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जानें गर्भावस्था में पोटैशियम लेना क्यों जरूरी


जयपुर। सोडियम के साथ पोटैशियम स्वस्थ रक्तचाप बनाए रखने में मदद करता है। सोडियम कोशिकाओं से तरल पदार्थ लेता है और रक्तचाप को बढ़ाता है और यह कोशिकाओं में तरल पदार्थ को बनाए रखने में मदद करता है। सोडियम अधिक लेने से इसका स्राव तेजी से बढ़ जाता है। गर्भावस्था में पोषक तत्वों की ज्यादा जरूरत होती है। पोटैशियम आवश्यक खनिज तत्त्व है। शरीर में कोशिकाओं में द्रव और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन को बनाए रखता है। यह तंत्रिका आवेग, मांसपेशियों में संकुचन और कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन से ऊर्जा निकालकर शरीर में प्रसारित करता है।

तुरन्त चिकित्सक से सलाह लें

पोटैशियम ऐसा मिनरल है जो शरीर के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण है। पोटैशियम दिल, किडनी और अन्‍य अंगों के सामान्‍य रूप से काम करने के लिए आवश्‍यक है। पोटैशियम एक इलेक्ट्रोलाइट है। यह पोषक तत्‍वों को कोशिकाओं के अंदर और अपशिष्‍ट उत्‍पादों को कोशिकाओं से बाहर ले जाने में मदद करता है। इसलिए पोटैशियम की कमी से होने वाले लक्षण नजर आने पर तुरन्त चिकित्सक से सलाह लें।

4700 मिलीग्राम पोटैशियम की जरूरत

सामान्यत: महिला को प्रतिदिन 4700 मिलीग्राम पोटैशियम की जरूरत होती है। यद्यपि गर्भावस्था में इसकी जरूरत बढ़ती नहीं है, लेकिन पोटैशियम युक्त भोजन नियमित लेना जरूरी है। गर्भावस्था के दौरान रक्तचाप 50 प्रतिशत तक बढ़ता है।

कर्डियक अरेस्ट का कारण बन सकता

गर्भावस्था में हाइपरक्लेमिया या उच्च पोटैशियम का स्तर खतरनाक हो सकता है। यह कार्डियक अरेस्ट का कारण बन सकता है। किडनी की फेल्योरिटी का कारण भी है।

कम हो स्तर तो सावधान

गर्भवती महिला में पोटैशियम के स्तर में कमी से थकान, पानी की कमी से पैरों, टखने में सूजन, निम्न रक्तचाप से चक्कर आना, हाथ-पैरों की उंगलियों में अकडऩ, मांसपेशियों में असामान्य कमजोरी, कब्ज, असामान्य दिल की धड़कन और अवसाद हो सकता है। प्राकृतिक खाद्य पदार्थ से भी इसके कमी को पूरा किया जा सकता है। टमाटर, आलू, केला, बीन्स, हरी पत्तेदार सब्जियां, दही, मछली, मशरूम आदि में यह भरपूर मात्रा में होता है।

 


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ज्यादा उम्र में गर्भवती होने से बेटियों के बांझ होने का खतरा


न्यूयार्क, 10 दिसंबर (आईएएनएस)। महिलाओं का अधिक उम्र में गर्भधारण उनकी
संतान के रूप में जन्मीं बेटियों की प्रजनन क्षमता के लिए नुकसानदेह हो सकता
है। एक शोध में बताया गया है कि जो महिलाएं देर से मां बनती हैं, उनकी बेटियों
में प्रजनन क्षमता प्रभावित होने का जोखिम ज्यादा रहता है।

शोध के निष्कर्षों से पता चलता है कि महिलाओं की प्रजनन क्षमता उम्र के साथ
घटती है, क्योंकि महिला के अंडों में आनुवांशिक दोष एकत्र होता जाता है।

‘द गार्डियन’ की रिपोर्ट के अनुसार, अंडों में बढऩे वाला यह आनुवंशिक दोष
महिला से उनकी बेटियों में पहुंच जाता है, जिससे उनके स्वयं के अंडे की
गुणवत्ता कम होती है।

महिलाओं के पिता की उम्र का हालांकि यहां कोई महत्वपूर्ण प्रभाव देखने को नहीं
मिलता।

रिपोर्ट ने अटलांटा में रिप्रोडक्टिव बायोलॉजी एसोसिएट्स से पीटर नैगी के
हवाले से बताया, ‘‘मां की प्रजनन की आयु न केवल खुद के लिए ही महत्वपूर्ण है,
लेकिन यह निश्चित रूप से उनकी बेटी की प्रजनन क्षमता को निर्धारित करता है,
बल्कि बेटियों के बांझ होने का अंदेशा भी रहता है।’’

उन्होंने आगे कहा, ‘‘जब हम 40 की उम्र की आसपास की महिलाओं को गर्भवती बनने
में मदद करते हैं, उसी दौरान उन बच्चों में बांझपन का जोखिम अधिक रहता है।’’ आज के वातावरण को देखते हुए जिस तरह से खान—पान में बदलाव आया है उसके मुताबिक ही हमारे शरीर में बहुत बदलाव देखने को मिला है। जिस तरह युवा अपनी दिनचर्या में फास्टफूड को अपना रहे हैं उनसे बीमारियों का बढ़ने का तेजी से खतरा बढ़ रहा है।

रजोनिवृत्ति की उम्र अलग-अलग होती है, लेकिन आम तौर पर यह 50 साल की आयु के
करीब होता है। अगर कोई महिला रजोनिवृत्ति के करीब होने के दौरान संतान को जन्म
देती है तो उसकी बेटी की प्रजनन क्षमता प्रभावित होने की आशंका अधिक रहती है।

संबंधित शोधपत्र न्यू ओरलींस स्थित अमेरिकन सोसाइटी ऑफ रिप्रोडक्टिव मेडिसिन
में प्रस्तुत किया गया।

 


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नपुुुुंसकता दूर करने वाली दवा वियाग्रा को लेकर नया खुलासा


नपुंसकता दूर करने वाली दवा ‘वियाग्रा’ गर्भ में शिशुओं को प्रभावित करने वाली गंभीर विकास जटिलताओं को रोकने में प्रभावी नहीं है। एक शोध से यह जानकारी मिली है।

भ्रूण विकास निग्रह, जिसे सामान्य तौर पर अंतर-गर्भाशय वृद्धि अवरोध (आईयूजीआर) कहा जाता है, यह एक जटिल गर्भावस्था की स्थिति है, जिसमें शिशु सामान्य वजन जितना नहीं बढ़ पाता है। यह स्थिति तब पैदा होती है, जब गर्भनाल अपने अंदर रक्त के कमजोर प्रवाह के कारण सही तरीके से विकसित नहीं हो पाता है।

वियाग्रा ब्रांड नाम के तहत बेची जाने वाली दवा सिल्डनाफिल रक्त वाहिकाओं को आराम पहुंचाता है और इसे कई सालों से पुरुषों के शिश्न में उत्थान संबंधी समस्याओं के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। वियाग्रा आईयूजीआर के उपचार में एक संभावित विकल्प के रूप में उभरा था।

लिवरपूल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का कहना है कि गर्भनाल में रक्त आपूर्ति में सुधार करने से गर्भस्थ शिशु के विकास और स्वास्थ्य में सुधार होना चाहिए। हालांकि, द लेंसेट चाइल्ड एंड एडोलेसेंट में प्रकाशित इस शोध के निष्कर्षों में कहा गया है कि जब गंभीर विकास जटिलताओं से प्रभावित गर्भस्थ शिशु की मां को सिल्डनाफिल का डोज दिया गया, तो इससे न तो गर्भावस्था की कम अवधि को बढ़ाने में, न ही गर्भस्थ शिशु के उत्तरजीविता में कोई सुधार, या न ही नवजात की मृत्यु दर में कोई कमी देखी गई।

विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जारको अरलफिरेविक ने कहा, ‘‘दुखद है कि इस दवा का ऐसी अवस्था में प्रयोग अप्रभावी है।’’ अरलफिरेविक ने कहा, ‘‘हालांकि, हमारे लगातार जारी शोध के हिस्से के तहत, हम अब परीक्षण में भाग लेनेवाले शिशुओं की विकास की निगरानी कर रहे हैं, ताकि इस बीमारी के बारे में इस पर इस दवाई के असर के बारे में और जानकारी मिले, ताकि हमें भविष्य में इसके संभावित उपचार विकल्पों की पहचान में मदद मिले।’’

इस अध्ययन में 135 गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया जिन्हें 30 हफ्तों या उससे कम का गर्भ था तथा उनका गर्भस्थ शिशु आईयूजीआर से पीडि़त था। इसमें से 70 महिलाओं को सिल्डनाफिल दवा दी गई, जबकि 65 महिलाओं को प्लेसबो (परीक्षण के दौरान झूठमूठ की दवाई देना, जबकि वास्तव में कोई दवाई नहीं देना) दिया गया था।


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टाइम लैप्स तकनीक: भ्रूण की सेहत पर 5000 डिजीटल तस्वीरों से रखी जाती है नजर, जानिए पूरी प्रोसेस


कई सालों से शिशु की चाह रखने वालों के लिए आईवीएफ तकनीक मददगार है। इसका एक हिस्सा है टाइम लैप्स तकनीक। इसमें भ्रूण की सेहत पर हजारों डिजीटल तस्वीरों के माध्यम से इसके बनने से लेकर यूट्रस तक में पहुंचाने तक पूरी नजर रखते हैं। इन तस्वीरों से डॉक्टर भ्रूण के विकास पर नजर रखते हैं ताकि गर्भपात व भ्रूण में किसी भी दिक्कत की आशंका को कम कर सकें।

यह है तकनीक : इसमें भ्रूण को इन्क्यूबेटर में रखते हैं। यहां से तस्वीर लेकर विशेषज्ञ भ्रूण की ग्रोथ का अध्ययन कर एक निश्चित समय अंतराल पर कोशिकाओं में होने वाले विघटन का विश्लेषण करते हैं। भ्रूण का समय पर विभाजन, सामान्य मानते हैं। इससे सफल इम्प्लांट की संभावना बढ़ती है। तकनीक के जरिए तीन सही दिखने वाले भ्रूणों के बेहतर विकास के आधार पर उन्हें चुनकर यूट्रस में इम्प्लांट करते हैं।

ऐसे पूरी होती प्रक्रिया : पहले पांच दिन भ्रूण को टाइम लैप्स इमेजिंग के साथ लगे इन्क्यूबेटर में विकसित करते हैं। सिस्टम से भ्रूण के विकास की विभिन्न स्टेज की पांच हजार तस्वीरें लेकर उनका विश्लेषण व विशेषज्ञों के साथ चर्चा कर बिना चीरफाड़ के भ्रूण को चुनकर आगे की प्रक्रिया शुरू करते हैं।

कौनसा भ्रूण बेहतर : जो तस्वीरें ली जाती है, उनका गहनता से अध्ययन कर पता लगाते हैं कि किस भ्रूण में असामान्य संख्या में क्रोमोसोम्स होने की सबसे कम या सर्वाधिक आशंका है। एक स्वस्थ मानव भ्रूण में क्रोमोसोम्स के 23 जोड़े होने चाहिए। इस संख्या में किसी भी तरह का बदलाव होने पर इम्प्लांट के विफल होने की आशंका बढती है। क्योंकि यह तकनीक असामान्य क्रोमोसोम्स का जोखिम देखते हुए भ्रूण की स्क्रीनिंग की सुविधा देती है, ऐसे में खतरों को कम कर सकते हैं। भ्रूण में असामान्य संख्या में क्रोमोसोम्स होना आईवीएफ चक्र के विफल होने का बड़ा कारण है। इससे या तो गर्भ में इम्प्लांट करने में असफलता होती है या बाद की स्टेज में गर्भपात हो सकता है या बच्चा डाउन सिंड्रोम या अन्य आनुवांशिक समस्याओं के साथ पैदा हो सकता है।


- डॉ. तरुणा झाम्बा, गाइनेकोलॉजिस्ट, उदयपुर


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महिलाओं को इसलिए होता है अजीब खाने का मन


आपने अक्सर सुना होगा, देखा होगा या खुद महसूस किया होगा कि प्रेग्नेंसी के दौरान अक्सर महिलाएं अजीब चीजें खाती हैं। कई बार तो उन्हें ऐसी चीजें खाने की इच्छा होती है जिन्हें उन्होंने कभी नहीं खाया या काफी समय से नहीं खाया। कई महिलाएं मीठा ज्यादा खाने लगती हैं, तो कई खट्टा या नमकीन। कुछ महिलाओं को इस दौरान मिट्टी, चॉक जैसी चीजें खाने का भी मन करता है। हालांकि, क्या आप जानती हैं कि ऐसा क्यों होता है? क्यों जिंदगी के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर महिलाओं की खाने की आदत अजीब हो जाती हैं?


असल में होती है क्रेविंग
प्रेग्नेंट होने का मतलब यह नहीं है कि आप एक सामान्य इंसान होना बंद कर दें जिसे खाने की क्रेविंग होती है। आपको भी किसी खास चीज को खाने का मन कर सकता है और आपको इस दौरान जो मन करे, वह जरूर खाना चाहिए। हालांकि प्रेग्नेंसी के दौरान हॉर्मोनल बदलाव की वजह से भी आपको क्रेविंग होती है। अत: इस दौरान आपको जो खाने का मन करे, वह खाएं।

चाहे हो बहाना
कभी-कभी कुछ महिलाएं सिर्फ वह चीजें खाने के लिए क्रेविंग का बहाना करती हैं, जिन्हें वह आमतौर पर नहीं खातीं। उदाहरण के तौर पर हो सकता है कि आप आइसक्रीम, बर्गर, पिज्जा, पास्ता आदि को अवॉइड करती हैं, लेकिन प्रेग्नेंसी के दौरान कुछ खास खाने की इच्छा होने का बहाना बनाकर इन चीजों को खा सकती हैं।

कुछ कमी तो नहीं
कुछ महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान मिट्टी, चॉक, कागज, क्ले आदि खाने लगती हैं। हालांकि, इसकी वास्तविक वजह कोई नहीं जानता लेकिन हो सकता है कि ऐसा वह आयरन, जिंक या किसी और चीज की कमी की वजह से कर रही हों। कभी-कभी प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं में किसी खास चीज की कमी हो जाती है और इसी वजह से उन्हें यह अजीब चीजें खाने का मन होता है। अजीब चीजें खाने पर उन्हें डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

वजह सांस्कृतिक भी
कई बार महिलाएं कुछ अजीब चीजें इसलिए भी खाती हैं क्योंकि उनके परिवार में या समाज में ऐसा होता है। कई बार सांस्कृतिक वजहों के कारण भी महिलाएं अजीब चीजें खाती हैं जैसे अगर किसी जगह के लोग मानते हों कि जब प्रेग्नेंट महिला का जी मिचलाए तो मिट्टी खाने से आराम मिलता है, ऐसे में वहां की इस दौरान महिलाएं मिट्टी
खाती हैं।


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प्रेग्नेंसी में कब्ज की समस्या: इस तरह पाएं निजात


कब्ज की समस्या प्रेग्नेंसी के दौरान आमतौर पर 60—70 फीसदी महिलाओं को किसी न किसी तिमाही में होती है। इसका प्रमुख कारण अचानक हार्मोन्स में होने वाला बदलाव व मानसिक तनाव है। कई बार कब्ज की दिक्कत गंभीर समस्या भी बन जाती है जिसके लिए स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना जरूरी है। इससे राहत पाने के लिए जीवनशैली में हल्की-फुल्की शारीरिक गतिविधि को जोडऩे के अलावा डाइट में तरल चीजें थोड़ी ज्यादा खाने के लिए कहते हैं। विशेषज्ञ से जानते हैं इस बारे में -

आंतों पर दबाव
प्रेग्नेंसी में प्रोजेस्ट्रॉन हार्मोन का स्त्राव बढऩे से खासकर पाचनतंत्र की नाजुक और नरम मांसपेशियां ज्यादा रिलैक्स हो जाती हैं। जिससे इसकी कार्यप्रणाली बाधित होती है और पेट साफ होने में शिथिलता आती है। वहीं दूसरी व तीसरी तिमाही में गर्भस्थ शिशु का आकार बढऩे से आंतों पर पडऩे वाले दबाव की भी दिक्कत रहती है। हाइपोथायरॉइड के कारण भी कब्ज की आंशका रहती है। इसलिए थायरॉइड टैस्ट कराया जाता है।

ध्यान दें
जिन्हें लंबे समय तक कब्ज रहे तो इसका कोई अन्य कारण या कोई बीमारी भी हो सकती है। लंबे समय तक कब्ज के साथ पेटदर्द, स्टूल के साथ म्यूकस या खून आए तो विशेषज्ञ को दिखाएं। कई बार सख्त स्टूल आना आंतों की नसों में सूजन का संकेत हो सकता है। कुछ महिलाओं को प्रेग्नेंसी के आखिरी माह में पाइल्स हो जाती है जो प्रसव बाद ठीक हो जाती हैं। ऐसा गर्भस्थ बच्चेदानी का रक्तवाहिनियों पर दबाव बढऩे से होता है।

इस तरह पाएं कब्ज से निजात
हाई फायबर डाइट लें चोकरयुक्त आटा, दलहन (सोयाबीन, ज्वार, मक्का व बाजरा), मोटा अनाज और हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, मैथी, बथुआ आदि खाएं।

पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं
शरीर में तरल की मात्रा सामान्य बनी रहने से भोजन को पचने में आसानी होती है। ऐसे में रोजाना 7—8 गिलास पानी पीएं। जूस, सूप भी पी सकती हैं।

हल्का फुल्का वर्कआउट करें
शरीर को अंदरूनी रूप से मजबूत बनाने के लिए फिजिकल एक्टिविटी करें। वॉक, योग , प्राणायाम, स्विमिंग, डांस करें। भोजन पचने में आसानी होगी।

आंतों का मूवमेंट समझें
अक्सर भोजन करने के बाद या तो पेट में भारीपन महसूस होता है या फिर गुडग़ुड़ जैसी आवाज आने जैसा अहसास होता है। इस पर ध्यान देना जरूरी।

आयरन की हाई डोज
प्रेग्नेंसी में चलने वाली प्रमुख दवाओं में से जब आयरन की डोज अनियमित व जरूरत से ज्यादा ली जाए तो कब्ज रहती है। डोज व भोजन से मिलने वाले आयरन की मात्रा बैलेंस करें।


- डॉ. निर्मला शर्मा
प्रोफेसर व यूनिट हैड, स्त्री रोग विशेषज्ञ, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, कोटा


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शारीरिक-मानसिक ही नहीं, रोगों के कारण भी हो सकती है डिसेबिलिटी


भारत में डिसेबल लोगों की संख्या करीब 2 करोड़ से अधिक है। २011 की जनगणना के अनुसार देश में 2.21 फीसदी लोग दिव्यांग हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार विश्व में 15.3 प्रतिशत आबादी इस समस्या से जूझ रही है। इनमें सबसे अधिक चलने-फिरने में समस्या वाले लोग हैं। भारत में करीब 20 फीसदी को मूवमेंट जबकि 19 फीसदी को सुनने में समस्या है। भारत में 29 फीसदी दिव्यांगजन को दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। विशेषज्ञों की मानें तो सावधानी बरतकर इससे बचाव संभव है। हर वर्ष 3 दिसंबर को इंटरनेशनल डे ऑफ़ पर्सन्स विद डिसेबिलिटी मनाते हैं। पत्रिका टीवी के ‘हैलो डॉक्टर’ शो में इसी विषय पर विशेषज्ञों से हुई बातचीत के प्रमुख अंश...

डिसेबिलिटी के प्रकार
फिजिकल: रीढ़ की हड्डी में कोई तकलीफ होने से शिशु में जन्मजात शारीरिक विकृति होना।
सेरेब्रल पाल्सी: शिशु का शरीर पर नियंत्रण न रहना।
हियरिंग: शिशु सुनेगा नहीं तो बोल नहीं पाएगा। वह प्रतिक्रिया न दे तो समझें कि नहीं सुन सकता।
डाउन सिंड्रोम: क्रोमोसोम्स (गुणसूत्र) में गड़बड़ी से शिशु मानसिक रूप से कमजोर होता है।
कलर ब्लाइंडनेस: जन्म के बाद रंगों को न पहचान पाना।
स्टैमरिंग: जन्म के बाद शब्दों का उच्चारण सही से न कर पाना।

नई जिंदगी
किसी हादसे या अन्य कारण से पैर कट गया है तो जयपुर फुट (प्रॉस्थेसिस) से जिंदगी नए कदम भर सकती है। रबर से बने इस फुट को लगाने के बाद रोगी सामान्य व्यक्ति की तरह चल-फिर सकता है। इसकी मदद से व्यक्ति खेतीबाड़ी का काम करने के साथ साइकिल भी चला सकता है। इस प्रॉस्थेसिस की उम्र लगभग दो से तीन साल होती है।

रोगों का खतरा
डिसेबिलिटी सिर्फ शारीरिक-मानसिक परेशानी ही नहीं है। कुछ रोग जैसे डाउन सिंड्रोम, मल्टीपल स्क्लेरोसिस और सेरेब्रल पाल्सी भी एक तरह की डिसेबिलिटी है। ऐसे रोगी खुद से कुछ भी करने में सक्षम नहीं होते। इनकी अधिक देखभाल जरूरी है।

प्रेग्नेंसी केयर
जन्म लेने वाला शिशु हष्ट-पुष्ट हो इसके लिए गर्भवती को सेहत का खास खयाल रखना चाहिए। डाइट में पोषक तत्त्वों से युक्त चीजें खाएं और आयोडीन की मात्रा लेते रहें। वर्ना इसकी कमी से बच्चे में थायरॉइड हार्मोन का असंतुलन हो सकता है। महिला में खून की कमी से शिशु का वजन कम हो सकता है। विटामिन-बी कॉप्लेक्स की कमी से आंखों की नसें कमजोर हो सकती हैं।
बचाव : गर्भस्थ शिशु में कुछ विकृतियां ऐसी होती हैं जिन्हें गर्भावस्था में ही पहचानकर उनकी आशंका को कम कर सकते हैं। इसके लिए महिला का खानपान और दिनचर्या सही होनी चाहिए।

आधुनिकता
किसी भी तरह की डिसेबिलिटी को पूरी तरह से खत्म करना चुनौतीपूर्ण है। लेकिन मेडिकल साइंस के जरिए व्यक्तिके जीवन में होने वाली परेशानियों को कम कर सकते हैं। पोलियो या किसी अन्य कारण से शरीर के किसी भाग की मांशपेशी कमजोरी है तो एक्सरसाइज, थैरेपी व उपकरणों की मदद से उसे मजबूत बनाकर काम करने लायक बना सकते हैं। ऐसे 10-20 फीसदी मामलों में राहत मिलती है।

02 करोड़ से अधिक है भारत में डिसेबल लोगों की संख्या।

500 में से एक बच्चे को किसी न किसी वजह से होती शारीरिक दिक्कत जो भविष्य में बनती डिसेबिलिटी का कारण।
20% लोग सडक़ या अन्य तरह के हादसों के शिकार होने से होते डिसेबल।

 

हैलो डॉक्टर एक्सपर्ट टीम
डॉ. अशोक गुप्ता, शिशु रोग विशेषज्ञ, जेके लोन अस्पताल
डॉ. अनिल जैन, रिहैबिलिटेशन एक्सपर्ट, संतोकबा दुर्लभजी हॉस्पिटल


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गर्भावस्था में अकेले घूमने जाएं लेकिन सावधानी के साथ


गर्भवती होने पर एक महिला को अपनी जीवनशैली में कई बदलाव करने की जरूरत पड़ती है और उसे अपनी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना होता है। ऐसे में अकेले सफर करने या यात्रा पर निकल जाने की योजना हो तो उसे कुछ महीनों के लिए टालने के अलावा उसके पास और कोई रास्ता नहीं बचता और वह अपना मन मार कर रह जाती है। वहीं इसका एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि गर्भावस्था यात्रा के लिए सबसे अच्छा वक्त होता है क्योंकि पूरी दुनिया में गर्भवती स्त्री के साथ नरमी से पेश आया जाता है लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि आप लापरवाही के साथ अपनी सुरक्षा को ताक पर रखकर अकेली ही किसी ट्रिप पर निकल जाएं। सुरक्षित और मजेदार यात्रा के लिए कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना होगा।


पहले पूरी खोजबीन करना है बहुत जरूरी
अपने पसंदीदा डेस्टिनेशन के बारे में सबकुछ पता करें। यह जानने की कोशिश करें कि क्या वहां ट्रैवल एडवाइजरी की सुविधा उपलब्ध है? क्या वहां का कानून गर्भवती महिला को अकेले घूमने की इजाजत देता है? पहनावे के नियम क्या हैं? आपके देश की एम्बैसी कहां स्थित है? मौसम कैसा है? वहां कोई ऐसी बीमारी तो नहीं फैल रही, जो आपके लिए खतरा पैदा कर दे? स्थानीय खान-पान क्या है? पीने का साफ पानी कहां उपलब्ध है? सबसे नजदीक अस्पताल कितनी दूरी पर है? ऐसे सवालों के जवाब एक ऐसी यात्रा की योजना बनाने में मदद करेंगे, जिसमें कम जोखिम और ज्यादा मजा हो।

सुरक्षा के कुछ जरूरी उपाय
अपने बैग में गैर-जरूरी सामान भरने से बचें। आपका बैग जितना हल्का होगा, आपको खतरा भी उतना कम होगा और चीजें खोने का डर भी नहीं होगा। अपने लगेज, क्रेडिट काड्र्स और दूसरे जरूरी सामान को अपनी नजरों से दूर न होने दें। गहने, लैपटॉपए स्मार्टफोन जैसी महंगी दिखने वाली वस्तुएं घर पर ही छोड़ दें क्योंकि ये अपराधियों का ध्यान आकर्षित कर सकती हैं। अपने ट्रैवल प्लान और जरूरी दस्तावेजों की कॉपी अपने परिवार और दोस्तों को देकर जाएं। अपने मेडिकल रिकॉर्ड और डॉक्टर का फोन नंबर साथ रखें।

डॉक्टरी सलाह जरूरी
सफर पर निकलने से पहले अपने डॉक्टर से मिलें। हो सकता है, जहां आप जाना चाह रही हों, वहां जाने के लिए आपको कुछ खास दवाओं और वैक्सीनेशन की जरूरत हो। संभव हो तो ऐसी जगह न जाएं, जहां जाने के लिए टीकाकरण जरूरी हो क्योंकि इसमें मौजूद सीरम आपके गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचा सकता है। अगर यात्रा पांच घंटे से ज्यादा की है तो इस दौरान खूब पानी पिएं और हर तीस मिनट में थोड़ा वॉक करें, ताकि आपके पैरों में सूजन न हो। गर्भावस्था के अठाईसवें हफ्ते के बाद ज्यादातर एयरलाइंस यात्रा की अनुमति देने के लिए आपसे डॉक्टर का सहमति पत्र भी मांगती हैं।

इंश्योरेंस के जरिए सुरक्षा
यात्रा के लिए अपना बैग पैक करने से पहले एक अच्छा ट्रैवल इंश्योरेंस जरूर खरीदें। यह आपको यात्रा के दौरान किसी आपात स्थिति में लौटने, बीमार होने पर इलाज का खर्च और यहां तक कि समयपूर्व प्रसव की स्थिति में पर्याप्त आर्थिक मदद की गारंटी देता है। आपकी रिटर्न फ्लाइट की तारीख में बदलाव पर होने वाले खर्च के अलावा यात्रा बीमा चोरी या प्रॉपर्टी के नुकसान से होने वाली हानि की भरपाई भी करता है।

पोषण का भी रखें ध्यान
प्रेगनेंसी में कमजोरी व चक्कर आना आम बात है। ऐसे में आपको अपने खान-पान का पूरा ध्यान रखना होगा। हमेशा नॉन-एल्कोहॉलिक ड्रिंक और फल व सूखे मेवे साथ रखें। अगर साफ पानी की उपलब्धता पर अंदेशा हो तो पानी की बोतल भी साथ होनी चाहिए। यात्रा के दौरान डॉक्टर और अपने न्यूट्रिशियनिस्ट की सलाह पर अमल करें। अगर बीमार हो जाएं या भूख न लगे तो थोड़ा-थोड़ा दिन में कई बार खाएं।


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प्रेग्नेंसी के बाद आती हैं ऐसी स्थिति, जानें क्या करें, क्या नहीं


गर्भावस्था के 9 महीने पूरे होते-होते आपको ऐसा महसूस होने लगता है कि आपने बच्चा पैदा होने से जुड़ी दुनिया की सारी सलाह पा ली है लेकिन ऐसा नहीं है। ऐसी बहुत सी बातें हैं, जो आपको कभी पता ही नहीं चलीं। जानिए इन महत्वपूर्ण बातों के बारे में...


प्रेग्नेंट महिलाओं, खासतौर से पहली बार मां बनने जा रही महिलाओं को हर किसी से कोई न कोई नसीहत मिल ही जाती है। वह भी इस बात को लेकर काफी खुशी महसूस करती है कि उसे डिलीवरी के बाद होने वाली बातों का अंदाजा हो रहा है लेकिन जब वह मां बन जाती है तब उसे पता चलता है कि बच्चे की देखभाल से लेकर उसकी अपने शरीर में आने वाले बदलाव से जुड़ी बहुत सी ऐसी बातें थीं, जो उसे किसी ने बताई ही नहीं। इस स्थिति में उसे कई बार यह महसूस होता है कि अगर उसे इनके बारे में पहले से पता होता तो वह मानसिक और शारीरिक रूप से खुद को बेहतर रूप से तैयार रख पाती।

डिलीवरी के कुछ हफ्तों तक रक्तस्त्राव हो सकता है
आप पढ़ी-लिखी वयस्क महिला है और अपनी पहली प्रेग्नेंसी के दौरान आप ने प्रेग्नेंसी से जुड़ी आधा दर्जन किताबें पढ़ डाली है और सोशल मीडिया से भी काफी जानकारी जुटा ली है लेकिन हो सकता है कि आपको यह मालूम न हो कि बच्चे के जन्म के बाद कुछ दिन या कुछ हफ्तों तक आपको हैवी ब्लीडिंग हो सकती है। इसके लिए तैयार रहें।

स्तनपान कराना सीखना होगा
एक आम धारणा है कि प्राकृतिक तौर पर महिलाएं यह जानती हैं कि बच्चे के जन्म के बाद उन्हें स्तनपान कैसे कराना है लेकिन यह सही नहीं है। ब्रेस्टफीडिंग एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसे शुरुआत में सीखने की जरूरत पड़ती है। अगर आपको भी परेशानी हो तो किसी कंसल्टेंट, दोस्त या किसी अन्य जरिए से मदद लेने में हिचकिचाएं नहीं। यही नहीं, अगर आप ब्रेस्टफीडिंग के दौरान किसी दर्द से गुजरती हैं तो इसे सहन करते रहने की बजाय सलाह लें।


बच्चे को लपेटना आसान नहीं है
सुनने और देखने में ऐसा लगता है कि बच्चे को एक नरम ब्लैंकेट में लपेटना आसान है लेकिन जब आपको यह वाकई करना पड़ता है तब आपको समझ आता है कि एक हाथ पैर पटकते बच्चे को सही तरीके से लपेट पाना एक टेढ़ी खीर है। बच्चा कुछ ही मिनटों में कहीं न कहीं से हाथ बाहर निकाल ही लेता है।

डिलीवरी के बाद भी आप प्रेग्नेंट नजर आ सकती हैं
तकरीबन 8 पाउंड के बच्चे को जन्म देने के बाद भी आप अगले कुछ महीनों तक प्रेग्नेंट महिला की तरह दिख सकती हैं। इसकी एक बड़ी वजह हो सकती है कि बच्चे के बाद आपकी बॉडी के लिए अपने पुराने आकार में वापस सिकुड़ जाना मुश्किल होता है। आपका पेट गोल और सूजन भरा दिखाई दे सकता है। ऐसा कुछ अतिरिक्त वजन और आपके बढ़े हुए गर्भाशय के कारण हो सकता है, जिससे अपने मूल आकार में आने में कुछ समय लगता है।


ब्रेस्टफीडिंग के दौरान खाने की इच्छा प्रबल हो सकती है
प्रेग्नेंसी के दौरान बार-बार भूख लगती है यह तो सभी जानते है लेकिन क्या आप जानती हैं कि डिलीवरी के बाद ब्रेस्टफीडिंग के दौरान आपकी कैलोरीज बर्न होती हैं और आपको भूख लगती है। यह भूख इतनी प्रबल होती है कि आप कुछ भी खा लेने के लिए मजबूर हो सकती हैं। इसीलिए स्तनपान के दौरान अगर आपको भूख लगे तो घबराएं नहीं और ज्यादा से ज्यादा पोषक तत्वों का सेवन करें।

बेबी रैप्स, कैरियर और स्लिंगबेहद कंफ्यूजिंग होते हैं
बेबी रैप्स को बांधने की कोशिश बार-बार नाकाम होने पर आपको यह लगता है कि शायद एक बेबी कैरियर आपकी मदद कर पाएगा लेकिन ऐसा नहीं है। इसे इस्तेमाल करना भी उतना ही मुश्किल है। इसके अलावा बाजार में स्लिंग भी उपलब्ध हैं लेकिन इसे इस्तेमाल करने पर आप पाएंगी कि इसमें से बच्चे के गिरने का खतरा है तो इन्हें बाजार से खरीदने से पहले इन परेशानियों को जरूर ध्यान में रखें।


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मां को एनीमिया है तो होने वाले बच्चे की इम्युनिटी पर असर, ये हैं बचने के उपाय


अगर आप भी शरीर में खून की कमी यानी एनीमिया का कारण सिर्फ पोषण की कमी को मानते हैं, तो यह गलत है। हाल ही ग्लोबल न्यूट्रिशन द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट 2017 के अनुसार एनीमिया की वजह हाइजीन की कमी व अन्य कई कारण हैं।

रिपोर्ट में यह
मां बनने की उम्र वाली 51 फीसदी महिलाएं एनीमिक हैं। जबकि 2016 की रिपोर्ट में भारत में 48 प्रतिशत महिलाएं एनीमिक पाई गई थीं। डॉक्टर्स के अनुसार पोषण व हाइजीन का अभाव एनीमिया का कारण है। इससे मां-शिशु दोनों को दिक्कतें होती हैं। जिन गर्भवती महिलाओं को ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है, उनके शिशु कम इम्युनिटी वाले पैदा होते हैं। विश्व में 15 से 49 साल की करीब 6 करोड़ महिलाएं एनीमिक हैं।

हीमोग्लोबिन कम
खू न में आयरन की कमी से हीमोग्लोबिन कम होने लगता है, जिसे एनीमिया कहते हैं। आयरन शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं (रेड ब्लड सेल्स) बनाता है जिससे हीमोग्लोबिन का निर्माण होता है। इसका काम फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर रक्त में पहुंचाना है। ऐसे में हीमोग्लोबिन कम होने से शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। एक स्वस्थ पुरुष में 13-16 व महिला में 12-14 मिग्रा. प्रति डेसिलीटर हीमोग्लोबिन होना चाहिए।

कारण : पोषण (फॉलिक एसिड, विटामिन-बी 12, आयरन) की कमी अहम है। कुछ रोगों के कारण जैसे दवाओं का दुष्प्रभाव, थायरॉइड, थैलेसीमिया, किडनी संबंधी समस्या, कैंसर, नियमित रक्तस्त्राव और खराब दिनचर्या से भी एनीमिया हो सकता है। 48 प्रतिशत भारतीय महिलाएं एनीमिक पाई गई हैं, 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार।

06 करोड़ महिलाएं विश्व में एनीमिक हैं। ये 15 से 49 साल की हैं।

ऐसे पाएं राहत
फॉलेट : शरीर को नई रक्त कोशिकाएं बनाने के लिए फॉलेट, विटामिन-12, आयरन की जरूरत होती है जो हरी सब्जियों, साबुत अनाज, सूखे मेवों, पालक, चुकंदर व सेब में होते हैं।
अनार: प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम व कार्बोहाइडे्रट, हीमोग्लोबिन की मात्रा को तेजी से बढ़ाकर रक्त संचार को ठीक करता है। रोज सुबह खाली पेट अनार खाने या जूस पीने से खून की कमी पूरी होती है।
किशमिश: आयरन, फाइबर आदि होने से किशमिश व खजूर रोग के इलाज में उपयोगी हैं। रातभर पानी में भीगी किशमिश शहद के साथ खाएं। 100 ग्रा. खजूर में 90 मिग्रा. आयरन है।

शहद
आयरन व विटामिन बी12 से युक्त शहद और स्नैैक्स में भुने चने व गुड़ खाने से हीमोग्लोबिन बनता है। खट्टे फल भी खाएं।


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प्रेग्नेंसी में बेवजह भ्रम ना पालें, जानें ये खास बातें


किसी भी महिला के गर्भवती होने या पहली बार मां बनने पर घर वाले, रिश्तेदार, पड़ोसी और यहां तक कि दूर-दराज के जानकार भी उसे तरह-तरह की सलाह देने लगते हैं। लेकिन सही जानकारी के अभाव में कई बार ये सुझाव परेशानी का सबब भी बन जाते हैं। आइए जानते हैं समाज में गर्भावस्था से पहले व डिलीवरी के बाद से जुड़े भ्रम और उनकी सच्चाई के बारे में।

भ्रम : डिलीवरी से पहले भरपेट खाना खाकर ही अस्पताल जाएं?
सच : अस्पताल जाने से पहले हल्का भोजन ही करें वर्ना गर्भवती महिला को उल्टी हो सकती है और खाना सांस की नली में फंस सकता है।

भ्रम : गर्भावस्था में पपीता नहीं खाएं ?
सच : गर्भावस्था के शुरुआती तीन महीनों में पपीता नहीं खाना चाहिए, इसके बाद पपीता खाया जा सकता है।
भ्रम : इस दौरान महिला को करवट से लेटना चाहिए?
सच : गर्भवती महिला के बाईं करवट लेटने से बच्चे का ब्लड सर्कुलेशन अच्छा होता है और विकास होता है।

भ्रम : जिनका पेट आगे की ओर बढ़ता है, उन्हें लडक़ा होता है?
सच : यह धारणा बिल्कुल गलत है। प्रेग्नेंसी में महिला का पेट बच्चे की ग्रोथ पर निर्भर करता है, इसका बच्चे के जेंडर से कोई लेना-देना नहीं होता। कई बार मोटापे से ग्रसित महिलाओंं का पेट भी इस दौरान काफी बढ़ जाता है।

भ्रम : प्रेग्नेंसी में ज्यादा सोने वाली महिलाओं को लडक़ी होती है।
सच : इस दौरान शरीर में कई हार्माेनल बदलाव आते हैं, जिस वजह से महिला को थकान या नींद ज्यादा आती है, इसका लडक़े या लडक़ी होने से कोई संबंध नहीं होता।

भ्रम : प्रेग्नेंसी में दही नहीं खाना चाहिए वर्ना यह बच्चे पर जम जाता है?
सच : कई बार जब प्री मैच्योर बेबी होता है तो उस पर एक सफेद परत होती है जिसे लोग दही समझ लेते हैं। दरअसल गर्भ में बच्चे की सुरक्षा के लिए उसके चारों ओर एक सफेद परत होती है, जैसे-जैसे बच्चे का विकास होता जाता है यह परत हटती जाती है।

भ्रम : नारियल खाने से बच्चा गोरा होता है?
सच : गर्भवती महिला के नारियल खाने से बच्चे का रंग तो प्रभावित नहीं होता लेकिन इससे बच्चे का विकास जरूर होता है क्योंकि नारियल में साइटोक्राइंस होते हैं।
भ्रम : घी खाने से डिलीवरी आराम से हो जाती है?
सच : घी खाने का डिलीवरी से कोई संबंध नहीं है। हां, घी खाने से ब्लड प्रेशर की समस्या हो सकती है। इसलिए गर्भावस्था में संतुलित मात्रा में ही घी खाएं।

भ्रम : डिलीवरी के बाद कम पानी पीना चाहिए?
सच : डिलीवरी के दौरान शरीर से रक्त निकलने से पानी की कमी हो जाती है इसलिए खूब पानी पीएं वर्ना कब्ज की समस्या हो सकती है और अगर डिलीवरी में टांके या घाव हुआ है तो उन पर दबाव पड़ता है।

भ्रम : एक दिन बाद दूध पिलाएं?
सच : शुरुआत के 48 घंटे का गाढ़ा-पीला दूध कोलस्ट्रम होता है जो बच्चे के लिए काफी पोषक और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है इसलिए प्रसव के बाद स्तनपान जरूर कराएं।

भ्रम : डेढ महीने तक आराम करना चाहिए?
सच: लगातार लेटे रहने से पैरों में खून का थक्का जम जाता है और सूजन आ सकती है। कई बार खून का थक्का फेफड़ों में पहुंचकर घातक हो सकता है, इसलिए प्रसव के बाद सुबह-शाम नियमित सैर करें आप हल्के व्यायाम भी कर सकती हैं।


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गुड न्यूज नहीं होती फैंटम प्रेग्नेंसी, जानें इसके बारे में 


अपनी बढ़ती टमी और चक्कर आने की स्थिति को कई महिलाएं गर्भावस्था समझ लेती हैं। लेकिन चेकअप के लिए डॉक्टर के पास पहुंचने पर उन्हें पता चलता है कि वे गर्भवती नहीं हैं बल्कि किसी और वजह से बीमार हैं। इस अवस्था को फैंटम प्रेग्नेंसी, फॉल्स प्रेग्नेंसी या सियोडोसिएसिस कहते हैं। 

ये हैं लक्षण
आमतौर पर इस स्थिति में किसी भी महिला के लक्षण एक सामान्य गर्भवती महिला के समान ही होते हैं जैसे वजन बढऩा, चक्कर  आना, सुबह उठने पर थकान लगना, जी घबराना या उल्टियां होना, माहवारी में अनियमितता या ब्रेस्ट के आकार में परिवर्तन होने पर महिला खुद को प्रेग्नेंट समझने लग जाती है। 

कैसे पता चलता है
जब कोई महिला डॉक्टर के पास जाती है तो उसकी प्रेग्नेंसी जांच के लिए पेल्विस एग्जामिनेशन और अल्ट्रासाउंड किया जाता है। अल्ट्रासाउंड  के दौरान जब कोई बच्चा दिखाई नहीं देता या कोई धड़कन सुनाई नहीं देती तो डॉक्टर इसे फैंटम प्रेग्नेंसी डिक्लेयर कर देते हैं। कई मामलों में गर्भवती न होने पर भी महिला के यूट्रस में फैलाव और गर्भाशय मुलायम हो जाता है। हालांकि फैंटम प्रेग्नेंसी के मामले में यूरिन प्रेग्नेंसी टेस्ट हमेशा नेगेटिव होता है, लेकिन महिला इसे मानने को तैयार नहीं होती।

आंकड़ों के अनुसार
रोजाना जन्म लेने वाले औसतन 22,000 बच्चों की तुलना में ऐसे मामले पांच से छह होते हैं। यह स्थिति किसी भी आयु वर्ग की महिला के साथ हो सकती है। ऐसा भी कहा जाता है कि 1531-1558 के दौरान इंग्लैंड की महारानी मैरी भी दो बार फैंटम प्रेग्नेंसी का शिकार हुईं जब उनके डॉक्टर ने यूट्रस के ट्यूमर को गर्भावस्था समझ लिया।

इन्हें है खतरा
ज्यादा शिकार 30 से 40 साल की महिलाएं होती हैं या जो महिलाएं प्रेग्नेंसी के मामले में बेहद भावुक हों। जिन महिलाओं के बच्चे की हाल ही में मृत्यु हुई हो या उनका मिसकैरिज हुआ हो, उन्हें भी इसकी आशंका रहती है क्योंकि डॉक्टर इसके लिए शारीरिक और मानसिक दोनों कारणों को जिम्मेदार मानते हैं। इन्हें मानसिक रूप से ज्यादा मजबूत होने की जरूरत होती है।

परिवार का सहारा
गर्भावस्था का समय महिला के लिए बेहद उत्साह से भरा होता है। ऐसे में जब उसे पता चलता है कि वह प्रेग्नेंट नहीं है तो उसे काफी हताशा होती है इसलिए डॉक्टर को जितना जल्द हो महिला और उसके परिवार को इस बारे में बता देना चाहिए और उसे मैंटली सपोर्ट करना चाहिए।

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गर्भावस्था में लें पूरी नींद


गर्भावस्था के दौरान अपर्याप्त नींद शरीर में जटिलताएं बढ़ाने के साथ रोग प्रतिरोधी क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। 

साइंस डेली की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अवसाद से घिरी महिलाएं नींद की समस्या से प्रभावित होती हैं। 

इस विषय पर यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोध को साइकोसोमैटिक मेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

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गर्भाशय कैंसर की भी वजह बनता ल्यूकोरिया


खराब जीवनशैली, खानपान व शरीर की सफाई न रखने से महिलाओं को होने वाली श्वेतप्रदर (ल्यूकोरिया) की समस्या आम है। 70% महिलाओं को 25-30 वर्ष की उम्र के बाद जबकि 30% मामलों में यह दिक्कत कम उम्र की लड़कियों में होती है। लंबे समय तक ल्यूरकोरिया गर्भाशय कैंसर का खतरा बढ़ाती है। 

ल्यूकोरिया में वजाइना से सफेद पदार्थ निकलता है। गर्भाशय की अंदरूनी झिल्ली में सूजन आ जाती है। इसकी तीन अवस्थाएं हैं।
1. प्रसव के बाद श्वेतस्त्राव होना, ऑव्युलेशन क्रिया है।
2. गर्भावस्था के पहले माह में श्वेतस्त्राव गर्भावस्था की पहचान है।
3. प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन रिलीज होने पर माहवारी के 14 दिन बाद श्वेतस्त्राव।

परेशानी
एनीमिया, कमजोर याद्दाश्त, बेचैनी, घबराहट, जोड़दर्द, चेहरे पर पीलापन, अपच व पीठदर्द होता है।

सतर्कता
कभी-कभार श्वेतस्त्राव के साथ खुजली सामान्य है। लेकिन यदि साथ में दुर्गन्ध, प्रभावित हिस्से के आसपास अत्यधिक खुजली व बदनदर्द हो तो स्त्री रोग विशेषज्ञ को दिखाएं। वर्ना संक्रमण हो सकता है। 

आयुर्वेदिक उपचार
ल्यूकोल व चंद्रप्रभाति की 2-2 गोली सुबह-शाम व सूजन दूर करने के लिए पुनर्नवा मंडूर दवा देते हैं। पत्र्रांगासव और पिप्पलासव की 3-3 चम्मच को भोजन के बाद लें। एक गिलास में तीन चम्मच के बराबर पानी मिलाएं। हल्दी वाला दूध पीएं, इम्युनिटी बढऩे के साथ सूजन दूर होगी। रोहितक मूल का क्वाथ पानी के साथ सुबह-शाम लें।

ध्यान रखें
परवल, आंवला, भिंडी, टमाटर, खीरा खाएं। दूध व दूध से बनी चीजें लें। सेब, पपीता, नारियल पानी, अनार जैसे फल खाएं, पोषक तत्त्वों की कमी पूरी होगी। प्रोसेस्ड व रिफाइंड फूड, मैदा, कॉफी, चाय, अंडा, मसालेदार व तला-भुना भोजन न लें। हाइजीन का ध्यान रखें। 

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प्रसव के दौरान ब्लीडिंग रोकता है लाइफरैप सूट


दुनियाभर में हर साल साढ़े तीन लाख महिलाओं को प्रसव के बाद जान गंवानी पड़ती है। इस आंकड़े को कम करने के लिए लाइफरैप सूट उपयोगी साबित हो सकता है जो पोस्ट पार्टम हेमरेज यानी प्रसव के बाद रक्तस्त्राव को रोककर मां की जान बचाता है। यह मेट्रो सिटीज में उपलब्ध है।

शरीर के चार हिस्सों में प्रेशर के साथ बांधते हैं
स्पेशल स्ट्रेचेबल फाइबर से बना नॉन न्युमेटिक एंटी शॉक गारमेंट को स्पेस सूट या लाइफरैप सूट के नाम से भी जाना जाता है। इसके चार सेग्मेंट होते हैं। पेट, जांघ, घुटना और पिंडली वाले हिस्से पर इसे निश्चित प्रेशर के साथ बांधा जाता है। यह दिमाग और हृदय तक रक्तसंचार को सामान्य करता है। साथ ही इलाज मिलने तक के लिए 4-5 घंटे की समयावधि को बढ़ा भी देता है। इससे  यदि कोई महिला इमरजेंसी में एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचे या उसे लेबर रूम से ऑपरेशन थियेटर भी ले जाना पड़े तो उसकी जान बचाने में मदद मिलती है।

प्रसव के पांच मिनट बाद भी ब्लीडिंग न रुके तो इसे पहनाएं
प्रसव के बाद इसे महिला को पहनाकर रक्तसंचार को नियमित करते हैं ताकि अधिक ब्लीडिंग से होने वाली मौतें रोकी जा सकें। ज्यादातर मौतों की वजह एनीमिया, पूर्व में हुए ऑपरेशन, गर्भस्थ शिशु का आकार में बड़ा होना होता है। सामान्यत: प्रसव के 3-5 मिनट के बाद रक्तस्त्राव बंद हो जाता है लेकिन कई मामलोंं में मांसपेशियों के सिकुडऩे की क्षमता कमजोर होने से रक्त लगातार बहता रहता है। ऐसे में रक्तप्रवाह पेट के निचले हिस्से व पैरों में बढ़कर जमने लगता है। इससे दिमाग, फेफड़े व हृदय तक रक्त नहीं पहुंच पाता और ऑक्सीजन की कमी से महिला के कोमा में जाने, हृदय का काम करना बंद करने, गर्भाशय निकालने व मृत्यु की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में अत्यधिक रक्तस्त्राव और धड़कनों के बढऩे पर इस सूट को पहनाया जाता है।

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भ्रूण में बीमारियों का पता लगाती पीजीडी तकनीक


पीजीडी क्या है?
पीजीडी (प्री-इंप्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस) इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ ) से बने भ्रूण में मौजूद किसी प्रकार के आनुवांशिक या क्रोमोसोमल डिस्ऑर्डर का पता लगाने वाली अत्याधुनिक वैज्ञानिक तकनीक है। पीजीडी के दौरान भ्रूण को गर्भाशय में स्थानांतरित करने से पहले उसकी जांच की जाती है ताकि दंपति आईवीएफ प्रक्रिया के लिए अपना अगला कदम बढ़ाने का फैसला कर सके। 

क्यों पड़ती है इसकी अवश्यकता?
हाल ही हुए अध्ययनों के अनुसार आईवीएफ  के जरिए बने लगभग 25-30 प्रतिशत भ्रूण गर्भधारण के बाद पहले तीन महीने तक जीवित नहीं रहते। इसके अलावा आनुवांशिक व क्रोमोसोमल विकृतियों के कारण अधिकतर भ्रूणों को इंप्लांाट करना संभव नहीं होता। ऐसी स्थिति में एंब्रायोनिक स्क्रीनिंग जांचरक्षक की भूमिका निभाती है।

किसके के लिए जरूरी?
अगर किसी महिला की उम्र 35-40 वर्ष है और उसका पहले भी गर्भपात हो चुका है या पति-पत्नी में से किसी को आनुवांशिक डिस्ऑर्डर या किसी प्रकार की विकृति है तो उसे एंब्रायोनिक स्क्रीनिंग जांच करवानी चाहिए। इससे गर्भपात का खतरा कम होता है और जन्म लेने वाले बच्चेे में आनुवांशिक विकृतियां होने की आशंका भी काफी कम हो जाती है।   

इसकी प्रक्रिया क्या है?
यह तकनीक असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) द्वारा विकसित भू्रणों में क्रोमोसोम की संख्या और उनमें पाई जाने वाली विकृतियों का पता लगाने और उनके निदान के लिए उपयोग की जाती है। इस नए जेनेटिक टूल्स की मदद से चिकित्सा विशेषज्ञ यह जान पाए हैं कि ऊपरी तौर पर सबसे अच्छी क्वालिटी के दिखने वाले कुछ भ्रूणों के साथ भी आनुवांशिक विकृति जुड़ी रह सकती है।

पीजीडी का भविष्य क्या है?
ऐसे लोगों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है जो आनुवांशिक जांच कराने की इच्छा रखते हैं। पीजीडी की तरह ही पीजीएस (प्रीइंप्लांटेशन जेनेटिक स्क्रीनिंग) का इस्तेमाल क्रोमोसोम की सामान्य संख्या का पता लगाने और उनमें किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को जांचने के लिए किया जा सकता है। इससे भू्रण धारण के दौरान होने वाली समस्याओं से बचा जा सकता है।

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जानें गर्भधारण से जुड़े कुछ मिथक और उनकी सच्चाई


गर्भधारण के  लिए जरूरी सेक्स से जुड़े कई मिथक व भ्रम अकसर महिलाओं और पुरूषों में रहते हैं। इन सवालों को डॉक्टर के साथ शेयर करने में असहज महसूस करते हैं, लेकिन एक बेहतर लाइफ व गर्भधारण के लिए सेक्स से जुड़ी बातें साफ होनी चाहिए। ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब हम आपको दे रहे है... 

1. क्या गर्भधारण के लिए ऑर्गेज्म जरूरी है?
नहीं, बिल्कुल नहीं. एक अनुमान के मुताबिक 80 प्रतिशत महिलाएं सेक्स के दौरान आर्गेज्म का अनुभव नहीं कर पाती. लेकिन इसके बावजूद महिलाएं प्रेग्नेंट होती है. इस लिए ये बिल्कुल भी जरूरी नहीं है कि गर्भधारण के लिए सेक्स के दौरान स्त्री को आर्गेज्म होना चाहिए। 

2. क्या ओरल सेक्स करने से गर्भधारण नहीं होता?
नहीं, ओरल सेक्स से गर्भधारण का कोई संबंध नहीं हैं। लेकिन अंडोत्सर्ग के दौरान ओरल सेक्स से बचना चाहिए। सलीवा में एंजाइम होते हैं और यह स्पर्म को नुकसान पहुंचा सकते हैं। 

3. गर्भधारण के लिए रोज सेक्स करना चाहिए?
महिला को गर्भ तक स्पर्म की बेहतर सप्लाई के लिए हफ्ते में तीन से चार बार सेक्स करना चाहिए। तीन और चार दिनों तक स्पर्म जिंदा रहते हैं, इसलिए नियमित सेक्स करने से शुक्राणु की सप्लाई आसानी से हो जाती है और गर्भधारण की संभावना प्रबल होती है। 

4. गर्भधारण के लिए सबसे अच्छी पोजिशन क्या है?
अकसर कपल्स को इस बात की चिंता रहती है कि सेक्स के दौरान कौन सी पोजिशन बनाई जाए जिससे शुक्राणु आसानी से स्त्री के अंग में अंदर तक पहुंच सकें , और गर्भधारण हो सके, लेकिन सच्चाई ये है कि इन सब चीजों से कोई फ र्क नहीं पड़ता. किसी भी पोजिशन में सेक्स किया जा सकता है, जो सहज और आनंद का एहसास दे। 

5. क्या प्रेग्नेंट होने के लिए ज्यादा सेक्स करती हैं?
महिलाएं इस बारे में चिंता करती है कि बहुत ज्यादा सेक्स करने से स्पर्म की उपलब्धता घट रही या उसकी गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। अगर पुरुष अपने स्पर्म को स्टोर करके रखता है, तो बड़ी मात्रा में बाहर आता है, लेकिन इसकी बड़ी मात्रा मृत होती है। सेक्स के दौरान बड़ी मात्रा में पुरुष और महिला के जनन क्षमता युक्त हार्मोन भी रिलीज होते हैं. इसलिए अगर आप बच्चे के बारे में सोच रही हैं, तो ज्यादा से ज्यादा सेक्स ठीक है। 

6. महिलाओं का लुब्रिकेंट्स या जेल उपयोग करना सही है? 
अगर हो सके तो सेक्स के दौरान आप लुब्रिकेंट्स का प्रयोग ना करें. हालांकि जो महिलाएं योनि की शुष्कता से पीडि़त होती हैं और बिना लुब्रिकेंट्स के सेक्स पीड़ादायक है, तो आप सुरक्षित लुब्रिकेंट्स का इस्तेमाल कर सकती हैं, लुब्रिकेंट्स शुक्राणु के लिए किसी भी बाधा उत्पन्न नहीं करेगा और शुक्राणुओं को अंडों तक पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं होगी। 

7. क्या गर्भधारण के लिए उत्तेजना जरूरी है?
पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन सबसे ज्यादा सुबह के समय निर्मित होता है, यह साबित हो चुका है कि स्पर्म स्वस्थ तभी होता है, जब टेस्टोस्टेरॉन की मात्रा सबसे ज्यादा मौजूद होती है. इसलिए सेक्स करने से पहले अपने मौके को बढ़ाए। 

8. गर्भाधान के मौके बढ़ाने के लिए सबसे बढिय़ा फर्टिलिटी गैजेट क्या है?
इसका सही जवाब है, कोई नहीं, बहुत सारी महिलाएं अंडोत्सर्ग किट्स, एप्स का उपयोग करती हैं. हालांकि गैजेट्स की वजह से आप फर्टिलिटी प्रक्रिया के प्रति बहुत ज्यादा सतर्क हो जाती हैं. हालांकि इससे तनाव भी उत्पन्न होता है। 

9. क्या मेरे पार्टनर के टिकने पर निर्भर करता है कि गर्भधारण
पार्टनर को इस बारे में चिंतित होने की जरुरत है कि वह कितनी देर तक टिकता है। पुरुष अक्सर बेडरूम में अपनी परफॉरमेंस को लेकर चिंतित रहते हैं और यह उनकी फर्टिलिटी को किस तरह प्रभावित करता है. वे कितनी देर तक टिकते हैं, कितनी साइज है, कितना स्पर्म वे प्रोड्यूस करते हैं. ये सारी चीजें एक स्वस्थ बेबी के लिए मायने नहीं रखती हैं।

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सेकंड प्रेगनेंसी की प्लानिंग करने से पहले पढ़ लें ये महत्वपूर्ण बातें


कई बार देखने में आता है कि महिलाएं पहली प्रेगनेंसी के कुछ माह बाद दोबारा प्रेगनेंट हो जाती है, लेकिन क्या उनका यह कदम सही है। इस आर्टिकल में हम इस बारें में चर्चा करेंगे कि दूसरे बच्चे की प्रेगनेंसी के लिए उचित समय कौनसा है और दोनों बच्चों के बीच कम से कम कितना गैप होना चाहिए।

डेढ साल का गैप है बेस्ट 
इस बारें में यदि डॉक्टर्स की राय को सही माना जाएं तो दो बच्चों की ​बीच डेढ़ साल का गैप एकदम परफैक्ट है। लेकिन य​दि इस टाइम से पहले दूसरे बच्चे का चांस लिया जाता है तो इससे बच्चा मिसकैरिज होनी रिस्क बढ़ जाती है। इसके साथ ऐसे केस में प्री मैच्योर बेबी होना, बेबी का वजन सही न होना जैसी समस्याएं सामने आती है। होती है। वहीं मां को एनीमिया, यूट्रस इंफेक्शन जैसी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। 

मां के स्वास्थ्य को खतरा 
एक बच्चे के जन्म के बाद मां को पूर्ण रूप से ठीक होना आवश्यक है। क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान मां कि बॉडी कि एनर्जी और न्युट्रियंट्स निकल जाते है। ऐसे में बॉडी को फिर से नॉर्मल होने में और फिर से एक हेल्दी प्रेगनेंसी के लिए रिकवर करने में टाइम लगता हैं। ऐसे में कम से कम दो बच्चों के बीच कम अंतर के चलते मां के स्वास्थ्य पर पूरा खतरा बना रहता है।

3 साल का गैप 
विशेषज्ञो का ऐसा मानना है कि एक बच्चे के जन्म के तीन साल में महिला का शरीर एक बार फिर से पूर्ण स्वस्थ्य हो जाता है। साथ ही देश कि पॉपुलेशन भी काफी हद तक कंट्रोल में रहती है। इसलिए भारतीय सरकार भी दो बच्चों के बीच तीन साल के गैप पर जोर देती है।

बेहतर होते रिश्ते 
अगर दोनों बच्चों के बीच गैप ज्यादा है तो, ऐसे में बड़ा बच्चा छोटे बच्चे कि लालन पोषण में अहम रोल निभा सकता है। ऐसे में दोनों बच्चों के बीच भावनात्मक जुड़ाव बहुत अच्छा होता है। लेकिन साथ ही यह भी माना जाता है कि ऐसी परिस्थिति में बड़ा बच्चा मां बाप कि ज्यादा अटेंशन चाहता है।

इसलिए दूसरे बच्चे का प्लान करने से पहले थोड़ा सोच—विचार करके ही निर्णय लें।


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अगर चाहती है सेहतमंद बच्चा तो इन चीजों से परहेज करें गर्भवती महिला


नई दिल्ली। मां बनने का अहसास हर महिला के लिए बहुत खास होता है और इस दौरान वह अपने जीवन के अनुभव को महसूस करती है। लेकिन इस दौरान गर्भवती महिलाओं को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है। केन्द्र सरकार के आयुष मंत्रालय ने गर्भवती महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान कुछ सावधानियां बरतने की सलाह दी है। 

मंत्रालय ने अपनी एक रिपोर्ट में स्वस्थ्य जच्चा और सेहतमंद बच्चे के लिए सलाह देते हुए कहा कि गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान इच्छा, क्रोध, लगाव, नफरत और वासना से खुद को दूर रखना चाहिए। इसके अलावा महिलाओं को हमेशा अच्छे लोगों के साथ और शांतिप्रिय माहौल में रहना चाहिए। इस बाबत आयुष मंत्रालय ने मदर एंड चाइल्ड केयर नामक बुकलेट जारी की है जिसमें, ये सलाह दी गई हैं। 

इस बारें में आगे सलाह देते हुए मंत्रालय का कहना है कि यदि आप सुंदर और सेहतमंद बच्चा चाहती हैं तो  "इच्छा और नफरत" से दूर रहे। साथ ही आध्यात्मिक विचारों पर ध्यान केंद्रित करें। अपने आसपास धार्मिक तथा सुंदर चित्रों को सजाकर रखें। इस बुकलेट में गर्भकाल के दौरान योग और अच्छी खुराक के फायदों के बारे में भी बताया गया है।

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गर्भावस्था में महिलाएं भूलकर भी न लें पैरासिटामोल, भ्रूण को होता है ये नुकसान


लंदन। आमतौर पर गर्भावस्था के दौरान बुखार या दर्दनिवारक के रूप में पैरासिटामोल का इस्तेमाल यों तो सुरक्षित माना जाता है, लेकिन हाल में हुए एक शोध में पता चला है कि गर्भावस्था में पैरासिटामोल लेने से भ्रूण की यौनइच्छा पर असर पड़ता है और उसका आचरण भी आक्रामक बना देता है। डेनमार्क के कोपेनहेगेन विश्वविद्यालय के एक नए शोध में पैरासिटामोल के इस्तेमाल से पहले कई बार सोचने की सलाह दी गई है।

इस शोध का प्रकाशन पत्रिका 'रिप्रोडक्शन' में किया गया है। इसमें जानवर पर किए गए शोध में लोकप्रिय दर्दनिवारक पैरासिटामोल के इस्तेमाल को पुरुष व्यवहार के विकास के लिए नुकसानदेह पाया गया है। शोधकर्ताओं ने कहा है कि चूहे को दी गई खुराक एक गर्भवती महिला को दी जाने वाली खुराक के लगभग बराबर रही।

हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रयोग सिर्फ चूहों तक सीमित रहा, इसलिए इसे सीधे तौर पर मानव पर लागू नहीं किया जा सकता। शोध के दौरान कोपेनहेगन विश्वविद्यालय से जुड़े रहे डेविड मोबजर्ग क्रिटेनसेन ने कहा कि शोधकर्ताओं द्वारा पैरासिटामोल के हानिकारक प्रभाव की निश्चितता की वजह से इसका परीक्षण मानव पर किया जाना अनुचित होगा।

फ्रांस में एन्वायरमेंट एट ट्रॉवेल (आईआरएसईटी) व अब इंस्टीट्यूट डि रिचेर्चे इन सेंटे से जुड़े मोबजर्ग क्रिटेनसेन ने कहा, "एक परीक्षण में पैरासिटामोल दिए गए चूहे हमारे द्वारा नियंत्रित किए गए चूहों की तरह संभोग करने में साधारण तौर पर अक्षम रहे। भ्रूण के विकास के दौरान इनमें पुरुष प्रणाली का विकास सही ढंग से नहीं हुआ और यह उनके बाद के वयस्क जीवन काल में भी देखा जा सकता है। यह चिंताजनक है।"

मोजबर्ग क्रिस्टेनसेन ने कहा कि पहले के शोध में देखा गया है कि पैरासिटामोल के इस्तेमाल से नर भ्रूणों में टेस्टोस्टोरोन सेक्स हार्मोन का विकास बाधित होता है। इससे शिशुओं में अंडकोष की विकृति का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन भ्रूण अवस्था में टेस्टोस्टोरोन का कम स्तर प्रौढ़ पुरुषों के व्यवहार के लिए भी महत्वपूर्ण है।

टेस्टोस्टोरोन एक प्राथमिक पुरुष सेक्स हार्मोन है जो पुरुष के शरीर व दिमाग के पुरुष प्रणाली को विकसित करने में सहायक होता है।


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