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हायरिंग में लें पुराने एम्प्लॉइज की मदद तो आगे बढ़ेगी कंपनी


आपका छोटा बिजनेस है या फिर बड़ा या फिर किसी स्टार्ट अप की शुरुआत आपने की है, आपको नए लोगों की, नई-नई स्किल्स की जरूरत हमेशा होती है। ऐसे में नए व्यक्ति को हायर करते समय आप उससे अलग-अलग तरह के सवाल पूछते हैं। उसके अनुभव और पर्सेनेलिटी को जानने की कोशिश करते हैं। इस दौरान आप अपनी कंपनी के पुराने एम्प्लॉइज की मदद ले सकते हैं। वह नए कैंडिडेट को बेहतर तरीके से परख सकते हैं। जानें कैसे-

कल्चर के मुताबिक है या नहीं
हर करंट एम्प्लॉई कंपनी के कल्चर के बारे में पूरी तरह से वाकिफ होता है। उसे उस कल्चर की अच्छाइयां और बुराइयां, दोनों पता होती हैं। इंटरव्यू लेते समय वह टेबल के दोनों साइड्स के बेनिफिट्स जानता है। उसे हायरिंग में शामिल करने से वह यह फैसला लेने में सक्षम होता है कि इंटरव्यू देने आया शख्स कंपनी के कल्चर और पोजिशन में फिट होगा या नहीं। वह दूसरे टीम मेट्स के साथ सामंजस्य बैठा पाएगा या नहीं। इसके बाद वह कैंडिडेट को चुनने या न चुनने का फैसला एम्प्लॉयर पर छोड़ देता है।

टीम में फिट होगा या नहीं
पुराने एम्प्लॉई को जब हायरिंग प्रोसेस में शामिल किया जाता है तो वह नए कैंडिडेट में देखता है कि वह पुरानी टीम के साथ फिट होगा या नहीं। अगर नया कैंडिडेट पुरानी टीम से अलग है और बदलाव के तैयार भी नहीं है तो उसका आना पुराने एम्प्लॉइज में विवाद की वजह बन सकता है जो कंपनी की सफलता के लिए सही नहीं है।

नए कैंडिडेट में स्पार्क है या नहीं
कोई भी कैंडिडेट हायरिंग मैनेजर से बात ही नहीं करता, बल्कि उस समय वह अपना वह होमवर्क प्रजेंट कर रहा होता है, जो वह कंपनी के बारे में करके आया है। जब आप हायरिंग प्रक्रिया में अपने पुराने एम्प्लॉइज को शामिल करते हैं तब वह नए कैंडिडेट्स का स्पार्क भी आंकते हैं।


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ऐसे बनें शानदार सेल्समैन, मिलेगा शानदार कमीशन भी, कमाएंगे लाखों


दुनिया भर में जितने भी सेल्सपीपुल हैं, वे अपने आपको कभी सेल्सपीपुल या सेल्सपर्सन के रूप में प्रोजेक्ट नहीं करते। इसके उलट वे कस्टमर के सामने यह शो करते हैं कि वे इस फील्ड के एक्सपर्ट हैं। इसलिए अगर आप भी सेलिंग बिजनेस में हैं तो फिर जो बेचते हैं, उसमें एक्सपर्ट हो जाएं। आइए जानते हैं कि किन तरीकों को अपनाकर आप बेहतर सेल्सपर्सन बन सकते हैं -

सेल्सपर्सन की तरह सोचना बंद करें
यदि आप अपने प्रोस्पेक्ट में एक्सपर्ट होना चाहते हैं तो फिर सबसे पहले आपको ‘सेल्सी’ बनने से बचना होगा। इसका मतलब है कि आपको सेल्सपर्सन की तरह सोचने से बचना होगा। जब आप सेल्सपर्सन की तरह से सोचते हैं तो फिर अपने प्रोडक्ट या सर्विस की कमियों के बारे में सोचना बिल्कुल बंद कर देते हैं। याद रखें कि आपको सिर्फ प्रोडक्ट बेचने पर ही ध्यान नहीं देना बल्कि अपने कस्टमर को सुनना भी है। इससे आपके प्रॉडक्ट की गुणवत्ता सुधरती जाएगी और कस्टमर उसे खुद-ब-खुद आपके प्रोडक्ट को हाथों-हाथ लेने लगेगा और उसकी डिमांड बढ़ती चली जाएगी। इस तरीके से आपकी कंपनी की सेल्स बढ़ती जाएगी।

डॉक्टर का माइंडसेट अपनाएं
सेल्सपर्सन के बजाय आप एक डॉक्टर की तरह से सोचना शुरू करें। आपने कभी किसी डॉक्टर को यह कहते नहीं सुना होगा कि मेरे पास इलाज का एकदम नया प्रॉसीजर है और मैं उसे आपको बताने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। इसके बजाय डॉक्टर आपकी सारी बातें ध्यान से सुनकर आपके मर्ज को समझने की कोशिश करता है और उसके बाद ही दवाई लिखता है। आपको भी चाहिए कि सबसे पहले अपने कस्टमर्स की जरूरतों को जानें।

चुनौतियां बताएं और जानें
अगर आप किसी चीज को सफलता पूर्वक बेचना चाहते हैं तो उसके लिए जरूरी है कि कस्टमर आपसे खुलकर बात करें। ऐसा करने के लिए सबसे पहले उसके सामने उन चुनौतियों का जिक्र करें, जो आपने फेस की हैं। इसके बाद उससे पूछें कि क्या उसने भी अपने जीवन में ऐसी ही किसी चुनौती का सामना किया है। उसकी चुनौती जानकर आप उसे हल करने का रास्ता भी सुझा सकते हैं। इससे कस्टमर खुश होगा और वह आपसे जरूर कुछ खरीदेगा।

सेल की जरूरत न बताएं
बिजनेस के दौरान एक ऐसा भी वक्त आता है, जब आपको अपने बिल्स चुकाने के लिए सेल का सहारा लेना ही पड़ता है लेकिन किसी भी सेल के दौरान कस्टमर को यह नहीं लगना चाहिए कि सेल आपके फायदे के लिए लग रही है, बल्कि उसे यह लगना चाहिए कि सेल से आप उसे फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए सेल के दौरान आप पूरी तरह से रिलेक्स रहें और कॉन्फीडेंट दिखाई दें। आपके इस व्यवहार से भी कस्टमर आपकी ओर आकर्षित होंगे और आपके प्रोडक्ट की सेल बढ़ेगी जो आपको आपके लक्ष्य तक ले जाएगी।

15 पर्सेंट का रूल समझें
एक सेल्सपर्सन को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि किसी भी बातचीत में 15 पर्सेंट से ज्यादा फायदा नहीं होता। जब भी अपने प्रोस्पेक्ट से बात करना शुरू करते हैं तो बातचीत पूरी तरह से आपके नियंत्रण में नहीं रहती। कस्टमर या प्रोस्पेक्ट सवाल उठाते हैं, आप उनके सवालों के दौरान अपनी बॉडी लैंग्वेज इस तरह की रखें कि कस्टमर को लगे कि आप उसकी बात ध्यान से सुन रहे हैं। इससे कस्टमर आपको एक्सपर्ट समझेगा और आपके प्रोडक्ट को जरूर खरीदना चाहेगा।


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स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं तो पहले करें ये प्लानिंग फिर बनेंगे करोड़पति


नब्बे फीसदी स्टार्ट अप तो शुरू होते ही फेल होने के लिए हैं, यह बात आपने जरूर सुनी होगी। हालांकि यह बात हमेशा सच नहीं होती और नब्बे स्टार्ट अप फेल नहीं होते। फेल होने वाले स्टार्ट अप की संख्या इससे काफी कम होती है लेकिन यह भी सच की किसी भी बिजनेस की शुरुआत में बहुत सारी मेहनत लगती है और इसमें रिस्क भी बहुत होता है। इसी रिस्क और मेहनत की वजह से कुछ आइडिया मूर्तरूप लेने से पहले ही दम तोड़ देते हैं।

अब आपका आइडिया बहुत अच्छा है, यूनिक है, आपने प्लानिंग भी बहुत अच्छी ही की है, आप मेहनत और रिस्क से किसी भी तरह से घबरा भी नहीं रहे हैं लेकिन आपकी मामूली गलती की वजह से बिजनेस फेल जाता है। ऐसे में या तो आपका स्टार्ट अप फेल जाता है और आप दूसरों के लिए उदाहरण बन जाते हैं और या फिर दूसरों के विफल उदाहरण से सबक लेकर खुद के स्टार्ट अप को सफलता की नई ऊंचाइयों पर पहुंचा सकते हैं। अपने स्टार्ट अप को शुरुआत से ही मजबूती प्रदान करने के लिए आपको कुछ गलतियां करने से बचना होगा। आइए जानते हैं कि ऐसी ही कुछ गलतियों के बारे में -

पूरी प्लानिंग नहीं
एक बिजनेस की शुरुआत के लिए एक आइडिया ही काफी होता है लेकिन इसे बनाए रखने के लिए प्लानिंग बहुत जरूरी होती है। कुछ लोगों को प्लानिंग करना काफी मुश्किल लग सकता है लेकिन अगर आप सही प्लानिंग नहीं करेंगे तो यह अंधेरे में तीर मारने जैसा होगा। सॉलिड प्लानिंग अकेला ऐसा महत्त्वपूर्ण स्टेप है, जिससे भविष्य में सफलता मिलेगी। अत: आपके पास क्लीयर स्टेप्स होने जरूरी हैं।

विफलता का डर
आपने भले ही तय कर लिया हो कि आप डरेंगे नहीं लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आज भी विफलता का डर लोगों पर सबसे ज्यादा हावी होता है। लोग यह मानते हैं कि विफल हो गए तो सफलता नहीं मिलेगी लेकिन देखा जाए तो विफलता ही सफलता की कुंजी है। अपनी विफलता को सकारात्मक लेना सीखें। दुनिया के बहुत से सफल एंटरप्रेन्योर्स, बिजनेस की शुरुआत में विफल हुए थे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वह विफलता के डर से उबरे और अपनी तमाम गलतियों से सीख ली।

अकेले सब कुछ करने की चाहत
एक दिन में केवल 24 घंटे होते हैं और सच्चाई यही है कि आप अकेले सब कुछ नहीं कर सकते। अहंकार स्टार्ट अप ड्रीम का सबसे बड़ा दुश्मन है। रिक्रूटमेंट, मैनेजमेंट, लीगल, फाइनेंस एंटरप्रेन्योर्स के लिए समस्या खड़ी कर सकते हैं। इन सबके लिए ऐसे लोगों को ढूंढें, जो इन कामों में माहिर हों। आप सारे एम्प्लॉइज को मैनेज नहीं कर सकते और फिर धीरे-धीरे शॉर्टकट ढूंढने लगते हैं। आपका एचआर प्रभावित होने लगता है। इसका नतीजा यह होता है कि आपकी कंपनी सभी के लिए दुस्वप्न बन जाती है और आप सफलता के बजाय विफलता प्राप्त करते हैं।

पैसे को सब कुछ मानना
स्टार्टअप ओनर्स के पास एक बड़ा विजन होता है। वह इसके जरिए भारी पैसा कमाना चाहते हैं। इसलिए वह प्रॉडक्ट के लिए सही मार्केट खोजने और यूजर बेस बनाने की बजाय पैसा कमाने को तवज्जो देते हैं। अगर वह पैसा कमाने में सफल हो जाते हैं तो वह मान लेते हैं कि उनका बिजनेस सफल है लेकिन याद रखें कि हर साल बहुत पैसे वाले स्टार्ट अप भी फेल हो जाते हैं। अगर आप वास्तविक रूप में सफल होना चाहते हैं तो आपको मार्केट में लंबे समय तक टिकने पर जोर देना चाहिए तभी आप अपनी मंजिल को हासिल कर सकेंगे।

परफेक्शन का इंतजार
परफेक्शन के इंतजार ने बहुत से स्टार्ट अप्स को विफल कर दिया है। यदि आपके पास एक किलर आइडिया है तो फिर आप यह जरूर चाहते हैं कि आप इसे दुनिया के सामने सबसे अच्छे यानी परफेक्ट रूप से सामने लाया जाए। हालांकि, आपका शुरुआत से ही परफेक्शन का इंतजार करना बेमानी है। याद रखें कि आपका बिजनेस शुरुआत से ही परफेक्ट नहीं होगा, परफेक्ट बनाने के लिए आपको दिन-रात इस पर मेहनत करनी होगी, तभी सफलता मिलेगी।

मार्केटिंग नहीं करना
एक बिजनेस एक लोगो से कहीं बढक़र होता है। आपका ब्रांड बहुत अच्छा हो लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि आपको मार्केटिंग की जरूरत हर वक्त रहती है। याद रखें कि मौजूदा बजट को डवलपमेंट पर ही खर्च न करें, बल्कि कुछ बिजनेस की मार्केटिंग के लिए भी बचा कर रखें। दुनिया को जानने दें कि आपका बिजनेस क्या है।

सही टीम नहीं चुनना
सही टीम ढूंढना भी मुश्किल हो सकता है, इसलिए एंटरप्रेन्योर्स या छोटे बिजनेस ओनर्स को ऐसे पोटेंशियल कैंडिडेट्स को चुनना चाहिए, जो कंपनी के लिए सही हों। गलत टीम चुनने से न केवल पैसों का नुकसान होता है बल्कि इससे दूसरे एम्प्लॉयर्स का मोरल भी नीचे गिरता है। ऐसी टीम चुनें, जो पूरी ईमानदारी से अपनी राय आपको दे और आपका बिजनेस आगे बढ़ाए। हमेशा याद रखें कि एक सही और बेहतरीन टीम ही आपको सफलता दिलाएगी।

आधे-अधूरे प्रयास
बिजनेस की शुरुआत करनी है तो आपको पैशन और धैर्य की जरूरत होती है। यह चीजें नहीं होने पर आपकी जिंदगी से कई चीजें दूर हो सकती हैं। आपको चाहिए कि आप बिजनेस को समय दें और लक्ष्य की राह में आने वाली सभी चुनौतियां का सामना पूरी शिद्दत के साथ करें। अपनी समस्याओं को पूरे मन से सुलझाने का प्रयास करें।


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कई बार फेल होने के बाद लगाया ऐसा दिमाग, अमरीका में जमा दी धाक


2006 में मैंने आइआइटी मुंबई में इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग में इंटीग्रेटेड बीटेक प्रोग्राम किया। कॉलेज के दिनों में रोबोटिक्स के कॉम्पिटीशन में पार्टिसिपेट करना मेरा पैशन रहा। मुझे इंस्टीट्यूट का टेक्नीकल अवॉर्ड मिला, तो कॉन्फिडेंस बढ़ा। इसके बाद सीधा इसरो में प्लेसमेंट मिला, लेकिन मैंने दूसरी राह चुनी। शुरू से ही सोच रखा था कि खुद का कुछ करना है और मेरी यह सोच स्ट्रगल लेकर आई। जॉब नहीं था, तो आइआइटी, डीआरडीओ, इसरो के टेक्नीकल प्रोजेक्ट्स लेना शुरू कर दिया। 2012 में अपनी कम्पनी रजिस्टर करवाई और इन संस्थानों को रिसर्च इंस्ट्रूमेंट बनाकर देने लगा।

यह बूटस्ट्रैपिंग मोड तीन साल चला। इस दौरान सिर्फ प्रोजेक्ट्स से सर्वाइव कर रहा था, लेकिन मेरा मानना है कि यह दौर ही सबसे ज्यादा सिखाने वाला रहा। मैंने 25-30 प्रोजेक्ट्स किए और वो भी इंडिया के बेहतरीन साइंटिस्ट्स के साथ, लेकिन मुझे सिर्फ सर्वाइव नहीं करना था। पीछे मुडक़र देखा तो पता चला कि बैचमेट आज काफी आगे निकल चुके हैं। फिर सोचा कि बिजनेस को स्केलेबल बनाना है। इसके लिए मैंने ‘प्रोजेक्ट से प्रोजेक्ट’ में मूव करना शुरू कर दिया। अपना स्टार्टअप, अपने प्रोडक्ट को लेकर पहले काफी जद्दोजहद रही।

पेशेंस को लूज नहीं करें
मनोज का कहना है कि रिसर्च मेरा पर्सनल इंट्रस्ट था। मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि मुझे सीलिंग फैन ही बनाना है, लेकिन यह जरूर सोचा था कि दूसरों को जॉब देना और इलेक्ट्रिसिटी के इश्यू को सॉल्व करना है। यदि यह स्टार्टअप भी सफल नहीं होता, तो प्लान बी के तौर पर मैं रिसर्च फील्ड में ही कुछ करता। मुझे प्रोडक्ट बनाने में नौ महीने लगे। मेरे स्टार्टअप में तीन साल का स्ट्रगल काफी काम आया। लर्निंग के तौर पर मैं अपनी जर्नी को देखूं तो कह सकता हूं कि एंटरप्रेन्योर्स को पेशेंस कभी लूज नहीं करना चाहिए। स्ट्रगल को लर्निंग की तरह लें और फाइनेंशियल इश्यूज से निपटने के लिए ***** स्ट्रैपिंग करें, तो सफल जरूर होंगे। लाइफ में एक्सपेरिमेंट और फेल होना भी जरूरी है।

फिर हुआ फेलियर से सामना
मैंने एक बड़ी डेयरी कम्पनी के लिए व्हीकल ट्रैकिंग और टेम्प्रेचर मॉनिटर सिस्टम बनाया, लेकिन छह महीने तक ही चल पाया और फेल हो गया। इसके बाद दो और प्रोडक्ट बनाए और वे भी फेल हो गए। लेकिन मैंने पेशेंस नहीं खोया। यह फेज एक साल तक रहा, लेकिन कॉन्फिडेंस था कि तीन साल में जो सीखा है, उससे कुछ न कुछ कर ही लूंगा। फिर मैंने इलेक्ट्रिकल फील्ड का स्टार्टअप शुरू किया। मैंने होम अप्लायंस के मार्केट को स्टडी किया तो पता चला कि इंडिया में हर साल 5 से 6 करोड़ पंखे हर साल बनते हैं, लेकिन ये एनर्जी एफिशियेंट नहीं होते। यह मार्केट काफी बड़ा था। ऐसे में मैंने इन्हें एनर्जी एफिशियेंट बनाने के लिए प्रोटोटाइप बनाया। जिसके काफी अच्छे नतीजे आए। एक पंखे की इलेक्ट्रीसिटी में तीन पंखे चले। इसके बाद प्रोडक्ट ‘गोरिल्ला फैन’ की लॉन्चिंग की और पहले ही दिन से सक्सेस मिलने लगी। तीन साल में इसे 2 मिलियन अमरीकन डॉलर की फंडिंग मिल चुकी है। 215 एम्प्लॉई काम कर रहे हैं और जल्द ही 50 करोड़ का टर्नओवर कम्प्लीट करने वाले हैं।

अवॉर्ड एंड रिकग्निशन

  • नेशनल एंटरप्रेन्योरशिप अवॉर्ड
  • यूनाइटेड नेशंस अवॉर्ड
  • फोर्ब्स इंडिया और एशिया की 30 अंडर 30 सूची में नाम

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गांव की लड़की को पति ने सिखाया मार्शल आर्ट, खली ने दी ट्रेनिंग, फिर बना दिया इतिहास


कन्या भ्रूण हत्या को लेकर फजीहत कराने वाले हरियाणा की बेटियों ने दुनिया में देश का नाम किया है। यहीं के मालवा गांव में मैं पैदा हुई। वेट लिफ्टर बनने के लिए जिम में कदम रखा तो समाज की पुरानी सोच ने मुझे आड़े हाथ लिया। वह सोच जिसमें लड़कियां चूल्हे-चौके में अच्छी लगती हैं। बेटी पर पैसा क्यों बर्बाद करना, क्या कमा देगी? शादी करो, जैसे दबाव खानदानवालों की तरफ से भी परिवार पर थे। मगर मैंने ठाना था, इस सोच को बदलना है।

हर पुरुष एक जैसी सोच वाला नहीं होता
पुरुषवादी सोच के बीच मेरे बड़े भाई संजय मुझे मंजिल तक पहुंचाने में लगे थे। मैं पांच भाई-बहनों में चौथे नंबर पर हूं। 2002 में बीए फर्स्ट ईयर के दौरान वेट लिफ्टिंग की ट्रेनिंग लेने लगी। कोच बलवरी सिंह बल्ली से सात से आठ महीने ट्रेनिंग ली, उनका देहांत हो गया। मैं ट्राइआउट (परीक्षण) के लिए बरेली गई। फिर 2004 में लखनऊ में रहते हुए मैंने कई नेशनल गोल्ड मेडल जीते। 2008 में स्पोर्ट्स कोटे से सशस्त्र सीमा बल में कांस्टेबल की नौकरी मिल गई।

मेहनत रंग लाई
पति की सलाह पर नौकरी छोड़ वुशु (चाइनीज मार्शल आर्ट) की ट्रेनिंग ली। रोहतक में मेरे भाई ने विशेष कोच से मुझे कुछ महीने इसकी ट्रेनिंग दिलाई। लगातार दो वर्ष सीनियर नेशनल चैंपियनशिप व गेम्स में वुशु चैंपियन बनी।

विदेशों में बजाया डंका
एक बार अकादमी में डब्लूडब्लूई की टीम आई। उन्होंने मेरा कार्डियो चैक किया और दुबई में होने वाले ट्राइआउट का न्यौता दिया। मैं कामयाब हुई और उनके साथ कॉन्ट्रैक्ट साइन कर ऐसा करने वाली देश की पहली महिला बनी। मैंने वहां तीन बड़ी ‘मी यंग क्लासिक चैंपियनशिप’ और 2018 में रेसलमेनिया में देश का नेतृत्व किया। अब लक्ष्य डब्ल्यूडब्ल्यूई चैंपियन बनना है।

शुक्रिया विरोधियों!
मैदान और साधन नहीं मिले तो कपड़ों के बैग के साथ प्रैक्टिस की। शुक्रिया, क्योंकि विरोधी न होते तो कामयाबी की इतनी जिद न होती। नकारात्मकता ने मुझे जीतने और लडऩे का हौसला दिया। आज गांव के लोग अपनी बेटियों को कविता बनाना चाहते हैं। मेरे गांव में सैकड़ों लड़कियां मैदान की तरफ जाती दिखेंगी। सपना साकार हो रहा है।

सुनहरा मौका
पहली बार है जब WWE इस साल मार्च में खुद ट्राइआउट लेने मुंबई आ रहा है। खिलाड़ी ट्राइआउट के लिए न जाने कहां-कहां भटकते है। हमने रोहतक में एक अकादमी खोली है।

जब चुनौती स्वीकार भीड़ में से उठाया हाथ
मुंझे नौकरी नहीं मिल रही थी, तो घर-परिवार संभालने का फैसला लिया। इतना लंबा सफर तय करने के बाद इस तरह सब कुछ छोड़ घर बैठ जाना पति और भाई को ठीक नहीं लग रहा था। जिस मुकाम को हासिल करने की जिद थी, वह अभी नहीं मिला था। इसलिए मैंने दोबारा उठने का फैसला किया। जालंधर में स्थित महाबली खली की अकादमी में मैं अपने परिवार के साथ एक शो देखने गई। रिंग में एक महिला रेस्लर चुनौती दे रही थी, कोई है, जो मुझसे टकरा सके। मैंने भीड़ के बीच से अपना हाथ खड़ा कर दिया और सलवार-सूट में ही रिंग में उतर गई। मैंने देसी तरीके से उसे पटक दिया। यहां से एक नई शुरुआत हुई। खली ने मौका दिया और मैं वहां ट्रेनिंग लेने लगी।

कॅरियर और शादीशुदा जिंदगी में संतुलन
सामाजिक और शारीरिक दोनों परेशानियां झेलीं। बच्चे के जन्म के बाद स्त्री शारीरिक कमजोरी महसूस करती है। मगर मैंने बच्चे के जन्म के एक साल बाद ही प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। बच्चे को ननद की देखरेख में छोड़ ट्रेनिंग पर जाती थी। कई बार चुपके से रो भी लेती थी। मगर जो सपने देखे हैं वे पूरे करने थे। परिवार का संघर्ष सार्थक करना है। इसमें आने वाली लड़कियों के लिए रास्ता बनाना है। 2014 से 2016 तक लगातार तीन साल नेशनल चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक, 2015 में नेशनल व 2016 में साउथ एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीता। मैं नौकरी ढूंढ रही थी। मगर अफसोस कि देश को इतने स्वर्ण दिलाने के बाद भी मुझे नौकरी नहीं मिल रही थी।

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कामयाब बिजनेसमैन बनने के लिए आजमाएं ये टिप्स तो होगा फायदा ही फायदा


सफलता कोई चीज नहीं है बल्कि वह एक माइंडसेट है। सफलता हासिल करने के लिए आपको अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित होना होता है। आपको सबकुछ छोडक़र बस अपने लक्ष्य को हासिल करने पर अपना ध्यान केंद्रित करना होता है। इसके लिए आपको अपनी जिंदगी में अच्छी आदतें लानी होती हैं और बुरी आदतों को छोडऩा होता है। जहां अच्छी आदतें आपको आपके लक्ष्य और सफलता के करीब लेकर जाती हैं, वहीं, आपकी बुरी आदतें आपको आपकी कामयाबी से दूर ले जाती हैं और आप जिंदगी में विफल हो जाते हैं। बुरी आदतें आपको हाथ आए अवसर को गंवाने के लिए मजबूर कर देती हैं और आप कभी एक कामयाब एंटरप्रेन्योर नहीं बन पाते। साथ ही आप अपने प्रतिस्पर्धियों से पीछे रह जाते हैं।

अच्छी आदतें आपको ना सिर्फ बिजनेस में सफलता दिलाती हैं और कामयाब एंटरप्रेन्योर बनने में आपकी मदद करती हैं बल्कि आपको आपके परिवार और दोस्तों के भी करीब लाती हैं। अच्छी आदतों को अपनाकर आप सफलतापूर्वक अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं और खुश रहते हैं। वहीं, बुरी आदतें आपको थोड़े समय के लिए भले ही खुश कर दें लेकिन लंबे समय में वह आपको निराशा के अलावा और कुछ नहीं देतीं। इसलिए बेहतर होगा कि आप वक्त रहते ऐसी आदतों को छोड़ दें और सफलता की ओर बढ़ें। आइए जानते हैं कि आपको अपना लक्ष्य हासिल करने और सफल एंटरप्रेन्योर बनने के लिए कौन-कौन सी बुरी आदतों को छोड़ देना चाहिए -

अंडरअचीविंग बंद करें
अगर आप थोड़ी सी सफलता में ही खुश और संतुष्ट हो जाते हैं तो आपको अपनी यह आदत छोड़ देनी चाहिए। अपनी इस आदत की वजह से आप कभी ज्यादा पाने की इच्छा नहीं करते और कम में ही खुश रहते हैं। सफलता इस तरह से कभी हासिल नहीं होती। सफलता के लिए आपको चाहिए कि लक्ष्य की ओर बढ़ते समय जब आपको कोई कामयाबी हासिल हो, तब आप खुद को थोड़ा और हासिल करने के लिए प्रेरित करें और काम करते रहें। इससे आप अपने लक्ष्य के करीब आते जाएंगे और ज्यादा उपलब्धियां हासिल कर सकेंगे। याद रखें कि आपको अगर कोई रोक सकता है तो वह है खुद आप। अत: खुद को कभी ना रोकें और आगे बढ़ते रहें।

नकारात्मक लोगों के साथ न रहें
यह बात सच है कि आपके स्वभाव, आपके व्यक्तित्व और आपकी सोच पर आपकी संगत का काफी प्रभाव पड़ता है। आप जिस तरह के लोगों के साथ रहते हैं, उससे तय होता है कि आप सफल होंगे या नहीं। जब आप अपना अधिकतर समय नकारात्मक सोच वाले लोगों के साथ बिताते हैं, तब आप कभी सफलता के करीब नहीं पहुंच पाते। अत: आपको चाहिए कि खुद को सकारात्मक लोगों के करीब रखें ताकि आप अपने लक्ष्य के करीब पहुंच सकें और सफल एंटरप्रेन्योर बन सकें।

परफेक्शनिस्ट न बनें
अगर आपको परफेक्शनिस्ट बनने की आदत है तो आपको सफल होने के लिए इस आदत को छोडऩा होगा। आप हर काम में अगर परफेक्शन की तलाश करेंगे तो हो सकता है कि आप समय पर उन कामों को पूरा ही ना कर पाएं। ऐसे में परफेक्शन से किए काम का भी कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। आपको चाहिए कि परफेक्शनिस्ट बनने के बजाय वास्तविक बनें और समय पर काम पूरा करने की आदत डालें। इससे आप विश्वसनीय लगेंगे और सफलता पाएंगे।

मल्टी-टास्किंग रोकें और फोकस करें
वैसे तो आज के जमाने में मल्टीटास्किंग की काफी जरूरत है लेकिन अगर आप अपना सारा ध्यान खुद को मल्टीटास्कर बनाने में ही लगा देते हैं तो आप किसी एक विशेष काम पर फोकस नहीं कर पाते। ऐसे में आप लक्ष्य के करीब नहीं पहुंच पाते। आपको चाहिए कि मल्टीटास्किंग के बजाय किसी एक विशेष काम पर फोकस करें और उसके विशेषज्ञ बन जाएं।

काम के वक्त सोशल मीडिया नहीं
आजकल अधिकतर लोगों को हर वक्त सोशल मीडिया पर रहने की बुरी आदत होती है। आपकी यह आदत आपको सफलता से दूर ले जाती है। सोशल मीडिया पर रहें लेकिन हर वक्त नहीं। खासकर जब आप अपना काम कर रहे हों, तब आपको सोशल मीडिया से दूरी बनाकर रखनी चाहिए और अपने काम को पूरा करने पर ही सारा ध्यान लगाना चाहिए।

किसी से तुलना न करें
किसी से तुलना करने से कभी आपका भला नहीं हो सकता। आपको अपनी तुलना खुद से ही करनी चाहिए और खुद को बेहतर बनाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहना चाहिए। जब आप दूसरों की तरह बनने की कोशिश करते हैं, तब आप स्वयं की पहचान खो देते हैं जिससे आप अपने तय लक्ष्य से दूर हो सकते हैं। इसके बजाय आप खुद पर ध्यान दें और खुद को बेहतर बनाते रहें। इससे आपकी क्षमता बढ़ेगी और आपका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा जो सफलता के लिए जरूरी है।

बहाने न बनाएं
कुछ लोगों को हर काम में बहाने बनाने की आदत होती है। अगर आपको भी यह आदत है तो जान लीजिए कि इससे आप कभी अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकेंगे। अगर आप बहाने बनाकर अपना काम टाल देते हैं तो आप सफलता के बजाय विफलता की ओर बढ़ते हैं। आपको चाहिए कि आप बहाने खोजने में ध्यान ना लगाकर काम करने के तरीकों पर ध्यान लगाएं और उन्हें पूरा करें। ऐसा करने से आप लक्ष्य को हासिल कर सकेंगे और सफलत एंटरप्रेन्योर्स में शामिल हो सकेंगे।

खुद पर सारा बोझ न डालें
कुछ लोगों की आदत होती है कि वह दूसरों पर विश्वास नहीं करते और खुद ही सारा काम करने की कोशिश करते हैं। अगर आपको भी यह बुरी आदत है तो जान लें कि इससे आपको नुकसान ही होगा। आप अकेले सभी काम पूरे नहीं कर सकते, समय पर तो बिल्कुल नहीं। ऐसे में आपको अपने स्टाफ पर भरोसा करना चाहिए और खुद पर सभी कामों का बोझ नहीं डालना चाहिए।


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Motivational Story : बॉलीवुड एक्टर बनने से पहले सरकारी विभाग में नौकरी थे Amrish Puri , पढ़ें उनकी संघर्ष की कहानी


बॉलीवुड में अमरीश पुरी को एक ऐसे अभिनेता के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने अपनी कड़क आवाज, रौबदार भाव-भंगिमाओं और दमदार अभिनय के बल पर खलनायकी को एक नई पहचान दी। रंगमंच से फिल्मों के रूपहले पर्दे तक पहुंचे अमरीश पुरी ने करीब तीन दशक में लगभग 250 फिल्मों में अभिनय का जौहर दिखाया। आज के दौर में जब कलाकार किसी अभिनय प्रशिक्षण संस्था से प्रशिक्षण लेकर अभिनय जीवन की शुरुआत करते हैं, अमरीश पुरी खुद एक चलते फिरते अभिनय प्रशिक्षण संस्था थे। हालांकि, बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि पंजाब के नौशेरां गांव में 22 जून 1932 में जन्में अमरीश पुरी ने बॉलीवुड में कदम रखने से पहले श्रम विभाग में नौकरी करते थे।

नौकरी के साथ साथ वह उसके साथ ही सत्यदेव दुबे के नाटकों में अपने अभिनय का जौहर दिखाया करते थे। बाद में वह पृथ्वी राज कपूर के 'पृथ्वी थियेटर' में बतौर कलाकार अपनी पहचान बनाने में सफल हुए। पचास के दशक में अमरीश पुरी ने हिमाचल प्रदेश के शिमला से बीए पास करने के बाद मुंबई का रूख किया। उस समय उनके बड़े भाई मदन पुरी हिन्दी फिल्म में बतौर खलनायक अपनी पहचान बना चुके थे। वर्ष 1954 में अपने पहले फिल्मी स्क्रीन टेस्ट में अमरीश पुरी सफल नहीं हुए। उन्होंने अपने जीवन के 40वें वसंत से अपने फिल्मी जीवन की शुरुआत की थी। वर्ष 1971 में बतौर खलनायक उन्होंने फिल्म रेशमा और शेरा से अपने कैरियर की शुरुआत की, लेकिन इस फिल्म से दर्शकों के बीच वह अपनी पहचान नहीं बना सके।

देखने लायक था श्रीदेवी के साथ टकराव
उस जमाने के मशहूर बैनर 'बाम्बे टॉकीज' में कदम रखने बाद उन्हें बड़े-बड़े बैनर की फिल्में मिलनी शुरू हो गई। उन्होंने खलनायकी को ही अपने कॅरियर का आधार बनाया। इन फिल्मों में निशांत, मंथन, भूमिका, कलयुग और मंडी जैसी सुपरहिट फिल्में भी शामिल हैं। इस दौरान यदि अमरीश पुरी की पसंद के किरदार की बात करें तो उन्होंने सबसे पहले अपना मनपसंद और न कभी नहीं भुलाया जा सकने वाला किरदार गोविन्द निहलानी की वर्ष 1983 में प्रदर्शित कलात्मक फिल्म 'अद्र्धसत्य' में निभाया। इस फिल्म में उनके सामने कला फिल्मों के अजेय योद्धा ओमपुरी थे। इसी बीच हरमेश मल्होत्रा की वर्ष 1986 में प्रदर्शित सुपरहिट फिल्म 'नगीना' में उन्होंने एक सपेरे की भूमिका निभाई जो लोगो को बहुत भाई। इच्छाधारी नाग को केन्द्र में रख कर बनी इस फिल्म में श्रीदेवी और उनका टकराव देखने लायक था।

'मोगैम्बो' नाम बना उनकी पहचान
वर्ष 1987 में उनके कैरियर में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ। इस वर्ष अपनी पिछली फिल्म 'मासूम' की सफलता से उत्साहित शेखर कपूर बच्चों पर केन्द्रित एक और फिल्म बनाना चाहते थे जो 'इनविजबल मैन' के ऊपर आधारित थी। इस फिल्म में नायक के रूप में अनिल कपूर का चयन हो चुका था, जबकि कहानी की मांग को देखते हुए खलनायक के रूप में ऐसे कलाकार की मांग थी जो फिल्मी पर्दे पर बहुत ही बुरा लगे। इस किरदार के लिए निर्देशक ने अमरीश पुरी का चुनाव किया जो फिल्म की सफलता के बाद सही साबित हुआ। इस फिल्म में अमरीश पुरी द्वारा निभाए गए किरदार का नाम था 'मोगैम्बो' और यही नाम इस फिल्म के बाद उनकी पहचान बन गया।

हॉलीवुड में भी किया काम
जहां भारतीय मूल के कलाकार को विदेशी फिल्मों में काम करने की जगह नहीं मिल पाती है, वही अमरीश पुरी ने स्टीवन स्पीलबर्ग की मशहूर फिल्म 'इंडियाना जोंस एंड द टेंपल ऑफ डूम' में खलनायक के रूप में काली के भक्त का किरदार निभाया। इसके लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति भी प्राप्त हुई। इस फिल्म के पश्चात उन्हें हॉलीवुड से कई प्रस्ताव मिले जिन्हे उन्होनें स्वीकार नहीं किया क्योंकि उनका मानना था कि हॉलीवुड में भारतीय मूल के कलाकारों को नीचा दिखाया जाता है। लगभग चार दशक तक अपने दमदार अभिनय से दर्शकों के दिल में अपनी खास पहचान बनाने वाले अमरीश पुरी ने 12 जनवरी 2005 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।


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ऐसे शुरु करें स्टार्टअप तो होगा प्रोफिट, कमाएंगे पैसा ही पैसा


दुनिया भर में सरकारें बहुत से कॉन्ट्रैक्ट्स निकालती हैं और इस सेक्टर में बिजनेस की बहुत संभावनाएं होती हैं। हालांकि, इन संभावनाओं के बाद भी एक बिजनेस टू गवर्नमेंट (बी-टू-जी) स्टार्टअप को लॉन्च करना और आगे ले जाना आसान नहीं होता। इसके लिए जरूरी टेंडरिंग प्रोसेस को पूरा होने में कुछ महीने लग सकते हैं। दूसरा, यहां अनुभव महत्व रखता है। ऐसे में स्टार्टअप्स के लिए मुश्किल होती है। आइए जानते हैं कि आप अपने बी-टू-जी स्टार्टअप को किस तरह सफल बना सकते हैं -

सभी जगह रजिस्टर करें
जब भी कोई सरकारी एजेंसी अपने किसी प्रोजेक्ट के लिए नए कॉन्ट्रैक्टर को हायर करती है तो वह इसके बारे में कई वेबसाइट्स पर पोस्ट करती है। ऐसे में आपको हर वेबसाइट पर जाकर अपने बी-टू-जी स्टार्टअप को रजिस्टर जरूर करना चाहिए।

सबकॉन्ट्रैक्ट करें
आप अपने स्टार्टअप के लिए अनुभव हासिल करने के लिए किसी बड़े कॉन्ट्रैक्टर के साथ सबकॉन्ट्रैक्टर के तौर पर काम कर सकते हैं। इससे आपको ज्यादा फायदा भले ही नहीं होगा लेकिन आप अपने इस अनुभव को भविष्य में इस्तेमाल कर सकते हैं।

बाहर विश्वसनीयता बनाएं
अपनी विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए आपको हमेशा सरकारी एजेंसियों के साथ काम करने की जरूरत नहीं होती। आप सार्वजनिक हितों के प्रोजेक्ट्स पर काम करके भी ऐसा कर सकते हैं। इससे सरकारी एजेंसियों का ध्यान भी आपकी ओर जाता है और वह आपके बी-टू-जी स्टार्टअप को प्रोजेक्ट देती हैं।


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ऐसे लें लोगों का टेस्ट तो जीवन में दिन दूनी रात चौगुनी होगी तरक्की


आजकल ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो एंटरप्रेन्योर बनकर अपना खुद का बिजनेस शुरू करना चाहते हैं। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि बिजनेस को सफल बनाने के लिए वह सही संसाधनों का इस्तेमाल करें। किसी भी बिजनेस के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन होता है एम्प्लॉइज को रिक्रूट करना। अगर आप बिजनेस के लिए सही एम्प्लॉइज हायर करते हैं तो यह आपके लिए अच्छा रहता है। आइए जानते हैं कि आप सफल बिजनेस के लिए सही रिक्रूटमेंट कैसे कर सकते हैं -

अनुभव से ज्यादा स्किल्स देखें
सही रिक्रूटमेंट के लिए यह बहुत जरूरी है। हमेशा याद रखें कि कैंडिडेट के रेज्यूमे को उसके अनुभव के प्रूफ की तरह लेने के बजाय उसके जरिए कैंडिडेट की स्किल्स समझने की कोशिश करें। कैंडिडेट से बात करें और उसके स्किल सेट को समझने की कोशिश करें। इसके बाद आप यह निर्णय ले सकेंगे कि उस कैंडिडेट की स्किल्स आपके जॉब के मुताबिक हैं या नहीं। सही स्किल्स होने पर आप उस कैंडिडेट को हायर कर सकते हैं।

रियल-वर्ल्ड समस्याओं को सामने रखें
जब भी आप किसी कैंडिडेट के साथ उसकी स्किल्स के लिए बीतचीत करें, तब कोशिश करें कि उसे रियल-वल्र्ड समस्याओं को सुलझाने का मौका दें। ऐसी समस्याएं जिन्हें सुलझाने के लिए एनालिटिकल थिंकिंग की जरूरत होती है। इससे आप उस कैंडिडेट के कॉम्पिटेंसी लेवल को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे और देख सकेंगे कि वह मुश्किलों में कैसे रिएक्ट करता है। इसके बाद आप उसे हायर करने का फैसला ले सकेंगे।

जॉब डिस्क्रिप्शन पर ध्यान दें
जब भी आप अपने बिजनेस के लिए कोई जॉब निकालें तो उसकी डिस्क्रिप्शन पर खास ध्यान दें। उसमें यह जरूर बताएं कि आप किस तरह का एम्प्लॉई चाहते हैं और आपकी उससे क्या उम्मीदें हैं। इससे आपको बिजनेस के लिए सही एम्प्लॉई ढूंढने में मदद होगी।


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झूठे बर्तन मांज जुटाए थे फीस के पैसे, फिर बदली तकदीर और बने अरबपति, जाने कहानी


दुनिया के बड़े-बड़े बिजनेस स्कूलों में सफल बिजनेसमैन की सक्सेस स्टोरी पढ़ाई जाती है। ऐसे ही मशहूर बिजनेसमैन हैं अमरीकन कंपनी फ्लेक्स-एन-गेट के मालिक शाहिद खान। लाहौर (पाकिस्तान) में जन्मे शाहिद ने संघर्ष भरा सफर तय करते हुए अपना साम्राज्य खड़ा किया। जब वह 16 वर्ष के थे तब वह आंखों में बड़ा आदमी बनने का सपना लिए अमरीका आ गए। वह आर्किटेक्ट बनना चाहते थे।

जब अमरीका आए, तब उनके पास महज 500 डॉलर थे। उन्हें रोजाना के खर्च में पैसों की तंगी का सामना करना पड़ा। ऐसे में उन्होंने पढ़ाई के बाद वाईएमसीए में बर्तन साफ करने का काम शुरू कर दिया। इस काम में उन्हें एक घंटे के 1.20 डॉलर मिलते थे।

उन्होंने 1971 में यूआईयूसी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग में अपनी ग्रेजुएशन पूरी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नौकरी की तलाश शुरू कर दी। शाहिद ऑटोमोटिव प्रोडक्शन कंपनी फ्लेक्स-एन-गेट में इंजीनियरिंग डायरेक्टर के पद पर जॉब करने लगे। फिर उन्होंने कारों के लिए कस्टमाइज्ड बम्पर्स बनाना शुरू किया। इस काम में उन्होंने खुद की बचत से 16 हजार डॉलर और बैंक लोन लेकर 50 हजार डॉलर लगाए।

उनकी शुरुआत छोटी थी, लेकिन व्यापार में बड़ी सफलता मिली। बाद में उन्होंने फ्लेक्स-एन-गेट को खरीदा। यही नहीं, वह अमरीका की नेशनल फुटबॉल लीग की एक टीम जैक्सनविल जगुआर के मालिक भी हैं, जो उन्होंने 2012 में खरीदी थी। दरअसल, शाहिद को लाभ कमाने का सबक बचपन में ही मिल गया था। उनके पिता ने उन्हें बचपन में ही विनम्र रहने के साथ मुनाफा कमाने का सबक सिखाया।

बचपन में वह रेडियो बनाकर बेचा करते थे। यहां तक कि वह अपने दोस्तों को कॉमिक्स किराए पर देकर भी पैसे कमा लेते थे। अपनी कड़ी मेहनत और दृढ़ता के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि अगर आपमें दृढ़ संकल्प और कभी नहीं हारने की भावना है तो आप असंभव को भी संभव कर सकते हैं। स्थिति कितनी भी मुश्किल हो, अगर आपके पास हार नहीं मानने की शक्ति है तो जीत आपकी ही होगी।


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5 कहानियां, जो हमेशा के लिए बदल देंगी आपकी लाइफ, बनाएंगी कामयाब


जब कोई आदर्शों से भरा जीवन जीता है तो प्रेरणा का पुंज बन जाता है। स्वामी विवेकानंद ने भी जीवन को इसी तरह जिया। खासतौर पर युवाओं के लिए उनकी बातें और सीखें अनमोल हैं। उनके बताए रास्ते पर चलकर न सिर्फ सफलता प्राप्त की जा सकती है बल्कि देश और दुनिया के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने की प्रेरणा भी विवेकानंद देते हैं। जानते हैं कि उनके जीवन से हमें क्या शिक्षा मिलती है-

देने का आनंद अधिक होता
उन दिनों स्वामी विवेकानंद अमरीका में एक महिला के यहां ठहरे हुए थे, जहां अपना खाना वे खुद बनाते थे। एक दिन वे भोजन करने जा रहे थे कि कुछ भूखे बच्चे पास आकर खड़े हो गए। स्वामी विवेकानंद ने अपनी सारी रोटियां उन बच्चों में बांट दी। यह देख महिला ने उनसे पूछा, ‘आपने सारी रोटियां उन बच्चों को दे डालीं। अब आप क्या खाएंगे?’ उन्होंने मुस्कुरा कर जवाब दिया, ‘रोटी तो पेट की ज्वाला शांत करने वाली चीज है। इस पेट में न सही, उस पेट में ही सही। देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा होता है।’

सामना करो अपने डर का
एक बार बनारस में एक मंदिर से निकलते हुए विवेकानंद को बहुत सारे बंदरों ने घेर लिया। वे खुद को बचाने के लिए भागने लगे, लेकिन बंदर उनका पीछा नहीं छोड़ रहे थे। पास खड़े एक वृद्ध संन्यासी ने उनसे कहा, ‘रुको और उनका सामना करो!’ विवेकानंद तुरंत पलटे और बंदरों की तरफ बढऩे लगे। उनके इस रवैये से सारे बंदर भाग गए। इस घटना से उन्होंने सीख ग्रहण की कि डर कर भागने की अपेक्षा मुसीबत का सामना करना चाहिए। कई सालों बाद उन्होंने एक संबोधन में कहा भी, ‘यदि कभी कोई चीज तुम्हें डराए तो उससे भागो मत। पलटो और सामना करो।

दूसरों के पीछे मत भागो
एक व्यक्ति विवेकानंद से बोला, ‘मेहनत के बाद भी मैं सफल नहीं हो पा रहा।’ इस पर उन्होंने उससे अपने डॉगी को सैर करा लाने के लिए कहा। जब वह वापस आया तो कुत्ता थका हुआ था, पर उसका चेहरा चमक रहा था। इसका कारण पूछने पर उसने बताया, ‘कुत्ता गली के कुत्तों के पीछे भाग रहा था जबकि मैं सीधे रास्ते चल रहा था।’ स्वामी बोले, ‘यही तुम्हारा जवाब है। तुम अपनी मंजिल पर जाने की जगह दूसरों के पीछे भागते रहते हो। अपनी मंजिल खुद तय करो।’

श्रेष्ठ है सादा जीवन
सादा जीवन जीने के पक्षधर थे स्वामी विवेकानंद। वह भौतिक साधनों से दूर रहने के की सीख दूसरों को दिया करते थे। वे मानते थे कि कुछ पाने के लिए पहले अनावश्यक चीजें त्याग देनी चाहिए और सादा जीवन जीना चाहिए। भौतिकतावादी सोच लालच बढ़ाकर हमारे लक्ष्य में बाधा बनती है।

रहो दिखावे से दूर
विदेश जाने पर एक बार स्वामी विवेकानंद से पूछा गया, ‘आपका बाकी सामान कहां है?’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘बस यही सामान है।’ कुछ लोगों ने व्यंग्य करते हुए कहा, ‘अरे! यह कैसी संस्कृति है आपकी? तन पर केवल एक भगवा चादर लपेट रखी है।’ इस पर वह मुस्कुराकर बोले, ‘हमारी संस्कृति आपकी संस्कृति से अलग है। आपकी संस्कृति का निर्माण आपके दर्जी करते हैं, जबकि हमारी संस्कृति का निर्माण हमारा चरित्र करता है। संस्कृति वस्त्रों में नहीं, चरित्र के विकास में है।’ इससे हमें सीख मिलती है कि बाहरी दिखावे से दूर रह कर अपने चरित्र के विकास पर ध्यान देना चाहिए।

एकाग्रता सफलता की कुंजी
अमरीका में भ्रमण करते हुए स्वामी विवेकानंद ने एक जगह देखा कि पुल पर खड़े कुछ लडक़े नदी में तैर रहे अंडे के छिलकों पर बंदूक से निशाना लगाने की कोशिश रहे हैं। किसी का एक भी निशाना सही नहीं लग रहा था। तब वे एक लडक़े से बंदूक लेकर खुद निशाना लगाने लगे। उन्होंने पहला निशाना बिलकुल सही लगाया। फिर एक के बाद एक उन्होंने 12 निशाने सही लगाए।

लडक़ों ने आश्चर्य से पूछा, ‘आप यह कैसे कर लेते हैं?’ स्वामी विवेकानंद बोले, ‘तुम जो भी कर रहे हो, अपना पूरा दिमाग उसी एक काम में लगाओ। अगर तुम निशाना लगा रहे हो तो तुम्हारा पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर ही होना चाहिए। फिर कभी चूकोगे नहीं। अगर अपना पाठ पढ़ रहे हो, तो केवल पाठ के बारे में सोचो। एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है।’


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दोस्तों से उधार ले खड़ा किया करोड़ों का कारोबार, ऐसे हुए सफल, जाने पूरी कहानी


पूंजी कम हो, लेकिन विजन बड़ा हो तो शून्य से शिखर पर कैसे पहुंचा जा सकता है, ये कर दिखाया जोधपुर के लोहिया दंपती ने। लोग जिस वेस्ट को कचरा समझ फेंक देते हैं, उसी वेस्ट से लोहिया दम्पती ने हैंडीक्राफ्ट आइटम का प्रीति इंटरनेशनल के नाम से ऐसा एंपायर खड़ा किया, जिसका सालाना टर्नओवर 45 करोड़ रुपए का है।

यही नहीं, वेस्ट से हैंडीक्राफ्ट बनाने वाली प्रदेश की यह पहली ऐसी कम्पनी है, जो कैपिटल माकेर्ट में सूचिबद्ध है। इनके हैंडीक्राफ्ट आइटम की आज 36 देशों में डिमांड है। पोलो ग्राउंड में चल रहे माहेश्वरी ग्लोबल एक्सपो में उनकी स्टॉल पर वेस्ट से बने ऐसे ही यूनिक हैंडीक्राफ्ट आइटम हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। इनकी विस्तृत रेंज देखकर ही लोग अचंभित हो जाते हैं। इन हैंडीक्राफ्ट आइटम के साथ लोग सेल्फी और फोटो खिंचवा रहे हैं। कार के बोनट और सीट से बने सोफा सेट तो लोगों को इतना पसंद आ रहा है कि हर कोई इस पर बैठ फैमिली फोटो खिंचवा रहा है।

शास्त्रीनगर में रहने वाले रितेश लोहिया ने 2008 से 2012 तक कई बिजनेस किए, लेकिन सफलता नहीं मिली। इस पर पत्नी प्रीति के साथ वेस्ट से हैंडीक्राफ्ट आइटम बनाने के आइडिया पर काम शुरू किया। कुछ आइटम बनाकर उनके फोटो वेबसाइट पर अपलोड कर दिए। कुछ ही दिनों में उन्हें डेनमार्क से पहला ऑर्डर मिला। लेकिन पुराने बिजनेस में नुकसान के कारण उनके पास ऑर्डर के आइटम बनाने लायक पैसे नहीं थे। इस पर एक दोस्त से उधार लेकर पहला ऑर्डर पूरा किया।

इसके बाद विदेशों में उनके हैंडीक्राफ्ट आइटम की डिमांड बढऩे लगी। रितेश ने बताया कि प्रदेश में हैंडीक्राफ्ट आइटम बनाने वाली उनकी पहली कम्पनी है, जो कैपिटल मार्केट में है। उनके आइटम की सबसे ज्यादा डिमांड पर यूरोपियन के देशों में हैं। लोहिया के इस बिजनेस को डिस्कवरी और हिस्ट्री चैनल भी दिखा चुके हैं।

कार से सोफा, बाइक और साइकिल से स्टैंड
रितेश ने बताया कि वे वाहनों, रेलवे व बसों के कबाड़ से डायनिंग टेबल, स्टैंड और प्लास्टिक के कट्टे, बोरियों से बेडशीट, चेयर के कवर बनाते हैं। उनकी तीन फैक्ट्रियां हैं। एक फैक्ट्री में टेक्सटाइल वेस्ट, प्लास्टिक के कट्टे, बोरियों के वेस्ट से, दूसरी फैक्ट्री में बाइक, थ्री व्हीलर व फोर व्हीलर के कबाड़ से हैंडीक्राफ्ट आइटम और तीसरी फैक्ट्री में फर्नीचर बनाते हैं।


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आज ही आजमाएं ये टिप्स तो बिजनेस में होगा शानदार प्रॉफिट


आप एक मैनेजर के तौर पर एक लीडर की भूमिका निभा रहे हैं, एक बड़ी टीम को लीड कर रहे हैं। दूसरी तरफ यह भी कड़वा सच है कि बहुत से लोग अपने बॉस से तभी मिलते हैं, जब वे मुसीबत में होते हैं। उन्हें उससे केवल डांट ही मिली होती है। आप अगर अच्छे मैनेजर या लीडर बनना चाहते हैं तो टीम मेट्स को कोचिंग देकर इस दूरी को कम कर सकते हैं। जानते हैं कैसे...

क्यों दे रहे हैं आप कोचिंग, बताएं
जब आप अपने टीम मेंबर्स को कोचिंग देना कमिट करें तो उससे पहले उन्हें यह जरूर बताएं कि आप उन्हें कोचिंग क्यों दे रहे हैं। उन्हें बताएं कि आप चाहते हैं कि टीम के हर सदस्य का विकास हो और वह आगे बढ़े, इसलिए आपने उन्हें कोचिंग देने के बारे में सोचा है और यह कोचिंग नियमित होने वाली है। इससे टीम मेंबर्स को कोचिंग के पीछे का उद्देश्य समझ आ जाएगा और वह यह जान जाएंगे कि कोचिंग से उन्हें ही आगे बढऩे में सफलता मिलने वाली है और इसकी मदद से अपने लक्ष्य आसानी से प्राप्त कर पाएंगे। कारण समझ आने पर वे आपको को-ऑपरेट करेंगे और कोचिंग के लिए न केवल एक बार, बल्कि हर बार सहयोग देंगे।

कोचिंग हर किसी के लिए है
हर किसी को कोचिंग लेने का अवसर मिलना ही चाहिए। कई बार ऐसा होता है कि लोग यह भी सोच लेते हैं कि अरे, रेसेप्शनिस्ट को कोचिंग देने का क्या मतलब है? उसे भला क्या फायदा? लेकिन आप बतौर टीम लीडर याद रखें कि हर किसी को आगे बढऩे का मौका मिलना चाहिए, उसे हर वह चीज करने का मौका मिलना चाहिए, जो वह कर सकता है। सभी में असीम संभावनाएं हैं, जरूरत है तो उन पर भरोसा किए जाने की।

उनके लक्ष्य से बंधी हो कोचिंग
आपको कोचिंग देने से पहले लोगों से उनके शॉर्ट टर्म, मिड टर्म और लॉन्ग टर्म गोल्स के बारे में पूछना चाहिए। हो सकता है कि आपको इस बात को लेकर हैरानी हो कि लोगों को पता ही नहीं है कि उन्हें जिंदगी में कब आगे बढऩा है। गोल्स के बारे में चर्चा करने और टीम मेंबर की मदद करने से उन्हें अपने लक्ष्य के बारे में जानने में मदद मिलेगी। ऐसा होने से आपकी छवि भी टीम मेंबर्स के बीच अच्छी बनेगी और वे आपका आदर करेंगे। आदर मिलने से आपको भी खुशी होगी।

कोचिंग तो होनी ही चाहिए
बतौर मैनेजर या टीम लीडर आपको अटपटा लगे और आप इसे अपनी प्राथमिकता में बिल्कुल न रखें लेकिन टीम मेंबर्स की कोचिंग हर साल-छह महीने में होना जरूरी है। आप चाहें तो इसे कैलेंडर पर मार्क कर लें और फिर चाहे कितनी भी व्यस्ताएं क्यों न हों, उस तारीख को कोचिंग शुरू कर ही दें। कोचिंग बोर न लगे, इसलिए इसे उपदेशात्मक न रखें। आप चाहें तो बाहर से भी एक्सपर्ट बुला सकते हैं, इससे टीम मेंबर्स को नई-नई बातें जानने का मौका मिलेगा। इससे काफी फायदा होगा। बाहर से एक्सपर्ट आपको भी कुछ नया ही सिखाएंगे।

साइकोलॉजी को समझें
जब भी आप कोचिंग दें तो इस बात को न भूलें कि आप इंसानों को कोचिंग दे रहे हैं और जब वे कोचिंग के लिए आते हैं तो असुरक्षा, आइडिया, पूर्वाग्रह जैसी चीजें उनके मन में होती हैं। उनके यही पूर्वाग्रह उन्हें कोचिंग के प्रति सकारात्मक रवैया अख्तियार करने से रोकते हैं। इसलिए जब भी कोचिंग शुरू करें, आप साफ कर दें कि वे लोग किसी भी तरह की मुसीबत में नहीं हैं, न ही उनकी नौकरी खतरे में है। आपका आश्वासन पाकर वे आश्वस्त हो जाएंगे और मन लगाकर कोचिंग लेंगे।


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Soupergirl ने बचत के पैसों से खड़ा कर दिया करोड़ों का साम्राज्य, जाने कहानी


संघर्ष के दिनों में मैरीलिन ने वेटर का काम किया है। इंटरनेट कैफे में नौकरी की और लोगों को हंसाने के लिए स्टैंड-अप कॉमेडियन भी बनीं। लेकिन वे खुश नहीं थीं। माइकल पौलन की ‘दी ओमनीवोर्स डिलेमा’ खाने के प्रति उनके सोचने का तरीका ही बदल दिया।

बचत के रुपयों से 72 साल की मैरीलिन पोलोन ने 20 साल पहले सूप बनाकर बेचना शुरू किया। अपनी नौकरी छोडक़र उन्होंने इस स्टार्ट-अप को उस समय शुरू किया जब कोई स्टार्ट-अप का अर्थ भी नहीं जानता था। मैरीलिन ने बताया कि उन्हें अमरीका में लोगों के तेजी से बदलती खान-पान की आदतों से इसका आइडिया आया था। वे लोगों को डाइटिंग कराने की बजाय खिलाकर उन्हें फिट रखना चाहती हैं। उनकी खास रेसिपी में से एक है उनके खास सूप। इन्हीं की वजह से वे खुद को ‘सुपरगर्ल’ कहती हैं।

दोगुना हुआ कारोबार
मैरीलिन एक मोडिफाइड वैन में इसे चलाती हैं। स्टार्ट-अप के शुरुआती दिनों में ही लोगों ने उनकी रेसिपीज को हाथों-हाथ लिया। उनका 2016 में टर्नओवर 10.44 करोड़ रुपए से बढक़र बीते साल 20.89 करोड़ रुपए हो गया है। इनका सूप 50 से अधिक फूड स्टोर पर मिलता है। उन्हें अब अमरीका समेत अन्य यूरोपीय देशों में भी पहचान बच चुकी है। वे एबीसी के ‘शार्क टैंक’, एन्टरपे्रन्योर थीम वाले रियलिटी शो में भी आ चुकी हैं।

ऐसे मिला अवसर
सारा कहती हैं कि आज अमरीका के 40 फीसदी लोग अपने खाने में हरी सब्जियां और अंकुरित खाद्य पदार्थ शामिल करना चाहते हैं। 2018 में शाकाहारी भोजन की इंटरनेट पर खोज में 90 फीसदी की वृद्धि हुई है। 60 फीसदी कमाई का हिस्सा 25 कॉस्टको गोदामों और 50 से अधिक फूड स्टोर पर बिकने वाले सूप की बिक्री से आता है। बीते साल इनकी सालाना टर्नओवर 20.89 करोड़ रुपए हो गया।

भारतीय और एशिया के ज्यादातर देश जहां शाकाहार लोगों के खान-पान का एक बड़ा हिस्सा है। अब अमरीका में भी लोकप्रिय हो रहा है। इसने हमें बिजनेस आइडिया दिया। लोग कहीं न कहीं ये बात जानते हैं कि वे हैल्दी खाना नहीं खा रहे हैं।


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A.R. Rehman: 11 वर्ष की उम्र में करना पड़ी नौकरी, बदला धर्म, फिर यूं बने बड़े संगीतकार


भारतीय सिनेमा जगत में ए. आर. रहमान को एक ऐसे प्रयोगवादी और प्रतिभाशाली संगीतकार में शुमार किया जाता है जिन्होंने भारतीय सिनेमा संगीत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाई है। तमिलनाडु में 06 जनवरी 1967 को जन्मे रहमान का रूझान बचपन के दिनों से ही संगीत की ओर रहा। उनके पिता आर. के. शेखर मलयालम फिल्मों के लिये संगीत दिया करते थे। रहमान भी अपने पिता की तरह ही संगीतकार बनना चाहते थे। संगीत के प्रति रहमान के बढ़ते रूझान को देख उनके पिता ने उन्हें इस राह पर चलने के लिये प्रेरित किया और उन्हें संगीत की शिक्षा देने लगे।

छह वर्ष की उम्र से बनाने लगे थे धुन

सिंथेसाइजर और हारमोनियम पर संगीत का रियाज करने वाले रहमान की की-बोर्ड पर उंगलियां ऐसा कमाल करती तो सुनने वाले मुग्ध रह जाते कि इतना छोटा बच्चा इतनी मधुर धुन कैसे बना सकता है। उस समय रहमान की उम्र महज छह वर्ष की थी। एक बार उनके घर में उनके पिता के एक मित्र आए और जब उन्होंने रहमान की बनाई धुन सुनी तो सहसा उन्हें विश्वास नहीं हुआ और उनकी परीक्षा लेने के लिये उन्होंने हारमोनियम पर कपड़ा रख दिया तथा रहमान से धुन निकालने के लिये कहा। हारमोनियम पर रखे कपड़े के बावजूद रहमान की उंगलियां बोर्ड पर थिरक उठीं और उस धुन को सुन वह चकित रह गए।

कुछ दिनों के बाद रहमान ने एक बैंड की नींव रखी जिसका नाम नेमेसीस एवेन्यू था। वह इस बैंड में सिंथेनाइजर, पियानो, गिटार, हारमोनियम बजाते थे। अपने संगीत के शुरूआती दौर से ही रहमान को सिंथेनाइजर ज्यादा अच्छा लगता था। उनका मानना था कि यह एक ऐसा वाद्य यंत्र है जिसमें संगीत और तकनीक का बेजोड़ मेल देखने को मिलता है। वह अभी संगीत सीख ही रहे थे तो उनके सिर से पिता का साया उठ गया लेकिन रहमान ने हिम्मत नहीं हारी और संगीत का रियाज सीखना जारी रखा।

बहन को बचाने के लिए मांगी थी मन्नत, बदला धर्म

वर्ष 1989 की बात है रहमान की छोटी बहन काफी बीमार पड़ गई और सभी चिकित्सकों ने यहां तक कह दिया कि उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं है। रहमान ने अपनी छोटी बहन के जीवन की खातिर मंदिर-मस्जिदों में दुआएं मांगी और जल्द ही उनकी दुआ रंग लाई तथा उनकी बहन चमत्कारिक रूप से स्वस्थ हो गई। इस चमत्कार को देख रहमान ने इस्लाम कबूल कर लिया और इसके बाद उनका नाम ए. एस. दिलीप कुमार से अल्लाह रखा रहमान यानि ए. आर. रहमान हो गया।

इस बीच रहमान ने मास्टर धनराज से संगीत की शिक्षा हासिल की और दक्षिण फिल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार इल्लया राजा के समूह के लिए की-बोर्ड बजाना शुरू कर दिया उस समय रहमान की उम्र महज 11 वर्ष थी। इस दौरान रहमान ने कई बड़े एवं नामी संगीतकारों के साथ काम किया इसके बाद रहमान को लंदन के ट्रिनिटी कॉलेज ऑफ म्यूजिक में स्कॉलरशिप का मौका मिला जहां से उन्होंने वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक की स्नातक की डिग्री भी हासिल की। स्नातक की डिग्री लेने के बाद रहमान घर आ गये और उन्होंने अपने घर में ही एक म्यूजिक स्टूडियो खोला और उसका नाम पंचाथम रिकार्ड इन रखा।

मणिरत्नम ने दिया था पहला ब्रेक

इस दौरान रहमान लगभग एक साल तक फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिये संघर्ष करते रहे और टीवी के लिये छोटा मोटा संगीत देने और रेडियो जिंगल बनाने का काम करते रहे। वर्ष 1992 रहमान के सिने कैरियर का महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ। अचानक उनकी मुलाकात फिल्म निर्देशक मणिरत्नम से हुई। मणिरत्नम उन दिनों फिल्म रोजा के निर्माण में व्यस्त थे और अपनी फिल्म के लिये संगीतकार की तलाश में थे। उन्होंने रहमान को अपनी फिल्म में संगीत देने की पेशकश की।

कश्मीर आतंकवाद के विषय पर आधारित इस फिल्म में रहमान ने अपने सुपरहिट संगीत से श्रोताओं का दिल जीत लिया और इसके साथ ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इसके बाद रहमान ने पीछे मुडक़र कभी नहीं देखा और फिल्मों में अपने एक से बढक़र एक एवं बेमिसाल संगीत से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद रहमान ने तिरूड़ा तिरूड़ा, बांबे, जैंटलमैन, इंडियन और कादलन आदि फिल्मों में भी सुपरहिट संगीत दिया और संगीत जगत में अपनी अलग पहचान बना ली। रहमान ने कर्नाटक संगीत, शास्त्रीय संगीत और आधुनिक संगीत का मिश्रण कर श्रोताओं को एक अलग संगीत देने का प्रयास किया। अपनी इन्हीं खूबियों के कारण वह श्रोताओं में बहुत लोकप्रिय हो गए।

रहमान निर्माता-निर्देशकों की पहली पसंद बन गए और वे रहमान को अपनी फिल्म में संगीत देने के लिये पेशकश करने लगे। लेकिन रहमान ने केवल उन्हीं फिल्मों के लिये संगीत दिया जिनके लिये उन्हें महसूस हुआ कि वाकई इसमें कुछ बात है। वर्ष 1997 में भारतीय स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ पर उन्होंने स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के साथ मिलकर वंदे मातरम यानी मां तुझे सलाम का निर्माण किया। इसके बाद वर्ष 1999 में रहमान ने कोरियोग्राफर शोभना, प्रभुदेवा और उनके डांसिंग समूह के साथ मिलकर माइकल जैक्सन के माइकल जैक्सन एंड फ्रैंडस टूर के लिये म्यूनिख, जर्मनी में कार्यक्रम पेश किया।

इसके बाद रहमान को म्यूजिक कान्सर्ट में भाग लेने के लिये विदेशों से भी प्रस्ताव आने लगे। उन्होंने पाश्चात्य संगीत के साथ-साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत के मिश्रण को लोगों के सामने रखना शुरू कर दिया था। रहमान को बतौर संगीतकार अब तक दस बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। इन सबके साथ ही अपने उत्कृष्ट संगीत के लिये उनको चार बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है।

इन सबके साथ ही विश्व संगीत में महत्वपूर्ण योगदान के लिये वर्ष 2006 में उन्हें स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में सम्मानित किया गया। रहमान के सिने करियर में एक नया अध्याय उस समय जुड़ गया जब ए आर रहमान ने फिल्म स्लमडॉग मिलिनेयर के लिए दो ऑस्कर पुरस्कार जीतकर नया इतिहास रच दिया। रहमान को 81वें अकादमी अवार्ड समारोह में इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


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पहले ड्रग्स फिर बॉयफ्रेंड से ब्रेकअप ने तोड़ा दिल, फिर भी बनी टॉप एक्ट्रेस, जाने कहानी


अमरीकन एक्ट्रेस-मॉडल डेमी मूर ग्लैमर वर्ल्ड में जाना-पहचाना नाम है। लेकिन उन्हें बचपन में काफी तकलीफों का सामना करना पड़ा है। 11 नवंबर 1962 को अमरीका के रोसवेल में डेमी का जन्म हुआ। बचपन में डेमी अक्सर पैरेंट्स को नशे में धुत पाती थी। डेमी एक बच्चे के रूप में स्ट्रैबिस्मस (भेंगापन) से भी पीडि़त रहीं। अंतत: दो ऑपरेशन के बाद यह सही हुआ।

डेमी हाई स्कूल छोडक़र पिन-अप गर्ल/ मॉडल के तौर पर काम करने लगी। उन्होंने ऋण कलेक्शन एजेंसी में भी काम किया। यही नहीं उन्होंने ड्रामा क्लासेज भी जॉइन की। 1980 में 18 साल की उम्र में डेमी ने रॉक म्यूजिशियन फ्रेडी मूर के साथ शादी कर ली, लेकिन यह केवल चार साल चली। इस बीच उन्हें 1981 में फिल्म ‘चॉइसेज’ में रोल मिला। 1983 में उन्हें रोमांटिक कॉमेडी ‘ब्लेम इट ऑन रियो’ में ब्रेक दिया गया। फिर उन्हें टीवी शो ‘जनरल हॉस्पिटल’ में रेगुलर रोल मिला। फिर भी एक न्यूली मैरिड और स्थिर एक्टिंग जॉब होना उनके जीवन के लिए स्थिरता की गारंटी नहीं था।

अचानक उनकी लाइफस्टाइल चेंज हो गई। वह ड्रग्स की आदी भी रही। फिर उन्हें अपनी गलतियों का अहसास हुआ और उन्होंने जीवन में एक नई शुरुआत की। 1990 में फिल्म ‘घोस्ट’ के रूप में एक बड़ा ब्रेक मिला। यह मूवी सफल रही और इसकी बदौलत उन्हें 1991 में तीन फिल्मों के ऑफर मिले, जिनमें ‘द बूचर्स वाइफ’, ‘मोर्टल थॉट्स’ और ‘नथिंग बट ट्रबल’ थी।

90 के दशक की शुरुआत की फिल्मों ने उन्हें हॉलीवुड की टॉप ए-लिस्ट एक्ट्रेस में शामिल करवा दिया। इस सफर के बीच उन्होंने ब्रूस विलिस से शादी की, जो बाद में टूट गई। इसी तरह एश्टन कचर के साथ भी उनकी शादी ज्यादा लंबी नहीं चली। हालांकि एक्टिंग कॅरियर में उन्हें कई अवॉर्ड मिले। डेमी ने जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच बतौर एक्ट्रेस अपनी एक अलग पहचान बनाई।


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इन एग्रीकल्चर एप्स की मदद से करें नया कृषि स्टार्टअप शुरु, होगा जमकर फायदा


इन दिनों कई युवा अपनी MNCs की शानदार पैकेज वाली जॉब्स छोड़ कर खेती-बाड़ी में रुचि लेने लगे हैं। यही नहीं खेती को लेकर वे कई नए स्टार्टअप्स भी शुरु कर रहे हैं। आप भी कुछ अच्छे एग्रीकल्चर एप्स से आप फसलों के बारे में जानकारी पा सकते हैं और अपने कॅरियर को नई ऊंचाई दे सकते हैं।

ग्रामोफोन कृषि एप
ग्रामोफोन एंड्राइड एप में तीन मुख्य सेक्शन मौजूद हैं। बाजार सेक्शन में किसानों को कीटनाशकों व फसल पोषण की सम्पूर्ण जानकारियां मिलती है। वहीं मेरी खेती सेक्शन के माध्यम से मंडी का भाव, मौसम की जानकारी एवं एग्री एक्सपट्र्स की सलाह प्राप्त की जा सकती है। समुदाय सेक्शन किसानों को उनके जैसे हजारों किसानों से संवाद करने का मौका देता है।

किसान सुविधा एप
वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किसानों को मजबूत बनाने के लिए इस एप को लॉन्च किया गया था। इस एप का डिजाइन काफी सरल है। यह ताजा मौसम और अगले पांच दिनों के पूर्वानुमान, निकटतम शहरों में वस्तुओं/फसलों की मार्केट कीमत, उर्वरकों, बीजों, मशीनरी आदि के बारे में जानकारी देता है। यह एप कई भाषाओं के साथ आता है, जो इसे इस्तेमाल में आसान बना देता है।

जेफार्म सर्विसेज एप
जेफार्म सर्विसेज किसानों को ट्रैक्टर और कृषि मशीनरी किराये पर लेने की मुफ्त सुविधा प्रदान करता है। यहां अपने मौजूदा ट्रैक्टर और कृषि उपकरण किराये पर देने वाले किसानों को सीधे इन उपकरणों को लेने के इच्छुक किसानों से जोड़ दिया जाता है।

खेती-बाड़ी ऐप
खेती-बाड़ी एप का उद्देश्य जैविक खेती को बढ़ावा और समर्थन देना है। यह किसानों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। यह एप किसानों को जैविक खेती के माध्यम से उनकी रासायनिक खेती को बदलने में मदद करता है। यह एप वर्तमान में चार भाषाओं (हिंदी, अंग्रेजी, मराठी और गुजराती) में उपलब्ध है।

कृषि मित्र आरएमएल फार्मर
इस एप से किसान मंडी की कीमतों, कीटनाशकों और उर्वरकों, खेत और किसान से संबंधित समाचार, मौसम पूर्वानुमान और विशेषज्ञों की सटीक सलाह जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां जुटा सकते हैं। यह सरकार की कृषि नीतियों और योजनाओं के संबंध में कृषि सलाह और समाचार भी प्रदान करता है।


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ऑफिस में आजमाएं ये उपाय तो दिखेगा चमत्कार, बढेगा मुनाफा, खुश रहेगा मन


एक आम व्यक्ति जागते हुए अपना आधे से अधिक समय जॉब करते हुए बिताता है। काम की अधिकता, आसपास के बोझिल वातावरण व अन्य तनावों के चलते उसे कई प्रकार की समस्याएं हो सकती है। ऐसे में जरूरी है कि वह अपने ऑफिस को अधिक से अधिक रुचिकर तथा खुशनुमा बनाए रखें। इससे प्रोडक्टिविटी के साथ-साथ क्वालिटी ऑफ लाइफ भी मिलती है। जानिए ऐसे ही कुछ उपायों के बारे में, जिनके जरिए आप अपने ऑफिस के माहौल को एक स्वस्थ स्थान बना सकते हैं।

कम बैठें और छोटे व्यायामों में खुद को व्यस्त रखें
जैसा कि अगर आप अपने ऑफिस में रोजाना 8 से 9 घंटे का लंबा समय बिताते हैं और डेस्क पर काम करने लोगों को इन लंबे घंटों तक लगातार बैठना ही पड़ता है। इतने लंबे समय तक बैठने से लोगों को कंधों में दर्द, सर्वाइकल और रीढ़ की विभिन्न समस्याएं हो सकती हैं। इन स्वास्थ्य मुद्दों से बचने के लिए लंबे समय के बीच में ब्रेक लेकर थोड़ा चलना और छोटे व्यायामों में खुद को व्यस्त रखना बहुत आवश्यक है।

एयर प्यूरीफायर और हरे पौधे लगाएं, जो हवा को शुद्ध करें
ताजा हवा का एक झोका हमारे स्वास्थ्य और मनोदशा को लाभ पहुंचाने में बहुत फायदेंमद साबित हो सकता है। ताजा सुगंध बेहतर रचनात्मकता की ओर ले जाती है और बेहतर काम करने में मदद मिलती है। एयर प्यूरीफायर लगाना और अपने कार्यस्थल के पास पौधे लगाने से आप मन लगाकर काम कर सकते हैं।

स्टैंडिंग डेस्क लगाए
डेस्क पर बैठना कभी-कभी हानिकारक प्रतीत नहीं होता लेकिन यह निश्चित रूप से हानिकारक है। ऑफिसों में स्टैंडिंग डेस्क का भी प्रावधान है। इसलिए, बहुत लंबे समय तक बैठने से बचने के लिए अपने काम और समय को विभाजित करें और अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्टैंडिंग डेस्क का उपयोग करें।

फिलोसॉफी बनाएं
फिलोसॉफी बनाना मन, शरीर और काम को संतुलित करने में एक प्रमुख भूमिका निभाता है। उद्यानों से लेकर छोटे-छोटे पुस्तकालयों तक, एक निजी स्थान का निर्माण करें। एक स्वस्थ कार्यस्थल भावना को जगाने और उत्साह भरा माहौल बनाने के लिए सर्वोत्कृष्ट है।

अपने जगह को मनमाफिक बनाएं
अपने कार्यस्थल को हरे और हल्के रंगों से पेंट करें ताकि आपके आस-पास शांति रहे। व्यक्तिगत सामानों के साथ कार्यस्थल को सजाने से न केवल एक भावनात्मक सुख मिलेगा, बल्कि माहौल अधिक अनुकूल और ताजा हो जाएगा। अपने कार्यस्थल के आसपास कुछ हरे पौधे लगाकर निश्चित रूप से काम को अधिक आरामदायक और आसान बनाने में मदद मिल सकती है।


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नए साल में इन उपायों से होगी दिन-दूनी रात चौगुनी होगी तरक्की


हर बार नए साल पर हम लोगों को बड़े-बड़े प्रण करते देखते हैं। कभी वे पूरे होते हैं तो कभी अधूरे रह जाते हैं। हमारे साथ भी कई बार ऐसा होता है। क्यों न इस बार हम कुछ ऐसे छोटे-छोटे प्रण लें, जिन्हें निभाना आसान हों और साथ ही वे हमारी जिंदगी भी सकारात्मक रूप से बदल दें।

क्या आप शुक्रगुजार हैं?
हमारे पास क्या है, इससे कहीं ज्यादा हमारा ध्यान इस पर रहता है कि हमारे पास क्या नहीं है। जबकि हमारे जीवन में अच्छी चीजें अनगिनत हैं। हम कमियों के बारे में सोच कर परेशान होते रहते हैं। अगर हम अपनी नियामतों पर ध्यान केंद्रित करें और उनके प्रति शुक्रगुजार रहें तो ज्यादा अच्छा महसूस करेंगे। सकारात्मक सोचना जरूरी है। ऐसे बड़ी-से-बड़ी मुश्किल को भी बेहतर तरीके से हल कर सकते हैं। किसी व्यक्ति से मदद मिलने पर उसे शुक्रिया कहना कभी मत भूलें। शुक्रगुजार महसूस करें और शुक्रिया अदा करते रहें।

कुछ पल फोन को दूर रखें
माना कि आज के दौर में मोबाइल फोन बहुत जरूरी है, मगर क्या इतना जरूरी है कि हम इसके बिना एक पल को भी न रह सकें? इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्मार्ट फोन का लगातार प्रयोग हम पर शारीरिक और मानसिक रूप से गलत प्रभाव भी डाल रहा है। अगर हम इसका उपयोग सीमित कर दें तो यह प्रभाव कम हो सकता है। एकदम से नहीं हो पा रहा तो रोज एक घंटा या कुछ मिनट फोन के बिना रहने की आदत डालें। उतने वक्त के लिए फोन साइलेंट या ऑफ कर दें। यह प्रण भी करें कि सोने से पहले फोन को खुद से दूर रख देंगे।

बढ़ाइए मदद के हाथ
किसी की मदद करना इस बात का प्रतीक है कि हम एक अच्छे इंसान हैं। किसी को कुछ देने का मतलब हैं कि हम इतने काबिल हैं कि किसी को कुछ दे सकते हैं। जरूरी नहीं कि मदद बहुत बड़ी हो। अपने आसपास नजर डालिए, कितनी ही बार कितने ही लोगों को छोटी-छोटी मदद की जरूरत होती है। मदद करने का अवसर तलाशिए, मदद करिए। दूसरों को खुशियां देकर अपने जीवन में अर्थ भरिए।

‘न’ कहने से परहेज क्यों!
मदद करना अच्छी बात है, मगर किसी की बात मानने के लिए अपना नुकसान नहीं कर लेना चाहिए। कई बार ‘न’ कहना भी जरूरी होता है। एकदम स्वार्थी होना भी ठीक नहीं और अगर आप मना करना नहीं जानते तो भी यह अच्छी बात नहीं। अगर आपको लगता है कि ‘न’ कहने से सामने वाले को बुरा लगेगा तो विनम्रता और तर्क के साथ अपनी बात रखें कि आप वह काम क्यों नहीं कर सकते। जीवन में आगे बढऩे के लिए यह जरूरी है। कभी किसी को अपना फायदा न उठाने दें।

भावनाओं का इजहार
किसी के लिए अगर हमारे मन में स्नेह या आभार की भावना है तो हमेशा उसे व्यक्त कर देना चाहिए। अगर किसी की कोई बात अच्छी लगती है तो कह दें। सोचिए, जब कोई हमारे साथ ऐसा करता है तो कितना अच्छा लगता है और हमारा उत्साह भी बढ़ता है। साथ ही सामने वाले के लिए मन में अच्छी भावना भी बढ़ जाती है। साथ ही कभी-कभी गुस्सा या नाराजगी व्यक्त करने से भी परहेज न करें। इससे मन हल्का रहता है।

रोजाना कुछ पढ़ें
कुछ न पढ़ते रहना एक अच्छी आदत है। इससे ज्ञान में बढ़ोतरी होती है और समय का सदुपयोग होता है। इससे एकाग्रता बढ़ती है और भाषा भी सुधरती है। किसी रोचक किताब से शुरुआत करिए। पढऩे के शौकीन अपने किसी दोस्त से सलाह मांगिए। एक बार आपमें यह आदत डल गई तो आप समझेंगे कि इसके फायदे ही फायदे हैं।

सीखिए ध्यान से सुनना
अगर आप भी उनमें से हैं जो केवल अपनी बात कहना चाहते हैं तो इस आदत में सुधार लाया जा सकता है। दूसरों को ध्यान व धैर्य के साथ सुनिए। इससे लोग आपको पसंद करते हैं। संबंध अच्छे होते हैं। नई जानकारी मिलती है। अच्छे श्रोता बनने की कोशिश करें।

और ज्यादा मुस्कुराइए
मुस्कान में एक जादू होता है। यह लोगों को अपना बना लेती है, सुंदरता बढ़ाती है और हमें अच्छा महसूस कराती है। नए साल पर खुद से वादा करिए कि हम जितना भी मुस्कुराते हैं, हर रोज उससे कहीं ज्यादा मुस्कुराएंगे...।


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ऑनलाइन नहीं ऑफलाइन में है फ्यूचर, इन कंपनियों ने शुरु किया बिजनेस, कमाया फायदा


ई-कॉमर्स इंडस्ट्री ने तेजी से तरक्की की और इसी कारण स्टार्टअप की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। अधिकतर स्टार्टअप का मानना रहा है कि ऑनलाइन बिजनेस ऑफलाइन बिजनेस से ज्यादा आसान और फायदेमंद हैं। लेकिन इस भ्रम को देश-विदेश की कई फेमस कंपनियों ने तोड़ा है। इनमें इंडियन कंपनी भी शामिल हैं। ऑनलाइन से ऑफलाइन बिजनेस की ओर जाने वाली इन कंपनियों ने ना केवल ऑफलाइन बिजनेस स्टार्ट किया बल्कि इसमें पार्ट में इंवेस्टमेंट भी बढ़ाया है। ऐसे यंग एंटरप्रेन्योर जिन्हें लगता है कि उनका बिजनेस आइडिया ऑफलाइन सैटअप में भी फायदेमंद हो सकता है उन्हें भी इस फंडे को समझना चाहिए।

दस साल बाद की ऑफलाइन में शुरुआत
स्पोर्ट्स सेगमेंट की जानी-पहचानी अमरीकन कंपनी ‘अंडर ऑर्मर’ ने दस साल बाद अपना पहला रिटेल स्टोर खोला था। वर्ष 1996 में शुरुआत के बाद कंपनी ने 2007 में ब्लाटिमोर में स्टोर खोलकर सभी को चौंका दिया था क्योंकि ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर कंपनी अच्छा परफॉर्म कर रही थी। फिर भी वह ऑफलाइन बिजनेस की तरफ गई। कंपनी को इसका फायदा भी मिला ना केवल उसका मार्केट बेस बढ़ा अपितु दुनिया के कई देशों में उसके रिटेल स्टोर खुले। आज ‘अंडर ऑर्मर’ के कनाडा और चीन सहित कई देशों में स्टोर हैं। इसलिए यदि आप भी स्टार्टअप आइडिया को ऑफलाइन ले जाना चाहते हैं ऐसी कंपनियों के सक्सेस मॉडल को अच्छे से समझकर अपना भी सकते हैं।

मिंत्रा भी अब ऑफलाइन
फ्लिपकार्ट की फैशन ब्रांच मिंत्रा ने भी ऑनलाइन सक्सेस के बाद ऑफलाइन स्टोर की शुरुआत की है। मिंत्रा ने बार्सिलोना के फैशन ब्रांड मैंगो के साथ स्टोर खोले हैं। मिंत्रा के मैंगो की पार्टनरशिप में फिलहाल 12 स्टोर हैं, जबकि 3 स्टोर उसके प्राइवेट ब्रांड रोडस्टार के नाम से हैं। वॉलमॉर्ट के स्वामित्व वाली मिंत्रा के और शहरों में स्टोर खोलने की योजना है।

इंडियन कंपनी ने भी चौंकाया
ऑनलाइन बिजनेस से शुरुआत करने वाली इंडियन आइवियर कंपनी ‘लेंसकार्ट’ ने भी ऑफलाइन बिजनेस मॉडल को अपनाया। वर्ष 2010 में ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से कंपनी की शुरुआत हुई। लेकिन जल्द ही इसके फाउंडर इसे ऑफलाइन बिजनेस की ओर भी ले गए। ऑफलाइन मॉडल सक्सेसफुल साबित हुआ है और नतीजतन आज कंपनी के 300 से अधिक स्टोर है। इनकी संख्या में बढ़ोतरी भी हो सकती है। कंपनी के फाउंडरों के अनुसार आने वाले दिनों में देश में ओर 400 स्टोर खोलने की कंपनी की योजना है। ‘लेंसकार्ट’ एक बड़ा उदाहरण है यंग एंटरप्रेन्योर के लिए जो सक्सेसफुल होने के बाद इंटरनेट बिजनेस मॉडल को ही फॉलो करते हैं।

डेनिम कंपनी रिप्ले ने भी की ऑफलाइन शुरुआत
इटली की डेनिम कंपनी रिप्ले भी इंडिया में ऑफलाइन बिजनेस की शुरुआत करने जा रही हैं। ब्रांड को यहां अच्छी पहचान मिलने के बाद कंपनी ने रिलायंस ब्रांड के साथ डील की है, जिसके बाद वह जल्द ही कंपनी मुम्बई से अपने ऑफलाइन बिजनेस की शुरुआत करेगी।

इन बातों का रखें ध्यान
यंग एंटरप्रेन्योर के लिए ऑनलाइन से ऑफलाइन बिजनेस में जाना इतना आसान नहीं होगा क्योंकि ऑफलाइन बिजनेस के लिए काफी इंवेस्टमेंट की आवश्यकता होती है। वहीं यदि आपने सही बिजनेस मॉडल को नहीं अपनाया तो आपको आर्थिक नुकसान का भी सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा आपके प्रोडक्ट की ऑनलाइन मांग कितनी है इसी रिसर्च को बेस बनाकर आप कोई निर्णय करें। विशेष बात यह है कि मिंत्रा या लेंसकार्ट जैसे सक्सेसफुल ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म को भी ऑफलाइन बिजनेस में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन मार्केट बेस बढ़ाने और अपने प्रोडेक्ट को छोटे शहरों तक पहुंचाने के लिए ऑफलाइन बिजनेस मॉडल पर विचार जरूर करना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार साइड स्विच करने में धैर्य और प्लानिंग की खासी जरूरत होती है, ऐसे में जल्दबाजी आपको नुकसान दे सकती है।


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