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बेटी को लड़कों वाला नाम पसंद या लड़की का, यह फैसला मां-बाप ने उसपर छोड़ा


हमारी सामाजिक परम्पराएं ***** के आधार पर फर्क कर बच्चों को सिखाती हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। बजाय इसके कि उनकी योग्यता क्या है और वे क्या कर सकते हैं। यह अवधारणा बच्चों एवं युवाओं दोनों के लिए ही नकारात्मक हैं।

आमतौर पर लड़का और लड़की के बीच फर्क करना बेहद आसान होता है। पहनावा, भाषा, पसंद, शारीरिक बनावट और दुनिया का हमें देखने का नजरिया चंद ऐसी कसौटियां हैं जो हम अक्सर दोनों लिंगों में भेद करने के लिए चुनते हैं। पुरुष के शरीर में भी अगर कोई स्त्री होने का अहसास करता है तो प्रकृति और कानून दोनों उसे इसकी आजादी देते हैं कि वो जिस तरहचाहे रह सकता है। अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में रहने वाले जेरेमी और ब्रायन ने अपने तीन साल के बच्चे का जेंडर (लिंग) निर्धारण का अधिकार उस पर ही छोड़ दिया।

उन्होंने बच्चे के ***** के बारे में सार्वजनिक रूप से किसी को भी जानकारी नहीं दी। फेसबुक पर दोनों ने लोगों से अपने तीन साल के बच्चे नाया को सिर्फ नाम से बुलाने का आग्रह किया। ताकि नाया लड़का या लड़की के फर्क के बिना अपनी जिंदगी जी सके। जेरेमी और ब्रायन ने सोचा कि ये उनके बच्चे का निर्णय होना चाहिए कि वो क्या कहलाना पसंद करेगा- एक लड़का या एक लड़की। अभिभावक इस बात पर भी ध्यान देने लगे हैं कि ***** आधारित भेदभाव और माता-पिता की आशाएं बच्चों पर कितना असर डालती हैं। सभी माता-पिता अपने बच्चों को खुश देखना चाहते हैं। लेकिन बहस इस बात पर है कि क्या हम अपने बच्चों की परवरिश आज के परिवेश के हिसाब से करेंगे या सदियों पुरानी परंपराओं के हिसाब से।

ऐसे मिली प्रेरणा
नाया के माता-पिता ने भी इन सभी बातों पर बहुत विचार-विमर्श किया। नाया के पिता जेरेमी ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्सुअल व्यक्तित्व के लोगों के साथ काम करते थे। इन लोगों के कटु अनुभवों ने पिता बनने के बाद जेरेमी को काफी चिंता में डाल दिया। जेरेमी को यह फिक्र सताने लगी कि कहीं बड़ा होने पर उनका बच्चा भी दबाव में आकर जन्म प्रमाण पत्र में लिखे ***** को ही स्वीकार करने को बाध्य महसूस न करे। इसलिए जेरेमी ने यह फैसला बच्चे पर ही छोडऩा उचित समझा।

नहीं किया कोई फर्क...
उन्होंने नाया को लड़का-लड़की दोनों की तरह पाला। नाया को कभी एहसास नहीं होने दिया कि उसकी पहचान क्या है। वे नाया को रिश्तेदारों की तस्वीरें दिखाकर उसे समझाते कि दादा खुद को पुरुष कहलाना पसंद करते हैं जबकि दादी को महिला कहलाने में रुचि है। ताकि नाया को अपना व्यक्तित्व निर्धारित करने में आसानी हो। दोनों का मानना था माता-पिता होने के नाते हमें कम से कम एक ईमानदार प्रयास तो करना चाहिए। समाज के नियम हर जगह लागू नहीं हो सकते।

जब नाया ने चुना...
एक दिन जेरेमी नाया और उसके डॉगी के साथ कमरे में खेल रहे थे। अचानक नाया ने कहा कि वह डॉगी है और अब से सब उसे डॉगी न कहकर उसका नाम लेंगे। जेरेमी ने बातचीत को जारी रखते हुए उन्होंने पूछा कि नाया जीवन भर क्या कहलाना पसंद करेगी। नाया ने कहा कि वो एक लड़की कहलाना पसंद करेगी। ब्रायन और जेरेमी कहते हैं कि वे नाया के किसी भी चुनाव पर खुश होते। क्योंकि वे बस इतना चाहते थे कि उनकी बेटी वो चुनें जो वो अपने बारे में दिल से महसूस करती है।


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चिकनपॉक्स के बाद बच्चे को टीका लगाना जरूरी नहीं


बच्चों में विटामिन-डी की पूर्ति कैसे होती है?

जब सूरज की किरणें शरीर पर पड़ती हैं तो विटामिन-डी बनता है। यदि बच्चा नियमित रूप से धूप में खेलता है तो विटामिन-डी स्वत: बनता है। लेकिन आजकल के रहन-सहन में बच्चे धूप में नहीं खेल पाते। ऐसे में विशेषज्ञ घरवालों को सलाह देते हैं कि बच्चों को दिन में कम से कम एक से डेढ़ घंटे के लिए धूप में बिठाएं। इसके अलावा विटामिन-डी की पूर्ति के लिए डॉक्टर, बच्चे की उम्र, वजन व मेडिकल स्थिति के आधार पर ड्रॉप और पाउडर के रूप में सप्लीमेंट लेने की सलाह देते हैं। इनका कोई दुष्प्रभाव नहीं होता।
अस्थमा में बच्चों के लिए इन्हेलर का प्रयोग कितना सही?
बच्चों में अस्थमा एलर्जी की वजह से होता है। नियमित रूप से दवा से इसे रोका जा सकता है। इसमें सांस के साथ लेने वाले इन्हेलर उपयोगी होते हैं। ये दो तरह के होते हैं - प्रिवेन्टर व रिलीवर। बदलते मौसम में एलर्जी होने पर प्रिवेन्टर इन्हेलर के प्रयोग से अस्थमा को आसानी से रोका जा सकता है। यदि अस्थमा की तीव्रता बढ़ती है तो रिलीवर इन्हेलर प्रयोग करते हैं। छह माह से अधिक आयु के बच्चों को परिजनों की देखरेख में इन्हेलर दिए जाते हैं।
मेरे बच्चे की उम्र 6 साल है। उसे हाल ही में चिकनपॉक्स हुआ था। क्या उसे चिकनपॉक्स का टीका लगवाएं?
चिकनपॉक्स होने के बाद टीका न लगवाएं क्योंकि एक बार यदि यह हो जाए तो उससे बच्चों में इसके प्रति जीवनभर के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है।
बच्चों को चलना सिखाने के लिए वॉकर का प्रयोग करना चाहिए?
नहीं, इसके दुष्प्रभाव होते हैं। वॉकर से चोट की आशंका बनी रहती है। सामान्य बच्चों की तुलना में वॉकर का उपयोग करने वाले बच्चों को चढऩे-उतरने में दिक्कतहोती है। एक साल से कम उम्र के बच्चे जिनकी टांगों में वजन झेलने की क्षमता कम होती है, वॉकर में खड़े होने व टांगों पर जोर पडऩे से उनकी टांगें गोल मुड़ (बो-लेग्स) जाती हैं।
बच्चों को निमोनिया से कैसे बचाएं?
जन्म के बाद बच्चे को न्युमोकोकल, फ्लू और एच- इन्फ्लूएंजा का टीका डॉक्टर द्वारा निर्देशित समयांतराल पर लगवाना चाहिए। इसके अलावा बच्चे को सर्दी से बचाएं और पूरी तरह से कवर करके रखें। बच्चों को संक्रमण से बचाएं और उसे गंदगी वाले स्थानों पर ले जाने से बचें


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जानें बच्चों की हाइट न बढ़ने की इन वजहों के बारे में


कई बार बच्चों की लंबाई कम होने पर माता-पिता बाजार में बिकने वाले सप्लीमेंट्स (पाउडर, गोली, कैप्सूल आदि) खिलाने लगते हैं। लेकिन इनसे लंबाई कभी नहीं बढ़ती बल्कि ये शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। दरअसल इन चीजों में स्टेरॉइड मिला होता है जिससे बच्चे की भूख बढ़ती है। खाना ज्यादा खाने से उसका वजन बढऩे लगता है जिसकी वजह से यह भ्रम हो जाता है कि शरीर बढ़ रहा है। वास्तव में इन चीजों को ज्यादा समय तक लेने से हड्डियां व मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। साथ ही कम उम्र में ही मोटापे की समस्या हो जाती है जिससे भविष्य में कई अन्य परेशानियां बढ़ सकती हैं। इसलिए इनसे पूरी तरह परहेज करें।


कम हाइट की वजह समझें: लंबाई न बढऩे का कारण सिर्फ पोषक तत्त्वों का अभाव ही नहीं होता। कई अन्य कारण भी हो सकते हैं जैसे- शरीर में पीयूष ग्रंथि से निकलने वाले ग्रोथ हार्मोन की कमी, बार-बार किसी तरह का संक्रमण, थायरॉइड हार्मोन का असंतुलन, मेटाबॉलिक कारण, साथ ही पोषक तत्त्वों की कमी भी इसकी एक वजह हो सकती है।


निर्धारित उम्र तक ही संभावना: सामान्यत: बच्चों की हाइट माता-पिता की लंबाई के बराबर होती है। इसके अलावा लड़कियों की लंबाई 18 व लड़कों की 21 वर्ष तक ही बढ़ती है। इसके बाद हड्डी में एपिफाइसिस बंद हो जाता है। जिससे लंबाई बढऩे की कोई संभावना नहीं रहती।
क्या करें: समस्या दिखने पर डॉक्टर से परामर्श करें। ऐसे में वे हार्मोन व न्यूट्रीशन संबंधी जरूरी जांचेें करवाकर वजह का पता लगाते हैं। उसके बाद जरूरत के मुताबिक दवाएं व डाइट चार्ट का निर्धारण करते हैं।

ध्यान रहे: निर्धारित उम्र से पहले ही कारण समझकर इसका उपचार करा लिया जाए तो ही समाधान हो सकता है।

कार्बोहाइड्रेट से पूर्ण खाने के व्यंजन अपने बच्चे की डाइअट में ज़रूर संयुक्त रखें। गेहूँ की चपाती, दालें और ब्रेड में कार्बोहाइड्रेट भरपूर होता है। दूध और दूध की बनी चीज़ें अपने बच्चों को रोज़ दें। इसमें पाया गया कैल्शियम आपके बच्चों की हड्डियाँ मज़बूत करने के साथ-साथ उनकी लंबाई भी अच्छी करेगा।


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म्यूजिक डाइट से बच्चे बनेंगे सेहतमंद


शास्त्रीय संगीतज्ञ व म्यूजिक थैरेपिस्ट डॉ. आचार्य त्रिगुणातीत जैमिनी बता रहे हैं संगीत से कैसे साधें बच्चों के स्वास्थ्य का सुर-

शास्त्रीय संगीत कारगर
संगीत हमारे जीवन में कुछ इस कदर रच बस गया है, इसके बिना अब जीवन की कल्पना करना ही मुश्किल है। संगीत सिर्फ हमारे मनोरंजन का साधन मात्र नहीं है, बल्कि वह हमें हैल्दी रखने में भी काफी कारगर है। खासतौर से बच्चों को संगीत के सात सुरों के माध्यम से हैल्दी रखा जा सकता है। पिछले छह महीने से बच्चों पर संगीत के पडऩे वाले प्रभाव का अध्ययन करने के बाद यह पता चला कि बच्चों को स्वस्थ रखने में शास्त्रीय संगीत बेहद कारगर साबित हो सकता है। 

सितार व पियानो बनाएं होशियार
संगीत के पंचम, गंधार, मध्यम स्वरों से बच्चों को रिझाते हुए उन्हें स्वस्थ रखा जा सकता है। शोध में हमने पाया कि जलतरंग, काष्ट तरंग, पाइप तरंग, सितार व पियानो सुनने से बच्चे स्वस्थ रहते हैं। ऐसा संगीत सुनने से मस्तिष्क कोशिकाओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और वे मजबूत होती हैं। बच्चों में बातचीत करने, पढऩे-लिखने व शरीर को चुस्त दुरुस्त रखने में मदद मिलती है। 

6 से  8 साल के बच्चों को जलतरंग, काष्ट तरंग, पाइप तरंग, सितार व पियानो सुनाने से उन्हें स्वस्थ रखने में मदद मिलती है। यह बात कई शोधों में भी साबित हो चुकी है कि बच्चों को चुस्त-दुरुस्त रखने में शास्त्रीय और धीमा संगीत अहम भूमिका निभाता है।

सॉफ्ट म्यूजिक फायदेमंद
नवजात शिशुओं के लिए सॉफ्ट म्यूजिक सर्वोत्तम माना जाता है, इसलिए बच्चों को हमें क्लासिकल म्यूजिक सुनाना चाहिए। इसलिए शिशुओं को झुनझुना बेहद पसंद आता है। बच्चों के लिए ऐसे ही संगीत का चयन करना चाहिए, जिसके स्वर हल्के हों, क्योंकि बच्चों का मस्तिष्क संवेदनशील होता है और तेज संगीत का उन पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। सितार के सुर ही उनके लिए अनुकूल हैं। 

घातक है तेज म्यूजिक
जो फिल्मी संगीत हम सुनते हैं, वह मासूमों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। इससे बच्चों का बौद्धिक विकास भी प्रभावित होता है। बच्चों की तीन अवस्थाएं होती है। शिशु अवस्था, बाल अवस्था और किशोर अवस्था। हाई वोल्टेज संगीत खासतौर से नवजात बच्चों के लिए खतरनाक हो सकता है। 

गर्भवती महिलाएं रखें ध्यान
हाई वोल्टेज संगीत सुनते समय गर्भवती महिलाओं को खासतौर से सतर्क रहने की जरूरत है। जो महिलाएं एमपी3, टीवी या रेडियो पर मनमौजी टाइप का तेज संगीत सुनती हैं, उनके बच्चों को मानसिक हानि होने की आशंका ज्यादा होती है। शोर वाला पॉप म्यूजिक भू्रण में जन्मजात विकृति पैदा करने वाला होता है। इसलिए शोर शराबे वाले संगीत की बजाय शास्त्रीय संगीत सितार या संतूर आदि सुनना ज्यादा लाभकारी है। शादी-पार्टियों में डीजे के शोर से भी गर्भवती महिलाओं को दूर रहना चाहिए, ऐसा संगीत गर्भ में पल रहे मासूम पर अत्याचार जैसा ही है।

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कॉर्नफ्लेक्स को स्नैक्स की तरह टिफिन में न दें 


न्यू एज मम्मियां तरह-तरह के फ्लेवर वाले कॉर्नफ्लेक्स में पौष्टिकता ढूंढ रही हैं, जबकि हैल्थ एक्सपट्र्स इनके सेवन में सतर्कता की सलाह दे रहे हैं क्योंकि इससे शुगर का सेवन ज्यादा होता है।  

बच्चों को जहां कॉर्नफ्लेक्स के रंग-बिरंगे आकर्षक डिब्बे लुभा रहे हैं, वहीं मम्मियों को इनका 'ईजी टू कुक' गुण खूब भा रहा है। इनकी वजह से मॉम्मियों की सहूलियत और भी बढ़ जाती है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सेहत की दृष्टि से कॉर्नफ्लेक्स की एक सर्विंग 30 ग्राम तक हो, तो ठीक है लेकिन ज्यादातर लोग, विशेषकर बच्चे इसे कहीं ज्यादा मात्रा लेते हैं। इन्हें स्नैक्स की तरह खाया जा रहा है।

कई माताएं तो अपने बच्चों को टिफिन में भी ये फ्लेवर्ड सीरीयल्स भर कर दे रही हैं। येल यूनिवर्सिटी के एक शोध में पाया गया कि  इनके बहाने बच्चे अनजाने में शुगर का जरूरत से ज्यादा सेवन कर रहे हैं। 

बंगलुरु की पोषण विशेषज्ञ रिआन फर्नेन्डो कहती हैं, 'कॉर्नफ्लेक्स का ग्लिसमिक इंडेक्स (जी आई) काफी ऊंचा है। यह 80 है, जबकि चीनी की जीआई वैल्यू 100 होती है। जीआई इस चीज का माप संकेतक है कि किसी खास तरह के फूड के सेवन के बाद ब्लड शुगर लेवल कितनी जल्दी बढ़ जाता है।  

कॉर्नफ्लेक्स के कई ब्रांडों में शुगर 28-30 फीसदी तक पाई जाती है। फर्नेन्डो, जो हाई परफॉमेंस एथलीट खिलाडिय़ों के लिए भी काम करती हैं, कहती हैं, 'दिन भर में चार टेबलस्पून से ज्यादा एडेड शुगर लेना अनहैल्दी है।Ó एडेड शुगर यानी फलों और दूध आदि में मौजूद कुदरती शुगर से अलग मात्रा।

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बढ़ रहा बच्चों का कैंसर, पहचानना मुश्किल


यूं तो कैंसर के लक्षण पहले वयस्कों में देखने को मिलते थे। लेकिन इस बीमारी की चपेट में अब बच्चेे भी आने लगे हैं। कैंसर शरीर के विभिन्न भागों में सामान्य कोशिकाओं के अनियंत्रित वृद्धि के कारण होता है। सामान्य परिस्थितियों में सेल्स का एक नियंत्रित तंत्र होता है। कभी-कभी नॉर्मल सेल्स के अंदर डीएनए मॅालीक्यूल्स में अपरिवर्तनीय क्षति के कारण कर्सिनोजन हमला कर देते हैं। यही कैंसर जैसी बीमारी का कारण बनता है। बचपन में कैंसर होना चाइल्डहुड कैंसर कहलाता है। दुनियाभर में यह अनुमान लगाया गया है कि चाइल्डहुड कैंसर की वजह से प्रतिवर्ष 1 लाख 75 हजार बच्चों की मृत्यु हो जाती है। एक शोध से पता चला है कि चाइल्डहुड कैंसर से मरने वाले बच्चों की मृत्यु दर लगभग 20 फीसदी थी, जिसमें हाल ही में 0.6 प्रतिशत की वृद्धि हो गई है। आइए जानते हैं इसके लक्षणों और उपचार के बारे में। 

विल्मेस ट्यूमर अधिकांश तौर पर 4 या 5 साल के बच्चों को होता है। पेट में गांठ बनना, भूख न लगना, बुखार आदि इसके लक्षण हैं। 

क्या हैं लक्षण
कैंसर स्पेशलिस्ट इन चाइल्डहुड ट्यूमर्स डॉ. रमनदीप अरोड़ा के अनुसार कैंसर के लक्षण को पहचानना मुश्किल होता है क्योंकि ये सामान्य बीमारी की तरह होते हैं जैसे सुस्ती, कमजोरी, चक्कर आना, पीठ, पैर, जोड़ों में दर्द, सिरदर्द, असामान्य रक्तस्त्राव, मसूढ़ों से खून आना,भूख न लगना, वजन घटना, पेट में सूजन, पेटदर्द, कब्ज, सांस लेने में कठिनाई, लगातार खांसी, पीठ दर्द,  पुतली के पीछे सफेद रंग आदि।

देखभाल है जरूरी 
आपके डॉक्टर कई आधारों पर यह तय करते हैं कि आपको किस प्रकार की देखभाल की आवश्यकता है जैसे कंैसर का प्रकार, कैंसर कितनी तेजी से बढ़ रहा है, क्या कैंसर शरीर के अन्य अंगों में फैल गया है, आपकी आयु और समग्रता में आपका स्वास्थ्य आदि। 

कैंसर के प्रकार
बच्चों में होने वाले कैंसर के प्रकार वयस्कों की तुलना में अलग तरह के होते हैं जैसे ल्यूकीमिया, ब्रेन एंड अदर सेंट्रल नर्वस सिस्टम ट्यूमर, न्यूरोब्लास्टोमा, लिम्फोमा, रैब्डोमायोसरकोमा, रेटिनोब्लास्टोमा, बोन कैंसर आदि। आमतौर पर इसके अलावा अन्य प्रकार के कैंसर बच्चों में नहीं देखे जाते।   

ल्यूकीमिया : बोन मैरो और ब्लड कैंसर को ल्यूकीमिया कहते हंै। बच्चों में पाए जाने वाले कैंसर में ल्यूकीमिया 30 फीसदी होता है। इसके लक्षण कुछ इस प्रकार हैं- जैसे हड्डियों के जोड़ में दर्द, थकान, कमजोरी और त्वचा का पीला पड़ जाना आदि। कीमोथैरेपी इसका एकमात्र इलाज है।

न्यूेरोब्लास्टोमा : कैंसर का यह प्रकार शिशुओं और छोटे बच्चों को होता है। यह शायद ही कभी 10 वर्ष से ज्यादा आयु के बच्चों में देखा गया हो। पेट में सूजन, हड्डी में दर्द और बुखार इसके लक्षण हैं। 

लिम्फोमा : लिम्फोमा के लक्षणों में  वजन घटना, बुखार, पसीना और थकान आदि देखने को मिलते हंै। 

ब्रेन एंड अदर सेंट्रल नर्वस सिस्टम ट्यूमर : इसमें सिरदर्द, उल्टी, धुंधला या डबल दिखना, चक्कर आना, चलते समय सहारे की जरूरत पडऩा जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं। 

रेटिनोब्लास्टोमा : यह आंखों का कैंसर होता है। आमतौर पर यह दो साल की उम्र के आसपास होता है। लक्षण के तौर पर आंखों में लाल रंग दिखता है तथा आंखों की पुतली अक्सर सफेद या लाल लगती है। 

रैब्डोमायोसरकोमा : कैंसर का यह प्रकार सिर, गर्दन, कमर, पेट, हाथ और पैर के अलावा शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इस कैंसर के मामले बेहद कम सामने आते हैं। 

बोन कैंसर 
बच्चों में होने वाली बोन कैंसर की बीमारी हड्डियों को प्रभावित करता है। यह शरीर के किसी भी अंग से शुरू होकर हड्डियों में फैलता रहता है। इससे  हड्डियों में सूजन और दर्द की समस्या होती है।

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फिंगरप्रिंट बताएगा भविष्य में होने वाली दांतों की बीमारी के बारे में 


बच्चों में होने वाली दांत की बीमारियों का पता अब बचपन में ही चल जाएगा। इसकी जानकारी बच्चे के फिंगरप्रिंट से ली जा सकेगी। यह शोध लखनऊ स्थित किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी की डेंटल फैकल्टी (पीडियाट्रिक एंड प्रिवेेंटिव डेंटिस्ट्री) की डॉ. गरिमा जिंदल ने किया है। उनके मुताबिक, दांत से जुड़ी गंभीर बीमारियां जेनेटिक होती हैं और फिंगरप्रिंट का सीधा संबंध जीन से होता है। 

तीन तरह के होते हैं फिं गर प्रिंट 
फिंगरप्रिंट पैटर्न तीन प्रकार के होते हैं। इनमें ट्रू वर्ल, लूप्स और प्लेन आर्च हैं। अध्ययन में पाया गया है कि ट्रू वर्ल वाले बच्चों के दांत सामान्य जबकि लूप्स फिंगरप्रिंट वाले बच्चों का ऊपरी जबड़ा आगे की तरफ व प्लेन आर्च वाले बच्चों का निचला जबड़ा आगे की तरफ निकलता है। 

बचपन के फिंगरप्रिंट कारगर 
डॉ. गरिमा ने बताया, बच्चों के दांत और जबड़े में बदलाव एक साल से लेकर वयस्क होने तक जारी रहता है। ऐसे में तीन-चार साल की उम्र में फिंगरप्रिंट लिए जाएं तो किशोरावस्था या वयस्क होने पर होने वाली दांत की बीमारियों का पता चल जाएगा। शोध 12 से 16 वर्ष की उम्र के 237 बच्चों पर किया गया है। पीडियाट्रिक एंड प्रिवेेंटिव डेंटिस्ट्री के हैड डॉ. आरके पांडेय के नेतृत्व में  यह शोध हुआ।

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ऐसे सुरक्षित रखें अपने बच्चों का सिर


छोटे बच्चों में अक्सर असंतुलन की समस्या देखने में आती है। असंतुलन के कारण गिरने से कई बार चोट उनके सिर पर लगकर गंभीर रूप ले सकती है। बच्चों को ऐसी ही तकलीफ से बचाने के लिए एक विशेष प्रकार का हेल्मेट बनाया गयाहै। जानते हैं इसके बारे में।

उपयोगिता
यह हेल्मेट करीब एक साल से अधिक उम्र के उन बच्चों के लिए उपयोगी है जो खड़े होने या चलते समय शरीर का संतुलन बनाने में असमर्थ होते हैं। माता-पिता बच्चे की सुरक्षा के लिए डॉक्टरी सलाह से हेल्मेट बनवाते हैं व कई बार न्यूरो फिजिशियन या ऑर्थोपेडिक सर्जन भी इस तरह के हेल्मेट बनवाने की सलाह देते हैं।

125 ग्राम है वजन
स्पंज वाले इस हेल्मेट का वजन करीब सवा सौ ग्राम होता है। इसे बच्चे के सिर के नाप के हिसाब से बनाया जाता है। यह नाप देने के दूसरे या तीसरे दिन तैयार हो जाता है। यह हेल्मेट बच्चों के सिर के साथ गर्दन को भी कवर रखता है। इससे गर्दन भी सुरक्षित रहती है। हेल्मेट को बांधने वाली बेल्ट पीछे की ओर लगाई जाती है।

गिरने से क्या खतरा
स्पाइनल कॉर्ड और सिर को जोडऩे वाले स्थान को वाइटल सेंटर कहते हैं। जिसमें असंतुलन के कारण गिरने से चोट लगने की आशंका रहती है। शारीरिक असंतुलन वाले बच्चों में गिरने पर इस हिस्से में चोट लगने की आशंका अधिक होती है। चोट लगने से बच्चों को सांस लेने में परेशानी हो सकती है। कभी-कभी चोट जानलेवा भी हो सकती है।

शारीरिक असंतुलन की वजह
प्रीमैच्योर बेबी, सेरेब्रेल पॉलिसी, दिमागी बुखार, दिमागी टीबी या ट्यूमर, जन्मजात विकृतियां या नसों में कमजोरी, पैरों में चोट या विटामिन्स की कमी और दुर्घटनाओं से पीडि़त बच्चों में शारीरिक असंतुलन हो सकता है। कुछ बच्चों में यह समस्या एक साल की उम्र से शुरू होकर दूसरे या तीसरे साल में ठीक हो जाती है जबकि क ई में 8-10 वर्ष की उम्र तक बनी रहती है। ऐसे बच्चों को विशेष देखभाल की जरूरत होती है।

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जानें बच्चों में होने वाली दुर्लभ बीमारियों के बारे में 


भारत में सात करोड़ से अधिक आबादी प्रोजेरिया और डिस्लेक्सिया जैसी दुर्लभ बीमारियों (रेयर डिजीज) से पीडि़त है। प्रोजेेरिया के बारे में फिल्म 'पा' और डिस्लेक्सिया पर 'तारे जमीं पर' फिल्म से लोगों में थोड़ी जागरुकता आई लेकिन ऐसी 6800 से अधिक रेयर डिजीज और भी हैं जिनके बारे में हम जानते भी नहीं। दुनियाभर में लगभग 35 करोड़ लोग इनसे पीडि़त हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों के जन्म के समय सचेत रहें तो कुछेक का इलाज संभव है।  

अल्ट्रा रेयर डिजीज
अलग-अलग देशों में इसके अलग-अलग मानक हैं। भारत में दस हजार की आबादी में किसी एक को होने वाली बीमारी को रेयर जबकि एक लाख की आबादी में से दो लोगों को होने वाली बीमारी को अल्ट्रा रेयर डिजीज कहते हैं।  

कराएं न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग
न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग में बच्चे के जन्म के समय ही खून की जांच होती है। अमरीका जैसे देशों में नवजात बच्चों की करीब 45 प्रकार की जांचें होती हैं। जबकि भारत में 22-25 प्रकार की जांच होने लगी हैं। जांच में ऐसी करीब 20 प्रकार की रेयर डिजीज की पहचान हो जाती है जो कुपोषण से होती हैं। इनका समय रहते इलाज केवल डाइट मैनेजमेंट से हो सकता है। 

ये हैं लक्षण
 दौरा या बेहोशी।
शरीर में अकडऩ या शिथिलता। 
बार-बार बिना वजह उल्टी। 
शरीर या पेशाब से तेज दुर्गंध। 
त्वचा में बदलाव या दाने निकलना। 
समय के साथ मानसिक या शारीरिक विकास न होना। 
सिर का सामान्य से छोटा या बड़ा होना। 
सांस ज्यादा तेज या धीमे आना। 
चेहरे पर अजीब और असमय बदलाव।
मोतियाबिंद होना। 
कमजोर हड्डियां ।

बचाव की संभावना
अधिकतर रेयर डिजीज से बचाव संभव नहीं है क्योंकि इनके कारणों का पता नहीं चल पाता। जेनेटिक कारणों से होने वाली 20 फीसदी रेयर डिजीज में गर्भ के समय ही बचाव संभव है पर ऐसी तकनीक अपने देश में बहुत कम है। नवजात में कुपोषण के कारण होने वाली ऐसी बीमारियों की पहचान कर इलाज की तकनीक हमारे देश में भी आ चुकी है। इसके लिए जन्म के बाद न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग  क रानी चाहिए। 

बेंगलुरु से शुरू हुआ है अभियान
दुर्लभ बीमारियों से पीडि़त नौ मरीजों के अभिभावकों ने देश में रेयर डिजीज के मरीजों के लिए एक संस्था 'रेयर डिजीज ऑफ इंडिया' (ओआरडीआई) की स्थापना दो साल पहले बेंगलुरु में की। अब संगठन में 300 से अधिक डॉक्टर हैं जो नि:शुल्क परामर्श देते हैं। ओआरडीआई की ओर से देश में पहला हेल्प लाइन नंबर 08892555000 शुरू किया गया है। इस नंबर पर रेयर डिजीज मरीजों के परिजन संपर्क कर मदद ले सकते हैं।

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मां के साथ-साथ बनिए बच्चों की एक अच्छी दोस्त


मां बनना दुनिया का सबसे अनोखा अनुभव है। एक मां को बच्चे की हर छोटी और बड़ी जरूरत को पूरा करने की कोशिश करनी होती है। मां सिर्फ मां नहीं बल्कि बच्चे के लिए एक अच्छी केयर टेकर होती है। लेकिन एक मां को ये चाहिए को वो बच्चे की अच्छी केयर टेकर से साथ एक अच्छी दोस्त भी बनें। खासतौर पर मां के लिए बढ़ते बच्चों की दोस्त बनना बहुत जरूरी है ताकि बच्चे अपनी कोई भी बात छिपाए बिना छोटी से छोटी बात भी आपके साथ शेयर कर सकें। 

अपने बच्चे के आगे-पीछे घूमना उसके साथ खेलना आपके लिए मजेदार अनुभव होगा इसलिए बच्चों के खेल में उनके साथ आप भी बच्चे बनकर शामिल हो जाएं और जमकर मस्ती करें। आप चाहें तो बच्चों को अपने काम में शामिल कर सकती हैं। फिर चाहे साथ में गार्डनिंग करना हो या फिर साथ-साथ ईवनिंग वॉक पर जाना। 

आप एक बार बच्चे की दोस्त बन गईं तो हो सकता है बच्चे आपके साथ बेतकल्लुफ होने की कोशिश करें। लेकिन ध्यान रखें बच्चे की दोस्त बनने के साथ-साथ डिसिप्लिन और रूटीन फॉलो करना भी जरूरी है। बच्चे के खाने, खेलने, पढ़ाई करने, टीवी देखने, हर चीज का समय फिक्स कर दें ताकि बच्चे के साथ ही आपकी लाइफ भी थोड़ी आसान हो जाए।




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जब बच्चा कुछ कर गुजरने की धमकी दे... तो हो जाएं सावधान


आजकल बच्चे छोटी-छोटी बातों को लेकर जल्दी तनावग्रस्त होने लगे हैं। नतीजतन उनमें आत्महत्या की प्रवृत्ति में खासी वृद्धि देखी गई है। लेकिन यह प्रवृत्ति अचानक पैदा नहीं होती। खराब स्कूली परिणाम, जलन, चिंता आदि के कारण यह समस्या उनमें बढ़ रही है। कई बार माता-पिता बच्चों के अवसाद का अनुमान नहीं लगा पाते। इसे रोकने के लिए जरूरी है कि उनकी कुछ बातों और आदतों पर निगरानी बनाए रखें।

अगर बच्चा बार-बार कुछ कर गुजरने या मरने की धमकी देने लगे तो सावधान हो जाएं। इसका आशय है कि उसके मन-मस्तिष्क में कुछ गलत करने की सोच आने लगी है। ऐसे में उसके पीछे का कारण जानें और उचित परामर्श दें। कम उम्र से ही जीवन-मृत्यु पर लिखने लगे तो माता-पिता को ध्यान देना चाहिए। यह असामान्य गतिविधि है। आत्महत्या की खबरें चाव से पढ़ता है या ऐसी खबरों की कटिंग सहेजकर रखता है तो उनकी मनोस्थिति पर तत्काल ध्यान दें। बच्चा तेज साइकिल या वाहन दौड़ाए, ग्रीन सिग्नल में सड़क पार करे तो सतर्क हो जाएं। इसका मतलब जीवन के प्रति उनकी उदासीनता भी हो सकता है जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।

अनिद्रा या देर रात को उठकर चलने लगना इस बात का संकेत है कि वह किसी चीज की कमी महसूस कर रहा है। ऐसे में उसे समझें और हिम्मत दें। आत्महत्या की सोच पनपने के बाद बच्चों में खेलकूद के प्रति रुझान कम हो जाता है। ऐसे में उनके निष्क्रिय होने के कारणों को खोजें। तनाव के क्षणों में बच्चे की मनोदशा अभिभावक ही बेहतर समझ सकते हैं। ऐसे में माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चे को समझकर उसे सकारात्मक संरक्षण देें। यदि बच्चा किसी मृत रिश्तेदार के बारे में अकारण या बार-बार पूछताछ करे तो इसकी वजह जानने की कोशिश करें। यदि उस रिश्तेदार ने आत्महत्या की थी तो ज्यादा सावधानी की जरूरत है।

अपना पसंदीदा सामान या खिलौने दोस्तों या अनजान लोगों में बांटने लगे तो इसका कारण केवल उदारता नहीं है, यह भी हो सकता है वह चाहता हो कि उसके बाद उसकी प्रिय चीजें संभालकर रखी जाएं। बच्चा यदि जीने-मरने की बात करने लगे तो कारण को समझकर उसे प्यार से समझाएं। ज्यादातर माता-पिता को बच्चे की सोच का सबसे बाद में पता चलता है। वे किसी भी बात को पहले अपने मित्रों से साझा करते हैं। ऐसे में बच्चों की उनके मित्रों से बातचीत पर गुपचुप नजर बनाए रखें।

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बिताना चाहती है बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम, ध्यान रखें ये महत्वपूर्ण टिप्स


हो सकता है एक वर्किंग मदर होने की वजह से आप अपने बच्चों के साथ ज्यादा समय नहीं बिता पाती हों, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप उन्हें प्यार नहीं करती या आपको उनकी चिंता नहीं हैं। अक्सर लोग वर्किंग मदर्स पर एक अच्छी मां न होने का आरोप लगा देते है लेकिन याद रखें बच्चों के साथ अधिक समय बिताने से ज्यादा महत्वपूर्ण है उनके साथ क्वालिटी टाइम बिताना। इन तरीकों से आप ऑफिस से आने के बाद अपने बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम एक्सपेंड कर सकती है...

फोन, लैपटॉप बंद कर दें 
ऑफिस से आने के बाद कोशिश करें कि आप अपना समय सिर्फ बच्चों के साथ बिताएं। इसके लिए आप घर आते हुए अपना फोन स्विच ऑफ कर देंं। अगर आपको लगता है कि फोन स्विच ऑफ करना मुश्किल है तो उसे कम से कम अपने से दूर ही कर दें। साथ ही अपने लैपटॉप को भी बंद कर दें। सोशल मीडिया से भी दूर रहे। फेसबुक, ट्विटर न खोलें। घर लौटने पर पूरा ध्यान बच्चों पर दें। इससे उनके साथ आपका रिश्ता यकीनन मजबूत बनेगा। 

उनकी बातों को सुनें
जब भी आप अपने बच्चों के साथ हो तो उन्हें बोलने का पूरा मौका देंं और उनकी बातों को ध्यान से सुनें। ऑफिस से लौटकर बच्चों के साथ बैठे और उनसे बात करें। वह आपको अपने स्कूल की, दोस्तों की, टीचर्स की और ढ़ेर सारी बातें बताएंगे। उन्हें रोकें नहीं बल्कि उनकी बातों को गौर से सुनें। बीच-बीच में सिर भी हिलाएं। 

कामों को मिलकर करें
हो सकता है यह सुनने में आपकों सही न लगे, लेेकिन ऐसा करने से कई उद्देश्य पूरे होते हैं। आप अपने बच्चों के साथ मिलकर सफाई, खाना बनाना, पौधों को पानी देना जैसे घर के काम कर सकती है। इसमें आप सबको मजा भी आएगा और काम भी जल्दी हो जाएंगे। इसके बाद आप बच्चों को आइसक्रीम ट्रीट दे सकती हैं। 

बच्चों को गले लगाएं
हर बच्चे को मां के स्पर्श की जरूरत होती है, भले ही वह कितना ही बड़ा हो। इसलिए आपके बच्चे चाहे छोटे हो, टीनेजर हो या इसकी बीच की उम्र हो, कोशिश करें कि जब भी उनके साथ हो, उन्हें अपने प्यार का अहसास करवाएं। ऑफिस जाते समय और लौटकर उन्हें कसकर गले लगाएं। 

परंपरा बनाएं 
आप अपने बच्चों के साथ कुछ परंपराएं बना सकती है जैसे हर रविवार शॉपिंग पर जाना या महीने के किसी एक तय दिन पिकनिक पर जाना, साथ मिलकर कपड़े तय करना, डिनर साथ में खाना आदि। ऐसा करने से आप बहुत सी यादें बनाएंगी और बच्चों के साथ आपका रिश्ता और गहरा हो जाएगा। 

धैर्य रखें
ऑफिस में काम करने के बाद यकीनन आप थक जाती है, ऐसे में घर पर चीजें फैली हो और तभी आपका बच्चा शरारत कर दें तो खुद को शांत रखें। छोटी-छोटी चीजों पर गुस्सा न हो, बल्कि गहरी साँस ले और वहां से चली जाएं। घर में जितनी शांति होगी, आपके बच्चों और आपके लिए उतना ही बेहतर होगा। 

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सेहतमंद तरीके से करें अपने बच्चे के स्कूल जाने की शुरुआत, अपनाएं ये टिप्स


स्कूल की छुट्टियां खत्म होने वाली हैं। इसी के साथ बच्चों का रेगुलर स्कूल जाने और तेज धूप में ज्यादा समय बिताना लाजमी होगा। इस दौरान लू लगने, डायरिया और उल्टी जैसी समस्याओं के मामले सामने आने की आशंका बढ़ सकती है। ऐसे में माता-पिता कुछ सावधानियों को बरतकर अपने बच्चे को सेहतमंद बना सकते हैं। 

नाश्ता 
पूरे दिन की एनर्जी के लिए नाश्ता अहम है। शारीरिक गतिविधि के अलावा हड्डियों, मांसपेशियों व दिमागी विकास के लिए यह जरूरी है। इसमें एक गिलास दूध, ताजा फल, ओटमील, सूखे मेवे, स्टफ परांठा आदि दे सकते हैं। 

लिक्विड डाइट 
खेलने या धूप में बाहर घूमने के दौरान बच्चों को ज्यादा पसीना आने से कमजोरी महसूस होती है। ऐसे में अतिरिक्त एनर्जी के लिए उन्हें नारियल पानी, छाछ, नींबू पानी जैसी लिक्विड डाइट आदि दें। 

दिन में 5-6 बार खिलाएं
ज्यादातर बच्चों को बार-बार भूख लगती रहती है। ऐसे में एक बार हैवी डाइट देने के बजाय हल्का-फुल्का बार-बार या दिन में 5-6 बार खिलाएं। भोजन के अलावा सलाद, फल, अंकुरित अनाज या कोई हैल्दी चाट खिलाएं। एक गिलास दूध फ्रूटमिल्क, मिल्कशेक या छाछ व लस्सी के रूप में पिलाएं।

धूप से बचाएं
यदि धूप तेज है तो बच्चों को सुबह 11 से शाम 4 बजे के बीच बाहर न भेजें। रात के समय के अलावा बच्चों को इस समय के बीच नींद पूरी करने के लिए कह सकते हैं। या फिर घर में ही कुछ एक्टिविटी करने के लिए कहें। 
सुरभी पारीक, डाइटीशियन व न्यूट्रिशनिस्ट, जयपुर 


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पिता की देखभाल से बच्चों के मोटापा को किया जा सकता है कंट्रोल, जानिए कैसे


न्यूयॉर्क। बच्चों की देखभाल में पिता की भूमिका दो से चार साल की उम्र के बीच उनमें मोटापा रोकने में मददगार हो सकती है। एक नए शोध में पाया गया है कि बच्चों को नहलाने, कपड़े पहनाने तथा कहीं बाहर ले जाने या उनके साथ खेलने में पिता की भूमिका बच्चों में मोटापे के जोखिम को काफी हद तक दूर करता है।

यह शोध अमेरिका के मैरीलैंड राज्य में बाल्टीमोर शहर स्थित जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय में किया गया। विश्वविद्यालय के जॉन हॉपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ से संबद्ध प्रमुख शोधकर्ता मिशेल वांग ने कहा, "बढ़ते बच्चों के विकास में पिता की भूमिक बेहद अहम होती है। हमारे शोध से पता चलता है कि इसका बच्चों के स्वास्थ्य पर अच्छा असर होता है।"

शोध के नतीजे 'ओबेसिटी' जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। यह अध्ययन अमेरिका के बच्चों पर किया गया है। शोध के नतीजे बताते हैं कि बच्चों की देखभाल तथा उनमें मोटापा रोकने के प्रयासों में पिता की अहम भूमिका उनमें मोटापे के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है।

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13 साल से कम के बच्चों को स्मार्टफोन बेचने पर रोक की मांग


न्यूयॉर्क। बच्चों को स्मार्टफोन की लत से रोकने के लिए अमेरिका के कोलोराडो राज्य के एक समूह ने 13 साल से कम उम्र के बच्चों को स्मार्टफोन की बिक्री पर रोक लगाने की मांग की है। यूएसए टूडे की रपट में कहा गया है कि गैर लाभकारी संस्था पैरेंट्स अगेन्स्ट अंडरएज स्मार्टफोन्स या पीएयूएस के संस्थापक टिम फरनम ने कोलोराडो में प्रस्तावित वैलेट पहल की अगुआई की है।

उन्होंने प्रस्ताव दिया है कि न तो 13 सालसे कम उम्र के बच्चों को स्मार्टफोन की बिक्री की जानी चाहिए और न ही वैसे माता-पिता को स्मार्टफोन की बिक्री करनी चाहिए, जो अपने 13 साल से कम उम्र के बच्चे के लिए स्मार्टफोन खरीदने जाते हैं। इस प्रस्ताव के तहत खुदरा विक्रेताओं को राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट देनी होगी कि उन्होंने स्मार्टफोन बेचने से पहले इस बात की जांच की थी और पूछताछ की थी।

इसमें यह भी कहा गया है कि उन खुदरा विक्रेताओं पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए, जो बार-बार बच्चों को फोन बेच रहे हों।
लेकिन कई लोगों ने इस विचार का विरोध भी किया है। उनका कहना है कि बच्चों को स्मार्टफोन का प्रयोग करना चाहिए या नहीं, इसका फैसला लेने का हक उनके मां-बाप को है।

कोलोराडो के सीनेटर जॉन केफाल्स, डी-फोर्ट कॉलिन्स के हवाले से बताया गया है कि उनका कहना है कि वे इस प्रस्तावित कानून के पीछे के कारण को समझ सकते हैं, लेकिन उनका मानना है कि इसे लागू करना सरकार का किसी परिवार के निजी जिन्दगी में दखलअंदाजी होगी। 


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सावधान! बचपन में धूम्रपान करने से बाद में हो सकता है यह खतरनाक रोग


लंदन। बचपन में धूम्रपान करने या धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के ज्यादा संपर्क रहने वाले युवाओं को र्यूमेटॉइड आथ्र्राइटिस (संधिवात या गठिया) का खतरा रहता है। एक शोध में यह बात सामने आई। र्यूमेटॉइड आथ्र्राइटिस सूजन संबंधी एक दीर्घकालीन विकार है, जो शरीर के जोड़ों, खासकर हाथों और पैरों मेंपाए जाने वाले जोड़ों को प्रभावित करता है।

शोध में पाया गया कि बचपन में जो लोग धूम्रपान के लती हुए या धूम्रपान करने वालों के संपर्क में रहे, उनमें जोखिम का अनुपात बचपन में धूम्रपान न करने वालों की तुलना में 1.73 था।

फ्रांस की यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स ऑफ साउथ पेरिस में प्रोफेसर और इस अध्ययन की प्रमुख लेखिका रैफैले सेरर ने कहा, "हमारा शोध किसी भी प्रकार के तंबाकू वाले वातावरण, खासकर उन परिवारों में, जिनमें र्यूमेटॉइड आथ्र्राइटिस मामले पहले से मौजूद हैं, वहां से बच्चों को दूर रखने पर जोर देता है।"

इस शोध का परिणाम यूरोपियन कांग्रेस ऑफ र्यूमेटोलॉजी (यूलार) 2017 की वार्षिकी में प्रकाशित किया गया है। इसके अलावा, एक अन्य विश्लेषण में धूम्रपान वाले मरीजों में रीढ़ की हड्डी के ढांचे संबंधी बीमारी अंकिलोसिंग स्पॉन्डिलाइटिस होने की आशंका भी जताई गई है।

शोधकर्ताओं ने कहा, धूम्रपान नई गैरजरूरी हड्डियों के बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह बीमारी सिंडेसमोफाइटिस कहलाती है। तुर्की की इजमिर कतीप सेलेबी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर सेरवेट अकार ने कहा, "धूम्रपान न केवल बीमारियों की संवेदनशीलता के लिए, बल्कि एएस के साथ मरीजों में रोगों की तीव्रता बढ़ाने में एक बड़ा खतरा होता है।"

उन्होंने कहा, र्यूमेटोलॉजिस्टों को अपने मरीजों को धूम्रपान छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, क्योंकि यह भविष्य में जीवन की गुणवत्ता पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।" 

अपने विमान में बच्चे के पैदा होने की खुशी में जेट एयरवेज ने इस बच्चे का एक फ्री पास जारी कर दिया, जिसका इस्तेमाल यह बच्चा भविष्य में जेट एयरवेज की यात्राओं के दौरान कर सकेगा। जेट एयरवेज ने कहा इस पास के ​जरिए यह बच्चा मुक्त मे कितनी यात्राएं कर सकता हैै। वैसे आपको बता दें जेट एयरवेज की फ्लाइट में ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी बच्चे ने उड़ान भरे जाने के दौरान जन्म लिया है।

Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/kids-news/childhood-passive-smoking-may-up-arthritis-risk-later-1604322/

अधिक देर तक स्मार्टफोन यूज करने से बच्चों में हो जाती है ये खतरनाक बीमारी


मोबाइल फोन आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है लेकिन आज के समय इसका सही इस्तेमाल कम ही हो रहा है। आजकल छोटे बच्चों को स्मार्टफोन पर चिपके हुए आसानी से देखा जा सकता है। यदि आपका बच्चा भी स्मार्टफोन चलाना का बहुत ज्यादा शौकीन है तो जरा सावधान हो जाइए नहीं तो भविष्य में इसके दुष्परिणाम देखने को मिल सकते है।

एक हालिया अध्ययन में यह बात पता चली है कि स्मार्टफोन की लत में फंसे बच्चे, जहां माता-पिता के साथ कम समय बिता रहे हैं, वहीं इसकी टेक्नोलॉजी उनके मानसिक विकास और दिमाग को कमजोर भी कर रही है. स्मार्टफोन का ज्यादा इस्तेमाल करने वाले बच्चों की रचनात्मक प्रतिभा खत्म होने लगती है और उनमें फैसले लेने की क्षमता भी कमजोर पड़ जाती है।   

अध्ययन के दौरान पाया गया कि तकनीक के इस्तेमाल और फिजिकल एक्ट‍िविटी में तालमेल न होने के कारण बच्चों का शारीरिक विकास भी काफी हद तक प्रभावित हो रहा है। हाल ही में हर्ले स्ट्रीट क्लिीनिक द्वारा कराए गए एक सर्वे में 1,500 से अधिक श‍िक्षकों में से लगभग दो-तिहाई टीचर्स ने कहा है कि वे अश्लील फोटो भेजने और देखने वाले स्टूडेंट्स से वाकिफ हैं, जिनमें प्राइमरी स्कूल के बच्चे भी शामिल हैं। इतना ही नहीं अश्लील वीडियो के मामले में पिछले तीन साल के दौरान 2,000 से अधिक शिकायतें दर्ज करवाई गई।

इसलिए यदि आप भी चाहते है कि आपके बच्चे का मानसिक और शारीरिक तौर पर पूर्ण विकास हो तो आज से उसकी स्मार्टफोन की लत का छुड़वा दें।

Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/kids-news/cellphone-addiction-is-as-bad-as-cocaine-addiction-especially-for-kids-1599954/

अगर आपका बच्चा भी पीता है चाय तो हो जाएं सावधान, नहीं हो जाएंगी ये बीमारी


चाय मेहमाननवाजी का पहला स्टेप है। कहते है यदि किसी के घर पर गए और उसने आने वाले मेहमान की बहुत अच्छी खातिर की है लेकिन चाय नहीं मिलाई तो वह घर आकर यही कहेगा वहां तो हमे चाय भी नसीब नहीं हुई। यहां इस लाइन का लिखने का मतलब सिर्फ इतना है कि हमारे देश में चाय को लोग बहुत अधिक महत्व देते है। चाय के बारे में ऐसा कहा जाता है कि चाय पीने से पाचन क्रिया सही रहती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता दुरुस्त रहती है और कमजोरी दूर होती है।

यह बात सही है कि चाय पीने के कई फायदे है लेकिन एक बच्चे और वयस्क पर इसके प्रभाव बिल्कुल अलग-अलग होते है। कहने का मतलब है कि बच्चों के लिए अधिक मात्रा चाय का सेवन उनके शरीर पर नेगेटिव इफेक्ट डालता है। कई माता-पिता चाय में अधिक मात्रा में दूध देकर पिला देते है, वो सोचते है इस बहाने वो दूध भी मिलेगा लेकिन उनका ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है। 

अधिक मात्रा में चाय पीने से बच्चों के मस्तिष्क, मांसपेशियों और नर्वस सिस्टम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे बच्चों की हड्डियों में दर्द (खासतौर पर पैंरों में), व्यवहार में बदलाव और मांसपेशियों में कमजोरी नजर आने लगती है। ऐसे में यदि आपका बच्चा भी अधिक चाय का सेवन करता है तो उसे तुरंत इसकी आदत छुड़वा दीजिए नहीं तो आपके बच्चों को इन परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/kids-news/if-your-child-drinks-tea-then-be-careful-as-it-s-harmful-for-their-health-1599194/

बच्चों की डाइट में शामिल करें ये चीजें, कभी बीमार नहीं होगा आपका बच्चा


अक्सर रोगों का एक कारण सामने आता है मरीज के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का कमजोर होना। इसका कारण शरीर में पोषक तत्त्वों की कमी और डाइट में एंटीऑक्सीडेंट से युक्त चीजें शामिल न करना है। कई बार मौसम में बदलाव होने पर स्थिति और भी बिगड़ जाती है। खासकर इसके मामले बच्चों में अधिक देखे जाते हैं। जानते हैं खानपान से जुड़ी वे बातें जो इम्युनिटी बढ़ाती हैं और पोषक तत्त्वों की पूर्ति भी करती हैं। 

कलरफुल सब्जियां 
लाल पीली व हरी शिमला मिर्च, गाजर, आलू, फूलगोभी व पत्तागोभी में कलरफुल तत्त्व कैरोटीनायड्स पाए जाते हैं जो एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। गाजर में विटामिन-ए, बी, सी, पोटेशियम और सोडियम पाया जाता है।  इसके अलावा लाल शिमला मिर्च में बीटा कैरोटिन और विटामिन-सी अधिक पाया जाता है जो बच्चों की आंखों और त्वचा को हैल्दी बनाने का काम करते हैं। 

यू देंं : रंगबिरंगी सब्जियों से सैंडविच, परांठा, रोल्स, कबाब, टिक्की तैयार कर बच्चों को दें। इनमें मौजूद बीटा कैरोटिन कोल्ड और फ्लू से भी बचाता है।

दही
एक शोधानुसार ऐसे बच्चे जो दही खाते हैं, उन्हें कान-गले का संक्रमण और सर्दी-जुकाम के होने की आशंका 19 फीसदी तक कम हो जाती है। रोजाना दही लेने से सूजन, संक्रमण और एलर्जी संबंधी समस्याएं भी दूर होती हैं।

यू देंं : बच्चे को सादा दही देने की बजाय शेक या स्मूदी के रूप में दें। दही में फल काटकर डालें और ड्राय फ्रूट्स भी मिलाकर दे सकती हैं। 

सुपरफूड ब्रोकली
इसे सुपरफूड कहते हैं। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स, एंटीइंफ्लेमेट्री और डिटॉक्सिफाइंग कंपोनेंट होते हैं जो इम्युनिटी बढ़ाते हैं। इसमें विटामिन-ए, सी व ई अधिक होता है।

यू दें : पास्ता या सूप में डाल कर दे सकती हैं।

टमाटर
लाल टमाटर में खास एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं जो बच्चे में फ्री-रेडिकल से होने वाले नुकसान से बचाने के साथ इम्युनिटी बढ़ाते हैं। 

यू देंं : टमाटर प्यूरी, सॉस, सूप और सलाद के रूप में दे सकती हैं। 


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पिता के साथ समय बिताने वाले बच्चों को IQ तेज होता है, जानिए क्यों


पिता-पुत्र का रिश्ता कितना अनमोल होता है यह बात किसी को बताने या समझाने की जरूरत नहीं है। हर पिता अपने पुत्र से जी जान से प्रेम करता है और उसकी सिर्फ यह ख्वाहिश होती है कि उसका बेटा आगे चलकर उसका नाम रोशन करें। लेकिन क्या आप जानते है कि एक पिता को अपने बच्चों के साथ कितना और किस तरह वक्त बिताना चाहिए। बता दें इसका असर बच्चे की बुद्धिमता पर भी पड़ता है। अगर हम यह कहें कि एक पिता के लिए अपने बच्चे के साथ वक्त बिताना फर्ज नहीं बल्कि जरूरत भी है तो गलत नहीं होगा।

इम्पीरिअल कॉलेज ऑफ लंदन में हाल ही में हुए एक अध्ययन में यह पता चला है कि अगर पिता अपने बच्चों के साथ कम उम्र से अच्छा वक्त गुजारता है तो इसका बच्चों की बुद्धिमता पर एक सकारात्मक असर पड़ता है। अध्ययन में ये बात भी सामने आई है कि शांत, संवेदनशील और कम चिंता करने वाले स्वभाव के लोगों के बच्चे बुद्धिमान 'यंगस्टर्स' बनते हैं। पिता का बच्चे के साथ बचपन से ही घुलना-मिलना बच्चे कि क्षमताओं को उभारने में सहायक होता है। 

अध्ययन में शामिल हुए इम्पीरियल कॉलेज ऑफ लंदन के एक प्रोफेसर का कहना है कि एक पिता को अपने बच्चे के साथ घुलना-मिलना चाहिए और एक अच्छा वक्त गुज़ारना चाहिए, फिर वो चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो। इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 128 पिताओं और बच्चों पर एक शोध किया। इस दौरान उन्होंने 3 महीने तक के बच्चों के उनके पिता के साथ खेलते वक्त के वीडियो बनाये और इसके 2 साल के बाद बच्चे के 'मेंटल डेवेलपमेंट इंडेक्स' का टेस्ट लिया, जैसे कि रंगों या आकारों को पहचानना आदि। शोध में उन बच्चों को ज्यादा समझदार और बुद्धिमान पाया गया, जिनके पिता बचपन से ही उनके साथ खेलते या वक्त गुजारते आए थे। 

तो यदि आप यह चाहते हो कि आपका बच्चा बड़ा होकर बुद्धिमान और तेज दिमाग वाला बनें हो अभी से उसका साथ वक्त बिताना शुरू कर दें।

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