ जरूर शेयर करें।


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क्या पत्तागोभी के इन गुणों के बारे में जानते हैं आप


पत्तागोभी का रोजाना रस पीने से पेट के घावों यानी पेप्टिक अल्सर में लाभ होता है और पेशाब संबंधी परेशानियां दूर होती हैं। पत्तागोभी सलाद के अलावा सब्जी के रूप में भी इस्तेमाल की जाती है। इसमें कई औषधीय गुण होते हैं जो हमें निरोगी बनाते हैं। जानते हैं इसके फायदों के बारे में।

कब्ज से छुटकारा -
पत्तागोभी में मौजूद कुछ सूक्ष्म तत्व शरीर में पाए जाने वाले विषैले पदार्थों को बाहर निकालकर शरीर की चयापचय क्रिया यानी मेटाबॉलिज्म को नियमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ताजा पत्तागोभी को बारीक काटकर उसमें नमक, कालीमिर्च और नींबू का रस मिलाकर रोजाना सुबह के समय खाली पेट खाने से 2-4 सप्ताह में कब्ज की समस्या दूर हो जाती है।

पेट के लिए उपयोगी -
ताजा पत्तागोभी के रस में विटामिन यू नामक एक ऐसा दुर्लभ विटामिन पाया जाता है, जो काफी असरदार अल्सर प्रतिरोधी पदार्थ है। पत्तागोभी का रस पीने से पेप्टिक अल्सर यानी पेट के घाव ठीक हो जाते हैं। विटामिन यू का यू अक्षर लैटिन भाषा के शब्द यूलस से लिया गया है जिसका अर्थ अल्सर होता है। नियमित रूप से रोजाना सुबह-शाम एक-एक कप ताजा पत्तागोभी का रस पीने से अल्सर की बीमारी में आराम मिलता है।

पेशाब संबंधी तकलीफें -
पत्तागोभी में खनिज लवण प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो मूत्र प्रणाली पर नियंत्रण रखने में सहायक होता है। इसलिए रुक-रुक कर पेशाब आने की शिकायत में पत्तागोभी का आधा कप रस पीने से आराम मिलता है।


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Fitness samachar - इन बातों का रखेंगे ध्यान तो कभी नहीं होगी थकान


कई लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि यार मैं तो थक गया। बार-बार और बिना काम के ही होने वाली थकान से बचना चाहते हैं तो इन बातों पर ध्यान दें :-

- शारीरिक ऊर्जा को बरकरार रखने के लिए प्रोटीन युक्त नाश्ता जरूरी होता है। प्रोटीनयुक्त व रेशेदार नाश्ते से ब्लड शुगर संतुलित रहता है और शरीर में ऊर्जा बनी रहती है। सुबह का नाश्ता अच्छा हो तो दिन की शुरुआत भी अच्छी होती है।

- दिन भर थोड़ा-थोड़ा पानी या कोई भी तरल पदार्थ पीते रहें। पानी शरीर से हानिकारक तत्वों को बाहर निकालकर शारीरिक प्रणाली में नई ऊर्जा भरता है। शर्बत, फलों का रस, छाछ व नारियल पानी आदि पीना चाहिए।

- कार्बोहाइड्रेट से शरीर को ऊर्जा मिलती है। ऐसे फल जरूर खाएं, जिसमें ग्लूकोज पर्याप्त मात्रा में हो, जैसे संतरा, मौसमी, लीची आदि। चीनी का प्रयोग न करें। दूध में शहद डालकर पिएं या फिर केले का शेक पीना भी बेहतर विकल्प है। दिन में कम से कम 10 मिनट तक टहलना सेहत के लिए बहुत जरूरी होता है।

पर्याप्त नींद लें
7-8 घंटे की नींद जरूर लें ताकि अगले दिन के लिए आपको पर्याप्त ऊर्जा मिले। जब भी थकान महसूस हो तो 15-20 मिनट की झपकी जरूर लें। नींद पूरी न होने से वजन भी बढ़ता है और थकान भी जल्दी होती है।


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इस हार्मोन की कमी से कमजाेर हाेता है लाेगाें का गणित, जानिए क्या


ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि गर्भावस्था में अगर किसी महिला में थायरॉक्सिन हार्मोन का स्तर कम है तो उसकी होने वाली संतान गणित में कमजोर होगी। यह हार्मोन बच्चे के दिमागी विकास के लिए जरूरी होता है। शोधकर्ताओं ने 12 हफ्तों तक गर्भवती महिलाओं और बाद में बच्चों पर भी जन्म से लेकर पांच साल की उम्र तक शोध करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है।

थायरायड ग्रंथि गर्दन के सामने की ओर,श्वास नली के ऊपर एवं स्वर यन्त्र के दोनों तरफ दो भागों में बनी होती है। इसका आकार तितली की तरह होता है। एक स्वस्थ व्‍यक्ति में थायरायड ग्रंथि का भार 25 से 50 ग्राम तक होता है | यह ‘ थाइराक्सिन ‘ नामक हार्मोन बनाती है।

थायरायड ग्रंथि से थाईराक्सिन कम बनने की अवस्था को ‘हायपोथायराडिज्म’ कहते हैं, इस से निम्न रोग के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं -

- शारीरिक व मानसिक विकास धीमा हो जाता है।
- इसकी कमी से बच्चों में क्रेटिनिज्म (CRETINISM ) नामक रोग हो जाता है |
- 12 से 14 साल के बच्चे की शारीरिक वृद्धि रुक जाती है और 4 से 6 साल के बच्चे जितनी ही रह जाती है |
- शरीर का वजन बढ़ने लगता है एवं शरीर में सूजन भी आ जाती है |
- सोचने व बोलने की क्रिया धीमी हो जाती है।
- शरीर का ताप कम हो जाता है, बाल झड़ने लगते हैं तथा ‘गंजेपन’ की स्थिति आ जाती है |


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