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राजनीतिक कारणों से उपेक्षा की शिकार हुई आदि शंकराचार्य की तपोस्थली गुरु गुफा


नरसिंहपुर। आदि शंकराचार्य ने जिस गुफा में रहकर तपस्या की थी और अपने गुरु गोविंद पादाचार्य से दंड संन्यास की दीक्षा ग्रहण की थी वह गुफा राजनीतिक कारणों से उपेक्षा का शिकार हो गई। किसी अन्य धर्म की बात होती तो शायद यह स्थान तीर्थ स्थल बन चुका होता पर सनातन धर्म का यह महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल राजनीति के फेर में उलझ गया और शासकीय स्तर पर इसका अपेक्षित विकास नहीं हो सका। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज का कहना है कि तत्कालीन सीएम शिवराज को उन्होंने नमामि देवी नर्मदे यात्रा के दौरान यहां आशीर्वाद दिया था पर उनके लिए अस्वीकार्य हो गया।

बन चुका है विशाल मंदिर
यह स्थान नर्मदा नदी के सांकलघाट और ढाना घाट के पास नीमखेड़ा धूमगढ़ में है जिसके सामने पहाड़ी पर द्विपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने आदि गुरु शंकराचार्य के विशाल भव्य मंदिर का निर्माण कराया है। इस मंदिर में आदि गुरु शंकराचार्य और उनके गुरु गोविंद पादाचार्य के दंड संन्यास दीक्षा देते हुए दिव्य विग्रह स्थापित किए जाएंगे। इन विग्रहों का स्वरूप कैसा होगा इसके चित्र पत्रिका को प्राप्त हुए हैं।

शिवराज सरकार ने की गुरु गुफा की उपेक्षा
आदि शंकराचार्य की तपोस्थली गुरु गुफा को लेकर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज और पूर्व सीएम शिवराज सरकार के बीच गहरा मतभेद रहा। शिवराज सिंह चौहान ने ओंकारेश्वर में एक स्थान को आदि शंकराचार्य की तपोस्थली मानकर वहां देश की सबसे बड़ी आदि शंकराचार्य की प्रतिमा स्थापित करने की योजना बनाई थी जो परवान नहीं चढ़ सकी। जबकि इधर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज की पहल पर विशाल मंदिर दिव्य विग्रहों की प्राणप्रतिष्ठा के लिए तैयार हो चुका है। भाजपा शासन में गुरु गुफा की उपेक्षा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां रोशनी तक का इंतजाम नहीं है। न ही श्रद्धालुओं के बैठने दर्शन करने व पानी, छाया आदि का इंतजाम किया गया है जबकि यह स्थल तपोभूमि होने के साथ ही एक प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण रमणीक स्थल है ।

उप राष्ट्रपति ने किया था गोविंदवन में पौधरोपण
गुरु गुफा के आसपास विकास के लिए कांग्रेस कार्यकाल में प्रयास किए गए थे। ५ जुलाई १९८९ को यहां एक वृहद पौधरोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया था। तत्कालीन उप राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज के सान्निध्य में यहां पौधरोपण किया था। कार्यक्रम का आयोजन तत्कालीन सीएम मोतीलाल बोरा की अध्यक्षता में किया गया था। यह कार्यक्रम अखिल भारतीय आध्यात्मिक उत्थान मंडल की रजत जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था। बहरहाल इस स्थान की देख रेख गोविंदनाथ वन विकास समिति द्वारा की जा रही है।
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अस्वीकार्य हो गया आशीर्वाद
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज का कहना है कि नमामि देवी नर्मदे यात्रा के दौरान वे तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान के आग्रह पर सांकलघाट पहुंचे थे और उन्हें गुरु गुफा के दर्शन कराए थे साथ ही शिवराज दंपती को स्फटिक शिवलिंग भेंट कर आशीर्वाद दिया था पर शिवराज के लिए वह अस्वीकार्य हो गया। शंकराचार्य महाराज ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने की वजह से कुछ लोग उन्हें कांग्रेस के प्रकाश में देखते हैं पर यह उचित नहीं है शंकराचार्य के रूप में वे किसी पार्टी के नेताओं के गुरु नहीं हैं दीक्षा देते समय वे यह नहीं पूछते कि दीक्षा लेने आया व्यक्ति किस पार्टी का है। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज का कहना है कि नरसिंहपुर के सांकल घाट में स्थित गुरु गुफा ही वास्तव में आदि शंकराचार्य की दंड संन्यास दीक्षा स्थली है इसीलिए उन्होंने यहां आदि शंकराचार्य के मंदिर का निर्माण कराया है।
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विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कराएंगे स्थान का विकास
गुरु गुफा और नव निर्मित आदि शंकराचार्य मंदिर क्षेत्र के विकास को लेकर पत्रिका से बातचीत में मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने कहा है कि निसंदेह यह सनातन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण स्थल है। वे व्यक्तिगत तौर पर रुचि लेकर इस क्षेत्र का विकास कराएंगे। यह जरूरी है कि लोग इस स्थान के बारे में जानें और इसके महत्व का समझें।

 


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विचार मंथन : अपने दोषों को भी देखा कीजिए- समर्थ गुरु रामदास


आपके प्रति यदि किसी का व्यवहार अनुचित प्रतीत होता है तो यह मानने के पहले कि सारा दोष उसी का है, आप अपने पर भी विचार कर लिया करें । दूसरों पर दोषारोपण करने का आधा कारण तो स्वयमेव समाप्त हो जाता है । कई बार ऐसा भी होता है कि किसी की छोटी-सी भूल या अस्त-व्यस्तता पर आप मुस्करा देते हैं या व्यंगपूर्वक कुछ उपहास कर देते हैं । आपकी इस क्रिया से सामने वाले व्यक्ति के स्वाभिमान पर चोट लगना स्वाभाविक है ।

 

अपनी प्रशंसा सभी को प्यारी लगती है पर व्यंग या आलोचना हर किसी को अप्रिय है । कोई नहीं चाहता कि अकारण लोग उसका उपहास करें, मजाक उड़ायें । फिर आपके अप्रिय व्यवहार के कारण यदि औरों से अपशब्द, कटुता या तिरस्कार मिलता है तो उस अकेले का ही दोष नहीं। इसमें अपराधी आप भी हैं । आपने ही प्रारम्भ में इस स्थिति को जन्म दिया है । इसलिये दूसरों से प्रतिकार की भावना बनाने के पूर्व यदि अपना भी दोष-दर्शन कर लिया करें तो अकारण उत्पन्न होने वाले झगड़े जो कि प्रायः इसी से अधिक होते हैं, क्यों हों ?

 

अगर किसी को अपनी बात मनवानी ही है अथवा यह पूर्ण रूप से जान लिया गया है कि अमुक कार्य में इस व्यक्ति का अहित है, आप उसे छुड़ाना चाहते हैं तो भी अशिष्ट या कटु-व्यवहार का आश्रय लेना ठीक नहीं । यदि वह व्यक्ति आपके तर्क या सिद्धान्त को नहीं मानता तो आप उसे अयोग्य, मूर्ख या दुष्ट समझने लगते हैं और अनजाने ही ऐसा कुछ कह या कर बैठते हैं जो उसे बुरा लगे। इससे दूसरे के आत्माभिमान को चोट लगती है, जिसकी प्रतिक्रिया भी कटु होती है । उससे कलह बढ़ने की ही सम्भावना अधिक रहेगी ।


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विचार मंथन : क्योंकि मैं नारी हूँ, डर किसको कहते मैं जानती ही नहीं - भगवती देवी शर्मा


मैं नारी हूँ, मैं अपने पति की सहधर्मिणी हूँ और अपने पुत्र की जननी भी मैं हूँ । मुझ सा श्रेष्ठ संसार में और कौन है, तमाम जगत् मेरा कर्मक्षेत्र है, मैं स्वाधीन हूँ, क्योंकि मैं अपनी इच्छानुरूप कार्य कर सकती हूँ । मैं जगत में किसी से नहीं डरती, मैं महाशक्ति की अंश हूँ, मेरी शक्ति पाकर ही मनुष्य शक्तिमान है । मैं स्वतंत्र हूँ, परन्तु उच्छृंखल नहीं हूँ, मैं शक्ति का उद्गम स्थान हूँ, परंतु अत्याचार के द्वारा अपनी शक्ति को प्रकाशित नहीं करती । मैं केवल कहती ही नहीं करती भी हूँ । मैं काम न करूं, तो संसार अचल हो जाए । सब कुछ करके भी मैं अहंकार नहीं करती । जो कर्म करने का अभिमान करते हैं, उनके हाथ थक जाते हैं ।

 

मेरा कर्मक्षेत्र बहुत बड़ा हैं, वह घर के बाहर भी और घर के अन्दर भी । घर में मेरी बराबरी की समझ रखने वाला कोई है ही नहीं । मैं जिधर देखती हूँ, उधर ही अपना अप्रतिहत कर्तव्य पाती हूँ । मेरे कर्तव्य में बाधा देने वाला कोई नहीं है, क्योंकि मैं वैसा सुअवसर किसी को देती ही नहीं । पुरुष मेरी बात सुनने के लिए बाध्य है - आखिर मैं गृहस्वामिनी जो हूँ । मेरी बात से गृह संसार उन्नत होता हैं । इसलिए पति के सन्देह का तो कोई कारण ही नहीं है और पुत्र, वह तो मेरा है ही, उसी के लिए तो हम दोनों व्यस्त हैं । इन दोनों को, पति को और पुत्र को अपने वश में करके मैं जगत् में अजेय हूँ । डर किसको कहते हैं, मैं नहीं जानती । मैं पाप से घृणा करती हूँ । अतएव डर मेरे पास नहीं आता । मैं भय को नहीं देखती इसी से कोई दिखाने की चेष्टा नहीं करता ।

 

संसार में मुझसे बड़ा और कौन है ? मैं तो किसी को भी नहीं देखती और जगत में मुझसे बढ़कर छोटा भी कौन है ? उसको भी तो कहीं नहीं खोज पाती । पुरुष दम्भ करता है कि मैं जगत में प्रधान हूँ, बड़ा हूँ, मैं किसी की परवाह नहीं करता । वह अपने दम्भ और दर्प से देश को कंपाना चाहता है । वह कभी आकाश में उड़ता है, कभी सागर में डुबकी मारता है और कभी रणभेरी बजाकर आकाश वायु को कंपाकर दूर दूर तक दौड़ता है, परन्तु मेरे सामने तो वह सदा छोटा ही है, क्योंकि मैं उसकी माँ हूं । उसके रुद्र रूप को देखकर हजारों लाखों काँपते हैं, परन्तु मेरे अंगुली हिलाते ही वह चुप हो जाने के लिए बाध्य है । मैं उसकी माँ - केवल असहाय बचपन में ही नहीं सर्वदा और सर्वत्र हूँ । जिसके स्तनों का दूध पीकर उसकी देह पुष्ट हुई है, उसका मातृत्व के इशारे पर सिर झुकाकर चलने के लिए वह बाध्य हैं ।


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विचार मंथन : सेवा-कार्य के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता है- डॉ. प्रणव पंड्या


यदि दूसरों के विचार आपके विचारों से मुक्त हों तो उनसे लड़ाई-झगड़ा न करो । अनेक प्रकार के मन होते हैं । विचारने की शैली अनेक प्रकार की हुआ करती है । विचारने के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हुआ करते हैं । अतएव सभी दृष्टिकोण निर्दोष हो सकते हैं। लोगों के मत के अनुकूल बनो । उनके मत को भी ध्यान तथा सहानुभूतिपूर्वक देखो और उनका आदर करो। अपने अहंकार चक्र के क्षुद्र केंद्र से बाहर निकलो और अपनी दृष्टि को विस्तृत करो । अपना मन सर्वग्राही और उदार बनाकर सबके मत के लिए स्थान रखो, तभी आपका जीवन विस्तृत और हृदय उदार होगा ।

 

आपको धीरे-धीरे, मधुर और नम्र होकर बातचीत करनी चाहिए, मितभाषी बनों । अवांछनीय विचारों और संवेदनाओं को निकाल दो। अभिमान या चिड़चिड़ेपन को लेशमात्र भी बाकी नहीं रहने दो । अपने आप को बिलकुल भुला दो । अपने व्यक्तित्व का एक भी अंश या भाव न रहने पावे । सेवा-कार्य के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता है ।

 

यदि आप में उपर्युक्त सद्गुण मौजूद हैं तो आप संसार के लिए पथप्रदर्शक और अमूल्य प्रसाद रूप हो । आप एक अलौकिक सुगंधित पुष्प हो जिसकी सुगंध देश-भर में व्याप्त हो जाएगी। यदि आपने ऐसा कर लिया तो समझ लो आपने बुद्धत्व की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर लिया ।


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स्पंदन - परिष्कार


परिष्कार का अर्थ है—शोधन। किन्तु; शोधन किसका? व्यक्तित्व का। और, व्यक्तित्व का अर्थ है—शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा। परिष्कार क्यों? ताकि स्वयं के मूल को जान सकें। जीवन को लक्षित कर सकें। उपयोगी जीवन जी सकें।

परिष्कार का मार्ग? आकलन और आकलन-व्यक्तित्व का। शोधन का अभ्यास और नए लक्ष्यों का चिन्तन। स्वाध्याय के बिना, चिन्तन के बिना यह कार्य सम्भव नहीं है। स्वयं के बारे में उन वृत्तियों का चिन्तन, जिन्हें परिष्कृत करना है। उन व्यसन-वासनाओं का चिन्तन, जो निमित्त पाकर जागृत हो जाती हैं। उन भावनाओं का चिन्तन, जो हमारे दृष्टिकोण को ढके रखती हैं। उन भावों का, जो मैत्री के प्रति मन में विकर्षण पैदा करते हैं, हमारे व्यक्तित्व को नकारात्मक स्वरूप प्रदान करते हैं।

लक्ष्यों का चिन्तन
चिन्तन उन लक्ष्यों का, जो हम प्राप्त करना चाहते हैं। उस व्यक्तित्व का, जिसका हम निर्माण करना चाहते हैं। अपने अस्तित्व को हम नहीं बदल सकते, व्यक्तित्व को बदल सकते हैं। क्या यह सम्भव है कि हमारा व्यक्तित्व और अस्तित्व एक हो जाए? चिन्तन करना है हमारी बुद्धि का, हमारे विचार-तन्त्र का, जो हमें दिशा देते हैं। हमारे मन पर अंकुश का कार्य करते हैं। इसके लिए हमें सत, रज और तम के स्वरूप को समझना अनिवार्य है।

सबसे बड़ी बात है, अपने बारे में सही-सही बात को स्वीकार करना। आप सोचने बैठे हैं कि आपको कौन-सी बात परेशान करती है। यदि आपको समझ में आ जाए कि परेशानी का कारण आपका झूठा व्यवहार है, आप कोई कार्य करना चाहते हैं, किन्तु सामाजिक परिवेश में उसे सही नहीं आंका जाता, तब आप एक मुखौटा पहनकर समाज के सामने आते हैं। अपनी गलती को ढकने का प्रयास करते हैं। इससे आपकी पुरानी गलती का प्रभाव दृढ़ होता है।

जब तक आप सच्चाई को स्वीकार नहीं करेंगे, गलती करने का भाव बना ही रहेगा। आप उन कारणों का विचार करें कि गलती क्यों करना चाहते हैं और झूठ क्यों बोलना चाहते हैं। आपको लगेगा कि उम्र भर की सारी गलतियां एक-एक करके आपके सामने से गुजरने लगी हैं। खुलती जा रही हैं। यह भी लगेगा कि एक दबी हुई गलती निमित्त पाकर दूसरी गलती के लिए प्रेरित करती है। यह प्रक्रिया आपके व्यक्तित्व की दिशा बदल देती है।

प्रायश्चित
आप आंख मूंदकर लेट जाएं तथा गलती का आकलन शुरू कर दें। शरीर को ढीला-निढाल छोड़ दें। विचारों को एक ही समस्या पर केन्द्रित कर दें। शरीर में भी विचारों के अनुरूप हरकत होती रहेगी। आप ध्यान न दें। धीरे-धीरे गलतियों की परतें उधड़ती जाएंगी। आप भाव के उस मूल तक पहुंच जाएंगे, जो आपको गलती करने के लिए प्रेरित करता है। आपको अचानक एक हल्कापन महसूस होगा। बहुत सारा बोझ उतर जाएगा, आपके मन से।

गलतियों का यह चित्रण और इनकी स्वीकारोक्ति आपकी जीवनधारा बदल देगी। आपको लगेगा कि आपकी गलतियों के मूल में क्या था। इतना समझ में आते ही भावी गलतियों का सिलसिला रुक जाएगा।

स्वीकारोक्ति और संकल्प ही तो प्रायश्चित है। इसके साथ मन के भावों में परिवर्तन आ जाता है। घटना विशेष का महत्त्व ही पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है। निमित्त कारणों का रूप समझ में आता है कि व्यक्ति किस प्रकार भुलावे का जीवन जीते हुए दु:खी रहता है। मूल दर्द कहीं और ही दबा रहता है।

इसी प्रकार के नियमित चिन्तन से व्यक्ति को सहज ही विकृतियों से मुक्ति मिल सकती है। व्यसन, वासनाओं का मूल समझा जा सकता है। धीरे-धीरे समस्या का मूल व्यक्ति की समझ में आ जाता है। व्यक्ति के दबे हुए मनोभाव जाग्रत होते हैं, शक्तियों और सकारात्मक कार्यों का प्राकृत रूप में विकास फूटता है। सबको स्वयं के समान दु:खी पाकर उसका मैत्री भाव भी जाग्रत होता है। जीवन परिष्कृत भी हो जाता है और अन्य को परिष्कृत करने का भाव भी जाग्रत होता है।


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अधूरी रह गई शिवराज की आदि गुरु की प्रतिमा स्थापना की योजना, शंकराचार्य ने बना दिया भव्य मंदिर


पत्रिका एक्सक्लूसिव ढानाघाट गुरु गुफा से लौटकर अजय खरे।

नरसिंहपुर। मध्यप्रदेश में आदि गुरु शंकराचार्य की देश की सबसे बड़ी प्रतिमा की स्थापना का सपना शिवराज सरकार पूरा नहीं कर सकी पर यह बड़ा धार्मिक काम द्विपीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने जरूर पूरा करा दिया है। उनकी पहल पर जिले में नर्मदा नदी के ढानाघाट में आदि शंकराचार्य का भव्य मंदिर बन कर तैयार है जिसमें अगले दो माह में आदि शंकराचार्य और उनके गुरु गोविंद पादाचार्य के दंड संन्यास दीक्षा देते हुए दिव्य विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा करा दी जाएगी।

सिद्ध क्षेत्र है गुरु गुफा
सांकलघाट के पास ढानाघाट पर यह मंदिर उस सिद्ध क्षेत्र में बनाया गया है जिसके बारे में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज शास्त्रोक्त आधार पर यह प्रमाणित करते रहे हैं कि यहां आदि गुरु शंकराचार्य ने अपने गुरु गोविंद पादाचार्य से दंड संन्यास की दीक्षा ग्रहण की थी। यहां वह गुरु गुफा अपने प्राकृतिक स्वरूप में अभी भी मौजूद है जिसमें रह कर आदि शंकराचार्य ने कठोर जप तप व साधना की थी। इस स्थान व गुफा की प्रमाणिकता को पुरातत्वविद भी साबित कर चुकेे हैं। यह स्थान धूमगढ़ नीमखेड़ा के अंतर्गत है।

५५ फीट ऊंचा शिखर
मंदिर का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने २८ जनवरी २०१८ को मंदिर के लिए भूमिपूजन किया था। जून माह में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ और महज ७ माह में विशाल मंदिर लगभग बनकर तैयार हो गया है। करीब ४० गुणा ६० वर्ग फीट क्षेत्र में निर्मित मंदिर के शिखर की ऊंचाई ५५ फीट है। चेन्नई से आए कारीगर अब इसकी फिनिशिंग और टचिंग का काम कर रहे हैं। मंदिर के अनुरूप कुछ अन्य कलाकृतियों को उकेरेने का कार्य अंतिम चरण में है। मंदिर निर्माण में अभी तक ४२०० श्रमिक दिवस कार्य किया गया है। मंदिर के सामने ही नर्मदा परिक्रमावासियों के ठहरने और सदाव्रत आदि के लिए अन्नक्षेत्र, भोजनालय का निर्माण कराया गया है। २० कक्षों वाले इस अतिथिग़ृह में २ कक्ष शंकराचार्य महाराज के ठहरने के लिए बनाए गए हैं। इसका काम भी पूर्णता की ओर है।

अधूरी रह गई शिवराज सरकार की योजना
एमपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर में आदि शंकराचार्य की दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा की स्थापना के लिए कार्य योजना तैयार की थी। इसके लिए सरकार ने 23 अप्रैल 2018 को आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास का गठन किया था। जिसमें देश के प्रमुख धर्म गुरुओं को शामिल किया था। श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य को मुख्यमार्ग दर्शक ने किया था । न्यास की पहली बैठक 23 अप्रैल 2018 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निवास पर हुई थी। जिसमें शंकराचार्य की 108 फीट की प्रतिमा की स्थापना के लिए पूरे प्रदेश से अष्टधातु को एकत्र करने का अभियान चलाया था जिसमें लोगों ने स्वर्ण से लेकर अन्य धातएं दान में दी थीं। दूसरी ओर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने ओंकारेश्वर को आदि शंकराचार्य की तपोभूमि बताने पर अपना विरोध जताया था। शिवराज की नमामि देवी नर्मदे यात्रा के दौरान सांकलघाट में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने उन्हें गुरु गुफा को आदि शंकराचार्य की तपोस्थली बताते हुए यहां मूर्ति स्थापना की बात की थी। शिवराज को इस गुफा के अंदर दर्शन कराए थे व उन्हें व साधना को स्फटिक का शिवलिंग भी भेंट किया था। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने बताया था कि आदि शंकराचार्य ने यहां अपने गुरु गोविंद पाादाचार्य से दंड संन्यास की दीक्षा ली थी, गौरतलब है कि ब्रिटिश काल के गजेटियर में भी सांकल घाट को आदि शंकराचार्य की तपोस्थली बताया गया है।
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अत्यंत मनोरम स्थल
नर्मदा किनारे ऊंची पहाड़ी पर निर्मित यह मंदिर आसपास प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है, पूर्वाभिमुख मंदिर के दायीं ओर नर्मदा का विशाल आंचल है तो बायीं ओर गुरुगुफा है जहां आदि शंकराचार्य ने अपने गुरु से दीक्षा ग्रहण की थी।

 

 

 


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अधूरी रह गई शिवराज की आदि गुरु की प्रतिमा स्थापना की योजना, शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने नरसिंहपुर में बना दिया मंदिर


पत्रिका एक्सक्लूसिव ढानाघाट गुरु गुफा से लौटकर अजय खरे।

नरसिंहपुर। मध्यप्रदेश में आदि गुरु शंकराचार्य की देश की सबसे बड़ी प्रतिमा की स्थापना का सपना शिवराज सरकार पूरा नहीं कर सकी पर यह बड़ा धार्मिक काम द्विपीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने जरूर पूरा करा दिया है। उनकी पहल पर जिले में नर्मदा नदी के ढानाघाट में आदि शंकराचार्य का भव्य मंदिर बन कर तैयार है जिसमें अगले दो माह में आदि शंकराचार्य और उनके गुरु गोविंद पादाचार्य के दंड संन्यास दीक्षा देते हुए दिव्य विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा करा दी जाएगी।

सिद्ध क्षेत्र है गुरु गुफा
सांकलघाट के पास ढानाघाट पर यह मंदिर उस सिद्ध क्षेत्र में बनाया गया है जिसके बारे में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज शास्त्रोक्त आधार पर यह प्रमाणित करते रहे हैं कि यहां आदि गुरु शंकराचार्य ने अपने गुरु गोविंद पादाचार्य से दंड संन्यास की दीक्षा ग्रहण की थी। यहां वह गुरु गुफा अपने प्राकृतिक स्वरूप में अभी भी मौजूद है जिसमें रह कर आदि शंकराचार्य ने कठोर जप तप व साधना की थी। इस स्थान व गुफा की प्रमाणिकता को पुरातत्वविद भी साबित कर चुकेे हैं। यह स्थान धूमगढ़ नीमखेड़ा के अंतर्गत है।

५५ फीट ऊंचा शिखर
मंदिर का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने २८ जनवरी २०१८ को मंदिर के लिए भूमिपूजन किया था। जून माह में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ और महज ७ माह में विशाल मंदिर लगभग बनकर तैयार हो गया है। करीब ४० गुणा ६० वर्ग फीट क्षेत्र में निर्मित मंदिर के शिखर की ऊंचाई ५५ फीट है। चेन्नई से आए कारीगर अब इसकी फिनिशिंग और टचिंग का काम कर रहे हैं। मंदिर के अनुरूप कुछ अन्य कलाकृतियों को उकेरेने का कार्य अंतिम चरण में है। मंदिर निर्माण में अभी तक ४२०० श्रमिक दिवस कार्य किया गया है। मंदिर के सामने ही नर्मदा परिक्रमावासियों के ठहरने और सदाव्रत आदि के लिए अन्नक्षेत्र, भोजनालय का निर्माण कराया गया है। २० कक्षों वाले इस अतिथिग़ृह में २ कक्ष शंकराचार्य महाराज के ठहरने के लिए बनाए गए हैं। इसका काम भी पूर्णता की ओर है।

अधूरी रह गई शिवराज सरकार की योजना
एमपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर में आदि शंकराचार्य की दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा की स्थापना के लिए कार्य योजना तैयार की थी। इसके लिए सरकार ने 23 अप्रैल 2018 को आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास का गठन किया था। जिसमें देश के प्रमुख धर्म गुरुओं को शामिल किया था। श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य को मुख्यमार्ग दर्शक ने किया था । न्यास की पहली बैठक 23 अप्रैल 2018 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निवास पर हुई थी। जिसमें शंकराचार्य की 108 फीट की प्रतिमा की स्थापना के लिए पूरे प्रदेश से अष्टधातु को एकत्र करने का अभियान चलाया था जिसमें लोगों ने स्वर्ण से लेकर अन्य धातएं दान में दी थीं। दूसरी ओर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने ओंकारेश्वर को आदि शंकराचार्य की तपोभूमि बताने पर अपना विरोध जताया था। शिवराज की नमामि देवी नर्मदे यात्रा के दौरान सांकलघाट में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने उन्हें गुरु गुफा को आदि शंकराचार्य की तपोस्थली बताते हुए यहां मूर्ति स्थापना की बात की थी। शिवराज को इस गुफा के अंदर दर्शन कराए थे व उन्हें व साधना को स्फटिक का शिवलिंग भी भेंट किया था। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने बताया था कि आदि शंकराचार्य ने यहां अपने गुरु गोविंद पाादाचार्य से दंड संन्यास की दीक्षा ली थी, गौरतलब है कि ब्रिटिश काल के गजेटियर में भी सांकल घाट को आदि शंकराचार्य की तपोस्थली बताया गया है।
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अत्यंत मनोरम स्थल
नर्मदा किनारे ऊंची पहाड़ी पर निर्मित यह मंदिर आसपास प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है, पूर्वाभिमुख मंदिर के दायीं ओर नर्मदा का विशाल आंचल है तो बायीं ओर गुरुगुफा है जहां आदि शंकराचार्य ने अपने गुरु से दीक्षा ग्रहण की थी।

 

 

 


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विचार मंथन : समय का पालन मानव-जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण संयम है- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


समय का सदुपयोग करने वाला सफल होने के साथ प्रशंसा का पात्र बनता हैं
निर्धारित समय में हेर-फेर करते रहने वाले बहुधा लज्जा एवं आत्मग्लानि के भागी बनते हैं । किसी को बुलाकर समय पर न मिलना, समाजों, सभाओं, गोष्ठियों अथवा आयोजनों के अवसर पर समय से पूर्व अथवा पश्चात् पहुंचना, किसी मित्र से मिलने जाने का समय देकर उसका पालन न करना आदि की शिथिलता सभ्यता की परिधि में नहीं मानी जा सकती है । देर-सवेर कक्षा अथवा कार्यालय पहुंचने वाला विद्यार्थी तथा कर्मचारी भर्त्सना का भागी बनता है । ‘लेट लतीफ’ लोगों की ट्रेन छूटती, परीक्षा चूकती, लाभ डूबता डाक रुक जाती, बाजार उठ जाता, संयोग निकल जाते और अवसर चूक जाते हैं । इतना ही नहीं व्यावसायिक क्षेत्र में तो जरा-सी देर दिवाला तक निकाल देती हैं । समय पर बाजार न पहुंचने पर माल दूसरे लोग खरीद ले जाते हैं । देर हो जाने से बैंक बन्द हो जाता है और भुगतान रुक जाता है । समय चुकते ही माल पड़ा रहता है । असामयिक लेन-देन तथा खरीद-फरोख्त किसी भी व्यवसायी को पनपने नहीं देती ।

 

समय का पालन मानव-जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण संयम है । समय पर काम करने वालों के शरीर चुस्त, मन नीरोग तथा इन्द्रियां तेजस्वी बनी रहती हैं । निर्धारण के विपरीत काम करने से मन, बुद्धि तथा शरीर काम तो करते हैं किन्तु अनुत्साहपूर्वक । इससे कार्य में दक्षता तो नहीं ही आती है, साथ ही शक्तियों का भी क्षय होता है । किसी काम को करने के ठीक समय पर शरीर उसी काम के योग्य यन्त्र जैसा बन जाता है । ऐसे समय में यदि उससे दूसरा काम लिया जाता है, तो वह काम लकड़ी काटने वाली मशीन से कपड़े काटने जैसा ही होगा ।

 

क्रम एवं समय से न काम करने वालों का शरीर-यन्त्र अस्त-व्यस्त प्रयोग के कारण शीघ्र ही निर्बल हो जाता है और कुछ ही समय में वह किसी कार्य के योग्य नहीं रहता । समय-संयम सफलता की निश्चित कुन्जी है । इसे प्राप्त करना प्रत्येक बुद्धिमान का मानवीय कर्त्तव्य है ।


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विचार मंथन : प्रेम उदार है, तो स्वार्थ धोखे का बाजार- स्वामी सर्वदानन्द


पापियों की उपेक्षा करने से मनुष्य क्रोध से बच जाता हैं

प्यारे प्रभु के दर्शन करने हैं तो मन मन्दिर की सफाई करो । तब देव अपनी सर्व शक्तियों से उसमें पधारेंगे । मन को निर्मल बनाने के लिए अपने में मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा आदि भावनाओं को जगाओ । अर्थात् सुखी पुरुषों में मित्रता, दुखियों पर करुणा-पुण्य आत्माओं पर हर्ष और पापियों पर उपेक्षा की भावना से चित्त निर्मल हो जाता हैं । मैत्री, करुणा और हर्ष से चित में उत्साह और शान्ति रहती है और पापियों की उपेक्षा करने से मनुष्य क्रोध से बच जाता हैं । इसके अलावा छल, कपट और स्वार्थादि दोषों को छोड़ दो, दोनों में स्वार्थ मुख्य है ।

 

इसके उदय होने से शेष सब अवगुण अपना बल बढ़ाते हैं । गुणों में मैत्री सबसे अधिक मूल्यवान है । इसके आने पर शेष सब गुण इसकी छाया मैं आ जाते हैं प्रेम प्रकाश है, स्वार्थ अन्धकार है, प्रेम उदार है स्वार्थ धोखे का बाजार है । प्रेम ने संसार को सुधारा स्वार्थ ने संसार को बिगाड़ा- प्रेम परमेश्वर से मिलाता है । स्वार्थ संसार के बंधन में गिराता है ।

 

इसलिए प्रेम सत्संग, स्वाध्याय द्वारा निष्कपट, सरल स्वभाव से अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाओ अनेक जन्मों की परम्परा से जो बुरी वासनायें दृढ़ हो गई हैं उनको दूर करो, स्वार्थ को छोड़कर सच्ची प्रभु भक्ति साधारणतया, प्राणी मात्र की सेवा और विशेषतया मनुष्य मात्र की सेवा करो । इस प्रकार जो मल बुरे खोटे कर्मों के करने से बढ़ता है, विक्षेप जो पुरुषार्थ न करके केवल इच्छा करते रहने से मन को चंचल बनाता है और आवरण जो स्वाध्याय सत्संग के बिना बढ़ता है को दूर करके भगवान की कृपा को प्राप्त करो। यही एक सरल मार्ग है ।


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विचार मंथन: मेरे विशाल भारत के चरणों में एक बार पुनः समस्त विश्व गिरकर शान्ति के सन्देश की याचना करेगा- स्वामी विवेकानंद


जब स्वामी विवेकानन्द भारत भ्रमण के लिये निकले हुए थे प्रसंग उन दिनों की हैं, इसी क्रम में घुमते हए एक दिन हाथरस पहुँचे! भूख और थकान से उनकी विचित्र हालत हो रही थी । कुछ सस्ताने के लिये वे एक वृक्ष के नीचे निढाल हो गये । अरुणोदय हो चुका था! उसकी सुनहरी किरणें स्वामी जी के तेजोद्दीप्त चेहरे पर पड़कर उसे और कान्तिवान बना रही थीं । इसी समय उधर से एक युवक निकला! स्वामी जी के आभावान चेहरे को देखकर ठिठका! अभी वह कुछ बोल पाता, इससे पूर्व ही उनकी आँखे खुलीं और एक मृदु हास्य बिखेर दिया! प्रत्युत्तर में युवक ने हाथ जोड़ लिये और आग्रह भरे स्वर में कहा- आप कुछ थके और भूखे लग रहे हैं यदि आपत्ति न हो, तो चलकर मेरे यहाँ विश्राम करें । बिना कुछ कहे स्वामी जी उठ पड़े और युवक के साथ चलने के लिये राजी हो गये ।

 

चार दिन बीत गये! नरेन्द्र अन्यत्र प्रस्थान की तैयारी करने लगे । इसी समय वह युवक उनके समक्ष उपस्थित हुआ! चल पड़ने को तैयार देख उसने पूछ लिया - "क्या अभी इसी समय प्रस्थान करेंगे?" "हाँ , इसी वक्त! " उत्तर मिला! "तो फिर मुझे भी संन्यास दीक्षा देकर अपने साथ ले चलिये, मैं भी संन्यासी बनूँगा । स्वामी जी मुस्करा दिये! बोले - "संन्यास और संन्यासी का अर्थ जानते हो?" जी हाँ, भलीभाँति जानता हूँ! संन्यास वह है जो मोक्ष की ओर प्रेरित करे और संन्यासी वह जो मुक्ति की इच्छा करे! "किसकी मुक्ति ? स्वयं की, साधक की! " तत्क्षण उत्तर मिला ।

 

स्वामी जी खिलखिलाकर हँस पड़े! बोले - तुम जिस संन्यास की चर्चा कर रहे हो, वह संन्यास नहीं पलायनवाद है । संन्यास न कभी ऐसा था, न आगे होने वाला है! तुम इस पवित्र आश्रम को इतना संकीर्ण न बनाओ । यह इतना महान् व शक्तिवान् है कि जब कभी इसकी आत्मा जागेगी, तो बम की तरह धमाका करेगा ! तब मेरा भारत, भारत ( वर्तमान दयनीय भारत ) न रहकर, भारत ( आभायुक्त ) महाभारत, विशाल भारत बन जायेगा और एक बार पुनः समस्त विश्व मेरे भारत के चरणों में गिरकर शान्ति के सन्देश की याचना करेगा । यही अटल निर्धारण है, ऐसा होने से कोई भी रोक नहीं सकता, अगले दिनों यह होकर रहेगा ।

 

मैं स्पष्ट देख रहा हूँ की भारत के युवा संन्यासी इस मुहीम में पूर्ण निष्ठा के साथ जुट पड़े हैं और अपनी सम्पूर्ण क्षमता लगाकर इसे मूर्तिमान करने में कुछ भी कसर उठा नहीं रख रहे हैं! इनके प्रयासों से भारत की आत्मा को जगते, मैं देख रहा हूँ और देख रहा हूँ उस नवविहान को, जिसकी हम सबको लम्बे समय से प्रतीक्षा है ।

 

तनिक रुककर उन्होंने पुनः कहना आरम्भ लिया - " यह वही संन्यास है, जिसकी सामर्थ्य को हम विस्मृत कर चुके हैं, जिसके दायित्व को भला चुके हैं! इसका तात्पर्य आत्म-मुक्ति कदापि नहीं हो सकता! यह स्वयं में खो जाने की, अपने तक सीमित होने की प्रेरणा हमें नहीं देता, वरन् आत्मविस्तार का उपदेश करता है! यह व्यक्ति की मुक्ति का नाम नहीं, अपितु समाज की, विश्व की, समस्त मानव जाति की मुक्ति का पर्याय है! यह महान आश्रम अपने में दो महान परम्पराओं को साथ लेकर चलता है - साधु और ब्राह्मण की! साधु वह, जिसने स्वयं को साध लिया! ब्राह्मण वह, जो विराट् ब्रह्म की उपासना करता हो, उसी की स्वर्ग मुक्ति की बात सोचता हो! तुम्हारा संन्यास गुफा-कन्दराओं तक, एकान्तवास तक परिमित है किन्तु हमारा संन्यास जन-संकुलता का नाम है ।

 

वाणी कुछ समय के लिये रुकी, तत्पश्चात पुनः उभरी - " बोलो ! तुम्हें कौन-सा संन्यास चहिये ? एकान्त वाला आत्म-मुक्ति का संन्यास या साधु-ब्राह्मणों वाला सर्व-मुक्ति का संन्यास ? युवक स्वामीजी के चरणों में गिर पड़ा, बोला - " नहीं, नहीं मेरा आत्म-मुक्ति का मोह भंग हो चुका है! मुझे ऐसा संन्यास नहीं चहिये! मैं समाज की स्वर्ग मुक्ति के लिये काम करूँगा! देखा जाय तो समाज-मुक्ति के बिना व्यक्ति की अपनी मुक्ति सम्भव नहीं ।

 

युवक के इस कथन पर स्वामीजी ने सिर हिलाकर सहमति प्रकट की! एक क्षण के लिये दोनों के नेत्र मिले मानों प्राण-प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया चल पड़ी हो! फिर उसे गुरु ने उठाकर गले से लगा लिया और कहा - " आज से शरत्चन्द्र गुप्त नहीं, स्वामी सदानन्द हुए, " गुरु-शिष्य दोनों उसी समय आगे की यात्रा पर प्रस्थान कर गये । मोक्ष अकेले हथियाने की वस्तु नहीं है! "मोक्ष हम सब को" यही वाक्य शुद्ध है सब के मोक्ष का प्रयत्न करने में अपना मोक्ष भी सम्मिलित है ।


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विचार मंथन : ईश्वरदर्शन के लिए मनुष्य को हठ करना पड़ता हैं- रामकृष्ण परमहंस


ईश्वरदर्शन के लिए मनुष्य को हठ करना पड़ता हैं

तीव्र वैराग्य किसे कहते हैं, इसकी एक कहानी सुनो । किसी देश में एक बार वर्षा कम हुई । किसान नालियाँ काट-काटकर दूर से पानी लाते थे । एक किसान बडा़ हठी था, उसने एक दिन शपथ ली कि जब पानी न आने लगे, नहर से नाली का योग न हो जाए, तब तक बराबर नाली खोदूँगा । इधर नहाने का समय हुआ । उसकी स्त्री ने लड़की को उसे बुलाने भेजा ।

 

लड़की बोली, 'पिताजी, दोपहर हो गयी, चलो तुमको माँ बुलाती है । 'उसने कहा, तू चल, हमें अभी काम है ।' दोपहर ढल गयी, पर वह काम पर हटा रहा । नहाने का नाम न लिया। तब उसकी स्त्री खेत में जाकर बोली, 'नहाओगे कि नहीं? रोटियाँ ठण्डी हो रही हैं। तुम तो हर काम में हठ करते हो। काम कल करना या भोजन के बाद करना।' गालियाँ देता हुआ कुदाल उठाकर किसना स्त्री को मारने दौडा़ बोला, 'तेरी बुद्धि मारी गयी है क्या? देखती नहीं कि पानी नहीं बरसता; खेती का काम सब पडा़ है; अब की बार लड़के-बच्चे क्या खाएँगे? सब को भूखों मरना होगा । हमने यही ठान लिया है कि खेत में पहले पानी लायेंगे, नहाने-खाने की बात पीछे होगी ।

 

मामला टेढा़ देखकर उसकी स्त्री वहाँ से लौट पडी़ । किसान ने दिनभर जी तोड़ मेहनत करके शाम के समय नहर के साथ नाली का योग कर दिया । फिर एक किनारे बैठकर देखने लगा, किस तरह नहर पानी खेत में 'कलकल' स्वर से बहता हुआ आ रहा है, तब उसका मन शान्ति और आनन्द से भर गया । घर पहुँचकर उसने स्त्री को बुलाकर कहा, 'ले आ अब डोल और रस्सी ।' स्नान भोजन करके निश्चिन्त करके निश्चिन्त होकर फिर वह सुख से खुर्राटे लेने लगा । जिद यह है और यही तीव्र वैराग्य की उपमा है ।


खेत में पानी लाने के लिए एक और किसान गया था । उसकी स्त्री जब गयी और बोली, 'धूप बहुत हो गयी, चलो अब, इतना काम नहीं करते', तब वह चुपचाप कुदाल एक ओर रखकर बोला, 'अच्छा, तू कहती है तो चलो ।' (सब हँसते हैं ।) वह किसान खेत में पानी न ला सका। यह मन्द वैराग्य की उपमा है । हठ बिना जैसे किसान खेत में पानी नहीं ला सकता, वैसे ही मनुष्य ईश्वरदर्शन नहीं कर सकता ।


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स्पंदन - सुख


सृष्टि का हर प्राणी सुख की तलाश में रहता है। सुख से जीना चाहता है। दु:ख के भय से त्रस्त दिखाई पड़ता है। वह अपनी पूरी दिनचर्या सुख के साथ परिभाषित करता है। जीवनयापन और सुख-सुविधाओं की सारी परिकल्पनाओं का आधार सुख है।

टेलीविजन, टेलीफोन, कार, फ्रिज आदि सारी सुविधाएं सुख की दृष्टि से जुटाई जाती हैं। इसी सुख की अनुभूति नशे का आधार भी है। जीवन के अनेक झंझट, खींचतान का आधार भी सुख की तलाश ही है। व्यक्ति सारे तनाव इसी सुख की तलाश में सहन करता है। पूरी उम्र पापड़ बेलता है, चिन्तित रहता है वह सुख की तलाश में। फिर भी क्या कारण है कि वह सुखी नहीं हो पाता?

एक छोटा-सा कारण है— सुख की परिभाषा। व्यक्ति यदि सुख को तलाशने से पहले अपने सुख को परिभाषित कर ले कि वह सुख किसको मानता है, तो समस्या का समाधान हो जाएगा। उसे पता रहेगा कि कौन-सा कार्य उसे सुखी कर सकेगा और कौन-सा नहीं। किस कार्य से सुख को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। क्रमश: दु:ख के मार्ग स्वत: बन्द होने लग जाएंगे। उसकी सुख की धारणा समय के साथ पुष्ट होती चली जाएगी।

सुख का स्वरूप
सुख की आज अनेक परिभाषाएं हैं। शरीर का सुख आज सर्वोपरि है। पहले भी रहा है, किन्तु ‘निरोगी काया’ तक। आज उसका विकृत स्वरूप हमारे सामने है। बुद्धि-विलास का सुख भी ऐसा ही है। तर्क-वितर्क में व्यक्ति सदा उलझा रहता है और अपनी ही बात को सही मानने का उसका हठ उसे सुखी नहीं होने देता। सुख को परिभाषित करने से पूर्व इतना तो स्पष्ट होना ही चाहिए कि इस सुख का आभास किसे होता है- शरीर को, बुद्धि को अथवा मन को? क्या इसके आगे भी आत्मा सुख का अनुभव करती है? व्यवहार में मन ही आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है, वही सुख की अनुभूति का केन्द्र है।

सुख हमें हमारी इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होता है। मन तक यह सुख इन्द्रियां पहुंचाती हैं। मन ही सुखी अथवा दु:खी होता है। मन इन्द्रियों का राजा है। मन के इशारे पर ही इन्द्रियां कार्य करती हैं।

मन किसी को देखकर सुखी हो, तो आखें उसे देखती रहती हैं। कुछ सुनकर मन प्रसन्न होता है, तो कान सुनते ही रहते हैं।

चिन्तन-मनन से शीघ्र ही व्यक्ति को पता चल सकता है कि किस कारण से उसे सुख मिलता है और किससे दु:ख के दरिया में गोता खाना पड़ता है। मन आत्मा से जुड़ा है और आत्मा के साथ ईश्वर की सत्ता जुड़ी है, अत: मन का मूल स्वभाव आनन्द है। यह सुख से भी ऊपर की स्थिति है। मन को इसके सिवा कुछ अच्छा नहीं लग सकता। सुख और दु:ख साथ-साथ चलते हैं। यहां शान्ति की अवधारणा जीवन में समन्वय स्थापित करती है। आनन्द और शान्ति मिलकर शान्तानाद (नन्द) बनते हैं।

मन ही सुख-दु:ख की अनुभूति का केन्द्र है और उसे पाने के साधन हैं शरीर और बुद्धि। शरीर और बुद्धि आज साध्य बन गए, साधन नहीं रहे। अत: मन भी जीवन से छिटकता जा रहा है। व्यक्ति शरीर के रख-रखाव और बुद्धि की सामथ्र्य बढ़ाने के लिए सदा जुटा रहता है। शिक्षा का भी सारा जोर इन्हीं पर है। जबकि, वास्तविकता यह है कि इनका तो स्वस्थ व सात्विक रहना ही पर्याप्त है। मन में इच्छा उठते ही ये दोनों उसे पूरी करने में जुट जाएं। सदा स्वस्थ रहें। इच्छापूर्ति पर भी नियंत्रण रहे। इनके रुग्ण होने से कोई इच्छा अधूरी न रह जाए, अत: सुख पाने के लिए हमें शरीर और बुद्धि से हटकर पहले मन के धरातल पर चिन्तन करना होगा।

सुख की अनुभूति
हमारे जीवन के लक्ष्य मन के साथ जुड़े हैं। समाज में हमारी पहचान भी मन के साथ जुड़ी है, अध्यात्म के धरातल का आधार हमारा मन ही है। क्या पाना चाहता है हमारा मन, सुखी रहने के लिए? कहां पहुंचना चाहता है इस जीवनकाल में? इन प्रश्नों में सुख-दु:ख के सभी धरातल दिखाई देंगे। क्या-क्या व्यक्ति को करना चाहिए और क्या छोड़ देना चाहिए, वह आसानी से तय कर सकता है।

फिर प्रश्न आता है कि सुख की पहचान कैसे हो? सुख की पहचान नहीं, अनुभूति हो सकती है। कार्य का परिणाम ही इसका वाचक हो सकता है। जिस कार्य की परिणति सुख में हो, वही अच्छा है, अन्य नहीं। कोई भी कार्य करते समय हमें सुख का आभास हो और परिणाम में दु:ख मिले तो वह कार्य करने योग्य नहीं। क्षणिक सुख और स्थाई सुख में भेद करना भी आवश्यक है। सुख वही कहा जाएगा जो कार्य करते समय भी महसूस हो, कार्य की समाप्ति तक प्रसन्नता दे और जिसके परिणाम भी सुखद हों।

किसी भी कार्य से यदि दु:ख पैदा होगा तो तनाव भी पैदा होगा। सुख सभी प्रकार के तनावों से मुक्त होता है। यह व्यक्ति को शान्ति में स्थापित करता है।

विश्व में सभी धर्मों का पहला आधार शान्ति है। व्यक्ति को सभी कंटीले मार्गों से दूर रखने का प्रयास धर्मशास्त्र करते हैं। व्यक्ति स्व-विवेक के अहंकार से दु:ख की ओर दौड़ता है और सुख की तलाश करता रहता है। जो अपने सुख को परिभाषित कर लेता है, उसका जीवन वसन्त हो गया समझो!


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विचार मंथन : अपनी आज की परिस्थिति हैसियत और औकात को देखकर छोटी शक्ति से ही कार्य आरम्भ करो- भगवती देवी शर्मा


यदि आपके पास मनचाही वस्तुएं नहीं हैं तो निराश होने की कुछ आवश्यकता नहीं । अपने पास जो टूटी-फूटी चीजें है उन्हीं की सहायता से अपनी कला को प्रदर्शित करना आरम्भ कर दीजिये, जब चारों ओर घोर घन अन्धकार छाया हुआ होता है तो वह दीपक जिसमें छदाम की मिट्टी, आधे पैसे का तेल और दमड़ी को बत्ती है । कुल मिलाकर एक पैसे की भी पूँजी नहीं है—चमकता है और अपने प्रकाश से लोगों के रुके हुए कामों को चालू कर देता है ।

 

जब कि हजारों पैसे के मूल्य वाली वस्तुएं चुपचाप पड़ी होती हैं, यह एक पैसे की पूँजी वाला दीपक प्रकाशवान होता है, अपनी महत्ता प्रकट करता है, लोगों का प्यारा बनता है, प्रशंसित होता है और अपने आस्तित्व को धन्य बनाता हैं । क्या दीपक ने कभी ऐसा रोना रोया है कि मेरे पास इतने मन तेल होता, इतने सेर रुई होती, इतना बड़ा मेरा आकार होता तो ऐसा बड़ा प्रकाश करता ।

 

दीपक को कर्महीन नालायकों की भाँति, बेकार शेखचिल्लियों जैसे मनसूबे बाँधने की फुरसत नहीं है, वह अपनी आज की परिस्थिति हैसियत और औकात को देखता है, उसका आदर करता है और अपनी केवल मात्र एक पैसे की पूँजी से कार्य आरम्भ कर देता है। उसका कार्य छोटा है, बेशक; पर उस छोटेपन में भी सफलता का उतना ही महत्व है जितना के सूर्य और चन्द्र के चमकने की सफलता का है।


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विचार मंथन : जो प्रेम स्वार्थ विमुख (निस्वार्थ) नहीं है, वह नितान्त बलहीन ही होता है- योगी अरविंद


यथार्थ ईश्वर भक्त या भगवत् प्रेमी अकेला ही लाखों योद्धाओं की शक्ति रखता है । वह किसी पार्थिव सहायता का मुखापेक्षी नहीं रहता । वह तो केवल उस सर्व-शक्तिमान विश्व-नियामक परमेश्वर की कृपा का ही भिखारी होता है, उस महाशक्ति के प्रभाव सो ही वह प्रेम एवं विरह रहित होकर अपने समस्त कर्तव्यों को पूर्ण करता हैं । कोई भी दुःख उसे अभिभूत एवं प्रलोभन उसे विपन्न नहीं कर सकता ।

 

उस भगवद्-भक्त का हृदय किसी निष्फल भाव अथवा किसी विपक्ष चेष्टा से कातर नहीं होता है । इसी प्रकार आरम्भ किये हुए किसी कार्य में वह असफल भी नहीं होता । अतः हे हमारे विरही दीन-हृदय जिससे प्रेम किया है, उस प्रेमी का एक बार परिचय तो दो! अपने उस ईश्वर के लिए तुमने कौन सा कर्तव्य पूर्ण किया है, और किस प्रलोभन के संग्राम में विजय प्राप्त की है, सो तो बताओ । एक बार उसकी महिमा की दीप्ति उज्ज्वल बनाने के लिए किस शत्रु को पराजित किया है, एवं कौन सा दुख सहन कर किस रूप में कीर्ति स्थापित की है, उसका भी तो हिसाब दो। अरे, तुम्हारे मुख का प्रेम केवल शब्द मात्र ही है। तभी तो तुम साधारण से दुःख या तुच्छ से द्वन्द्व अथवा स्वल्प मात्र परिश्रम से शान्त जो जाते हो ।

 

तुम आक्षेप करते हो कि तुम्हारी शक्ति किसी प्रतिकूलता के सम्मुख ठहर नहीं सकती । किसी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सकती । भला, जो प्रेम जीवन की प्रबल शक्ति नहीं होता, उसे मिथ्या के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है? जो प्रेम स्वार्थ विमुख (निस्वार्थ) नहीं है, वह नितान्त बलहीन ही होता है ।


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विचार मंथन : अपने अन्दर जो ईश्वरीय दिव्य तेज जगमगा रहा है उसके दर्शन कीजिए- रामकृष्ण परमहंस


स्वर्ग प्राप्त करना बहुत ही सरल है

स्वर्ग का द्वार हर मनुष्य के लिए खुला हुआ हैं । जो चाहे सो उसमें बड़ी आसानी के साथ प्रवेश कर सकता हैं । परमात्मा ने श्रेष्ठ, शुभ और पुण्य कार्यों को बड़ा ही सरल बनाया है, इस राजमार्ग पर चलने का हर कोई अधिकारी हैं । झूठ बोलने में बहुत सोचने समझने, विचारने और संभल संभल कर बात करने की जरूरत होती है परन्तु सत्य बोलने में जरा भी खटपट नहीं ।

 

चोरी करने के लिए बड़ी तिकड़म लड़ानी पड़ती है परन्तु ईमानदारी से रहना बेहद आसान है, एक कम बुद्धि का आदमी भी ईमानदारी का व्यवहार बड़ी सुगमता से कर सकता है इसमें उसे कुछ भी परेशानी न उठानी पड़ेगी । इसी प्रकार जुआ व्यभिचार, ढोंग, छल आदि में पग पग पर कठिनाई पड़ती हैं परन्तु पावन कर्तव्यों का पालन करते रहना बेहद आसान है, उसमें कोई आपकी बदनामी या कठिनाई नहीं है ।

 

लोग समझते हैं कि असत्य का, पाप का रास्ता सरल और सत्य का, धर्म का रास्ता कठिन है परन्तु असल बात ऐसी नहीं है । नरक के द्वार तक पहुँचने में बहुत कठिनाई है और स्वर्ग का द्वार सड़क के किनारे है जहाँ हर कोई बड़ी आसानी के साथ पहुँच सकता है । यह द्वार हर किसी के लिए हर घड़ी खुला रहता है। आप चाहें तो आज ही-अभी ही, उसमें बे रोक टोक प्रवेश कर सकते हैं ।

 

अपने अन्तःकरण को टटोलिए, आत्म निरीक्षण कीजिए, आपके अन्दर जो ईश्वरीय दिव्य तेज जगमगा रहा है उसके दर्शन कीजिए विवेक के प्रकाश में अपनी सद्भावनाओं और सद्वृत्तियों की सम्पत्ति को तलाश कीजिए यही आपकी अमर सहचरी है । यह अप्सराएं आपको क्षण भर में स्वर्ग के दरवाजे तक पहुँचा सकती हैं ।


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विचार मंथन : क्या बाहरी वस्तु किसी को सुख दे सकती है- डॉ. प्रणव पंड्या


हम बहुधा शारीरिक सुख तथा मानसिक सुख को ढूँढ़ते फिरते हैं, पर जो सबसे उत्तम सुख है, उस आध्यात्मिक सुख की हमें खबर ही नहीं है । हमारे जितने भी कार्य हैं, उनमें सुख पाने की एक इच्छा छिपी रहती है । हम स्थूलदर्शी मनुष्य बाहरी वस्तुओं से ही सुख पाने की इच्छा रखते हैं । क्या बाहरी वस्तु किसी को सुख दे सकती है ?

 

इस जगत् में हमारे सुख के समान बाहर नहीं, भीतर हैं, अर्थात् सुख माने के लिए बाहर ढूंढ़ना वृथा है । हिंदू-शास्त्र भी इस बात का प्रमाण देती है कि बिना मन का तत्त्व-निर्णय किए, बाह्य जगत् के सुखों की कोई आशा नहीं । इसलिए मन का तत्त्व जानना और उस पर पूरा अधिकार जमा लेना अत्यंत आवश्यक है । मन को जीत लेने से ही हम संसार को जीत लेंगे ।

 

मनुष्य के लिए सुख की, आनंद की खान भीतर ही है । उसकी झलक बाहर भी दिखाई देती है, पर वह केवल झलक ही है । शास्त्र का कथन ठीक ही है कि यदि सत्य वस्तु, ब्रह्म या परमात्मा का रूप जानना हो, तो हमें अपने चित्त को क्षण भर के लिए स्थिर बनाना पड़ेगा । इसे साधना-धर्म का अंग कहते हैं। इसलिए स्थायी सुख-प्राप्ति के लिए हमें धर्म का आश्रय लेना पड़ेगा । धर्म ही हमें वर्तमान मुहूर्त के क्षणिक सुख के बदले भविष्य में होने वाले अक्षय सुख का मार्ग बताता है ।


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विचार मंथन : पात्रता जाँचने के उपरांत ही किसी को कुछ महत्त्वपूर्ण मिला है- श्रीराम शर्मा आचार्य


पात्रता जाँचने के उपरांत ही किसी को कुछ महत्त्वपूर्ण मिला है


सुदामा बगल में दबी चावल की पोटली देना नहीं चाहते थे, सकुचा रहे थे, पर उनने उस दुराव को बलपूर्वक छीना और चावल देने की उदारता परखने के बाद ही द्वारिकापुरी को सुदामापुरी में रूपांतरित किया। भक्त और भगवान् के मध्यवर्ती इतिहास की परंपरा यही रही है। पात्रता जाँचने के उपरांत ही किसी को कुछ महत्त्वपूर्ण मिला है। जो आँखें मटकाते, आँसू बहाते, रामधुन की ताली बजाकर बड़े-बड़े उपहार पाना चाहते, हैं, उनकी अनुदारता खाली हाथ ही लौटती है । भगवान् को ठगा नहीं जा सकता है । वे गोपियों तक से छाछ प्राप्त किए बिना अपने अनुग्रह का परिचय नहीं देते थे। जो गोवर्धन उठाने में सहायता करने के हिम्मत जुुटा सके, वही कृष्ण के सच्चे सखाओं में गिने जा सके ।

 

यह समय युगपरिवर्तन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य का है। इसे आदर्शवादी कठोर सैनिकों के लिए परीक्षा की घड़ी कहा जाए, तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं समझी जानी चाहिए । पुराना कचारा हटता है और उसके स्थान पर नवीनता के उत्साह भरे सरंजाम जुटते हैं । यह महान् परिवर्तन की-महाक्रांति की वेला है । इसमें कायर, लोभी, डरपोक और भाँड़ आदि जहाँ-तहाँ छिपे हों तो उनकी ओर घृणा व तिरस्कार की दृष्टि डालते हुए उन्हें अनदेखा भी किया जा सकता है ।

 

यहाँ तो प्रसंग हथियारों से सुसज्जित सेना का चल रहा है । वे ही यदि समय को महत्त्व व आवश्यकता को न समझते हुए, जहाँ-तहाँ मटरगस्ती करते फिरें और समय पर हथियार न पाने के कारण समूची सेना को परास्त होना पड़े तो ऐसे व्यक्तियों पर तो हर किसी का रोष ही बरसेगा, जिनने आपातस्थिति में भी प्रमाद बरता और अपना तथा अपने देश के गौरव को मटियामेट करके रख दिया ।


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विचार मंथन : मल मूत्र की गठरी देह में आत्मा की अवधि पूरी होने पर मोह कैसा- ऋषि शुकदेव जी


मरने से डरना क्या ?

राजा परीक्षित को भागवत सुनाते हुए जब शुकदेव जी को 6 दिन बीत गये और सर्प के काटने से मृत्यु होने का एक दिन रह गया तब भी राजा का शोक और मृत्यु भय दूर न हुआ । कातर भाव से अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर वह क्षुब्ध हो रहा था । शुकदेव जी ने परीक्षित को एक कथा सुनाई-राजन् बहुत समय पहले की बात है एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया । संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा निकला, रात्रि हो गई, वर्षा भी होने लगी, सिंह व्याघ्र दहाड़ने लगे । राजा बहुत डरा और किसी प्रकार रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूँढ़ने लगा । कुछ दूर पर उसे दीपक दिखाई दिया । वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बीमार बहेलिये की झोपड़ी देखी । वह चल फिर नहीं जा सकता था इसलिए झोपड़ी में ही एक ओर उसने मल मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था । अपने खाने के लिए जानवरों का माँस उसने झोपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी, छोटी, अँधेरी और दुर्गन्ध युक्त वह कोठरी थी । उसे देखकर राजा पहले तो ठिठका, पर पीछे उसने और कोई आश्रय न देखकर उस बहेलिये से अपनी कोठरी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की ।

 

बहेलिये ने कहा- आश्रय के लोभी राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते है और मैं उन्हें ठहरा लेता हूँ तो दूसरे दिन जाते समय बहुत झंझट करते है । इस झोपड़ी की गन्ध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर उसे छोड़ना ही नहीं चाहते, इसी में रहने की कोशिश करते है और अपना कब्जा जमाते है । ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ । अब किसी को नहीं ठहरने देता । आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूँगा । राजा ने प्रतिज्ञा की-कसम खाई कि वह दूसरे दिन इस झोपड़ी को अवश्य खाली कर देगा । उसका काम तो बहुत बड़ा है, यहाँ तो वह संयोगवश ही आया है । सिर्फ एक रात ही काटनी है ।

 

बहेलिये ने अन्यमनस्क होकर राजा को झोपड़ी के कोने में ठहर जाने दिया, पर दूसरे दिन प्रातःकाल ही बिना झंझट किये झोपड़ी खाली कर देने की शर्त को फिर दुहरा दिया । रजा एक कोने में पड़ा रहा, रात भर सोया । सोने में झोपड़ी की दुर्गन्ध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सबेरे उठा तो उसे वही सब परमप्रिय लगने लगा । राज काज की बात भूल गया और वही निवास करने की बात सोचने लगा । प्रातःकाल जब राजा और ठहरने के लिए आग्रह करने लगा तो बहेलिए ने लाल पीली आँखें निकाली और झंझट शुरू हो गया । झंझट बढ़ा उपद्रव और कलह कर रूप धारण कर लिया । राजा मरने मारने पर उतारू हो गया । उसे छोड़ने में भारी कष्ट और शोक अनुभव करने लगा ।

 

शुकदेव जी ने पूछा- परीक्षित बताओ, उस राजा के लिए क्या यह झंझट उचित था ? परीक्षित ने कहा- भगवान वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइए । वह तो बड़ा मूर्ख मालूम पड़ता है कि ऐसी गन्दी कोठरी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर राजकाज छोड़कर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता था । उसकी मूर्खता पर तो मुझे भी क्रोध आता है । शुकदेव जी ने कहा- परीक्षित! वह मूर्ख तू ही है । इस मल मूत्र की गठरी देह में जितने समय तेरी आत्मा को रहना आवश्यक था वह अवधि पूरी हो गई । अब उस लोक को जाना है जहाँ से आया था । इस पर भी तू झंझट फैला रहा है । मरना नहीं चाहता, मरने का शोक कर रहा है । क्या यह तेरी मूर्खता नहीं है ।


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स्पंदन - देखना


आत्मा का धर्म है जानना और देखना और कुछ नहीं। बाकी जो कुछ है वह मन, बुद्धि तथा शरीर का काम है, आत्मा का नहीं। अत:, आत्मा में स्थिर होने का अर्थ है- निर्लिप्त भाव से देखना, जानना। आत्मा को केवल आत्मा से ही जाना जा सकता है, इसलिए भी देखने और जानने के लिए हमें शरीर, मन और बुद्धि के बाहर जाना ही होगा। जब तक इनका आवरण रहेगा, आत्मा ढकी ही रहेगी, अत: स्वस्थ एवं शुद्ध जीवन जीने का मार्ग है- देखो और जानो।

मैं आत्मा हूं
इसके लिए मन में सदा यह विचार रहना आवश्यक है कि मैं आत्मा हूं। आत्मा में ईश्वर है तो मैं ईश्वर हूं। ईश्वर है तो अकेला नहीं हो सकता। उसकी शक्तियां, क्षमताएं भी उसके साथ ही हैं और वे सब मुझ में हैं। इसका अर्थ यह भी है कि शरीर मैं नहीं हूं। यह मन और विचार भी मैं नहीं हूं। मैं तो इनको देखता हूं- बस। ईश्वर सृष्टा है, उसने मुझे रचा है। मुझे आगे की सृष्टि रचनी है, यह मेरा मूल दायित्व है।

जो ज्ञान है, उसे आगे बढ़ाना है। कर्म करते हुए ऋण-मोचन करके ईश्वर में लीन हो जाना है। जो कुछ कर्म मैं पिछले जन्म से साथ लाया हूं, जो संस्कार लाया हूं, उनका भी विपाक होना है। जो कुछ ऋणानुबंध मेरे साथ जुड़े हैं उनको भी सहर्ष, हंसते हुए चुकाना है। जो कुछ घट रहा है उनके पीछे भी ये ही कारण हैं, अन्यथा कुछ नहीं। मैं इनको टाल नहीं सकता। जो कुछ घटित हो रहा है, बस उसे देखना है। शरीर की क्रियाएं, स्पन्दन, मन के भाव आदि सब दिखाई पड़ते रहें और हम इनके साथ लिप्त भी न हों।

हम अभ्यास करें कि हमारा शरीर कुछ समय के लिए शिथिल हो सके। हम भीतर प्रवेश कर लें। हमारी इन्द्रियां कुछ देर के लिए सुप्त हो सकें, अंतर्मुखी हो सकें?

हमारे विचार अन्दर होने वाली गतिविधियों पर कुछ देर रुकें। हमारा मन भीतर के प्रकाश को देखने का प्रयत्न करे। देखने की पहली सीढ़ी है- श्वास। इसको आते-जाते देखना है। शरीर समझ में आने लगेगा, विचार समझ में आएंगे, मन समझ में आएगा। सब एकाग्र होने लगेंगे। स्वयं का इनके साथ सम्बन्ध समझ में आएगा। अनित्य क्या है, दिखाई देगा। संयम बढ़ेगा, अनुशासन और मर्यादाएं बढ़ेंगी, शांति का मार्ग प्रशस्त होगा।

प्राण-ऊर्जा
देखने का यही क्रम यदि जारी रहा तो प्राण-ऊर्जा का क्रम दिखाई देगा, जीवन परिवर्तन का नया मार्ग समझ में आएगा। प्रतिदिन आधा घंटा या चालीस मिनट का यह अभ्यास शीघ्र ही व्यक्ति को मन की गहराइयों का परिचय दे देता है। उसको अन्तर्मुखी (गंभीर) बना देता है। शरीर की रासायनिक क्रियाएं दिखने लगती हैं। भावनाओं का प्रभाव, संकल्प का प्रभाव कैसे व्यक्तित्व पर छा जाता है, इसका अनुभव होने लगता है। कैसे मन में प्राणियों के प्रति सहृदयता, करुणा और मैत्री के भाव प्रस्फुटित हो जाते हैं, कैसे आनंद का स्रोत खुलता है, व्यक्ति स्वयं के कर्मों का किस प्रकार विश्लेषण कर लेता है, कैसे वह संस्कारों से मुक्त होने का प्रयास करता है और शेष जीवन में किस प्रकार की शांति का नया अनुभव करता है आदि का आभास उसको होता है।

एक ही बात है जो इस देखने और जानने के साथ जुड़ती है, वह यह है कि कर्म के बिना कुछ भी नहीं। देखना और जानना भी कर्म है। यहां भाव-कर्म की प्रधानता होती है, शरीर गौण रहता है। भावों की प्रधानता कर्म में श्रद्धा पैदा करती है, संकल्प को दृढ़ करती है और अभ्यास की निरंतरता बनाए रखती है।

देखना और जानना
देखने का नाम ही तो दर्शन है। जानना ही ज्ञान है। आप एक चीज को कैसे देखते हैं, वही तो आपका दर्शन है। इसका आधार ज्ञान होता है। भाव भी ज्ञान के कारण ही बनते हैं। लक्ष्य की स्पष्टता भी ज्ञान से ही होती है। शर्त यह है कि ज्ञान भी तटस्थ हो और दर्शन भी। बुद्धि का तर्क काम नहीं आता। इससे तो द्वंद्व पैदा होता है। द्वंद ही तो जीवन का दूसरा नाम है। द्वंद ही तो शांति का शत्रु है।

जो कुछ घट रहा है, उसे सृष्टि का क्रम समझकर देखें। स्वयं को भी इसी का एक अंग मानें। तब आप भी निमित्त मात्र रहकर कर्म करेंगे। सुख-दु:ख का बहुत प्रभाव आप पर नहीं पड़ेगा, यह भी सृष्टि-क्रम का ही अंग है। इसका अर्थ भाग्य के भरोसे बैठ जाना भी नहीं है।

जीवन तो कर्म प्रधान ही रहेगा। इससे तो भाग्य को भी बदला जा सकता है। कर्महीनता तो मृत्यु का पर्याय है। बस, आपको केवल कर्मफल की चाह से मुक्त रहना है। आचार्य महाप्रज्ञ ने लिखा है:

‘‘एक चिन्तन आता है, उसका संस्कार बन जाता है। एक प्रवृत्ति होती है और उसका संस्कार बन जाता है। एक शब्द आता है और उसका संस्कार बन जाता है। चिन्तन चला जाता है, प्रवृत्ति चली जाती है। शब्द चला जाता है, किन्तु वे अपने पीछे संस्कार छोड़ जाते हैं। जो छोड़ा जाता है, उसकी अभिवृत्तियां होती रहती हैं।’’

‘‘मार्ग चलने के लिए होता है, आसक्ति के लिए नहीं होता। जब आसक्ति आती है तब पद-चिन्ह छूटते हैं। देखने और जानने का मार्ग ऐसा है जहां न पद-चिन्ह, न अनुसरण, न कुछ शेष, न कोई स्मृति, न संस्कार।’’


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विचार मंथन : अपने को ऐसा बनाओं की आपकों मित्र कहते हुए दूसरे लोग गर्व अनुभव करें- स्वामी विवेकानंद


सदाचार का महान धन
सदाचार-श्रेष्ठ आचरण-अच्छा चाल चलन, यह मानव जीवन का बहुमूल्य खजाना है । सृष्टि के आदि काल से ऋषि मुनियों से लेकर आधुनिक विद्वानों तक यह बात स्वीकार होती आई है कि मनुष्य का गौरव इसमें हैं कि उसका आचरण श्रेष्ठ हो । भलाई, नेकी, उदारता, सेवा, सहायता, सहानुभूति से परिपूर्ण हृदय वाला व्यक्ति सदाचारी कहा जाता है, उसके बाह्य आचरण ऐसे होते हैं, जो दूसरों को स्थूल या सूक्ष्म रीति से निरन्तर लाभ ही पहुँचाते रहते हैं । वह एक भी कार्य ऐसा नहीं करता, जिससे उसकी आत्मा को लज्जित होना पड़े, पश्चाताप करना पड़े या समाज के सामने आँखें नीची झुकानी पड़ें ।

 

अगर व्यवहार उत्तम नहीं तो सब व्यर्थ है
मनुष्य चाहे जितना विद्वान् चतुर धनवान, स्वरूप वान, यशस्वी तथा उच्च आसन पर आसीन हो, परन्तु यदि उसका व्यवहार उत्तम नहीं तो वह सब व्यर्थ है, धूलि के बराबर है। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा है, उस पर मीठे फल भी लगते हैं पर उससे दूसरों को क्या लाभ या धूप में तपा हुआ पथिक न तो उसकी छाया में शान्ति लाभ कर सकता है और न भूख से व्याकुल को उसका एक फल प्राप्त हो सकता है। जिसका आचरण श्रेष्ठ है वह किसी की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं धार्मिक उन्नति में जरा भी बाधा पहुँचाने वाला कार्य न करेगा वरन् उससे सहायता ही देगा।

 

अपने को ऐसा बनाओं की आपकों मित्र कहते हुए दूसरे लोग गर्व अनुभव करें...
आप अपने आचरणों को ऐसा रखिये, जिससे आपको जन्म देने वाले माता पिता की कीर्ति में वृद्धि हो । अपने को ऐसा बनाओं की आपकों मित्र कहते हुए दूसरे लोग गर्व अनुभव करें । आपसे छोटे लोग आपका उदाहरण सामने रख कर अपने आचरण को उसी साँचे में ढालने का प्रयत्न करें । स्मरण रखिए, सदाचार मानव जीवन का महान धन है । जो सदाचारी है, असल में वही सच्चा धनी हैं ।


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