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सावधान, अ​ब हैकर भी मांग रहे रंगदारी


नितिन शर्मा, नोएडा। सावधान हो जाएं। अब बदमाश ही नहीं घर बैठे हैकर भी आपसे रंगदारी मांग सकते हैं। इन हैकर्स के टारगेट पर सबसे ज्यादा कॉरपोरेंट कंपनी और बडे़ बिजनेसमैन हैं। हम आपको बताते हैं ये हैकर्स कैसे आपसे घर बैठे रुपये की डिमांड कर सकते हैं। कैसे एक ही मेल से ये आपको वश में कर सकते हैं। इनसे बचने का अचूक तरीका सावधानी ही है।

मेल में डॉट लॉकी नाम का वायरस कर रहे सेंड


रंगदारी मांगने वाले हैकर डॉट लॉकी नाम एक वायरस अटैच कर आपके ईमेल पर किसी भी नाम से मेल भेजते हैं। मेल खोलते ही उसमें अटैच डॉट लॉकी नाम का यह वायरस डाउनलोड हो जाता है।

डाउनलोड होते ही डाटा हो जाता है लॉक

 लॉकी वायरस के डाउनलोड होते ही आपके कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल में जितना भी डाटा और फाइल है, वे सभी लॉक हो जाएगी। इससे डाटा रिकवर करना भी आसान नहीं है।

डाटा लॉक होने के बाद आता है रंगदारी का मेल

साइबर एक्सपर्ट किसलय चौधरी ने बताया कि कंप्यूटर के अंदर सारी फाइल और डाटा लॉक होने के कुछ घंटों बाद हैकर उसी आईडी पर दूसरी मेल भेजते हैं। इसमें हैकर लाखों डॉलर की डिमांड करते हैं। इसके साथ ही उनकी डिमांड के अनुसार डॉलर देने पर वह यह लॉक खोलकर कंप्यूटर की सभी फाइल्स को रिकवर कराने का दावा करते हैं।  

आॅनलाइन गेटवे से मगांते हैं रुपये
 
साइबर एक्सपर्ट ने बताया कि ये हैकर आॅनलाइन गेटवे से रुपये भेजने की डिमांड करते हैं। इससे उन्हें आसानी से पकड़ा नहीं जा सकता है। इसके साथ ही वह डॉलर की डिमांड करते हैं, जो आसानी से कनवर्ट हो सकेगा और वे पकड़े भी नहीं जा सकें।

एक से डेढ़ लाख डाॅलर मांगे

जानकारी के अनुसार, डॉट लॉकी नाम का यह वायरस कुछ हफ्तों से ही हैकर्स ने एक्टिव किया है। इसकी मदद से वह सबसे ज्यादा कंपनियों को शिकार बना रहे हैं। वे भी ऐसी कंपनियां, जिनका एक दिन का डाटा लॉक होने से लाखों का नुकसान हो सकता है। हाल में ऐसे ही दिल्ली की तीन कंपनियों का डाटा हैकर्स ने डॉट लॉकी की मदद से लॉक किया अौर इसके बाद उनसे एक से डेढ़ लाख डॉलर की ​डिमांड की गई।

बरतें सावधानी

इंडियन साइबर आर्मी के सीईओ किसलय चौधरी ने बताया कि किसी भी मेल को जरा सभलकर पढे़ं। जल्दबाजी में कोई अंजान मेल को न खोलें। अगर आपको हैकर्स के इसी वायरस से डाटा लॉक भी हो गया है और वह रंगदारी मांग रहा तो डरें नहीं। आपका डाटा खोला जा सकता है। 

यह है हैकर्स का तोड़
 
जिस तेजी से हैकर्स वायरस एक्टीव कर रंगदारी मांग रहे हैं। उसी तरह मार्केट में कुछ सॉफ्टवेयर भी आ गए हैं। साथ ही पुलिस और साइबर एक्सपर्ट भी मौजूद हैं, जिनकी मदद से आप बिना रंगदारी दिए अपने डाटा लॉक को खुलवा सकते हैं।

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वाट्स एेप व फेसबुक पर चल रहा यह गंदा धंधा


नितिन शर्मा, नोएडा। एनसीआर में वाट्स एेप और सोशल साइट्स पर देह व्यापार का धंधा धड़ल्ले से चल रहा है। इंटरनेट पर एक सर्च में सैकड़ों सेक्स रैकेट संचालकों के नाम और नंबर निकल आते हैं। इसके बावजूद पुलिस इन्हें पकड़ने में नाकाम साबित हो रही है।

इंटरनेट पर ऐसी अनगिनत वेबसाइट और फेसबुक, ट्विटर अकाउंट बने हैं। यहां सेक्स रैकेट संचालक संपर्क कर लड़कियों के फोटो डालते हैं, इसके बाद युवा फोटो देखने के बाद भाव करते हैं।

वाट्स एेप पर भी भेज रहे फोटो


इंटरनेट के साथ ही अपडेट होते युवाओं से दलाल वॉट्स एेप पर संपर्क करते हैं। यहां भी प्रोफाइल पिक में लड़कियों के फोटो बदल बदलकर पंसद कराई जाती है। वहीं कुछ सेक्स रैकेट संचालक लड़कियों के फोटो वाट्स एेप से भेजकर उसका रेट फिक्स करते हैं। जिसमें डील फाइनल होने के बाद बतौर एडवांस राशि लेकर वे निश्चित तारीख पर अपनी सर्विस देते हैं।

मसाज पार्लर के नाम से रजिस्टर हैं सेक्स रैकेट


एनसीआर में 100 से भी अधिक सेक्स रैकेट ऐसे हैं जो इंटरनेट पर मसाज पार्लर के नाम से रजिस्टर है। एक ही सर्च में यहां मसाज पार्लर की लिस्ट निकलकर आ जाती है। इनके कॉटेक्ट करने पर आधे से ज्यादा पर सेक्स रैकेट चलते होने का पता लगता है।

जस्ट डॉयल पर भी हैं इनके नंबर

देह व्यापारी इंटरनेट तक ही सीमित नहीं है। उनके नंबर आपको जस्ट डायल से भी मिल सकते हैं। यहां से मिलने वाले मसाज पार्लर के नंबरों पर कॉल करने पर सेक्स रैकेट का पता चलता है। जो खुलेआम धंधा कर रहे हैं।

मोबाइल नंबर के सब कुछ होता है फर्जी

इंटरनेट पर मसाज पार्लर के नाम से सर्च करते ही आपके सामने एक लंबी लिस्ट आ जाती है लेकिन इनमें आंधे से अधिक के नंबर सही होने के साथ ही पते फर्जी होते हैं। इन मसाज पार्लरों में दिए गए आधे से अधिक पते ऐसे है जो शहर में है ही नहीं। इसके बावजूद इस पर कोई निगाह नहीं रखता।

वाट्स एेप और कॉल कर भेजते हैं लड़कियां

सेक्स रैकेट चलाने वाले आरोपी वाट्स एेप पर ही पता और जगह बताते हैं। यह लोग दिन में अपनी जगह पर लोगों को बुलाते है, वहीं रात के समय आरोपी ग्राहक के ठिकाने पर लड़कियों को भेजते हैं।

इंटरनेट और कॉल के मुताबिक यहां चल रहे सेक्स रैकेट

सदरपुर सेक्टर-45, सेक्टर-72,निठारी गांव, सेक्टर-51 समेत अन्य  पते पर चल रहे हैं। एसएसपी किरण एस ने कहा कि अगर जिले में कहीं भी इस तरह से सेक्स रैकेट चल रहे हैं तो उनकी जांच कर छापा मारकर कार्रवाई की जाएगी।

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JNU को लेकर वहीं की प्रोफेसर का खुलासा- EXCLUSIVE


संदीप तोमर, नई दिल्ली/नोएडा। जेएनयू में देशविरोधी नारेबाजी के बाद देश दो हिस्सों में बंटता नजर आ रहा है। एक पक्ष जहां देशविरोधी नारे लगाने वालों को कड़ी सजा देने की मांग कर रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे सरकार की साजिश कह रहा है। जेएनयू की हकीकत जानने के लिए पत्रिका ने जेएनयू की ही एक प्रोफेसर से बात की। उन्होंने जेएनयू को लेकर कई सनसनीखेज खुलासे किए। उन्होंने कहा कि जेएनयू के प्रोफेसर हाफिज सर्इद से मिले हुए हैं। ये प्रोफेसर हैं जेएनयू के लॉ डिपार्टमेंट की अमिता सिंह। प्रो. अमिता सिंह ने साफ शब्दों में कहा -

यह भी पढ़ें:JNU में बुरी तरह पीटे गए थे कारगिल के हीरो

- हाफिज सईद से मिले हुए हैं जेएनयू के कई टीचर्स।

- जब भी देश में गैर-कांग्रेसी सरकार होती है। उसे बदनाम करने के लिए रची जाती है साजिश।

- हर देशविरोधी गतिविधि के बाद जिस तरह शराब पार्टी होती है, उससे साबित होता है कि इनको बड़े स्तर पर फंडिंग होती है।

- जेएनयू ही नहीं, जामिया मिलिया से भी छात्रों को बुलाया जाता है देशविरोधी गतिविधियों के लिए।

- सीपीआई कांग्रेस का विंग है और कांग्रेस उसे ऐसे ही यूज करती है।

- उमर खालिद बिजनौर से है। बिजनौर आतंक का अड्डा है, वहां आईएस का भी अड्डा।

प्रोफेसर अमिता से शब्दशः बातचीत
 
सवाल — जेएनयू में ये सब चल क्या रहा है?

प्रोफेसर - इन लोगों का ये है कि ये सीपीआई (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया), सीपीआईएमएल (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया मार्कसिस्ट आैर लेनिनिस्ट) के हैं। लाइक, जनूटा (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय टीचर्स एसोसिएशन) प्रेसीडेंट अजय पटनायक और कन्हैया। ये सब सीपीआई के लोग हैं। पार्टी कैडर के हैं। इन लोगों का पहला मुद्दा पार्टी की पॉलिसी का रहता है। उसमें ये स्टूडेंट्स को यूज करते हैं। ये सिलसिला तो सालों से चल रहा है। पिछले तीन सालों से जब केंद्र में सरकार कमजोर या अनडिसाइडेड हो गई। आपको पता है कि आखिरी दिनों में मनमोहन सिंह कुछ नहीं कर रहे थे, स्टेट एजेंसी कोई काम नहीं कर रही थीं। सब थक चुके थे। उसी पीरियड में ये सब घुसे हैं, जो कश्मीरी अलगाववादी सारे हैं। उसी पीरियड में इन तत्वों की यहां पर एंट्री हुई। वरना जेएनयू की हिस्ट्री में कभी ऐसी नारेबाजी नहीं हुई। नारेबाजी होती है, कास्ट, क्लास, सोशल स्ट्रक्चर, फाॅरेस्ट राइट, फिशर फाॅग, इन लोगों के लिए होती है। लेकिन एंटी नेशनल नारेबाजी, जो देश की अखंडता और संप्रभुता पर प्रश्न चिन्ह उठाए, ऐसी कभी नहीं हुई।

सवाल - 2000 में एक इवेंट के दौरान कारगिल में शामिल रहे दो मेजर पीटे गए थे?

प्रोफेसर - वो इतना बड़ा नहीं था। मेरे ख्याल से बहुत माइनर इवेंट था। अबकी बार को देखते हुए बहुत माइनर इवेंट था। कारगिल के टाइम भी जब हआ था, उस समय भी सरकार दूसरी थी। इन लोगों का ये है कि जब भी काेई दूसरी सरकार आती है, नॉन-कांग्रेस गवनर्मेंट, तो ये इसी तरह से करते हैं। ...और कांग्रेस और सीपीआई का बड़ा क्लोज वो है, कांग्रेस का ये विंग है। वह इसको इस्तेमाल करती आई है। और कांग्रेस के अंदर अपने विभाजन हैं क्योंकि कुछ लोग इनको मानते हैं और कुछ लोग इनको नहीं मानते हैं। इसलिए कांग्रेस के अंदर भी एक किस्म का डिवीजन है।

सवाल - विदेशी फंडिंग का क्या मामला है?


प्रोफेसर - शीला दीक्षित का बेटा संदीप दीक्षित भी इन्हीं के साथ है। सीपीआई की लिस्ट में नाम है उसका। वेबसाइट पर दिया हुआ है। थिंक टैंक में संदीप दीक्षित का नाम भी है। तो इतना क्लोज इनका रिलेशन है कांग्रेस और सीपआई का।

सवाल - तो क्या कन्हैया ने एंटी नेशनल नारे लगाए थे?

प्रोफेसर - मैं तो थी नहीं उस दिन। मैं फ्रांस में थी लेकिन जब मैं 12 तारीख को आई और मैंने देखा तो मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। क्योंकि कन्हैया बेसिकली कमजोर घर का लड़का है। लेकिन वो ड्रामेबाज तो है, वो ईजीली कैरिड अवे हो जाता है। एक इंपोर्टेंस मिलती है। गरीब घर का कमजोर तबके का लड़का इतनी बड़ी यूनिवर्सिर्टी में आता है। उसे चारों तरफ दिखाई देता है कि लड़के-लड़कियां, जो मॉर्डन हैं। उसके लिए ताली पीट रहे हैं। तो वो बस उसी जोश में बकवास करता जाता है। उसकी इतनी ट्रेंनिंग भी नहीं है। मेंटल ट्रेनिंग की। उसे पता हो कि कश्मीर के लिए आवाज उठाने का मतलब है कि आप अपने देश के ऊपर कीचड़ उछाल रहे हो। इतनी भी उसकी सोशल साइंसेज ट्रेनिंग नहीं है। वो सोचता है कि जैसे गांव में कास्ट से आजादी की बात करता है, दिल्ली में आकर क्लास से आजादी की बात करता है, तो शायद बहुत अच्छा सेंटिमेंट है। उसने कहा कि कश्मीर को आजाद कर दो, कश्मीर के लोगों को आजादी दे दो। उसमें ज्यादा डेप्थ नहीं है।

सवाल - और खालिद?

प्रोफेसर - खालिद—वालिद तो घाघ लोग हैं। उमर खालिद, शैला राशिद ये सारे तो बहुत स्ट्रांग कश्मीरियत वाले लोग हैं।

सवाल - खालिद कश्मीर से नहीं कानपुर से है?

प्रोफेसर - खालिद बिजनौर से है। बिजनौर गढ़ है, अड्डा है टैरेरिज्म का। वहां तो आईएस का भी अड्डा है। बिजनौर में हिंदुस्तान का सबसे बड़ा अवैध काऊ स्लाटर हाउस है। सारी गाय ले जाई जाती हैं वहां और एक भी मुसलमान आवाज नहीं उठाता है। जबकि संभल में आप नहीं कर सकते। संभल में मुसलमान गाय नहीं कटने देते।

सवाल - विदेशी फंडिंग, क्या कोई प्रूफ है?


प्रोफेसर - होती है। मेरे पास प्रूफ नहीं है। लेकिन ये बात तय है कि कहीं न कहीं से इनको पैसा आता है। जिसको ये लोग इस्तेमाल करते हैं। जिस दिन यहां पर नारेबाजी होती है, उस दिन शाम को पार्था सार्थी रॉक पर  व्हिस्की की हजारों एक्सट्रा बोतल मिलती हैं। व्हिसकी की बोतलें इनको सप्लाई होती हैं। ये सब बहुत आॅर्गेनाइज्ड मामला है। इसके बाद ये हाॅस्टल में हल्ला-गुल्ला करते हैं। पार्था सार्थी रॉक पर मैंने खुद जाकर देखा है। जिस दिन हमारी जनूटा की मीटिंग हुई थी, जिसमें इन्होंने नारेबाजी की थी। उसकी अगली सुबह मैं आई और मेरे गार्ड ने ले जाकर मुझे दिखाया।

सवाल - पीडीपी वाले भी फंडिंग करते हैं?

प्रोफेसर - ये लेफ्ट वाले करते हैं। लेफ्ट में बहुत सारे ग्रुप हैं, जैसे ही एक ग्रुप पर पुलिस की पकड़ होती है वह दूसरे ग्रुप में चले जाते हैं। ये बहुत तेज चीज हैं।

सवाल - कुल कितने टीचर और स्टूडेंट एंटीनेशनल हैं?


प्रोफेसर - टीचर्स तो मुश्किल से दस हैं, लेकिन वे कलर ऐसा देते हैं जैसे कि सब इनके साथ हैं। ...और आप सोचते हैं जेएनयू जैसी संस्था में कोई टीचर इतना बेवकूफ होगा जो एंटी नेशनल नारे लगवाएगा। ये केवल पांच से छह लोग हैं और वे भी दलित और मुसलमान। क्योंकि उनके अपने ग्रेजेस हैं। इतने सालों से यहां पर जितने अप्वाइंटमेंट हुए हैं, सब सीपीएम वालों के, सीपीआई वालों के हुए हैं। इतने सालों में इतनी तो फसल बढ़ गई है इनकी कि ये अपनी मेजाॅरिटी क्लेम करते हैं। काफी लोग हो गए हैं इनके साथ। एंटी नेशनल नारे जो हैं... वो मुश्किल से दस लोग हैं। बाकि केवल साइलेंट मेजाॅरिटी इनके साथ रहती है क्योंकि उनका अप्वाइंटमेंट किया है, क्योंकि उनका पेपर छपवाया है, क्योंकि उन्हें विदेश भेजा है।

सवाल - नंबर ऑफ स्टूडेंट्स कुछ अंदाजा?

प्रोफेसर - स्टूडेंट्स मुश्किल से पचास होंगे। बाकी सारे एलमुनाई बुला लेते हैं। वो आकर यहां पर अड्डा बनाए बैठे हैं। ट्रेड यूनियनिस्ट वगैरह सब आ जाते हैं। उस दिन भी सारे जामिया के थे। यहां के नहीं। उनके चेहरे एकदम साफ पता पड़ रहे थे। हमारे कुछ स्टूडेंट्स ने ये आईडेंटीफाई कर लिया था, उन्होंने कहा था कि ये जामिया के है। जामिया तो इनका अड्डा है। वहां तो ये डरते भी नहीं हैं। मैं वाइवा लेने जाती हूं... जैसे ही कश्मीर का सवाल करते हैं तो वे तो गाली देने पर आ जाते हैं कि हिंदुस्तान अपने आप को क्या समझता है। इतना गुस्सा आता है... आपको हिंदुस्तान यहां पर 25 हजार रुपए महीने कि स्कालरशिप दे रहा है। खाना दे रहा है। दिल्ली में रख रहा है। आपको वो सारे अधिकार देर रहा है, जो बाकि स्टूडेंट्स को हैं। फिर भी तुम गाली दे रहे हो। कहते हैं नहीं, किसी की जुबान को काटना गलत है, हमारी जुबान काट ली है।

सवाल - क्या हिस्ट्री में कोई सेपरेटिस्ट नेता है जो जेएनयू में आया है?


प्रोफेसर - खूब आते रहते हैं। जेकेएलएफ का यासीन मलिक, गिलानी भी शायद आया है। उमर फारूक भी आया है। सारे आते रहते हैं। यहां के टीचर भी जाते रहते हैं पाकिस्तान। ...वो एक नहीं है जो पाकिस्तान में शोर मचाता रहता है, हाफिज सईद। हाफिज सईद से मीटिंग करके आए हैं यहां के टीचर्स। उन्हीं दस टीचर्स में से दो टीचर्स। हाफिज सईद से मीटिंग करके आए थे तीन साल पहले।

सवाल - 700 में से केवल दस लोगों ने बवाल मचाया हुआ है?


प्रोफेसर - ये दस अल्ट्रा लेफ्टिस्ट हैं। बाकी कांग्रेसी हैं, मेजाॅरिटी में। बीजेपी के 50-60 लोग ही हैं। कांग्रेसी इतने साल से... कांग्रेसी लेबल का, लेफ्ट के लोगों का ही इतने साल से अप्वाइंटमेंट हुआ है। कांग्रेसी साइलेंट हो जाते हैं, क्योंकि वे बीजेपी के खिलाफ हैं। एक तरह से एंटी बीजेपी कैंप के चक्कर में लेफ्ट की जीत हो जाती है। और इसलिए लेफ्ट ये सब उसी समय करता है जब बीजेपी की सरकार आती है।

सवाल- क्या सुब्रहमण्यम स्वामी को जेएनयू का वीसी बनाना चाहिए?

प्रोफेसर - नहीं नहीं, रूल्स ही नहीं है। मेरिट से होना चाहिए। बेसिक क्वालिफिकेशन देखनी चाहिए बस एंटी नेशनल न हो, धर्म कोई भी हो, उससे क्या मतलब है।

प्रोफेसर अमिता सिंह के कहने पर बातचीत के कुछ अंश संपादित कर दिए गए हैं।




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मोदी के मंत्री ही नहीं सुनते पीएम की!


नोएडा। सबका साथ सबका विकास ऐसा हमरे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहना है जिसके लिए प्रधानमंत्री जी के द्वारा तमाम योजनाये भी चलायी गयी। जिसमे गांव के विकास के लिए अलग से योजना बनाई गई और इसका नाम दिया गया आदर्श ग्राम योजना।

इस योजना में प्रत्येक सांसद को अपने संसदीय क्षेत्र से एक गांव को गोद लेकर गांव को आदर्श गांव योजना के तहत उस गांव को एक में आदर्श गांव बनाने की बात कही गयी। पर क्या ऐसा हुआ इस बात को जानने के लिए पत्रिका की टीम पहुंची गोत्ताम्बुध्नगर के नीमका गांव। केंद्रीय मंत्री व गौतमबुद्ध नगर के सांसद डा. महेश शर्मा ने जेवर ब्लॉक के नीमका गांव को सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद लिया था। योजना के तहत गांव का सर्वागीण विकास किया जाएगा, आधारभूत ढांचे को सुधारने के साथ-साथ लोगों के रहन सहन के स्तर को भी बेहतर बनाया जाएगा, तमाम वादे किये गये लेकिन ये वादे महज वादे ही बन कर रह गए। आज भी नीमका गांव की हालत ऐसी है जैसी की एक साल पहले हुआ करती थी।

एक साल बाद भी नहीं बदली गांव की हालत




केन्द्रीय मंत्री व गौतमबुद्ध नगर के सांसद डा. महेश शर्मा ने जो वादे और सुनहरे सपने गांव वालो को दिखाये वो महज एक सपना ही बन कर रह गए। एेसा गांव के लोग मौजुदा हालात को देख कर कह रहे हैं। गावं के ही रहने वाले बुजुर्ग शिवपाल की माने तो मंत्री साहब ने गांव को गोद तो ले लिया लेकिन गांव का कोई विकास नहीं किया गया। आज भी गांव वेसा ही है जेसा की एक साल पहले या मंत्री जी के गोद लेने से पहले था। फौज की नौकरी से रिटायर्ड सतपाल सिंह का कहना है की नीमका गांव का हाल तो अब एेसा है की धोबी घर का रहा ना घाट का। एेसा इसलिए क्योंकि अब गांव की किसी भी समस्या के लिए जब भी गांव वाले अथॉरिटी जाते हैं तो अथॉरिटी कहती है कि ये गांव आदर्श गांव योजना में आता है इसका विकास सांसद जी ही करेंगे।

अब तक तीन बार आये मंत्री जी गांव

गांव के लोंगो में अब एक तरह से देखा जाये तो सांसद महेश शर्मा के साथ-साथ बीजेपी से भी भरोसा उठता जा रहा है। गांव के लोंगो का कहना है की गांव के लोंगो से वादा किया गया था की आदर्श गांव के तहत आने वाली सुविधाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सामाजिक सुरक्षा, मूलभूत सुविधाएं, लोगों को आत्म निर्भर बनाना, स्वच्छता, सांस्कृति व सामाजिक विकास किया जाएगा। लिंग असंतुलन को काम करने के लिए लोगों को जागरूक किया जाएगा। गांव में लाइब्रेरी, ई लाइब्रेरी, गांव में कम से कम दसवीं तक पढ़ाई का इंतजाम, किसानों को ऑर्गेनिक खेती, बीज बैंक बनाने को लेकर ग्रामीणों को जागरुक किया जाएगा। ये सब सुनहरे सपने दिखये गये लेकिन उनमे से एक भी काम गांव में नहीं किया गया । हालांकि गांव वालों की माने तो मंत्री जी ने अब तक गांव का तीन बार दौरा किया लेकिन विकास के नाम पर कुछ भी नहीं मिला।

चार हजार मतदाता और लगभग दस हजार आबादी का गांव नीमका में आवश्‍यक मूलभूत सुविधाए आज भी नहीं उपलब्‍ध है। खेतीबाड़ी कर आजीविका चलाने वाले गांव वालों कि शिकायत है कि गांव में गुर्जर और यादव जाति के लोंगो न होने के कारण सपा के शासन काल में काफी परेशानियां झेलनी पड़ रही है। आदर्श गांव में आने के बावजूद भी उनका गांव आज भी जस का तस है जैसा की वो पहले हुआ करता था। गांव के लोंगो का कहना है अगर दोबारा चुनाव होते हैं तो गांव वाले बीजेपी का त्याग करेंगे। आपको ये भी बता दे कि इस गांव में ज्यादातर लोग बीजेपी से जुड़े हुए हैं और पार्टी समर्थक है लेकिन आज वही लोग पार्टी का तिरस्कार करने की बात कह रहे हैं।

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OMG! यूपी में इस जमीन से निकल रही आग


हिमांशु शर्मा, नोएडा। हिमाचल प्रदेश में स्थित ज्वाला देवी के मंदिर तो आप गए ही होंगे। वहां की खासियत यह है कि मंदिर में जमीन से एक ज्वाला निकल रही है। एेसा ही कुछ ग्रेटर नोएडा में भी देखने काे मिल रहा है। आपको इस पर विश्वास नहीं होगा लेकिन यह सच है।

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ग्रेटर नोएडा के जारचा क्षेत्र में जमीन से आग निकलने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। इसका खुलासा तब हुआ जब एक व्यक्ति इसमें झुलस कर घायल हो गया। इस दौरान इस व्यक्ति के दोनों पैर जल गए। स्थानीय लोगों ने बताया कि यह पहला मामला नहीं है इससे पहले भी कई लोग व जानवर इस आग की चपेट में आकर घायल हो चुके हैं।



एनटीपीसी एरिया में जमीन से निकल रही आग


दरअसल एनटीपीसी एरिया में जमीन इतनी ज्वलनशील हो चुकी है कि कहीं भी आग लग जाती है। इतना ही नहीं यहां की जमीन इस कारण बिलकुल काली पड़ चुकी है। अब हालात एेसे हैं कि इससे फसलें भी बरबाद होने लगी हैं। आए दिन हादसे होते रहते हैं, लेकिन प्रशासन इन सब बातों से अंजान है।

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रास्ते से गुजरने वाले इस आग से होतेे हैं अंजान

ग्रेटर नोएडा के जारचा क्षेत्र के एनटीपीसी के पास के गांव में जहा जमीन में इतनी आग है कि अगर यहां पत्थर मारा जाए तो तुरंत आग लग जाती है। इसलिए यहां से गुजरने वाली राहगीर इसकी चपेट में आकर झुलस जाते हैं।

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झुलस गया सूबेदार सिंह


बीते शुक्रवार ऊचा गांव के किसान अपने खेतों पर जा रहे थे तभी सूबेदार सिंह आग की चपेट में आ गए उनके दोनों पैर इसी आग में झुलस गए, जिसमे वो बुरी तरह घायल हो गए। जमीन की सतह से आग का अनुमान नहीं हो पाता। ऐसे में जो उस क्षेत्र से गुजरता है वो जैसे ही उस जगह पांव रखता है, पैर वहीं धंस जाता है और घायल हो जाता है।

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नहीं बुझ रही ये आग

ऐसे में इस घटना का शिकार सूबेदार सिंह भी हो गया। घायल हुआ किसान फ़िलहाल अस्पताल में एडमिट है। जिसका इलाज चल रहा है। इस घटना के बाद एनटीपीसी के कर्मचारी कई घंटों से पानी डालकर आग को बुझाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन जमीन से आग आैर धुंआ निकल रहा है।

प्रशासन नहीं दे रहा ध्याान

हैरानी की बात यह है कि इस पूरे मसले पर न तो कोई प्रशासनिक अधिकारी और न ही एनटीपीसी का कोई अधिकारी बोलने को तैयार है। फिलहाल इस हादसे में घायल का इलाज एनटीपीसी के अस्पताल में चल रहा है।

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क्यों निकल रही है आग

ग्रेटर नोएडा के ऊचा गांव के प्रधान सुरेश यादव की मानें तो एनटीपीसी क्षेत्र की जितनी भी जमीन है, वो इतनी खराब हो चुकी है कि उपजाऊ क्षमता भी खत्म हो चुकी है। एनटीपीसी से निकलने वाली राख में केमिकल होता है, जो कि जमीन में जमा होता रहता है वो केमिकल बाद में आग का रूप ले लेता है और ज्यादतर गर्मियों में जमीन में अपने आप भी आग निकलने लगती है। प्रधान की मानें तो इस बारे में कई बार प्रशासन को अवगत कराया गया है पर अब तक कोई सुनवाई नहीं हो पाई है। वहीं, भू-वैज्ञानिक दीपक शर्मा ने बताया कि मिट्टी की जांच के बाद ही यह बताया जा सकता है कि यहां से आग क्यों निकल रही है।

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अखिलेश जी! देखिए,आपकी पुलिस वसूल रही है रंगदारी


गाजियाबाद। यूपी पुलिस अपने एक से बढ़कर एक कारनामों के लिए बदनामी का परचम फहरा रही है। बदनामी के इसी ताज में एक और सितारा जड़ा है गाजियाबाद की पुलिस ने। यहां का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है, जिसमें एक स्क्रैप व्यापारी बता रहा है कि कैसे पुलिस ने उसे उठाया और उससे लाखों रुपए वसूल लिए। मामला संज्ञान में आने पर यहां के एसएसपी ने आरोपी को सस्पेंड भी कर दिया।

वीडियो देखने के लिए क्लिक करें-



यह है पूरा मामला
दिल्ली से सटे गाजियाबाद के बॉर्डर थाना लिंक रोड पुलिस पर लगे "रंगदारी" मांगने के आरोप का मामला सामने आया है। इसमें एक स्क्रैप व्यापारी ताहिर को जबरदस्ती उठाकर थाने लाया और कांस्टेबल पंकज यादव ने उससे लाखों रुपए मांगे और मारपीट कर दबाव भी बनाया गया। ताहिर ने एक वीडियो के जरिए अपनी पीड़ा जाहिर की है। ताहिर ने बताया है कि उसे पुलिस ने किस तरह जबरदस्ती थाने उठा कर लाया और 6 लाख रुपए की मांग की। जब तक ताहिर और उसके परिजनों ने पैसे नहीं दिए, तब तक उसे थाने में रखा गया और उसके साथ गाली-गलौज एवं मारपीट की गई।

आरोपी सस्पेंड, इंस्पेक्टर की जांच के आदेश
वीडियो वायरल होने के बाद मामला मीडिया में आया तो एसएसपी धर्मेन्द्र सिंह यादव ने आरोपी सिपाही पंकज यादव को सस्पेंड कर दिया। साथ ही इंस्पेक्टर उपेन्द्र यादव की विभागीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं।

पहले भी हुई वसूली
ऐसा नहीं है कि यह मामला पहला हो, पिछले हफ्ते ही थाना सिहानी गेट पुलिस पर भी ऐसे ही आरोप लगे थे। यहां तैनात सुभाष यादव नाम के एक कॉन्स्टेबल पर आरोप लगा था कि एक व्यक्ति से हर महीने पैसा वसुल किया जाता था और अगर वह पैसा नहीं देते तो प्रताडि़त किया जाता था। आरोप था कि पैसे नहीं देते तो जान से मारने तक की धमकी तक दे डाली थी, जिसकी ऑडियो भी वायरल हुई थी।

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शिक्षक भर्ती फर्जीवाडा : सवालों के घेरे में पूर्वांचल और लखनऊ यूनिवर्सिटी


अनूप कुमार
फैजाबाद.मंडल के पांच जिलो में हुई सहायक शिक्षकों की भर्ती में हुए बड़े फर्जीवाड़े के खुलासे के बाद सवालों के घेरे में प्रदेश के दो बड़े नामचीन विश्वविद्यालय आ रहे है। जिसमें पहला नाम जौनपुर के वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल यूनिवर्सिटी जबकि दूसरा नाम प्रदेश की राजधानी में स्थित लखनऊ विश्वविद्यालय का है।

शिक्षकोंकी भर्ती के बाद सत्यापन की प्रक्रिया में जिन 81 क्षेत्रोंकी डिग्रियां फर्जी पायी गयीं है, उनमें सर्वाधिक संख्या जौनपुर की है। जबकि उसके बाद नंबर आता है लखनऊ और लखनऊ से सटे हरदोई और उन्नाव जनपद का।

जहां के रहने वाले अभ्यर्थियों ने बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा करते हुए फर्जी डिग्री के सहारे नौकरियां हथिया लीं। इसके चलते आधे लोगों को तो उनकी नियुक्ति के लिए तय किये गए विद्यालय भी उपलब्ध करा दिए गए थे। अब सवाल ये उठता है की इतनी नामचीन शिक्षण संस्थाओं के नाम पर फर्जी डिग्रियां बनाकर इतना बड़ा फर्जीवाडा कैसे हो गया और किसी को खबर नहीं हुई।

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सर्वाधिक फर्जी 19 डिग्रियां बनी

इस बड़े फर्जीवाड़े में जो खुलासे हुए है वो बेहद चौंकाने वाले है। संयुक्त शिक्षा निदेशालय से पत्रिका टीम को जो दस्तावेज उपलब्ध कराये गए है उनकी जांच में ये बात सामने आई है कि शिक्षकों के प्रपत्रों के सत्यापन में जिन 81 सहायक अध्यापकों की डिग्रियां फर्जी पायी गयीं है, उनमें सर्वाधिक संख्या 19 जौनपुर जनपद की है। जौनपुर के अभ्यर्थियों की डिग्रियां की जांच में ये पाया गया की उनकी डिग्रियां फर्जी है साथ ही जौनपुर के अलावा पड़ोसी जनपद आजमगढ़ और बलिया के क्षेत्रों की डिग्रियां भी फर्जी पायी गयीं है।

दिलचस्प बात तो ये है कि फर्जी पाए गए प्रपत्रों में अभ्यर्थियों के सर्वाधिक स्नातक के प्रमाण पत्र फर्जी पाए गये है। वहीं बीएड की भी डिग्रियां फर्जी पायी गयी हैं। गौरतलब है कि जौनपुर में ही वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय है। और आस पास के जनपदों के तमाम महाविद्यालय इसी विश्वविद्यालय से संबध है ऐसे पूर्वांचल विश्वविद्यालय पर सवाल उठाना लाजमी है।

राजधानी लखनऊ के अभ्यर्थी भी नहीं रहे पीछे

फैजाबाद में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में हुए फर्जीवाड़े में बदनामी के छींटे सूबे की राजधानी में स्थित लखनऊ विश्वविद्यालय के दामन पर भी पड़े है। संयुक्त शिक्षा निदेशक की जांच में पाया गया है कि जिन अभ्यर्थियों की डिग्रियां फर्जी पायी गयी है उनमें लखनऊ, उन्नाव और हरदोई की भी बड़ी संख्या है। इन शहरों के अभ्यर्थियों ने अपनी नियुक्ति के दौरान स्नातक और बीएड की फर्जी डिग्रियों का सहारा लिया और नौकरी पा ली इन तीनों शहरों के रहने वाले अभ्यर्थियों में लखनऊ के 6 उन्नाव के 4 और हरदोई के 9 अभ्यर्थी शामिल है।

सत्यापन में हुए इस फर्जीवाड़े के खुलासे ने धोखाधड़ी करने वाले इन अभ्यर्थियों के मंसूबो पर पानी फेर दिया और ये सभी फर्जी शिक्षक पकड़े गए।

कुछ शिक्षकों की तो सभी डिग्रियां जांच में निकली फर्जी

फैजाबाद में सहायक शिक्षकों की नियुक्ति में हुए भारी फर्जीवाड़े में केंद्र और प्रदेश सरकार की शिक्षा नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए है। प्रदेश में शिक्षा का स्तर आखिर कैसे ऊंचा होगा जब नौनिहालों को ज़िन्दगी का ककहरा सिखाने वाले मास्टरजी की खुद की शिक्षा की नींव फर्जी डिग्रियों एक सहारे खड़ी है। संयुक्त शिक्षा निदेशालय की जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आये है। संयुक्त शिक्षा निदेशक ने अपनी जांच में जिन 81 शिक्षकों को अयोग्य घोषित कर उनकी नियुक्ति रद्द की हैं उनमें तमाम ऐसे भी शिक्षक है जिनकी इंटर,स्नातक और बीएड सभी डिग्रियां फर्जी पायी गयीं है।

ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि आखिर कैसे इतना बड़ा फर्जीवाडा हो गया और इन शिक्षकों ने इंटर से लेकर बीएड तक की फर्जी डिग्रियां बनवा ली। किसी को खबर नहीं हुई जाहिर तौर पर इस मामले की बड़े पैमाने पर जांच की जरूरत है जिससे इस फर्जीवाड़े का खुलासा हो और शिक्षा के मूलभूत ढांचे को कमज़ोर होने से बचाया जा सके।

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गलती से भी ना खोल लें ऐसा एसएमएस


नितिन शर्मा, नोएडा। अगर आप एंड्रॉयड मोबाइल चला रहे हैं तो उस पर आने वाले एसएमएस को जरा संभलकर खोलें। जल्दबाजी और बिना पढ़े मजार बॉट नाम के इस एसएमएस के लिंक पर क्लिक करते ही आपका फोन हैक होने के साथ ही डाटा डिलीट भी हो सकता है। ऐसे में आपकी थोड़ी सी सावधानी सुरक्षा साबित होगी। अन्यथा जल्दबाजी या अनदेखी में लिंक पर क्लिक करते ही आपका फोन डमी के रूप में तबदील हो जाएगा।

सिर्फ एंड्रॉयड फोन पर आते हैं ये एसएमएस


दिनों दिन मार्केट में मची एंड्रॉयड फोन की होड़ से हैकर्स भी रूबरू हैं। एक से एक हाईटेक एंड्रॉयड फोन ने धीरे-धीरे कंप्यूटर और लैपटॉप की जगह ले ली है। लोग इसी में अपना सारा डाटा रखने के साथ ही आधे से ज्यादा काम मोबाइल से करते हैं। इसी को देखते हुए हैकर्स ने भी अब मोबाइल हैक करने के लिए मजार बॉट नाम का यह वायरस तैयार किया है, जो बिना किसी नंबर के आपके मोबाइल पर एक लिंक भेजता है। मजार बॉट नाम के इस एसएमएस के लिंक पर आप जैसे ही क्लिक करेंगे, यह आपके फोन को हैक कर लेगा। साथ ही यह आपके मोबाइल में सुरक्षित सारे डाटा को भी डिलीट कर देगा।

एसएमएस बना लोगों के लिए सिरदर्द


आईसीए के डायरेक्टर किसलय चौधरी ने बताया कि एंड्रॉयड की स्क्रिप्ट में दिक्कत की वजह से मजार एसएमएस लोगों के लिए सिरदर्द बन गया है। इसके कारण बगैर किसी जानकारी के नंबर से आने वाले किसी भी एसएमएस को ओपन नहीं करना ही सावधानी है।

डाटा चोरी करने के लिए यह वायरस किया गया तैयार


साइबर सेल एक्सपर्ट किसलय चौधरी ने बताया कि मार्केट में दिनों दिन हर तरह के डाटा की डिमांड बढ़ रही है। इसके लिए हैकर्स, डेवलपर्स, प्रोग्रामर व आईटी में कुछ धुरंधर लोग पैसे कमाने के लिए ऐसे वायरस बनाते हैं। इसके बाद वह गैर जानकार सोर्स से आने वाले एसएमएस को एक साथ हजारों-लाखों लोगों तक भेजते हैं। लोगों के इस लिंक पर क्लिक करते ही मोबाइल की सारी जानकारी उनके पास पहुंच जाती है, जिसके बाद मोबाइल का सारा डाटा डिलीट हो जाता है। मजार बॉट भी इसी तरह का एसएमएस वायरस है, जो ना केवल देश बल्कि पूरे विश्व में लाखों लोगों की परेशानी का सबब बना हुआ है। इस वायरस से लड़ने में कई में कई सरकारी एजेंसियां भी नाकाम हो चुकी हैं। एंड्रॉयड की स्क्रिप्ट में बिना सुधार किए ऐसी दिक्कतें जारी रहेंगी। इससे बचने के लिए सावधानी ही बचाव है।

कंप्यूटर और लैपटॉप पर ईमेल से करते थे वार, बदला तरीका

सेंटर फॉर रिसर्च आॅन साइबर क्राइम एंड साइबर लॉ के चेयरमैन अनुज अग्रवाल ने बताया कि अमूमन इंटरनेट या ईमेल के जरिए हैकर्स वायरस आदि को पहुंचाकर कंप्यूटर और लैपटॉप को हैक करते थे पर दिनों दिन मोबाइल की नई टेक्नोलॉजी और एक के बाद एक दमदार एंड्रॉयड फोन के आने से लोगों ने कंप्यूटर और लैपटॉप का इस्तेमाल कम कर दिया है। ज्यादातर लोग अपने मोबाइल में ही अपनी कीमती डाटा सुरक्षित रखते हैं इसी के वजह से हैकर्स ने ऐसे लोगों को टारगेट बना एसएमएस के जरिए मोबाइल के डाटा हैक करने का वायरस शुरू कर दिया है।

इसलिए बनाए जाते हैं ऐसे वायरस


इस तरह के वायरस से जो डाटा जुटाया जाता है, उसे बाजार में बेच दिया जाता है। इसी डाटा का उपयोग अलग-अलग प्रोमोशनल ऑफर्स और ठगी आदि के लिए किया जाता है।  इस डाटा के आधार पर फेक कॉल, एसएमएस, मेल या फिर कोई लिंक को भेज यह उनसे ठगी का काम करते हैं। जैसे नौकरी दिलाना, कॉलेज में एडमिशन, रेंट पर घर दिलाना, होटल में रूम बुक कराने इत्यादि का झांसा देते हैं।

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तो कौन है लखनऊ की छात्रा का गुनहगार


लखनऊ.राजधानी में छात्रा के साथ रेप और उसके बाद उसकी हत्या करने वाला आखिर कातिल कौन है.. ये वो मर्डर मिस्ट्री है। जिसमे लखनऊ पुलिस उलझती नजर आ रही है। पुलिस की 8 टीमें वारदात के बाद से लगातार कातिल की तलाश में लगी है। बावजूद इसके छात्रा के साथ हैवानियत करने वाला कातिल पुलिस की पकड़ से दूर है।


आखिर कौन है गुनहगार
आखिर कौन है 12 वी क्लास की छात्रा के साथ हैवानियत करने वाला दरिंदा। नंबर एक रिक्शा चालक सतगुरु जिसकी निशानदेही पर पुलिस ने छात्रा का शव बरामद किया। नंबर दो उसका साथी दीपू या गोल्फ क्लब के दोनों कैंडीज माइकल और सगीर। जिनकी लोकेशन वारदात के दिन उसी जंगल में थी। बावजूद इसके पुलिस अभी भी कतिलो का खुलासा नहीं कर सकी है।

पुलिस रिक्शा चालक को बना चुकी है आरोपी
पुलिस ने रिक्शाचालक और उसके साथी को साक्ष्य छुपाने के आरोप में आरोपी बनाया है। जबकि दोनों कैंडीज से पूछताछ कर ये पता लगाने की कोशिश की जा रही है। कि आखिर दोनों उस दिन गोल्फ क्लब की बजाए जंगल में क्या कर रहे थे। पुलिस की इस जांच पड़ताल के बावजूद अभी भी दरिंदे पुलिस की पकड़ से दूर है। हालांकि पुलिस के बड़े अधिकारियो का दावा है कि वो बहुत जल्द इस मर्डर मिस्ट्री का खुलासा कर लेंगे।

अब तक नहीं मिली साइकिल और बैग
 पुलिस आरोपियों को रिमांड पर लेने और उनका नार्को और डीएनए टेस्ट कराने की बात भी कह रही है। इसके साथ ही सीसीटीवी की फूटेज के आधार पर जंगल के आसपास के कई लोगो को हिरसत में लिया गया है और उनसे पूछताछ की जा रही है। पुलिस की टीमें छात्रा की साइकिल और बैग की खोजबीन भी कर रही है। लेकिन अभी तक कोई सफलता नहीं मिलती दिखाई दे रही।अब सवाल उठता है कि दो लोगो को साक्ष्य छुपाने का आरोपी बनाया गया है।

किसी को नहीं बनाया रेप और हत्या का आरोपी
इसके साथ ही पुलिस अन्य लोगो से पूछताछ कर रही है। लेकिन अभी तक कोई भी आरोपी रेप और हत्या का दोषी नहीं बनाया गया है। तो कौन दरिंदे है जिन्होंने पहले गैंगरेप किया उसके बाद छात्रा को मौत के घाट उतार डाला इस बात का जवाब फिलहाल पुलिस के पास नहीं है

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#Freedom251 का नहीं है रजिस्ट्रेशन


नोएडा। दुनिया का सबसे सस्ता स्मार्टफोन देने के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाया जा रहा है। देश में जो भी प्रोडक्ट बेचे जाते हैं, उनका रजिस्ट्रेशन ब्यूरो आॅफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआर्इएस) में किया जाता है। यहां से सर्टिफिकेशन लेने के बाद ही कोई प्रोडक्ट लांच किया जा सकता है।

बीआईएस की वेबसाइट पर अभी रिंगिंग बेल्स के फ्रीडम 251 स्मार्टफोन को लिस्ट नहीं किया गया है। पत्रिका टीम ने इस बारे में बीआईएस की वेबसाइट पर जाकर मोबाइल को तलाश करने की कोशिश की, लेकिन इस नाम से कोई भी मोबाइल लिस्ट नहीं ​हो पाया।
इससे साफ होता है कि कंपनी लोगों को बेवकूफ बना रही है। सोशल मीडिया के साथ ही अब एक्सपर्ट भी कंपनी के दावे पर सवाल उठा रहे हैं।

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कंपनी ने कहा, हर सेकंड में छह लाख लाेग

कंपनी की साइट पर मोबाइल ​बुकिंग में भी समस्या आ रही है। ऐसे में संभव है कि कंपनी लोगों को बेवकूफ ही बना रही है।
वहीं, कपंनी की तरफ से इस बारे में वेबसाइट पर बयान जारी करके कहा गया है कि साइट पर हर सेकंड में छह लाख लोग आ रहे हैं, ऐसे में साइट क्रैश हो गई है।

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freedom Phone

...तो एडकॉम बना रही है फ्रीडम 251

सोशल मीडिया पर चल रही बातों पर भरोसा किया जाए तो दुनिया का सबसे सस्ता फोन रिंगिंग बेल्स नहीं बनाएगी, बल्कि एक दूसरी कंपनी एडकॉम बनाएगी। हम इस बात की पुष्टि नहीं कर रहे हैं लेकिन सोशल मीडिया पर इस तरह की पोस्ट ट्रेंड कर रही हैं। बताया ये भी जा रहा है कि फ्रीडम 251 पर रिंगिंग बेल्स का लोगो होने की बजाए एडकॉम का लोगो बना हुआ है।

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स्वास्थ्य भवन परिसर में कूड़े के ढेर में मिली जली फाइलें


लखनऊ. बीते दिनों वकीलों के उग्र प्रदर्शन की जद में आये स्वास्थ्य भवन में कई महत्वपूर्ण फाइलें जलकर ख़ाक हो गईं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग को इसकी जानकारी ही नहीं है। मामले का खुलासा तब हुआ जब स्वास्थ्य भवन परिसर में जली फाइलों के अवशेष कूड़े के ढेर में पड़े मिले। जिसमें नौकरी, प्रमोशन, पेंशन, ट्रांसफर, पोस्टिंग और वेतन पाने से सम्बंधित महत्वपूर्ण विषयों का उल्लेख था। हालांकि डीजी हेल्थ डॉ. सुनील श्रीवास्तव ने फाइलें जलने की बात से इनकार किया है।

स्वास्थ्य भवन में बीते दिनों जो दस्तावेज जलकर खाक हुए है। उनमें नियुक्ति, प्रोन्नति, आय-व्यय और एनएचएम से जुड़ी कई फाइलें भी शामिल हैं। फाइलें तो जल गईं लेकिन वे अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गईं। सबसे पहला सवाल सुरक्षा-व्यवस्था को लेकर है कि क्या जिस जगह से प्रदेश भर की चिकित्सा-व्यवस्था की मानिटरिंग होती है। वहां की सुरक्षा-व्यवस्था ऐसी है कि जब चाहे कोई आकर आगजनी करके या दस्तावेजों के साथ छेड़छाड करके चला जाए और अधिकारी मुंह तांकते रह जाए?

दूसरा सवाल यह है कि क्या जिन लोगों के नौकरी, प्रमोशन, पेंशन, ट्रांसफर, पोस्टिंग और वेतन का मामला लंबित चल रहा था। उन्हें लाभ मिल पाएगा?

तीसरा सवाल यह कि फर्जीवाड़े और घोटाले से जुड़ी जो भी जांचें चल रही थीं वे अब भी क्या उसी रफ़्तार से चल पायेंगी? क्योंकि बगैर दस्तावेज के अधिकारियों को जांच आगे बढ़ाने में काफी कठिनाई आ सकती है।

वैसे ये मामला देखने में जितना छोटा लग रहा है शायद उतना छोटा है नहीं। क्योंकि यदि गहनता से जांच होगी तो कई दबे हुए राज भी बाहर आयेंगे। हो सकता है मौके की नजाकत का फायदा उठाते हुए कुछ सफेद पोश भ्रष्टï लोगों को बचाने के लिए उनसे जुड़ी फाइलें भी आग के हवाले कर दी गई हों। फिलहाल ये
तमाम बिन्दु जांच का विषय हैं। सही से जांच के बाद ही मामले की सच्चाई का पता चल पाएगा।

बताते चलें कि बीते दिनो वकीलों ने अपने साथी श्रवण कुमार की हत्या के विरोध में राजधानी के कैसरबाग से लेकर परिवर्तन चौराहे तक जमकर कोहराम मचाया था। उन्होंने स्वास्थ्य भवन के बाहर खड़ी कई गाडिय़ों में आग लगाई दी थी। वकीलों पर आरोप है कि उन्होंने स्वास्थ्य भवन के अंदर घुस कर कई अहम दस्तावेजों को आग के हवाले कर दिया था। स्वास्थ्य भवन के परिसर में आज भी जगह -जगह फाइलें जली हुए हालत में देखी जा सकती हैं।

फर्जी विकलांग प्रमाण पत्र पर नौकरी पाने का मामला
भारतीय किसान यूनियन बदायूं की ओर से 13 जुलाई 2015 को निदेशक, प्रशासन, स्वास्थ्य भवन, रितु  महेश्वरी को एक शिकायती पत्र लिखा गया था। पत्र के माध्यम से फर्जी विकलांंग प्रमाण पत्र के आधार
पर एक कर्मचारी द्वारा स्थानांतरण निरस्त कराने के मामले में ध्यान आकृष्ट कराया गया है। पत्र में लिखा है कि जनपद बरेली के मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय में तैनात वरिष्ठï लिपिक कुलदीप शर्मा का वर्तमान में जनपद पीलीभीत में स्थानांतरण हो गया है।

विगत वर्ष 2014 में उक्त लिपिक का स्थानांतरण जनपद एटा में हुआ था लेकिन लिपिक ने फर्जी विकलांग प्रमाण पत्र लगाकर स्थानांतरण निरस्त करा लिया। उक्त लिपिक जनपद बरेली में स्वास्थ्य विभाग में नियुक्त हुआ था। कई वर्षों से एक ही जनपद में होने के कारण लिपिक ने अकूत संपत्ति अर्जित कर ली है। इसलिए लिपिक का स्थानांतरण निरस्त कराकर उसके विरुद्घ जांच कराये और गलत दस्तावेज के आधार पर स्थानांतरण रुकवाने के मामले में अनुशासनात्मक करें। इस संबंध में जो शिकायती पत्र निदेशक प्रशासन को प्रेषित किया गया था। वह जल चुका है। ऐसे में बिना शिकायती पत्र के जांच किस आधार पर होगी और
जांच में कितनी पारदिर्शिता बरती जायेगी। ये बातें जानना अपने आप मे काफी महत्वपूर्ण होगा।

बयान
वकीलों के प्रदर्शन के दौरान स्वास्थ्य भवन की कोई फाइल नहीं जली है।- डॉ. सुनील श्रीवास्तव, डीजी हेल्थ

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नोएडा के ईएसआई हाॅस्पिटल में सैलरी घोटाला


हिमांशु शर्मा. नोएडा। जिले के ईएसआई हाॅस्पिटल में सैलरी को लेकर पत्रिका की टीम एक बड़ा खुलासा करने जा रही है। दरअसल टीम जब हाॅस्पिटल में गई तो पता चला की जिन कर्मचारियों को कान्ट्रेक्ट बेस पर एक साल के लिए रखा जाता है। उनका वेतन तय सैलरी से आधा ही दिया जाता है। मानकों के अनुसार कान्ट्रेक्ट नर्स की सैलरी 27,800 रुपए है, जबकि उन्हें मात्र 15 हजार रुपए ही दिए जा रहे हैं। इस तरह हर माह लाखों रुपए का घोटाला किया जा रहा है। आपको बता दें कि हाॅस्पिटल में तकरीबन 150 कान्ट्रेक्ट बेस कर्मचारी हैं।

मिली जानकारी के अनुसार कान्ट्रेक्ट नर्स की सैलरी 27,800 होनी चाहिए, जो कि केन्द्र सरकार द्वारा तय की गई है, लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि ईएसआई हास्पिटल में नर्स को मात्र 15 हजार और सहायक नर्स को सात हजार रुपए ही वेतन दिया जाता है, जबकि इन्हें भी 15 हजार रुपए तय मानक के हिसाब से दिए जाने चाहिए। नाम न बताने की शर्त पर नर्स और सहायक नर्सों ने बताया कि उन्हें वाया दूत कम्पनी अपॉइन्ट करती है और वेतन देने का काम भी कम्पनी का ही है। इतना ही नहीं इस दौरान नर्सों ने कम्पनी पर कई गंभीर आरोप भी लगाए हैं। उनका कहना है कि उन्हें सैलरी स्लिप नहीं दी जाती और वेतन दिए जाने पर, सैलरी स्लिप की अगर मांग की जाती है तो उन्हें नौकरी ने निकालने की धमकी दी जाती है। इससे पहले भी जब अपनी मांगों को लेकर कुछ कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया था, तो कम्पनी ने तानाशाही दिखाते हुए प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों का कान्ट्रेक्ट कैन्सिल करते हुए निकाल दिया था।

डायरेक्टर को नहीं है कोई जानकारी
नोएडा के ईएसआई हाॅस्पिटल की डायरेक्टर डॉ. निलीमा से मामले में जब पत्रिका की टीम ने बात की तो उनका कहना था कि उन्हें मामले की कोई भी जानकारी नहीं है और कान्ट्रेक्ट पर रखे जाने वाले कर्मचारियों की तैनाती वाया दूत कम्पनी ही करती है, जिसमें हॉस्पिटल का किसी भी प्रकार का कोई रोल नहीं है। तो वहीं जब वाया दूत कम्पनी की मैनेजर अमरजीत कौर से मामले में टीम ने बातचीत करनी चाही, तो अमरजीत कौर ने बातचीत करने से साफ इनकार कर दिया। इन तमाम बातों से आप अन्दाजा लगा सकते हैं कि ईएसआई हॉस्पिटल में तैनात कांट्रेक्ट कर्मचारियों के वेतन में किस तरह से भ्रष्टाचार किया जा रहा है।

दिल्ली के ईएसआई में भी आया था सैलरी घोटाले का मामला
आपको बता दें कि साल-2015 मार्च में दिल्ली के रोहिणी में स्थित ईएसआई हाॅस्पिटल में कान्ट्रेक्ट बेस पर तैनात कर्मचारियों ने अपनी सैलरी की मांग को लेकर हड़ताल की थी, जिसमें आरटीआई में खुलासा किया गया था कि कर्मचारियों की सैलरी जो कि 24,867 रुपए निकलकर सामने आई थी, लेकिन कर्मचारियों को मिलने वाला वेतन महज 13 हजार रुपए ही था।

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वैलेंटाइन-डे पर इनका प्यार देखकर कांप जाएंगे आप


नितिन शर्मा, नोएडा। जहां रविवार को युवा वैलेंटाइन-डे की खुमारी में डूबे हुए थे, वहीं नोएडा की सड़कों पर कुछ युवा अपने प्यार आैर पैशन की खातिर अपने साथ ही दूसरों की जान भी जोखिम में डालते दिखे।

स्टंट और रफ्तार के रोमांच को पूरा करने के लिए दिल्ली आैर फरीदाबाद के बाइकर्स नोएडा-ग्रेनो एक्सप्रेसवे की सर्विस लेन के किनारे स्थित सेक्टर—45 पहुंच रहे हैं। महंगी बाइकों से स्टंट करने वाले युवक अपने गैंग के साथ हर वीकेंड पर यहां पहुंचते हैं। ये अपने साथ ही यहां से गुजरने वाले वाहनों और दूसरे लोगों की जान को जोखिम में डालकर महामाया बालिंका इंटर कॉलेज के पीछे चौड़ी सडक पर स्टंट करते हैं।

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चौकी से कुछ दूरी पर ही करते हैं स्टंट

इस जगह से सिर्फ 500 मीटर की दूरी पर एमिटी चौकी स्थित है। इसके बावजूद बाइकर्स को इसका कोई डर नहीं है। बाइकर्स दोपहर के समय चार से पांच घंटे तक लगातार स्टंट करते हैं। इस बीच सड़क पर दूसरे वाहन भी निकलते हैं, लेकिन युवकों की संख्या देखकर कुछ नहीं कह पाते।

नहीं पकड़ पाती है पुलिस

ये बाइकर्स स्टंट करने दिल्ली और फरीदाबाद से आते हैं। एक स्टंटमैन ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि दिल्ली में स्टंट करने पर पुलिस तुरंत चालान काट देती है। वहां कोई जगह भी नहीं है। इसके चलते वे यहां आ जाते हैं। यहां पुलिस की कोर्इ सिरदर्दी नहीं है। बाकी कभी पुलिस पीसीआर आती भी है, तो उनका पीछा नहीं कर पाती।

निकलने से बचते हैं लोग

जिस सडक पर बाइकर्स स्टंट करते हैं, वह सेक्टर—45 और 44 को कनेक्ट करती है। इस सड़क के एक तरफ सेक्टर का पार्क और दूसरी तरफ स्कूल है, लेकिन बाइकर्स के डर की वजह से वाहन चालक और सेक्टरवासी इस सड़क पर नहीं आते। वे सेक्टर के अंदर से लिंक होने वाली सड़कों से गुजरना ही मुनासिब समझते हैं।

पीसीआर तैनात कर की जाएगी कार्रवार्इ


सेक्टर—39 कोतवाली प्रभारी जहीर खान ने कहा कि सेक्टर—45 के आसपास पुलिस पीसीआर रहती है। अगर ऐसे कोई बाइकर्स स्टंट करने इस एरिया में आते हैं तो वीकेंड पर दोपहर में भी यहां पीसीआर तैनात कर कार्रवाई की जाएगी।

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जानिए, किस तरह से फायदा पहुंचाया यादव सिंह ने इंजीनियरों का


नोएडा। यादव सिंह के मामले में सीबीआई को दस्तावेजों में कुछ ऐसे सबूत मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि कई नाॅन टेक्निकल लोगों को टेक्निकल काम दिए गए। वहीं, प्राधिकरण के कई इंजीनियरों को तो दूसरे ट्रेड का होने के बावजूद सिविल काम दे दिया गया। ये सभी यादव सिंह के करीबी हैं।

सूत्रों के अनुसार, इन लोगों को यह सब ज्यादा मुनाफा दिलाने के लिए किया गया। इन्हें ऐसा किसके आदेश और नियमों पर किया गया है, इसका पता लगाने के लिए सीबीआई जल्द ही ऐसे कर्मचारियों की लिस्ट बनाकर पूछताछ कर सकती है।

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यादव सिंह के कार्यकाल का रिकॉर्ड खंगाल रही सीबीआई

सीबीआई ऐसे कर्मचारियों का पता लगाने के लिए दस्तावजे खंगाल रही है। इसमें यादव सिंह कार्यकाल के सभी दस्तावेज जांचे जा रहे हैं। साथ ही इस मामले में प्राधिकरण अधिकारियों से भी पूछताछ हो रही है। सूत्रों के अनुसार, प्राधिकरण में कई ऐसे प्रोजेक्ट इंजीनियर हैं, जो दूसरे विभाग में तैनात और ट्रेड से हैं, लेकिन उन्हें सीविल के प्रोजेक्ट सौंपे गए।

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डायरी में भी कुछ प्रोजेक्ट इंजीनियरों के नाम हैं शामिल

सूत्रों के अनुसार, यादव सिंह के घर से मिली उसकी डायरी में कई बडे़-छोटे अधिकारियों के नाम शामिल हैं। इनमें प्राधिकरण के कई नाॅन टेक्निकल कर्मियों को प्रोजेक्ट देने तक का विवरण है। इसके साथ ही सीबीआई के पास इससे संबंधित दस्तावजे भी हैं। जल्द ही ऐसे इंजीनियरों को पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है।

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सीएम साब! ट्रैक से हटवाएं अवैध कब्जे-लगवाएं लाइट तो चलाएं साइकिल


संतोषी दास
लखनऊ. समाजवादी पार्टी की साइकिल खतरे में है। सीएम अखिलेश यादव लोगों से अंधेरे में साइकिल चलवा रहे हैं। हम यहां बात कर रहे हैं, अखिलेश यादव के साइकिल ट्रैक की, जिसको बनाने में करोड़ों रुपए खर्च कर दिए गए, लेकिन इसका इस्तेमाल साइकिल चालक नहीं कर पा रहे हैं। कहीं पर साइकिल ट्रैक में अवैध कब्जे हैं तो कहीं पर लाइट ही नहीं हैं। इस वजह से लोग साइकिल ट्रैक का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।

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कुर्सी रोड पर बने सबसे लंबे साइकिल ट्रैक की हालत सबसे बदतर है। यहां न तो दिन में साइकिल चल सकती है और न ही रात में।  इस ट्रैक पर दिन में फल और सब्जियों के ठेले लगते हैं। रात को स्ट्रीट लाइट न होने से लोग मेन रोड पर ही साइकिल दौड़ाते हैं।

कुर्सी रोड जाने वाले रास्ते में इस साइकिल ट्रैक की हालत यह है कि रात को पैदल भी इधर से निकालना लोगों के लिए दुश्वार है। यहां रात के समय रोजाना सैकड़ों वाहन निकलते हैं। यह सड़क शहर के व्यस्त सडकों में से एक है। इसके बावजूद यहां स्ट्रीट लाइट नहीं है।

हो चुके हैं कई हादसे
टेढ़ी पुलिया से कुर्सी रोड जानकीपुरम जाने वाली इस सड़क पर आये दिन हादसे होते हैं। हादसों का कारण है कि यहां पर बिजली की व्यवस्था नहीं है। रोड साइड दुकानों पर तो बिजली जगमगाती है, लेकिन सड़क पर काफी अंधेरा रहता है। इसकी सुध न तो बिजली विभाग ने ली और न ही नगर निगम ने।

राहगीरों को होती है परेशानी
जानकीपुरम वार्ड के पार्षद कैलाश यादव ने बताया कि लाइट न होने की कई बार शिकायत की गई, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। राहगीर महेश ने बताया कि वह रोजाना शाम को काम करके साइकिल से इस रोड से निकलते हैं। उसकी माने तो उसका मन करता है कि ट्रैक पर साइकिल चलकर घर सुरक्षित पहुंचा जाए, लेकिन बिजली न होने के कारण ट्रैक पर चलना बहुत मुश्किल है। स्थानीय निवासी प्रजापति राय ने बताया कि अंधेरा होने के कारण उनका कुछ महीने पहले एक्सीडेंट हुआ था, जिसमें उनका पैर टूट चुका है। बिजली न होने से यह रास्ता खतरनाक है।

नीदरलैंड की तर्ज पर बनाया साइकिल ट्रैक का बुरा हाल
सीएम अखिलेश यादव ने साइकिल को बढ़ावा देने की पहल की थी। इसके तहत उन्होंने कई कार्यक्रमों में लाभार्थियों को साइकिल बांटे गए। नीदरलैंड की तर्ज पर राजधानी में साइकिल ट्रैक का निर्माण भी करवाया, लेकिन लखनऊ समेत प्रदेश के अन्य जिलों में साइकिल ट्रैक में साइकिल चलाना मुश्किल हो रहा। ट्रैक पर अवैध कब्जे हैं। ट्रैक दुकानें सज रही हैं। साइकिल ट्रैक उनके ड्रीम प्रोजेक्ट में से एक है।


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बसपा के इस नेता के पास 10,000 करोड़ का कालाधन!


सहारनपुर। सहारनपुर के पूर्व एमएलसी मोहम्मद इकबाल पर दस हजार करोड़ रुपये का कालाधन जमा करने का आरोप लगा है। मोहम्मद इकबाल बसपा से जुड़े हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका पर सुनवार्इ के दौरान केंद्र सरकार ने बताया कि सीरियस फ्राॅड इन्वेस्टीगेशन आॅफिस (एसएफआर्इआे), एनफोर्स्मेंट डायरेक्टरेट (र्इडी) आैर इन्कम टैक्स विभाग की जांच में यह मामला सामने आया है। कोर्ट में केंद्र सरकार ने बताया कि मोहम्मद इकबाल ने 10 हजार करोड़ रुपये कालेधन के रूप में इकट्ठा किए हैं।

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एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक, बिजनेसमैन रणवीर सिंह ने एक याचिका कोर्ट में दाखिल की थी, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि मोहम्मद इकबाल ने कर्इ जगह कम पूंजी लगाकर 111 कंपनियां खोली थीं। इन कंपनियों की कमार्इ करोड़ों रुपये में दर्शार्इ गर्इ है। आरोप है कि ब्लैक मनी को व्हाइट करने के लिए ये कंपनियां खोली गर्इं थीं। इस याचिका पर कोर्ट ने केंद्र सरकार को जांच के आदेश दिए थे।

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कोर्ट में पेश की र्इडी की रिपोर्ट


शुक्रवार को एडिशनल साॅलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने कोर्ट में र्इडी की प्राथमिक रिपोर्ट पेश की। इसमें उन्होंने कहा कि यह एंटी मनी लाॅन्ड्रिंग अौर फाॅरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट के उल्लंघन का मामला भी हो सकता है।

एनआरएचएम घोटाले से जुड़े हो सकते हैं तार

सोमवार को र्इडी ने कोर्ट में कहा कि पूर्व एमएलसी मो. इकबाल के नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (एनआरएचएम) घोटाले से जुड़े होने के संकेत मिले हैं। इसको लेकर र्इडी ने सोमवार को कोर्ट में एक एफिडेविट पेश किया। उसके अनुसार, जांच के दौरान र्इडी को मो. इकबाल के एनआरएचएम घोटाले से जुड़े होने के कुछ सबूत मिले हैं। कोर्ट ने केंद्रीय एजेंसियों एसएफआर्इआे आैर आयकर विभाग को 25 अप्रैल तक अपनी रिपोर्ट पेश करने काे कहा है। वहीं, इस बारे में पूर्व एमएलसी मो. इकबाल से बात करने की कोशिश की गर्इ लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका।

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Reality Check: महोत्सव में आग बुझाने के लिए नाकाफी हैं इंतजाम


लखनऊ. यदि लखनऊ महोत्सव में लगे स्टालों में आग लग गई तो इसे बुझाना बहुत मुश्किल होगा। दरअसल, यहां लगे हुए 70 फीसदी स्टालों पर आग बुझाने के कोई इंतजाम नहीं हैं। वहीं, दमकल विभाग का दावा है कि पूरे महोत्सव में दमकल की गाड़ियों के साथ अग्निशमन की टीम लगी है। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं।

लखनऊ महोत्सव में लगभग 350 वाणिज्यिक स्टाल, 65 पवेलियन, 450 शिल्पी स्टाल, 45 व्यंजन स्टॉल, 20 क्यास्क (काफी, आईस्क्रीम, भेलपूरी आदि ) के लिए लगे हैं। इसके अलावा बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले और फाउंटेन भी लगे हैं। पत्रिका डॉट कॉम ने जब यहां लगे स्टालों पर आग की सुरक्षा की जांच की तो 70 प्रतिशत स्टालों पर आग के इंतजाम नहीं दिखे।

स्टॉल मालिकों ने कहा- केवल रसीद दी सिलेंडर नहीं
फूड जोन में लगे स्टालों के मालिकों में इलाहाबाद के सुनील धूपर, राजस्थान के जनार्दन रस्तोगी, राजस्थान के ही मोहनलाल महिपाल महाशय ने बताया कि जिला प्रशासन की तरफ से उन्हें रसीद तो दी गई लेकिन आग बुझाने का सिलेंडर नहीं। इतने स्टालों में सिर्फ जयपुर के महेंद्र सिंह के स्टॉल में आग बुझाने का सिलेंडर मिला।
Lucknow Mahotsav
यह है अग्निशमन विभाग का दावा
अग्निशमन विभाग के सीएफओ एबी पाण्डेय ने इस संबंध में बताया कि आग से बचने के लिए महोत्सव में उनकी तरफ से पुख्ता इंतजाम हैं। दमकल कर्मियों की 40 लोगों की टीम लगातार भ्रमण कर कर रही है। वहीं, 5 दमकल की गाड़ियां वहां मौके पर हर समय घूम रहीं हैं। स्टॉल लगाने वाले लोग बाहर के भी हैं, उन पर दबाव नहीं बनाया जा सकता। जिन लोगों ने अपनी मर्जी से आग बुझाने के सिलेंडर लिए हैं, उनको दिए गए हैं। उनकी तरफ से आग से निपटने के लिए ठोस इंतजाम हैं।

PhotoCredit: Ritesh Singh


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STING: शराब कारोबारियों ने ऐसे मचा रखी है लूट


बरेली. बरेली जिला प्रशासन शराब के ठेकेदारों के हाथों की कठपुतली बनता नजर आ रहा है। शराब की भट्टियों पर शराब बेचने का लाइसेंस होता है, शराब पिलाने का नहीं। शराब की भट्टियों पर रसोई गैस सिलेंडर का इस्तेमाल करते हुए पकौड़ी और अंडों की दुकानें भी चलाई जाती हैं, जोकि नियमानुसार गैर कानूनी है। कोतवाली क्षेत्र मे जंक्शन से चंद कदमो की दूरी पर मॉडल शॉप पर छोटे-छोटे बच्चे पैग बनाते नजर आते हैं। खास बात यह है कि यहां 24 घंटे शराब बिकती है। इसका खुलासा एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिए हुआ है।

स्टिंग के जरिए पता चलता है कि नियमों के खिलाफ भट्टियों पर शराब बेचने के लिए लोगों को रखा गया है। उन्हें 2500 से 4000 रूपये हर महीने सैलरी दी जाती है। आठ घंटे से ज्यादा काम लिया जाता है, जबकि नियमानुसार सरकारी रेट से कम मजदूरी देना भी गैरकानूनी है। भमौरा थाने के समाने शराब की दुकान पर काम करने वाले ने बताया कि वे बेरोजगारी की वजह से काम कर रहे हैं।

सेल्समैन के मुताबिक, प्रिंट रेट से ज्यादा कीमत पर शराब बेची जा रही है। बोतल पर 77 रुपए प्रिंट रेट हैं, लेकिन 80 रुपए लिये जाते हैं। देशी शराब के ठेके पर इंग्लिश शराब और बीयर भी बिक रही है, जबकि लाइसेंस केवल देशी शराब बेचने का है। वहीं, इस पूरे खेल में विभाग के जिम्मेदार अफसरों ने जांच करने की बात कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं।

देखें वीडियो

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OMG: नोएडा प्राधिकरण व बिल्डर ने ठग लिए 200 करोड़ रुपये


संदीप तोमर, नोएडा। पंकज नागलिया ने अपना दफ्तर शुरू करने के लिए नोएडा में बन रहे नेहरू प्लेस एक्सटेंशन में एक यूनिट बुक कराई थी। अच्छी जगह पर बिजनेस भी अच्छा चलेगा इस सपने के साथ पंकज ने बिल्डर को पूरे पैसे दे दिए। पंकज ने 2009 में करीब बीस लाख रुपए का भुगतान किया।

कुछ इसी तरह दीपक अग्रवाल ने भी यहां पर एक छोटी यूनिट बुक कराई। दीपक का कहना है कि अपने बिजनेस के लिए आॅफिस बनाना था। मुझे ये साइट अच्छी लगी तो पैसा लगा दिया। पहले तो बिल्डर की तरफ से देरी हुई अब नोएडा प्राधिकरण ने बायर्स की जान अटकाई हुई है।दीपक अग्रवाल का कहना है कि ये बहुत बड़ा फ्रॉड है और इसमें एक हजार लोगों के 200 करोड़ रुपए फंसे हुए हैं। दीपक का कहना है कि इतना सब होने के बाद भी बिल्डर हम लोगों से अतिरिक्त पैसों की मांग कर रहा है। अलग अलग चार्जेस के नाम पर हर आदमी से दो से पांच लाख रुपए तक की मांग की जा रही है।

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2009 में शुरू हुआ था प्रोजेक्ट


दरअसल, 2009 में नोएडा में अर्बटेक बिल्डर ने नेहरू प्लेस एक्सटेंशन का प्रोजेक्ट शुरू किया था। ये एक कॉमर्शियल आईटी पार्क था, जहां पर आॅफिस और दुकानें बनाई गईं। इस प्रोजेक्ट में एक हजार यूनिट मतलब कि एक हजार दुकानें बनाई गईं। एक दुकान की औसत कीमत बीस लाख है। वैसे यहां पर 80 लाख तक के आॅफिस भी हैं। 


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प्राधिकरण ने पहले की जमीन आवंटित, बाद में की कैंसल


शुरुआत में प्राधिकरण ने बिल्डर के प्रोजेक्ट को पास करते हुए जमीन आवंटित कर दी लेकिन जब निर्माण पूरा हो गया और बात पजेशन देकर रजिस्ट्री कराने की आई तो ​प्राधिकरण ने अड़ंगा लगा दिया। प्राधिकरण ने बिल्डर को दी गई जमीन का आवंटन रद्द कर दिया। प्राधिकरण का तर्क है कि जब बिल्डर को जमीन दी गई थी, उस वक्त उसकी कंपनी रजिस्टर्ड नहीं थी।


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नहीं दी जा रही जमीन की रजिस्ट्री


आईटी पार्क का निमार्ण पूरा हो चुका है। बायर्स पूरी पेमेंट भी कर चुके हैं। बिल्डर बायर्स से बकाया राशि की मांग कर रहे हैं और उसके बाद पजेशन लेने के लिए भी कह दिया गया है। लेकिन मौजूदा हालात में पजेशन लेकर भी कोई फायदा नहीं है। दीपक अग्रवाल का कहना है कि अगर हम पजेशन ले भी लें तो आॅफिस का क्या करेंगे। वहां पर हम केवल टेबल कुर्सी डाल सकते हैं। काम करने की परमीशन हमें नहीं दी जा रही है। यहां की जमीन अभी विवादित है और हमें जमीन की रजिस्ट्री नहीं दी जा रही है।


प्राधिकरण ने शुरू में क्यों नहीं चेक किए कागज


इस मामले में फोनरवा के अध्यक्ष एनपी सिंह का कहना है कि प्राधिकरण ने शुरूआत में ही बिल्डर के कागजात की जांच क्यों नहीं की। इतने साल बाद प्राधिकरण को ये गलती क्यों नजर आई। प्राधिकरण की गलती का ​खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ रहा है। सभी लोगों ने लोन पर पैसा उठाकर यहां आॅफिस लिया था, जोकि होते हुए भी नहीं है।


धरना-प्रदर्शन की तैयारी


बायर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अन्नू खान का कहना है कि बिल्डर से मिलकर कोई न कोई समाधान निकाला जाएगा। अगर बिल्डर ने हमारी जायज मांगों को नहीं माना तो उसके खिलाफ धरना-प्रदर्शन किया जाएगा।


हार्इकोर्ट भी जा सकते हैं बायर्स


पंकज का कहना है कि अब सभी बायर्स भी हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं। सभी मिलकर मामले में पहले से चल रहे मुकदमे में थर्ड पार्टी बनेंगे और गुहार लगाएंगे कि हाईकोर्ट फैसला सुनाते समय उनकी परेशानी को भी ध्यान में रखे। वहीं, प्राधिकरण की प्रवक्ता अंजु का कहना है कि मामला कोर्ट में है। वहां से निर्णय आने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है।


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हर इंजीनियरिंग स्टूडेंट सफल क्यों नहीं हो पाता, स्टडी में हुआ खुलासा


लखनऊ. देश में हर साल लगभग 15 लाख इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स पास आउट होते हैं। इनमें से कई सफल इंजीनियर बन जाते हैं तो कइयों के सपने कोर्स खत्म होने के साथ ही खत्म हो जाते हैं। विभिन्न मु्द्दों का मूल्यांक करने वाली संस्था ऐस्पायरिंग माइंड्स की नैशनल एंप्लॉयबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार 80 प्रतिशत इंजीनियरिंग ग्रैजुएट नौकरी के काबिल नहीं है। रिपोर्ट 650 से ज्यादा इंजीनियरिंग कॉलेजों के 1,50,000 इंजीनियरिंग छात्रों की स्टडी पर आधारित है जो 2015 में पास आउट हुए हैं।

एस्पाइरिंग माइंड्स के सीटीओ वरुण अग्रवाल ने कहा, ‘‘आज बड़ी संख्या में छात्रों के लिये इंजीनियरिंग वास्तव में स्नातक की डिग्री बन गया है। हालांकि शिक्षा मानकों में सुधार के साथ यह जरूरी हो गया है कि हम अपने अंडरग्रैजुएट कार्यक्रम को तैयार करें ताकि वे रोजगार के ज्यादा काबिल हो सके.’’ रिपोर्ट के अनुसार शहरों के हिसाब से दिल्ली के संस्थान सर्वाधिक रोजगार के काबिल इंजीनियर दे रहे हैं. उसके बाद क्रमश: बेंगलुरु का स्थान है।

यहां पढ़ें पूरी रिपोर्ट


यूपी में भी स्थिति ठीक नहीं

यूपी के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी(एकेटीयू) की गिनती देश में बड़े तकनीकि शिक्षण संस्थानों में होती है। यूनिवर्सिटी में लगभग 4.5 लाख  स्टूडेंट्स पढ़ते हैं। हर साल लगभग एक लाख इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स यहां से पास आउट होते हैं। इस यूनिवर्सिटी के एग्जाम कंट्रोलर बीएन मिश्रा के मुताबिक लगभग 40-45 प्रतिशत स्टूडेंट्स का प्लेसमेंट हो जाता है। इनमें से कई स्टूडेंट्स प्लेसमेंट नहीं लेते और आगे की पढ़ाई करते हैं। लगभग 20-25 प्रतिशत इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स बीटेक की पढ़ाई के बाद हायर स्टडीज या कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स की प्रिपरेशन करते हैं। इनमें मेधावी छात्रों की संख्या भी काफी है।

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टॉपर्स प्रिफर करते हैं आगे पढ़ना


पत्रिका उत्तर प्रदेश ने बीते दिनों एकेटीयू के टॉपर्स पर एक स्टोरी की थी जिसमें बताया गया था कि अधिकतर टॉपर्स प्लेमेंट के बजाए आगे की पढ़ाई करना प्रिफर कर रहे हैं। यूनिवर्सिटी के एग्जाम कंट्रोलर बीएन मिश्रा इस बात से काफी हद तक इत्तेफाक रखते हैं। उनका कहना है कि लगभग 30 से प्रतिशत बच्चों को इंजीनियर की नौकरी नहीं मिल पाती या यूं कहें कि वे इसके काबिल नहीं होते।

AKTU के 2015 बैच के बीटेक पास आउट संतोष शर्मा का कहना है कि ऐसा नहीं कि 80 प्रतिशत स्टूडेंट्स इंजीनियर बनने के काबिल नहीं होते। ये बात सच है कि कई लोग केवल डिग्री लेने के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हैं लेकिन कई ऐसे स्टूडेंट्स हैं जो सीरियसली एक सफर इंजीनियर बनने की चाहत रखते हैं। ऐसे स्टूडेंट्स को ग्रूम करने की जरूरत है। उनके साथ के साथ ज्यादातर स्टूडेंट्स को जॉब मिली थी, संतोष भी नोएडा की एक आईटी फर्म में कार्यत हैं। वहीं 2015 बैच की एकेटीयू (सीएस-ट्रेड) टॉपर प्रतीक्षा वार्ष्णेय कहती हैं कि यह बात काफी हद तक ठीक है कि आधे से ज्यादा इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स केवल भेड़-चाल में पड़कर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हैं। इंजीनियर बनने के प्रति उनका लक्ष्य क्लीयर नहीं होता।
 
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पैरंट्स का प्रेशर भी रहता है

करियर काउंसलर राजेश चंद्र पांडे का कहना है कि इन हालातों के लिए स्टूडेंट्स को पूरी तरह से दोषी ठहराना ठीक नहीं। कई पैरंट्स अपने बच्चे को इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं इसलिए वे उसका एडमिशन इंजीनियरिंग कॉलेज में करवा देते हैं। कई बच्चे भी केवल पैरंट्स की इच्छा पूरी करने के लिए बीटेक करते हैं। ऐसे में वे एक सफल इंजीनियर नहीं बन पाते तो इसके कई कारण हैं।

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