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जानिए, बच्चों में मोटापे से जुड़े हर सवाल का जवाब


बच्चों की खाने की गलत आदतों से मोटापा बढ़ता है। भूख लगने से पहले खाना, स्नैक्स, जंकफूड, फास्टफूड, अधिक मीठा खाने से तेजी से वजन बढ़ता है। इसके अलावा अक्सर बच्चे नियमित शारीरिक गतिविधियां नहीं करते हैं। वीडियो गेम, टीवी, मोबाइल देखते हैं। कैलोरी खर्च नहीं हो पाती है। 90 फीसदी मोटापा गलत खानपान से होता है। इसके अलाव आनुवांशिक कारणों से भी मोटापा बढ़ता है, हालांकि यह 3 से 5 प्रतिशत बच्चों में ही होता है। यदि माता-पिता मोटापे से ग्रस्त हैं तो बच्चे में भी मोटापे की आशंका बढ़ जाती है। 7-10 प्रतिशत बच्चों में इस वजह से मोटापा बढ़ता है। ये हैं विशेषज्ञ से अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-

प्र. मेरा बच्चा मोटापे से ग्रस्त है। क्या वो आगे भी मोटा ही रहेगा?

ऐसा जरूरी नहीं है। संतुलित खानपान व आउटडोर एक्टिविटी से वजन कम होता है। हालांकि कभी-कभी मोटापाग्रस्त माता-पिता के बच्चे में ऐसी दिक्कत हो सकती है।

प्र. बच्चे का वजन घटाने के लिए क्या करूं?

जंकफूड-फास्टफूड खिलाने से बचें। उसके खाने में 40 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 30 प्रतिशत फैट व 30 प्रतिशत प्रोटीन का अनुपान जरूरी है। इसके अलावा प्रतिदिन एक घंटा खेलने के लिए बाहर ले जाएं।

प्र. बच्चे में हैल्दी खानपान की आदत कैसे डालें?

बड़ों की आदतों को देखकर बच्चे ज्यादा सीखते हैं। जो आदत उसमें चाहते हैं पहले वह खुद करें। बच्चा वह सबकुछ खाना शुरू कर देगा। कभी वह खुद को अलग नहीं समझेगा।

प्र. बच्चे में खेलने व व्यायाम की आदत कैसे डालें?

उसके सोने-जागने, खाने-पीने व पढऩे-खेलने का समय तय कर दें। मोबाइल-टीवी के लिए एक घंटे से ज्यादा समय न दें। दोस्तों के साथ मैदानी खेलों व व्यायाम की आदत डालें। खुद भी साथ जाएं।

प्र. क्या वजन घटाने वाली दवाएं दे सकते हैं?

बच्चों का वजन घटाने के लिए दवा या स्टेरॉयड का सहारा न लें। ये सेहत के लिए ठीक नहीं है। क्लिनिकल न्यूट्रिशनिस्ट या हैल्थ कोच से डाइट प्लान कर वजन कम कराएं।

सेहतमंद रखने के लिए जरूरी हैं ये कदम

  • खानपान की आदतों को बदलें
  • जंकफूड, फास्ट फूड खाने से बचें
  • सपरिवार बच्चे के साथ भोजन करें।
  • टीवी देखते हुए कुछ भी न खाएं।
  • कभी भी खाने की आदत बदलें।
  • खाने से आधे घंटे पहले सलाद दें।
  • खाने से तीन घंटे से पहले, बिना भूख लगे जबरदस्ती न खिलाएं।

- डॉ. विष्णु अग्रवाल शिशु रोग विशेषज्ञ, जेके लोन, शिशु चिकित्सालय, जयपुर


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बच्चा भावुक है, घबराता-रोता है तो ऐसे रखें खयाल


सवाल: नौ साल का बच्चा चौथी क्लास का स्टूडेंट है और बहुत भावुक है। स्कूल में कुछ बात हो जाए तो वह बुरा मान जाता है और रोने लगता है जिससे उसका पूरा दिन खराब हो जाता है। मैने कई बार उसे समझाने की कोशिश की जिससे जिससे वे दूसरे बच्चों के साथ घुलमिल जाए पर कुछ नहीं हुआ। मैं क्या करूं?

जवाब: जैसा कि आपने बताया है कि आपका बच्चा भावुक है। वह कभी-कभी खुद को असहाय महसूस करता है। ऐसे में आपको सबसे पहले ये समझना होगा कि वह कितना भावुक है ताकि उसकी समस्या को हल किया जा सके। जो बच्चे भावुक होते हैं उनमें घबराहट या चीजों को सहन करने की क्षमता बहुत कम होती है। आपके बच्चे के साथ ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि उसकी उम्र बहुत कम है लेकिन उसे इसी उम्र से संभालना होगा। बच्चे की समस्या जानने के लिए उसके शिक्षकों से मिलें। बच्चे को आप अपने स्तर से पूरा सहयोग करें ताकि वह मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत बन सके और चीजों को सहन कर सके।

समस्या को नजरअंदाज न करें
बच्चे को इस तरह की समस्या है तो उसे नजरअंदाज न करें। ऐसा करने से बच्चा कुछ दिन तो डरा-सहमा रहेगा लेकिन बाद में उसके भीतर से भावनाएं खत्म हो जाएंगी और धीरे-धीरे गुस्सैल होने के साथ ढीठ बन जाएगा। बच्चा जब स्कूल संबंधी किसी बात को बता रहा है तो उसकी बात ध्यान से सुनें। उसकी बातों से आपको तय करना होगा कि उसे कैसे समझाना है और उसकी देखभाल कैसे करनी है। इसमें खुद के साथ स्कूल के शिक्षकों और प्ले थैरेपिस्ट की मदद लेंगे तो बच्चे में सुधार देखेंगे।

मेघन लीह, पैरेंट कोच, वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत


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बच्चों की आदतों से हैं परेशान तो जाने उनका बेहतर इलाज़


सवाल: मैं कामकाजी महिला हूं और पहली बार मां बनने वाली हूं। बच्चे के जन्म के बाद मैं पूरी छुट्टियां खत्म करने के बाद ही ऑफिस जाने का मन है। इसके बाद मेरी सास बच्चे की देखभाल करेंगी। पर मुझे डर लगता है कि कहीं मैं बच्चे से अलग न हो जाऊं ?

जवाब: बच्चे के जन्म के बाद आप छुट्टी पर रहेंगी तो बच्चा आपके करीब रहेगा। जब उसे आप अपनी सास के पास छोडकऱ जाएंगी तो दिल नहीं मानेगा। इस दुविधा से निकलने के लिए बच्चे के जन्म से पहले अपनी सासू मां के करीब रहें। याद रखें बच्चे की उम्र चार, पांच या छह साल है तब वे आपसे जुड़ा रहेगा। इसके बाद अगर वे दादी या नानी के पास रहता है तो वे उनके अधिक करीब होगा, पर इसका मतलब ये नहीं कि वे आपको भूल जाएगा। जब भी समय मिले बच्चे के साथ समय बिताएं।

सवाल: मेरी बेटी ने हाल ही स्कूल जाना शुरू किया है। मैने देखा है कि वे कुछ मामलों में झूठ बोलती है। ये कोई बड़ा मसला नहीं है लेकिन मुझे डर लगता है कि कहीं ये अविश्वास की स्थिति न बन जाए। मैने गौर किया है कि वह टिफिन ले जाती है इसके बाद भी स्कूल कैफेटेरिया से कुछ खरीदकर खाती है। जब मैं उससे पूछती हूं तो वह सिरे से नकार देती है, जबकि इसकी पुष्टि मैंने कैफेटेरिया से की है। क्या छोटी उम्र की ये आदत जिंदगीभर बनी रहेगी?

जवाब: इस तरह की परेशानी दूसरे अभिभावकों के साथ भी रहती है। पांच से छह साल के उम्र के बच्चों में ऐसी आदत देखी जाती है। पहले इसपर सोचिए कि बच्ची झूठ क्यों बोल रही है। स्कूल में बच्चे वैसा ही करते हैं जैसा उनके दोस्त करते हैं। आपकी बच्ची टिफिन ले जाने के बाद भी स्कूल कैफेटेरिया से खाना खा रही है क्योंकि उसके दोस्त भी बाहर से खाना खरीद रहे हैं। अगर आपको सच्चाई पता है तो बच्ची से ये न पूछें कि वह झूठ क्यों बोल रही है। बच्ची को जरूर बताएं कि इस महीने वह इतनी बार अपना टिफिन बिना खाए वापस लाई। बच्ची का पसंदीदा खाना टिफिन में दें। बच्ची से बात कर तय करें कि महीने में तीन दिन कब कैफेटेरिया से खाना चाहती है। उस दिन कैफेटेरिया से खाना खाने दें। अगर आप ऐसा नहीं करेंगी तो बच्ची के झूठ बोलने की आदत बढ़ेगी और वह परेशान भी रहेगी।

सवाल: मैं घरेलू महिला हूं और मेरे तीन बच्चे हैं जिनकी उम्र पांच, चार और दो साल है। मैं अपने चार साल के बच्चे की शिकायत करने की आदत से परेशान हूं। वो प्री-स्कूल में पढऩे जाता है। जब वे घर आता है तो टीवी देखने के लिए कहता है या किसी के साथ खेलने की जिद्द करता है। जब पांच साल का बच्चा स्कूल से वापस आता है तो वे भी अपने छोटे भाई जैसा व्यवहार करता है। मेरा ज्यादा समय दो साल के बच्चे की देखभाल में गुजरता है। बच्चे मुझे परेशान करने लगे हैं। क्या तरीका है जिससे ये सब ठीक हो जाए ?

जवाब: दूसरे नंबर का बच्चा आपकी परेशानी का सबब है। कारण जानना होगा कि वो ऐसा क्यों कर रहा है? बच्चे चाहते हैं कि वो कुछ ऐसा करें जिससे अभिभावकों का ध्यान उन पर बना रहे। उसे पता है जब वह टीवी देखने की जिद्द करता है तो आप उसे उसके कमरे में भेजने लगती है। इसका मतलब है कि उसे आप उतना ध्यान नहीं दे पा रही हैं जितना ध्यान दूसरे बच्चों को दे रही हैं। आप यह कबूल करिए की आप तीनों बच्चों की पालनहार हैं। बच्चों की गलत आदत के लिए हम उन्हें दोषी नहीं ठहरा सकते हैं जो अपरिपक्व हैं। चार साल के बच्चे के लिए रोजाना 10 से 30 मिनट का समय निकालें और उससे बात करें। बच्चे को चुप कराना या डांटना किसी समस्या का समाधान नहीं है। बच्चे को कभी ये मत कहिए कि जिद्द मत करो। जिस दिन से आप ऐसा करने लगेंगी सारी समस्या हल हो जाएगी और बच्चे भी खुश रहेंगे।

सवाल: मैंने अपने दो साल के बच्चे को कुछ दिन पहले ही प्री-स्कूल भेजना शुरू किया है। कुछ दिन से उसे सर्दी, जुकाम के साथ नाक बहने की समस्या रहने लगी है। कई दिन स्कूल भी नहीं भेजा लेकिन वह स्कूल जाने की जिद करता है तो उसे जरूरी देखभाल के साथ स्कूल भेज रही हूं लेकिन उसकी हालत मुझे ठीक नहीं लगती है। स्कूल में भी खांसने व छींकने से परेशान रहता है। ऐसी स्थिति में मैं नहीं चाहती कि वह स्कूल जाए लेकिन मुझे भी ऑफिस जाना होता है इसलिए स्कूल भेजती हूं। अब मैं क्या करूं?

जवाब: बच्चे की सेहत ठीक रहे यह सबसे बड़ा बिंदु है। आपके बच्चे की नाक लगातार बह रही है और खांसी व छींकने की समस्या है तो सबसे पहले किसी बाल रोग विशेषज्ञ को दिखाएं जिससे पता चले कि उसे ये तकलीफ बार-बार क्यों हो रही है। इस स्थिति में बच्चे को स्कूल भेजना बिलकुल भी ठीक नहीं है। अच्छा यही होगा कि उसे कुछ दिन तक आराम करने दें। अगर ऐसी हालत में बच्चा स्कूल जाएगा तो उसकी तबीयत और खराब हो सकती है। बच्चे के खानपान और साफ-सफाई को लेकर सावधानी बरतें क्योंकि इसमें लापरवाही उसकी सेहत को नुकसान पहुंचा सकती है। इस बात का भी ध्यान रखें कि ऐसी हालत में बच्चे को घर में दूसरों के भरोसे न छोड़ें। आपके बच्चे को देखभाल की जरूरत है जिसके बाद ही उसे इस समस्या से निजात मिल सकती है। बच्चे को ऐसी हालत में स्कूल भेजने से उसकी क्लास में पढऩे वाले बच्चे को भी संक्रमण हो सकता है। बच्चे का ध्यान रखें और उसे समय दें जिससे उसकी समस्या हल हो सके। आप वर्किंग हैं तो बच्चे को स्कूल भेजकर अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश न करें। आप छुट्टी लें और बच्चे की सेहत पर पूरा ध्यान दें।

वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत


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बच्चों से सवालों से हैं परेशान तो जानें उनके सटीक जवाब


सवाल: अपनी मां के साथ मेरा बहुत अच्छा रिश्ता नहीं था। मुझे उनसे कुछ खास लाड प्यार नहीं मिला है। अब मैं खुद एक बच्ची की मां हूं और मैं उसके साथ हर चीज श्ेायर करती हूं। क्या मैं अपने मां के रिश्ते को अपनी बेटी से साझा कर सकती हूं। क्या ये सही है?

जवाब: जब हम अभिभावक बनते हैं तब हमें पता चलता है कि हमने क्या पाया है और बचपन में हमें क्या नहीं मिला। अब आपकी बच्ची को उसकी नानी से जो लाड प्यार मिल रहा है उसे आप अपने बचपन के दिनों से तुलना कर रही हैं। आप खुद को दबाव में न रखें। उसे अपने दादा-दादी और नाना-नानी के साथ समय बिताने दें। बेटी को सीमाओं में बांध कर न रखें। इससे जो परेशानी आपको हो रही है वैसी ही परेशानी भविष्य में बेटी को होगी।

सवाल: मेरे चार साल के बच्चे का बात करने का तरीका बदल गया है। जब वह गुस्साता है या जो वह चाहता है, उसे नहीं मिलता है तो मुझे और अपने पिता को ‘दमदम’ बुलाता है। कभी-कभी वह(आई हेट यू) भी कहता है। उसकी आदत कैसे ठीक होगी?

जवाब: चार साल का बच्चा स्वभाव से थोड़ा नटखट होता है। इस उम्र में बोलना सीख रहा होता है, जिससे कई बार वह अपनी सीमाओं को लांघ जाता है। गुस्से में अपनी भावना का इजहार करने के लिए ऐसी चीजें करता है। ऐसे में कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना होगा जिससे उसकी आदत में सुधार हो सके। जब वो गुस्सा करे तो आप शांत रहें। उसकी ये आदत छुड़ाने के लिए उसे किसी भी तरह की धमकी न दें। कभी ये न कहें कि ऐसा करने पर आप उसे पार्क नहीं ले जाएंगे या उसकी पसंद की चीज नहीं देंगे। इससे उसका गुस्सा और बढ़ेगा। जब वह दमदम बुलाता है तो उसे यह अहसास न होने दें कि आपको इससे बुरा लग रहा है। यदि उसकी समझ में यह बात बैठ गई कि उसकी आदतों से आपको परेशानी हो रही है तो वह उन्हें बार-बार दोहराएगा। बच्चे की आदत को लेकर परेशान न हों। जब वह गुस्सा करे तो उसे शांत करने की कोशिश करें सब ठीक हो जाएगा।

सवाल: मेरा पांच साल का बच्चा जब कुछ नया करना चाहता है और वे नहीं कर पाता है (जैसे बॉल कैच करना, कोई नया शब्द लिखना) तो वे उस काम को छोड़ देता है या रोने लगता है। मैने बहुत कोशिश की लेकिन सब नाकाम हो गई क्योंकि वो चाहता है कि चीजें बिना किसी की मदद के सीखे। अपने नाम का एक शब्द नहीं लिख पा रहा था। मैं वहां से चली गई क्योंकि बेहद निराश दिख रहा था। मैं चाहते हुए भी उसकी मदद नहीं कर पा रही हूं। मैं उसकी इस आदत को लेकर काफी परेशान हूं। मेरी मदद करें।

जवाब: बच्चे के इस व्यवहार के कारणों को तलाशना होगा और उसकी निराशा के कारणों को जानें। उसे बॉल पकडऩे और शब्दों को लिखने में दिक्कत है तो उसे दिमाग संबंधी तकलीफ हो सकती है। इसके लिए चिकित्सक से मिलें। आपका बच्चा खुद से अपना नाम लिखना चाहता है। जब हाथों में पेंसिल पकड़ता है तो उसे उम्मीद होती है कि वे ऐसा कर लेगा पर नहीं कर पाता है। वे शब्दों को वैसे नहीं लिख पा रहा है जैसा लिखने की तस्वीर उसने अपने मन में बनाई है जो उसकी निराशा का कारण है। जब वे किसी शब्द को लिखने की कोशिश कर रहा हो तो आप वहां से जाएं नहीं। ये कभी मत सोचिए की नियमित अभ्यास से वो कर लेगा, ये भ्रम बच्चे की निराशा को और बढ़ाएगा। खेल-खेल में लिखना सीख जाएगा। बच्चा गुस्सा करे तो आप शांत रहें और धैर्य रखें। आप एहसास कराएं कि मैं यहीं खड़ी रहूंगी और तुम्हारा गुस्सा नियंत्रित करूंगी। बच्चा कोई शब्द थोड़ा भी सही लिखता है तो उसे प्रोत्साहित करें। बॉल कैच करने की समस्या से निजात के लिए उसके साथ खेलें जिसमें बॉल कैच करने या रिंग पकडऩे अभ्यास हो सके। उम्मीद है कुछ दिन में समस्या हल हो जाएगी।

सवाल: जब मेरा छह साल का बच्चा कुछ गलत करता है और मैं उसे मना करती हूं तो वे खुद को मारने लगता है। वे खुद को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता है लेकिन वे कहता है कि उसे खुद की बुरी आदतें उसे खराब लगती हैं इसलिए वे ऐसा करता है। कई बार वह गुस्स्से में कुछ भी फेंक देता है। अपने भाई को मार देता है इसके बाद वे अपने पैरों को जमीन पर पटकने लगता है। उससे पूछते हैं कि वे ऐसा क्यों कर रहा है तो वे कहता है कि उसने जो किया उसे सोचकर बुरा लगता है इसलिए ऐसा करता है। हम क्या करें?

जवाब: घर के छोटे बच्चों में ऐसी आदत आमतौर पर देखी जाती है और आप अकेली नहीं है। इसका निदान यही है कि पहले आप पता करें कि आखिर वे ऐसा क्यों कर रहा है। इस उम्र के बच्चों का दिमाग पूरी तरह से विकसित नहीं होता है। इस वजह से वे रोते-चिल्लाते हैं, गुस्सा करते हैं और कई बार अपनी भावना जाहिर करने के लिए चीजें भी तोड़ देते हैं। जैसा कि आपने बताया था कि आपका दूसरा बच्चा भी है, वहीं, आपके बड़े बच्चे की निराशा और परेशानी का केंद्र बन चुका है। छोटे बच्चे पर आपका ध्यान अधिक रहता है इसे देख बड़े बच्चे का व्यवहार ऐसा हो रहा है। इससे निजात पाने के लिए दोनों बच्चों को एकसाथ लेकर बैठें और प्यार से बात करें। बच्चे से ये कहना बंद करें कि अपने भाई को नहीं मारते। जब वह अपने भाई को मारें तो आप कहें कि अरे देखो भाई को चोट लग गई। जाओ आइसपैक लेकर आओ। इसे दर्द हो रहा है। तब उसे अहसास होगा कि वह गलत कर रहा है। बड़े बच्चे की पुरानी तस्वीरों को उसे दिखाते हुए बताएं कि जब वह घर में आया था तब सब कितने खुश थे। इससे बच्चे के मन में जो नकारात्मक भाव हैं वे खत्म होंगे।

वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत


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बच्चों के सवाल जो अभिभावकों को करते हैं परेशान, जानिए उनके जवाब


सवाल: मेरी 8 माह की बेटी है और पहले पति की पत्नी से 6 वर्ष का बेटा है। वह हायपर एक्टिविटी डिस्ऑर्डर बीमारी से ग्रसित है। मेडिटेशन और अन्य चीजों से उसको थोड़ी राहत है लेकिन वह अक्सर हायपर हो जाता है। ऐसे में बताएं हम क्या करें?

जवाब: सौतेले बच्चों की परवरिश बेहद मुश्किल मानी गई है। दरअसल सबसे बड़ी परेशानी प्राइमरी पैरेंटिंग की होती है जो आपने नहीं की। ऐसे में बच्चे के मनोभाव और आदतों को समझकर उसे अपने अनुसार ढालना चुनौती का काम होता है। हायपर एक्टिविटी डिस्ऑर्डर के बारे में कहते हैं कि यह बीमारी परिस्थतियों में भारी बदलाव के कारण ज्यादा महसूस होती है। दुनिया का हर बच्चा माता-पिता के साथ रहना चाहता है। वर्तमान हालात में उसे मजबूरी में आपके साथ रहना पड़ रहा है। ऐसे में अपने पति का साथ लेते हुए उसके मन के विज्ञान को समझने की कोशिश करें। जितना हो सके उसका विश्वास जीतने की कोशिश करें। बच्चे के साथ समय बिताएं और उससे अच्छे से बात करें। उसकी परेशानी जल्द ठीक हो जाएगी।

सवाल: मैं अपने चार साल के बेटे को क्या टैबलेट दे सकती हूं? दूसरे अभिभावक ऐसा कर रहे हैं? मैं देखती हूं कि मेरे दोस्तों ने अपने प्री- स्कूल किड्स को टैबलेट दिया हुआ है जिसमें वे गेम्स खेलने के साथ वीडियो देखते हैं? क्या ये सही है?

जवाब: आपने जिस तरह से सीधा सवाल किया है वो मुझे पसंद आया। मेरा भी सीधा जवाब है ‘नहीं’। प्री-स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को टैबलेट की कोई जरूरत नहीं है। इससे वो स्मार्ट नहीं बनेगा। चार साल के बच्चे को घर पर अच्छी देखभाल के साथ अभिभावकों के लाड-प्यार की जरूरत होती है। अच्छा और पौष्टिक खाना, पानी और अच्छी नींद उसके लिए बहुत जरूरी है। टैब पर गेम खेलने से बच्चे का मन भटकेगा। खेल में हार और जीत उसके दिमाग का किसी तरह से विकास नहीं करेगी। बाल रोग विशेषज्ञ और न्यूरोलॉजिस्ट ने शोध के बाद चेतावनी दी थी कि तकनीक बच्चों को बुरा बर्ताव करने के लिए प्रेरित करती है। ऐसी स्थिति में चार साल के बच्चे को टैब देना किसी भी तरह से ठीक नहीं है। जैसे-जैसे आपका बच्चा बड़ा होगा आपको कई तरह के निर्णय लेने होंगे जो उसके भविष्य को बेहतर बनाने का काम करेंगे। सभी अभिभावकों ये पता होना चाहिए कि उसके लिए क्या बेहतर है क्या नहीं। ञ्च वाशिंगटन पोस्ट

सवाल: मेरा तीन साल का बच्चा है। उसे कुछ भी समझाओ तो उसे मानने में परेशानी है। किसी बात को लेकर ‘ना’ कहा जाता है तो दांत से काटता है। हमने पूरी कोशिश की ताकि उसकी आदत सुधर जाए पर कोई खास बदलाव नहीं है। मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब: तीन साल का बच्चा जब गुस्सा होगा तो उसका इजहार भी करेगा। बच्चा गुस्सा क्यों हो रहा है इसका पता लगाएं। बच्चा जब नाराजगी जता रहा है तो आप संयमित रहें। उससे प्यार से पेश आएं। कभी ये न बोलें कि बंद करो या मैं चली जाऊंगी। इसके लिए बच्चे के साथ खेलें। उसके साथ हंसे और अच्छे सवाल पूछें। हर परिस्थिति में बेहतर ढंग से समझाएं। इस उम्र में मस्तिष्क विकास के कारण चीजें समझने का उसे समय दें।

सवाल: दो साल के बच्चे को उसकी गलती का अहसास कैसे कराया जाए जिससे वह माफी मांग सके? मैं पूरी तरह आश्वस्त हूं कि अपने भाई या डॉगी को मारने के बाद वो खुद को गलत नहीं मानता है। इस उम्र में क्या करें जिससे सुधार हो जाए ?

जवाब: बच्चे की बौद्धिक और चीजों को समझने की क्षमता बेहतर करने के लिए उसे सामाजिक दायित्वों के बारे में बताना चाहिए। जब उसे अहसास हो जाएगा कि उसकी किसी बात से किसी को कैसे क्षति पहुंचती है तो उसे अपनी गलतियों का अहसास खुद-ब- खुद होने लगेगा। बच्चे की छोटी से छोटी गलत हरकत पर उसे टोकना चाहिए। जैसे वे अपने भाई को मार रहा है, डॉगी की पूंछ खींच रहा है। बच्चे की उम्र छह साल से कम है तो उसे माफी मांगने के लिए दबाव न बनाएं। उसे आपके व्यवहार से ही पता चल जाएगा कि उसने गलती की है। बच्चे की उम्र दो साल है तो उसे नहीं पता कि उसकी गलती से दूसरे को क्या हुआ है। ये दर्शाने की कोशिश करें कि उसकी गलती से किसी को नुकसान हुआ है। इससे बच्चे की मनोस्थिति सुधरेगी। बच्चा आपकी भावना को समझेगा और अपनी गलतियों में सुधार करेगा।


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बच्चे ऑनलाइन क्या कर रहे हैं इसकी निगरानी है जरूरी


बच्चों के ऑनलाइन नेटवर्क के इस्तेमाल को लेकर रेखा खींचनी होगी जिससे उन्हें भविष्य के खतरों से बचाया जा सके। इससे बच्चे का दिमाग तेज और स्वस्थ होगा। क्या ये सही है कि सिलिकॉन वैली के टेक्नोलॉजी इंजीनियर अपने बच्चों को स्क्रीन पर समय नहीं बिताने देते हैं? जी हां ये सही है कि टेक कंपनी में काम करने वाले इंजीनियर्स और एग्जक्यूटिव अपने बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने में लगे हुए हैं। स्थिति ये है कि जो लोग ऐसा नहीं कर पा रहे हैं वे खुद को शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हैल्थ की एडॉलेसेंट ब्रेन कॉग्निटिव डेवलपमेंट (एबीसीडी) रिपोर्ट के अनुसार 11 हजार किशोरों पर शोध कर ये जानने की कोशिश की गई कि वे कौन सी वजहें हैं जिससे बच्चे किसी बात को लेकर प्रोत्साहित होते हैं और उसका दिमाग पर क्या असर पड़ता है।

शोध में पता चला कि डिजिटल मीडिया के इस्तेमाल से सबसे अधिक बच्चों की नींद प्रभावित होती है। स्लीप रिसर्चर मैथ्यू वॉल्कर ने किताब ‘वॉय वी स्लीप’ में लिखा है कि नींद प्रभावित होने से एकाग्रता खत्म होती है, दिमाग अस्थिर रहता है। मानिसक स्वास्थ्य बिगड़ता है जिससे बच्चे का जीवन प्रभावित होता है। कोई नया ऐप डाउनलोड करने या ऑनलाइन अकाउंट बनाने से पहले उसके बारे में अच्छे से जान लें। ऐसा करेंगे तो भविष्य की परेशानी से बच सकेंगे।

इन नियमों का पालन जरूरी
बच्चों को दिनभर में रात को एक घंटे स्क्रीन पर समय बिताने दें लेकिन स्कूल होमवर्क और डिनर होने के बाद। स्कूल प्रोग्राम में कंप्यूटर को टीचिंग टूल के तौर पर इस्तेमाल किया जाए। प्यू रिसर्च सेंटर रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी देशों के 81 फीसदी किशोर सोशल मीडिया के माध्यम से अपने दोस्तों के साथ जुड़े हैं जबकि 69 फीसदी अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों से भी जुड़े हैं। बच्चों को टीवी और मोबाइल पर समय बिताने से रोकने की बजाए योजना बनाएं कि उन्हें कितना समय देना चाहिए


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बेटी को लड़कों वाला नाम पसंद या लड़की का, यह फैसला मां-बाप ने उसपर छोड़ा


हमारी सामाजिक परम्पराएं ***** के आधार पर फर्क कर बच्चों को सिखाती हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। बजाय इसके कि उनकी योग्यता क्या है और वे क्या कर सकते हैं। यह अवधारणा बच्चों एवं युवाओं दोनों के लिए ही नकारात्मक हैं।

आमतौर पर लड़का और लड़की के बीच फर्क करना बेहद आसान होता है। पहनावा, भाषा, पसंद, शारीरिक बनावट और दुनिया का हमें देखने का नजरिया चंद ऐसी कसौटियां हैं जो हम अक्सर दोनों लिंगों में भेद करने के लिए चुनते हैं। पुरुष के शरीर में भी अगर कोई स्त्री होने का अहसास करता है तो प्रकृति और कानून दोनों उसे इसकी आजादी देते हैं कि वो जिस तरहचाहे रह सकता है। अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में रहने वाले जेरेमी और ब्रायन ने अपने तीन साल के बच्चे का जेंडर (लिंग) निर्धारण का अधिकार उस पर ही छोड़ दिया।

उन्होंने बच्चे के ***** के बारे में सार्वजनिक रूप से किसी को भी जानकारी नहीं दी। फेसबुक पर दोनों ने लोगों से अपने तीन साल के बच्चे नाया को सिर्फ नाम से बुलाने का आग्रह किया। ताकि नाया लड़का या लड़की के फर्क के बिना अपनी जिंदगी जी सके। जेरेमी और ब्रायन ने सोचा कि ये उनके बच्चे का निर्णय होना चाहिए कि वो क्या कहलाना पसंद करेगा- एक लड़का या एक लड़की। अभिभावक इस बात पर भी ध्यान देने लगे हैं कि ***** आधारित भेदभाव और माता-पिता की आशाएं बच्चों पर कितना असर डालती हैं। सभी माता-पिता अपने बच्चों को खुश देखना चाहते हैं। लेकिन बहस इस बात पर है कि क्या हम अपने बच्चों की परवरिश आज के परिवेश के हिसाब से करेंगे या सदियों पुरानी परंपराओं के हिसाब से।

ऐसे मिली प्रेरणा
नाया के माता-पिता ने भी इन सभी बातों पर बहुत विचार-विमर्श किया। नाया के पिता जेरेमी ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्सुअल व्यक्तित्व के लोगों के साथ काम करते थे। इन लोगों के कटु अनुभवों ने पिता बनने के बाद जेरेमी को काफी चिंता में डाल दिया। जेरेमी को यह फिक्र सताने लगी कि कहीं बड़ा होने पर उनका बच्चा भी दबाव में आकर जन्म प्रमाण पत्र में लिखे ***** को ही स्वीकार करने को बाध्य महसूस न करे। इसलिए जेरेमी ने यह फैसला बच्चे पर ही छोडऩा उचित समझा।

नहीं किया कोई फर्क...
उन्होंने नाया को लड़का-लड़की दोनों की तरह पाला। नाया को कभी एहसास नहीं होने दिया कि उसकी पहचान क्या है। वे नाया को रिश्तेदारों की तस्वीरें दिखाकर उसे समझाते कि दादा खुद को पुरुष कहलाना पसंद करते हैं जबकि दादी को महिला कहलाने में रुचि है। ताकि नाया को अपना व्यक्तित्व निर्धारित करने में आसानी हो। दोनों का मानना था माता-पिता होने के नाते हमें कम से कम एक ईमानदार प्रयास तो करना चाहिए। समाज के नियम हर जगह लागू नहीं हो सकते।

जब नाया ने चुना...
एक दिन जेरेमी नाया और उसके डॉगी के साथ कमरे में खेल रहे थे। अचानक नाया ने कहा कि वह डॉगी है और अब से सब उसे डॉगी न कहकर उसका नाम लेंगे। जेरेमी ने बातचीत को जारी रखते हुए उन्होंने पूछा कि नाया जीवन भर क्या कहलाना पसंद करेगी। नाया ने कहा कि वो एक लड़की कहलाना पसंद करेगी। ब्रायन और जेरेमी कहते हैं कि वे नाया के किसी भी चुनाव पर खुश होते। क्योंकि वे बस इतना चाहते थे कि उनकी बेटी वो चुनें जो वो अपने बारे में दिल से महसूस करती है।


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जानें गर्भावस्था में पोटैशियम लेना क्यों जरूरी


जयपुर। सोडियम के साथ पोटैशियम स्वस्थ रक्तचाप बनाए रखने में मदद करता है। सोडियम कोशिकाओं से तरल पदार्थ लेता है और रक्तचाप को बढ़ाता है और यह कोशिकाओं में तरल पदार्थ को बनाए रखने में मदद करता है। सोडियम अधिक लेने से इसका स्राव तेजी से बढ़ जाता है। गर्भावस्था में पोषक तत्वों की ज्यादा जरूरत होती है। पोटैशियम आवश्यक खनिज तत्त्व है। शरीर में कोशिकाओं में द्रव और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन को बनाए रखता है। यह तंत्रिका आवेग, मांसपेशियों में संकुचन और कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन से ऊर्जा निकालकर शरीर में प्रसारित करता है।

तुरन्त चिकित्सक से सलाह लें

पोटैशियम ऐसा मिनरल है जो शरीर के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण है। पोटैशियम दिल, किडनी और अन्‍य अंगों के सामान्‍य रूप से काम करने के लिए आवश्‍यक है। पोटैशियम एक इलेक्ट्रोलाइट है। यह पोषक तत्‍वों को कोशिकाओं के अंदर और अपशिष्‍ट उत्‍पादों को कोशिकाओं से बाहर ले जाने में मदद करता है। इसलिए पोटैशियम की कमी से होने वाले लक्षण नजर आने पर तुरन्त चिकित्सक से सलाह लें।

4700 मिलीग्राम पोटैशियम की जरूरत

सामान्यत: महिला को प्रतिदिन 4700 मिलीग्राम पोटैशियम की जरूरत होती है। यद्यपि गर्भावस्था में इसकी जरूरत बढ़ती नहीं है, लेकिन पोटैशियम युक्त भोजन नियमित लेना जरूरी है। गर्भावस्था के दौरान रक्तचाप 50 प्रतिशत तक बढ़ता है।

कर्डियक अरेस्ट का कारण बन सकता

गर्भावस्था में हाइपरक्लेमिया या उच्च पोटैशियम का स्तर खतरनाक हो सकता है। यह कार्डियक अरेस्ट का कारण बन सकता है। किडनी की फेल्योरिटी का कारण भी है।

कम हो स्तर तो सावधान

गर्भवती महिला में पोटैशियम के स्तर में कमी से थकान, पानी की कमी से पैरों, टखने में सूजन, निम्न रक्तचाप से चक्कर आना, हाथ-पैरों की उंगलियों में अकडऩ, मांसपेशियों में असामान्य कमजोरी, कब्ज, असामान्य दिल की धड़कन और अवसाद हो सकता है। प्राकृतिक खाद्य पदार्थ से भी इसके कमी को पूरा किया जा सकता है। टमाटर, आलू, केला, बीन्स, हरी पत्तेदार सब्जियां, दही, मछली, मशरूम आदि में यह भरपूर मात्रा में होता है।

 


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बच्चों को हैंडल करने को लेकर हैं परेशान तो आजमाएं ये टिप्स


चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट मानते हैं कि आप बच्चों को अनुशासन में रखें लेकिन जहां प्यार और आपके साथ की जरूरत हो, उन्हें उपलब्ध कराएं। परवरिश में कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए। बच्चे अपने द्वारा किए गए कामों के प्रभाव और उसके परिणामों को नहीं जान पाते, इसलिए मां-बाप को चाहिए कि उनके बच्चे जो भी करें, उसके लिए वे उसे प्यार से समझाएं, न कि डांट कर। पेरेंट्स को चाहिए कि बच्चे की कल्पना शक्ति को बाहर आने दें, उस पर रोक-टोक न करें। बच्चों के नए-नए दोस्त बनते हैं, जिससे वे कई तरह की गलत आदतें सीख सकते हैं। अपने बच्चों को गलत आदतों से बचाने के लिए पेरेंट्स को बच्चों को ज्यादा समय देने की जरूरत है। आइए देखे कैसे...

उदाहरण प्रस्तुत करें
याद रखें, बच्चे अपने माता-पिता को देखकर ही सीखते हैं। आपके कार्यों की गूंज आपके शब्दों से तेज होती है। पहले खुद अच्छे व्यवहार के द्वारा सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करें फिर बच्चों से अच्छे व्यवहार की अपेक्षा करें।

अच्छा व्यवहार करें
बच्चों से विनम्रता से बात करें। उनकी बातों को ध्यान से सुनें। बच्चे के साथ आपका व्यवहार दूसरों के साथ उसके व्यवहार की आधारशिला है।

उम्र का ध्यान रखें
बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, वैसे-वैसे उनके व्यवहार में बदलाव आता है। जैसे-जैसे बच्चों के व्यवहार में बदलाव आता है, उसके अनुरूप उनके साथ अपने संबंधों में बदलाव लाएं।

बच्चों से ये बातें कभी न कहें
कभी-कभी माता-पिता बच्चों को ऐसी बात कह देते हैं, जो उनके मन में घर कर जाती हैं। इसलिए ऐसी बातें कहने से बचें। जैसे, ‘मैं जब तुम्हारी उम्र की थी तो अधिक जिम्मेदार थी। तुम अपने बहन/भाई की तरह क्यों नहीं बन सकते?’

जिम्मेदार बनाएं
बचपन से ही बच्चों में जिम्मेदारी की भावना विकसित करें। नियम बनाकर चलने के साथ उन्हें आत्म-नियत्रंण सिखाएं।

साथ होने का अहसास कराएं
बच्चों की हर जरूरत के समय उनके लिए मानसिक और शारीरिक रूप से उपलब्ध रहें लेकिन उन्हें थोड़ा स्पेस भी दें। हमेशा उनके साथ साए की तरह न रहें। पूनम मेहता

सही तरीके से बच्चे को समझाएं
बच्चों के कई सवालों का जवाब आपको ही देने होते हैं। शांति और स्नेहपूर्वक होकर स्थिति का सामना करना चाहिए। सही तरीके से बच्चे को समझाएं और उसे हर स्थिति का सामना करने के लिए प्रेरित करें। अच्छी परवरिश वह है जिसमें बच्चे में सहानुभूति, ईमानदारी, आत्म-विश्वास, आत्म-नियंत्रण, दयालुता, सहयोग, मानवता और प्रसन्न व्यवहार के गुण विकसित हों।


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बच्चे पर अपना स्थायी प्रभाव छोड़ना है तो दें ये तोहफा


बच्चे का बर्थडे हो, उसे शाबाशी देनी हो या शॉपिंग का मौका, आप बच्चों के लिए झट से खिलौने खरीद लाती हैं। अगर आप अपने बच्चे को तोहफे देना पसंद करती हैं तो इसमें गलत कुछ नहीं है लेकिन अगर आप बच्चे पर स्थायी प्रभाव छोडऩा चाहती हैं तो एक बेहतर रास्ता अपना सकती हैं। मनोचिकित्सकों का मानना है कि परिवार के साथ छुट्टियों पर जाना बच्चों को खिलौने देने से कहीं बहुत ज्यादा खुशी प्रदान करता है।


इससे अच्छा गिफ्ट नहीं : सर्वे बताते हैं कि पेरेंट्स जितने टॉयज बच्चों को खरीद कर देते हैं उनमें से लगभग दो-तिहाई खिलौने नापसंद करार दिए जाते हैं। जो पसंद किए जाते हैं, उन्हें भी कुछ हफ्ते और कभी-कभी कुछ मिनट ही खेलकर छोड़ दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर परिवार के साथ बिताई गईं छुट्टियां का न केवल वे वर्तमान में लुत्फ उठाते हैं, बल्कि इन पलों को जीवनभर यादों में बसा कर रखते हैं।


सही खिलौने भी जरूरी : इसमें कोई दोराय नहीं कि बच्चों में खेल की भावना को पनपने देने के लिए खिलौने जरूरी हैं लेकिन बहुत से आधुनिक खिलौने बच्चों और परिवार के बीच दूरियां बढ़ाने का काम भी कर रहे हैं। खेल ऐसा हो, जिससे बच्चे को जरूरी अनुभव हो सकें और बड़े भी इसका मजा उठा सकें। इनके बिना भी जीवन बहुत खाली और उत्साहहीन होगा।


मिलेंगे खास अनुभव : बड़ों की ही तरह बच्चे भी भौतिक वस्तुओं से ज्यादा अनुभवों को पसंद करते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि यात्रा को बच्चे एंजॉय करते हैं लेकिन उनका नजरिया बड़ों से अलग होता है। इस दौरान वे जो भी सीखते हैं, उसे हमेशा याद रखते हैं। लेकिन जगह का चुनाव करते वक्त बच्चे की पसंद को ध्यान में रखना जरूरी है।

तनाव की भी छुट्टी : पारिवारिक यात्रा बच्चे को अपने पेरेंट्स का मस्ती भरा रूप देखने का मौका दे सकती है, जो उसे कभी घर में दिखाई नहीं देता। दूसरी ओर आज हमारी जीवनशैली जितनी तनावभरी है, उतनी ही बच्चों की भी हो रही है। पढ़ाई और अच्छे नतीजों का तनाव उन्हें भी स्ट्रेस का शिकार बना रहा है। छुट्टियां हमें इस तनाव भरे जीवन से दूर साथ में रिलेक्स और मस्ती करने का मौका देती हैं।


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ज्यादा उम्र में गर्भवती होने से बेटियों के बांझ होने का खतरा


न्यूयार्क, 10 दिसंबर (आईएएनएस)। महिलाओं का अधिक उम्र में गर्भधारण उनकी
संतान के रूप में जन्मीं बेटियों की प्रजनन क्षमता के लिए नुकसानदेह हो सकता
है। एक शोध में बताया गया है कि जो महिलाएं देर से मां बनती हैं, उनकी बेटियों
में प्रजनन क्षमता प्रभावित होने का जोखिम ज्यादा रहता है।

शोध के निष्कर्षों से पता चलता है कि महिलाओं की प्रजनन क्षमता उम्र के साथ
घटती है, क्योंकि महिला के अंडों में आनुवांशिक दोष एकत्र होता जाता है।

‘द गार्डियन’ की रिपोर्ट के अनुसार, अंडों में बढऩे वाला यह आनुवंशिक दोष
महिला से उनकी बेटियों में पहुंच जाता है, जिससे उनके स्वयं के अंडे की
गुणवत्ता कम होती है।

महिलाओं के पिता की उम्र का हालांकि यहां कोई महत्वपूर्ण प्रभाव देखने को नहीं
मिलता।

रिपोर्ट ने अटलांटा में रिप्रोडक्टिव बायोलॉजी एसोसिएट्स से पीटर नैगी के
हवाले से बताया, ‘‘मां की प्रजनन की आयु न केवल खुद के लिए ही महत्वपूर्ण है,
लेकिन यह निश्चित रूप से उनकी बेटी की प्रजनन क्षमता को निर्धारित करता है,
बल्कि बेटियों के बांझ होने का अंदेशा भी रहता है।’’

उन्होंने आगे कहा, ‘‘जब हम 40 की उम्र की आसपास की महिलाओं को गर्भवती बनने
में मदद करते हैं, उसी दौरान उन बच्चों में बांझपन का जोखिम अधिक रहता है।’’ आज के वातावरण को देखते हुए जिस तरह से खान—पान में बदलाव आया है उसके मुताबिक ही हमारे शरीर में बहुत बदलाव देखने को मिला है। जिस तरह युवा अपनी दिनचर्या में फास्टफूड को अपना रहे हैं उनसे बीमारियों का बढ़ने का तेजी से खतरा बढ़ रहा है।

रजोनिवृत्ति की उम्र अलग-अलग होती है, लेकिन आम तौर पर यह 50 साल की आयु के
करीब होता है। अगर कोई महिला रजोनिवृत्ति के करीब होने के दौरान संतान को जन्म
देती है तो उसकी बेटी की प्रजनन क्षमता प्रभावित होने की आशंका अधिक रहती है।

संबंधित शोधपत्र न्यू ओरलींस स्थित अमेरिकन सोसाइटी ऑफ रिप्रोडक्टिव मेडिसिन
में प्रस्तुत किया गया।

 


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मां—बाप भी सीखें बच्चों से, करें शेयर और रहें खुश


भले ही यह बात सुनने में आपको बचकानी लगे लेकिन अगर आप कभी-कभी अपने बच्चों के स्नैक्स खाती हैं या उनके खिलौनों से खेलती हैं तो इसमें शर्माने वाली कोई बात नहीं है। एक मां होने के नाते आपकी हमेशा यही कोशिश रहती है कि आप बच्चों को सबसे अच्छी चीजें लाकर दें। ऐसे में आप खुद भी कभी-कभी उनका फायदा उठाएं।

खाली समय में मजे करना
आप अपने बच्चों से उनके खेलने का समय भी चुरा सकती हैं यानी आप उनसे बिना प्लान किए खाली समय में मजे करना भी सीख सकती हैं। यह बिना प्लान किया खाली समय आपकी रचनात्मकता, प्रॉब्लम-सॉल्विंग, रिश्तों आदि के लिए तो बेहतर होगी ही, साथ ही आप इस समय में मजे भी कर पाएंगी, जिससे आप खुश रहेंगी।

बच्चों का खाना
हर मां की तरह आपकी भी हमेशा यही कोशिश रहती होगी कि आप अपने बच्चे के लिए सबसे अच्छा खाना और स्नैक्स तैयार करें जिसमें ताजी सब्जियां हों, सभी पोषक तत्व हों और वह स्वादिष्ट भी हो। हालांकि, कभी-कभी बच्चों के लिए यह खाना तैयार करने के बाद आप थक जाती होंगी और खुद जो हाथ आया वह खा लेती होंगी। ऐसे में कुछ भी खाने से अच्छा है कि आप अपने बच्चों के लिए तैयार किए खाने में से ही थोड़ा सा खाना खा लें या बनाते वक्त ज्यादा बनाएं।


कोई किताब
जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं, वह अपनी नई किताबें पढऩा शुरू कर देते हैं और उनकी बुकशेल्फ में पुरानी किताबें यूं ही रखी रहती हैं। आप उनकी इन तस्वीरों वाली किताबों को चुरा सकती हैं यानी उन्हें ले सकती हैं। आप अपने व्यस्त समय में से कुछ समय निकालकर अपने बच्चों की बुकशेल्फ में से कोई किताब पढ़ सकती हैं। आपको वाकई अच्छा लगेगा।

पसंदीदा शब्द
अक्सर ऐसा होता है कि जब आप अपने नन्हे से कुछ करने को कहती हैं तो उसका जवाब होता है न। भले ही उन्हें खुद यह शब्द सुनना पसंद न हो लेकिन उन्हें यह कहना जरूर पसंद होता है, चाहे उनका मतलब हमेशा न नहीं होता। और चूंकि एक कामकाजी मां होने के नाते आप हर समय खुद पर कई जिम्मेदारियां लादे रहती हैं तो ऐसे में आप अपने बच्चे का यह पसंदीदा शब्द चुरा सकती हैं। यानी आप भी लोगों को न कह सकती हैं। याद रखें कि कभी-कभी किसी काम के लिए न कहना भी आपके लिए अच्छा होता है।

क्राफ्ट स्किल्स
आप अपने बच्चों से उनकी क्राफ्ट स्किल्स भी ले सकती हैं। अभिभावक होने का एक फायदा यह भी है कि आप अपने बच्चों के साथ अपने बचपन की गर्मी की छुट्टियों को दोबारा जी सकती हैं। इसमें आपको मजा भी बहुत आएगा।


नोटबुक्स
लिखना याददाश्त और सीखने की प्रक्रिया के लिए अच्छा है। ऐसे में आप अपने बच्चों से उनकी लाइन्स वाली नोटबुक ले सकती हैं और रोज कुछ न कुछ लिख सकती हैं। हमेशा टाइप करने की बजाय हाथों से कुछ लिखें भी।

चुलबुला स्टाइल
आप भले ही अपने बच्चों के कपड़ों में फिट न हो पाएं लेकिन आप उनका चुलबुला सेंस ऑफ स्टाइल, जरूर उनसे उधार ले सकती हैं। इससे न केवल आपको अच्छा महसूस होगा बल्कि आप खुद को खुश भी रख सकेंगी। बच्चों का आनंदित करने वाला सेंस ऑफ स्टाइल आपको भी आनंद से भर देगा और आप जोश से काम करेंगी।


थोड़ी सी झपकी
नेशनल स्लीप फाउंडेशन के अनुसार हर वयस्क को कम से कम 7 से 9 घंटे प्रति रात की नींद लेनी ही चाहिए। हालांकि, अधिकतर कामकाजी मांएं पूरे दिन में भी ऐसा नहीं कर पातीं। इसका असर उनकी सेहत पर पड़ता है। आप जानती ही होंगी कि कैसे आपके बच्चे कभी-कभी रात में आपके पास धीरे से आते हैं और आपका तकिया और कंबल ओढक़र आराम से सो जाते हैं। आप भी काम छोडक़र एक झपकी लें।

बच्चों वाली मूवीज
आप बच्चों वाली मूवीज को अपने बच्चों से चुरा सकती हैं लेकिन इससे ज्यादा आप उन्हें उनके साथ शेयर कर सकती हैं। आप उन्हें अपने बच्चों के साथ देख सकती हैं और उनका मजा ले सकती हैं। इन मूवीज से आपको कई आइडियाज मिल सकते हैं, जैसे बच्चों का ध्यान कैसे रखें, उनके साथ मजे कैसे करें आदि। साथ ही आप इन मूवीज से बहुत कुछ सीख भी सकती हैं, जिन्हें शायद आप अपने ऑफिस में भी इस्तेमाल कर सकें।


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नपुुुुंसकता दूर करने वाली दवा वियाग्रा को लेकर नया खुलासा


नपुंसकता दूर करने वाली दवा ‘वियाग्रा’ गर्भ में शिशुओं को प्रभावित करने वाली गंभीर विकास जटिलताओं को रोकने में प्रभावी नहीं है। एक शोध से यह जानकारी मिली है।

भ्रूण विकास निग्रह, जिसे सामान्य तौर पर अंतर-गर्भाशय वृद्धि अवरोध (आईयूजीआर) कहा जाता है, यह एक जटिल गर्भावस्था की स्थिति है, जिसमें शिशु सामान्य वजन जितना नहीं बढ़ पाता है। यह स्थिति तब पैदा होती है, जब गर्भनाल अपने अंदर रक्त के कमजोर प्रवाह के कारण सही तरीके से विकसित नहीं हो पाता है।

वियाग्रा ब्रांड नाम के तहत बेची जाने वाली दवा सिल्डनाफिल रक्त वाहिकाओं को आराम पहुंचाता है और इसे कई सालों से पुरुषों के शिश्न में उत्थान संबंधी समस्याओं के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। वियाग्रा आईयूजीआर के उपचार में एक संभावित विकल्प के रूप में उभरा था।

लिवरपूल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का कहना है कि गर्भनाल में रक्त आपूर्ति में सुधार करने से गर्भस्थ शिशु के विकास और स्वास्थ्य में सुधार होना चाहिए। हालांकि, द लेंसेट चाइल्ड एंड एडोलेसेंट में प्रकाशित इस शोध के निष्कर्षों में कहा गया है कि जब गंभीर विकास जटिलताओं से प्रभावित गर्भस्थ शिशु की मां को सिल्डनाफिल का डोज दिया गया, तो इससे न तो गर्भावस्था की कम अवधि को बढ़ाने में, न ही गर्भस्थ शिशु के उत्तरजीविता में कोई सुधार, या न ही नवजात की मृत्यु दर में कोई कमी देखी गई।

विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जारको अरलफिरेविक ने कहा, ‘‘दुखद है कि इस दवा का ऐसी अवस्था में प्रयोग अप्रभावी है।’’ अरलफिरेविक ने कहा, ‘‘हालांकि, हमारे लगातार जारी शोध के हिस्से के तहत, हम अब परीक्षण में भाग लेनेवाले शिशुओं की विकास की निगरानी कर रहे हैं, ताकि इस बीमारी के बारे में इस पर इस दवाई के असर के बारे में और जानकारी मिले, ताकि हमें भविष्य में इसके संभावित उपचार विकल्पों की पहचान में मदद मिले।’’

इस अध्ययन में 135 गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया जिन्हें 30 हफ्तों या उससे कम का गर्भ था तथा उनका गर्भस्थ शिशु आईयूजीआर से पीडि़त था। इसमें से 70 महिलाओं को सिल्डनाफिल दवा दी गई, जबकि 65 महिलाओं को प्लेसबो (परीक्षण के दौरान झूठमूठ की दवाई देना, जबकि वास्तव में कोई दवाई नहीं देना) दिया गया था।


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टाइम लैप्स तकनीक: भ्रूण की सेहत पर 5000 डिजीटल तस्वीरों से रखी जाती है नजर, जानिए पूरी प्रोसेस


कई सालों से शिशु की चाह रखने वालों के लिए आईवीएफ तकनीक मददगार है। इसका एक हिस्सा है टाइम लैप्स तकनीक। इसमें भ्रूण की सेहत पर हजारों डिजीटल तस्वीरों के माध्यम से इसके बनने से लेकर यूट्रस तक में पहुंचाने तक पूरी नजर रखते हैं। इन तस्वीरों से डॉक्टर भ्रूण के विकास पर नजर रखते हैं ताकि गर्भपात व भ्रूण में किसी भी दिक्कत की आशंका को कम कर सकें।

यह है तकनीक : इसमें भ्रूण को इन्क्यूबेटर में रखते हैं। यहां से तस्वीर लेकर विशेषज्ञ भ्रूण की ग्रोथ का अध्ययन कर एक निश्चित समय अंतराल पर कोशिकाओं में होने वाले विघटन का विश्लेषण करते हैं। भ्रूण का समय पर विभाजन, सामान्य मानते हैं। इससे सफल इम्प्लांट की संभावना बढ़ती है। तकनीक के जरिए तीन सही दिखने वाले भ्रूणों के बेहतर विकास के आधार पर उन्हें चुनकर यूट्रस में इम्प्लांट करते हैं।

ऐसे पूरी होती प्रक्रिया : पहले पांच दिन भ्रूण को टाइम लैप्स इमेजिंग के साथ लगे इन्क्यूबेटर में विकसित करते हैं। सिस्टम से भ्रूण के विकास की विभिन्न स्टेज की पांच हजार तस्वीरें लेकर उनका विश्लेषण व विशेषज्ञों के साथ चर्चा कर बिना चीरफाड़ के भ्रूण को चुनकर आगे की प्रक्रिया शुरू करते हैं।

कौनसा भ्रूण बेहतर : जो तस्वीरें ली जाती है, उनका गहनता से अध्ययन कर पता लगाते हैं कि किस भ्रूण में असामान्य संख्या में क्रोमोसोम्स होने की सबसे कम या सर्वाधिक आशंका है। एक स्वस्थ मानव भ्रूण में क्रोमोसोम्स के 23 जोड़े होने चाहिए। इस संख्या में किसी भी तरह का बदलाव होने पर इम्प्लांट के विफल होने की आशंका बढती है। क्योंकि यह तकनीक असामान्य क्रोमोसोम्स का जोखिम देखते हुए भ्रूण की स्क्रीनिंग की सुविधा देती है, ऐसे में खतरों को कम कर सकते हैं। भ्रूण में असामान्य संख्या में क्रोमोसोम्स होना आईवीएफ चक्र के विफल होने का बड़ा कारण है। इससे या तो गर्भ में इम्प्लांट करने में असफलता होती है या बाद की स्टेज में गर्भपात हो सकता है या बच्चा डाउन सिंड्रोम या अन्य आनुवांशिक समस्याओं के साथ पैदा हो सकता है।


- डॉ. तरुणा झाम्बा, गाइनेकोलॉजिस्ट, उदयपुर


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बच्चा डरता है अंधेरे या भूत से तो अपनाएं ये टिप्स, बनेगा निडर


भय मन की वह दशा है जिसमें बच्चा किसी काल्पनिक परिस्थिति से डरा रहता है। यह जन्मजात न होकर वातावरण पर आधारित है, अत: इसे दूर किया जा सकता है। एक अध्ययन में देखा गया है कि चार वर्ष की आयु तक बच्चा सांप से नहीं डरता। उसे ज्ञात ही नहीं होता कि सांप खतरनाक होते हैं। सांप से खतरे की बात सुनते-सुनते बच्चा सांप से डरने लगता है। जबकि कई बच्चों ने तो प्रत्यक्ष रूप से सांप को देखा ही नही होता है।

माता-पिता तथा अभिभावक अनजाने में ही रात्रि में जब छोटा बच्चा सोने में आनाकानी करता है, तो उसे बाबाजी, भूत-प्रेत, शेर का डर दिखाकर सुलाने की कोशिश करते हैं। अध्ययन से पता चला है कि इस प्रकार की भावना से ग्रसित बच्चे छोटी सी घटना से कांपने तथा चिल्लाने लगते हैं, डरकर मां से चिपक जाते है और अकेले जाने से डरते हैं। कम उम्र के अधिकतर बच्चे तेज आवाज, बिजली की चमक, बादलों का गर्जना, अकेलापन, जानवर, अंधेरे स्थान से डरते है।

भय को दूर करने के लिए आप ये उपाय करें

  • बच्चों में अंधकार का काल्पनिक डर घर कर जाता है। ऐसे बच्चों को अपने साथ अंधेरे में हाथ पकडक़र ले जाएं और फिर लाइट जलाकर बताएं कि यहां डरने की कोई चीज नहीं है।
  • उन्हें साहसी बनाएं, कहानियों द्वारा और स्वयं अपने उदाहरणों द्वारा। उन्हें वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, मोगली आदि की कहानियां सुनानी चाहिए, जिससे उनका आत्म-विश्वास बढ़े।
  • दण्ड का भय अमनोवैज्ञानिक है। माता-पिता तथा शिक्षक द्वारा अत्यधिक भय नहीं दिखाना चाहिए। घर व विद्यालय का वातावरण भयहीन होना चाहिए।
  • यदि बच्चा बिल्ली, चूहे, कुत्ते आदि से डरता है तो उसे इन जानवरों के चित्र दिखाकर उनसे परिचित कराना चाहिए।
  • ऐसे वीडियो दिखाएं, जिसमें बच्चे कुत्ते, बिल्लियों के साथ खेल रहे हों तथा इन्हें हाथ फिराकर प्यार कर रहे हों। इससे बच्चों के मन से जानवरों का डर दूर हो जाएगा।

डॉ. आशा पारीक, बाल मनोविशेषज्ञ


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महिलाओं को इसलिए होता है अजीब खाने का मन


आपने अक्सर सुना होगा, देखा होगा या खुद महसूस किया होगा कि प्रेग्नेंसी के दौरान अक्सर महिलाएं अजीब चीजें खाती हैं। कई बार तो उन्हें ऐसी चीजें खाने की इच्छा होती है जिन्हें उन्होंने कभी नहीं खाया या काफी समय से नहीं खाया। कई महिलाएं मीठा ज्यादा खाने लगती हैं, तो कई खट्टा या नमकीन। कुछ महिलाओं को इस दौरान मिट्टी, चॉक जैसी चीजें खाने का भी मन करता है। हालांकि, क्या आप जानती हैं कि ऐसा क्यों होता है? क्यों जिंदगी के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर महिलाओं की खाने की आदत अजीब हो जाती हैं?


असल में होती है क्रेविंग
प्रेग्नेंट होने का मतलब यह नहीं है कि आप एक सामान्य इंसान होना बंद कर दें जिसे खाने की क्रेविंग होती है। आपको भी किसी खास चीज को खाने का मन कर सकता है और आपको इस दौरान जो मन करे, वह जरूर खाना चाहिए। हालांकि प्रेग्नेंसी के दौरान हॉर्मोनल बदलाव की वजह से भी आपको क्रेविंग होती है। अत: इस दौरान आपको जो खाने का मन करे, वह खाएं।

चाहे हो बहाना
कभी-कभी कुछ महिलाएं सिर्फ वह चीजें खाने के लिए क्रेविंग का बहाना करती हैं, जिन्हें वह आमतौर पर नहीं खातीं। उदाहरण के तौर पर हो सकता है कि आप आइसक्रीम, बर्गर, पिज्जा, पास्ता आदि को अवॉइड करती हैं, लेकिन प्रेग्नेंसी के दौरान कुछ खास खाने की इच्छा होने का बहाना बनाकर इन चीजों को खा सकती हैं।

कुछ कमी तो नहीं
कुछ महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान मिट्टी, चॉक, कागज, क्ले आदि खाने लगती हैं। हालांकि, इसकी वास्तविक वजह कोई नहीं जानता लेकिन हो सकता है कि ऐसा वह आयरन, जिंक या किसी और चीज की कमी की वजह से कर रही हों। कभी-कभी प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं में किसी खास चीज की कमी हो जाती है और इसी वजह से उन्हें यह अजीब चीजें खाने का मन होता है। अजीब चीजें खाने पर उन्हें डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

वजह सांस्कृतिक भी
कई बार महिलाएं कुछ अजीब चीजें इसलिए भी खाती हैं क्योंकि उनके परिवार में या समाज में ऐसा होता है। कई बार सांस्कृतिक वजहों के कारण भी महिलाएं अजीब चीजें खाती हैं जैसे अगर किसी जगह के लोग मानते हों कि जब प्रेग्नेंट महिला का जी मिचलाए तो मिट्टी खाने से आराम मिलता है, ऐसे में वहां की इस दौरान महिलाएं मिट्टी
खाती हैं।


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नहाने में नाटकबाजी करता है बच्चा तो अपनाएं ये मजेदार ट्रिक्स


अधिकतर बच्चों को नहाना पसंद होता है क्योंकि इसमें वह खूब सारी मस्ती करते हैं। उन्हें नहाने से आराम मिलता है और साथ ही खेलने को भी मिलता है। हालांकि, कुछ अभिभावकों के लिए अपने बच्चों को नहलाना एक बहुत ही मुश्किल काम होता है। कुछ बच्चों को नहाना बिल्कुल पसंद नहीं होता और उन्हें नहलाने के लिए उनके माता-पिता को जंग सी लडऩी होती है। अगर आपके बच्चे को भी नहाने में मजे नहीं आते तो इन तरीकों को अपनाकर इसे मजेदार बनाएं...

थीम्ड बाथ
अगर आपके नन्हे को नहाने से डर लगता है तो आप उसके पसंदीदा खिलौने पर नहाने का डेमो दिखा सकती हैं। जब वह अपने खिलौने को नहाते हुए और मजे करते हुए देखेगा तो यकीनन ही उसका भी नहाने का मन करेगा और वह बिना डर के नहाएगा। इसमें उसे मजा भी बहुत आएगा।

नहाते समय पेंट
आप अपने नन्हे को नहाते समय बाथरूम की दीवारों, बाथटब, टाइल्स और खुद पर भी पेंट करने की इजाजत दे सकती हैं। इससे उसे नहाने में मजा भी आएगा। आप इस पेंट को आराम से घर पर बना सकती हैं। एक चम्मच मक्के का आटा, चार से छह पम्प्स बेबी शैंपू, दो से तीन बूंद फूड कलर और एक से दो चम्मच पानी मिलाकर आप यह पेंट बना सकती हैं।

रोल प्ले
नहाते समय आपका बच्चा जिस चीज से डरता है, चाहे वह बाल धोना हो, स्पॉन्ज हो या कुछ और, आप उसके खिलौनों के साथ वह सब करके दिखा सकती हैं। उसके खिलौनों को नाम दें और उन्हें कैरेक्टर बना दें। इसके बाद उनके साथ वह चीजें करें, जिनसे आपका बच्चा डरता है या एंजॉय भी करता है। इससे बच्चे का डर निकलेगा और आत्मविश्वास बढ़ेगा।

संवेदक अनुभव दें
जब भी आप अपने नन्हे को नहलाने जाएं तो वहां विभिन्न चीजें रख दें, जिन्हें वह पकड़ सके और महसूस कर सके। इसके लिए आप सॉफ्ट फ्लैनल्स, अलग तरह के फिसलने वाले साबुन, गुब्बारा आदि का इस्तेमाल कर सकती हैं।

बबल्स
एक बबल बाथ किसे पसंद नहीं होता? आप अपने नन्हे को नहलाते समय बबल्स का इस्तेमाल कर सकती हैं। आप इनकी मदद से बच्चे या अपना क्रेजी हेयरस्टाइल, उसकी दाढ़ी-मूंछ या कोई भी चीज बना सकते हैं। इसमें बच्चे को मजा आएगा और वह खिलखिलाते हुए नहा भी लेगा।

खिलौनों के साथ लुका-छिपी
इसके लिए आपको अलग-अलग साइज के स्पॉन्ज और धुले हुए कपड़ों की जरूरत पड़ेगी। अब आप अपने बच्चे को इन्हें छिपाने के लिए कहें और खुद उन्हें ढूंढें। याद रखें कि आप उन्हें जल्दी न ढूंढें और बच्चे से जानबूझकर पूछें कि उसने कहां छिपाया है। इससे बच्चे को मजा आएगा और वह नहाने से भागेगा नहीं।


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एड्स पीड़ित महिला को भी मिल सकता है मातृत्व सुख, जानें कैसे


एच आई वी से संक्रमित जोड़ों के लिए खुशखबरी है कि वे भी अब मातृत्व सुख का आनंद ले सकते हैं। ये मुमकिन है उन एड्स से संक्रमित जोड़ों में जिसमें स्त्री एच आई वी नेगेटिव है व पुरुष एच आई वी पॉजिटिव है। ऐसा जोड़ा फर्टिलिटी उपचारों की मदद से अपनी सूनी गोद हरी कर सकता है। आई यू आई, आई वी एफ व ईक्सी की मदद से स्त्री के संक्रमित होने की आशंका को काफी हद तक कम किया जा सकता है, इस वजह से माता से शिशु को होने वाला संक्रमण का खतरा भी कम हो जाता है।

दो तरह के उपचार
दो प्रकार से फर्टिलिटी उपचारों को लिया जा सकता है।
स्पर्म डोनर
पहला तरीका स्पर्म डोनर हो सकता है। इस उपचार में एच आई वी नेगेटिव स्त्री छांट कर निकाले गए शुक्राणु को गर्भधारण के लिए इस्तेमाल में लेती है। ये तरीका ठीक उसी प्रकार है जो स्त्री उस वक्त लेती यदि पुरुष बांझपन का शिकार होता तो।
स्पर्म वाशिंग
दूसरा उपाय है स्पर्म वाशिंग जो बहुत सफलतापूर्वक कई दम्पति सिर्फ इसलिए अपना रहे हैं क्योंकि वो आनुवांशिक रूप से अपने पुरुष साथी को पिता बनते देखना चाहते हैं। यह उपचार इस सिद्धांत पर आधारित है कि एच आई वी से संक्रमित पदार्थ केवल शुक्र संबंधी द्रव में मौजूद होते हैं न कि शुक्राणु में। पुरुष के सेमनल फ्लूइड को प्रयोगशाला में अच्छे से धोया जाता है ताकि उसका संक्रमण हटाया जा सके। इसके बाद उस शुक्राणु को तब तक संग्रहित रखा जाता है जब तक कि महिला में अण्डोत्सर्ग न होने लगे। अण्डोत्सर्ग होने पर आई यू आई की मदद से महिला के गर्भ में शुक्राणु स्थापित कर दिया जाता है। यदि जोड़ीदार में कोई अन्य फर्टिलिटी संबंधित दिक्कत है तो आई वी एफ या ईक्सी की मदद भी ली जा सकती है।
नई तकनीक की वजह से अब'एड्स पीडि़त जोड़े भी चिन्तामुक्त होकर फर्टिलिटी ट्रीटमेंट की मदद से अपने घर में किलकारियों की गूंज अनुभव कर सकते हैं। फर्टिलिटी उपचारों की मदद से वो खुद की सन्तान प्राप्त कर सकते हैं वो भी इस विश्वास के साथ कि उसमें एच आई वी संक्रमित होने का खतरा बहुत कम होगा।


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जब बच्चों को सर्दियों में हो बुखार, तो करें ये उपचार


विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, स्ट्रेप्टोकोकस (यह एक बैक्टीरिया है जो निमोनिया की वजह बनता है) निमोनिया पांच साल से छोटी उम्र के बच्चों के अस्पताल में भर्ती होने व मृत्यु होने का प्रमुख कारण है। सर्दियों के मौसम में निमोनिया को लेकर खास सतर्कता बरतना जरूरी है। यह रोग असल में बैक्टीरिया, वायरस, फंगस या परजीवी की वजह से फेफड़ों में होने वाला एक प्रकार का संक्रमण है। यह फेफड़ों में एक तरल पदार्थ जमा करके खून और ऑक्सीजन के बहाव में रुकावट पैदा करता है। बलगम वाली खांसी, सीने में दर्द, तेज बुखार और सांसों में तेजी निमोनिया के लक्षण हैं। लेकिन कई बार आम फ्लू, छाती का संक्रमण व लगातार खांसी के लक्षण निमोनिया से मिलते हैं। इसलिए फ्लू या जुकाम जैसे लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो बच्चे को विशेषज्ञ को जरूर दिखाएं।
प्रमुख वजह
निमोनिया कई तरीकों से फैल सकता है। इसके वायरस और बैक्टीरिया अक्सर बच्चों के नाक या गले में पाए जाते हैं। ये सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंच जाते हैं। खांसी या छींकों से भी वायरस व बैक्टीरिया फैलते हैं। इसके साथ ही जन्म के समय या उसके तुरंत बाद रक्त के जरिए भी निमोनिया हो सकता है।
ध्यान रहे
यदि मां को सर्दी-जुकाम की समस्या है तो उन्हें इसका फौरन इलाज कराना चाहिए क्योंकि ब्रेस्ट फीडिंग कराने पर यह तकलीफ बच्चे को भी प्रभावित कर सकती है।

कमजोर प्रतिरोधक क्षमता से अधिक खतरा
नवजात और समय पूर्व प्रसव से होने वाले बच्चे (जिनकी उम्र दो से पांच साल तक हो) के फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं हों तो उन्हें निमोनिया का खतरा ज्यादा रहता है। सांस-नली में अवरोध और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले बच्चों को भी निमोनिया की आशंका रहती है। अस्वस्थ व अस्वच्छ वातावरण, कुपोषण और स्तनपान की कमी से भी निमोनिया से पीडि़त बच्चों की अधिक खतरा रहता है। ऐसे में माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को सही समय पर जरूरी वैक्सीन लगवाएं।

नैबुलाइजर का प्रयोग
निमोनिया होने की स्थिति में डॉक्टर की सलाह से बच्चे को नैबुलाइजर भी दिया जाता है। ऐसे में घरवालों को चाहिए कि वे बच्चे को नैबुलाइज करने के बाद मशीन का पाइप और मास्क अच्छी तरह से साफ करें जिससे संक्रमण का खतरा नहीं रहता।
प्री-मैच्योर बेबी
समय से पूर्व जन्मे बच्चों (प्री-मैच्योर बेबी) की रोग प्रतिरोधक क्षमता सामान्य शिशुओं की तुलना में कम होती है इसलिए इन्हें निमोनिया का खतरा अधिक होता है। ऐसे में घरवालों को यदि बुखार, खांसी या सर्दी-जुकाम की तकलीफ है तो वे अपना इलाज कराएं ताकि बच्चे में संक्रमण न फैले। साथ ही साफ-सफाई का भी विशेष ध्यान रखें।
कपड़े न लादें
सर्दी के नाम पर माता-पिता अक्सर बच्चों को कपड़ों से लाद देते हैं। ऐसा न करें, बच्चे को ऐसे कपड़े पहनाएं जो उनके लिए आरामदायक हों। कई बार ज्यादा तंग कपड़े होने पर बच्चे की जांघों और घुटनों के पीछे वाले हिस्से में पसीना आने लगता है और उस अंग की त्वचा कमजोर पड़ सकती है।
बच्चे को सुलाते समय
इस मौसम में बच्चे को सुलाते हुए कंबल आदि ओढ़ाने के बाद कमरा एकदम बंद न करें। हवा की आवाजाही के लिए दरवाजा या खिड़की थोड़ी खुली रखें। इसके अलावा बच्चे को धूप में बिठाना या लेटाना चाहते हैं तो उसकी प्राकृतिक तेल जैसे सरसों या नारियल से मालिश करें क्योंकि ये तेल त्वचा में अच्छी तरह से एब्जॉर्ब होकर शरीर के तापमान को नियंत्रित रखते हैं। बच्चे को सर्दी लगने के डर से 24 घंटे कमरे में बंद न रखें। ऐसा केवल तभी करें जब बाहर तेज हवा हो।
जब न नहलाएं
सर्दी अधिक होने पर यदि आप बच्चे को नहलाना नहीं चाहते तो उसे स्पंज कर सकते हैं। लेकिन ध्यान रहे कि पानी न तो अधिक ठंडा और न ही ज्यादा गर्म।
प्रिवेंटिव डोज
डेढ़, ढाई और साढ़े तीन माह पर बच्चों को निमोनिया से बचाव के लिए टीका लगाया जाता है। इसके अलावा छह महीने के बाद फ्लू का टीका भी उनके लिए सुरक्षा कवच का काम करता है।


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बच्चों की जुड़ी हुई जीभ से भी होती है बोलने में समस्या


टंग टाई जिसे आम बोलचाल में 'जुड़ी हुई जीभ या जीभ का मोटा तांतु होना भी कहते हैं। यह मुंह में जन्म के साथ होने वाली विकृति है। ये 5 से 10 प्रतिशत बच्चों में पाई जाती है। वैसे यह समस्या आमतौर पर लड़कों में ज्यादा होती है। ऐसा जीभ की निचली सतह को मुंह के निचले भाग से जोड़ने वाले तांतुनुमा फ्रेनुलम के असामान्य रूप से मोटा,छोटा और कड़ा होने की वजह से होता है। इससे जीभ पूरी तरह गति नहीं करती व कुछ मामलों में पूरी बाहर नहीं आ पाती जिसे एनकाइलोग्लोसिया भी कहते हैं।

ओरल हाइजीन का अभाव
इस अवस्था का दुष्प्रभाव बच्चों में कम या ज्यादा अलग-अलग हो सकता है। कुछ बच्चों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, वहीं इस समस्या के कारण देखने में आया है कि कुछ बच्चों में यह स्थिति बोलने और खाने या निगलने को प्रभावित कर देती है। इसके अलावा कई मामलों में ब्रेस्टफीड करने में दिक्कत आती है। वहीं जीभ की पूरी तरह मूवमेंट न होने से ओरल हाइजीन यानी दांतों व मसूड़ों की ठीक से सफाई नहीं हो पाती।
फ्रेनुलोप्लास्टी से इलाज
यदि इससे किसी तरह की कोई खास समस्या नहीं हो रही है तो विशेष इलाज की जरूरत नहीं होती है। लेकिन यदि बोलने या खाने में दिक्कत हो तो इसे ठीक किया जाता है। छोटे शिशुओं में इस तांतु को काट दिया जाता है। लेकिन उम्र अधिक होने या यह तांतु ज्यादा मोटा होने पर इसे सर्जरी से दुरुस्त किया जाता है। इस उपचार को फ्रेनुलोप्लास्टी कहते हैं।


टंग टाई की वजह से स्तनपान करते समय ठीक ढंग से स्तनपान करने में आपके शिशु को काफी परेशानी आएगी क्योंकि वह सही तरीके से स्तन को चूस नहीं पाएगा। क्योंकि टंग टाई की वजह से आपका बच्चा सारा दूध चूसने में सक्षम नहीं होगा, तो जाहिर बात है कि आपके दूध की आपूर्ति में भी कमी आएगी। इसको रोकने के लिए बेहतर रहेगा कि आप पम्पिंग का इस्तेमाल करें। अगर आप निर्धारित समय तक स्तनपान करवाते रहना चाहती है, तो आपका ऐसा करना बहुत जरूर हो जाता है।


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