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समय से पहले जवान होने वाले बच्चों का रिजल्ट आता है खराब, जानिए क्यों


आपने अपने दैनिक जीवन में कही ऐसे बच्चे देखे होंगे जिनकी हकीकत में उम्र बहुत कम होती है लेकिन देखने में वे काफी जवान नजर आते है। ऐसा प्राकृतिक रूप से नहीं होता बल्कि एक हार्मोन की वजह से होता है। युवावस्था में प्यूबर्टी (यौवन से संबंधित) हॉर्मोन सीखने की क्षमता को में बाधा डालते है। शोधकर्ताओं के अनुसार ये हार्मोन मस्तिष्क के एक विशेष हिस्से को प्रभावित करते है। 

इस संबंध में किए गए शोध का प्रमुख हिस्सा रही बार्कले स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की एसोसिएट प्रोफेसर व लेखक लिंडा विलब्रेख्त ने कहा, हमने पाया है कि यौवन से संबंधित हॉर्मोन मस्तिष्क के फ्रंटल कॉर्टेक्स के लिए एक 'स्वीच' की तरह काम करता है, जो सीखने की क्षमता में रुकावट का काम करता है। विलब्रेख्त ने कहा, ऐसा देखने में आया है कि आधुनिक शहरी परिवेश में लड़कियां तनाव और मोटापे की समस्या के कारण समय से पहले जवान हो रही हैं, जो स्कूलों में उनके खराब प्रदर्शन का कारण बनता जा रहा है। 

शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में चुहिया में जब प्यूबर्टी से संबंधित हॉर्मोन इंजेक्ट किया गया, तो उन्होंने उनके फ्रंटल कॉर्टेक्स के तंत्रिका संचार में महत्वपूर्ण बदलाव देखा। ये बदलाव फ्रंटल मस्तिष्क में हुए, जो सीखने, ध्यान देने तथा स्वभाव के नियंत्रण से जुड़े है। अध्ययन का नेतृत्व करने वाले लेखक डेविड पाइकस्र्की ने कहा, हमारी जानकारी में यह पहला अध्ययन है, जो यह दर्शाने में कामयाब हुआ है कि यौवन से संबंधित हॉर्मोन कॉर्टेक्स के तंत्रिका संचार में बदलाव लाते हैं। बता दें यह अध्ययन पत्रिका 'करेंट बायोलॉजी' में प्रकाशित हुआ है।

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पढ़ाई में अगर आपका बच्चा है कमजोर तो उसे खिलाएं ये चीज


हर मां-बाप का यह सपना होता है कि उसका बच्चा पढ़ाई में होशियार हो और उसका दिमाग तेज हो। लेकिन यदि किसी का बच्चा पढऩे में कमजोर है, उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता है तो ऐसे माता-पिता का चिंता करने की जरूरत नहीं है। हाल ही में एक अध्ययन में यह बात पता चली है कि स्कूली बच्चों को ओमेगा-3 की खुराक देने से उनका पढ़ाई में अच्छी तरह से मन लगता है। साथ ही उनकी याददाश्ता भी बढ़ती है। 

ओमेगा-3 को मछली के तेल (वसा अम्ल), समुद्री भोजन और कुछ कवक द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। ओमेगा-3 के सेवन से स्कूली बच्चों के पढऩे के स्तर में सुधार होता है। अध्ययन में बताया गया कि यदि इन इन वसा अम्लों की खुराक देकर पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहे बच्चों की मदद की जा सकती हैं। स्वीडन के गोटेबर्ग विश्वविद्यालय के सालग्रेनस्का एकेडमी के मैट्स जानसन का कहना है कि बच्चों को इस खास तरह के आहार से मदद मिलेगी।  

आपको बता दें यह अध्ययन स्वीडेन में तीसरी श्रेणी के नौ और दस साल के 154 स्कूली बच्चों पर किया गया था। अध्ययन के दौरान स्कूली बच्चों की एक कंप्यूटर आधारित परीक्षा (लोगोस परीक्षण) ली गई। इसमें उनके कई तरह के पढऩे के तरीके, पढऩे की गति, निर्थक शब्द और शब्दावली के पढऩे की क्षमता की की माप की गई। इस दौरान बच्चों को तीन महीने तक ओमेगा-3 और ओमेगा-6 के कैप्सूल या एक तरह के पॉम आयल वाले कैप्सूल दिए गए।

अध्ययन में यह सामने आया कि पॉम आयल कैप्सूल वाले बच्चों की तुलना में वसा अम्लों के प्रयोग वाले बच्चों में पढऩे के तरीके में अधिक सुधार हुआ है। इनमें निर्थक शब्दों को भी सही तरीके उच्चारण करने की क्षमता आई और शब्दों को सही क्रम में तेजी से पढऩे में भी सुधार हुआ।

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क्या आपके बच्चे आपकी नहीं सुनते, आजमाएं ये तरीका


इन दिनों ज्यादातर अभिभावकों की यह शिकायत रहती है कि उनके बच्चे उनकी बात नहीं सुनते। उनसे कुछ भी कहो वे नजरअंदाज कर देते हैं और जिस काम में लगे हो उसी में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में उनके सामने लाउडस्पीकर लेकर भी कुछ कहा जाए तो भी उनकी प्रतिक्रिया में ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। हालांकि वैज्ञनिकों का मानना है कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है। उनकी यह क्षमता दरअसल मस्तिष्क के विकास प्रक्रिया का अंग है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चे जानबूझकर ऐसा नहीं करते। वो एक तरह की उपेक्षात्मक दृष्टिबाध्यता से गुज़र रहे होते हैं। यह उपेक्षात्मक दृष्टिबाध्यता, मूलतः देखने और नज़र डालने, सुनने और जो कहा गया है उस पर ध्यान देने के बीच का फ़र्क़ है। इसका परिणाम होता है जागरूकता का अभाव, ख़ासकर उन चीजों के बारे में जो तात्कालिक ध्यान में न हो।

बच्चों और बड़ों में फ़र्क़

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ़ कॉग्निटिव न्यूरोसाइंस की प्रोफ़ेसर निली लेवी के अनुसार बच्चे वयस्कों की तुलना में अपने आसपास की जानकारियों के प्रति कम जागरूक होते हैं। प्रोफ़ेसर लेवी के अनुसार - अभिभावकों और देखरेख करने वालों को यह समझना होगा कि किसी मामूली सी चीज़ पर ध्यान केंद्रित करने से भी बच्चे वयस्कों की तुलना में अपने आसपास के परिवेश से ज़्यादा कट जाते हैं।

वह बताती हैं - जैसे, कोई बच्चा अपने कोट के बटन बंद करते हुए सड़क पार करते समय दूसरी तरफ़ से आती हुई गाड़ियों पर शायद ध्यान नहीं दे पाए लेकिन वयस्क आसानी से ऐसा कर पाते हैं। जिस चीज़ पर आपका ध्यान हो उसके अलावा आसपास के परिवेश पर ध्यान देने की योग्यता उम्र के साथ विकसित होती है।

बच्चों की इस प्रवृत्ति के कई बार ख़तरनाक नतीजे भी हो सकते हैं। जैसे अगर मोबाइल पर मैसेज करते समय कोई बच्चा सड़क पार कर रहा हो तो यह उसके लिए ज़्यादा ख़तरनाक हो सकता है। लेकिन बच्चों की इस उपेक्षात्मक दृष्टिबाध्यता का फ़ायदा भी होता है। आख़िर कौन चाहता है कि हर बात पर उसका ध्यान बंटे? अपने परिवेश के प्रति अनभिज्ञ रहने से हमारी एकाग्रता और ध्यान बेहतर होता है।

ज़रूरी है एकाग्रता

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हर किसी में एक हद तक एकाग्रता की एक निश्चित क्षमता ही होती है और जब हम कोई महत्वाकांक्षी कार्य कर रहे होते हैं तो हमें एकाग्रता की बहुत ज़्यादा ज़रूरत होती है। प्रोफ़ेसर लेवी कहती हैं - दिमाग़ का बड़ा हिस्सा इसके लिए समर्पित रहता है। यह बेहद कठिन कार्य है। हम उन चीजों पर तवज्जो नहीं देना चाहते जो महत्वपूर्ण न हों। लेवी कहती हैं - इसके लिए आपको उपेक्षात्मक दृष्टिबाध्यता की ज़रूरत होती है, वरना आप एकाग्रता नहीं बना पाएँगे और ऐसे में दुनिया में जीना मुश्किल हो जाएगा। लेवी कहती हैं कि दिमाग़ हमारे अंदर यह भ्रम पैदा करता है कि वो हर समय हर चीज़ पर नज़र रखे हुए है। और जब हम किसी बहुत ज़ाहिर सी बात पर ध्यान नहीं दे पाते तो आश्चर्यचकित हो जाते हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ हर्टफोर्डशायर में मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर रिचर्ड वाइज़मैन ने मनुष्य की दृष्टि क्षमता का विस्तृत अध्ययन किया है। उनके अनुसार यह काफ़ी जटिल चीज़ है। प्रोफ़ेसर वाइज़मैन प्रचलित 'सेलेक्टिव अटेंशन टेस्ट' में संशोधन करके इसका प्रयोग करते हैं। इस टेस्ट का विकास डेनियल साइमंस ने किया था। इस टेस्ट में दिखाया जाता है कि एक वीडियो में दिखने वाले एक गोरिल्ला की अनदेखी कर जाना कितना आसान है।

बच्चे और एकाग्रता

प्रोफ़ेसर वाइज़मैन कहते हैं कि रचनात्मक लोग दूसरों के मुक़ाबले चीजों पर ज़्यादा ध्यान दे पाते हैं। वहीं जो लोग काम को लेकर उत्तेजित या परेशान रहते हैं उनके कमरे में मौजूद गोरिल्ला (एक मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण के दौरान) पर ध्यान की संभावना काफ़ी कम होती है। वे कहते हैं सामान्य जीवन में हम कई बार बेहद जाहिर सी बात पर ध्यान नहीं दे पाते क्योंकि हमारा ध्यान उस वक़्त कहीं और पूरी तरह एकाग्र होता है। उदाहरणस्वरूप, कार चालक कहते हैं कि वे पैदल यात्री पर इसलिए ध्यान नहीं दे पाए क्योंकि उनका ध्यान सड़क पर मौजूद किसी और चीज पर था।

वाइज़मैन कहते हैं - बड़े होने के साथ हम सीखते हैं कि क्या ग़ैर ज़रूरी है इसलिए वयस्कों के एक चीज़ से दूसरी चीज़ पर ध्यान ले जाने की संभावना ज़्यादा होती है। जहाँ तक ग़ैर इरादतन उपेक्षा की बात है हम सब इसके शिकार हो सकते हैं। हम सब इसको लेकर शिकवा-शिकायत करते हैं, फिर भी यह आम जीवन के लिए ज़रूरी है।

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क्या आपका बच्चा भी स्कूल से भरा हुआ टिफिन वापिस लाता है


बच्चों को खाना खिलाना सबसे मुश्किल काम है, खासकर सब्जियों से बच्चे अक्सर ही दूर भागते हैं। वहीं फास्टफूड उन्हें लुभाता है, लेकिन वह सेहत के लिए हानिकारक है। बच्चे के खान पान के लिए हमेशा ही मां को जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन विज्ञान ऐसा नहीं मानता।

एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि बच्चों की खाने की आदत उनके जेनेटिक्स पर निर्भर करता है ना कि पेरेंटिंग पर। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों ने 1,900 जुड़वा बच्चों के खाने की आदत पर अध्ययन किया। 16 महीनों के बच्चों ने अलग-अलग तरह के खाने की तरफ अपनी दिलचस्पी दिखाई।

चाइल्ड साइकोलॉजी और साइकिएट्री जर्नल में लिखते हुए उन्होंने कहा - जन्म के कुछ दिनों बाद बच्चें नए-नए तरह के खानों के संपर्क में आते हैं, कुछ तो उन्हें खाने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन कुछ कतराते हैं।

इस स्टडी में जुड़वा बच्चों को इसलिए शामिल किया गया क्योंकि जुड़वा बच्चे एक तरह के माहौल में पले-बढ़े होते हैं। एक ही पेरेंट्स दोनों को पालते हैं। बच्चों का खाने के लिए नखरे दिखाना खराब पेरेंटिंग का परिणाम माना जाता है। नए तरह के खाने को खाने से कतराने को फूड 'नियोफोबिया' कहा जाता है।

अध्ययन के मुताबिक - यह खराब पेरेंटिंग की वजह से नहीं बल्कि जीन्स की वजह से होती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं होता कि बच्चों की आदतों को बदला नहीं जा सकता। बच्चों की इन आदतों से पेरेंट्स काफी तनाव में आ जाते हैं। लेकिन इससे परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि समय के साथ बच्चों की ये आदतें बदल जाती हैं।

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क्या आपका बच्चा भी कोने में अकेले बैठकर ये हरकत करता है?


बच्चों की हर हरकत पर नजर रखना माता पिता के लिए बेहद जरूरी है। बच्चों को सही राह दिखाना उनका कर्तव्य है, लेकिन साथ ही उन्हें सही गलत के बीच फर्क सिखना भी पेरेंट्स की ही जिम्मेदारी है। इसके लिए बहुत जरूरी है कि पेरेंट्स को यह पता हो कि उनके बच्चे कब क्या करते हैं।

तकनीकी जगत में हर रोज कुछ नया हो रहा है। इस तरक्की से हमारा और आपका जीवन भी खासा प्रभावित हो रहा है। कुछ मायनों में ये प्रभाव सकारात्मक है और कुछ मायनों में नकारात्मक। हमारे साथ-साथ हमारे बच्चों का जीवन भी इससे अछूता नहीं रह गया है।

महज दो साल की उम्र में वे मोबाइल, टैबलेट व कंप्यूटर में इस कदर खो जाते हैं कि खुद को आसपास के माहौल से अलग कर लेते हैं। इसका असर उनके मानसिक और शारीरिक विकास पर पड़ता है।

 चार साल की अरुणिमा ने एक साल पहले पहली बार मोबाइल फोन अपने हाथ में लिया था। इसके बाद उसके रंग बिरंगे डिस्प्ले में वह इस कदर खोई कि स्कूल के बाद और छुट्टियों के दौरान उसका एकमात्र हमसफर वही मोबाइल है।

मुंबई में रहने वाली चार साल की अक्षिणी दीक्षित दो साल पहले टैबलेट से रूबरू हुई। आज की तारीख में वह यू-ट्यूब पर कविताएं सुनती है और विभिन्न प्रकार के गाने व गेम्स डाउनलोड करती है। स्क्रीन ने धीरे-धीरे न सिर्फ उसके आउटडोर खेलों की जगह ले ली है बल्कि परिवार और दोस्तों के साथ बिताने वाले वक्त पर भी अधिकार कर लिया है।

अरुणिमा और अक्षिणी सिर्फ दो नाम हैं। विशेषज्ञों की मानें तो भारतीय बच्चों में स्मार्टफोन, टैबलेट, आईपैड व लैपटॉप के रूप में 'स्क्रीन एडिक्शन' लगातार बढ़ रहा है और भविष्य में इसका बुरा असर पड़ने वाला है। मुंबई के नानावती सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में बाल व युवा साइकियाट्रिस्ट डॉ.शिल्पा अग्रवाल कहती हैं - मुझे इस बात की चिंता है कि आज बच्चे मानव संबंधों की कीमत पर डिजिटल प्रौद्योगिकी का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका उनके मस्तिष्क पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा।

डॉ.अग्रवाल के अनुसार - इसका असर बच्चों को अपने भावों को नियंत्रित करने की क्षमता पर पड़ सकता है और यह स्वस्थ संचार, सामाजिक संबंधों तथा रचनात्मक खेलों को प्रभावित कर सकता है।

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क्रिएटिव तरीके से पैक करें बच्चों का लंच बॉक्स


क्या आपका बच्चा स्कूल से लंच वापस लेकर आता है? कई बार ऐसा होता है कि भले ही खाना बच्चे की पसंद का हो, उसका मन लंच बॉक्स खोलने का ही नहीं होता।

जोक पैक करें

एक किड फ्रेंडली जोक लंच बॉक्स में मिलने पर बच्चे के चेहरे पर जो मुस्कान आएगी, वह देखने लायक होगी। आप इंटरनेट से ऐसे जोक्स खूब तलाश सकती हैं। आप इन्हें कंप्यूटर पर टाइप करके प्रिंट निकालें या फिर नेपकीन या पेपर टॉवल पर हाथ से लिखें। आप चाहें तो इस पर एक मजाकिया ड्रॉइंग भी बना सकती हैं।

पहेली पैक करें

हालांकि पहेली को सुलझाने में दिमाग का इस्तेमाल होता है लेकिन बच्चे को यह कभी एक्स्ट्रा होमवर्क की तरह नहीं लगता। आप इसमें रिडल्स, पजल्स, सुडोकू, क्रॉसवर्ड भेज सकती हैं। बच्चे इससे न केवल व्यस्त रहेंगे, बल्कि कॉपियों के पन्ने भी नहीं फाड़ेंगे।

क्लू पैक करें

बच्चा जब स्कूल से आएगा तो क्या खास होने वाला है, इस बारे में भी कोई क्लू आप रख सकती हैं। यदि आप सभी फिल्म जाने वाले हैं तो आप पॉपकॉर्न का एक टुकड़ा रख सकती हैं। यदि कोई रिश्तेदार या फ्रेंड डिनर पर आने वाला है तो उसकी नाम की जिग्सॉ पजल रखें।

क्रिएटिव नोट रखें

ए क साधारण लेकिन प्यारा सा लव नोट बच्चे का दिन बना सकता है। आप 'आई लव यू' लिखें। इसके चारों ओर कोई ड्रॉइंग बना दें। इसके अलावा आप बच्चे को प्रोत्साहित करने के लिए उसकी तारीफ में भी कोई नोट रख सकती हैं, जैसे तुम एक सुपर स्टार हो, तुम बहुत अच्छे भाई या बहन हो। बच्चा ऐसी तारीफ पाकर फूला नहीं समाएगा।

फोटो रखें

पिछले वीकेंड पर आप सभी कहीं गए हों तो उसकी याद दिलाती कोई फोटो, घर में फैमिली टाइम के दौरान खींची गई प्यारी सी फोटो बच्चे के लंच बॉक्स में पैक करें। यह बिल्कुल भी जरूरी नहीं है कि आप कलर प्रिंट निकलवाएं। आप कंप्यूटर से ब्लैक एंड व्हाइट प्रिंट निकाल कर भी रख सकती हैं।

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फीस भरने में देरी हुई तो बच्चे ही क्यूं झेले शर्मिंदगी?


केस 1 : 11 साल की वर्षा को कुछ दिनों पहले स्कूल की फीस भरने में देरी होने के कारण क्लास में खड़ा कर दिया गया। छुट्टी होने पर वह घर रोते हुए गई। कुछ दिनों तक वह इसी मानसिक स्थिति में रही। न घर पर ठीक से बात की और न ही दोस्तों से।  

केस 2 : कई स्कूलों में फीस समय पर न भरे जाने पर बच्चे को स्लिप देने या डायरी में नोट डालने का प्रावधान है। कुछ माह पहले 10 साल की रूबी को क्लास में स्लिप दी गई। हिदायत दी कि दो दिन में फीस जमा हो जानी चाहिए। ऐसे व्यवहार से केवल रूबी की पढ़ाई व मानसिक स्थिति पर भी फर्क पड़ा।   

वर्षा व रूबी तो महज उदाहरण हैं। स्कूलों में तय समय सीमा में फीस नहीं भरने की सूचना के नाम पर सजा बच्चों की दी जा रही है। करीब सभी स्कूलों में यही हाल है। स्कूल प्रशासन पैरेंट्स से सीधे संपर्क करने के बजाय सूचित करने के नाम पर बच्चों की डायरी में या तो नोट डालते हैं या फिर परीक्षा में न बैठने देने की धमकी देते हैं। इसका बच्चों के मानसिक स्थिति व पढ़ाई पर असर पड़ सकता है।

यह करते हैं स्कूल संचालक

- 20 से लेकर 50 रुपए प्रतिदिन एक्स्ट्रा फीस
- डायरी में नोट डालना या स्लिप देना
- प्रार्थना सभा या कक्षा में बच्चों को बाहर निकालना
- परीक्षा में न बैठने देना
- पढ़ाई या स्कूल की अन्य गतिविधियों से वंचित रखना
- किसी प्रकार की सजा देना

माता-पिता से करें संपर्क

समाजशास्त्री रश्मि जैन के मुताबिक मध्यवर्गीय व गरीब परिवारों में कभी-कबार स्कूल की फीस देने में देरी हो जाती है। ऐसे में बच्चों को उनके समूह या क्लास के सामने फीस के लिए कहना बिलकुल गलत है। किशोरावस्था में बच्चों की मानसिक स्थिति पर भी इसका असर पड़ सकता है। बच्चे कुंठित महसूस करते हैं। कई बार आपस में एक-दूसरे का मजाक उड़ाते हैं। इस तरह का व्यवहार बच्चों को एक-दूसरे से काट सकता है। इसलिए इंटरनेट व तकनीक के दौर में स्कूल प्रशासन को ईमेल या मोबाइल का इस्तेमाल कर माता-पिता को सीधे संपर्क करना चाहिए।

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आपके बढ़ते बच्चे के लिए जरूरी हैं ये पोषक तत्व


बच्चों की ग्रोथ में पोषक तत्व बेहद अहम किरदार निभाते हैं। बच्चों से ज्यादा कोई एक्टिव नहीं होता। दिन भर की खेल कूद और विकास के लिए उन्हे पर्याप्त पोषक तत्वों की जरूरत होती है। यहां पढ़ें आपके बच्चों को किन पोषक तत्वों की सबसे ज्यादा है जरूरत।

प्रोटीन- प्रोटीन शरीर के उत्तकों को बनाने, रख-रखाव और मरम्मत करने में सहायता करता है। प्रोटीन की ज्यादा मात्रा दूध और डेयरी प्रोडक्ट, दालें, अंडे, मछली, पोर्क और मांस में होती है। प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थों की आवश्यकता विशेषकर तेजी से बढ़ रहे बच्चों को होती है। रोजना अपने बच्चे को प्रोटीन से भरपूर पदार्थ खिलाएं।

विटामिन और खनिज- विटामिन और खनिज शरीर को स्वस्थ बनाता है, साथ ही शरीर के विकास में सहायता करता हैं। बच्चों के लिए आयरन और कैल्शियम बहुत आवश्यक हैं। बढ़ रहे बच्चे को अपनी हड्डियां और दांत मजबूत करने के लिए कैल्शियम की जरुरत होती है। दूध, दूध से बने पदार्थ और हरी पत्तेदार सब्जियां कैल्शियम का अच्छा स्त्रोत है। किशोर अवस्था में बच्चों की कैल्शियम की आवश्यकता की पूर्ति केवल खाने से ही पूरी नहीं होती, बल्कि कुछ अतिरिक्त कैल्शियम सप्लिमेंट की जरुरत भी होती है।

कार्बोहाइड्रेट और वसा- बच्चों में शारीरिक विकास के लिए जिस ऊर्जा और कैलोरी की जरुरत होती है उसकी पूर्ति कार्बोहाइड्रेट से होती है। स्कूल जाने की उम्र में बच्चे तेजी से विकास करते हैं, जिससे उनको भूख ज्यादा लगती है।

आयरन- आयरन खून बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण खनिज है। आयरन खून बनाने के अलावा ध्यान और एकाग्रता को सुधारने में सहायता करता है। मांस, अंडा, मछली, हरी पत्तेदार सब्जियां, आयरन के अच्छे स्रोत हैं। जब विटामिन सी से भरपूर भोजन हम करते हैं तो उस शाकाहारी खाने में आयरन की मात्रा ज्यादा होती है।

फल और सब्जियां- फल और सब्जियों में विटामिन और खनिज की मात्रा ज्यादा होती है। विटामिन और खनिज स्वस्थ त्वचा, अच्छी ग्रोथ, विकास और संक्रमण से लड़ने के लिए आवश्यक हैं। सब्जियों में फाइबर भरपूर मात्रा में होता है, जिसमें विटामिन ए और सी और सूक्ष्म पोषक जैसे मैग्नीशियम और पोटेशियम पाया जाता है। सब्जियों में एंटीऑक्सीडेंट भी पाया जाता है। एंटीऑक्सीडेंट जो बच्चों के शरीर को बीमारियों से लड़ने की शक्ति देता है। साथ ही बड़ी उम्र में कैंसर और दिल की बीमारियों के खतरे को कम करता है। साबुत अनाज, मांस और डेयरी प्रोडेक्टस में विटामिन डी की प्रचुरता होती है। फलों में भी फाइबर की मात्रा, विटामिन विशेषकर ए और सी और पौटेशियम होता है। सब्जियों की तरह फलों में भी एंटीऑक्सीडेंट होता है।

अनाज- आप जितना अनाज खाते हैं, उसमें कम से कम आधा अनाज दलिया, आटा, मक्का, ब्राउन चावल और गेहूं की रोटियां होनी चाहिए।

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जानिए स्कूल जाते वक्त क्यों रोते हैं बच्चे?


यूं तो स्कूल के नाम पर सभी बच्चों का पसीना छूटने लगता है और ज्यादातर बच्चे स्कूल जाने के नाम पर रोने लगते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कई बच्चे स्कूल जाते वक्त महज इसलिए रोते हैं क्योंकि वह आपसे कुछ कहना चाहते हैं। आइये आपको बच्चों के इस मनोविज्ञान को समझने में आपकी सहायता करते हैं।

बच्चों के स्कूल में रोने के कई कारण हो सकते हैं। कई बच्चों को सुबह-सुबह जल्दी उठने या नींद खराब होने से भी रोना आता है जिससे वे स्कूल जाने से कतराने लगते हैं।
कुछ बच्चे किसी दूसरे बच्चे के कारण स्कूल जाने में आना-कानी करते हैं यानी आपका बच्चा किसी दूसरे बच्चे द्वारा सताया जा रहा है और आपका बच्चा उसका ठीक से मुकाबला नहीं कर पाता। कई बार बच्चे स्कूल से माहौल से भागने लगते हैं या फिर बच्चे को स्कूल का माहौल रास नहीं आता तो वे स्कूल जाने से रोने लगते हैं।

और भी हो सकते हैं कारण..

कुछ बच्चों में आत्मविश्वास की कमी होती है या फिर कई बच्‍चों में मोटापा होने के कारण उन्‍हें लोगों की नजरों में आना पसंद नहीं जिससे वे टीचर के किसी भी सवाल का जवाब देने से घबराते हैं, ऐसे में वे टीचर के सामने जाते ही रोने लगते हैं।

कुछ बच्चे जो कि अन्य  बच्चों से बहुत तेज होते है अपनी किसी गलती को छिपाने के लिए या फिर दूसरों का ध्यान अपनी और आकर्षित करने के लिए भी रोना शुरू कर देते हैं।

कई बार बच्चे को कोई बीमारी या तकलीफ होती है या फिर स्कूल की किसी एक्टिविटी से परेशानी होते हैं लेकिन टीचर के डर से कह नहीं पाते। ऐसे में बच्चे स्कूल जाते ही रोने लगते हैं।

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फिर आया समर कैम्प का मौसम


एक बार फिर समर कैम्प का मौसम आ गया है। ज्यादातर स्कूलों में छुटि्टयां शुरू हो गई हैं और बच्चे इन छुटि्टयों में कुछ नया सीखने की प्लानिंग बना रहे हैं। तो क्यों ना इस सीजन में कुछ खास किया जाए। इन दिनों इंडिया में आउटिंग समर कैम्प का कॉन्सेप्ट तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इसके तहत बच्चा न सिर्फ नई जगह को एंजॉय करता है, बल्कि बहुत कुछ सीखता भी है।

बच्चों की रूचि को देखते हुए बहुत-से समर कैम्प इवेंट ऑर्गनाइजेशंस ने इस बार भी नए-नए प्रोग्राम लॉन्च किए हैं, जिनके जरिए छुटि्टयों को भरपूर एंजॉय किया जा सकता है। देश में समर कैम्प की ऎसी कई लोकेशंस हैं, जहां एडवेंचर का मजा भी लिया जा सकता है। देशभर के बहुत-से समर कैम्प इवेंट ऑपरेटर्स नौ से 19 साल आयुवर्ग के स्टूडेंट्स के लिए आउटिंग समर कैम्प ऑर्गनाइज करवाते हैं।

वॉटर फॉल का एंजॉयमेंट
हिमाचलप्रदेश के धर्मशाला ड्रिस्टिक्ट को समर कैम्प के लिए काफी पसंद किया जाता है। टूरिस्ट डेस्टिनेशन के हिसाब से यह जगह काफी एंजॉयेबल है। यहां के वॉटर फाल और मंदिर, सभी को अट्रैक्ट करते हैं। दूसरी ओर, यहां की सोरिंग ईगल पीक्स प्लेस पर कैम्प लगाया जाता है, जिसे बच्चे काफी एंजॉय करते हैं।

रीवर के किनारे कैम्प

उत्तराखंड के टोंस रीवर के किनारे भी समर कैम्प लगाए जाते हैं। यह स्थान देहरादून से 180 किमी. दूर है। यहां पर कैम्प एक्टिविटीज के लिए प्रॉपर स्पेस है। यही नहीं, स्टूडे ंट्स वॉटर गेम्स को भी एंजॉय कर सकते हैं। कैम्प के दौरान उनकी सेफ्टी पर भी पूरा ध्यान जा रहा है।

यहां क्लाइम्बिंग का मजा

शिमला की तहसील जुंगा समर कैम्प के उपयुक्त जगह मानी जाती है। समर में यहां का ट्रेम्प्रेचर भी सही रहता है। लिहाजा यहां हर साल समर कैम्प लगाए जाते हैं। इनमें बच्चे वॉटर स्पोट्र्स से लेकर नैचरल क्लाइम्बिंग का लुत्फ उठाते हैं। यहां पर क्लाइम्बिंग और रीवर रॉफ्टिंग का कम्प्लीट मजा लिया जा सकता है। यहां के ट्री काफी अटै्रक्टिव हैं।

हरियाली और पहाड़ों के बीच कैम्प
रानीखेत के पास स्थित उरोली और सितलाखेत भी समर कैम्प के लिए परफेक्ट प्लेस हैं। हरियाली और पहाड़ों के बीच बच्चे काफी एंजॉय करते हैं। एक्सपर्ट की मानें, तो इन जगहों की पॉजिटिव एनर्जी से स्टूडेंट्स में आत्मविश्वास डवलप होता है। यहां हर साल हजारों की संख्या में बच्चे और यंगस्टर्स कैम्प के लिए आते हैं।

बेस कैम्प के लिए परफेक्ट
देहरादून (उत्तराखंड) से 98 किलोमीटर दूर चकराता भी बेस कैम्प के लिए शानदार जगह है। यहां टीनेजर्स के लिए ज्यादा कैम्प लगाए जाते हैं। यह जगह टै्रकिंग के लिए बिलकुल उपयुक्त है। इसीलिए यहां यूथ काफी एंजॉय करता है। वर्तमान में यहां सेना के जवानों को ट्रेनिंग दी जाती है।

इन जगहों का भी जवाब नहीं
इनके अलावा कुर्ग, यॉरकोड, नैनिताल, ऋषिकेश, मनाली और शिमला भी एंजॉयमेंट के हिसाब से उपयुक्त माने जाते हैं।

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बच्चों पर पढ़ाई का दबाव बनाना सही नहीं


अक्सर पैरेंट्स को अपने बच्चों से शिकायत रहती है कि वे पढ़ाई पर ध्यान नहीं देते हैं और बात नहीं मानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बच्चों को हर बात पर रोकने-टोक ने पर उनके कोमल मन पर बुरा असर पड़ सकता है। बच्चों पर दबाव बनाने से उन्हें ये नुकसान हो सकते हैं-

पढ़ाई का दबाव
अगर आप बच्चों पर पढ़ाई का बहुत दबाव डालेंगे तो उनके दिमाग पर नेगेटिव असर पड़ेगा और वे पढ़ाई से दूर भागने लगेंगे। इसके लिए आप बच्चों के साथ थोड़ी देर बैठे और रूचिकर तरीके से पढ़ाई करवाए। इसमें उन्हें मजा भी आएगा और उनकी पढ़ाई भी हो जाएगी।

तनाव
एक ही बात के लिए बच्चों को टोकते रहने से उसके प्रति उनके मन में डर पैदा हो जाता है। इस पर आप जब भी उन्हें पढ़ाई के लिए कहेंगे तो वे बुक लेकर तो बैठ जाएंगे, लेकिन उन्हें स्ट्रेस होने लगेगा। तनाव के चलते बच्चे कई बार बहुत गलत फैसले भी ले लेते हैं। ऎसे में जरूरी है कि आप उन्हें प्यार से समझाएं।

रटने की बजाए समझाए
कुछ बच्चे जल्दी पढ़ाई खत्म करने के चलते चीजे रटने लगते हैं, लेकिन रटे हुए चैप्टर कुछ वक्त तक ही याद रहते हैं। ऎसे में जरूरी है कि आप उन्हें रटने की बजाए ठीक से चैप्टर समझाए, ताकि वे उनके दिमाग में बना रहे।

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बच्चों की बदमिजाजी से हैं परेशान, तो "ये" करें


हर अभिभावक यही चाहता है कि उनका बच्चा हर किसी से अच्छा व्यवहार करे, ऎसे में बहुत बुरा लगता है, जब बच्चा बदमिजाजी करने से बाज नहीं आता। बच्चे का बुरा व्यवहार हर अभिभावक के लिए बेहद परेशान करने वाला होता है, इसकी वजह से कई बार उन्हें शर्मिदगी उठानी पड़ जाती है।

बेवजह की जिद
क्या होता है

आपकी बेटी या बेटा किसी दुकान पर गए और वो वहां पर अपनी मनपसंद चॉकलेट लेने की जिद करने लगे और आपने न कर दिया। जिसके बाद वो दुकान पर ही रोने- चिल्लाने और तमाशा करने लग जाता है।

क्यों होता है ऎसा
बच्चे तब जिद करते हैं. जब उन्हें किसी मुद्दे पर अपने अभिभावकों से बहस करनी होती है, ताकि वे ये साबित कर सकतें कि उन्हें क्या चाहिए। नखरे और जिद हर वक्त सही नहीं होते, खासकर तब जब बच्चा बड़ा हो रहा होता है। और अंत में बच्चों के जिद की समाप्ति उनके अडियल रूख और रोने से होती है।

क्या करें आप
अगर आप किसी पब्लिक एरिया में अगर हों या आसपास ज्यादा भीड़ हों तो ऎसी परिस्थिति आए, इससे पहले ही वहां से चली जाएं या फिर बच्चों के इस व्यवहार पर ज्यादा ध्यान न दें, क्योंकि अगर एक बार आपकी बेटी (या बेटे) को पता लग गया है कि उसके इस व्यवहार से आपको कोई फर्क नहीं पड़ रहा है तो वो खुद ब खुद शांत हो जा एगी। आप उससे बेहद शांत और सधी हुई भाषा में न करने का कारण बताएं।

शिकायती होना
क्या होता है

बारिश हो रही है और उस कारण आपका बेटा बाहर खेलने नहीं जा पाता है। ऎसे में वह लगता है शिकायत करने क्योंकि आपने बारिश होने पर रोका या उसे खेल के मैदान तक पहुंचाने के लिए कुछ नहीं किया।

क्यों होता है ऎसा
चूंकि बच्चा खुद तो कुछ कर नहीं पाता है तो ऎसे में वो शिकायत करके अपनी भड़ास निकालता है। इसके अलावा अगर बच्चा भूखा हो, थका हुआ हो या फिर उसे किसी तरह की परेशानी हो रही हो, तब भी वह ऎसा व्यवहार करता है।

क्या करें आप
आप उससे बात करें कि आखिर ऎसा कौन-सा रास्ता है, जिससे उसकी समस्या का समाधान हो सकता है। आप उनके सामने यह जाहिर करें कि आप उसकी समस्या को अच्छे से समझ रही हैं और साथ ही समाधान पर काम भी कर रही हैं। आप चाहें तो उसे विकल्प के तौर पर भी कई सुझाव दे सकती हैं, जैसे वो घर पर आपके साथ या अपने भाई-बहन के साथ बोर्डगेम खेल सकता है, साथ ही अगले दिन आप उसके साथ बाहर खेलने जरूर जाएंगी।

झूठ और चोरी करना
क्या होता है

आपका छह साल का बच्चा स्कूल से एक नया रबर लेकर आता है और जब आप इसके बारे में उससे पूछती हैं तो कहता है कि वह उसके दोस्त ने बर्थ डे गिफ्ट के तौर पर दिया है।

क्यों होता है ऎसा
बच्चों को यह पता नहीं होता कि किसी चीज को लेने और चोरी करने में क्या अंतर है। वो चीजें ले लेते हैं क्योंकि उन्हें वह चीज पसंद आ रही होती है, उन्हें बाद में यह लगता है कि उनकी हरकत गलत है। ऎसे में वे अपनी गलती छिपाने लगते हैं और झूठ बोलते हैं।

क्या करें आप
उनकी इस हरकत को छिपाएं नहीं। कोशिश करें कि वे खुद से आपको बता दें कि उन्होंने ही रबर खुद से लिया है। अगर आप डरा-धमका कर उनसे पूछताछ करनी शुरू करेंगी तो वे एक झूठ छिपाने के चक्कर में और झूठ बोलना शुरू कर देंगे। उनके सामने बहुत ही सलीके से यह जाहिर करें कि उन्होंने जो किया है वो आपको पसंद नहीं आया। अगर वो आपके सामने सच बोल दें तो आप बदले में बाजार से वही चीज उन्हें लाकर तोहफे के रूप में दें।

पलट कर जवाब देना
क्या होता है

आपके होमवर्क करने के लिए कहने पर आठ साल का बेटा आपसे यह कहता है कि वो अपना होमवर्क करने के लिए बाध्य नहीं है क्योंकि उसके लिए यह एक तरह से समय बर्बाद करने वाला काम है।

क्यों होता है ऎसा
बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं, उनकी एक अपनी सोच बनती जाती है। कई बार अपने माता-पिता के बहुत ज्यादा अनुशासन से उनके अंदर गुस्सा भर जाता है, जिस वजह से वे कई बार रूखा व्यवहार करते हैं, तर्क-कुतर्क करते हैं। अगर ऎसे व्यवहार पर पेरेंट्स हंस देते हैं तो उन्हें लगता है कि उनका व्यवहार सही है और पेरेंट्स उसे स्वीकार भी कर रहे हैं।

क्या करें आप
खुद को बेहद शांत और संतुलित रखें। आप बहुत ही सधे हुए लहजे में बच्चे को यह दर्शाएं कि उसका यह व्यवहार आप कभी पसंद नहीं करेंगी। आप उसे बताएं कि जिस लहजे में उसने बात की है, वैसी भाषा और लहजा परिवार का कोई भी सदस्य बात करने में नहीं इस्तेमाल करता। इसलिए आगे से वह इसी तरह के लहजे में बात बिल्कुल ही न करे।

आक्रामक हो जाना
क्या होता है

आपका बच्चा बाहर से आता है, उसके बाद आपको अचानक से यह पता चले कि वह तो वहां से लड़ाई करके आया है। उसने अपने भाई-बहन या अन्य किसी बच्चे को मारा, उसके बाल पकड़े या फिर काट लिया।

क्यों होता है ऎसा
बहुत ज्यादा आक्रामकता भी यह दर्शाती है कि बच्चा अपने प्रति लोगों का (या पेरेंट्स का) ध्यान आकर्षित करना चाह रहा है, साथ ही अपने आसपास के माहौल को कंट्रोल करना चाह रहा है। यह ध्यान देना ज्यादा जरूरी है कि वह आखिर ऎसा क्यों रहा है।

क्या करें आप
बच्चे की आक्रमकता को रोकने के लिए आप किसी तरह की हिंसा का सहारा न लें क्योंकि इससे वह और ज्यादा हिंसक हो जाएगा। इसकी बजाय आप बच्चों से बात करें। ध्यान रखें कि बच्चा कहीं टीवी पर आक्रामक या लड़ाई-झगड़े वाला कोई प्रोग्राम तो नहीं देख रहा। यह पता लगाएं कि आखिर क्या वजह है कि बच्चे को इतना ज्यादा गुस्सा आता है। कुछ ऎसी एक्टिविटी खोजें, जिससे बच्चे को शांत रखा जाए और उसका गुस्सा भी कम किया जा सके।

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ऎसे पहचानें, बच्चे में डिस्लेक्सिया की बीमारी


कई बच्चे शब्दों को ठीक से पहचान नहीं पाते हैं और कई बार समझाने पर भी उन्हें हमेशा गलत ही लिखते हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी इस आदत में सुधार नहीं आता है तो उनसे चिढ़ने की बजाए, समझ जाएं कि बच्चे को डिसलेक्सिया की समस्या है।

स्लो लर्नर नहीं

आमतौर पर माता पिता स्लो लर्नर तथा डिसलेक्सिक बच्चे में अंतर नहीं कर पाते। स्लो लर्नर बच्चों में चीजों को समझने की क्षमता धीमी होती है, जबकि डिसलेक्सिक बच्चे में कमजोर शब्द ज्ञान को छोड़ कर प्रतिभा की कोई कमी नहीं होती। इन बच्चों की फोटोग्राफिक मेमोरी खासी तेज होती है। ये बच्चे विषय का एक फे्रम एक बार दिमाग में बिठा लें, तो भूलते नहीं।

पेरेन्ट्स के रूप में आपकी जिम्मेदारी
1.
उम्र तथा भाषाई क्षमता को देखते हुए बच्चे से उन बातों पर चर्चा करें, जिन्हें आपने भांपा है।

2. उसे पूछें कि स्कूल में वह कैसा महसूस करता है, कहीं किसी बात को लेकर वह परेशान तो नहीं या फिर सुधार के लिए उसे किसी भी प्रकार की जरूरत तो नहीं है।

3. उसे बताएं कि हालांकि वह बहुत मेहनत करता है, पर टीचर तथा आप उसके विकास के लिए कुछ और भी चीजों को अपनाना चाहते हैं।

4. बच्चे को शब्दों के विन्यास की जानकारी दें। उनके अर्थ समझाएं ताकि उनका कॉन्सेप्ट क्लीयर हो सके।

5. अगर बच्चा पढ़ाई से जी चुराता है, टीचर ने कुछ पढ़ाया ही नहीं कह कर पल्ला झाड़ता है, तो पास बैठने वाले बच्चे से संपर्क बनाएं। इससे आपको बच्चे की कारगुजारियों के साथ साथ होमवर्क, क्लास में पढ़ाए जा रहे चैप्टर आदि बातों के बारे में पता चलता रहेगा।

6. ऎसे बच्चों को पास बैठाकर शब्दों का उच्चारण करवाएं जिससे वह शब्दों को बेहतर तरीके से समझे और उसे शब्दों की जानकारी दें।

7. बच्चे में छिपी क्षमताओं तथा प्रतिभा को उभारें। उसके प्रयासों की हमेशा तारीफ करें तथा गलती करने पर धैर्य से काम लें। गलती पर डांट के बजाय प्यार से समझाएं।

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