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स्पंदन - कल्पना


जीवन वर्तमान है, स्मृति अनुभव है और कल्पना व्यक्ति की योजन शक्ति है। आज के कार्यों में पिछले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए वर्तमान को कैसे संजोया जाए, इसके लिए कल्पनाशीलता आवश्यक है। कल्पना सकारात्मक हो, सृजनात्मक हो, दूरगामी हो। कल्पना जीवन को महत्त्व देने का श्रेष्ठ माध्यम है।

रस, माधुर्य, स्नेह, लालित्य भाव सभी कल्पना से जुड़े हैं। व्यवहार की भाषा में आप इसे सपने देखना भी कह सकते हैं। जब व्यक्ति सपने देखेगा तभी तो उनको पूरा कर सकेगा। जो सपना ही नहीं देख पाए उसका विकास असम्भव है। केवल दिवास्वप्न ही व्यर्थ जाते हैं। स्वप्न निजी धरातल के भी हो सकते हैं, कार्यक्षेत्र के भी और जीवन के किसी भी क्षेत्र के, जिससे आप जुडऩा चाहते हैं।

कल्पना का कार्य
आम धारणा यह है कि स्मृति बन्धन है, व्यक्ति को अपने अतीत से बांधकर रखती है। स्मृति के कारण व्यक्ति मुक्त नहीं रह पाता। स्मृति में अनेक बिम्ब और प्रतिबिम्ब होते हैं, प्रतिध्वनियां होती हैं, प्रतिक्रियाएं होती हैं, जो व्यक्ति के जीवन को सीमित करती रहती हैं, उसको एक निश्चित दिशा में ही बांधे रखती हैं। स्मृति के कारण कई बार व्यक्ति वर्तमान में भी नहीं जी पाता। अपनी स्मृतियों में ही खोया रहता है। पर, उपलब्धि कुछ नहीं होती। स्मृति में खो जाना कल्पना नहीं है, सपना भी नहीं है।

स्मृति को तोडक़र बाहर निकालना कल्पना का कार्य है। जीवन को दिशा देना भी कल्पना का कार्य है। व्यक्ति के मानस को झकझोरने का कार्य कल्पना ही कर सकती है। जीवन का बोध करा सकती है। आज की आधुनिक प्रबन्ध व्यवस्था में योजन शब्द का अर्थ भी कल्पना ही है। परिणाम तो किसी के हाथ में नहीं है। केवल प्रयास करने का कार्य हमारा है। लक्ष्य बनाकर प्रयास करने की दिशा तय करना हमारी कल्पना शक्ति का ही कार्य है। प्रबन्धकीय योजन में अनेक विशेषज्ञों की सृजनशीलता और कल्पना उपयोग में आती है।

योजना का प्रारूप सकारात्मक होता है। भावी दृष्टिकोण उसमें समाहित रहता है। कल्पना हमारा भविष्य तय करती है।एक व्यक्ति नौकरी करता है। घर से चिट्ठी आती है कि अमुक तारीख को तुम्हारी शादी तय कर दी गई है। वह दस-पंद्रह दिन का अवकाश लेकर घर जाता है। शादी करके, पत्नी को लेकर नौकरी पर चला जाता है। इस दम्पती के भावी जीवन की कल्पना आसानी से की जा सकती है। दोनों को ही सपने देखने का समय नहीं मिला।

सगाई और शादी के बीच का अन्तराल जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग इसलिए है कि व्यक्ति अपनी जिन्दगी के बारे में सपने देख सके। उसे इतना तो मालूम होना ही है कि भावी जीवन-साथी की पारिवारिक और सामाजिक स्थिति क्या है, आर्थिक और शैक्षणिक स्वरूप क्या है।भावी रिश्तों की मिठास का यह समय कन्याओं के लिए शायद अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। उन्हें स्नेह और माधुर्य बटोरना है, आगे बांटना है। इस काल की सारी कल्पना रसमय होती है।
जीवन में रस का नया संचार कर देती है। यह रस पूरी उम्र बना रहता है। पूरी उम्र जीवन साथी पर यह रस उड़ेला जाता रहेगा।

कल्पना की मिठास
मातृत्व भी इसी प्रकार का सपने देखने का काल है, जहां रस की प्रधानता होती है। माधुर्य और स्नेह होता है। होठ गुनगुनाते हैं। यही रस बालक को उम्र भर मिलता है। इस रस को बटोरने के लिए समय देना पड़ेगा। इसके बिना सब कुछ नीरस अथवा पुस्तक पढक़र किया हुआ-सा लगेगा। भावनाओं की गहनता कम होगी, बुद्धि का धरातल व्यापक होगा। जीवन के सभी रिश्ते भावप्रधान होते हैं। जीवन के सभी क्षेत्रों में लक्ष्य बनाने का कार्य, कार्य के साथ पूर्ण मनोयोग और स्मृति से मुक्त रहने का मार्ग कल्पना ही प्रशस्त करती है। भाव यदि नकारात्मक हैं तो मन में अनेक प्रकार के संशय, आवेग और तनाव को भी कल्पना जन्म देती है। कल्पना के बहाव में इतनी शक्ति होती है कि व्यक्ति अपना अतीत और वर्तमान दोनों ही भूल बैठता है। वह ऊर्जावान की अपेक्षा ऊर्जाहीन बन जाता है।

स्मृति हो अथवा कल्पना, दोनों ही साधन की तरह काम आनी चाहिएं। ये साध्य नहीं हो सकतीं। अपेक्षा इस बात की है कि कार्य की समाप्ति के साथ ही स्मृति और कल्पना भी सुप्त रह सकें, दिनचर्या समाप्ति के बाद हम स्वयं में रह सकें तथा कल की चिन्ता न रहे।

वैयक्तिक और सामाजिक दोनों ही धरातलों पर हम अपने ज्ञान और अनुभवों को साथ रखकर अपने भावी जीवन की कल्पना करें तथा मन को पटु बनाने और एक निश्चित लक्ष्य बनाकर कार्य करना शुरू करें तो जीवन को मोड़ सकते हैं। स्वाध्याय में भी तो हम यही करते हैं—क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए और क्या बनना है। एक निश्चित लक्ष्य को लेकर नियमित योजना करना, आगे से आगे नई मंजिल तय करना तथा व्यापकता का भाव बनाए रखना व्यक्ति की कल्पना को ही स्वाध्याय बना देता है। कल्पना का सबसे उज्ज्वल पक्ष यह है कि यह सदा व्यक्ति को आशावान बनाती है।

हर छात्र अच्छे नम्बरों से पास होने के सपने देखता है। आगे से आगे अपने भविष्य का चित्र तैयार करता चला जाता है। इसमें मिठास होती है तो बड़े होने या बनने का सुख भी होता है। सकारात्मक कल्पना में कड़वापन होता ही नहीं है। यथार्थ के सहारे, अपनी क्षमता के अनुकूल वह संघर्ष को तैयार होता है। जो बड़े सपने देखता है वह छोटा नहीं रह सकता।


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विचार मंथन : ऐसे थे भारत मां के वीर सपूत छत्रपति शिवाजी


भारत के वीर सपूतों में से एक हिंदू हृदय सम्राट, मराठा गौरव छत्रपति शिवाजी न सिर्फ एक महान शासक थे बल्कि दयालु योद्धा भी थे । शिवाजी पिता शाहजी और माता जीजाबाई के पुत्र थे । उनका जन्म महाराष्ट राज्य के पुणे के पास स्थित शिवनेरी में हुआ था । शिवाजी एक सेक्युलर शासक थे और वे सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करते थे । उनकी सेना में मुस्लिम बड़े पद पर मौजूद थे, इब्राहिम खान और दौलत खान उनकी नौसेना के खास पदों पर थे, सिद्दी इब्राहिम उनकी सेना के तोपखानों का प्रमुख था । शिवाजी ने अपने सैनिकों की तादाद को 2 हजार से बढ़ाकर 10 हजार किया था, भारतीय शासकों में वो पहले ऐसे थे जिसने नौसेना की अहमियत को समझा । उन्होंने सिंधुगढ़ और विजयदुर्ग में अपने नौसेना के किले तैयार किए, रत्नागिरी में उन्होंने अपने जहाजों को सही करने के लिए दुर्ग तैयार किया था ।

 

उनकी सेना पहली ऐसी थी जिसमें गुरिल्ला युद्ध का जमकर इस्तेमाल किया गया, जमीनी युद्ध में शिवाजी को महारत हासिल थी, जिसका फायदा उन्हें दुश्मनों से लड़ने में मिला, पेशेवर सेना तैयार करने वाले वो पहले शासक थे । धार्मिक हिंदू के साथ दूसरे धर्मों का भी सम्मान करते थे, संस्कृत और हिंदू राजनीतिक परंपराओं का विस्तार चाहते थे ।

 

शिवाजी ने 1657 तक मुगलों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध कायम रखे थे, यहां तक कि बीजापुर जीतने में शिवाजी ने औरंगजेब की मदद भी की लेकिन शर्त ये थी कि बीजापुर के गांव और किले मराठा साम्राज्य के तहत रहे. दोनों के बीच मार्च 1657 के बीच तल्खी शुरू हुई और दोनों के बीच ऐसी कई लड़ाईयां हुईं जिनका कोई हल नहीं निकला । शिवाजी को एक दयालु शासक के तौर पर भी याद किया जाता है ।


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विचार मंथन : होलिका का यह मंगल पर्व घर हो या पड़ोस होलिका के नफरत भरे ढोंग को पनपने न दें- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


होली के दिन घर-आँगन, चौबारे, गलियारे में अनेक रंगों की धूम रहती है । होली के उल्लास में उमड़ते इन रंगों में कई चिंतन के रंग भी शामिल होते है । जिनसे तन नहीं मन भीग रहा होता है । परिस्थिति एवं परिवेश को तनिक गहराई से देखेंगे तो इन रंगों का अनुमान होगा, और अपने आप में उतरेंगे तो चिंतन के इन रंगों की चटख और शोख छटा नजर आयेगी । इनमें उल्लास के साथ विषाद का भी पुट नजर आयेगा । खुशी के साथ गम भी दिखाई देगा और हँसी के साथ रुदन भी यहाँ बिखरे दिखाई देंगे । चिंतन के इन रंगों में सारी इन्सानी जिन्दगी का वजूद आ सिमटा है । कई -क्या? क्यों? कैसे? और किसलिए? की पिचकारियाँ हमारे ऊपर आपके ऊपर इन रंगों को उड़ेल रही है । जो भी विचारशील हैं उनमें से कोई चिंतन के रंगों की इस फुहार से बच नहीं सकता ।

 

होली की एक सुप्रसिद्ध कहावत है- ‘बुरा न मानो होली है ।’ तब फिर बुरा मानने की क्या जरूरत है । आप भी हमारे साथ भीगिये इन चिंतन के रंगों में और मित्रों-परिचितों को भी बचने न दीजिए, उन्हें भी भिगोइए इन गाढ़े रंगों में । सदस्य परिवार के हों या पड़ोस के कोई भी छूटने न पाये । हम आप और सभी विचारशील जन मजबूती से थाम लें अपनी पिचकारियाँ और उड़ेलें चिंतन के रंग एक-दूसरे पर । हमारी, हम सबकी विचारशीलता में विमर्श पैदा हो, मतों में दुराग्रह की बजाय पारस्परिक संवाद की स्थिति बने और अन्ततः समाधान जन्म ले । तभी तो उल्लास में सार्थकता आएगी ।

 

सहस्राब्दियाँ, शताब्दियां बीत गयी हमें होली मनाते । कई रंग देखें हैं हम सबने । कई गीत गाये हैं हमने । कई धुनें छेड़ी है । कई रंगों और कई तालों ने हमारी जिन्दगी को लय दी है। वैदिक ऋचाओं की गूँज और सामगान की सुमधुर ध्वनि के साथ होली मनाना शुरू किया था हमने । अपने आचरण और कर्त्तव्यनिष्ठ, प्रचण्ड तप और अविराम साधना से हमीं ने जिन्दगी को ऐसा गढ़ा था कि देवता भी हमारे घर-आँगन में आकर हम सबसे होली खेलते थे । देवत्व हमारी निजी जिन्दगी की परिभाषा थी । स्वर्ग हमारी सामाजिक जिन्दगी का सच था । ऐसा नहीं था कि इस क्रम में व्यतिक्रम के अवसर नहीं आए । असुरता ने अपनी हुँकार भरी, हिरण्यकश्यपु और होलिका के सहोदर षड़यंत्रों ने हमारे देवत्व और स्वर्ग को मटियामेट करने का कुचक्र रचा । पर हमारे प्रह्लाद-पराक्रम ने आसुरी प्रवृत्ति के इन भाई-बहिन को पनपने नहीं दिया । अपनी ही नफरत की आग में होलिका जल मरी । भगवान नृसिंह ने असुरता का वक्ष विदीर्ण कर दिया और होली के गीत-प्रह्लाद की भक्ति की थिरकन के साथ गूँज उठे ।

 

प्रेम का स्वाँग भरे होलिका आज भी नफरत फैला रही है । घर-परिवार की टूटन, जाति-वंश का भेद, सम्प्रदायों और धर्मों की दीवारें, भाषा और क्षेत्र के विभाजन इन नफरत को बढ़ावा दे रहे हैं । चतुर होलिका हमारे-हम सबके प्रह्लाद-पराक्रम के अभाव में सफल है । सवाल हमसे है और आप से भी कि आखिर कहाँ खो गयी वह साधना, प्रचण्ड तप करने का वह पुरुषार्थ, जिस पर रीझकर भगवान नृसिंह हमारे-हम सबके अन्तःकरण में अवतरित हो सके । ध्यान रहे- भगवान केवल भक्तों और तपस्वियों को वरदान देते हैं । भावसंवेदना की सघनता और पुरुषार्थ की प्रचण्डता ही प्रभु के वरदान की अधिकारी बनती है । निष्ठुर और कायर तो सदा ही दुःख भोगते आये हैं ।

 

शुरुआत आज से और अभी से करें । संकल्पित हों कि होलिका का यह मंगल पर्व हमारे जीवन में एक नयी क्रान्ति लाए । घर हो या पड़ोस होलिका के नफरत भरे ढोंग को पनपने न दें । सघन संवेदना ही नफरत फैलाने वाली होलिका का समर्थ उत्तर है । उल्लास के रंगों को तो भरपूर बिखेरे पर व्यंग्य और बुराई का कीचड़ न उछलने दें । जीवन में जूझने का हौसला पैदा करें । निराशा-हताशा और थकान क्यों? जब भगवान् नृसिंह स्वयं हम पर कृपा करने के लिए तैयार हैं तो आखिर डर और भय किसलिए । सघन संवेदना और प्रचण्ड पराक्रम के रंगों से ऐसी होली खेलें कि नफरत की होलिका अपने ही षड़यंत्र में जल कर राख हो जाए और भय और आतंक को फैलाने वाला हिरण्यकश्यपु की छाती खुद भय से फट जाय। इस होली पर अपने चिंतन और आचरण से सिद्ध करें कि हम भगवान् नृसिंह के भक्त है प्रह्लाद के अनुगामी हैं । और हममें बरसाने में होली के रंगों की छटा बिखेरने वाले गीता गायक कृष्ण के उपदेशों पर चलने का साहस है ।


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विचार मंथन : जागृतात्माओं जागों, जब जटायु व गिलहरी अनिती के खिलाफ चुप नहीं बैठे- स्वामी विवेकानंद


जागृतात्माओं जागों, जब जटायु व गिलहरी अनिती के खिलाफ चुप नहीं बैठे

पंख कटे जटायु को गोद में लेकर भगवान् राम ने उसका अभिषेक आँसुओं से किया । स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए भगवान् राम ने कहा-तात् । तुम जानते थे रावण दुर्द्धर्ष और महाबलवान है, फिर उससे तुमने युद्ध क्यों किया ?

 

अपनी आँखों से मोती ढुलकाते हुए जटायु ने गर्वोन्नत वाणी में कहा- प्रभो! मुझे मृत्यु का भय नहीं है, भय तो तब था जब अन्याय के प्रतिकार की शक्ति नहीं जागती ? भगवान् राम ने कहा-तात् ! तुम धन्य हो ! तुम्हारी जैसी संस्कारवान् आत्माओं से संसार को कल्याण का मार्गदर्शन मिलेगा ।

 

गिलहरी पूँछ में धूल लाती और समुद्र में डाल आती । वानरों ने पूछा-देवि! तुम्हारी पूँछ की मिट्टी से समुद्र का क्या बिगडे़गा । तभी वहाँ पहुँचे भगवान् राम ने उसे अपनी गोद में उठाकर कहा 'एक-एक कण धूल एक-एक बूँद पानी सुखा देने के मर्म को समझो वानरो। यह गिलहरी चिरकाल तक सत्कर्म में सहयोग के प्रतीक रूप में सुपूजित रहेगी । जो सोये रहते हैं वे तो प्रत्यक्ष सौभाग्य सामने आने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते । इसलिए जागृतात्माओं की तुलना में उनका जीवन जीवित-मृतकों के समान ही होता है ।


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स्पंदन - कान्ति


कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति के पास बैठकर वहां से उठने की इच्छा नहीं होती तो किसी के पास बैठने तक की इच्छा नहीं होती। इसका उत्तर है-मन की भूमिका। जिसके मन में समष्टिभाव है, वह उदारमना होता है। वह दया, करुणा और स्नेह का प्रतीक होता है। वह किसी के अहित की बात नहीं सोचता और न ही स्वयं के स्वार्थ को महत्त्व देता है। उसके चेहरे पर एक विशेष ओज दिखाई पड़ता है। यही ओज अथवा कान्ति उसके प्रति विशेष आकर्षण का केन्द्र बनता है। जैसे-जैसे व्यक्ति का शुद्ध ज्ञान बढ़ता है, विश्वकल्याण का भाव बढ़ता जाता है। उसकी कान्ति का क्षेत्र भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है। जब भी कोई व्यक्ति इस प्रभाव क्षेत्र में प्रवेश करता है तो वह सहज ही आकर्षित हो जाता है।

आभा-मण्डल
प्रत्येक व्यक्ति का एक आभा-मण्डल होता है। जो उस व्यक्ति के मन की सूचना देता रहता है। दुष्ट चरित्र का आभा-मण्डल किसी आत्मीयता प्रधान जीव को आकर्षित नहीं करता। यही आभा-मण्डल व्यक्ति के मन की खुराक बनता है, मन का पोषण करता है, मन को तुष्ट एवं पुष्ट करता है। आज वैज्ञानिकों ने इसका अध्ययन शुरू कर दिया है। अनेक संस्थाएं इस पर कार्य कर रही हैं। ऐसे उपकरण तैयार हो गए हैं जिनसे आभा-मण्डल के चित्र, भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में लिए जा सकते हैं। व्यक्ति के मनोभावों का अध्ययन किया जा रहा है। हमारे यहां सब कुछ ग्रन्थों में लिखा है, किन्तु उनको कोई समझाने वाला नहीं है। जबकि विदेशों में उनके उत्तर उपलब्ध हो रहे हैं। हमारा जीवन ज्ञान और कर्म का सन्तुलन है। कोरा ज्ञान बिना कर्म के विष का कार्य करता है। वह किसी परिणाम या उपलब्धि में परिणत नहीं हो सकता। बिना ज्ञान के किए गए कर्म भी व्यक्ति को वासना क्षेत्र में बांधते चले जाते हैं।

व्यक्ति के पाश बढ़ते जाते हैं, और उसका पशुत्व बलवान होता रहता है जबकि ज्ञानयुक्त कर्म व्यक्ति को भावना-क्षेत्र में बनाकर रखते हैं। वासना और भावना का समीकरण ही तो जीवन है। जिस प्रकार शुद्ध कर्म क्षेत्र व्यक्ति को ओजस्वी बनाता है, उसी प्रकार भावना की शुद्धता, व्यापकता इसे कान्ति में परिणत कर देती है। ओजस पराक्रम का क्षेत्र है, भावना की प्रबलता और शुद्धता (निर्मलता) वीतरागता की ओर ले जाती है।

यादृशं भुज्यते अन्नं, पच्यते जठराग्निना, प्रदीपने तपोभुक्तं, नीहारोमि च तादृशं:।

- व्यक्ति जैसा खाता है, वैसा निकालता है। अंधकार का भक्षण करने वाला दीपक धुआं उगलता है। इसके विपरीत जिसने स्नेह को जीत लिया, वृत्तियों को क्षीण कर दिया, वह सदा उदित रहता है।

भक्तामर का एक श्लोक है—

निर्धूमवर्तिरप्रवर्जित-तैलपूर:
कृत्स्नं जगत्त्रयमिदं प्रकटीकरोऽसि।
गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां
दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ! जगत्प्रकाश:॥

- हे प्रभु! तुम जगत् को प्रकाशित करने वाले अलौकिक दीप हो। दीप तेल और बाती से जलता है और उससे धुआं निकलता है। आपके अलौकिक दीपक को न तो बाती की जरूरत है, न ही तेल की। वह निर्धूम है। दीपक सीमित क्षेत्र को प्रकाशित करता है जबकि तुम इस परिपूर्ण जगत् को प्रकाशित करते हो। दीप को हवा का एक झोंका भी बुझा देता है किन्तु आपके अलौकिक दीप को पर्वत को प्रकम्पित कर देने वाला प्रलयवान भी नहीं बुझा सकता।

आन्तरिक ज्योति
प्रकाश का ज्ञान से सीधा सम्बन्ध है। ज्ञान के विकास के लिए प्रकाश की साधना की जाती है। सूर्योपासना की परम्परा प्रकाश की साधना करने वाले की अन्तश्चेतना को जाग्रत करती है।

आचार्य महाप्रज्ञ ने अपने ग्रन्थ ‘भक्तामर : अन्त:स्तल का स्पर्श’ में लिखा है-‘साधना के क्षेत्र में साधक आन्तरिक ज्योति के जागरण की साधना करता है। उसके प्रस्फुटन के लिए ही वह दीपक की लौ का ध्यान करता है। मणि की प्रभा, सूर्य की रश्मि अथवा चन्द्रमा का ध्यान करता है। उसके ये सारे उपक्रम भीतर की ज्योति को जगाने के लिए होते हैं।’

आकर्षण आकृति और रंग-रूप में नहीं होता, मन की पवित्रता में होता है। इसी से आभा-मण्डल की कान्ति बढ़ती है। इसी से मन में शान्त रस की स्थापना होती है।

यही एक रस स्थाई होता है, शेष रस क्षणिक कहे जा सकते हैं, अल्पकालीन होते हैं। इसके बाद मन से आवेग, आवेश और नकारात्मक भाव लुप्त हो जाते हैं, नए विष पैदा नहीं होते। कान्ति मन्द नहीं पड़ती, उज्ज्वल बनी रहती है।

कामना और कान्ति एक ही धातु से बने हैं, अत: कान्ति का आधार भी मन की कामना ही है, ऐसा व्याकरणकार लिखते हैं। कामना, भावना, इच्छा एक ही हैं और यह मन का बीज है। मन में ही इच्छा पैदा होती है, अपने आप पैदा होती है। आप इच्छा को पैदा नहीं कर सकते, केवल पूरी कर सकते हैं अथवा दबा सकते हैं। भावना और कर्म व्यक्ति से जुड़ते हैं।

कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और बुद्धियोग भावना और कर्म के विभिन्न समीकरणों को समझने में व्यक्ति की सहायता करते हैं।

कामना ही तो अन्तत: कर्म में परिवर्तित होती है। कर्म के साथ पैदा होते राग-द्वेष और कषाय मन में अंधकार और अहंकार पैदा करते हैं। शरीर में विष पैदा करते हैं। ये तमोगुणी होते हैं।

इन पर विजय पाने के लिए धृति का विकास किया जाता है। धैर्य का विकास किया जाता है। मन की स्थिरता और शक्ति देने वाली बुद्धि को ही धृति कहते हैं। धृति कान्ति का ईंधन बनती है।

धृति के साथ विवेक बढ़ता है, ज्ञान बढ़ता है, प्रज्ञा जाग्रत होती है, कान्ति बढ़ती है। बिना धृति के व्यक्ति बड़ा नहीं बन सकता। सार्थक जीवन यात्रा नहीं कर सकता। सुख और शान्ति का अनुभव नहीं कर सकता। लोकहित तो उसका विषय बन ही नहीं सकता।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का समष्टि भाव ही ज्ञान का प्रकाश होता है। यही कान्ति है। इस कान्ति से व्यक्तित्व प्रकाशमान भी रहता है और दूसरों को भी प्रकाशित करने की क्षमता प्राप्त करता है। यह कान्ति ही ज्ञान की उपलब्धि है, कर्म की परिपक्वता है और जीवन का अमृत रस है।


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विचार मंथन : मंदिर का पुजारी सिर्फ पूजा पाठ वाला ही नहीं. उसे तो भगवान जैसा ही होना चाहिए- आचार्य श्रीराम शर्मा


मित्रों, समर्थ गुरु रामदास ने छत्रपति शिवाजी के सिर पर हाथ रखा और कहा कि भारतीय स्वाधीनता के लिए, भारतीय धर्म की रक्षा करने के लिए तुम्हें बढ़ चढ़कर काम करना चाहिए । शिवाजी ने कहा कि मेरे पास वैसी साधन सामग्री कहाँ है? मैं तो छोटे से गाँव का एक अकेला लड़का, इतने बड़े काम को कैसे कर सकता हूँ । समर्थ गुरु रामदास ने कहा, "मैंने पहले से ही उसकी व्यवस्था सात सौ गाँवों में महावीर मंदिर के रूप में बनाकर के रखी है । जहाँ जनता में काम करने वाले को प्रकाण्ड, समझदार एवं मनस्वी लोग काम करते हैं ।" पुजारी पद का अर्थ मरा हुआ आदमी, बीमार, बुड्ढा, निकम्मा, बेकार और नशेबाज आदमी नहीं है । पुजारी का अर्थ-जिसे भगवान का नुमाइन्दा या भगवान का प्रतिनिधि कहा जा सके । जहाँ ऐसे समर्थ व्यक्ति हों, समझना चाहिए, वहाँ पुजारी की आवश्यकता पूरी हो गई ।

 

किसी आदमी को खाना दिया जाए और वह भी आधा-अधूरा, सड़ा-बुसा हुआ दिया जाए, तो उससे खाने वाले को भी नफरत होगी और उसके स्वास्थ्य की रक्षा भी नहीं होगी । इसी तरीके से भगवान की सेवा करने के लिए लँगड़ा-लूला, काना-कुबड़ा, मरा, अंधा, बिना पढा, जाहिल-जलील, गंदा आदमी रख दिया जाए, तो वह क्या कोई पुजारी है? पुजारी तो भगवान जैसा ही होना चाहिए । भगवान राम के पुजारी कौन थे? हनुमान जी थे। अतः कुछ इस तरह का पुजारी हो, तो कुछ बात भी बने। इसी तरह के पुजारी समर्थ गुरु रामदास ने सारे-के-सारे महाराष्ट्र में रखे थे। इन सात सौ समर्थ पुजारियों ने उस इलाके में जो फिजा, वो परिस्थितियाँ पैदा कीं कि छत्रपति शिवाजी के लिए जब सेना की आवश्यकता पड़ी, तो उन्हीं सात सौ इलाकों से बराबर उनकी सेना की आवश्यकता पूरी को जाती रही ।

 

इसी प्रकार जब उनको पैसे की आवश्यकता पड़ी, तो उन छोटे से देहातों से, जिनमें कि महावीर मंदिर स्थापित किए गए थे, वहाँ से पैसे की आवश्यकता को पूरा किया गया । अनाज भी वहाँ से आया । उसी इलाके में जो लोहार रहते थे, उन्होंने हथियार बनाए । इस तरह जगह-जगह छिटपुट हथियार बनते रहे। अगर एक जगह पर हथियार बनाने की बड़ी फैक्ट्री होती, तो शायद विरोधियों को पता चल जाता और उन्होंने उस स्थान को रोका होता । वे सावधान हो गए होते, मिलिट्री एक ही जगह रखी गई होती, तो विरोधियों को पता चल जाता और उसे रोकने की कोशिश की गई होती, लेकिन सात सौ गाँवों में पुजारियों के रूप में एक अलग तरह की छावनियाँ पड़ी हुई थीं । हर जगह इन सैनिकों को ट्रेनिंग दी जाती थी । हर जगह इन छावनियों में 10-20 वालंटियर आते थे और वही से पैसा धन व अनाज आता था । इस तरीके से मंदिरों के माध्यम से समर्थ गुरु रामदास ने छत्रपति शिवाजी के आगे करके इतना बड़ा काम कर दिखाया ।


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विचार मंथन : भगवान् का आमन्त्रण स्वीकारने वाले कभी घाटे में नहीं रहते- प्रज्ञा पुराण भाग


यह एक प्रमाणित तथ्य हैं कि जिन्होंने भगवान का आमन्त्रण सुना है वह कभी घाटे में नहीं रहे । बुद्ध ने 'धर्मम् बुद्धम् संघम् शरणम् गच्छामि' का नारा लगाया और संव्याप्त अनीति-अनाचार से जूझने हेतु आमन्त्रण दिया तो असंख्यों व्यक्ति युग की पुकार पर सब कुछ छोड़कर उनके साथ हो लिए । उन्होंने तत्कालीन व्यवस्था को बदलने के लिए उन भिक्षुओं के माध्यम से जो बौद्धिक क्रान्ति सम्पन्न की, उसी का परिणाम था कि कुरीतियुक्त समाज का नव निर्माण सम्भव हो सका ।

 

इसी तरह का चमत्कार गाँधी युग में भी उत्पन्न हुआ । अंग्रेजों की सामर्थ्य और शक्ति पहाड़ जितनी ऊँची थी । उन दिनों यह कहावत आम प्रचलित थी कि अंग्रेजों के राज्य में सूर्य अस्त नहीं होता था । बुद्धि, कौशल में भी उनका कोई सानी नहीं था । फिर निहत्थे मुट्ठी भर सत्याग्रही उनका क्या बिगाड़ सकते थे । हजार वर्ष से गुलाम रही जनता में भी ऐसा साहस नहीं था कि इतने शक्तिशाली साम्राज्य से लोहा ले सके और त्याग-बलिदान कर सके । ऐसी निराशापूर्ण परिस्थितियों में भी फिर एक अप्रत्याशित उभार उमड़ा और स्वतन्त्रता संग्राम छिड़ा, यही नहीं अन्तत वह विजयी होकर रहा ।

 

उस संग्राम में सर्वसाधारण ने जिस पराक्रम का परिचय दिया वह देखते ही बनता था । असमर्थो की समर्थता, साधनहीनों को साधनों की उपलब्धता तथा असहायों को सहायता के लिए न जाने कहाँ से अनुकूलताएँ उपस्थित हुई और असम्भव लगने वाला लक्ष्य पूरा होकर रहा ।

 


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विचार मंथन: सत्य मानव-जीवन की सफलता के लिये सर्वोत्तम नीति है और शिव की प्राप्ति भी इसी से संभव


भय और मलीनता से मुक्त रहने वालों की आत्मा तेजोपूत और उज्ज्वल रहा करती है । उसकी शक्ति बढ़ती और प्रभावपूर्ण बनती जाती है । उज्ज्वल और सत्यपूत आत्मा वाला व्यक्ति हजार दुष्टों तथा धूर्तों में भी ठीक उसी प्रकार प्रचण्ड और निर्भय बना रहता है जिस प्रकार एक अकेला केसरी शृंगालों और शूकरों के झुण्ड में । निर्भयता में अनन्त व अनिवर्चनीय आनन्द है । इसकी प्राप्ति सत्याचरण, सत्य वचन और सत्य व्यवहार द्वारा ही होती है । सत्य जीवन की सर्वोत्तम नीति है । इसका पालन करने वाला निश्चय ही किसी भी क्षेत्र में अपना श्रेष्ठतम निर्माण कर सकने में सफल हो जाता है ।

 

मनुष्य की आत्मा ही सर्वोत्तम तत्व और उसका सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व है । आत्मा की रक्षा करना मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धर्म बताया गया है । जिसने परमात्मा के प्रधान अंश आत्मा की रक्षा कर ली, उसे अपने आचरण, व्यवहार और क्रियाओं की सत्यता द्वारा पुष्ट और बलिष्ठ बना लिया और उसे मल विक्षेप अथवा कुटिलता के कलुष से मुक्त कर उसके मूल तत्व परमात्मा की ओर उत्सुक कर दिया । उसने मानों अपना ठीक-ठीक निर्माण कर लिया। वह अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व में पूरी तरह उत्तीर्ण माना जाता है, जिसके पुरस्कार स्वरूप उसे भवसागर से पार उतार कर सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा की गोद में पहुंचा दिया जाता है ।

 

मनुष्य अपना शिल्पी आप है । वह स्वयं ही अपना निर्माण करता है । उत्कृष्ट निर्माण ही निर्माण है । आत्म-तत्व की रक्षा ही सर्वोत्कृष्ट निर्माण माना गया है । इस निर्माण के लिये मनुष्य को सत्य तथा वास्तविक नीति का अवलम्बन करना चाहिये । सत्य मानव-जीवन की सफलता के लिये सर्वोत्तम नीति है, और शिव का प्राप्ति भी इसी से संभव हैं । इसको अपनाकर चलने वाले किसी भी दिशा और किसी भी क्षेत्र में अपना स्थान बनाकर अन्त में परम पद के अधिकारी बनते हैं ।


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स्पंदन - विवेक


व्यक्ति अपने सुख और स्वार्थ के अनुसार ही प्रत्येक कार्य सोच-विचार कर करता है। सही समझ कर ही करता है। ऐसे कम लोग होते हैं जो जानबूझकर गलत कार्य करते हैं। किन्तु, आज की परिस्थिति में विशेष अन्तर आ रहा है। जहां व्यक्ति को सही और गलत का भेद ही दिखाई नहीं पड़ता। उसके चारों ओर एक वातावरण बन रहा है, जिसके अनुसार ही वह जीता है। वर्तमान शिक्षा ने उसके व्यवहार का विवेक छीन लिया है।

शिक्षा का उद्देश्य
शिक्षा का उद्देश्य ही ज्ञान है। ज्ञान विवेक का जनक है। विवेक सही-गलत में भेद करना सिखाता है। आज सब कुछ उलटा होता दिखाई पड़ रहा है। अशिक्षित तो आज भी सोच-समझकर कार्य करता है, किन्तु जिसे हम शिक्षित कह रहे हैं, वह सोचना चाहता भी नहीं, सोचना जानता भी नहीं। वस्तुत: उसका दोष नहीं है। शिक्षा जीने के लिए तो काम आती ही नहीं है। मात्र नौकरी के उद्देश्य से ली जाती है। ज्ञान से इसका वास्ता ही नहीं है। आज की शिक्षा प्रणाली में भारतीयता भी दिखाई नहीं पड़ती। हमारा दर्शन, हमारी परम्पराएं, जीवन-व्यवहार के विभिन्न पक्ष आदि सब-कुछ लुप्त हो गए हैं।

नई पीढ़ी को तो आज के वातावरण ने यहां तक प्रभावित कर दिया है कि वह भारतीय संस्कृति से दूर भागने लगी है। हर भारतीय परम्परा को वह रुढि़ कहकर एक ओर सरका देती है। जबकि पाश्चात्य संस्कृति से वह तुरन्त प्रभावित हो जाती है। सामाजिक शिक्षा का दूसरा कार्य आज टेलीविजन कर रहा है। जीवन की जो छवि टेलीविजन प्रस्तुत करता है, वह तो इतनी भयावह है कि सभी निरुत्तर हैं। टेलीविजन विज्ञापनों के जरिए एक धीमा विष दर्शकों के मानस पटल पर छोड़ता जा रहा है। नई उपभोक्ïता वस्तुओं की विभिन्न श्रेणियां आज टेलीविजन के प्रभाव से ही बाजार में छा रही हैं। बच्चा भी विज्ञापन देखकर जिद करता है, गृहिणी खरीद की सूची में नित नए परिवर्तन कर रही है। उधार पर मिलने की नई-नई नीतियों ने अग्रिम खरीद का सपना दिखाया और किस्तें बांध लीं। पूरी वेतन-राशि किस्तों में जाने लगी।

बदलती प्राथमिकताएं
जीवन-व्यवहार में आज इतने परिवर्तन आ रहे हैं कि व्यक्ïित का सोच कहीं दिखाई ही नहीं देता। उसकी प्राथमिकताएं इतनी तेजी से बदल रही हैं कि उसको इसका आभास तक नहीं होता। एक ओर वह सुख-सुविधाओं की ओर भाग रहा है, तो दूसरी ओर तैयार माल की ओर। चाहे इसके लिए उसे कितनी ही कीमत चुकानी पड़े।

अपने इसी विवेक का शिकार आज हर व्यक्ति होने लगा है। नई शिक्षा ने उसे विवेकहीन बना दिया है। वह न तो शरीर के बारे में जानता है, न प्रकृति के बारे में। न ही जीवन व्यवहार में वह दक्ष है। किताबें और टेलीविजन आज उसके एकमात्र मार्गदर्शक हैं। वह विवेक के धरातल पर पराधीन हो गया है। क्या खाना है और क्या खा रहा है उसे यह भी सही पता नहीं। उसके मन में एक इच्छा है तो विकासवादी दिखाई पडऩे की, इसीलिए सबसे पहले वह भारतीय जीवन-व्यवहार को छोड़ता है।

आज किसी शहरी बच्चे को चमड़े के जूते पहनने की बात कहो, उसे लगेगा कि वह महाभारत काल में चला जाएगा। चाहे उसके पांव से बदबू आए अथवा नेत्रज्योति घटे, उसे तो आधुनिक और भारी महंगे ‘स्पोट्र्स-शू’ ही पहनने हैं। किसी माता से कहें कि वह बच्चे की आंखों में काजल डाले, तो वह बिगड़ सकती है क्योंकि काजल आज अवैज्ञानिक और हानिकारक माना जाता है। बड़ी उम्र के लोग आज रूखी चपातियां खाते नजर आते हैं। चर्बी बढऩे का डर है। पहले बुजुर्गों के लिए अलग से घी और मेवा डालकर सर्दियों में लड्डू बनते थे, ताकि शरीर चलता रहे। जीवन के हर पहलू में विवेक आवश्यक है। हमें समय के साथ बदलना तो चाहिए, किन्तु हर चीज नहीं बदल सकती। जो शाश्ïवत है, वह शाश्ïवत ही रहेगा। आवरण और परिधि के विषय एवं उनका स्वरूप बदल सकता है। कटोरी में न खाकर चम्मच-प्लेट में खा सकते हैं लेकिन खाद्य में रूपान्तरण नहीं होगा। शाश्ïवत को बचाने और बनाए रखने का कार्य विवेकपूर्ण चिन्तन से ही सम्भव है।

स्व-विवेक से निर्णय
स्वयं का ज्ञान नहीं होने के कारण हर क्षेत्र में पराधीन होना स्वाभाविक ही है। हर छोटी-बड़ी तकलीफ में उसे डॉक्टर की शरण लेनी है क्योंकि घर में काम आने वाले नुस्खे उसे ज्ञात नहीं हैं। खान-पान की नई संस्कृति ने उसके जीवन में कितने विष घोल दिए, उसे पता ही नहीं। कितन ही नए रोग विश्ïव में प्रकट हो गए हैं फिर भी उसे तथाकथित विकासवादी दृष्ïिटकोण उसे जकड़े हुए है। उसका स्व-विवेक मानो खो गया है। जीवन में सलाहकार मिलते रहेंगे; उनकी कोई कमी नहीं है। हम हर सलाह को काम में लेने लग जाते हैं, केवल इसलिए कि हम समझ नहीं पाते कि हमारे लिए क्या उचित है। आप सलाह ले सकते हैं, निर्णय स्व-विवेक से होना चाहिए।

हम उन किताबों से प्रभावित हैं, जो हम पढ़ चुके हैं। टेलीविजन से प्रतिदिन नया प्रभाव लेकर उठते हैं। उन पर विचार करने की क्षमता हम में नहीं है। विज्ञान के नाम पर हमने अनेक नई धारणाएं विकसित कर ली हैं जो हमारे लिए हितकारी नहीं हैं। सिर्फ इसलिए कि हमारा विवेक शान्त बैठ गया है। जीवन के गुण-दोष का विवेचन हम नहीं कर पाते। हमारा आत्मविश्ïवास भी कमजोर पड़ गया है। इसीलिए नौकरी के लिए भागते हैं, व्यवसाय नहीं करना चाहते। अपने जीवन को एक ऐसे ताने-बाने में बुनकर बैठ जाते हैं, जिसको हम स्वयं नहीं समझते। हमारी पहली आवश्यकता है कि हम अपने जीवन को समझें, आवश्यकताओं का आकलन करें, सुख को भी परिभाषित करें, व्यवहार की मर्यादा का ध्यान रखें, दूसरों के प्रति संवेदनशील बनें ताकि अनुकूल-प्रतिकूल बातों का विश्ïलेषण कर सकें।

इन सबके लिए विवेक जाग्रत होना आवश्यक है। आज नई पीढ़ी को भारतीय दर्शन से जोड़े रखना भी अपने आप में बहुत बड़ा कार्य है। आखिर, हमारे देश का भविष्य इसी के साथ तो जुड़ा है।


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विचार मंथन : इधर-उधर भटकने वाले प्राणी को अंतर्मुखी रूपी शीतल वृक्ष के नीचे ही शांति मिलती है- रामकृष्ण परमहंस


अपनी दृष्टि को बाहर से हटाकर अंदर डालना चाहिए, अध्यात्म-पथ का अवलंबन लेना चाहिए । जगत् में इधर-उधर भटकने वाला प्राणी इसी शीतल वृक्ष के नीचे शांति प्राप्त कर सकता है । जब बाहर की माया रूपी वस्तुओं के भ्रम से विमुख होकर हम अंतर्मुखी होते हैं, आत्मचिंतन करते हैं, तो प्रतीत होता है कि हम अपने स्थान से बहुत दूर भटक गए थे। आवश्यकताएँ कभी पूर्ण नहीं हो सकती हैं, उन्हें जितना ही तृप्त करने का प्रयत्न किया जाएगा, उतना ही वे अग्नि में घृत डालने की तरह और अधिक बढ़ती जाएँगी ।

 

इसलिए इस छाया के पीछे दौड़ने की अपेक्षा उसकी ओर से पीठ फेरनी चाहिए और सोचना चाहिए कि हम कौड़ियों के लिए क्यों मारे-मारे फिर रहे हैं, जब कि हमारे अपने घर में भंडार भरा हुआ है। अंतर में मुँह देखने पर, परमात्मा के निकट उपस्थित होने पर, वह ताली मिल जाती है, जिससे सुख और शांति के अक्षय भंडार का दरवाजा खुलता है ।


अपनी वास्तविक स्थिति को जानने से, आत्मस्वरूप को पहचानने से, संसार के स्वरूप का सच्चा ज्ञान होने से, शांति की शीतल धारा प्रवाहित होती है, जिसके तट पर असंतोष की ज्वाला जलती हुई नहीं रह सकती। सच्चा संतोष उपलब्ध हो पर उसकी बाह्य आवश्यकताएँ बहुत ही थोड़ी रह जाती हैं और जब थोड़ा चाहने वाले को बहुत मिलता है, तो उसे बड़ा आनन्द प्राप्त होता है ।


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विचार मंथन : स्वाधीनता पाने और अन्याय से मुक्ति के लिए बिरले ही आगे आते है- गुरू गोविन्दसिंह


गुरु गोविन्दसिंह ने एक ऐसा ही नरमेध यज्ञ किया । उक्त अवसर पर उन्होंने घोषणा की-"भाइयो, देश की स्वाधीनता पाने और अन्याय से मुक्ति के लिए चण्डी बलिदान चाहती है, तुम में से जो अपना सिर दे सकता हो, वह आगे आये । गुरु गोविन्दसिंह की मांग का सामना करने का किसी में साहस नहीं हो रहा था, तभी दयाराम नामक एक युवक आगे बढ़ा । " गुरु उसे एक तरफ ले गये और तलवार चला दी, रक्त की धार बह निकली, लोग भयभीत हो उठे । तभी गुरु गोविन्दसिंह फिर सामने आये और पुकार लगाई अब कौन सिर कटाने आता है । एक-एक कर क्रमश: धर्मदास, मोहकमचन्द, हिम्मतराय तथा साहबचन्द आये और उनके शीश भी काट लिए गये । बस अब मैदान साफ था कोई आगे बढ़ने को तैयार न हुआ ।

 

गुरुगोविंद सिंह के पंचप्यारे

स्वाधीनता पाने और अन्याय से मुक्ति के लिए बिरले ही आगे आते है-
गुरु गोविन्दसिंह अब उन पाँचों को बाहर निकाल लाये । विस्मित लोगों को बताया यह तो निष्ठा और सामर्थ्य की परीक्षा थी, वस्तुत: सिर तो बकरों के काटे गये । तभी भीड़ में से हमारा बलिदान लो-हमारा भी बलिदान लो की आवाज आने लगी । गुरु ने हँसकर कहा-"यह पाँच ही तुम पाँच हजार के बराबर है । जिनमें निष्ठा और संघर्ष की शक्ति न हो उन हजारों से निष्ठावान् पाँच अच्छे?'' इतिहास जानता है इन्हीं पाँच प्यारो ने सिख संगठन को मजबूत बनाया । जो अवतार प्रकटीकरण के समय सोये नहीं रहते, परिस्थिति और प्रयोजन को पहचान कर इनके काम में लग जाते है, वे ही श्रेय-सौभाग्य के अधिकारी होते हैं, अग्रगामी कहलाते है ।


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विचार मंथन : प्रपंच की माया जादुई है, इसके सम्मोहक-आकर्षण से बिरले ही बच पाते हैं- डॉ प्रणव पंड्या


प्रपंच की माया जादुई है । इसके सम्मोहक-आकर्षण से बिरले बच पाते हैं । ज्यादातर इसमें उलझकर भ्रमित होते हैं । उन्हें पता भी नहीं चल पाता कि वे भ्रम में भटके हुए हैं । जीवन के बहुमूल्य क्षणों को खो रहे हैं, जीवन लक्ष्य से दूर हो रहे हैं । प्रपंच की मायावी मुस्कानों में, इससे उपजे हंसी ठहाकों में जीवन ठगा जाता है । जिन्दगी की उजली सम्भावनाएँ कब पतन के अंधेरों में समा जाती हैं, पता ही नहीं चलता ।


इसकी पहचान आसान नहीं है । परचर्चा से इसकी शुरुआत होती है । परनिन्दा का रस इसमें घुलने से इसके नशे का नशीलापन गाढ़ा, मायावी और जादुई बनता है । परचर्चा और परनिन्दा का घुला-मिला रूप ही प्रपंच है। इसकी मायावी चकाचौंध में सबसे पहले जीवन की विवेक दृष्टि खोती है । जीवन लक्ष्य की स्मृति विलीन होती है । फिर अनायास ही द्वेष दुर्मति एवं दुर्बुद्धि पनप जाते हैं । इसके मायावी जादू से मित्र, शत्रु नजर आते हैं और भटकाने वाले प्रपंची जन सगे-सम्बन्धी लगने लगते हैं ।


प्रपंच के अंकुर कभी भी, कहीं भी, किसी में भी फूट निकलते हैं। बस इसके विषय बीजों के लिए परचर्चा और परनिन्दा का खाद-पानी चाहिए । इसकी विषवल्लरी के उपजते, पनपते और पल्लवित होते ही व्यक्ति आत्मविमुख व ईश्वर विमुख हो जाता है । अन्तःकरण में इसके जन्मते ही ईश्वर और आत्मा केवल दो शब्द बनकर रह जाते हैं। इनका अर्थ खो जाता है । प्रपंच की इस माया में सामान्य जन ही नहीं, साधक भी उलझकर भ्रमित होते और भटकने लगते हैं ।


उनकी साधना बातों और कर्मकाण्ड तक सिमट जाती है । साधना की आकृति फलती-फूलती रहती है, पर उसकी प्रकृति के प्राण प्रंपच चूसता रहता है । इन साधकों की ऐसी स्थिति के बारे में सन्त कवियों ने कहा है- ‘ब्रह्मज्ञान बिनु बात न करहीं । परनिन्दा करि विष रस भरही ॥’ ब्रह्मज्ञान के बिना कोई बात नहीं करते, लेकिन अन्तःकरण को परनिन्दा के विष रस से भरते रहते हैं । इनका उद्धार वेदान्त वचनों को पढ़ने, सुनने और प्रवचन करने से नहीं, प्रपंच के मायापाश से छूटने में है । सन्त कवि तुलसी के वचनों में सभी के लिए सीख है- ‘परचर्चा, परनिन्दा तजि, भजुहरि’ अर्थात् परचर्चा और परनिन्दा को छोड़कर हरि को भजो । तभी प्रपंच की जादुई माया से छुटकारा मिलेगा। मोक्ष की तात्त्विक अनुभूति होगी ।


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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवसः क्या चन्द्रमा सूर्य से स्वतंत्र हो सकता है?


पश्चिम के प्रभाव में दाम्पत्य सम्बन्धों की हमारी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि धुंधली पड़ती जा रही है। भौगोलिक दृष्टि से पूर्वी प्रदेश अग्नि प्रधान तथा पश्चिमी देश सोमप्रधान क्षेत्र है। वहां के नर-नारी शरीर पर प्रकृति के प्रभाव एक समान नहीं हो सकते। एक-दूसरे की नकल के परिणाम या दुष्परिणाम भी सामने आते जा रहे हैं।

हमारी इस सृष्टि में निर्माण-स्थिति एवं संहार की प्रक्रिया सतत चलती रहती है। इस प्रक्रिया में कम से कम दो तत्त्व होते हैं द्ग ब्रह्म और माया। विज्ञान कहता है कि सृष्टि में दो तत्त्व मूल में हैं। एक पदार्थ तथा दूसरा ऊर्जा यानी मैटर और एनर्जी। दोनों एक दूसरे में बदलते रहते हैं, किन्तु इनका ह्रास नहीं होता। वेद भी ब्रह्म और माया को ही इन दो तत्त्वों के रूप में देखता है। आगे जाकर इन्हीं को अग्नि-सोम के नाम से व्यवहार किया जाता है। आकाश में ये ही सूर्य-चन्द्रमा हैं, पर्जन्य और सोम हैं, पृथ्वी और वर्षा भी यही हैं, नर-नारी भी इन्हीं का रूपान्तरित अग्नि-सोम रूप हैं। अर्थात् नर-नारी भी तत्त्व रूप हैं, मात्र देह नहीं हैं। अग्नि-सोम के इस तात्विक स्वरूप को योषा-वृषा कहते हैं।

समय के साथ नर-नारी के देह में तो कोई परिवर्तन नहीं आया, किन्तु चिन्तन और जीवन शैली में बहुत परिवर्तन आया है। यह परिवर्तन किस सीमा तक हितकर है तथा कहां जाकर विष उगलने लगता है, किसी को इसका आकलन करने का समय नहीं मिलता। सबसे बड़ी बात तो यह है कि स्त्री अपने भोग्या रूप को भी नहीं समझा पा रही और भोक्ता रूप में सफल भी नहीं हो पा रही। स्त्री (देह में) पुरुष के साथ स्वतंत्रता एवं समानाधिकार के साथ-जीने को उत्सुक है। उसे शायद स्वतंत्रता के अर्थ भी नहीं मालूम। क्या चन्द्रमा सूर्य से स्वतंत्र हो सकता है या पृथ्वी बिना वर्षा के औषधि और वनस्पति पैदा कर सकती है? इनको तो संवत्सर के तंत्र को शिरोधार्य करना ही पड़ेगा।

शरीर के साथ मन-बुद्धि-आत्मा (अध्यात्म) को भी सम्मिलित करना होगा। हम ऐसा नहीं करेंगे तो शरीरपरक मिथुन भाव तक ही सीमित रह जाएंगे। मानव देह तो पैदा कर सकेंगे, अभिमन्यु की कल्पना नहीं कर सकते। काम पुरुषार्थ की उस उदात्त अवधारणा का स्पर्श नहीं कर पाएंगे जो सृष्टि का मूल है। ‘कामस्तदगेे्र समवर्तताधि...’ अभिप्राय यह है कि जीव शरीरों के सृजन की प्रक्रिया केवल शरीर पर निर्भर नहीं है। वह दो मनों का मिलन तो है ही, दो आत्मरूपों का मिलन भी है। इसमें पिछले जन्मों के कर्मफल भी अपना प्रभाव डालते हैं। दाम्पत्य की भारतीय अवधारणा आत्मिक ही है, शारीरिक नहीं है।

पश्चिम के प्रभाव में दाम्पत्य सम्बन्धों की हमारी यह आध्यात्मिक पृष्ठभूमि धुंधली पड़ती जा रही है। भौगोलिक दृष्टि से पूर्वी प्रदेश अग्नि प्रधान तथा पश्चिमी देश सोमप्रधान क्षेत्र है। वहां के नर-नारी शरीर पर प्रकृति के प्रभाव एक समान नहीं हो सकते। एक-दूसरे की नकल के परिणाम या दुष्परिणाम भी सामने आते जा रहे हैं। विवाह-विच्छेद की बढ़ती घटनाएं, ‘लिव-इन-रिलेशन’ द्ग जैसी अवधारणाएं तथा समलैंगिकता जैसी मानसिक विकृतियां प्रकृति विरुद्ध आचरण ही तो है। इनको कानूनी मान्यता देना मानवता को पाशविक स्वच्छन्दता की ओर धकेलना ही है। परम्परागत विवाह संस्था तो आज मानो ‘आउट-डेटेड्’ हो गई। जबकि इस संस्था का वैज्ञानिक आधार सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। मनुष्य जब पशु योनि से विकास की ओर बढ़ता है, तब विवाह का स्वरूप कुछ प्राकृतिक नियमों की वैज्ञानिकता को स्वीकारता है। ऐसी किसी समाज व्यवस्था पर नहीं ठहरता जिसे हम जब चाहें बदल डालें।

शिव का विश्व रूप ही अभ्युदय है और विश्व का शिव में लीन हो जाना ही नि:श्रेयस है। पहला निर्माण काल है, दूसरा निर्वाण काल। यही शिव-शक्ति का दाम्पत्य भाव है। यही भारतीय विवाह संस्कार की मूल अवधारणा है। नारी यज्ञ में भागीदार बनकर पत्नी का स्वरूप ग्रहण करती है। यही सृष्टि निर्माण की कामना का प्रथम ‘स्पन्द’ कहलाता है। शक्ति ही कामना बनकर आहुत होती है। दाम्पत्य रति ही निर्माण की भूमि बनती है। इसी से वानप्रस्थ में देवरति का प्रादुर्भाव होता है, जो निर्वाण का मार्ग प्रशस्त करती है।

नर आग्नेय है-सत्य है, नारी सौम्या है, ऋत है। केन्द्र रहित है। कामनाघन है। अभ्युदय ही इस कामना का लक्ष्य है। नर केन्द्र में जीना चाहता है। अंशी में लीन होने को जीवन भर आतुर रहता है। दाम्पत्य भाव में नर की प्रधानता गृहस्थी को अध्यात्म से जोड़े रखती है। नारी की प्रधानता भौतिक सुखों का जाल फैलाए रखती है। मन की चंचलता, आसक्ति, राग-द्वेष आदि क्लेशों में भी उलझी ही रहती है। भीतर आत्मा उसकी भी नर ही है, किन्तु लक्ष्य भोग ही रहता है, योग नहीं रहता।

यही नारी पत्नी रूप में संकल्पित होकर पति की शक्ति बन जाती है। पति को पूर्णता प्रदान करके स्वयं भी पूर्ण हो जाती है। दोनों का अद्र्धनारीश्वर स्वरूप पूर्णता को प्राप्त होता है। समय के साथ विरक्ति भी पत्नी ही पैदा करती है। यह कार्य अन्य नारी नहीं कर सकती। इसी विरक्त भाव के कारण पूर्णता प्राप्त ‘पति’ अपने नि:श्रेयस् मार्ग का चयन कर पाता है। शक्ति ही पुरुष शरीर में सदाशिव को प्रकट कर देती है। शरीर शव, आत्मा सदाशिव।

पश्चिम में विवाह के बाद भी पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए, अर्थात् एकाकार होकर नहीं जीते। दोनों ही स्वतंत्र पहचान बनाकर जीना चाहते हैं। आगे चलकर यही चिन्तन विवाह विच्छेद का कारण बनता है। पूर्व में विवाह विच्छेद की अवधारणा शास्त्रीय तो कभी नहीं थी। आदिम जातियों में ही रही थी। यहां विवाह का उद्देश्य दोनों द्ग ‘अभ्युद और नि:श्रेयस’ रहे हैं। जीवन के 25 साल पूर्ण होने पर विवाह के साथ ही ‘गृहस्थाश्रम’ की शुरुआत होती है। नारी का पत्नी रूप में, नर के जीवन में प्रवेश होता है। वह नर के साथ जीने के लिए आती है। अपना सब कुछ छोडक़र ही आती है (नाम और पहचान भी)। नारी सौम्या है और अग्नि में पूर्णरूपेण आहुत होने आती है। फिर से माता-पिता के घर में जाकर जीना उसका स्वप्न नहीं होता।

तब जीवन के शेष 75 साल उसको पति के घर में क्या करना है? पहले तो उस घर में अपना स्वामित्व स्थापित करना है। पति को अपने वशीभूत करना है, ताकि वह हर सलाह को स्वीकार कर सके। इसके लिए पति को रिझाना उसका पहला और अनिवार्य कर्म होता है। वह पति की ‘शक्ति’ है। उसे दाम्पत्य रति-वात्सल्य, स्नेह, श्रद्धा, प्रेम का अभ्यास कराती है। उसके अग्नि प्रधान जीवन में इन गुणों का स्थान कहां हो सकता है? वह अपने माधुर्य और लालित्य के सहारे उसमें मिठास घोलने का प्रयास करती है। उसे भी स्त्रैण बनाने का प्रयास करती है। यही तो पुरुष का वह निर्माण है, जो निर्वाण की पृष्ठभूमि है। विवाह पूर्व जो व्यक्ति स्वच्छन्द था, नारी साहचर्य से अनभिज्ञ था, कोरा पत्थर था-संवेदनाहीन था, उसे कड़ुवे-मीठे बोल से पूर्णता देती है। उसके अधूरेपन की पूर्णता उसकी स्वयं की पूर्णता बन जाती है। सही अर्थों में वही नर की भोक्ता है। जीवन के 25 वर्षों में पुरुष का निर्माण ऐसे करती है कि 50 वर्ष की उम्र में पुरुष के मन में एक विरक्ति का भाव भी पैदा कर देती है। उसके जीवन के निर्माण क्रम से बाहर होकर उसे निर्वाण पथ पर खड़ा कर देती है। यहां से जीवन का तीसरा आश्रम-वानप्रस्थ शुरू हो जाता है। अब दोनों पूर्ण भी हैं और मित्र भी हैं।

वानप्रस्थ गृहस्थ कार्यों से मुक्ति का काल है। धारणा-ध्यान-समाधि-सेवा के अभ्यास का काल है। मन में विरक्ति का भाव यदि नहीं आया, तो व्यक्ति कभी वानप्रस्थ को सही रूप में सार्थक नहीं बना सकता। यह कार्य तो न स्वयं व्यक्ति ही कर सकता है, न कोई अन्य नारी ही कर सकती है। अन्य नारी तो आसक्ति ही पैदा करेगी, चंचलता पैदा करेगी। तब कहां ध्यान और कहां समाधि?

पत्नी वानप्रस्थ में पति के मन को प्राण और वाक् (सृष्टि क्रम) से हटाकर आनन्द-विज्ञान (मोक्ष साक्षी क्रम) से जोड़ती है। आध्यात्मिक दाम्पत्य रति को आधिदैविक देवरति में प्रेरित करती है। जीवन का लक्ष्य पुरुषार्थ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) ही तो है। कामनामुक्त व्यक्ति ही मोक्ष प्राप्त करता है। नारी या नर दोनों ही अकेले रहकर कामनामुक्त नहीं हो सकते। यही आज पश्चिम की मूल समस्या है। न अकेले रह सकते, न दूसरे का बनकर ही रह सकते। एक साथी से विरक्त होते ही दूसरे की तलाश शुरू हो जाती है। जीवन आहार-निद्रा-भय-मैथुन में बंधकर रह जाता है। अभ्युदय प्राप्त हो जाता है। नि:श्रेयस उनके चिन्तन का विषय ही नहीं होता। हमें इससे बचना है। दाम्पत्य सम्बन्धों की अपनी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि की उज्ज्वलता को बनाए रखना है। तभी हम विश्व को बता पाएंगे कि नारी क्या है और क्या कर सकती है?


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विचार मंथन : नारी सदैव नर्मदा नदी के समान निर्मल, पूजनीय है, क्योंकि संसार में नारी ही साक्षात् लक्ष्मी है- भगवती देवी शर्मा


जैसे नर्मदा नदी का निर्मल जल सदा निर्मल रहता है उसी प्रकार ईश्वर ने नारी को स्वभावतः निर्मल अन्तःकरण प्रदान किया है । परिस्थिति तथा संगति से दोष होने के कारण कभी-कभी उसमें भी विकार पैदा हो जाते हैं पर यदि उन कारणों को बदल दिया जाय तो नारी हृदय पुनः अपनी शाश्वत निर्मलता पर लौट आता है ।

 

रेवेव निर्मला नारी पूजनीया सदा मता ।
यतो हि सैव लोकेऽस्मिन् साक्षात्लक्ष्मी मताबुधैः ॥
अर्थात- नारी सदैव नर्मदा नदी के समान निर्मल है । वह पूजनीय है। क्योंकि संसार में वही साक्षात् लक्ष्मी है ।

 

स्फटिक मणि को रंगीन मकान में रख दिया जाय या उसके निकट कोई रंगीन पदार्थ रख दिया जाय तो वह मणि भी रंगीन छाया के कारण रंगीन ही दिखाई पड़ने लगती है। परन्तु यदि उन कारणों को हटा दिया जाय तो वह शुद्ध निर्मल एवं स्वच्छ रूप में ही दिखाई देती है । इसी प्रकार नारी जब बुरी परिस्थिति में पड़ी होती है तब वह बुरी, दोषयुक्त दिखाई पड़ती है परन्तु जैसे ही उस परिस्थिति का अन्त होता है वैसे ही वह निर्मल एवं निर्दोष हो जाती है ।

 

नारी लक्ष्मी का साक्षात अवतार है। भगवान् मनु का कथन पूर्ण सत्य है कि जहाँ नारी का सम्मान होता है वहाँ देवता निवास करते हैं अर्थात् सुख शान्ति के समस्त उपकरण उपस्थित रहते हैं । सम्मानित एवं सन्तुष्ट नारी अनेक सुविधाओं तथा सुव्यवस्थाओं का केन्द्र बन जाती है । उसके साथ गरीबी में भी अमीरी का आनन्द बरसता है। धन दौलत निर्जीव लक्ष्मी है । किन्तु स्त्री तो लक्ष्मी जी की सजीव प्रतिमा है उसके प्रति समुचित आदर का, सहयोग का एवं सन्तुष्ट रखने का सदैव ध्यान रखा जाना चाहिए ।

 

नारी में नर की अपेक्षा सहृदयता, दयालुता, उदारता, सेवा, परमार्थ एवं पवित्रता की भावना अत्यधिक है। उसका कार्यक्षेत्र संकुचित करके घर तक ही सीमाबद्ध कर देने के कारण ही संसार में स्वार्थपरता, हिंसा, निष्ठुरता, अनीति एवं विलासिता की बाढ़ आई हुई है। यदि राष्ट्रों का सामाजिक और राजनैतिक नेतृत्व नारी के हाथ में हो तो उसका मातृ हृदय अपने सौंदर्य के कारण सर्वत्र सुख शान्ति की स्थापना कर दे ।
राम हमारे घरों में आये, इसके लिए कौशल्या की जरूरत है । कृष्ण का अवतार देवकी की कोख ही कर सकती है । कर्ण, अर्जुन और भीम के पुनः दर्शन करने हों तो कुंती तैयार करनी पड़ेगी । हनुमान चाहिये तो अंजनी तलाश करनी होगी । अभिमन्यु का निर्माण कोई सुभद्रा ही कर सकती है । शिवाजी की आवश्यकता हो तो जीजाबाई का अस्तित्व पहले होना चाहिये ।

 

यदि इस ओर से आँखें बंद कर ली गई और भारतीय नारी को जिस प्रकार अविद्या और अनुभव हीनता की स्थिति में रहने को विवश किया गया है, उसी तरह आगे भी रखा गया हो आगामी पीढ़ियाँ और भी अधिक मूर्खता उद्दंडता लिए युग आवेगी और हमारे घरों की परिपाटी को नरक बना देंगी । परिवारों से ही समाज बनता है फिर सारा समाज और भी घटिया लोगों से भरा होने के कारण अब से भी अधिक पतनोन्मुखी हो जायेगा ।


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विचार मंथन : एक खूबसूरत सोच से नकारात्मकता का वातावरण भी तुरंत सकारात्मकता में बदल जाता है- सेन्ट पॉल


मात्र कुढ़ते रहने से, चिन्ता की चादर ओढ़कर निष्क्रिय हो जाने से और मन ही मन कुड़ बुड़ाते रहने से किसी को रत्ती भर लाभ न तो कभी हुआ है न कभी आगे होने वाला है । इसलिए ऐ परमेश्वर के प्यारे पुत्रों! जिन्दा ही मर जाने की बजाय तुम मरकर भी जीवित बने रहने की विद्या का अभ्यास करो । निष्क्रियता की घुटन का घेरा तोड़कर उत्फुल्ल क्रियाशीलता की खुली हवा में साँस लेना सीखों ।

 

रेशम का कीड़ा अपना कोया खुद बुनता है और फिर उसी में घुटकर मर जाता है । घुटन की छटपटाहट से उबरने के लिए वह भी शायद हमारी ही तरह कभी विधाता, कभी व्यवस्था और कभी पड़ौसी को कोसता होगा । हमारे मन रूपी कीड़े को भी अपने ही बनाये कोयों की कैद में बंधना-घुटन पड़ता है ।


‘कोयाबन्दी’ की निष्क्रियता के अँधेरे बंद तहखानों से निकलकर ऊपर आओ, ‘मानसिक कालकोठरी’ के वातायनों को सूर्य की ऊष्मा और स्वच्छ सुरभित पवन का स्वागत करने दो । तुम्हारे कुस्वास्थ्य का यही एक मात्र निदान है ।

 

जाओ और यही संदेश अपने संपर्क में आने वाले जन-जन तक पहुंचाओ ताकि जहाँ-जहाँ भी किसी प्रकार की बुराई हो उसे दूर करने में अपनी-अपनी सीमा और शक्ति भर वे सक्रिय सहयोग दे सकें । उनकी समस्त सामर्थ्य केवल हवा के साथ लड़ने में ही व्यर्थ न चली जाये । एक खूबसूरत सोच से नकारात्मकता का वातावरण भी तुरंत सकारात्मकता में परिवर्तन होता है ।


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विचार मंथन : अहंकार के चलते हमेशा प्रेम का ही अंत होता है- चैतन्य महाप्रभु


भावनाओं का समुह

काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, प्रेम, अहंकार आदि सभी भावनाएं एक साथ एक द्वीप पर रहती थी । एक दिन समुद्र में एक तूफान आया और द्वीप डूबने लगा हर भावना डर गई और अपने अपने बचाव का रास्ता ढूंढने लगी । लेकिन प्रेम ने सभी को बचाने के लिए एक नाव बनायी सभी भावनाओं ने प्रेम का आभार जताते हुए शीघ्रातिशीघ्र नाव में बैठने का प्रयास किया प्रेम ने अपनी मीठी नज़र से सभी को देखा कोई छूट न जाये । सभी भावनाएँ तो नाव मे सवार थी लेकिन अहंकार कहीं नज़र नहीं आया प्रेम ने खोजा तो पाया कि, अहंकार नीचे ही था... नीचे जाकर प्रेम ने अहंकार को ऊपर लाने की बहुत कोशिश की, लेकिन अहंकार नहीं माना ।

 

ऊपर सभी भावनाएं प्रेम को पुकार रहीं थी,"जल्दी आओ प्रेम तूफान तेज़ हो रहा है, यह द्वीप तो निश्चय ही डूबेगा और इसके साथ साथ हम सभी की भी यंही जल समाधि बन जाएगी । प्लीज़ जल्दी करो" प्रेम ने कहा "अरे अहंकार को लाने की कोशिश कर रहा हूँ यदि तूफान तेज़ हो जाय तो तुम सभी निकल लेना । मैं तो अहंकार को लेकर ही निकलूँगा" प्रेम ने नीचे से ही जवाब दिया और फिर से अहंकार को मनाने की कोशिश करने लगा लेकिन अहंकार कब मानने वाला था यहां तक कि वह अपनी जगह से हिला ही नहीं ।

 

अब सभी भावनाओं ने एक बार फिर प्रेम को समझाया कि अहंकार को जाने दो क्योंकि वह सदा से जिद्दी रहा है लेकिन प्रेम ने आशा जताई,बोला, "मैं अहंकार को समझाकर राजी कर लूंगा तभी आऊगा । तभी अचानक तूफान तेज हो गया और नाव आगे बढ़ गई अन्य सभी भावनाएं तो जीवित रह गईं, लेकिन...अन्त में उस अहंकार के कारण प्रेम मर गया, अहंकार के चलते हमेशा प्रेम का ही अंत होता है । इसलिए ये सत्य बात है कि प्रेम से सबकुछ संभव हैं । हमेशा ध्या रखों की अहंकार का त्याग करते हुए प्रेम को अपने से एक पल के लिए भी जुदा न होने दें ।


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विचार मंथन : भगवान शिव आध्यात्मिक आदर्श के मूर्तिमान देवता हैं- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


भारतीय संस्कृति में देवताओं की विचित्र कल्पनायें की गई हैं । उनकी मुखाकृति, वेष-विन्यास रहन-सहन, वाहन आदि के ऐसे विचित्र कथानक जोड़कर तैयार किये गये हैं कि उन्हें पढ़कर यह अनुमान करना भी कठिन हो जाता है कि वस्तुतः कोई ऐसे देवी देवता हैं भी अथवा नहीं? चार मुख के ब्रह्माजी, पंचमुख महादेव, षट्मुख कार्तिकेय, हाथी की सूंड़ वाले श्री गणेशजी, पूंछ वाले हनुमानजी—यह सब विचित्र-सी कल्पनायें हैं, जिन पर मनुष्य की सीधी पहुंच नहीं हो पाती उसे या तो श्रद्धावश देवताओं को सिर झुकाकर चुप रह जाना पड़ता है या फिर तर्कबुद्धि से ऐसी विचित्रताओं का खण्डन कर यही मान लेना पड़ता है कि ऐसे देवताओं का वस्तुतः कहीं कोई अस्तित्व नहीं है ।

 

पौराणिक देवी-देवताओं के वर्णन मिलते हैं उन पर गम्भीरतापूर्वक विचार करें तो पता चलता है कि इन विचित्रताओं के पीछे बड़ा समुन्नत आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है । मानव-जीवन के किन्हीं उच्च आदर्शों और स्थितियों का इस तरह बड़ा ही कलापूर्ण दिग्दर्शन किया है, जिसका अवगाहन करने मात्र से मनुष्य दुस्तर साधनाओं का फल प्राप्त कर मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकता है ।

 

इस प्रकार के आदर्श आदिकाल से मनुष्य को आकर्षित करते रहे हैं । मनुष्य उनकी उपासना करता रहा है और जाने अनजाने भी इन आध्यात्मिक लाभों से लाभान्वित होता रहा है । इन्हें एक प्रकार से व्यावहारिक जीवन की मूर्तिमान् उपलब्धियां कहना चाहिए । उसे जीवन क्रम में इतना सरल और सुबोधगम्य बना देने में भारतीय आचार्यों की सूक्ष्म बुद्धि का उपकार ही माना चाहिए, जिन्होंने बहुत थोड़े में सत्य और जीवन-लक्ष्य की उन्मुक्त अवस्थाओं का ज्ञान उपलब्ध करा दिया है ।

 

शैव और वैष्णव यह दो आदर्श भी उन्हीं में से है । शिव और विष्णु दोनों आध्यात्मिक जीवन के किन्हीं उच्च आदर्शों के प्रतीक हैं । इन दोनों में मौलिक अन्तर इतना ही है कि शिव आध्यात्मिक जीवन को प्रमुख मानते हैं । उनकी दृष्टि में लौकिक सम्पत्ति का मूल्य नहीं है, वैराग्य ही सब कुछ है जब कि विष्णु जीवन के लौकिक आनन्द का भी परित्याग नहीं करते । यहां हमारा उद्देश्य इन दोनों स्थितियों में तुलना या श्रेष्ठता के आधार ढूंढ़ना नहीं है । शिव के आध्यात्मिक रहस्यों का ज्ञान करना अभीष्ट है ताकि लोग इस महत्व का भली भांति अवगाहन कर अपना जीवन लक्ष्य सरलतापूर्वक साध सकें ।

 

शिव का आकार *लिंगाकार माना जाता है । उसका अर्थ यह है कि यह सृष्टि साकार होते हुए भी उसका आधार आत्मा है । ज्ञान की दृष्टि से उसके भौतिक सौन्दर्य का कोई बड़ा महत्व नहीं है । मनुष्य को आत्मा की उपासना करानी चाहिए, उसी का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । सांसारिक रूप सौन्दर्य और विविधता में घसीटकर उस मौलिक सौन्दर्य को तिरोहित नहीं करना चाहिये ।


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समर्पित करें अहंकार!


अग्रि-सोम-इन्द्र तीनों त्रिलोकी के अधिपति हैं। तीनों मिलकर- ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र - प्राणी मात्र का अन्तरात्मा महेश्वर है। यही रुद्र है - एक घोर रूप, एक शिव रूप। यही सूर्य का जनक है। तत्व रूप में प्रत्येक शरीर में निवास करता है। इन्द्र की प्रधानता से यह महेश्वर, सोम की प्रधानता से महादेव तथा अग्नि की प्रधानता से रुद्र है। सोम रूप महान् ने वायु रूप ओज भर दिया इन्द्र में, सूर्य में ज्योति को पैदा किया। सूर्य ही जगत् का पिता कहलवाया। अध्यात्मभाव में इन्द्र का अंश सूर्य से निकलकर बुद्धि के रूप में विज्ञान आत्मा बनता है। तीन अक्षर प्राणों के योग से त्रिनेत्र या त्र्यंबक बनते हुए हृदय रूप (हृ-इन्द्र, द-विष्णु, य-ब्रह्मा) बनते हैं। पुराणों में इन्द्र को महेश कहा गया है। ‘‘अग्रिर्वा रुद्रस्तस्य द्वे तन्वौ घोरान्या च शिवान्या च’’। यही सूर्य रूप तपते हैं। अग्रि-इन्द्र-वरुण रूप कार्य करते हैं। सूर्य का ही नाम सत्यनारायण (विष्णु) है। विष्णु ही यज्ञ कहलाते हैं।

सूर्य ही शिव है। चारों ओर जल समुद्र है। किरणें ही केश हैं और उनका जल ही इनको गंगाधर बनाता है। ललाट पर चन्द्रमा है, तो यह चन्द्रशेखर हैं। घोर अग्रि के द्वारा की गई जितनी भी खराबी है उसको सोम रूप से शान्त कर देता है। अत: शिव, शंकर, शंभु कहलाता है।

सूर्य प्रतिबम्ब से महत् में जीव की अहंकृति बनती है। अत: शिव को अहंकार का अधिष्ठाता कहा जाता है। चन्द्रमा तथा पृथ्वी के प्रतिबिम्ब से क्रमश: प्रकृति और आकृति बनती है। अहंकार ही बुद्धि का जनक है, जो तापधर्मा है, उष्ण है। सृष्टि कर्म में प्रकृति अहंकार - अभिमान रूप में ही कर्म करने की, फल प्राप्त करने की कामना पैदा करती है। कर्म करना तो हमारे हाथ है, फल हम पैदा कर नहीं सकते। कामना पूर्ण नहीं हो तब आवेश या क्रोध आता है। क्योंकि मन में स्वयं को सर्वोपरि मान बैठता है। कृष्ण कहते हैं कि कर्ता मत बनो। अहंकार एक ओर ठेस लगाता है, धैर्य और धृति कम करता है, प्रमाद बढ़ाता है। जीवन को भारभूत कर देता है। जीवन की मूच्र्छा है। इसी को बुद्धिनाश, विवेकशून्यता अथवा बुद्धि का आत्मयोग से वंचित हो जाना कहते हैं। बुद्धि भी तो उसी अहंकार से पैदा होती है। अहंकार से कर्ता का मिथ्या भाव जीव के चित्त में स्थान बना लेता है। उसका आत्मभाव सुप्त हो जाता है। व्यक्ति बाहरी विश्व में लीन हो जाता है।

भौतिक जीवन का लक्ष्य भोग है, आध्यात्मिक साधनों का लक्ष्य मोक्ष है। यही हमारे मन की दो धाराएं हैं। मन ही किसी धारा में फैलता है, वही सिकुड़ता है। अहंकार ही पतन की शुरुआत है। अहंकारी किसी दूसरे को नहीं, स्वयं को खत्म कर लेता है। अहंकार का कोप पीढिय़ों को भोगना पड़ता है। अहंकार ही व्यक्ति को रावण बनाता है। शिव से प्राप्त शक्ति के अहंकार से ग्रस्त होकर कैलाश पर्वत को उठाने चला था। शिव से वर प्राप्त करके भस्मासुर शिव को ही भस्म करने दौड़ पड़ा था। वैसे ही आज जनता जनार्दन से शक्ति प्राप्त करके जनप्रतिनिधि जनता को ही छीलने में जुट जाते हैं। भगवान के संहार करने का यह भी एक स्वरूप है। इससे मुक्त भी वे ही कर सकते हैं। वे ही अग्रि-सोम अद्र्धनारीश्वर हैं, सृष्टि स्वरूप हैं। सम्पूर्ण सृष्टि शिव रूप है, शिवमय है। चूंकि सूर्य ही आशुतोष है, अत: प्रतिदिन शिवरूपी सूर्य का ही पूजन किया जाता है। चूंकि अहंकार एक शक्तिशाली अभिव्यक्ति है। अत: इससे मुक्त होने के लिए श्रम के साथ तप की भी आवश्यकता होती है। स्वयं सूर्यनारायण निरंतर तपते हैं। नए स्वरूप को (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक) प्राप्त करने के लिए भीतर जगह बनानी पड़ती है। प्राणों को बाहर प्रतिष्ठित करना, अपने प्राणों का समर्पण करना ही तप है।

हमें स्वयं को रिक्त करना है उन सभी उपाधियों से जो अन्य लोग हमें देते हैं - नाम, धर्म, प्रशंसा, धन, ज्ञान, यश आदि। ‘मैं’ का समर्पण बिना दृढ़ संकल्प के, तपन के संभव नहीं है। महाशिवरात्रि पर्व इसी संकल्प को दोहराने, आत्मशुद्धि करके भीतर शिव रूप में स्वयं को प्रतिष्ठित करने का पर्व है। आइए! हम सब मिलकर शिव (सूर्य) से प्रार्थना करें कि ‘जो मन जागते हुए मनुष्य से बहुत दूर तक चला जाता है, वही द्युतिमान मन सुषुप्ति अवस्था में सोते हुए मनुष्य के समीप आकर लीन हो जाता है तथा जो दूर तक जाने वाला और जो प्रकाशमान श्रोत्र आदि इन्द्रियों को ज्योति देने वाला है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।’

यज्जाग्ग्रतो दूरमुदैतिदैवन्तदुसुप्प्तस्यतथैवैति।।
दूरङ्गमञ्ज्योतिषाञ्ज्योतिरेकन्तन्न्मेमन शिवसङ्कल्प्पमस्तु।।

‘‘कर्मानुष्ठान में तत्पर बुद्धिसम्पन्न मेधावी पुरुष यज्ञ में जिस मन से शुभ कर्मों को करते हैं, प्रजाओं के शरीर में और यज्ञीय पदार्थों के ज्ञान में जो मन अद्भुत पूज्य भाव से स्थित है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्पवान् हो।’’

येनकर्म्माण्यपसोमनीषिणोयज्ञेकृण्वन्तिव्विदथेषुधीरा:।।
यदपूव्र्वंय्यक्षमन्त: प्प्रजानान्तन्न्मेमन शिवसङ्कल्प्पमस्तु।।६।।

आज देश को शिव रूप कल्याणकारी संकल्प की अत्यन्त आवश्यकता है। चारों ओर अहंकार, अपराध, अनर्गल-मर्यादाहीन आचरण के प्रकोप बढ़ रहे हैं। लंका किसी को जलती हुई दिखाई नहीं पड़ रही। बिना आध्यात्मिक धरातल के प्रज्ञा शून्य हो रहा है शिक्षित वर्ग भी। सींचने का कार्य, निर्माण कार्य शीतलता से, प्रेम की आहुति से, प्राणों की तपन से होता है। शिव से आज संकल्प की दृढ़ता मांगें! नमो शिवाय:!


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स्पंदन - मन


मन प्रतिपल पैदा होता रहता है, मरता रहता है। मन इच्छा से पैदा होता है। इच्छा मन का बीज रूप है। इच्छा पूर्ण होते ही मन भर जाता है। शुद्ध मन आत्मा-स्वरूप है जो सब प्राणियों में एक-सा होता है। जिस मन का हमें आभास होता है, वह त्रिगुण के आवरण में ढका हुआ मन है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य इस आवरण को हटाकर शुद्ध मन को समझना ही है। इसे ब्रह्म स्वरूप कह सकते हैं।

ध्यान के मार्ग
त्रिगुण माया का स्वरूप है। प्रकृति है। सृष्टि का व्यवहार है। इसके चंगुल से निकलने के लिए इसको समझना पड़ेगा। जीवन व्यवहार में मन की चंचलता का आधार भी माया ही है। मन, प्राण और वाक् अविनाभाव में साथ रहते हैं। मन के धरातल तक पहुंचने के लिए वाक् का आधार और प्राणों का प्रणनन चाहिए। शरीर और बुद्धि को मन की ओर मोडऩा होगा। अवधान, धारणा और ध्यान इसके मार्ग हैं। मन को किसी वस्तु अथवा विषय की ओर आकर्षित करना अवधान है। विषय पर एकाग्र होने को धारणा कहते हैं। एकाग्रता की निरन्तरता ही ध्यान है जो समाधि में बदल जाती है।

प्रश्न आता है कि अवधान किसका करें? एकाग्रता का विषय क्या हो? मन की क्षमताओं को समझकर उन्हें विकसित करना ही इसका लक्ष्य होना चाहिए। क्योंकि मन में उठने वाली इच्छाओं को समझना और उनका बुद्धि से नियंत्रण करना ही इसका उद्देश्य होना चाहिए। मन इन्द्रियों का राजा है। हर इन्द्रिय से होने वाले सभी अनुभव मन तक पहुंचते हैं। यह अनुभव बाह्य सृष्टि के भी हो सकते हैं और भीतर के भी। मन विषय को कितना पकड़ पाता है, कितनी देर तक पकड़ पाता है, यह उसकी क्षमता पर निर्भर है। एक बार में एक विषय पर टिकता है अथवा अनेक विषयों पर कार्य कर सकता है, यह उसकी एक क्षमता है। एक चावल को देखकर पूरे का अनुमान लगा ले, यह भी उसकी क्षमता पर निर्भर करता है। सम्प्रेषण की शक्ति उसकी सबसे बड़ी क्षमता है। सम्प्रेषण में स्थान की दूरी तथा मध्य के जो अवरोध बाधक होते हैं वे उसके समाप्त हो जाते हैं। यह मन की बहुत बड़ी क्षमता है। दूरियों को समेट कर चलना भी मन की क्षमता है। आप कितनी भी दूर बैठे व्यक्ति तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं। मन का आत्मोन्मुखी होना इसकी प्राकृतिक क्षमता है। मूल स्वरूप है-जहां से पैदा हुआ, वहीं समा जाना। शरीर और इन्द्रियों को स्वयं में समेटते हुए अन्तर्मुखी हो जाना।

मन को समझना
इस जगत् में हम जीते हैं, केवल मन की इच्छाओं को पूरा करने के लिए। शरीर और बुद्धि उपकरण की तरह इसमें सहायक होते हैं। मन हमारी भावनाओं का धरातल है। सुख और दु:ख की अनुभूति का धरातल है। आदान-प्रदान का धरातल है। जीवन व्यवहार में तो मन ही सब का धरातल है। हमें इस मन को समझना है, इसमें उठने वाली तरंगों को देखना है, उन्हें शान्त करना है। तभी तो हम शान्त होंगे। मन तो विकल्पों का केन्द्र है। जब भी किसी विषय पर एकाग्र होने का प्रयास करते हैं, तो अनेक व्यवधान आने लगते हैं। मन एक विषय पर टिकता ही नहीं। जीवन विकास के लिए आवश्यक है-मन की क्षमताओं का विकास, नियंत्रण का विकास।

हम एक आसन में बैठें, शान्त जगह पर। शरीर को ढीला छोड़ दें। लम्बा श्वास लें और श्वास को देखें। कुछ क्षण रोककर भीतर की हलचल को भी देखें। श्वास छोड़ें और श्वास को ही देखते रहें। विचारों के विकल्प उठेंगे, आप चिन्ता न करें, किसी भी विचार को रोकने का प्रयास न करें। कई प्रकार के चित्र उभरेंगे, उन्हें आने दें, जाने दें। रोकने का प्रयास न करें। धीरे-धीरे श्वास पर ध्यान केन्द्रित करने का अभ्यास बढ़ाते जाएं। विचारों का क्रम अपने आप टूटने लगेगा।


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विचार मंथन : व्यर्थ की कल्पनाओं में विचरण करने से युवा शक्ति बचे- प्रज्ञा पुराण


स्वप्न का राजा

एक युवक ने स्वप्न देखा कि वह किसी बड़े राज्य का राजा हो गया है । स्वप्न में मिली इस आकस्मिक विभूति के कारण उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा । प्रात:काल पिता ने काम पर चलने को कहा, माँ ने लकडियाँ लाने की आज्ञा दी, धर्मपत्नी ने बाजार से सौदा लाने का आग्रह किया, पर युवक ने कोई भी काम न कर एक ही उत्तर दिया- 'मैं राजा हूँ, मैं कोई भी काम कैसे कर सकता हूँ?'

 

घर वाले बड़े हैरान थे, आखिर किया क्या जाये? तब कमान सम्भाली उसकी छोटी ***** ने । एक- एक कर उसने सबको बुलाकर चौके में भोजन करा दिया, अकेले खयाली महाराज ही बैठे के बैठे रह गये । शाम हो गई, भूख से आँतें कुलबुलाने लगीं । आखिर जब रहा नहीं गया तो उसने बहन से कहा- 'क्यों री! मुझे खाना नहीं देगी क्या?' बालिका ने मुँह बनाते कहा- राजाधिराज! रात आने दीजिए, परियाँ आकाश से उतरेंगी तथा वही आपके लिए उपयुक्त भोजन प्रस्तुत करेंगी । हमारे रूखे- सूखे भोजन से आपको सन्तोष कहाँ होगा?'

 

व्यर्थ की कल्पनाओं में विचरण करने वाले युवक ने हार मानी और शाश्वत और सनातन सत्य को प्राप्त करने का, श्रमशील बनकर पुरुषार्थरत होने का, वचन देने पर ही भोजन पाने का अधिकारी बन सका । ऐसे लोगों की स्थिति वैसी ही होती है, जिनका कबीर ने अपनी ही शैली में वर्णन किया है-

ज्यों तिल माही तेल है, ज्यों चकमक में आग ।
तेरा साँई तुझ में, जागि सके तो जाग ॥
ज्यों नैनों में पूतली, त्यों मालिक सर मांय ।
मूर्ख लोग ना जानिये, बाहर ढूँढ़न जाँय ॥


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