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Motivational Story : यह महिला अब तक दे चुकी है 700 से अधिक परीक्षा


परीक्षा का नाम सुनते हैं कई लोगों के पसीने छूटने लग जाते हैं, लेकिन बेंगलूरु की एक नौकरी पेशा महिला 700 से अधिक परीक्षा दे चुकी है। महिला का नाम पुष्पा एनएम है जो अपने खाली समय में 700 से अधिक दिव्यांग स्टुडेंट्स के लिए परीक्षा लिख चुकी है। उन्हें 2018 का नारी शक्ति पुरस्कार (Nari Shakti Puraskar) मिल चुका है। 31 वर्षीय पुष्पा की परीक्षा लिखने की कहानी वर्ष 2007 में शुरू हुई थी जब एक गैर सरकारी संगठन से जुड़ी उनकी एक मित्र ने दिव्यांग स्टुडेंट्स की ओर से उनकी परीक्षा लिखने का अनुरोध किया और वह इसके लिए तैयार हो गईं।

एक वेबसाइट को दिए साक्षात्कार में पुष्पा ने कहा कि मैं भी मुश्किल समय में बड़ी हुई हूं और परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पैसा हमारे लिए ज्यादा महत्व नहीं रखता है। किसी के लिए कुछ करना और उन्हें मुस्कुराते हुए देखने से संतुष्टि मिलती है। उन्होंने आगे बताया कि एक एनजीओ के पास रहने के चलते ऐसे लोगों से मुलाकात अक्सर होती रहती है। जब भी हो, मैं उनकी मदद करने की कोशिश करती हूं और परीक्षा लिखना उनमें से एक है।

एक घटना की याद करते हुए पुष्पा बताती हैं कि जब मैं सातवीं कक्षा में थी तो मुझे एहसास हुआ की मैं एक गरीब परिवार से आती हूं। उन्होंने आगे बताया कि मुझे परीक्षा हॉल से इसलिए बाहर निकाल दिया गया क्योंकि मेरे माता-पिता स्कूल फीस जमा नहीं कर पाए थे। हालांकि, हमारे बुरे वक्त में पड़ोसियों ने मदद की। कुछ सालों बाद जब में Pre-University Course की पढ़ाई कर रही थी, तब भी मुझे आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। तब एक दिव्यांग व्यक्ति ने मेरी मदद की।

हालांकि, बाद में उन्होंने किसी ने किसी तरीके से उन लोगों की मदद की, लेकिन इन घटनाओं ने पुष्पा के उस विश्वास को मजबूत किया जरूरतमंदों की यथासंभव मदद करना उनकी नैतिक जिम्मेदारी है। उनसे जब पूछा गया कि पिछले 12 सालों में कैसे स्टुडेंट्स की मदद की, इस पर उन्होंने बताया कि प्रति वर्ष 50 से 60 परीक्षा लिखती हूं, जो औसतन हर हफ्ते एक परीक्षा बैठती है।

उन्होंने कहा, हर परीक्षा मेरे लिए महत्वपूर्ण है और परीक्षा शुरू होने से पहले में हर छात्र-छात्रा से विशेष तालमेल बनाती हूं। परीक्षा 3 से 3.5 घंटे तक चलती है। जब मैंने परीक्षा लिखना शुरू की, तब मैं या तो छुट्टी ले लेती थी या अपनी शिफ्ट बदलवा लेती थी। परीक्षा लिखने के चलते जो समय में कंपनी को नहीं दे पाती थी, उसको में कंपनी को अधिक समय देकर पूरा करती थी और ऑफिस की ओर से मुझे पूरा सहयोग मिलता था।

पुष्पा ने बताया कि जब मैं ऐसे स्टुडेंट्स के लिए परीक्षा लिखती हूं तो मुझे बेहद खुशी होती है। उनके परीक्षा में नंबर भी अच्छे आते हैं। उन्होंने आगे बताया कि ऐसे बच्चों की परीक्षा लिखने में जो खुशी मिलती है, मुझे शायद याद नहीं की खुद की परीक्षा लिखते वक्त कभी मैं इतनी खुश रही हूं।


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अगर सप्ताह में 3 दिन छुट्टी मिले तो यह रिकॉर्ड तोड़ देंगे भारतीय!


अगर सप्ताह में सिर्फ 4 दिन ऑफिस जाना हो तो बाकी के तीन दिन आप क्या करेंगे? इस रोचक सवाल पर एक ताजा सर्वे में पाया गया कि यदि 4 दिन ही काम पर जाना पड़े तो 66 फीसदी भारतीय प्रोफेशनल्स नए स्किल (हुनर) सीखना चाहेंगे या अपनी हॉबी को समय देंगे।

अमरीका स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनी 'क्रोनोस' के 'फ्यूचर ऑफ वर्कप्लेस' सीरिज के तहत सर्वे में अधिकतर लोगों ने कुछ नया सीखने की इच्छा जाहिर की है जबकि बाकी लोग टीवी, सिनेमा और संगीत सुनने की चाह रखते हैं। सर्वे में ऑस्ट्रेलिया, कनाड़ा, फ्रांस, जर्मनी, भारत, मैक्सिको, ब्रिटेन और अमरीका के 3 हजार कर्मचारियों को शामिल किया गया।

भारत में क्रोनोस के मैनेजर जेम्स थॉमस के मुताबिक, यह चौंकाने वाला नहीं है कि युवा भारत नए हुनर सीखने के लिए अधिक मौकों की तलाश मे है। हालांकि इसे समझ पाना थोड़ा पेचीदा जरूर है कि उन्होंने परिवार संग छुट्टी बिताने की बजाय नए कौशल को प्राथमिकता देने का फैसला क्यों किया।

43 प्रतिशत विदेशी घूमने के इच्छुक
वैश्विक स्तर पर लोगों ने निजी जीवन में पांच सबसे बड़ी इच्छाओं को प्राथमिकता दी। इनमें 44 फीसदी लोगों ने परिवार के साथ समय बिताना, 43 प्रतिशत ने यात्रा करना, 33 प्रतिशत ने व्यायाम करना, 30 प्रतिशत ने दोस्तों के साथ समय गुजारना और 29 प्रतिशत हॉबी को समय देना चाहेंगे।

भारत के लोग हैं दुनिया में सबसे मेहनती
सर्वे के अनुसार, भारत के लोग सबसे मेहनती हैं। 69 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे सप्ताह में 5 दिन काम करना चाहेंगे, भले ही समान वेतन पर उन्हें इससे भी कम दिन काम करने की आजादी मिले। मैक्सिको में 43 और अमरीका में 27 प्रतिशत कर्मचारियों ने 5 दिन काम करने की इच्छा जाहिर की।

अंग्रेज आराम पसंद
सर्वे में शामिल ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका के अधिकतर कर्मचारियों ने 'अधिक सोने' की इच्छा जाहिर की है। मैक्सिको में अधिकतर लोगों ने कहा कि वे अपना समय टीवी, फिल्म देखने और गाने सुनने में बिताना चाहेंगे।


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कभी लोग उड़ाते थे मजाक, आज बन गई दूसरों की मददगार, जाने कहानी


एक बैले डांसर के लिए शारीरिक मापदंड बहुत मायने रखते हैं। अक्सर सपनों को पूरा करने के लिए शारीरिक क्षमताओं से भी आगे निकलना पड़ता है। न्यूयॉर्क के रोचेस्टर की रहने वाली 41 वर्षीय आएशा ऐश इससे भली-भांति परिचित हैं। पेशेवर बैले डांसर के रूप में खुद को साबित करने में उन्हें अरसा लग गया। अमरीका में गिनी-चुनी अश्वेत बैले डांसर हैं। लोगों की नकारात्मक टिप्पणियों ने ऐश के इरादे को और मजबूत कर दिया। उन्होंने खुद को साबित करने का पक्का इरादा किया। हर बार ज्यादा मजबूती के साथ उठ खड़ी हुईं।

18 की उम्र में पूरा हुआ सपना
उम्र के 18वें पड़ाव पर न्यूयॉर्क सिटी बैले क्लब में एकल, मुख्य और लीड रोल के रूप में बैले परफॉर्म करने का अवसर मिला। 2011 में उन्होंने ‘स्वान डांस प्रोजेक्ट’ के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की लड़कियों को बैले का प्रशिक्षण देना शुरू किया। वे बच्चों से कहती हैं कि जिंदगी में बहुत से मौकों पर ‘नहीं’ सुनना पड़ेगा लेकिन निराश होने की बजाय दोगुनी ताकत से अपने सपनों को पूरा करने पर ध्यान देना। एक दिन यही लोग आपके लिए खड़े होकर तालियां बजाएंगे।

जज्बे को मिला सम्मान
2016 में ऐश को अफ्रीकन-अमरीकन पेशेवर बैले डांसर और स्वान ड्रीम प्रोजेक्ट के तहत किए सामाजिक कार्यों के लिए सम्मानित किया गया। वे कहती हैं कि अगर आपने कोई सपना देखा है तो इसपर पूरी शिद्दत से भरोसा करो।


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पैसा बचाना चाहते हैं, तो इन आइडियाज से रहें दूर


सेविंग्स से जुड़े कुछ आइडियाज लोगों के बीच में इतने पॉपुलर हैं कि लोग इनकी सच्चाई जानने की कोशिश ही नहीं करते। इनमें से ज्यादातर आइडिया आपको महंगे ही साबित होते हैं। जानते हैं कुछ ऐसे आइडियाज के बारे में, जिनसे आपको बचकर ही रहना चाहिए।

स्टोर लॉयल्टी प्रोग्राम
कुछ स्टोर्स ग्राहकों को लॉयल्टी प्रोग्राम्स ऑफर करते हैं और वन टाइम ज्वॉइनिंग फीस चार्ज करते हैं। ग्राहक सोचता है कि खरीद पर मिले डिस्काउंट से ज्वॉइनिंग फीस की भरपाई हो जाएगी। लेकिन यह अच्छा आइडिया नहीं है, क्योंकि ज्यादातर लोग स्टोर से नियमित रूप से खरीदारी नहीं करते। इस तरह के प्रोग्राम्स के कारण आप छोटे डिस्काउंट या कैशबैक के चक्कर में स्टोर से शॉपिंग करने लगते हैं।

सेल में खरीद
भारत जैसे देश में लोग कोई भी सामान खरीदते समय कीमत पर सबसे ज्यादा ध्यान देते हैं। यहां पर सेल शब्द सबको आकर्षित करता है। गारमेंट शॉप या शूज आउटलेट पर आपको 50 से 60 फीसदी की छूट मिल जाती है, तो आप खुश हो जाते हैं। पर यहां से सामान खरीदने पर प्रोडक्ट में डिफेक्ट होने पर बाद में रिटर्न नहीं होता। कई बार सेल या डिस्काउंट के चक्कर में आप वह सामान भी खरीद लेते हैं, जिसकी आपको जरूरत नहीं होती।

कार की एक्सटेंडेड वारंटी
आमतौर पर सभी कारों में दो साल की वारंटी होती है। इससे खरीदार को व्हीकल में मैन्युफैक्चङ्क्षरग डिफेक्ट से सुरक्षा मिल जाती है। यह वारंटी कुछ राशि चुकाने पर एक साल के लिए बढ़ सकती है। यह बढ़ी हुई वारंटी शायद ही आपके कभी काम आए। अगर एक या दो साल में मैन्युफैक्चङ्क्षरग डिफेक्ट नजर नहीं आता है तो यह बाद में परेशान नहीं करता। व्हीकल को दो या तीन तक इस्तेमाल करने के बाद मैन्युफैक्चङ्क्षरग डिफेक्ट साबित करना भी मुश्किल हो जाता है।

रिवार्ड प्वॉइंट्स
क्रेडिट कार्ड कंपनियों को सबसे ज्यादा खुशी तब होती है, जब आप पैसे खर्च करते हैं क्योंकि इससे उन्हें ज्यादा बिल भेजने का मौका मिलता है। अगर आप इस बिल को पूरा नहीं भर पाते तो प्रति माह से 2 से 3 फीसदी का चार्ज लिया जाता है। कंपनियां आपको कार्ड से ज्यादा खर्च करने पर रिवार्ड प्वॉइंट्स का लालच भी देती हैं। इन प्वॉइंट्स को प्राप्त करने के लिए खरीदारी करना गलत है। खर्चे जरूरतों के हिसाब से होने चाहिए, न कि रिवार्ड प्वॉइंट्स के आधार पर।

ब्याज के लिए सेविंग अकाउंट्स
ज्यादातर बैंक सेविंग्स बैंक अकाउंट में आपके बैलेंस पर 4 फीसदी ऑफर करते हैं। यह आकर्षक लगता है, पर फिक्स्ड डिपॉजिट की तुलना में कम है। ज्यादा रेट के लिए आपको ज्यादा बैलेंस मैंटेन रखना पड़ता है। ऐसे में ज्यादा राशि से कम रिटर्न मिलता है। अगर बैंक बैलेंस पर ज्यादा रिटर्न चाहते हैं तो बैंक की फ्लेक्सी अकाउंट या स्विप इन अकाउंट सुविधा का फायदा लें। अगर बैलेंस निश्चित राशि से ज्यादा होगा तो यह अपने आप फिक्स्ड डिपॉजिट में बदल जाएगा।

बल्क में खरीदारी
महंगाई से लडऩे का उपाय है कि आप बल्क में सामान खरीदें। इकट्ठा सामान लेने पर आपको सामान की कीमत सही मिल जाती है। पर हर चीज के लिए यह आइडिया कारगर साबित नहीं होता। आलू और प्याज आप इकट्ठा खरीद सकते हैं, क्योंकि इन्हें कुछ दिनों तक स्टोर कर सकते हैं। टमाटर, गाजर, खीरा, मूली आदि चार या पांच दिन मुश्किल से चल पाते हैं। इसलिए इकट्ठा खरीदने पर ये सड़ सकते हैं। पालक, धनिया तो एक या दो दिन में ही बेकार हो जाते हैं।

शिपिंग चार्ज
ऑनलाइन रिटेलर प्रोडक्ट्स पर शानदार डिस्काउंट्स देते हैं, पर ये शिपिंग चार्ज भी लेते हैं। एक निश्चित राशि से ज्यादा का ऑर्डर करने पर शिपिंग चार्ज नहीं लिया जाता है। शिपिंग चार्ज 50 से 100 रुपए तक होता है। ज्यादातर ग्राहक शिपिंग चार्ज से मुक्ति पाने के लिए अपने ऑर्डर में कई छोटे सामान जोड़ते जाते हैं। अगर ये गैरजरूरी सामान हैं तो शिपिंग चार्ज बचाने के चक्कर में इनमें फिजूलखर्ची ज्यादा हो जाती है। आपको जिस सामान की जरूरत है, वही खरीदें।

सस्ता आइटम
अगर आपको कम कीमत पर कोई सामान मिलता है तो यह अच्छी बात है। पर कई बार कम कीमत के सामान की कोई वैल्यू नहीं होती और पैसे भी बर्बाद जाते हैं। अगर आप 600 रुपए का टाउजर लेते हैं तो यह थोड़े दिन में ही खराब हो जाता है। स्थापित कंपनी से अप्लायंस खरीदने का एक फायदा यह भी है कि आप बाद में स्पेयर पार्ट ले सकते हैं। कई बार छोटी कंपनी कुछ समय बाद बंद भी हो जाती हैं। ऐसे में मूल प्रोडक्ट को सुधरवाया भी नहीं जा सकता।


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Motivational Story : अभिनेत्री नहीं, सैन्य अधिकारी बन देश की सेवा करना चाहती थीं नंदा


बॉलीवुड में अपनी दिलकश अदाओं से अभिनेत्री नंदा ने लगभग तीन दर्शक तक दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया, लेकिन बहुत कम लोगो को पता होगा कि वह फिल्म अभिनेत्री न बनकर सेना में काम करना चाहती थीं। मुंबई में 8 जनवरी, 1939 को जन्मी नंदा के घर में फिल्म का माहौल था। उनके पिता मास्टर विनायक मराठी रंगमंच के जाने माने हास्य कलाकार थे। इसके अलावा उन्होंने कई फिल्मों का निर्माण भी किया था। उनके पिता चाहते थे कि नंदा फिल्म इंडस्ट्री में अभिनेत्री बने, लेकिन इसके बावजूद नंदा की अभिनय में कोई दिलचस्पी नहीं थी। नंदा महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस से काफी प्रभावित थीं और उनकी ही तरह सेना से जुड़कर देश की रक्षा करता चाहती थीं।

एक दिन का वाकया है कि जब नंदा पढ़ाई में व्यस्त थीं, तब उनकी मां ने उनसे कहा, तुम्हें अपने बाल कटवाने होंगे क्योंकि तुम्हारे पापा चाहते हैं कि तुम उनकी फिल्म में लड़के का किरदार निभाओ। मां की इस बात को सुनकर नंदा को काफी गुस्सा आया। पहले तो उन्होंने बाल कटवाने के लिए साफ तौर से मना कर दिया, लेकिन मां के समझाने पर वह इस बात के लिए तैयार हो गईं। फिल्म के निर्माण के दौरान नंदा के सर से पिता का साया उठ गया। इसके साथ ही फिल्म भी अधूरी रह गई। धीरे-धीरे परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी।

उनके घर की स्थित इतनी खराब हो गई कि उन्हें अपना बंगला और कार बेचने के लिए विवश होना पड़ा। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण नंदा ने बाल कलाकार फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया। बतौर बाल कलाकार उन्होंने मंदिर (1948), जग्गू (1952), शंकराचार्य (1954), अंगारे (1954) जैसी फिल्मों मे काम किया। वर्ष 1956 में अपने चाचा वी शांताराम की फिल्म 'तूफान और दीया' से नंदा ने बतौर अभिनेत्री अपने सिने करियर की शुरुआत की। हालांकि, फिल्म की असफलता के कारण वह कुछ खास पहचान नहीं बना पाई। फिल्म दीया और तूफान की असफलता के बाद उन्होंने राम-लक्ष्मण, लक्ष्मी, दुल्हन, जरा बचके, साक्षी गोपाल, चांद मेरे आजा, पहली रात जैसी बी और सी ग्रेड वाली फिल्मों में बतौर अभिनेत्री काम किया, लेकिन इन फिल्मों से उन्हें कोई खास फायदा नहीं पहुंचा।

उनकी किस्मत का सितारा निर्माता एल वी प्रसाद की वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म 'छोटी बहन' से चमका। इस फिल्म में भाई-बहन के प्यार भरे अटूट रिश्ते को रूपहले परदे पर दिखाया गया था। इस फिल्म में बलराज साहनी ने बड़े भाई और नन्दा ने छोटी बहन की भूमिका निभाई थी। शैलेन्द्र का लिखा और लता मंगेशकर द्वारा गाया फिल्म का एक गीत 'भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना' बेहद लोकप्रिय हुआ था। रक्षा बंधन के गीतों में इस गीत का विशिष्ट स्थान आज भी बरकरार है। फिल्म की सफलता के बाद नंदा कुछ हद तक फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गई।

फिल्म 'छोटी बहन' की सफलता के बाद उनको कई अच्छी फिल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए। देवानंद की फिल्म काला बाजार और हमदोनों, बी.आर. चोपड़ा की फिल्म 'कानून' खास तौर पर उल्लेखनीय है। फिल्म काला बाजार जिसमें नंदा ने एक छोटी सी, लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वही सुपरहिट फिल्म हमदोनों में उन्होंने देवानंद के साथ बतौर अभिनेत्री काम किया। वर्ष 1965 उनके सिने करियर के लिए अहम वर्ष साबित हुआ। इस वर्ष उनकी 'जब जब फूल खिले' प्रदर्शित हुई। बेहतरीन गीत-संगीत और अभिनय से सजी इस फिल्म की जबरदस्त कामयाबी ने अभिनेता शशि कपूर और गीतकार आनंद बख्शी और संगीतकार कल्याण जी. आनंद जी को शोहरत की बुंलदियां पर पहुंचाने के साथ ही नंदा को भी 'स्टार' के रूप में स्थापित कर दिया।

वर्ष 1965 में ही नंदा की एक और सुपरहिट फिल्म गुमनाम भी प्रदर्शित हुई। मनोज कुमार और नंदा की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म में रहस्य और रोमांस के ताने-बाने से बुनी मधुर गीत-संगीत और ध्वनि के कल्पनामय इस्तेमाल किया गया था। वर्ष 1969 में नंदा के सिने करियर की एक और सुपरहिट फिल्म 'इत्तेफाक' प्रदर्शित हुई। दिलचस्प बात है कि राजेश खन्ना और नंदा की जोड़ी वाली संस्पेंस थ्रिलर इस फिल्म में कोई गीत नहीं था। इसके बावजूद फिल्म को दर्शकों ने काफी पसंद किया और उसे सुपरहिट बना दिया।

वर्ष 1982 में नंदा ने फिल्म 'आहिस्ता आहिस्ता' से बतौर चरित्र अभिनेत्री फिल्म इंडस्ट्री में एक बार फिर से वापसी की। इसके बाद उन्होंने राजकपूर की फिल्म 'प्रेमरोग' और 'मजदूर' जैसी फिल्मों में अभिनय किया। दिलचस्प बात है इन तीनों फिल्मों मे नंदा ने फिल्म अभिनेत्री पदमिनी कोल्हापुरे की मां का किरदार निभाया था। वर्ष 1992 में नंदा ने निर्माता-निर्देशक मनमोहन देसाई के साथ परिणय सूत्र में बंध गई, लेकिन वर्ष 1994 में मनमोहन देसाई की असमय मृत्यु से नंदा को गहरा सदमा पहुंचा। दिलकश अदाओं से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाली नंदा 25 मार्च 2014 को इस दुनिया को अलविदा कह गईं।


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महिला होने के कारण नहीं मिली थी नौकरी, खड़ा कर दिया खुद का बिजनेस एम्पायर


दुनिया में ऐसी बहुत सी शख्सियत हैं, जिन्होंने आम सोच से परे जाकर अपनी आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों की परवाह न करते हुए छोटा सा कारोबार शुरू किया और आज वे मशहूर बिजनेस पर्सनैलिटी में शुमार हैं। बायो फार्मास्युटिकल कंपनी बायोकॉन की फाउंडर व चेयरपर्सन किरण मजूमदार शॉ भी ऐसी ही शख्सियत हैं। एक समय ऐसा भी था जब महिला होने के नाते कई लोग उनके साथ काम करने के लिए तैयार नहीं थे।

बेंगलूरु में जन्मी किरण ने जूलॉजी में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद इन्होंने ‘मॉल्टिंग और ब्रूइंग’ विषय पर ऑस्ट्रेलिया में बैलेरैट यूनिवर्सिटी से 1975 में हायर एजुकेशन की। इस दौरान उन्होंने मेलबर्न की ही कार्लटोन और यूनाइटेड ब्रुअरीज में ट्रेनी ब्रूअर के रूप में काम किया। उन्होंने कुछ समय तक कोलकाता के जूपिटर ब्रूअरीज लिमिटेड में टेक्निकल कंसल्टेंट के तौर पर काम किया। उन्हें बेंगलूरु में इसलिए जॉब नहीं मिली कि वह महिला थीं। उन्हें यह कहकर इनकार कर दिया जाता था कि ब्रूअर का काम पुरुष करते हैं, महिला नहीं। फिर किरण ने खुद बिजनेस करने की सोची।

1978 में बेंगलूरु में एक गैरेज किराये पर लेकर दस हजार रुपए में अपनी कंपनी शुरू की। शुरुआती दौर में उन्हें अपनी कम उम्र, जेंडर और बिना परखे गए बिजनेस मॉडल के कारण क्रेडिबिलिटी संबंधी तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि उन्हें उस समय ऐसे लोग ढूंढना मुश्किल हो गया था, जो फीमेल बॉस के साथ काम कर सकें। 40 कैंडिडेट से मिलने के बाद वह अपने पहले स्टाफ मेंबर को हायर कर सकीं, वह भी एक रिटायर गैरेज मैकेनिक। अपने बिजनेस के लिए शुरूआती पूंजी जुटाना भी उनके लिए पहाड़ खोदने जैसा था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

आखिरकार एक बैंक उन्हें लोन देने को तैयार हो गया। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा उनके बिजनेस पर बढऩे लगा। उसके बाद किरण नहीं रुकीं। अपनी मेहनत और लगन की बदौलत वह अपनी कंपनी को लगातार आगे बढ़ाती गईं। आज वह सफल उद्यमी हैं और उन्हें कई अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है।


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शिक्षा में समाज को बदलने, बुराइयों से लडऩे की ताकत : आनंद कुमार


चर्चित कोचिंग संस्थान सुपर 30 के संस्थापक आनंद कुमार ने सऊदी अरब में प्रवासी बिहारियों से समाज में शिक्षा का प्रकाश फैलाने में अपना योगदान देने का आह्वान करते हुए कहा है कि शिक्षा में अकेले ही समाज को बदलने और सभी बुराइयों से लडऩे की ताकत है। आनंद कुमार रियाद में बिहार फाउंडेशन के सऊदी अरब चैप्टर द्वारा शुक्रवार को आयोजित 'बिहार दिवस समारोह' में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। बिहार फाउंडेशन की तरफ से जारी बयान के अनुसार, आनंद ने कहा शिक्षा से व्यक्ति आत्मविश्वास से भर जाता है और वह सही समय पर सही निर्णय ले सकता है।

कुमार ने संपन्न लोगों से शिक्षा के क्षेत्र में मदद के लिए आगे आने की अपील करते हुए कहा कि समाज के संपन्न लोगों की जिम्मेदारी है कि जरूरतमंद तबके तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने के बारे में विचार करें। बयान के अनुसार, उन्होंने कहा, बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में जरूरतमंदों के लिए शिक्षा को सुविधाजनक बनाने से ज्यादा कुछ भी संतोषजनक नहीं है। यहां प्रत्येक समर्थवान प्रवासी बिहारी इस क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकता है।

बयान के अनुसार, बिहार फाउंडेशन सऊदी अरब चैप्टर के अध्यक्ष ओबैदुर रहमान ने आनंद कुमार को आश्वासन दिया कि निकट भविष्य में सुपर 30 की तर्ज पर यहां भी जरूरतमंद छात्रों की मदद करने के लिए एक संस्थान प्रारंभ किया जाएगा। उन्होंने इसके लिए आनंद से सहयोग की अपील की। शिक्षा से संबंधित किसी भी कार्यक्रम के लिए सभी मदद का आश्वासन देते हुए आनंद ने कहा कि वर्तमान समय में पूरी दुनिया में ज्ञान ही वास्तविक सशक्तिकरण का माध्यम है।

सुपर 30 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराने के लिए चर्चित संस्थान है। आनंद के जीवन पर 'सुपर 30Ó नामक एक बायोपिक बनाई जा रही है, जिसमें बालीवुड अभिनेता रितिक रोशन मुख्य भूमिका में हैं। आनंद ने कहा कि आगामी 26 जुलाई को रिलीज होने वाली फिल्म दुनिया के तमाम मेहनती शिक्षकों तथा छात्रों को समर्पित है, जिन्होंने कठिनतम बाधाओं के बावजूद अपनी कोशिशें जारी रखीं हैं।


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बिहार के छोटे से गांव से पहुंचे जर्मनी, इस तरह हुए वर्ल्ड फेमस


‘क्या आपने कभी ऑनलाइन होटल सर्च किया है’ ये वह पंचलाइन है, जिसने ट्रिवागो के साथ उसके विज्ञापन में आने वाले मॉडल अभिनव कुमार को फेमस किया है। अभिनव कोई प्रोफेशनल मॉडल नहीं है। वे होटल सर्च इंजन ट्रिवागो के इंडिया के कंट्री हैड हैं। बिहार के लखीसराय जिले के बड़ैया के रहने वाले अभिनव वर्तमान में जर्मनी के डुसलडॉफ में रहते है। अभिनव का जर्मन कंपनी ट्रिवागो के इंडियन कंट्री हैड बनने का सफर इंडिया के मिडिल क्लास यूथ के लिए एक इंस्पीरेशन है।

साधारण परिवार से बने सेलेब्रिटी
साधारण परिवार में जन्मे अभिनव ने हाल में कहा था कि बिहार में रहने वाले उनके पिताजी ने दस वर्ष बाद उनसे फोन पर बात की है। टीवी के जरिए फेमस होने वाले अभिनव के पिताजी को उनकी लोकप्रियता का अंदाजा तब हुए जब बिहार के डेली न्यूजपेपर ने उनकी स्टोरी पब्लिश की। इसके बाद पिताजी को यह पता लगा कि अभिनव होटल इंडस्ट्री में काम नहीं करते बल्कि एक कंपनी के हैड हैं।

बिना एमबीए किए बने बेस्ट प्रबंधक
अभिनव कुमार के परिवार में उनके माता-पिता के अलावा एक भाई व एक बहन भी है। अभिनव ट्रिवागो के कंट्री हैड हैं लेकिन उन्होंने एमबीए नहीं किया है। पटना से स्कूली शिक्षा व पुणे से बैचलर डिग्री हासिल की है। उनका कहना है कि वे एमबीए स्टूडेंट्स की भीड़ में शामिल नहीं होकर कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे उनकी अलग पहचान बने। अभिनव ने कई मशहूर एनजीओज के लिए भी काम किया है।

विदेशों के बाद देश में दिखाया दम
इटली की एक यूनिवर्सिटी से अभिनव ने स्कॉलरशिप हासिल की। अभिनव को जॉब सर्च के दौरान ट्रिवागो के बारे में पता चला। वर्ष 2012 में वह जर्मनी चले गए और ट्रिवागो से जुड़े। इसके बाद वर्ष 2016 में कंपनी के ब्रांड मार्केटिंग हैड ने अभिनव से इंडियन कमर्शियल में काम करने के लिए कहा। जिसके बाद ट्रिवागो के विज्ञापन में वह दिखाई देने लगे।


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12वीं पास के लिए ये हैं शानदार कॅरियर ऑप्शन्स, कमा सकते हैं लाखों महीने


इन दिनों राज्यों, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भाषा की अलग पहचान होती जा रही है। भाषा की वजह से अब लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। यही वजह है कि स्कूलों के अलावा कॉलेजों, संस्थानों, कार्यालयों और यूनिवर्सिटी आदि में भी भाषा विशेषज्ञ यानी लैंग्वेज एक्सपर्ट की मांग में इजाफा देखा जा रहा है। ऐसे में जिनकी पकड़ विशेष भाषा पर मजबूत होती है उनके लिए कॅरियर के अनेक विकल्प मौजूद हैं। जानें इस क्षेत्र के बारे में -

कोर्स व आवश्यक योग्यता
किसी भी भाषा के एक्सपर्ट के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं तो इसके लिए आपके पास न्यूनतम योग्यता 12वीं कक्षा पास होना अनिवार्य है। कला संकाय में लैंग्वेज कोर्स के तहत विभिन्न भाषा में ग्रेजुएशन और ऑनर्स कर सकते हैं। विदेशी भाषा में भी संबंधित योग्यता प्राप्त की जा सकती है। कोर्सेज की बात करें तो इस फील्ड में सर्टिफिकेट कोर्स के अलावा डिप्लोमा, शॉर्ट टर्म कोर्स, डिस्टेंस लर्निंग कोर्स आदि कर किसी भी लैंग्वेज के एक्सपर्ट बन सकते हैं। ग्रेजुएशन के अलावा पोस्ट ग्रेजुएशन डिग्री भी हासिल की जा सकती है।

कॅरियर के विकल्प
टूरिज्म, एम्बेसीज, डिप्लोमेटिक सर्विस, पब्लिक रिलेशंस, मास कम्युनिकेशन, पब्लिशिंग, इंटरप्रिटेशन आदि के क्षेत्र हैं। यहां ऑनलाइन कंटेंट राइटर, टेक्नीकल ट्रांसलेटर या डीकोडर, ट्रांसलेटर, प्रूफ रीडर, पब्लिशिंग आदि पदों पर कार्य किए जा सकते हैं। कई कॉर्पोरेट ऑफिसेज में फ्रेंच, जर्मन, रशियन, चाइनीज, जापानी, स्पेनिश, कोरियन, पुर्तगीज के जानकारों को भी नियुक्त किया जाता है। फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ), यूनाइटेड नेशंस ऑर्गेनाइजेशन (यूएनओ) में भी मौका मिल सकता है ।

सैलेरी पैकेज
विभिन्न विदेशी और प्रादेशिक भाषाओं के जानकारों की सैलेरी उनके काम और संस्थान पर निर्भर करता है। वहीं किसी कॉर्पोरेट कंपनी के पीआर या अन्य पद पर कार्य करने पर 30 से 50 हजार रुपए तक मिलते हैं। शिक्षण क्षेत्र में 15 से 25 हजार और इंटरप्रिटर के रूप में प्रति घंटा दो से चार हजार रुपए कमाए जा सकते हैं। घर बैठे ट्रांसलेटर का काम कर प्रति लेख के अनुसार पैसा मिल जाता है।

इन भाषाओं की बढ़ रही है डिमांड
फ्रेंच, स्पेनिश, जर्मन, इटेलियन, लेटिन अमरीकन, पुर्तगीज, इंग्लिश, पर्शियन, संस्कृत, उर्दू, मराठी, नेपाली, तेलुगू, मंदारिन (चीनी) समेत आदि भाषाओं की डिमांड बढ़ गई है।

यहां से ले सकते हैं शिक्षा
(1) स्कूल ऑफ फॉरेन लैंग्वेज, नई दिल्ली
(2) डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेन लैंग्वेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी
(3) बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी


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डिजिटल खेती में बनाए कॅरियर, फटाफट कमा सकते हैं पैसा


कृषि क्षेत्र में बढ़ती समस्याओं और अनिश्चितताओं के बीच डिजिटल खेती को एक बेहतर विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। खर्चीला होने के बावजूद भारत सहित कई एशियाई देशों में इसकी ओर किसानों का रुझान बढ़ रहा है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, गुजरात जैसे राज्यों में कई प्रगतिशील किसान डिजिटल खेती कर रहे हैं। रोबोट, ड्रोन,जीपीएस प्रणाली आदि के प्रयोग से कई देश स्मार्ट खेती को बढ़ावा दे रहे हैं।

डिजिटल खेती में बुवाई से लेकर कटाई तक की प्रक्रिया को बढ़ावा देने सहित लगभग हर जानकारियां शामिल हैं। हाल ही में एक शोध रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्मार्ट खेती बाजार के 2022 तक 1.64 लाख करोड़ रुपए के आंकड़े को छूने की उम्मीद है। इतना ही नहीं 2017 से 2022 तक लगभग 20 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर भी देखी जा रही है।

क्या है डिजिटल खेती
डिजिटल खेती में स्वत: काम करने वाले यंत्र, ड्रोन, जीपीएस और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) जैसी तकनीकों की मदद से खेती की जाती है। यूरोप, पश्चिमी एशिया, लेटिन अमरीका और अमरीका में इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। नई तकनीकों और उपकरणों के इस्तेमाल के चलते इसमें शुरुआती लागत तो ज्यादा आती है, पर लंबे समय में खेती की लागत काफी घट जाती है।

क्यों है इसकी जरूरत
कृषि में प्रौद्योगिकी और डिजिटलीकरण के लाभ अनुमान से अधिक हैं। इससे मिट्टी की घटती उर्वरता और खादों व कीटनाशकों के बेजा इस्तेमाल जैसी समस्याओं से निजात मिल सकती है। संसाधनों की भी बचत होती है। खेती का तकनीक आधारित प्रबंधन ने किसानों का समय बचाने व खेती की अनिश्चितताओं को भी कम किया है।

क्या है मौजूदा समस्या
जलवायु परिवर्तन और आबादी का बढ़ता आंकड़ा मौजूदा कृषि के लिए बड़ी समस्या है। किसान अब भी पुराने तरीके से खेती कर रहे हैं। जिससे उन्हें परिस्थितियों के अनुकूल प्रयोगों के बारे में जानकारी नहीं हो पाती है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 तक कृषि ड्रोन का बाजार 70.99 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। इी तरह अकेले अमरीका में ही स्मार्ट खेती पर अंदाजन 05.82 लाख करोड़ रुपए 2015-25 तक खर्च किए जाएंगे।


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कम पैसों में शुरू करें ये बिजनेस, फटाफट कमाएंगे मुनाफा, जानिए क्या हैं राज


ट्रेडिशनल बिजनेस अब नए इनोवशन के साथ बतौर स्टार्टअप सामने आ रहे हैं। इसमें फ्लोरीकल्चर और ओरनामेंटल प्लांट का स्टार्टअप भी ट्रेंडिंग लिस्ट में सम्मलित है। वर्ष 2018 में इंडियन फ्लोरीकल्चर का मार्केट 157 बिलियन डॉलर का रहा है, जिसके वर्ष 2024 तक 472 बिलियन डॉलर का होने का अनुमान है। स्टार्टअप के आइडिया तलाश रहे एस्पायरिंग एंटरप्रेन्योर के लिए फ्लोरीकल्चर बिजनेस में असीमित संभावनाएं है, जिसमें फ्लावर कल्टीवेशन से लेकर टिशू कल्चर, पैकेजिंग भी शामिल हैं।

इंडियन फ्लावर्स की डिमांड
फ्लोरीकल्चर में ग्रोथ का सबसे बड़ा कारण है इंडियन फ्लावर्स की अमरीका, यूके, नीदरलैंड, जर्मनी और सऊदी अरब में डिमांड बढ़ रही है। पिछले वर्ष पुणे में आयोजित 13वें इंटरनेशनल फ्लोरा एक्सपो में 100 से अधिक देशों के विजिटर सम्मलित हुए। एक्सपो में इंडिया के फूल उत्पादक बेहतरीन प्रोडेक्ट के साथ आए। बीते दो वर्ष में इंडियन फ्लोरीकल्चर सेक्टर में अनऑर्गनाइज रूप से एंटरप्रेन्योर की संख्या में भी इजाफा हुआ है।

सेक्टर सलेक्शन में सावधानी
फ्लावर और ओरनामेंटस प्लांट के सेक्टर में स्टार्टअप की शुरुआत करने से पूर्व इसके बारे में रिसर्च करने की आवश्यकता है क्योंकि कल्टीवेशन के सेक्टर में अधिक इंवेस्टमेंट की जरुरत होती है। जबकि इसके रिटेल सेक्टर में जाने से पूर्व एक एंटरप्रेन्योर को ट्रेंडिंग फ्लावर और उसके मार्केट में जानकारी होना जरूरी है। इसके अलावा रिलायंस जैसे बड़े समूह भी इस सेक्टर में निवेश को लेकर रुचि दिखा रहे हैं। इसलिए एस्पायरिंग एंटरप्रेन्योर एक बेहतर प्लान के साथ ऐसे निवेशकों के पास जा सकते हैं। फ्लावर कल्टीवेशन से जुड़े लोगों का कहना है कि इंडियन सीड वाले रेड फ्लावर की डिमांड तेजी से बढ़ी है।

ऑनलाइन रिटेलर्स की है कमी
इंडियन फ्लावर इंडस्ट्री ने इस वर्ष वैलेंटाइन डे ने इस वर्ष बीते वैलेंटाइन के मुकाबले 15 प्रतिशत अधिक कारोबार किया है। जबकि एक्सपर्ट का मानना है कि यदि इस सेक्टर में ऑनलाइन रिटेलर्स की संख्या में इजाफा हो तो यह सेक्टर और अधिक तेजी से ग्रो करेगा। वहीं कॉम्पीटीशिन बढऩे से जो फ्लावर बंच वर्तमान में 250-350 रुपए के बीच ऑफलाइन मिल रहा है इसकी कीमत में काफी कमी आएगी। इससे कस्टमर की संख्या में तेजी से इजाफा होगा। वहीं ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से होम डिलीवरी की सर्विस मिलने और ऑफर की सुविधा भी कस्टमर बेस बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है।

मिल रही है भरपूर इंवेस्टर अटेंशन
फ्लो रीकल्चर मार्केट की फ्यूचर ग्रोथ पर इसलिए भी अधिक बात की जा रही है कि गवर्नमेंट भी इस सेक्टर को लेकर पॉजिटिव रुख दिखा रही है। इस कारण आईटीसी, थापर ग्रुप, टाटा ग्रुप जैस बिग कॉर्पोरेट के ऐसे स्टार्टअप में इंवेस्टमेंट को लेकर बात की जा रही है। वहीं एफडीआई के जरिए इस सेक्टर में 100 प्रतिशत निवेश की छूट भी विदेशी निवेशकों को इंडियन फ्लोरीकल्चर की ओर तेजी से आकर्षित कर रही है।


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Motivational Story : 8 साल संघर्ष करने के बाद 'एक दो तीन' गाने से पहचान मिली अलका याज्ञनिक को


आकाशवाणी कोलकाता से अपने करियर की शुरुआत करके शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचने वाली बॉलीवुड की सुप्रसिद्ध पाश्र्वगायिका अलका याज्ञनिक अपने गानों से आज भी श्रोताओं के दिलों पर राज कर रही हैं। अलका का जन्म कोलकाता में 20 मार्च, 1965 को एक मध्यम वर्गीय गुजराती परिवार में हुआ। उनकी मां शुभा याज्ञनिक शास्त्रीय संगीत गायिका थी।

घर में संगीत का माहौल होने के कारण उनकी रूचि भी संगीत की ओर हो गई और वह महज छह वर्ष की उम्र से ही अपनी मां से संगीत की शिक्षा लेने लगीं। अलका ने पाश्र्वगायिका के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत महज छह वर्ष की उम्र में कोलकाता आकाशवाणी से की जहां वह भजन गाया करती थीं।

जब वह महज 10 वर्ष की थीं तभी उनकी मां उन्हें लेकर मुंबई आ गई, जहां उनकी मुलाकात महान निर्माता-निर्देशक राजकपूर से हुई। राजकपूर ने अलका के गाने से प्रभावित होकर उन्हें संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से मिलने की सलाह दी। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल भी अलका के पाश्र्वगायन से काफी प्रभावित हुए और उनसे कहा कि अभी उनकी उम्र अभी काफी कम है। वह अभी बतौर डबिंग कलाकर काम कर ले बाद में वयस्क होने पर वे उन्हें पाश्र्वगायिका के रूप में काम करने का मौका देंगे।

अलका ने पाश्र्वगायिका के रूप में अपने सिने कैरियर की शुरुआत 1979 में प्रदर्शित फिल्म 'पायल की झंकार' से की। इस फिल्म में उन्हें एक गीत की कुछ पंक्तियां गाने का अवसर मिला। इसके बाद उन्हें फिल्म 'हमारी बहू अलका' में भी पाश्र्वगायन का अवसर मिला, लेकिन कमजोर पटकथा और दोयम दर्जे के संगीत के कारण यह फिल्म टिकट खिड़की पर असफल साबित हुई। लगभग दो वर्ष तक मुंबई में रहने के बाद अलका पाश्र्वगायिका बनने के लिए संघर्ष करने लगीं।

आश्वासन तो सभी देते, लेकिन उन्हें काम करने का अवसर कोई नहीं देता था। इस बीच उनको 1981 में प्रदर्शित फिल्म 'लावारिस' में पाश्र्वगायन का मौका मिला। अमिताभ बच्चन अभिनीत इस फिल्म में अलका ने 'मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है' गीत गाया जो श्रोताओं के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। इस गीत की सफलता के बाद अलका पाश्र्वगायिका के रूप में कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गईं, लेकिन उन्हें अब तक वह मुकाम हासिल नहीं हुआ था जिसके लिए वह सपनों के शहर मुंबई आई थीं।


लगभग आठ वर्ष तक मुंबई में संघर्ष करने के बाद 1988 में एन. चंद्रा की अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित अभिनीत फिल्म 'तेजाब' में अपने गीत 'एक दो तीन' की सफलता के बाद वह पाश्र्वगायिका के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गईं। वर्ष 1989 में उनके सिने करियर की एक और सुपरहिट फिल्म 'कयामत से कयामत तक' प्रदर्शित हुई जिसमें उन्होंने उदित नारायण के साथ 'ऐ मेरे हमसफर', 'अकेले हैं तो क्या गम है' और 'गजब का है दिन सोंचो जराÓ, जैसे सुपरहिट युगल गीत गाए जो श्रोताओं के बीच काफी लोकप्रिय हुए।

इन फिल्मों की सफलता के बाद अलका को कई अच्छी फिल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए। वर्ष 1994 उनके सिने कैरियर का अहम वर्ष साबित हुआ। इस वर्ष उनकी सुपरहिट फिल्म 'हम हैं राही प्यार के' प्रदर्शित हुई। इस फिल्म के लिए उन्हें पहली बार सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायिका राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके बाद 1999 में प्रदर्शित फिल्म 'कुछ कुछ होता है' के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अलका अपने सिने कैरियर में अब तक सात बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित की जा चुकी हैं।

माधुरी दीक्षित, श्रीदेवी, काजोल और जूही चावला जैसी नामचीन अभिनेत्रियों की आवाज कही जाने वाली अलका ने तीन दशक से भी ज्यादा लंबे कैरियर में हिन्दी के अलावा अवधी, गुजराती, उडिय़ा, राजस्थानी, नेपाली, बंगला, भोजपुरी, पंजाबी, मराठी, तेलुगू, तमिल, मणिपुरी, अंग्रेजी और मलयालम फिल्मों के गीतों के लिए भी अपना स्वर दिया है। वह अब तक लगभग 600 फिल्मों के लिए लगभग 20 हजार गीत गा चुकी हैं। वह आज भी फिल्म और संगीत जगत को अपनी दिलकश आवाज के जरिए सुशोभित कर रही हैं।


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मोबाइल एप्लीकेशन आपके बिजनेस को दे सकते हैं पंख, जानें कैसे


ग्लोबली करंट एक्टिव इंटरनेट यूजर्स की संख्या 450 करोड़ से भी अधिक है, जिनमें मोबाइल इंटरनेट यूजर्स 300 करोड़ हैं। वर्ष 2021 तक मोबाइल इंटरनेट यूजर्स की संख्या में 18 फीसदी से अधिक बढ़ोतरी होने की संभावना है। एक्टिव मोबाइल यूजर्स की बढ़ती संख्या स्टार्टअप की ग्रोथ में भी अहम भूमिका निभा रही है। 80 फीसदी मोबाइल यूजर्स दिन का आधा समय मोबाइल एप्लीकेशन के उपयोग में बिताते हैं। इसलिए एक स्टार्टअप के लिए मोबाइल एप की खास भूमिका है। आपके बिजनेस का साइज कितना भी हो लेकिन एक बेहतर मोबाइल एप इसे परफेक्ट ग्रोथ प्रदान कर सकती है। दुनियाभर की एप डवलपमेंट एजेंसिंयों का भी मानना है कि बीते चार वर्षों में मोबाइल एप डवलप कराने वाले स्टार्टअप की संख्या में 18 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई है जो कि नए एंटरप्रेन्योर के लिए अच्छा संकेत है।

जरूरी है मोबाइल एप
मो बाइल एप न केवल आपके बिजनेस की ग्रोथ के लिए आवश्यक है, बल्कि ब्रांड प्रजेंस, पुश नोटिफिकेशन, यूजर्स इंटरेस्ट इंफॉर्मेशन के साथ तुरंत अपडेशन मोबाइल एप की इंपोर्टेंस को बढ़ाते हैं। एक वेब पेज डाउनलोड होने में जितना टाइम लेता है, उससे आधे समय में मोबाइल एप ओपन हो जाती है। इसलिए युवाओं के बीच में एप की सक्सेस रेट अधिक है।

समय अधिक व्यतीत
कॉमर्स से लेकर हेल्थ, इंश्योरेंस, एग्रीटेक, लॉजिस्टिक, फूड, ट्रांसपोर्ट सहित अन्य सेक्टर में काम कर रही कंपनियों के लिए यह जानना आवश्यक है कि बीते एक वर्ष के दौरान मोबाइल एप पर लोगों ने 57 फीसदी अधिक समय बिताया। यंग एंटरप्रेन्योर के लिए जरुरी है कि वे अपने स्टार्टअप की ग्रोथ के लिए मोबाइल एप का इस्तेमाल करें।


लगातार बढ़ रही है संख्या
गूगल के प्ले स्टोर और एप्पल स्टोर में मोबाइल एप की संख्या लगातार बढ़ रही है। दिसंबर 2018 तक गूगल प्ले स्टोर में एप की संख्या 2.6 मिलियन थी। वहीं एप्पल स्टोर में यह नंबर 2.2 मिलियन के करीब रहा। जबकि ई-कॉमर्स या अन्य बिजनेस सेक्टर की एप इनकी तुलना में आधी ही डाउनलोड की जाती है। बिजनेस व सर्विस सेक्टर की मोबाइल एप में इंटरेस्टिंग फीचर लगातार एड हो रहे हैं। आने वाले दिनों में इनके डाउनलोड की संख्या में बढ़ोतरी होने की संभावना है।

प्लानिंग के साथ करें काम
मो बाइल एप बशर्ते बिजनेस के लिए फायदेमंद है लेकिन वेब की तुलना में यह खर्चीला साधन है। इसलिए आप इस बात का ध्यान रखें कि आप जिस सेक्टर में काम कर रहे है वहां टारगेट कस्टमर का बिहेवियर क्या है? इसके अलावा यदि आपके कॉम्पिटिटर्स मोबाइल एप का इस्तेमाल कर रहे हैं तो किस तरह के फीचर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। मोबाइल एप एक लगातार अपडेट होने वाला प्लेटफॉर्म है। यदि आपकी ओर से उस पर लगातार एक्टिविटी नहीं होगी तो इस बात की पूर्ण संभावना है कि यूजर जल्द ही उसे डिलीट या अनस्टॉल कर दें। मोबाइल एप की सर्विस स्टार्ट करने से पूर्व इस अपने बजट का आकलन जरुर कर लें।


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गूगल ट्रांसलेट का किया अनोखा प्रयोग, विदेशी युवती को अपनों से मिलवाया इन दोस्तों ने


तीन दोस्तों-कुणाल, आशीष और प्रिया ने छह घंटे की मशक्कत कर रविवार को गुलाबीनगर घूमने आई, लेकिन अपनों से बिछड़ी चीनी महिला को मिलवा दिया। दुकान पर चाय पी रहे तीनों ने जब रोती हुई चीनी महिला को देखा तो उन्हें उसके खोने का पता चला। तीनों ने गूगल ट्रांसलेटर की मदद लेकर मोबाइल पर चाइनीज की बोर्ड खोला और महिला की बातें समझ उसके ठिकाने पहुंचा दिया। शनिवार शाम बापू बाजार से महिला अपने साथियों से बिछड़ गई थी। महिला पर्यटक के लापता होने के बाद कमिश्नरेट पुलिस में भी खलबली मच गई थी। उसके बाद से ही उसे तलाशा जा रहा था।

एडिशनल डीसीपी नॉर्थ धर्मेन्द्र सागर ने बताया कि विदेशी महिला लूओक्सी शनिवार शाम को बापू बाजार में कपड़े खरीदने आई। वहां उसे तीन चीनी पर्यटक और मिल गए। तभी उसका मोबाइल खराब हो गया। महिला ने चौड़ा रास्ता में ही एक शॉप पर अपना मोबाइल रिपेयर करवाने के लिए दे दिया। उसके बाद वह रास्ता भटक कर पैदल सिंधी कैम्प पहुंच गई। वहां एक लडक़े ने होटल में कमरा दिलवा दिया। रात तक जब महिला अपने होटल नहीं पहुंची तो उसके साथियों ने माणक चौक थाने में पहुंचकर सूचित किया।

अभय कमान पर रात पर निगरानी रखती रही पुलिस
विदेशी पर्यटक के खो जाने पर पुलिस कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव के निर्देश पर पुलिस महकमे ने रात पर सर्च अभियान किया। अभय कमान सेंटर में रात भर चौड़ा रास्ता, नेहरू बाजार और अन्य जगहों पर लगे कैमरों पर सुबह तक निगरानी रखी। पुलिस ने महिला की खोज में होटल, धर्मशाला, रैन बसेरे, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड पर सर्च अभियान किया। वायरलैस सेट पर रात भर विदेशी महिला को ढूंढने का मैसेज चलता रहा। महिला रविवार को सिंधी कैम्प होटल से निकली और पैदल ही चौड़ा रास्ता पहुंची। वहां चाय दुकान पर तीन छात्र कुणाल, आशीष और प्रिया चाय पी रहे थे। विदेशी महिला उनके पास गई और रोने लग गई।

भाषा को समझा, फिर पुलिस तक पहुंचाया
कुणाल, आशीष और प्रिया ने बताया कि सुबह दस बजे वे तीनों चौड़ा रास्ता स्थित दुकान चाय पी रहे थे। वहां उन्हें रोती हुई महिला मिली। महिला को अंग्रेजी नहीं आती थी। हमने मोबाइल पर गूगल ट्रांसलेटर पर चायनीज की-बोर्ड डाउनलोड किया। महिला उस पर चायनीज में लिखती और इंग्लिश में ट्रांसलेट होता। तब उसने पूरी बात बताई। महिला के साथ हम अलग-अलग गाड़ी से चौड़ा रास्ता मोबाइल की दुकान पर गए, वहां से उसका मोबाइल लेकर रायसर प्लाजा पहुंचे। उसे नया मोबाइल दिलवाया। नए मोबाइल में सिम लगाकर उसके दोस्तों से बात करने का प्रयास किया, लेकिन बात नहीं हो पाई। इसके बाद हम महिला को चौड़ा रास्ता स्थित पर्यटक सहायता केंद्र लेकर जा रहे थे तभी नेहरू बाजार के पास पुलिस पहुंच गई और वे सभी को थाने लेकर आ गए। पुलिस ने सभी को धन्यवाद दिया।

15 मार्च को आई थी जयपुर
विदेशी महिला ग्रुप के साथ मुंबई, उदयपुर, जोधपुर, जैसलमेर होते हुए 15 मार्च को जयपुर घूमने आईं। महिला अपने ग्रुप के साथ सी-स्कीम में एक होटल में ठहरी हुईं थी।


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20 वर्ष तक नहीं हुए बच्चे तो पेड़ों को ही बना लिया बेटा, आज है 8000 बेटे


राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद शनिवार को जब कर्नाटक की पर्यावरणविद् सालुमारदा थिमाक्का को पद्मश्री दे रहे थे, तो बरबस ही सबकी आंखें उस पल पर जाकर टिक गईं, जब 107 वर्षीय दादी के हाथ राष्ट्रपति के सिर पर आशीर्वाद के लिए उठ गए। उन्होंने समारोह में राष्ट्रपति को आशीर्वाद दिया।

पेड़ों की मां के नाम से चर्चित थिमाक्का ने अपनी पूरी जिंदगी दरअसल पेड़ों को पालने-पोसने में ही खपा दी। अभी तक की जिंदगी में उन्होंने करीब 8,000 पेड़ लगा डाले और सिर्फ लगाए ही नहीं, बल्कि उन्हें बच्चों की तरह पाल-पोषकर बड़ा भी किया। इसमें सबसे उल्लेखनीय उनका काम करीब 400 बरगद के पेड़ लगाना रहा। ये पेड़ हुल्लूर और कुदूर के बीच हाइवे पर करीब 4 किमी के दायरे में फैले हुए हैं।

यहां से गुजरने वाला हर शख्स एक बार जरूर धरती की हरियाली बढ़ाने वाली इस दादी का शुक्रगुजार जरूर हो जाता है, क्योंकि गर्मियों में सडक़ के किनारे लगे बरगद पेड़ छांव तो देते ही हैं, हाइवे की खूबसूरती भी बढ़ाते हैं।

खुदकुशी कर रही थीं, पति ने रोक लिया
कर्नाटक के तुमकुरु जिले में जन्मी थिमाक्का की शादी एक मजदूर से हुई थी। वह खुद भी मजदूरी कर पेट पालती थीं। शादी के 20 साल बाद भी जब उनके बच्चे नहीं हुए तो वे खुदकुशी करना चाहती थीं। जब पति ने समझाया तो बरगद के पेड़ों को ही अपना बेटा मानने लगीं। उनका सबसे बड़ा बेटा (बरगद का पेड़) ६५ साल का है।

100 प्रभावशाली हस्तियों में शामिल
थिमाक्का को दुनिया तब ज्यादा जान पाई जब बीबीसी ने 2016 में उन्हें दुनिया की 100 सबसे प्रभावशाली शख्सीयतों में शुमार किया। 1996 में उन्हें राष्ट्रीय नागरिक सम्मान दिया गया। 2015 में उन पर एक किताब भी छपी। सालुमारदा का कन्नड़ में अर्थ होता है वृक्षों की कतार।


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Motivational Story : फिल्मी बैकग्राउंड होने के बावजूद संघर्ष करना पड़ा था शशि कपूर को


बॉलीवुड में शशि कपूर का नाम एक ऐसे अभिनेता के तौर पर लिया जाएगा जिन्होंने अपने रोमांटिक अभिनय के जरिए लगभग तीन दशक तक सिने प्रेमियों का भरपूर मनोरंजन किया। शशि कपूर (मूल नाम बलबीर राज कपूर) का जन्म 18 मार्च, 1938 को हुआ था और बचपन से ही उनका रूझान फिल्मों की ओर था और वह अभिनेता बनना चाहते थे। उनके पिता पृथ्वीराज कपूर और भाई राजकपूर और शम्मी कपूर फिल्म इंडस्ट्री के जाने माने अभिनेता थे। उनके पिता यदि चाहते तो वह उन्हें लेकर फिल्म का निर्माण कर सकते थे, लेकिन उनका मानना था कि शशि कपूर संघर्ष करें और अपनी मेहनत से अभिनेता बनें।

शशि कपूर ने अपने सिने कैरियर की शुरुआत बाल कलाकार के रूप में की। चालीस के दशक में उन्होंने कई फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम किया। इनमें 1948 की 'आग' और 1951 में प्रदर्शित 'आवारा' फिल्म शामिल है जिसमें उन्होंने अभिनेता राजकपूर के बचपन की भूमिका निभाई थी। पचास के दशक में शशि कपूर अपने पिता के थियेटर से जुड़ गए।

इसी दौरान भारत और पूर्वी एशिया की यात्रा पर आई बर्तानवी नाटक मंडली शेक्सपियेराना से वह जुड़ गए जहां उनकी मुलाकात मंडली के संचालक की पुत्री जेनिफर केडिल से हुई। वह उनसे प्यार कर बैठे और बाद में उनसे शादी कर ली। शशि कपूर ने अभिनेता के रूप में सिने कैरियर की शुरुआत वर्ष 1961 में यश चोपड़ा की फिल्म 'धर्म पुत्र' से की। इसके बाद उन्हें विमल राय की फिल्म 'प्रेम पत्र' में भी काम करने का

अवसर मिला, लेकिन दुर्भाग्य से दोनों ही फिल्में टिकट खिड़की पर असफल साबित हुईं। इसके बाद उन्होंने मेंहदी लगी मेरे हाथ, होली डे इन बांबे और बेनजीर जैसी फिल्मों में भी काम किया, लेकिन ये फिल्में भी टिकट खिड़की पर बुरी तरह नकार दी गईं। वर्ष 1965 उनके सिने कैरियर का अहम वर्ष साबित हुआ। इस वर्ष उनकी 'जब जब फूल खिले' प्रदर्शित हुई। बेहतरीन गीत-संगीत और अभिनय से सजी इस फिल्म की जबर्दस्त कामयाबी ने शशि कपूर को भी 'स्टार' के रूप में स्थापित कर दिया।

वर्ष 1965 में उनके सिने कैरियर की एक और सुपरहिट फिल्म फिल्म 'वक्त' प्रदर्शित हुई। इस फिल्म में उनके साथ बलराज साहनी, राजकुमार और सुनील दत्त जैसे नामी सितारे थे। इसके बावजूद वह अपने अभिनय से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। इन फिल्मों की सफलता के बाद शशि कपूर की छवि रोमांटिक हीरो की बन गई और निर्माता-निर्देशकों ने अधिकतर फिल्मों में उनकी रूमानी छवि को भुनाया।

वर्ष 1965 से 1976 के बीच कामयाबी के सुनहरे दौर में शशि कपूर ने जिन फिल्मों में काम किया, उनमें अधिकतर फिल्में हिट साबित हुईं। अस्सी के दशक में शशि कपूर ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया और 'जुनून' फिल्म का निर्माण किया। इसके बाद उन्होंने कलयुग, 36 चैरंगी लेन, विजेता, उत्सव आदि फिल्मों का भी निर्माण किया। हालांकि ये फिल्म टिकट खिड़की पर ज्यादा सफल नहीं हुई, लेकिन इन फिल्मों को समीक्षकों ने काफी पसंद किया।

वर्ष 1991 में अपने मित्र अमिताभ बच्चन को लेकर उन्होंने अपनी महात्वाकांक्षी फिल्म 'अजूबा' का निर्माण और निर्देशन किया, लेकिन कमजोर पटकथा के अभाव में फिल्म टिकट खिड़की पर नाकामयाब साबित हुई। हालांकि, यह फिल्म बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय हुई। शशि कपूर के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी अभिनेत्री शर्मिला टैगोर और नंदा के साथ काफी पसंद की गई। इन सबके बीच शशि कपूर ने अपनी जोड़ी सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के साथ भी बनाई और सफल रहे। यह जोड़ी सर्वप्रथम फिल्म 'दीवार' में एक साथ दिखाई दी। बाद में इस जोड़ी ने इमान धर्म, त्रिशूल, शान, कभी कभी, रोटी कपड़ा और मकान, सुहाग, सिलसिला, नमक हलाल, काला पत्थर और अकेला में भी काम किया और दर्शको का भरपूर मनोरंजन किया।

नब्बे के दशक में स्वास्थ्य खराब रहने के कारण शशि कपूर ने फिल्मों में काम करना लगभग बंद कर दिया। वर्ष 1998 में प्रदर्शित फिल्म 'जिन्ना' उनके सिने कैरियर की अंतिम फिल्म है जिसमें उन्होंने सूत्रधार की भूमिका निभाई। उन्होंने लगभग 200 फिल्मों में काम किया है। उनको फिल्म इंडस्ट्री के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के से नवाजा गया है। अपनी रूमानी अदाओं से दर्शकों के दिलों में खास पहचान बनाने वाले शशि कपूर चार दिसंबर, 2017 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।


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बिजनेस शुरू करने के पहले आजमाएं ये टिप्स तो होंगे मालामाल


मार्केट में किसी भी प्रोडक्ट की साख तभी बनती है, जब आपका वह प्रोडक्ट सभी मापदंडों पर खरा उतरे। इसलिए छोटे बिजनेस में इस बात का विशेष तौर पर ध्यान रखना जरूरी है। प्रोडक्ट का प्रोटोटाइप तैयार करके आप उसकी कार्यक्षमता, डिजाइनिंग आदि में आवश्यकतानुसार बदलाव कर सकते हैं। यह भी जांच लें कि आपका आइडिया ठीक तरह से काम कर रहा है या नहीं।

नए इंवेस्टर्स जुड़ेंगे
छोटे बिजनेस को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है कि आपके पास कोई न कोई इंवेस्टर हो, जो आपके आइडिया पर पैसा लगा सके। ऐसा तभी हो सकता है जब आपके पास कोई यूनिक प्रोडक्ट हो और जिसकी आने वाले समय में मांग हो। इंवेस्टर्स को अपने बिजनेस की ओर आकर्षित करने के लिए प्रोटोटाइप महत्वपूर्ण होता है। देखा जाए तो आइडिया इतना अच्छा अप्रोच नहीं करता है जितना कि प्रोडक्ट को यथार्थ में देखा जाए।

प्रोडक्ट के बारे में बताना आसान
प्रोडक्ट की खूबियों के बारे में तभी विस्तार से बताया जा सकता है, जब आपके पास उसका कोई भौतिक रूप उपस्थित हो। इसलिए मार्केटिंग एक्सपटर्स, बिजनेस पार्टनर्स, इंजीनियर्स आदि के सामने प्रोडक्ट का विवरण देने के लिए प्रोटोटाइप तैयार करना बेहतर होता है। ऐसे बिजनेस हानि से भी बच सकते हैं। कई बार बिना सोचे-समझे बहुत अधिक प्रोडक्ट बनाने से बड़ी हानि हो सकती है।

प्रोटोटाइप से मिलेगा आइडिया
जब आप प्रोटोटाइप बनाएंगे तो इसका एक फायदा यह भी होगा कि उस दौरान आपके दिमाग में कई सारे आइडिया आएंगे। ऐसे में आप ज्यादा क्रिएटिव वर्क करेंगे। प्रोटोटाइपिंग के दौरान आप न केवल अपने प्रोडक्ट को यूनिक बनाने का प्रयास करेंगे, बल्कि बिजनेस को आगे बढ़ाने पर विचार करेंगे।


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Motivational Story : बोर्ड परीक्षा के समय बच्चे के मन को पढऩा जरूरी


इस प्रतियोगी दौर में बच्चों के ऊपर पढ़ाई, परीक्षा और इसके बाद बेहतर करने का दबाव इतना ज्यादा है कि एकाग्र होकर पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता है। हर समय सबसे अच्छा करने या बेहतर परिणाम लाने की चिंता में वे कुछ भी ढंग से कर नहीं पाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि एक विद्यार्थी जब बोर्ड परीक्षा के दबाव और तनाव में आता है तो उसमें शारीरिक, व्यावहारिक, भावनात्मक और संज्ञानात्मक परिवर्तन आ जाते हैं। इन्हें देखना और पहचानना उसके माता-पिता और उससे जुड़े लोगों का काम है।

दरअसल, किसी भी तरह के डर या मांग के बदले में शरीर इसी तरह से प्रतिक्रिया करता है और व्यक्ति तनाव में आ जाता है। उसके नर्वस सिस्टम से तनाव वाले हार्मोन्स एड्रेनेलाइन और कॉर्टिसोल का स्राव होने लगता है, जो शरीर को इमरजेंसी एक्शन लेने के लिए उकसाता है। विशेषज्ञों ने आगे कहा, विद्यार्थियों में परीक्षा के तनाव का संबंध एडीएचडी से हैं। यह संबंध सकारात्मक तो कतई नहीं है, बल्कि यह छत्तीस का आंकड़ा है। लिहाजा, इन दोनों का एक साथ होना खतरनाक हो सकता है।

एडीएचडी से प्रभावित बच्चों का ध्यान बहुत जल्द भटक जाता है। इसके बावजूद उन्हें भी आम विद्यार्थियों की तरह हर चुनौती का सामना करना होता है। जैसे- अपनी चीजें सही जगहपर रखना, समय का ध्यान रखना और सवालों का का हल करना। यह सब इन बच्चों के जीवन को अधिक कठिन और चुनौतीपूर्ण बनाता है। परीक्षा के दौरान तो विशेष तौर पर एडीएचडी से परेशान बच्चों का तनाव कई गुना बढ़ जाता है। इन्हें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जो सुनने में एकबारगी तो आम लगती हैं, लेकिन इनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं हैं।

ये हैं समस्याएं :

- डाटा या कॉन्सेप्ट को पहचानने में कठिनाई
- विचार बनाने या व्यक्त करने में कठिनाई

- समय का ध्यान नहीं रहना
- एकाग्रता में कमी, ध्यान का भटकना

- निर्देर्शों का पालन नहीं कर पाना
- जल्दबाजी में गलतियां कर देना

परीक्षा के दौरान इन बच्चों का तनाव कम करने के लिए उनके माता-पिता उन्हें ट्यूशन या रेमेडी क्लास भेजकर उनके तनाव को कुछ कम जरूर कर सकते हैं। स्कूल भी यदि अपनी जिम्मेदारी समझकर कक्षाएं समाप्त होने के बाद एडीएचडी विद्यार्थियों के लिए विशेष प्रोग्राम का आयोजन कर सकते हैं।

दबाव और तनाव के स्तर को कंट्रोल में रखने के लिए जरूरी है कि विद्यार्थी हर पौने घंटे की पढ़ाई के बाद दस- बीस मिनट तक का ब्रेक लें। इस ब्रेक के दौरान आउटडोर गेम्स खेले जा सकते हैं। खेल ऐसा माध्यम है, जो शरीर को ऑक्सीटॉनिक्स हार्मोन निकालने में सहायता करता है। पढ़ाई के दौरान होने वाले तनाव से मुक्ति के लिए ये हार्मोन शरीर और मस्तिष्क के लिए रिलैक्सेशन थेरेपी का काम करते हैं। साथ ही माता- पिता को चाहिए कि वे लगातार अपने बच्चे से बात करते रहें, ताकि उसके अंदर चल रही बातों का पता चल सके।


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कभी करते थे फोटोकॉपी की दुकान पर काम, आज बॉलीवुड करता है सलाम, जाने कहानी


‘हमारी अधूरी कहानी’ फिल्म के ‘हां हंसी बन गए’ सॉन्ग को लिखने वाले पिंकसिटी कुणाल वर्मा को अपना मुकाम बनाने के लिए जीवन में कई तरह के एग्जाम से गुजरना पड़ा है। फिल्म चीट इंडिया के म्यूजिक कंपोजर के साथ ही फिल्म के गाने ‘फिर मुलाकात’ और हालिया रिलीज लुका छिपी के ‘दुनिया’ से उनकी खास पहचान बन गई है। उनकी कहानी दूसरों से अलग थी। मुम्बई में अपनी अलग पहचान बनाने की राह आसान नहीं थी, लेकिन हर मोड़ से उन्होंने बहुत कुछ सिखाया और आगे बढऩे के लिए प्रेरित हुए।

उन्होंने कहा कि मेरा रुझान कंप्यूटर डिजाइन और टेक्निकल फील्ड की तरफ था। रींगस के पास श्रीमाधोपुर गांव छोडक़र जयपुर में शिफ्ट होना तय किया। कुणाल वर्मा जयपुर आकर फोटोकॉपी की दुकान पर काम करने लगे, तब उन्हें दो हजार रुपए मिला करते थे, फिर ख्याल आया कि क्या मेरे सपने यहीं खत्म हो जाएंगे? वो बताते हैं कि इसके बाद मैंने अपना बिजनेस शुरू किया, यह डिजाइनिंग का ही काम था। 4-5 साल काम करने के बाद जो पैसा आया, उससे ‘माही वे’ सॉन्ग तैयार किया, लेकिन इसके वीडियो बनाने के लिए बजट नहीं था। यह गाना मैंने मेरे दोस्त को दे दिया। उसने उसे अपनी कार में प्ले किया, कार में उनके दोस्त संजय बांठिया बैठे थे। उन्हें वह गाना पसंद आया और मुझसे मुलाकात की। संजय ने इसके लिए वीडियो तैयार करवाया, लेकिन यह गाना नहीं चला। छह महीने तक मैंने कुछ नहीं किया। उसके बाद बांठिया ने म्यूजिक फर्म शुरू की। यहां से हम नए सिंगर्स के साथ काम करने लगे और लोग पसंद करने लगे।

महेश भट्ट से मिली तारीफ
मैंने मुम्बई में कई सॉन्ग्स के लिए बहुत से म्यूजिक डायरेक्टर्स और प्रोडक्शन हाउस से सम्पर्क किया। ऐसे में एक दिन भट्ट साहब के यहां से फोन आया और कहा गया कि ‘हंसी बन गए’ सॉन्ग सभी को पसंद आया, इसके लिए मीटिंग करने आ जाओ। मैं अगले दिन मुम्बई पहुंच गया और भट्ट साहब से मुलाकात हुई। यह मेरे लिए खास लम्हा था, उन्होंने मेरे लिखे गाने को पसंद किया। भट्ट साहब ने कहा कि इस गाने का फीमेल वर्जन किसी अन्य गीतकार से लिखवाएंगे, फिर मैंने रिक्वेस्ट करते हुए एक दिन का समय मांगा और यह वर्जन भी लिखने की बात कही। इस ड्यूरेशन में मैंने फीमेल वर्जन भी लिख दिया और वह उन्हें बेहद पसंद आया। दोनों वर्जन में मेरा लिखा गाना रिलीज हुआ और यह मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि रही। यहीं से एक और गाने का कॉन्ट्रेक्ट हो गया।

एक बार मुम्बई से वापस आने का मन हो गया था
‘हंसी...’ गाने के बाद फिर से जयपुर आ गया, यहां डेढ़ साल रहा। इस दौरान मुम्बई से कई कॉल आए और फिर एक दिन अपनी कार लेकर मुम्बई निकल पड़ा। आठ महीने स्ट्रगल रहा और इस दौरान छह महीने की कार की किस्त भी ड्यू हो गई। मैं सामान्य परिवार से था, इसलिए घरवाले भी थोड़ा डर गए। मैंने मुम्बई से फिर जयपुर आने का फैसला लिया, लेकिन इसी बीच एक रात वड़ा-पाव की स्टॉल पर चार गार्ड मेरे ही गाने को गाते हुए आए। यह सुनकर बहुत अच्छा लगा, फिर से हिम्मत जुटाई और नए म्यूजिक कंपोजर्स के साथ काम करने लगा। यहां से कुछ अच्छे प्रोजेक्ट मिलने शुरू हो गए और नामचीन म्यूजिक कंपनीज ने कॉन्ट्रेक्ट कर लिया। यहीं से ‘रेस’, ‘सिम्बा’ जैसी फिल्मों में भी गाने लिखे। मैंने कभी घर या गाड़ी का सपना नहीं देखा था, लेकिन आज मेरे पास बीएमडब्ल्यू है।


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अपनी हॉबी को बनाया कॅरियर, आज देश-विदेश में बांट रहे हैं अपना ज्ञान


ऐसा बहुत कम होता है कि हम हमारी हॉबी को ही प्रोफेशन बना लें और न केवल प्रोफेशन बनाएं वरन उसमें अंतरराष्ट्रीय ख्याति भी प्राप्त करें। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे आचार्य अनुपम जौली के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। कई बार की नाकामियों के बाद उन्होंने अपनी हॉबी को ही प्रोफेशन के रूप में चुना और आज अपनी इसी कला की बदौलत वो देश-विदेश में सम्मानित किए गए।

शौकिया तौर पर की थी शुरूआत
जिस उम्र में बच्चे डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना देखते हैं, उस उम्र से ही अनुपम हाथों की रेखाओं तथा ग्रह-नक्षत्रों की गणनाओं में उलझे रहते थे। अपने खाली समय में वो अपने दोस्तों तथा पड़ौसियों का भाग्य देखने का कार्य करते थे। धीरे-धीरे यही उनका जुनून बन गया और उन्होंने ठान लिया कि ज्योतिष को पूरी तरह सिखना है।

ग्रेजुएशन के बाद शुरू किया कारोबार
उन्होंने ग्रेजुएशन के बाद कम्प्यूटर हार्डवेयर का बिजनेस शुरू किया। उनका बिजनेस भी ठीक चल रहा था परन्तु जल्दी ही उन्हें इसमें घाटा होने लगा और उन्हें हार कर कम्प्यूटर हार्डवेयर के बिजनेस को बंद करना पड़ा। इसके बाद भी उन्होंने कई और बिजनेस शुरू किए लेकिन सभी में नाकामी हाथ लगी। ज्योतिष में उनकी प्रवीणता को देखकर उनके एक शुभचिंतक ने उन्हें ज्योतिष में ही भाग्य आजमाने के लिए कहा। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

आज विदेशी भी आते हैं ज्योतिष सीखने
विदेशियों में प्राचीन भारतीय विद्याओं के प्रति बढ़ती रूचि के चलते ज्योतिष भी इन दिनों काफी रूझान में है। आचार्य अनुपम जौली के पास इन दिनों ज्योतिष, वास्तु तथा रमल सीखने के लिए विदेशों से काफी स्टूडेंट्स आते हैं। यही नहीं, उन्हें देश-विदेश में ज्योतिष पर हो रहे सेमिनारों में बोलने के लिए भी बुलाया जाता है।


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