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जीवन में चाहते हैं शांति और सफलता, तो भगवान बुद्ध के इन 10 विचारों का करें फॉलो


आज बुद्ध पूर्णिमा है। आज ही के दिन महात्मा बुद्ध का जन्म दिवस मनाया जा रहा है। आज ही के दिन वैशाख उत्सव भी मनाया जा रहा है। आज बौद्ध धर्म के साथ-साथ हिन्दुओं के लिए भी ये बहुत ही खास दिन है। मान्यता है कि आज ही के दिन भगवान बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। आज का दिन निर्वाण दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

गौरतलब है कि आज ही के दिन राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ज्ञान की खोज में सुख-सुविधा छोड़कर जंगल की ओर निकल पड़े थे। बताया जाता है कि महात्मा बुद्ध को बिहार के गया स्थित महाबोधि मंदिर के महाबोधि वृक्ष/पीपल वृक्ष के नीचे कठीन तपस्या करने के बाद ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। बाद में अनुयायियों ने पूरी दुनिया में उनकी शिक्षा और ज्ञान को पूरी दुनिया में फैलाया।

अगर आप चाहते हैं कि आपको जीवन में शांति और सफलता मिले तो आपको भगवान बुद्ध के 10 विचार का जरूर फॉलो करना चाहिए। अगर उनके विचारों का फॉलों करते हैं तो आपको शांति और सफलता दोनों मिलेगी। अइये जानते हैं भगवान बुद्ध के 10 विचार...

  1. जंगली जानवर की अपेक्षा कपटी और दुष्ट मित्र से डरना चाहिए। क्योंकि जंगली जानवर आपके शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, जबकि एक बुरा मित्र आपकी बुद्धि को नुकसान पहुंचा सकता है।
  2. भगवान बुद्ध के अनुसार, संतोष सबसे बड़ा धन है, वफादारी सबसे बड़ा संबंध है जबकि स्वास्थ्य सबसे बड़ा उपहार है।
  3. भगवान बुद्ध की माने तो घृणा, घृणा करने से कम नहीं होती बल्कि प्रेम करने से घटती है।
  4. अपने क्रोध के लिए कोई दंड नहीं पाता, जबकि क्रोध द्वारा दंड मिलता है।
  5. हजारों बेकार शब्दों से अच्छा है कि एक शब्द बोला जाए जिससे शांति आए।
  6. सभी गलत कार्य मन से ही आते हैं। अगर मन में परिवर्तन आ जाए तो गलत कार्य नहीं आ सकता।
  7. भूत पर ध्यान नहीं देना चाहिए, ना ही भविष्य का सपना देखना चाहिए। सिर्फ वर्तमान पर ध्यान देना चाहिए।
  8. जो व्यक्ति 50 लोगों से प्यार करता है, वह 50 दुखों से घिरा रहता है। जो किसी से प्यार नहीं करता उसे कोई समस्या नहीं है।
  9. क्रोध खुद को जलाती है न कि दूसरे को। जैसे किसी और पर फेंकने के इरादे से एक गर्म कोयला अपने हाथ में रखने की तरह है।
  10. शरीर को स्वस्थ्य रखना भी एक कर्तव्य है। अगर शरीर स्वस्थ्य नहीं रहेगा तो मन और सोच को अच्छा और साफ नहीं रह सकता।

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विचार मंथन : हमारे जीवन के जल को भी विचारों की बैलगाड़ियां रोज गन्दा करती रहती है और हमारी शांति को भंग करती है- भगवान बुद्ध


शांति की तलाश
एक बार भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ कही जा रहे थे। उनके प्रिय शिष्य आनंद ने मार्ग में उनसे एक प्रश्न पूछा-‘भगवान! जीवन में पूर्ण रूप से कभी शांति नहीं मिलती, कोई ऐसा मार्ग बताइए कि जीवन में सदा शांति का अहसास हो।

 

भगवान बुद्ध आनंद का प्रश्न सुनकर मुस्कुराते हुए बोले, तुम्हें इसका जबाब अवश्य देगे किन्तु अभी हमे प्यास लगी है, पहले थोडा जल पी ले। क्या हमारे लिए थोडा जल लेकर आओगे?

भगवान बुद्ध का आदेश पाकर आनंद जल की खोज में निकला तो थोड़ी ही दूरी पर एक झरना नजर आया। वह जैसे ही करीब पंहुचा तब तक कुछ बैलगाड़िया वहां आ पहुची और झरने को पार करने लगी। उनके गुजरने के बाद आनंद ने पाया कि झील का पानी बहुत ही गन्दा हो गया था इसलिए उसने कही और से जल लेने का निश्चय किया। बहुत देर तक जब अन्य स्थानों पर जल तलाशने पर जल नहीं मिला तो निराश होकर उसने लौटने का निश्चय किया।

 

उसके खाली हाथ लौटने पर जब भगवान बुद्ध ने पूछा तो उसने सारी बातें बताई और यह भी बोला कि एक बार फिर से मैं किसी दूसरी झील की तलाश करता हूं जिसका पानी साफ़ हो। यह कहकर आनंद जाने लगा तभी भगवान बुद्ध की आवाज सुनकर वह रुक गया। बुद्ध बोले-‘दूसरी झील तलाश करने की जरुरत नहीं, उसी झील पर जाओ।

 

आनन्द दोबारा उस झील पर गया किन्तु अभी भी झील का पानी साफ़ नहीं हुआ था। कुछ पत्ते आदि उस पर तैर रहे थे। आनंद दोबारा वापिस आकर बोला इस झील का पानी अभी भी गन्दा है। भगवान बुद्ध ने कुछ देर बाद उसे वहां जाने को कहा। थोड़ी देर ठहर कर आनंद जब झील पर पहुंचा तो अब झील का पानी बिलकुल पहले जैसा ही साफ़ हो चुका था। काई सिमटकर दूर जा चुकी थी, सड़े- गले पदार्थ नीचे बैठ गए थे और पानी आईने की तरह चमक रहा था।

 

इस बार आनंद प्रसन्न होकर जल ले आया जिसे बुद्ध पीकर बोले कि आनंद जो क्रियाकलाप अभी तुमने किया, तुम्हारा जबाब इसी में छुपा हुआ है। भगवान बुद्ध बोले- हमारे जीवन के जल को भी विचारों की बैलगाड़ियां रोज गन्दा करती रहती है और हमारी शांति को भंग करती है। कई बार तो हम इनसे डर कर जीवन से ही भाग खड़े होते है, किन्तु हम भागे नहीं और मन की झील के शांत होने कि थोड़ी प्रतीक्षा कर लें तो सब कुछ स्वच्छ और शांत हो जाता है। ठीक उसी झरने की तरह जहाँ से तुम ये जल लाये हो। यदि हम ऐसा करने में सफल हो गए तो जीवन में सदा शान्ति के अहसास को पा लेगे।


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विचार मंथन : भगवान बुद्ध के इन चार सिद्धांतों को अपनाने वाले कभी घाटे में नहीं रहते


भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण ये तीनों एक ही दिन अर्थात वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुए थे। इसी दिन भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। सच्चा आत्मबोध प्राप्त कर लेने पर इनका नाम 'बुद्ध' पड़ गया और भगवान बुद्ध ने संसार में उसका प्रचार करके लोगों को कल्याणकारी धर्म की प्रेरणा देने की इच्छा की। इसलिए गया से चलकर वे काशीपुरी में चलें आए, जो उस समय भी विद्या और धर्म चर्चा का एक प्रमुख स्थान थी। यहां सारनाथ नामक स्थान में ठहरकर उन्होंने तपस्या करने वाले व्यक्तियों और अन्य जिज्ञासु लोगों को जो उपदेश दिया उसका वर्णन बोद्ध धर्म ग्रंथों में इस प्रकार मिलता है।

 

1- जन्म दुःखदायी होता है। बुढा़पा दुःखदायी होता है। बीमारी दुःखदायी होती है। मृत्यु दुःखदायी होती है। वेदना, रोना, चित्त की उदासीनता तथा निराशा ये सब दुःखदायी हैं। बुरी चीजों का संबंध भी दुःख देता है। आदमी जो चाहता है उसका न मिलना भी दुःख देता है। संक्षेप में 'लग्न के पाँचों खंड' जन्म, बुढा़पा, रोग, मृत्यु और अभिलाषा की अपूर्णता दुःखदायक है।

 

2- हे साधुओं! पीडा़ का कारण इसी 'उदार सत्य' में निहित है। कामना- जिससे दुनिया में फिर जन्म होता है, जिसमें इधर- उधर थोडा़ आनंद मिल जाता है- जैसे भोग की कामना, दुनिया में रहने की कामना आदि भी अंत में दुःखदायी होती है।

 

3- हे साधुओं! दुःख को दूर करने का उपाय यही है कि कामना को निरंतर संयमित और कम किया जाए। वास्तविक सुख तब तक नहीं मिल सकता, जब तक कि व्यक्ति कामना से स्वतंत्र न हो जाए अर्थात् अनासक्त भावना से संसार के सब कार्य न करने लगे।

 

4- पीडा़ को दूर करने के आठ उदार सत्य ये हैं- सम्यक् विचार, सम्यक् उद्देश्य, सम्यक् भाषण, सम्यक् कार्य, सम्यक् जीविका, सम्यक् प्रयत्न, सम्यक् चित्त तथा सम्यक् एकाग्रता। सम्यक् का आशय यही है कि- वह बात देश, काल, पात्र के अनुकूल और कल्याणकारी हो।

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भगवान विष्णु के माया में फंस गए थे नारद जी, बनना पड़ा था बंदर!


एक बार की बात है जब देवर्षि नारद को अपनी तपस्या पर घमंड हो गया था। कथा के अनुसार, कहा जाता है कि जब नारद जी तपस्या कर रहे थे तो कोई भी उनकी तपस्या भंग नहीं कर पाया तो उन्होंने सबसे पहले अपने पिता ब्रह्मा जी के पास गए और तपस्या सफल होने की जानकारी दी। उसके बाद नारद जी भगवान शंकर के पास गए और उन्हें भी तपस्या पूर्ण होने की जानकारी दी।

इसके बाद भगवान शंकर को लग गया कि नारद जी को अपनी तपस्या का घमंड हो गया है। तब उन्होंने कहा कि देवर्षि नारद इस बात की जानकारी भगवान विष्णु को मत देना। लेकिन मना करने के बावजूद नारद जी भगवान विष्णु के पास गए तपस्या के बारे में जानकारी दी। इसके बाद भगवान विष्णु को लग गया कि नारद जी को कामदेव को जीतने का घमंड हो गया है। इसके बाद उन्होंने सोचा कि अब नारद जी का घमंड तोड़ना ही होगा।

इसके बाद भगवान विष्णु ने माया रची और माता लक्ष्मी को विश्वमोहिनी का रूप धारण करने को कहा। जब नारदी जा रहे थे तो उन्हें रास्ते में एक बड़ा राज्य दिखाई दिया। जहां पर उन्होंने देखा कि धूम-धाम से समारोह मनाया जा रहा है। वहां के राजा शीलनिधि ने अपनी पुत्री विश्वमोहिनी का स्वयंवर रचाया था। सब कुछ जान कर नारद जी भी वहां पहुंचे। वहां नारद जी आदर- सत्कार हुआ। उसके बाद राजा ने अपनी पुत्री का भविष्य पूछा। इस पर देवर्षि ने कहा कि विश्वमोहिनी का पति काफी भाग्यशाली और त्रिलोक का स्वामी होगा।

इसके बाद विश्वमोहिनी के रूप और गुण से मोहित होकर नारद जी भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे प्रार्थना किया कि उन्हें ऐसा सुंदर रूप प्रदार करें कि विश्वमोहिनी स्वयंबर में उनका वरण कर ले। इस पर भगवान विष्णु ने देवर्षि का मुख बंदर का बना दिया और शरीर मनुष्य का ही रहने दिया। इसका आभास नारद जी को नहीं हुआ।

उसके बाद नारद जी शीलनिधि के दरबार में पहुंचे और विश्वमोहिनी के सामने जाकर खड़े हुए ताकि उनके गले में वह वरमाला डाल दे। वहां पर भगवान शिव के दो गण भी मौजूद थे। जब उन्होंने बंदर रूप वाले नारद जी को देखा तो दोनों उनका उपहास करने लगे। कुछ समय पश्चात भगवान विष्णु स्वयं में प्रकट हुए और विश्वमोहिनी ने उनके गले में वरमाला डाल दी। उसके भगवान विष्णु विश्वमोहिनी को लेकर चले गए।

इस पर देवर्षि नारद आश्चर्य चकित हो गए और दरबार में उपस्थि अन्य लोगों को निहारा, इस पर शिवगणों ने उनको अपना मुख दर्पण में देखने को कहा। जब नारद जी ने दर्पण को देखा तो अपना मुख बंदर का पाया। इस पर नारद जी क्रोधित हो गए और भगवान विष्णु का श्राप दिया कि तू भी पत्नी के वियोग में इधर-उधर भटकेगा और यही बंदर तेरी सहायता करेंगे।

इसके बाद भगवान विष्णु ने माया हटा ली। माया के हटते ही नारद जी चैतन्य हो गए और उन्हें खुद पर फश्चाताप होने लगा। नारद जी श्राप पर बहुत शर्मिन्दा हुए। उसके बाद भगवान विष्णु ने उनका श्राप सत्य होने का वचन दिया। कहा जाता है कि नारद जी के श्राप के कारण ही त्रेतायुग में विष्णु अवतार भगवान राम पत्नी सीता के वियोग में जंगल-जंगल भटके थे।


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स्त्रियों के बारे में ये गुप्त बातें जानते हैं क्या? जान लीजिए नहीं तो बाद में माथा पीटेंगे


हमारे शास्त्रों में मनुष्य के बारे में हर चीज की जानकारी दी गई। महिला हो या पुरुष सबके बारे में बताया गया है। शास्त्रों में महिलाओं के विषय में जो जानकारी दी गई, उसे जानकर आप महिलाओं को कुछ हद तक समझ सकते हैं। हमारे शास्त्रों में महिलाओं को माता लक्ष्मी का दर्जा दिया गया है। माना जता है कि जिस घर में महिलाओं का सम्मान होता है, वहां पर मां लक्ष्मी वास करती हैं।

अलग-अलग धर्मग्रंथों में महिलाओं के विषय में अलग-अलग उल्लेख किया गया है। उनके बारे में जानकारी दी गई है। रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास ने महिलाओं के बारे में जो उल्लेख किया है, वह मनुष्य के जीवन में बहुत ही महत्व रखता है। तुलसीदास ने महिलाओं के विषय में जिन बातों का जिक्र किया है, आज हम उन्ही के बारे में चर्चा करेंगे। आइये जानते हैं...

रामचरितमानस में दोहा है... धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परखिए चारी।।

तुलसीदास इस दोहे के माध्यम से कहना चाहते हैं कि जब आपकी परिस्थिति ठीक न हो तो उस वक्त धीरज, धर्म, मित्र और नारी की परीक्षा होती है क्योंकि अच्छे वक्त में सभी लोग आपके साथ होते हैं लेकिन बुरे वक्त में जो आपका साथ देता है, वही अच्छा होता है। बुरे वक्त में नारी यानि कि पत्नी की भी परीक्षा होती है।

जननी सम जानहिं पर नारी। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।

इस दोहे के माध्यम से तुलसीदास कहते हैं कि जो पुरुष, अपनी पत्नी के अलावे संसार के किसी और स्त्री को अपनी मां-बहन समझता है, उसके हृदय में इश्वर वास करते हैं। अगर पुरुष पर नारी यानि कि दूसरे की पत्नी से संबंध रखता है या बनाता है, तो वह पापी होता है और भगवान उससे दूर रहते हैं।

तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर। सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।।

दोहे के माध्यम से तुलसीदास कहते हैं कि सुंदरता को देखकर अच्छे से अच्छा ज्ञानवान, बुद्धिमान व्यक्ति भी मूर्ख बन जाता है। जैसे मोर को ही देख लीजिए... मोर देखने में कितना सुंदर है लेकिन वह सांप मारकर खाता है। अर्थात मनुष्य को कभी भी सुंदरता के पीछे नहीं भागना चाहिए।

मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारी सिखावन करसि काना।।

रामचरितमानस में यह दोहा राम-बाली संवाद पर लिखी गई है। यहां पर भगवान राम कहते हैं कि दुष्ट बाली तुम अज्ञानी हो, तुम अपने ज्ञानी पत्नी की बात नहीं माने इसलिए युद्ध में हार गए। कहने के तात्पर्य ये ही कि अगर आपसे कोई ज्ञानी व्यक्ति कुछ कहता है तो अपना घमंड छोड़ देना चाहिए और उसका बात मान लेना चाहिए।


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विचार मंथन : यहां मेरा अपना कुछ भी नहीं, जिसका है मैं उसी को अर्पित करती हूं- अहिल्याबाई होलकर


'ईश्वर ने मुझ पर जो जिम्मेदारी सौंपी है, मुझे उसे निभाना है। प्रजा को सुखी रखने व उनकी रक्षा का भार मुझ पर है। सामर्थ्य व सत्ता के बल पर मैं जो कुछ भी यहां कर रही हूं, उस हर कार्य के लिए मैं जिम्मेदार हूँ, जिसका जवाब मुझे ईश्वर के समक्ष देना होगा। यहां मेरा अपना कुछ भी नहीं, जिसका है मैं उसी को अर्पित करती हूं। जो कुछ है वह उसका मुझ पर कर्ज है, पता नहीं उसे मैं कैसे चुका पाऊंगी' यह कहना था उस नारी शासिका का, जिसे दुनिया प्रातःस्मरणीया देवी अहिल्याबाई होलकर के नाम से जानती व मानती है।

 

इतिहास के उस दौर में जब नारी शक्ति का स्थान समाज में गौण था। शासन की बागडोर उपासक व धर्मनिष्ठ महिला को सौंपना इतिहास का अनूठा प्रयोग था। जिसने दुनिया को दिखा दिया कि शस्त्रबल से सिर्फ दुनिया जीती जाती होगी, लेकिन लोगों के दिलों पर तो प्रेम और धर्म से ही राज किया जाता है, जिसकी मिसाल हैं देवी अहिल्याबाई होलकर।

 

अपनी निजी जिंदगी में बेहद दयालु व क्षमाशील होने के बावजूद अहिल्याबाई न्याय व्यवस्था के पालन में बेहद सख्त एवं निष्पक्ष थीं। उसकी मर्यादा भंग करने वालों व प्रजा का अहित चाहने वालों पर आपने कभी दया नहीं दिखाई। वे अपराधी को बतौर अपराधी ही देखती थीं। फिर चाहे वह राजपरिवार का सदस्य या सामान्य नागरिक ही क्यों न हो।

 

शासन व्यवस्था पर अहिल्याबाई की पकड़ जबर्दस्त थी। उनके आदेश का अनादर करने का दुःसाहस किसी में भी न था और अपनी प्रशंसा या चाटुकारिता से उन्हें सख्त चिढ़ थी। यही वह गुण था जिसकी वजह से वे इतना कुशल शासन और जनकल्याण कर सकीं। राज्य की आंतरिक व्यवस्था एवं बाह्य सुरक्षा के लिए वे सेना की अहमियत से अच्छी तरह वाकिफ थीं। तमाम जिंदगी धर्माचरण में व्यतीत करने के बावजूद आपने सेना की उपेक्षा नहीं की। सेना को अस्त्र-शस्त्र से सज्जित करने व उसके प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया।

 

प्रशासकीय व कूटनीतिक गतिविधियों के साथ अहिल्याबाई का आर्थिक नजरिया भी गौरतलब है। जिस होलकर राज्य की वार्षिक आमदनी सूबेदार मल्हारराव होलकर के समय में 75 लाख रुपए थी, वह देवी अहिल्याबाई के समय के अंतिम वर्षों में सवा करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी थी। उस दौरान जब संचार एवं यातायात के साधनों का अभाव रहा, अहिल्याबाई ने परराज्यों में द्वारका से जगन्नाथपुरी व बद्रीनाथ से रामेश्वर तक जनकल्याणकारी कार्यों से अपनी रचनाधर्मिता का परिचय दिया। अहिल्याबाई की स्थितप्रज्ञ भूमिका से परोपकारी कार्यों को करने की प्रबल इच्छाशक्ति का प्रतीक है।


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अगर इन चार सवालों का है जवाब, तो सफलता चूमेगी आपके कदम


ज्यादा से ज्यादा धन कमाने के चक्कर में लोग बहुत मेहनत करते हैं, लेकिन मेहनत के अनुसार उन्हें फल की प्राप्ति नहीं होती है। कुछ कार्यों में वे अवश्य सफल हो जाते हैं लेकिन कुछ में असफल भी होते हैं। अगर आप चाहते हैं कि सफलता प्रतिशत बढ़े, तो इसके लिए आपको चाणक्य नीति अपनान पड़ेगा क्योंकि चाणक्य ने जो बातें अपनी नीतियों में बताईं हैं, वह आज के समय में सच साबित हो रहा है।

अगर इंसान उनकी नीतियों का अमल करे तो वह जिंदगी में असफल नहीं हो सकता है। उसे कभी भी हार का सामना नहीं करना पड़ेगा। तो अइये जानते हैं किन सवालों का जवाब पता होना चाहिए।

समय कैसा है?

चाणक्य के अनुसार, हर इंसान को समय के बारे में जानकारी होनी चाहिए। क्योंकि समझदार व्यक्ति यह जरुर समझता है कि वर्तमान समय कैसा चल रहा है। उसी आधार पर इंसान को कार्य करना चाहिए। अगर अच्छे वक्त चल रहे हैं तो लोग अच्छे कार्य करते रहते हैं लेकिन बुरे वक्त में इंसान को अपने कार्य तो करना ही है, साथ ही धैर्य भी बनाकर रखना चाहिए और अच्छे वक्त का इंतजार करना चाहिए।

मित्र कौन है?

चाणक्य के अनुसार, हर व्यक्ति को इतनी तो समझ होनी ही चाहिए कि वह अपने दुश्मन और मित्र की पहचान कर सके। अगर व्यक्ति अपने मित्र और दुश्मन की पहचान नहीं कर सकता तो वह जीवन में कभी भी सफल नहीं हो सकता। क्योंकि कई बार दुश्मन के रुप में लोग मित्र बन जाते हैं और समय आने पर धोखा दे देते हैं, जिस कारण असफलता हाथ लग जाती है।

आय-व्यय की जानकारी

चाणक्य के अनुसार, समझदार व्यक्ति वही है जो आय और व्यय की सही जानकारी रखता है। चाणक्य के अनुसार, हमेश इंसान को अपेन आय के अनुसार ही खर्च करना चाहिए। जो व्यक्ति आय से अधिक खर्च करता है, उसे हर वक्त परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

जगह-स्थान की जानकारी

चाणक्य के अनुसार, इंसान जहां भी काम करता है, उसे उस जगह-स्थान के बारे में जानकारी होनी चाहिए। जैसे कि जिस जगह आप रह रहे हैं, वह जगह कैसा है? वहां के हालात कैसे हैं? जहां आप काम कर रहे हैं, वहां काम करने वाले लोग कैसे हैं? काम करने का तरीका कैसा है?

अगर आपको इन सभी सवालों के बारे में जानकारी है तो सफलता कदम चूमेगी। अगर नहीं है तो आप कभी भी सफल नहीं हो सकते।


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विचार मंथन : बचपन का कुर्ता युवावस्था में पहन हंसी के पात्र न बनें- स्वामी विवेकानन्द


जो मनुष्य कहता है कि मैं कहूं वह सच है और सब मिथ्या है यह कभी विश्वास योग्य नहीं। एक धर्म सच है तो अन्य धर्म क्योंकर मिथ्या हो सकते हैं? जो परम सहिष्णु और मानव जाति पर प्रेम करे वही सच्चा साधु समझना चाहिए। परमेश्वर हमारा पिता और हम सब भाई हैं, यही भावना मनुष्य को उन्नत बना सकती है। यदि कोई जन्म से अज्ञान है तो क्या उसका कर्त्तव्य ज्ञान सम्पादन करने का नहीं है? वह यों कहे कि हम जन्म से मूर्ख हैं तो अब क्यों ज्ञानी बनें, तो सब उसे महामूर्ख कहेंगे। यदि हमारे संकुचित विचार हों तो उन्हें महान बनाना क्या हमारे लिये कोई अपमान की बात है? धर्मोपासना के विशिष्ट स्थान, निश्चित और खास विधि धर्म-ग्रन्थों में बताये हैं, उनके लिये एक दूसरों का उपहास करना क्या कोई बुद्धिमानी है।

 

ये तो बालकों के खिलौनों की तरह हैं। ज्ञान होने पर बालक उन खिलौनों की जिस प्रकार परवाह नहीं करते, उसी प्रकार ईश्वर तक पहुंचे हुए लोगों को उक्त साधनों का महत्व नहीं प्रतीत होता किसी खास मत पन्थों को बिना जाने बूझे ज्ञान होने पर भी मानते रहना, बचपन का कुर्ता युवावस्था में पहनने की इच्छा करने के बराबर उपहास के योग्य है। मैं किसी धर्म पन्थ का विरोधी नहीं हूं और न मुझे उनकी अनावश्यकता ही प्रतीत होती है। पर यह देखकर हंसी रोके से भी नहीं रुकती कि कुछ लोग स्वयं जिस धर्म के रहस्यों को नहीं जानते उसे वे यदि अपना अमूल्य समय इस अध्याषारेघु व्यौपार के बदले उन्हीं तत्वों के जानने में लगावें तो क्या ही अच्छा हो।

 

अनेक धर्मपन्थ उन्हें क्यों खटकते हैं सो मेरी समझ में नहीं आता ! लोग अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार धर्म का अनुसरण करें तो किसी का क्या बिगड़ेगा? एक व्यक्ति के लिये स्वतन्त्र धर्म हो तो भी मेरी समझ में कोई हानि नहीं किन्तु लाभ ही। क्योंकि विविधता से संसार की सुन्दरता बढ़ती है। उदर तृप्ति के लिये अन्न की आवश्यकता है, परन्तु एक ही रस की अपेक्षा अनेक रसों के विविध पदार्थ होने से भोजन में अधिक रुचि आती है। कोई ग्रामीण, जिसे तरह-तरह के पदार्थ मत्सर नहीं और जो केवल रोटी तथा प्याज के टुकड़े से पेट भर लेता है यदि किसी शौकीन के खाने के नाना पदार्थ की निन्दा करे तो वह खुद जिस प्रकार उपहास के पात्र होगा, उसी प्रकार एक ही धर्मविधि के पीछे लगे हुए दूसरे धर्मों की निन्दा करने वाले लोग स्तुति के पात्र नहीं हो सकते।


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gayatri yagya : एक साथ एक करोड़ पुरोहित पूरी दुनिया के एक करोड़ घरों में करायेंगे गायत्री यज्ञ, बनेगा वर्ल्ड रिकॉर्ड


समर्थ एवं शक्तिशाली राष्ट्र के निर्माण एवं भारत को विश्व की महाशक्ति, भारत को पुनः दुनिया का सिरमौर जगतगुरु बनाने के उद्देश्य से हिन्दुस्तान के साथ संपूर्ण विश्व के एक करोड़ से ज्यादा घरों में एक साथ एक समय होगा गायत्री यज्ञ। आगामी 2 जून 2019 दिन रविवार को गायत्री परिवार के करोड़ों गायत्री पुरोहित परिजनों द्वारा घर-घर जाकर विश्व कल्याण की भावना से कराये जायेंगे गायत्री यज्ञ। अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंड्या ने पत्रिका डॉट कॉम को बताया कि भारत के साथ पूरे विश्व में फैले करोड़ों गायत्री साधकों द्वारा घर-घर जाकर निःशुल्क गायत्री यज्ञ कराया जायेगा।

 

 

यज्ञ का उद्देश्य

गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंड्या ने बताया कि गायत्री एवं यज्ञ हमारी संस्कृति के माता-पिता हैं। यह जो विराट यज्ञानुष्ठान गायत्री परिवार द्वारा किया जा रहा है वह बिना जाति, वर्ग, क्षेत्र, भाषा के श्रद्धालुओं के सहयोग से सम्पन्न होगा। अपनी श्रद्धा, निष्ठा, कर्मठता, संघबद्धता का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भारत के साथ दुनिया के अन्य देशों में रहने वाले करोड़ों गायत्री साधक, गायत्री को जन-जन तक सर्व सुलभ रूप में पहुंचाने वाले अपने सदगुरु युगऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा जी के महाप्रयाण दिवस 2 जून को संपूर्ण विश्व के कल्याणार्थ एक साथ एक समय गायत्री यज्ञ निःशुल्क, बिना जाती धर्म भेदभाव के कराकर आचार्य के चरणों में श्रद्धांजलि भी अर्पित करेंगे। साथ ही आगामी 2020 से 2026 तक 10 करोड़ नये घरों में गायत्री यज्ञ करवाया जायेगा।

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भारत के साथ संपूर्ण विश्व में होगा एक साथ गायत्री यज्ञ

वदों में गायत्री को सद्विचार की देवी और यज्ञ को सत्कर्म का देवता कहा गया है। भारतीय संस्कृति को यज्ञीय संस्कृति भी कहा जाता है, भारतीय ऋषियों ने इस संसार को य़ज्ञः विश्वस्य भुवनस्य नाभिः, अर्थात- यज्ञ इस ब्रह्मांड का नाभिक केन्द्र है। समाज एवं राष्ट्र की उन्नति के लिए किया जा रहा यह यज्ञ एक ब्रह्मास्त्र प्रयोग है जिससे पर्यावरण संतुलन होगा। युद्ध, आतंक का वातावरण मिटेगा तथा एकता, समता, सुचिता बढ़ेगी। कार्यक्रम पूरी तरह निःशुल्क है एवं सर्वजन हिताय - सर्वजन सुखाय है। यज्ञ से घरों में सुसंस्कारिता का वातावरण निर्मित होगा। यह कोई औपचारिकता या खाना पूर्ति, संख्या पूर्ति नहीं, बल्कि यह तो एक विशेष लक्ष्य-उद्देश्य के लिये आयोजित विराट अनुष्ठान है, जो एक साथ पूरी दुनिया के एक करोड़ घरों में गायत्री यज्ञ सम्पन्न गायत्री मंत्र का जप करने वाले साधक करेंगे।

 

 

एक करोड़ पुरोहित करायेंगे यज्ञ

घर-घर गायत्री यज्ञ अभियान के समन्वयक केदार प्रसाद दुबे ने बताया कि भारत को विश्वगुरु की भूमिका निभाने में पुनः सक्षम बनाने के लिये इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के उद्घोषक आचार्य श्रीराम शर्मा के स्वप्न को साकार करने की दिशा में यह अभियान बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है। यज्ञों के संचालन के हेतु एक करोड़ लोक हितकारी यज्ञ कराने वाले पुरोहित तैयार किए जा रहे हैं। इन पुरोहितों में पुरुष ही नहीं, उच्च शिक्षित महिलाएं भी यज्ञ करायेंगी। जो नये पुरोहित हैं उन्हें यज्ञ कर्मकांड कराने का विधिवत प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। देश दुनिया के एक करोड़ घरों में जाकर एक करोड़ पूर्ण प्रशिक्षित पुरोहित ही यज्ञ करायेंगे। इसके लिए घर घर जाकर लोगों से उनके घरों में कराने की पूर्व में ही अनुमति ली जा रही है और जन मानस इस अभियान के लिए सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर रहे हैं। पूर्व से निश्चित चयनित घरों में ही यह गायत्री यज्ञ सम्पन्न किया जायेगा।

gayatri yagya

मोबाइल पंडित

मोबाइल पंडित अर्थात सोशल मीडिया से जुड़कर ऐसी युवा पीढ़ी जो इस अभियान से जुड़कर अपने घर पर स्वयं भी या किसी और के घर जाकर गायत्री यज्ञ करना चाहते हैं तो, अपने एंडरॉयड मोबाइल फोन पर यज्ञ कर्मकाण्ड www.awgp.org एवं www.diya.net.in से डाउनलोड कर उसके सहयोग से सरलता पूर्वक गायत्री यज्ञ संपन्न करा सकते हैं। इसी प्रकार यज्ञ कर्मकाण्ड के मंत्रों का प्रशिक्षण वाला वीडियो भी इसी से डाउनलोड कर अभ्यास भी किया जा सकता है।

 

यज्ञ के लाभ

डॉ. प्रणव पंड्या ने बताया कि यह यज्ञ समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है, एवं यही संसार का सर्वश्रेष्ठ शुभकर्म है। यज्ञ पर्यावरण को शुद्ध करता है। यज्ञ धुम्र वायुमण्डल को सुगन्धि एवं पुष्टि प्रदान कर पर्जन्य वर्षा कराता है। यज्ञ वातावरण में विद्यमान रोग-कीटाणुओं का नाश करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है। यज्ञ द्वारा विश्वव्यापी पंचतत्वों की तन्मात्रा की तथा दिव्य शक्तियों की पुष्टि होती है। जहां नियमित यज्ञ होते हैं वह स्थान पवित्र व संस्कारवान् स्थान बन जाते हैं। यज्ञ से घरों में सुसंस्कारिता का वातावरण निर्मित होता है। यज्ञ त्याग-परोपकार, सहयोग-सहकार एवं सम्मान का सर्वोत्तम शिक्षक है। यज्ञ एक सिद्ध एवं पूर्ण विज्ञान है।

 

निःशुल्क होगा यज्ञ

डॉ. प्रणव पंड्या के अनुसार जिन एक करोड़ घरों में गायत्री परिजन पुरोहित यज्ञ कराने जायेंगे उनके द्वारा यज्ञ कराने की दक्षिणा या किसी भी तरह का शुल्क नहीं लिया जायेगा अर्थात पूरी तरह निःशुल्क गायत्री यज्ञ किया जायेगा।

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पैसा बचेगा भी... बढ़ेगा भी, बस करने होंगे ये चार काम


अक्सर हम कहते हैं कि पैसे इस हाथ से आता है और दूसरे हाथ से चला जाता है। कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि आयेगा तब तो बचेगा। इसीसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सांसारिक जीवन में पैसे का कितना महत्व है। यानि अर्थ के बिना सब व्यर्थ है। तो आइये जानते हैं उन तरीकों को, जिससे धन सुरक्षित रहेगा और बढ़ेगा भी।

दरअसल, महाभारत की विदुर नीति में लक्ष्मी यानि घन का अधिकारी बनने के लिए (विचार और कर्म से) चार अहम सूत्र बताए गए हैं। इन चार तरीके को अपनाने से कोई भी धनवान बन सकता है।

श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भात् सम्प्रवर्धते।
दाक्ष्यात्तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठत्ति।।

इस श्लोक में धन बचाने के चार सूत्र बताए गएं हैं। अगर इन चारों सूत्र पर हम ईमानदारी से काम करते हैं तो धन बचेगा भी और बढ़ेगा भी। आइये जानते हैं उन चार तरीकों के बारे में, जिससे धन को बचाया भी जा सकता है और बढ़ाया भी जा सकता है।

  1. अक्सर हम सुनते हैं कि अच्छा कर्म करने पर लक्ष्मी स्थाई तौर पर आती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि मेहनत और ईमानदारी से किये गए कार्यों से जो धन प्राप्त होता है, वह स्थाई होता है।
  2. धन का सही प्रबंधन और निवेश से वह लगातार बढ़ता है। यानि धन को अगर हम सही जगह और सही कार्यों में लगाएंगे तो उसका निश्चित ही लाभ मिलेगा। जिससे धन बढ़ेगा।
  3. अगर धन का सही तरीके से उपयोग किया जाए तो धन की बचत होगी। यही नहीं, अगर हम आय-व्यय पर विशेष ध्यान देंगे तो वह बढ़ता भी रहेगा। अगर हम ऐसा करेंगे तो धन का संतुलन बना रहेगा।
  4. सबसे महत्वपूर्ण है कि धन की रक्षा का लिए आपको हर तरह से संयम रखना होगा। इसका मतलब साफ है कि आवश्यक जरूरतों पर ही खर्च करें। अगर आप सुख पाने और शौक को पूरा करने में धन खर्च करते हैं तो धन की कमी होगी। आर्थात धन खर्च करने में मानसिक, शारीरिक और वैचारिक संयम रखना बहुत ही जरूरी है।

इससे साफ है कि हमें धन बचाने से ज्यादा उसे बढ़ाने पर सोचना चाहिए और उसी पर काम करना चाहिए।


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विचार मंथन : सबके अंत:करण में विराजते हैं भगवान चित्रगुप्त- आचार्य श्रीराम शर्मा


वेदों में भगवान को हजारों सिरों, नेत्रों, हाथों, पैरों वाला बताया गया है। परमात्मा ने प्रत्येक प्राणी के कर्मों का लेखा-जोखा भी सटीक तरीके से रखने का विधान बनाया है और उन्होंने यह काम अपने प्रतिनिधि भगवान चित्रगुप्त को दे रखा है जो सभी के अच्छे बूरे कर्मों की जानकारी विधिवत एकत्रित करते हैं, ऐसा हमारे शास्त्र पुराणों में वर्णित है। "गहना कर्मणोंगति"- प्रत्येक प्राणी के अंत:करण में भगवान चित्रगुप्त विराजित रहते हैं। जैसा कि चित्रगुप्त शब्द से अर्थ निकलता है, कि गुप्त रूप से बने चित्र।

 

भारतीय विद्वान कर्म रेखा के बारे में प्राचीन काल से बताते आए हैं कि "कर्म रेख नहीं मिटे, करो कोई लखन चतुराई" आधुनिक शोधों ने इन कर्म रेखाओं के अलंकारिक कथानक की पुष्टि की है। वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क के ग्रै मैटर के एक परमाणु में अगणित रेखाए पा़ई हैं, यह रेखाए किस प्रकार बनती हैं इसका कोई प्रत्यक्ष शारीरिक कारण वैज्ञानिकों को नहीं मिला। यह रेखाए एक प्रकार के गुप्त चित्र ही हैं। ग्रामोफ़ोन की रेखाओं में कितना संगीत रिकार्ड हो जाता है, आज कल प्रचलित माइक्रोसॉफ्ट में कितना डाटा संग्रह किया जा सकता है यह हम सब जानते हैं।



इस प्रकार सबके लिए अलग अलग चित्रगुप्त मन में रहते हैं, जो बिना किसी भेदभाव के प्राणी के कर्मों को उनके करने के भाव के साथ रिकॉर्ड करते चलते हैं। अत: किसी भी काम को करने के पहले अंतर्मात्मा की बात को जरूर सुना जाय। मन में चलने वाले देवासुर संग्राम में देव शक्तियों की विजय के लिए अपने अदंर के चित्रगुप्त का स्मरण जरूर किया जाय। इस स्थिति में आप सदा अच्छे काम ही करेंगे, साथ ही जल्दी तथा गलत कामो को न करने या अभी टालने का निर्णय तो लिया ही जा सकता है। हमारी राय में यही चित्रगुप्त पूजन का सही मर्म है, इसे समझा और अपनाया जाना चाहिए।


प्रारब्ध कर्मों का फल मिलना निश्चित है, परंतु उसके अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होने में कुछ समय लग जाता है। यह समय कितने दिन का होता है, इस सम्बन्ध में कुछ नियम मर्यादा नहीं है, वह आज का आज भी हो सकता है और कुछ जन्मों के अंतर से भी हो सकता है, किंतु प्रारब्ध फल होते वही हैं, जो अचानक घटित हों और जिसमें मनुष्य का कुछ वश न चले।


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विचार मंथन : ब्रह्म, जीव और जगत तीनों सत्य हैं- रामानुजाचार्य


यदि ब्रह्म एक विशिष्ट है, जिसमें जीव और जगत् विशेषण रूप से स्थित हैं। ब्रह्म आत्मा या केन्द्रीभूत तत्व है। जीव और जगत् ब्रह्म के देह हैं। ब्रह्म, जीव और जगत् तीनों सत्य हैं, भिन्न हैं, परन्तु केवल ब्रह्म स्वाधीन है तथा जीव और जगत् ब्रह्मधीन एवं ब्रह्म नियंत्रित हैं। जीव और जगत् किस अर्थ में ब्रह्म के देह हैं।

 

'देह वह द्रव्य है, जिसे एक चेतन आत्मा अपने प्रयोजन हेतु धारण करती है, नियंत्रित करती है, कार्य में प्रवृत्त करती है और जो पूर्णतया उस आत्मा के अधीनस्थ रहती है। इस दृष्टि से समस्त जीव-जगत् ब्रह्म के देह हैं, क्योंकि वे ब्रह्म पर आधारित, ब्रह्म के द्वारा नियंत्रित एवं ब्रह्म के अधीनस्थ रहते हैं। ब्रह्म और जीव-जगत् के इस विशिष्ट संबंध को रामानुज अपृथक्सिद्ध के नाम से पुकारते हैं, जिसमें पूर्ण तादात्म्य और पूर्ण भेद दोनों का निषेध किया गया है। इसमें संबंधियों के तादात्म्य पर ज़ोर तो दिया ही गया है, पर यह तादात्म्य संबंध और फलत: किसी एक संबंधी को ही समाप्त न कर दे, इस दृष्टि से भेद पर भी बल देकर संबंध के अस्तित्व की रक्षा की गई है।

 

जगत की तात्विक प्रस्थिति के बारे में वेदान्त दर्शन में मायावाद एवं लीलावाद की दो पृथक् एवं पूर्णत: विरोधी परम्पराएं रही हैं। इन दोनों परम्पराओं में मौलिक भेद सत्ता के प्रति दृष्टिकोण में है। दोनों यह मानते हैं कि सृष्टि प्रक्रिया का मूल सृजन की चाह है और उस चाह को चरमतत्व (ब्रह्म) पर आरोपित एवं मिथ्या माना गया है, जबकि लीलावाद में उसे ब्रह्म की स्वाभाविक शक्ति एवं वास्तविक माना गया है। दोनों के अनुसार जगत् ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है, पर एक में वह आभास मात्र है, जबकि दूसरे में वास्तविक। रामानुज जगत् को उतना ही वास्तविक मानते हैं, जितना की ब्रह्म है। ब्रह्म जगत की सृष्टि का निमित्त एवं उपादान कारण है। किन्तु इस प्रक्रिया में ब्रह्म निर्विकार रहता है।

 

क्रिया शक्ति उसकी सत्ता या स्वरूप में बाधा नहीं पहुँचाती। प्रलय की अवस्था में चित् और अचित् अव्यक्त रूप में ब्रह्म में रहते हैं। ब्रह्म को इस अवस्था में 'कारण-ब्रह्म' कहते हैं। जब सृष्टि होती है, तब ब्रह्म में चित् एवं अचित् व्यक्त रूप में प्रकट होते हैं। इस अवस्था को कार्य ब्रह्म कहते हैं। ब्रह्म अपनी दोनों विशिष्ट अवस्थाओं में अद्वैत रूप है। केवल भेद यह है कि पहले में अद्वैत एकविध है तो दूसरे में अनेकविध हो जाता है। दोनों अवस्थाएं समान रूप से सत्य हैं। अभेद-श्रुतियां कारण-ब्रह्म की बोधक हैं और और भेद-श्रुतियां कार्य-ब्रह्म की।


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विचार मंथन : अद्वितीय संसदविद, राष्ट्रसेवी, स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, विचारक एवं सुधारक, गोपाल कृष्ण गोखले


महाराष्ट्र के कोल्हापुर में 9 मई 1866 जन्में गोपाल कृष्ण गोखले अपने समय के अद्वितीय संसदविद और राष्ट्रसेवी, एक स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, विचारक एवं सुधारक भी थे। उन्होंने अपने जीवन में इस सिंद्धातों को आजीवन अपनाया- 1- सत्य के प्रति अडिगता, 2- अपनी भूल की सहज स्वीकृती, 3- लक्ष्य के प्रति निष्ठा, 4- नैतिक आदर्शों के प्रति आदरभाव, 5- वाकपटुता का कमाल।

 

सवैधानिक रीति से देश को स्वशासन की ओर ले जाने में विश्वास रखने वाले गोखले नरम विचारों के माने जाते थे। गोखले जी क्रांति में नहीं, सुधारों में विश्वास रखते थे। 1902 ई. में गोखले को 'इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउन्सिल' का सदस्य चुना गया। उन्होंने नमक कर, अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा एवं सरकारी नौकरियों में भारतीयों को अधिक स्थान देने के मुद्दे को काउन्सिल में उठाया। गोपाल कृष्ण गोखले ने 1905 में 'भारत सेवक समाज' की स्थापना की, ताकि देश के नौजवानों को सार्वजनिक जीवन के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। उनका मानना था कि वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा भारत की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। इसीलिए इन्होंने सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा लागू करने के लिये सदन में विधेयक भी प्रस्तुत किया था।

 

सुधारक की कड़ी भाषा

एक ओर लोकमान्य तिलक 'केसरी' और 'मराठा' अख़बारों के माध्यम से अंग्रेज़ हुकूमत के विरुद्ध लड़ रहे थे, तो वहीं 'सुधारक' को गोखले ने अपनी लड़ाई का माध्यम बनाया हुआ था। 'केसरी' की अपेक्षा 'सुधारक' का रूप आक्रामक था। सैनिकों द्वारा बलात्कार का शिकार हुई दो महिलाओं ने जब आत्महत्या कर ली, तो 'सुधारक' ने भारतीयों को कड़ी भाषा में धिक्कारा था- तुम्हें धिक्कार है, जो अपनी माता-बहनों पर होता हुआ अत्याचार चुप्पी साधकर देख रहे हो। इतने निष्क्रिय भाव से तो पशु भी अत्याचार सहन नहीं करते। गोखले जी के इन शब्दों ने भारत में ही नहीं, इंग्लैंड के सभ्य समाज में भी खलबली मचा दी थी। 'सर्वेन्ट ऑफ़ सोसायटी' की स्थापना गोखले द्वारा किया गया महत्त्वपूर्ण कार्य था। इस तरह गोखले ने राजनीति को आध्यात्मिकता के ढांचे में ढालने का अनुठा कार्य किया।

 

राजनीति को आध्यात्मिकता के ढांचे में ढालने का अनुठा कार्य

गोखले की सोसाइटी के सदस्य इन संकल्पों का आजीवन पालन करते थे - वह अपने देश की सर्वोच्च समझेगा और उसकी सेवा में प्राण न्योछावर कर देगा। देश सेवा में व्यक्तिगत लाभ को नहीं देखेगा। प्रत्येक भारतवासी को अपना भाई मानेगा। जाति समदाय का भेद नहीं मानेगा। सोसाइटी उसके और उसके परिवार के लिए जो धनराशि देगी, वह उससे संतुष्ट रहेगा तथा अधिक कमाने की ओर ध्यान नहीं देगा। पवित्र जीवन बिताएगा। किसी से झगड़ा नहीं करेगा। सोसायटी का अधिकतम संरक्षण करेगा तथा ऐसा करते समय सोसायटी के उद्देश्यों पर पूरा ध्यान देगा।

 

गांधी जी को मिली थी गोखले से प्रेरणा

गांधी जी गोखले को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। आपके परामर्श पर ही उन्होंने सक्रिय राजनीति में भाग लेने से पूर्व एक वर्ष तक देश में घूमकर स्थिति का अध्ययन करने का निश्चय किया था। साबरमती आश्रम की स्थापना के लिए गोखले ने गांधी जी को आर्थिक सहायता दी। गोखले सिर्फ गांधी जी के ही नहीं बल्कि मोहम्मद अली जिन्ना के भी राजनीतिक गुरु थे। गांधी जी को अहिंसा के जरिए स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई की प्रेरणा गोखले से ही मिली थी।

 

गोखले की मृत्यु के बाद महात्मा गांधी ने अपने इस राजनैतिक गुरु के बारे में कहा "सर फिरोजशाह मुझे हिमालय की तरह दिखाई दिये, जिसे मापा नहीं जा सकता और लोकमान्य तिलक महासागर की तरह, जिसमें कोई आसानी से उतर नहीं सकता, पर गोखले तो गंगा के समान थे, जो सबको अपने पास बुलाती है।" तिलक ने गोखले को 'भारत का हीरा', 'महाराष्ट्र का लाल' और 'कार्यकर्ताओं का राजा' कहकर उनकी सराहना की।

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विचार मंथन : ब्रजवासियों के जूठे बर्तनों से जो कुछ प्राप्त हो उसी को ग्रहण करने से ब्रह्मतत्व की प्राप्ति हो जाती है- संत सूरदास


सूरदास जी की रचनाओं में कृष्ण भक्ति का भाव उजागर होते हैं। वहीं उन्होंने अपनी रचनाओं में श्री कृष्ण की बाल लीलाओं और उनके सुंदर रूप का इस तरह वर्णन किया है कि मानों उन्होंने खुद अपनी आंखों से नटखट कान्हा की सभी लीलाओं को देखा हो। जो एक बार भी सूरदास जी की रचनाओं को पढ़ता है वो कृष्ण की भक्ति में डूब जाता है।

 

अरे मन तू ब्रज में ही रह
ब्रजरज धन्य है जहां नंदपुत्र श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं और अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं। उसी भूमि पर श्यामसुंदर का स्मरण करने से मन को परम शांति मिलती हैं। अरे मन! तू काहे इधर उधर भटकता है। ब्रज में ही रह, जहां व्यावहारिकता से परे रहकर सुख की प्राप्ति होती है। यहां न किसी से लेना, न किसी को देना, सब कृष्ण के ध्यान में हर पल मग्न रहते हैं। ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के जूठे बर्तनों से जो कुछ प्राप्त हो उसी को ग्रहण करने से ब्रह्मतत्व की प्राप्ति होती है। ब्रजभूमि की समानता कामधेनु भी नहीं कर सकती।

 

खंभे में अपना प्रतिबिंब
श्रीकृष्ण अपने ही घर के आंगन में जो मन में आता हैं वो गाते हैं। वह छोटे छोटे पैरो से थिरकते हैं तथा मन ही मन स्वयं को रिझाते भी हैं। कभी वे भुजाओं को उठाकर काली श्वेत गायों को बुलाते है, तो कभी नंद बाबा को पुकारते हैं और घर में आ जाते हैं। अपने हाथों में थोड़ा सा माखन लेकर कभी अपने ही शरीर पर लगाने लगते हैं, तो कभी खंभे में अपना प्रतिबिंब देखकर उसे माखन खिलाने लगते हैं। मैया यशोदा श्रीकृष्ण को कभी पालने में झुला रही है, तो कभी पालने को धीरे से हिला देती हैं, कभी कन्हैया को प्यार करने लगती हैं और कभी चूमने लगती हैं।

 

ऐसा सुख तो देवताओं और ऋषि-मुनियों को भी दुर्लभ है
मां यशोदा निंदिया को उलाहना देती हैं तब श्रीकृष्ण कभी पलकें मूंद लेते हैं और कभी होठों को फड़काते हैं। श्रीकृष्ण को सुलाने के लिए मैया मधुर मधुर लोरियां भी गाने लगती है। सूरदास जी नंद पत्नी यशोदा के भाग्य की सराहना करते हुए कहते है की सचमुच ही यशोदा बड़भागिनी हैं क्योंकि ऐसा सुख तो देवताओं और ऋषि-मुनियों को भी दुर्लभ है।

 

रसिक श्रीकृष्ण ने जब राधा रानी को..
राधा रानी से प्रथम मिलन पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पूछा की हे गोरी! तुम कौन हो? कहां रहती हो? किसकी पुत्री हो? हमने पहले कभी ब्रज की इन गलियों में तुम्हें नहीं देखा। तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आई? अपने ही घर के आंगन में खेलती रहती। इतना सुनकर राधा बोली, मैं सुना करती थी की नंदजी का लड़का माखन चोरी करता फिरता है। इस पर श्रीकृष्ण बोले, लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे। अच्छा, हम मिलजुलकर खेलते हैं। इस प्रकार रसिक श्रीकृष्ण ने बातों ही बातों में भोली-भाली राधा रानी को भरमा दिया।


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घर में करें इसका प्रयोग , बड़ी से बड़ी मुसीबत से दिलाएगा छुटकारा


हर इंसान को अपने जीवन में बहुत सी अच्छी और बुरी परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। जब व्यक्ति के जीवन में खुशियां रहती है तो वह अपना जीवन ठीक प्रकार से व्यतीत करता है परंतु जब व्यक्ति के जीवन में खुशियां समाप्त हो जाती है तो वह काफी चिंतित हो जाता है और उस व्कत उसे कुछ समझ नहीं आता कि उसको क्या करना चाहिए।

अगर ठीक प्रकार से जीवन व्यतीत करना है तो इसके लिए इंसान को खुश रहना बहुत ही आवश्यक है। इंसान खुश तब ही रह सकता है जब उसको किसी बात की चिंता ना हो।

दरअसल, हम अक्सर सुनते हैं कि उसके घर में वास्तु दोष है। यही कारण है कि अचानक उसकी खुशियां दुखों में बदल गई है। सच्चाई भी यही है। वास्तु दोष की वजह से ही घर परिवार के सदस्यों को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। आज हम आपको ऐसे उपाय के बारे में बताएंगे, जिसका प्रयोग कर आप अपने घर परिवार को खुशहाल रख सकते हैं।

  • हर घर में नमक रहता है। अब आप सोच रहे होंगे की नमक तो खाने में प्रयोग करते हैं इससे वास्तु दोष कैसे दूर होगा। नमक सिर्फ खाने के काम ही नहीं आता, बल्कि यह हमें बहुत सी मुसीबतों से भी बचाता है। अगर आप नमक का सही प्रयोग करेंगे तब...
  • घर में नकारात्मक ऊर्जा का वास हो जाए तो नमक को कांच के जार में भरकर इसको घर के किसी कोने में रख दें। ऐसा करने से घर में मौजूद नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश हो जाएगा और सकारात्मक ऊर्जा घर में वास करेगी, जिससे घर परिवार की समस्त परेशानियां दूर होंगी।
  • नमक को पीड़ित व्यक्ति के सिर से तीन बार घुमाकर इसे किसी बहते हुए पानी में प्रवाहित कर दें, इससे नजर उतर जाएगी और परेशानियां दूर हो जाएंगी।
  • गुरुवार का दिन छोड़कर किसी भी दिन पानी में खड़ा नमक मिलाकर घर में पोछा लगाएं, इससे घर में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा का नाश हो जाएगा।
  • नमक को एक शीशे की कटोरी में भरकर शौचालय या फिर स्नान घर में रख दें। इससे वास्तु दोष दूर हो जाएगा और घर परिवार में खुशियां आएंगी।

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विचार मंथन : मंदिर की गंभीर उदासी को देख भगवान भी दिखावा करने वाले पुजारी को भूल जाते हैं- रविन्द्रनाथ टैगोर


मौत प्रकाश को ख़त्म करना नहीं

सिर्फ तर्क करने वाला दिमाग एक ऐसे चाक़ू की तरह है जिसमें सिर्फ ब्लेड है यह इसका प्रयोग करने वाले के हाथ से खून निकाल देता है। कट्टरता सच को उन हाथों में सुरक्षित रखने की कोशिश करती है जो उसे मारना चाहते हैं। पंखुडियां तोड़ कर आप फूल की खूबसूरती नहीं इकठ्ठा करते। मौत प्रकाश को ख़त्म करना नहीं है; ये सिर्फ दीपक को बुझाना है क्योंकि सुबह हो गयी है। मित्रता की गहराई परिचय की लम्बाई पर निर्भर नहीं करती। किसी बच्चे की शिक्षा अपने ज्ञान तक सीमित मत रखिये, क्योंकि वह किसी और समय में पैदा हुआ है।

 

जो कुछ हमारा है वो हम तक आता है

मिटटी के बंधन से मुक्ति पेड़ के लिए आज़ादी नहीं है। हर बच्चा इसी सन्देश के साथ आता है कि भगवान अभी तक मनुष्यों से हतोत्साहित नहीं हुआ है। हर एक कठिनाई जिससे आप मुंह मोड़ लेते हैं, एक भूत बन कर आपकी नीद में बाधा डालेगी। जो कुछ हमारा है वो हम तक आता है, यदि हम उसे ग्रहण करने की क्षमता रखते हैं। तथ्य कई हैं पर सत्य तो केवल एक है। आस्था वो पक्षी है जो सुबह अंधेरा होने पर भी उजाले को महसूस करती है।

 

जो अच्छाई करने में बहुत ज्यादा व्यस्त है

मंदिर की गंभीर उदासी से भागकर बच्चें बाहर धूल में खेलने लगे और भगवान उन्हें खेलता देख दिखावा करने वाले पुजारी को भूल जाते है। वो जो अच्छाई करने में बहुत ज्यादा व्यस्त है, स्वयं अच्छा होने के लिए समय नहीं निकाल पाता। मैं एक आशावादी होने का अपना ही संस्करण बन गया हूं। यदि मैं एक दरवाजे से नहीं जा पाता तो दुसरे से जाऊंगा- या एक नया दरवाजा बनाऊंगा। वर्तमान चाहे जितना भी अंधकारमय हो कुछ शानदार सामने आएगा। मैं सोया और स्वप्न देखा कि जीवन आनंद है, मैं जागा और देखा कि जीवन सेवा है, मैंने सेवा की और पाया कि सेवा आनंद है। यदि आप सभी गलतियों के लिए दरवाजे बंद कर देंगे तो सच बाहर रह जायेगा।

 

दिन पर दिन जाते मैं बैठा एकाकी ।

दिन पर दिन चले गए,पथ के किनारे
गीतों पर गीत, अरे, रहता पसारे ।।
बीतती नहीं बेला, सुर मैं उठाता ।
जोड़-जोड़ सपनों से उनको मैं गाता ।।
दिन पर दिन जाते मैं बैठा एकाकी ।
जोह रहा बाट, अभी मिलना तो बाकी ।।
चाहो क्या, रुकूं नहीं, रहूं सदा गाता ।
करता जो प्रीत, अरे, व्यथा वही पाता ।

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अगर पत्नी के पैर में है इस तरह के निशान तो समझिए...


हिन्दू धर्म में स्त्री को घर की लक्ष्मी माना जाता है। कभी-कभी हम अपने घर परिवार में सुनते भी हैं कि उसे आने से उसके घर में सुख-समृद्धि आ गई। कभी ये भी सुनते हैं कि उसका पैर पड़ते ही बुरे दिन शुरू हो गए। हम कह सकते हैं कि कुछ महिलाए बहुत ही भाग्यशाली होती हैं तो कुछ असौभाग्यशाली।

तो ऐसे में सवाल उठता है कि कैसे हम जानेंगे कि कौन सी महिलाएं भाग्यशाली होती हैं तो कौन सी असौभाग्यशाली। इसे जानने और पहचानने के लिए हमारें शास्त्रों में कई तरह की बातें बताई गई है। लेकिन आज हम आपको जो बताएंगे उसे देखकर आप भी अंदाजा लगा सकते हैं कि आपके भाग्य में राजयोग है या नहीं।

तो आप भी अपनी पत्नी के पैर देखकर ये पता कर सकते हैं कि आपके भाग्य में राजयोग है या नहीं। आगर आपकी पत्नी के पैर में ये निशान है तो जान जाइये कि आपके भाग्य में राजयोग है।

  • जिस औरत के पैर के तलवे में चक्र, ध्वज और स्वास्थिक का निशान रहता है उसका पति सौभाग्यशाली होती है। कहा जाता है उसे राजयोग प्राप्त होता है और वह राजा की तरह जीवन व्यतीत करता है। उसे धन की कमी कभी नहीं होती है।
  • जिसके पैर के तलवों के गद्देदाग हिस्से की रेखाएं ऊंगलियों की ओर जाती है तो वह अपने पति के लिए सौभाग्यशाली होती है। इस तरह की पत्नी को पा कर पति को सुख-समृद्धि की प्राप्ती है और उसे जीवन में बड़ी-बड़ी सफलता मिलती है।
  • जिस औरत का पैर की सबसे छोटी अंगुली और बगल वाली अंगुली चलते समय जमीन को छुए तो वह अपनी पति के लिए सौभाग्यशाली होती है और वह हमेशा राजा की तरह जीवन बिताता है।
  • जिस महिला के तलवे में कमय या चक्र का निशान होता है वह अपने पति के लिए शुभ मानी जाती है। ऐसे शख्स सियासत में उच्च पद प्राप्त करते हैं।
  • अगर किसी महिला के पैर की सबसे छोटी अंगुली की लंभार अंगूठे और उसके बगल वाली अंगुली से छोटी हो तो ऐसी महिलाओं को घर में कदम रखते ही घर के दिन बदल जाते हैं। घर के किस्मत द्वार खुल जाते हैं। घर की सुख-समृद्धि और खुशहाली बदल जाती है और पति को राजयोग प्राप्त होता है।

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इस राशि वाले लड़के से हर लड़की करना चाहती है शादी, क्योंकि...


सभी लड़कियों का सपना होता है कि उसका जो जीवनसाथी मिले उसे उम्र भर प्यार करे और सुख-दुख में साथ निभाए। आज हम आपको बताएंगे कि अगर लाइफ पार्टनर राशि के हिसाब से चुनेंगे तो शायद आपकी ख्वाहिश पूरी हो जाए। क्योंकि हमारे धर्मशास्त्र में बताया गया है कि हर राशि की अलग-अलग खासियत होती है। उनमें से एक है वृषभ राशि , जिनका प्यार करने का अंदाज सबसे अगल होता है।

कहा जाता है कि इस राशि के लोग बेस्ट पति बनते हैं। इनकी सबसे खास बात यह है कि उम्र के साथ इनका प्यार और बढ़ता है। जिंदगी भर इनका प्यार वैसा ही रहता है जैसा शुरुआत में रहता है।

कहा जाता है कि इस राशि वालों में प्रेम क्षमता सबसे अधिक होती है। इस राशि वाले लोग प्यार में सबकुछ करने के लिए तैयार रहते हैं, जिससे उनकी पार्टनर खुश रहे। माना जाता है कि इस राशि के लोग कन्या राशि की ओर सबसे ज्यादा आकर्षित होता है। जहां तक राशि के अनुसरा मेल की बात कि जाए तो मीन और कन्या राशि इन जातकों के लिए सबसे बेहतर होते हैं।

इनसे प्यार से पेश आएं

वृषभ राशि वालों के साथ कुछ बातों को लेकर सावधानी भी बरतना चाहिए। बताया जाता है कि इस राशि के लोग बहुत ही गुस्सैले भी होते हैं। अगर आप इनको ठेस पहुंचाएंगे तो आपको ये कुछ भी बोल सकते हैं। ये आपसे रिश्ते भी तोड़ देंगे। समझदारी यही है कि इन जातकों के साथ प्यार से पेश आएं। कहा जाता है कि इस राशि के जातक बातें घुमा-फिराकर नहीं करते हैं। सीधे और साफ शब्दों में बात करते हैं। इन्हें धोखा-धड़ी बिल्कुल पसंद नहीं है।


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विचार मंथन : अनीति का संहार करने वाले पितृ भक्त परशुराम


 

श्रीमद्भागवत में कथा आती है कि गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख हवन हेतु गंगा तट पर जल लेने गई रेणुका आसक्त हो गयी और कुछ देर तक वहीं रुक गई। हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के आर्य मर्यादा विरोधी आचरण एवं मानसिक व्यभिचार करने के दण्डस्वरूप सभी पुत्रों को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी।

 

अन्य भाइयों द्वारा पिता की आज्ञा पूरी न कर पाने पर पिता के तपोबल से प्रभावित परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता का सिर धड़ से अलग एवं माता को बचाने के लिए आए अपने समस्त भाइयों का वध कर डाला। उनके इस कार्य से प्रसन्न जमदग्नि ने जब उनसे वर मांगने का आग्रह किया तो परशुराम ने सभी के पुनर्जीवित होने एवं उनके द्वारा वध किए जाने सम्बन्धी स्मृति नष्ट हो जाने का ही वर मांगा।

 

जब गणेशजी के दांत तोड़े -
एक कथानुसार, एक बार परशुराम भगवान शिव के दर्शन करने के लिए कैलाश पर्वत पहुंचे लेकिन गणेश जी ने उन्हें मिलने से इनकार कर दिया। इस बात पर परशुराम को क्रोध आ गया और उन्होंने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत तोड़ दिया था। तभी से गणेश जी एकदंत भी कहलाने लगे।

 

इसलिए किया था सहस्त्रार्जुन का वध-
एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना समेत भगवान परशुराम के पिता जमदग्रि मुनी के आश्रम पहुंच गया। मुनि ने कामधेनु गाय के दूध से पूरी सेना का स्वागत सत्कार किया, लेकिन चमत्कारी कामधेनु को सहस्त्रार्जुन अपने बल का प्रयोग कर बलपूर्वक छीन लिया। जब यह बात परशुराम को पता चली तो उन्होंने सहस्त्रार्जुन को मार डाला। उसके बाद सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने बदला लेने के लिए परशुराम के पिता का वध कर दिया और माता, पिता के वियोग में चिता पर सती हो गईं। इसके बाद पिता के शरीर पर 21 घाव को देखते हुए परशुराम ने शपथ ली थी कि वह इस धरती से समस्त क्षत्रिय वंशों का संहार कर देंगे और पूरे 21 बार उन्होंने पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।

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विचार मंथन : झूठी मनुष्य को ईश्वर, पशु पक्षी घोड़ा सांप बिच्छू आदि पता नहीं क्या-क्या बना देगा- गुरु अंगद देव


सत्य और झूठ
संसार में लोग सत्य भी बोलते हैं, और झूठ भी। सामान्य रूप से लोग सत्य बोलते हैं। परंतु जब कोई आपत्ति दिखाई दे, कहीं मान अपमान का प्रश्न हो, कहीं कोई स्वार्थ हो, कोई लोभ, कोई क्रोध हो आदि आदि, ऐसे कारण उपस्थित होने पर प्रायः लोग झूठ बोलते हैं। वे समझते हैं कि यदि मैंने इस अवसर पर सत्य बोल दिया, तो मेरा काम बिगड़ जाएगा। सामने वाला व्यक्ति मुझसे नाराज हो जाएगा। उससे मुझे जो लाभ मिल रहा है, वह नष्ट हो जाएगा।

 

ईश्वर का दंड
परंतु सब लोग एक जैसे नहीं होते। कुछ लोग यह सोचते हैं, कि हानि लाभ तो जीवन में होता ही रहता है। यह संसार है, इसमें सुख और दुख दोनों आते ही रहते हैं। मैं झूठ बोलकर ईश्वर को नाराज क्यों करूं? ऐसा करने पर ईश्वर मुझे दंड देगा और जो लाभ मुझे ईश्वर से मिल रहा है, या भविष्य में मिलने वाला है, वह मेरा लाभ नष्ट हो जाएगा। इसलिए ऐसे लोग ईश्वर को सामने रख कर सत्य ही बोलते हैं। तब जो उन्हें सांसारिक लोगों से हानि होती है, उसे वे सहन कर लेते हैं।

 

सावधान रहें
ऐसे अवसर पर उनको सहन करने की शक्ति, ईश्वर ही देता है। अतः संसार के लोग भले ही कुछ नाराज हो जाएं, आप ईश्वर को नाराज न करें। यदि ईश्वर नाराज हो गया, तो आपको उससे अधिक हानि उठानी पड़ेगी। संसार के लोग आपकी कम हानि कर पाएंगे। ईश्वर तो आगे पशु पक्षी घोड़ा सांप बिच्छू आदि पता नहीं क्या-क्या बना देगा। इसलिए सावधान रहें।

 

मैं गुरु वाला हूं
एक दिन अमरदास गुरु अंगद जी के स्नान के लिए पानी की गागर सिर पर उठाकर प्रातःकाल आ रहे थे कि रास्ते में एक जुलाहे कि खड्डी के खूंटे से चोट लगी और खड्डी में गिर गये। गिरने कि आवाज़ सुनकर जुलाहे ने जुलाही से पुछा कि बाहर कौन है? जुलाही ने कहा इस समय और कौन हो सकता है, अमरू घरहीन ही होगा, जो रातदिन पानी ढ़ोता फिरता है। जुलाही की यह बात सुनकर अमरदास ने कहा कमलीये घरहीन नहीं, मैं गुरु वाला हूं।

 

सच सच बताना
अमरदास के वचनों से जुलाही पागलों की तरह बौखलाने लगी। गुरु अंगद देव ने दोनों को अपने पास बुलाया और पूछा प्रातःकाल क्या बात हुई थी, सच सच बताना जुलाहे ने सारी बात सच सच गुरु जी के आगे रख दी कि अमरदास जी के वचन से ही मेरी पत्नी पागल हुई है। आप कृपा करके हमें क्षमा करें और इसे ठीक कर दें नहीं तो मेरा घर बर्बाद हो जायेगा। गुरु अगंद देव ने अमरदास को बारह वरदान देकर अपने गले से लगा लिया और कहा अब तुम मेरा ही रूप हो गये हो। इसके बाद गुरु अंगद देव ने जुलाही की तरफ कृपा दृष्टि से देखा जिससे वह पूर्ण ठीक हो गई।


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