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चीन में पाए गए 51.80 करोड़ साल पुराने सॉफ्ट ऊतक, वैज्ञानिकों ने इस खोज को बताया अद्भुत


नई दिल्ली। वैज्ञानिकों ने चीन में एक नदी के किनारे हजारों जीवाश्मों का एक चकित करने वाला खजाना खोज निकाला है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ये जीवाश्म लगभग 51.80 करोड़ साल पुराने हो सकते हैं और ये खासतौर से असामान्य हैं, क्योंकि ये सॉफ्ट बॉडी ऊतक हैं और अच्छी तरह संरक्षित हैं। इनमें चमड़ी, आंखों और अंदरूनी अंगों के ऊतक शामिल हैं।

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जीवाश्म विज्ञानियों ने इस खोज को अद्भुत बताया है। क्योंकि आधे से अधिक जीवाश्म ऐसी प्रजातियों के हैं, जिन्हें इसके पहले खोजा ही नहीं गया था। किंगजियांग बायोटा के रूप में बुलाए जाने वाले ये जीवाश्म हुबेई प्रांत में दानशुई नदी के पास पाए गए हैं।

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इनके 20,000 से अधिक नमूने लिए गए हैं और अभी तक इनमें से 4,351 के विश्लेषण किए जा चुके हैं, जिनमें कीड़े, जेलीफिश, समुद्री एनीमोन और शैवाल शामिल हैं।

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चीन की नॉर्थवेस्ट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शिनजियांग झांग ने कहा कि ये जीवाश्म जीवों के प्रारंभिक उत्पत्ति के अध्ययन में एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्रोत बनेंगे।

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पर्यावरण क्षेत्र की उपलब्धियों के लिए 4 भारतवंशी अमेरिकी सम्मानित


नई दिल्ली। पर्यावरण के मसलों का समाधान करने के लिए नवाचारी नजरिया विकसित करने के लिए चार भारतवंशी अमरीकी किशोरियों को पुरस्कृत किया गया। उनमें से प्रत्येक 25,000 डॉलर का अवार्ड प्रदान किया गया है। अमरीकन बाजार की रिपोर्ट के अनुसार, अवार्ड विजेताओं में केंटुकी की अंजली चड्ढा (16), देवालवारे की प्रीति सांई कृष्णामणि(17), उत्तर कैरोलिना की नवामी जैन (17) और पेंलिसवानिया की मामिदाला (17) शामिल हैं।

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चड्ढा ने एक ऐसा डिवाइस बनाया है जो कुएं के पानी में पाए जाने वाले पदार्थ आर्सेनिक का पता लगाने के लिए सेंसर का काम करता है। आर्सेनिक खतरनाक पदार्थ है जिससे कैंसर होता है।

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अमरीका में करीब पांच करोड़ लोग कुएं के पानी का इस्तेमाल प्राथमिक स्रोत के रूप में करता है। इसी प्रकार अन्य विजेताओं ने भी पर्यावरण से संबंधित समस्याओं के समाधान के लिए कुछ अलग युक्तियां तैयार की हैं।

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अगर आप भी बिल्कुल गर्म चाय पीते हैं तो संभल जाए, ​हो सकता है यह कैंसर


नई दिल्ली। सुबह की शुरूआत हम सबकी चाय से होती है। किसी को सुगर फ्री चाय पसंद है तो वही कोई दूध और चीनी डालकर चाय पीता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें बिना दूध की चाय पीना ज्यादा अच्छा लगता है। चाय भले ही कैसी भी हो यह आप पर निर्भर करता है, लेकिन जब भी चाय पीएं तो एक बात का ध्यान जरूर रखें और वह यह कि गर्मागर्म चाय पीने की गलती भूलकर भी न करें।

हम में से ऐसे कई लोग हैं जिन्हें एक दम गर्म चाय पीने का शौक होता है। वैसे तो चाय गर्म ही पी जाती है, लेकिन बिल्कुल गर्म चाय पीने से बचना चाहिए। हाल ही में हुई एक रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। इसमें बताया गया कि गर्म चाय पीने से इसोफेजियल कैंसर होने का खतरा बना रहता है।

 

इंसान के गले से पेट तक एक लंबी नली या ट्यूब होती है जिसे घुटकी कहते हैं। जब घुटकी में किसी को कैंसर होता है तो उसे इसोफेजियल कैंसर कहते हैं।

 

अमरीकन कैंसर सोसायटी के मुख्य के लेखक फरहाद इस्लामी का इस बारे में कहना है कि गर्मागर्म चाय-काफी की चुस्की कई लोगों को पसंद है। हालांकि इन्हें थोड़ा ठंडा करने के बाद ही पीना चाहिए। इंटरनेशनल जर्नल आफ कैंसर में इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया गया है। इस रिसर्च को करने के लिए 40 से 75 आयु वर्ग के कुल 50 हजार लोग को चुना गया था।

यानि कि 75 डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्म चाय को छूकर भी न देखें। चाय बनने के 4 से 5 मिनट बाद ही इसे पीना स्वास्थ्य के लिए बेहतर है।


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बिस्तर पर आराम से लेटकर भी अब घटाया जा सकता है वजन, बस करना होगा यह काम


नई दिल्ली। मोटापा इंसान की जिंदगी में कोई नई बात या समस्या नहीं है, लेकिन आज के समय में लोग इसे लेकर ज्यादा जागरूक हो गए हैं। फास्ट फूड और अनियमित दिनचर्या के चलते आज के युवा वर्ग इस समस्या से बहुत परेशान हैं और इससे निपटने के लिए डायट से लेकर जिम तक का सहारा ले रहे हैं। दिनभर की भागदौड़ के बाद लोग जिम में घंटों पसीने बहा रहे हैं। बहरहाल, अब इन सारी चीजों की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि अब सोकर भी वजन को कम किया जा सकता है।

अब आप बिस्तर पर आराम से लेटकर भी मोटापे को दूर कर खुद को फिट रख सकते हैं। सुनने में भले ही यह बात अजीब लगे, लेकिन यह सच है। आइए जानते हैं कि यह कैसे संभव है:

वैज्ञानिकों ने एक शोध के दौरान यह निष्कर्ष निकाला है कि सोने से पहले ठंडे पानी से नहाना स्वास्थ्य के लिए बेहद अच्छा है। इस वजह से जब भी सोने जाए उससे एक या आधा घंटा पहले ठंडे पानी से अच्छे से नहा लें। इससे काफी लाभ पहुंचेगा।

 

Now people can lose weight

कुछ वक्त पहले एक अध्ययन किया गया था जिसके रिपोर्ट को नॉर्थ अमरीकन जनरल आफ मेडिकल साइंस में प्रकाशित किया गया। इस रिपोर्ट के अनुसार, आप जिस कमरे में सो रहे हैं अगर उस रूम का तापमान कम है यानि कि यदि वह कमरा ठंडा है तो सोने के दौरान बॉडी में कैलोरी बर्न होने की संभावना ज्यादा है।

इसके साथ ही डिनर में सोडियम की मात्रा कम रखने की जरूरत है क्योंकि इस वक्त नमक का अधिक मात्रा में सेवन पाचन क्रिया में बाधा डालता है।

कुछ मात्रा में पानी पीने के बाद ही बिस्तर पर लेटें।

कोशिश यही करें कि देर शाम को काम से लौटने के बाद फ्रेश होकर थोड़ा सा वार्म अप करें इससे आप डिनर में जो भी खाते हैं पेट में उसके पाचन की दर बढ़ जाती है और सोते वक्त कैलोरी अधिक मात्रा में बर्न होता है।


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दुनिया के सबसे बड़े टेलीस्कोप के लिए ऑपरेटिंग सॉफ्टेवयर बना रही है ये भारतीय फर्म


नई दिल्ली: हवाई के Mauna Kea में दुनिया का सबसे बड़ा ग्राउंड बेस्ड टेलीस्कोप Thirty Metre Telescope (TMT) बन रहा है। भारत, अमेरिका, चीन, जापान और कनाडा के संयुक्त प्रयासों से बन रहे इस टेलीस्कोप का सबसे जटिल भाग यानि ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर का निर्माण आरत कर रहा है।

आपको मालूम हो Segment Support Assembly (SSA) नाम के इस ऑप्टिकल स्ट्रक्चर में 492 हेक्सागोनल शीशे होंगे जिन्हें मिलाकर इस टेलीस्कोप के प्राइमरी मिरर का निर्माण होगा।

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पूणे स्थित ThoughtWorks नाम की IT फर्म इसके लिए Common Software Services (CSS), Data Management Services(DMS) और Executive Software (ES) जैसे 3 सॉफ्टवेयर डेवलप कर रही है ताकि 2020 में जब ये टेलीस्कोप शुरू किया जाए तो इसके वृहद डेटा को रिसीव करने के बाद मैनेज जा सके।

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ThoughtWorks में काम करने वाले संतोष महाले का कहना है कि सबसे बड़ा चैलेंज इस टेलीस्कोप के लिए ऐसे सॉफ्टवेयर का निर्माण करना है जो फ्यूचर में इस टेलीस्कोप के ऑपरेशनल होने पर भी प्रासंगिक रहे। ThoughtWorks के इस प्रोजेक्ट से जुड़ने के कारण आईटी इंडस्ट्री में उत्साह है । एक अन्य आईटी फर्म में काम करने वाले गुंजन शुक्ला का कहना है कि इस प्रोजेक्ट से जुड़कर इंडियन आईटी इंडस्ट्री ने प्रूव कर दिया कि वो इस तरह के विश्वस्तरीय प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए तैयार हैं।


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प्रोस्टेट कैंसर का खतरा घटाने में सहायक होती है कॉफी, अध्ययन में हुआ नया खुलासा


नई दिल्ली। सुबह का बेहतरीन पेय होने के साथ ही कॉफी प्रोस्टेट कैंसर को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, जिससे दवा-प्रतिरोधी कैंसर के इलाज का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। जापान के कनाजावा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कहविओल एसिटेट व कैफेस्टोल तत्वों की पहचान की है, जो प्रोस्टेट कैंसर की वृद्धि को रोक सकते हैं।

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ये दोनों तत्व हाइड्रोकॉर्बन यौगिक हैं, जो प्राकृतिक रूप से अरेबिका कॉफी में पाए जाते हैं। इसके पायलट अध्ययन से पता चलता है कि कहविओल एसिटेट व कैफेस्टोल कोशिकाओं की वृद्धि को रोक सकते हैं, जो आम कैंसर रोधी दवाओं जैसे कबाजिटेक्सेल का प्रतिरोधी है।

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शोध के प्रमुख लेखक हिरोकी इवामोटो ने कहा, "हमने पाया कि कहविओल एसिटेट व कैफेस्टोल ने चूहों में कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि रोक दी, लेकिन इसका संयोजन एक साथ ज्यादा प्रभावी होगा।" इस शोध के लिए दल ने कॉफी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले छह तत्वों का परीक्षण किया। इस शोध को यूरोपियन एसोसिएशन ऑफ यूरोलॉजी कांग्रेस में बार्सिलोना में प्रस्तुत किया गया। शोध के तहत मानव की प्रोस्टेट कैंसर की कोशिकाओं पर प्रयोगशाला में अध्ययन किया गया।

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लाइलाज बीमारी सफेद दाग को लेकर वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा, हफ्तों में दूर हो जाएगी दिक्कत


नई दिल्ली। सफेद दाग यानी विटिलिगो को लेकर वैज्ञानिकों ने एक नई खोज की है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी पद्धति विकसित की है जिसकी मदद से कुछ ही हफ़्तों में सफेद रोग से पीड़ितों को निजात मिल जाएगी। सफेद दाग को कुष्‍ठ रोग मानकर पीड़ित लोगों को परिवार से अगल रखा जाता है जबकि यह कुष्‍ठ रोग से अलग सिर्फ एक त्वचा रोग है। इस रोग में शरीर पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं।

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अमरीका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स के शोधकर्ता जॉन हैरिस ने बताया कि आज के समय में इसके इलाज में एक से दो साल का वक्त लग जाता है। कई बार इलाज रोकने के सालभर बाद फिर उसी जगह दाग दिखने लगते हैं। इस दिक्कत के बारे में जॉन हैरिस बताते हैं कि दोबारा उसी जगह दाग इसलिए बनते हैं, क्योंकि त्वचा की कोशिकाएं उस जगह के बारे में जानती हैं जहां पर पहले से दाग मौजूद थे। यही कारण है कि वे फिर वहीं पनप जाती हैं।

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हाल ही में वैज्ञानिकों ने सफेद दाग यानी विटिलिगो के इलाज में उन कोशिकाओं के बारे में पता कर लिया है जो दोबारा पनप जाती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन कोशिकाओं को निष्क्रिय करने से सफेद दाग का इलाज जल्दी हो सकेगा और दोबारा इसे होने से भी ज्यादा समय तक रोका जा सकेगा। शोधकर्ताओं ने रोग पैदा करने वाली मेमोरी कोशिकाओं को अलग कर उनका अधिक बारीकी से विश्लेषण किया है। वे यह निर्धारित करने में सक्षम हैं कि ये कोशिकाएं विशेष रूप से मेलानोसाइट्स को टारगेट करती हैं।

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कहीं आपके लिए डरावना सपना न बन जाए घरेलू वाई-फाई, हैकर्स टीम को लेकर जारी हुआ है अलर्ट


नई दिल्ली। अगर आपका घरेलू वाई-फाई wifi बिस्तर पर लेटे-लेटे आपको ऑनलाईन ट्रांजेक्शन (बिटकॉइन सहित), दफ्तर के काम और व्यक्तिगत और संवेदनशील जानकारी साझा करने में सहूलियत और सुरक्षा प्रदान करता है तो आपको बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता है। आपको यह जानकार शायद आश्चर्य होगा कि आपके घर के कोने में पड़े और इंटरनेट सेवा प्रदाता (आईएसपी) द्वारा उपलब्ध कराए गए राउटर को बड़ी आसानी से हैक किया जा सकता है।

फिनिश साइबर सिक्योरिटी फर्म एफ-सिक्योर के अनुसार, चंद पैसों में हैकर्स क्लाउड इनेबल्ड कंप्यूटर के जरिए कुछ ही मिनटों में आपके इंटरनेट का पासवर्ड जान सकते हैं। हाल ही में यूएस कंप्यूटर एमरजेंसी रेडीनेस टीम ने रूस से संचालित होने वाले हैकर्स टीम को लेकर अलर्ट जारी किया है। इस हैकर्स टीम ने अमरीका में बड़ी संख्या में घरेलू राउटर्स को हैक किया है।

क्वीक हील टेक्नोलॉजी के संयुक्त प्रबंध निदेशक एवं सीटीओ संजय काटकर के अनुसार, साइबर अपराधी पैसे देकर आसानी से घरेलू वाई-फाई से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। काटकर ने एक मीडिया एजेंसी को बताया कि एक बार मालवेयर से प्रभावित होने के बाद राउटर ठीक से काम नहीं कर पाता है। कई बार बैंक के साइट्स और इ-कामर्स साइट पर जाने के दौरान खुद ब खुद ही नकली वेबसाइट्स खुल जाते हैं।

हैकर्स कई बार राउटर को हैक करने के पश्चात गैर-कानूनी गतिविधियों को भी अंजाम देने से नहीं हिचकते हैं। काटकर ने यह भी चेतावनी दी कि कई बार व्यक्तिगत और वित्तीय जानकारी चुराने के बाद साइबर अपराधी आपके वाई-फाई से जुड़े अन्य स्मार्ट डिवाइस को भी बर्बाद कर सकते हैं।

एफ-सिक्योर के अनुसार आपको राउटर लेने से पहले थोड़ा दिमाग लगाने की आवश्यकता है कि आप कैसा राउटर ले रहे हैं। साइबर सिक्योरिटी फर्म के अनुसार, वो राउटर जो इंटरनेट कनेक्शन के साथ मिलते हैं या फिर अमेजन जैसे साइट्स पर उपलब्ध प्रसिद्ध राउटर के हैक होने का खतरा ज्यादा रहता है, क्योंकि उनकी प्रसिद्धि ही हैकिंग की बड़ी वजह बनती है।

यह मुमकिन है कि आपके राउटर की हैक होने की जानकारी से आप अनभिज्ञ हों। डीएनएस हाईजैकिंग डिवाइस का प्रयोग कर हैकर्स आपके घरेलू वाई-फाई की सुरक्षा में सेंध लगा सकते हैं। एफ- सिक्योर ने आगे बताया कि हैकर्स आपके ट्रैफिक को किसी भी वेबसाइट पर सीधे तौर पर जोड़ सकते हैं, क्योंकि अनजाने में आप उन्हें अपना फेसबुक और क्रेडिट कार्ड की जानकारी दे चुके होते हैं।

अगर आपने अपने वाई-फाई के लिए कमजोर पासवर्ड चुना है तो वह और भी आसानी से टूट सकता है। काटकर ने सुझाव देते हुए कहा कि ग्राहकों को इस समस्या के समाधान करने की दिशा में विचार करने की आवश्यकता है, ताकि ऐसे मालवेयर को रोकने के साथ ही सभी डिवाइसों जैसे लैपटॉप/डेस्कटॉप, स्मार्टफोन, स्मार्ट टीवी आदि को सुरक्षित रखा जा सके, जो घरेलू वाई-फाई से जुड़े हों।

घरेलू वाई-फाई को सुरक्षित रखने का एक रास्ता यह भी है कि आप ऐसे राउटर की मांग करें, जो नवीनतम वाई-फाई सुरक्षा प्रणाली डबल्यूपीए को सपोर्ट करता हो। इस प्रणाली की घोषणा हाल-फिलहाल लाभ-निरपेक्ष वाई-फाई गठबंधन द्वारा की गई है जो तकनीक और तकनीक के प्रमाणपत्र को प्रोत्साहित करता है। इसके साथ ही आप अपने अतिथियों के लिए अलग नेटवर्क के साथ अलग पासवर्ड गठित कर सकते हैं, ताकि उनके डिवाइस के जरिए होने वाली हैकिंग से आपकी व्यक्तिगत जानकारी सुरक्षित रह सके। अंगूठे की छाप सबसे ज्यादा सुरक्षित और मजबूत पासवर्ड है।


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किसी काम के नहीं होते हैं ज्यादातर एंटीवायरस, 250 में सिर्फ 80 हुए हैं पास


नई दिल्ली: जो लोग स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हैं उन्हें अपने डिवाइस को दुरुस्त रखने के लिए एंटीवायरस antivirus इस्तेमाल करना पड़ता है। लेकिन कई बार एंटीवायरस इस्तेमाल करने के बावजूद भी आपके डिवाइस में वायरस आ जाते हैं और वो हैंग करने लगता है साथ ही कई और तरह की भी दिक्कतें आने लगती हैं। तो ऐसे में आज हम आपको मार्केट में मिल रहे ज्यादातर एंटीवायरस की सच्चाई के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे जानने के बाद आपके होश उड़ जाएंगे।

हवा से कार्बन डाइऑक्साइड खींचों और खुद बना लो कोयला, वैज्ञानिकों ने सुझाई ये गजब की विधि

दरअसल ऑस्ट्रिया की एंटीवायरस बनाने वाली कंपनी एवी कंपेरेटिव्स ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसके मुताबिक़ अधिकतर एंटीवायरस किसी काम के नहीं होते हैं और इनका इस्तेमाल करने पर आपके स्मार्टफोन को नुकसान भी हो सकता है। आपको बता दें कि जब भी आपके फ़ोन में कोई दिक्कत आती है तो आप गूगल प्ले स्टोर पर जाकर कोई एंटी वायरस इंस्टॉल कर लेते हैं लेकिन इस रिपोर्ट के मुताबिक़ गूगल प्लेस्टोर google play store पर एंड्राइड स्मार्टफोन Android Smartphone के लिए उपलब्ध एंटीवायरस ऐप्स में से दो तिहाई से ज्यादा ऐप्स काम के नहीं हैं। यहां तक की इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन ऐप्स पर भरोसा भी नहीं किया जा सकता है।

स्पेसएक्स के क्रू ड्रैगन की पहली मानवरहित परीक्षण उड़ान पूरी

आपको बता दें कि कंपनी ने गूगल प्ले स्टोर के 250 एंटीवायरस को स्टडी किया था जिसके बाद ये निकलकर सामने आया कि इनमें से महज 80 ऐप्स ही एक मालवेयर डिटेक्टिंग टेस्ट पास कर पाए थे। इस रिपोर्ट के आने के बाद एक बात तो पूरी तरफ से साफ़ हो गयी है कि आप अपने स्मार्टफोन में जो भी एंटीवायरस इस्तेमाल कर रहे हैं वो असली है या नकली इस बात की कोई गारंटी नहीं है। इस स्टडी में महज 23 ही ऐप ऐसे थे जिन्होंने पूरी तरह से मालवेयर डिटेक्ट किया।


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हवा से कार्बन डाइऑक्साइड खींचों और खुद बना लो कोयला, वैज्ञानिकों ने सुझाई ये गजब की विधि


नई दिल्ली। हाल ही में विज्ञान के क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने हैरतअंगेज खोज की है। मेलबर्न में आरएमआईटी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक का दावा है कि हवा से कार्बन डाइऑक्साइड CO2 निकालकर उससे कोयला बनाया जा सकता है। इस सनसनीखेज खोज में वैज्ञानिकों ने बताया है कि हम हवा में व्याप्त CO2 को कैसे रिसाइकिल कर सकते हैं। जरनल नेचर कम्यूनिकेशन में इस रिसर्च के छपने के बाद इसे विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी सफलता माना जा रहा है। इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने चरण-दर-चरण हवा में व्याप्त कार्बन डाइऑक्साइड को कोयला बनाने की विधि को समझाया है। वैज्ञानिकों ने वायुमंडल से ग्रीनहाउस गैस निकालकर उसे ठोस कार्बन का रूप देकर बंद कर दिया। वायुमंडलीय कार्बन को इकठ्ठा करने की यह तकनीक अगर सही साबित हो जाती है तो मानव जाति के लिए बहुत कारगर होगी। अगर कार्बन बनाने की यह प्रक्रिया सफल होती है तो यह कार्बन चक्र नियंत्रित करने का मौका देगा।

जानकारी के लिए बता दें कि तेल और गैस की बड़ी-बड़ी कंपनियां कार्बन सीवेज प्लांट विकसित करने के लिए अरबों डॉलर खर्च करने को तैयार हैं। जिसमें तेल कंपनी Royal Dutch Shell भी शामिल है। तेल और गैस की बड़ी-बड़ी कंपनियों को कार्बन स्टोर करने के लिए एक ऐसे प्लांट की तलाश है जो पृथ्वी के अंदर ही कार्बन डाइऑक्साइड को स्टोर कर सके। पृथ्वी के अंदर ही CO2 स्टोर करने का यह तरीका बहुत महंगा है। यह तब तक मुमकिन नहीं जब तक इसके लिए भारी सब्सिडी न हो। लेकिन हवा से CO2 को निकालकर उसे स्टोर करने की जो ताज़ा प्रकिया वैज्ञानिकों ने बताई है वह कम खर्च वाली साबित हो सकती है। इस विधि से ना केवल एक सीमित ईंधन स्रोत का बोझ काम होगा बल्कि यह ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में भी एक बड़ी भूमिका निभा सकता है।


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ऐसी औरतों के बच्चे होते है मोटे, वजह जानकर यकीन नहीं कर पाएंगे आप


नई दिल्ली। यूं तो मोटापे का बढ़ना ज्यादा जंक फूड खाना और ओवर ईटिंग पर निर्भर करता है और बच्चों में ये आदत सबसे ज्यादा देखने को मिलती है। मगर क्या आपको पता है बच्चों में मोटापे के बढ़ने का कारण उनकी मदर्स का जॉब करना भी हो सकता है।

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ये बात सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज की एक रिसर्च के मुताबिक वर्किंग वुमेन के बच्चों में मोटापा सबसे ज्यादा देखने को मिलता है। रिपोर्ट के मुताबिक सामान्य बच्चों के मुकाबले कामकाजी महिलाओं के बच्चे ज्यादा मोटे होते हैं, क्योंकि उनकी मां का पूरा ध्यान बच्चे की जगह जॉब पर होता है।

एक अंग्रेजी समाचार पत्रिका को बताते हुए यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एम्ला फिटजिस्मोन्स ने खुलासा किया कि करीब 29 प्रतिशत बच्चे ठीक से नाश्ता नहीं कर पाने की वजह से मोटापे का शिकार हो रहे हैं। वहीं 19 प्रतिशत बच्चे दिन में औसतन तीन घंटे से ज्यादा टीवी देखने से मोटे हो रहे हैं।

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प्रोफेसर एम्ला ने बताया कि इस बारे में लगभग 20 हजार परिवारों पर रिसर्च की गई, जिसमें सामने आया कि वर्किंग वुमेन्स के बच्चे दूसरों के मुकाबले ज्यादा मोटे होते हैं। रिसर्च के मुताबिक जो महिलाएं जॉब पर जाती हैं वो बच्चों के लिए घर के खाने की बजाय बिस्कुट, दालमोट, चॉकलेट्स आदि पैकेट वाली चीजें रखकर जाती हैं।

जो बच्चे 10 साल एवं इससे छोटी उम्र के हैं वो ज्यादातर खेलते या टीवी देखते समय उन्हीं पैकेट फूड्स को खाते हैं। जिससे उनका मोटापा बढ़ने लगता है। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे बच्चे रोजाना की शुगर की मात्रा से ज्यादा एक दिन में लेते हैं। जिससे उनके शरीर की चर्बी बढ़ने लगती है।


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भारतीय माता-पिता किस तरह छोटे बच्चों में बढ़ा रहे डिजिटल लत, आगे चलकर बच्चों को हो सकती है ये दिक्कत


नई दिल्ली। अगर आप भी उन माता-पिता में से हैं, जो अपने छोटे बच्चों को खाना खिलाते समय या उन्हें व्यस्त रखने के लिए उनके हाथ में स्मार्टफोन या टेबलेट थमा देते हैं, तो समय रहते चेत जाइए, क्योंकि यह आदत उन्हें न केवल आलसी बना सकती है, बल्कि उनकी उम्र के शुरुआती दौर में ही उन्हें डिजिटल एडिक्शन की ओर धकेल सकती है। अमरीकन अकेडमी ऑफ पीडियेट्रिक्स (आप) के अनुसार, 18 महीने से कम उम्र के बच्चों के लिए केवल 15-20 मिनट ही स्क्रीन पर बिताना स्वास्थ्य के लिहाज से सही और स्वीकार्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि व्यस्त शेड्यूल और छोटे बच्चों की सुरक्षा के प्रति जरूरत से अधिक सुरक्षात्मक रुख रखने वाले माता-पिता अपने छोटे बच्चों को स्मार्ट स्क्रीन में संलग्न कर रहे हैं।

खिलौनों के साथ खेलने या बाहर खेलने की जगह, इतनी छोटी उम्र में उन्हें डिजिटल स्क्रीन की लत लगा देना उनके सर्वागीण विकास में बाधा डाल सकता है, उनकी आंखों की रोशनी को खराब कर सकता है और बचपन में ही उन्हें मोटापे का शिकार बना सकता है, जो फलस्वरूप आगे चलकर डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हाई कॉलेस्ट्रॉल का कारण बन सकता है। मैक्स हेल्थकेयर, गुरुग्राम की मनोविशेषज्ञ सौम्या मुद्गल ने एक मीडिया एजेंसी को बताया, "खिलौने छोटे बच्चों के दिमाग में विजुअल ज्ञान और स्पर्श का ज्ञान बढ़ाते हैं।"

ज्यादा स्क्रीन टाइम छोटे बच्चों को आलस्य और समस्या सुलझाने, अन्य लोगों पर ध्यान देने और समय पर सोने जैसी उनकी ज्ञानात्मक क्षमताओं को स्थायी रूप से नष्ट कर सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बच्चों के लिए स्क्रीन पर सामान्य समय बिताने की सही उम्र 11 साल है। लेकिन, ब्रिटेन की ऑनलाइन ट्रेड-इन आउटलेट म्यूजिक मैगपाई ने पाया कि छह साल या उससे छोटी उम्र के 25 प्रतिशत बच्चों के पास अपना खुद का मोबाइल फोन है और उनमें से करीब आधे अपने फोन पर हर सप्ताह 21 घंटे तक का समय बिताते हैं। इस दौरान वे स्क्रीन पर गेम्स खेलते हैं और वीडियोज देखते हैं। विशेषज्ञ माता-पिता को अपने बच्चों को स्क्रीन पर 'ओपन-एंडिड' कंटेंट में संलग्न करने की सलाह देते हैं, ताकि यह एप पर समय बिताने के दौरान उनकी रचनात्मकता को बढ़ाने में मदद करे और यह उनके लिए केवल इनाम या उनका ध्यान बंटाने के लिए इस्तेमाल किए जाने के स्थान पर उनके ज्ञानात्मक विकास में योगदान दे। हालांकि, थोड़ी देर और किसी की निगरानी में स्क्रीन पर समय बिताना नुकसानदायक नहीं है।

मुद्गल ने कहा, "प्रौद्योगिकी बच्चे के सामान्य सामाजिक परस्पर क्रिया और आसपास के परिवेश से सीखने में बाधा नहीं बननी चाहिए।" एक बार स्मार्ट फोन या टेबलेट की लत लगने पर बाद में उन्हें स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने से रोकने पर बच्चों में चिड़चिड़ा व्यवहार, जिद करना, बार-बार मांगना और सोने, खाने या फिर जागने में नखरे करने जैसे विदड्रॉल सिम्पटम की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को डिजिटल लत से दूर रखने के लिए माता-पिता को न केवल बच्चों के लिए, बल्कि खुद के लिए भी घर में डिजिटल उपकरणों से मुक्त जोन बनाने चाहिए, खासतौर पर खाने की मेज पर और बेडरूम में।मुद्गल ने कहा, "बच्चे वही सीखते हैं, जो वे देखते हैं। बच्चों को इस लत से दूर रखने के लिए माता-पिता को उनके सामने खुद भी सही उदाहरण रखना चाहिए।"


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स्पेसएक्स के क्रू ड्रैगन की पहली मानवरहित परीक्षण उड़ान पूरी


नई दिल्ली। एलन मस्क के स्वामित्व वाली अंतरिक्ष क्षेत्र की कंपनी स्पेसएक्स के क्रू ड्रैगन अंतरिक्ष यान ने अपनी ऐतिहासिक मानवरहित परीक्षण उड़ान शुक्रवार पूरी कर ली। यान पूर्वी मानक समयानुसार सुबह 8.45 बजे अटलांटिक महासगर में उतरा। डेमो-1 नाम वाला यह मानवरहित प्रदर्शन मिशन मानव के लिए डिजाइन किए गए किसी अंतरिक्षण प्रणाली की पहली परीक्षण उड़ान है, और इसे एक अमरीकी व्यावसायिक कंपनी ने एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी के जरिए निर्मित और संचालित किया है।

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nasa के प्रशासक जिम ब्रिडेंस्टाइन ने एक ट्वीट में कहा, "स्पेसएक्स के डेमो-1 के तहत क्रू ड्रैगन यान का अंतरिक्ष केंद्र जाने के बाद आज की सफल वापसी मानव अंतरिक्ष उड़ान के एक नए युग में एक और मील का पत्थर है।" इस यान ने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र से पूर्वी समयानुसार तड़के 2.32 बजे प्रस्थान किया।

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मानवरहित डेमो-1 परीक्षण उड़ान से आईएसएस के लिए सुरक्षित मानवसहित उड़ान भरने और वापस लौटने की स्पेसएक्स की क्षमता प्रदर्शित हुई है। नासा और स्पेसएक्स आगे डेमो-2 की की तैयारी के लिए डेमो-1 के आंकड़े का इस्तेमाल करेंगे। डेमो-2 मानवसहित मिशन होगा, जो नासा के अंतरिक्षयात्रियों बॉब बेहंकेन और डौग हर्ली को आईएसएस लेकर जाएगा। यह मिशन फिलहाल जुलाई में प्रस्तावित है।

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स्पेसएक्स का क्रू ड्रैगन पृथ्वी के लिए रवाना, मानवरहित अंतरिक्ष उड़ान का माना जाता है प्रतीक


नई दिल्ली। एलन मस्क के स्वामित्व वाली अंतरिक्ष क्षेत्र की कंपनी स्पेसएक्स का क्रू ड्रैगन पृथ्वी पर लौटने के लिए शुक्रवार को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र (आईएसएस) से प्रस्थान कर गया। ड्रैगन की सुरक्षित वापसी मानव को ले जाने के लिए बनाए गए यान के पहले मानवरहित उड़ान के परीक्षण के पूरा होने का प्रतीक होगी।

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नासा ने ट्वीट किया, "प्रस्थान की पुष्टि हो गई है। 2.32 बजे क्रू ड्रैगन अंतरिक्षयान अंतरिक्ष केंद्र से अलग हो गया है। अंतरिक्ष यान हमारी प्रयोगशाला से धीरे-धीरे दूर जा रहा है।"

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नासा ने शुक्रवार को एक ब्लॉग पोस्ट में कहा, "डेमो-1 कहा जाने वाला बिना क्रू का प्रदर्शन मिशन का आखिरी मील का पत्थर है और यह शुक्रवार सुबह 8.45 बजे (भारतीय समयनुसार शाम 7.15 बजे) के आसपास अटलांटिक महासागर में निर्धारित तरीके से सुरक्षित वापसी करेगा।" दो मार्च को अपनी पहली मानवरहित उड़ान की शुरुआत करने के बाद ड्रैगन ने तीन मार्च को आईएसएस पर पहुंचा था।

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NASA ने सालों की खोज के बाद की नए ग्रह की पुष्टि, आकार में सूर्य से है 60 गुणा बड़ा


नई दिल्ली। अमरीका की अंतरिक्ष एजेंसी nasa ने सौरमंडल के बाहर के पहले एक ग्रह की मौजूदगी की पुष्टि की है। NASA ने बताया है कि उनके अंतरिक्ष टेलिस्कोप केपलर की लॉन्चिंग के 10 साल बाद इस ग्रह की मौजूदगी के बारे में पता लगाया जा सका है। अमरीका की यूनिवर्सिटी ऑफ हवाई के शोधकर्ताओं ने बताया कि इस ग्रह को केपलर-1658 बी के तौर पर पहचाना गया है। जो 3.85 दिन में अपने तारे का चक्कर पूरा करता है। NASA ने बताया कि यह ग्रह सूर्य से भी 60 गुना बड़ा बताया जा रहा है।

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जानकारी के अनुसार, केपलर टेलिस्कोप को 2009 में लॉन्च किए जाने के बाद हजारों एक्सोप्लेनेट यानी की सौरमंडल के बाहर के ग्रहों की खोज की गई है। सौरमंडल में ग्रह जब भी अपने तारे के सामने से निकलता है तो उसके तारे पर उसकी छाया दिखने लगती है और केपलर में भी इसी छाया के दिखने पर ग्रह के होने का अनुमान लगाया गया है। लेकिन इसे साबित करने के लिए अभी और ज्यादा विश्लेषण की जरूरत है।
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इस मामले पर अमरीका की अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने द्वीट पर जानकारी दी है जिसमें उन्होंने कहा है कि केपलर टेलिस्कोप ने (केपलर-1658 बी) ग्रह की खोज की है और वैज्ञानिक ने भी इसकी पुष्टि की है। केपलर द्वारा 2011 में खोजे गए इस ग्रह केपलर-1658 बी की पुष्टि में शोधकर्ताओं को मुश्किलों का सामना करना पड़ा क्योंकि इससे जुड़े अनुसंधानकर्ता कहते थे कि यह ग्रह सूर्य से 60 गुना ज्यादा बड़ा मालूम होता है।

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भारतीय रक्षा वैज्ञानिक को मिली बड़ी सफलता, अमरीका करेगा सम्मानित


नई दिल्ली। सरकार द्वारा संचालित रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन डीआरडीओ के अध्यक्ष जी. सतीश रेड्डी को अमरीकी इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोनॉटिक्स एंड एस्ट्रोनॉटिक्स ने 2019 के मिसाइल सिस्टम अवार्ड से सम्मानित किया है। उन्हें यह पुरस्कार एक अन्य वैज्ञानिक के साथ संयुक्त रूप से दिया जाएगा। वर्जीनिया स्थित अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी सोसायटी ने रविवार को एक बयान में कहा, "रेड्डी को बहुविधि रणनीतिक एवं टैक्टिकल मिसाइल प्रणालियों, निर्देशित हथियारों, उन्नत वैमानिक एवं नौवहन प्रौद्योगिकी की भारत में घरेलू डिजाइन तैयार करने, उसका विकास करने और उसे तैनात करने में तीन दशकों के योगदान के लिए चुना गया है।"
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रेड्डी 55 रक्षा सचिव और यहां डीआरडीओ की अंतरिक्ष शाखा एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी एडीए के महानिदेशक भी हैं। मिसाइल अवार्ड के दूसरे विजेता रोनडेल जे. विल्सन अरिजोना के टकसन स्थित रेथियन मिसाइल सिस्टम्स के सेवानिवृत्त इंजीनियरिंग फेलो हैं।

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बयान में कहा गया है, "विल्सन का चयन उनके तकनीकी नेतृत्व और नवाचार के लिए किया गया है, जिससे दुनिया की प्रमुख मिसाइल रक्षा प्रणालियों का प्रदर्शन और उनकी क्षमता उन्नत हुई है।" यद्यपि यह पुरस्कार मैरीलैंड के लॉरेल स्थित जॉन हॉपकिन्स युनिवर्सिटी की अप्लाइड फिजिक्स लैबोरेटरी के कोसियाकोफ सेंटर में सात मई से नौ मई तक आयोजित सोसायटी के रक्षा फोरम में प्रदान किया जाएगा, लेकिन रेड्डी यह पुरस्कार भारत में प्राप्त करेंगे।

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600 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भारत में दौड़ेगी यह ट्रेन, अमेरिका भी इस तकनीक से कोसों दूर


नई दिल्ली। भारत में टेक्नोलॉजी का विस्तार करते हुए (RRCAT) के वैज्ञानिक आर. एन. एस. शिंदे और 50 लोगों की एक टीम ने 600 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली ट्रेन का मॉडल तैयार कर लिया है। यह मॉडल इन वैज्ञानिकों की दिन रात की मेहनत का नतीजा है। इस मॉडल को इंदौर के प्रगत प्रौद्योगिकी केंद्र में तैयार किया गया है।

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जापान और चीन के बाद अब यह भारत में संभव हो पाया है कि 600 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से चलने वाली मैग्लेव ट्रेन का मॉडल तैयार हुआ है। कहा जा रहा है कि लगभग 10 वर्षों की मेहनत का नतीजा निकला है कि जल्दी ही मैग्नेटिक फ़ील्ड की सतह के ऊपर चलने वाली ट्रेन का मॉडल भारत ने बना लिया है।

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इस टेक्नोलॉजी से अभी अमेरिका भी दूर है। (RRCAT) जोकि भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत आता इसमें वैज्ञानिक देश को विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति लाने के लिए दिन-रात काम कर तकनीक पर नई-नई रिसर्च कर रहे हैं।

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यहां वैज्ञानिकों ने बुलेट ट्रेन की स्पीड से भी ज्यादा तेज़ी से चलने वाली मैग्लेव ट्रेन का सफल परीक्षण करने में कामयाबी हासिल की है। मैग्लेव ट्रेन पूर्ण रूप से स्वदेशी तकनीक से बनाई गई ट्रेन है। कहा जा रहा है कि इस तकनीक का आविष्कार होने के बाद कई विदेशी एजेंसियों ने भारतीय वैज्ञानिकों से संपर्क किया है। हालांकि सरकार इस तकनीक को कैसे काम में लाएगी इसके बारे में तो आने वाले समय में ही पता लगेगा

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मोबाइल खत्म कर रहा है पढऩे की आदत


जर्मनी सरकार के सलाहकार ने सरकार को सलाह दी है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों को स्मार्टफोन फोन के प्रयोग पर पाबंदी लगाई जाए। जुलिया वॉन विलर ने रिपोर्ट में बताया है कि बच्चों को सबसे अधिक यौन हिंसा से पीडि़त होने का खतरा है जिससे पूरी दुनिया परेशान होगी।

पोर्ट में स्मार्टफोन को भविष्य का सबसे बड़ा खतरा बताया है जिससे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर बुरा असर पड़ रहा है। उन्होंने बताया है कि जैसे हम अपने बच्चों को शराब और दूसरे तरह के नशे से बचाने पर ध्यान देत हैं उसी तर्ज पर स्मार्टफोन के इस्तेमाल से बच्चों का बचाव जरूरी है। अभिभावक भी बच्चों की इस परेशानी को लेकर बेहद गंभीर हैं। स्मार्टफोन से बच्चों की पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। बच्चों में स्मार्टफोन पर अधिक समय बिताने को लेकर गूगल और एक स्मार्टफोन कंपनी ने सॉफ्टवेयर भी तैयार किया है जिससेे अभिभावक पता कर लेंगेे कि बच्चा कितना समय स्मार्टफोन पर दे रहा है।

पढ़ाई पर भी बुरा असर
तकनीक का बुरा असर बच्चे के स्वभाव और शिक्षा पर पड़ रहा है। अमरीकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार सोशल मीडिया और स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल से युवाओं में पढऩे की आदत तेजी से कम हो रही है। नतीजा ये है कि उनके सोचने की क्षमता भी तेजी से कमजोर हो रही है। 1970 के दशक में हाई स्कूल में पढऩे वालों से बात की गई तो बताया कि वे उस दौर में 60 फीसदी समय किताब, मैगजीन व समाचार पत्र पढऩे में व्यतीत करते थे। 2016 में इस बारे में हाईस्कूल के छात्रों से पूछा गया तो ये आंकड़ा 16 फीसदी पर सिमट गया।

वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत


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प्रधानमंत्री मोदी ने नवाचार के लिए अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को सराहा


नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को कहा कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम उदाहरण है कि कैसे कोई देश सीमित संसाधन होने के बावजूद नवाचार के साथ आगे बढ़ता है। मोदी ने यहां राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर विज्ञान भवन में आयोजित एक समारोह में कहा, "अगर हमारे पास इच्छाशक्ति है, हम सीमित संसाधन के साथ भी सफलता हासिल कर सकते हैं। हमारा अंतरिक्ष कार्यक्रम उदाहरण है कि कैसे सीमित संसाधनों के साथ बेहतरीन परिणाम प्राप्त किया जा सकता है।"

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समारोह का आयोजन विज्ञान व प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार के लिए किया गया। मोदी ने कहा, "भारतीय वैज्ञानिकों ने हमेशा मानवता के विकास की दिशा में योगदान दिया है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और रिसर्च से जुड़े संस्थानों को समाज के भविष्य को देखते हुए खुद को ढालने की आवश्यकता होती है।" प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में बनी दवाइयों को 200 से ज्यादा देशों में भेजा जाता है और फार्मा व जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्रों को आगे बढ़ाने की जरूरत है।

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इस साल चेन्नई ने की 'साइंस एट द सभा' की मेजबानी, डाली न सब पहलुओं पर रोशनी


नई दिल्ली। द इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमेटिकल साइंसेज द्वारा आयोजित 'साइंस एट द सभा' का चौथा संस्करण यहां 24 फरवरी को संपन्न हो गया। एक अधिकारी ने इस बात की जानकारी दी। यह कार्यक्रम संस्थान की आम आदमी तक पहुंच बनाने की कोशिश का हिस्सा है। आम लोगों के लिए अपने आउटरीच कार्यक्रम के हिस्से के रूप में द इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमेटिकल साइंसेज (IMSc) की एक टीम ने विज्ञान वार्ता आयोजित की जिसमें 13 सूचनात्मक पैनल प्रदर्शित किए गए। प्रदर्शनी में सी वी रमन और सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर ने एजुकेशनल जर्नी पर भी प्रकाश डाला।

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इस कार्यक्रम में मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की संध्या कौशिक द्वारा 'ट्रैफिक रुल्स इन न्यूरोन', बेंगलुरू स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के विजय शिनॉय द्वारा 'अनट्विस्टिंग द ट्विस्टेड मैटर', बेंगलुरू स्थित अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की हरिनी नागेंद्रा द्वारा 'थिंकिंग इकोलॉजिक्ली अबाउट ऑअर अर्बन फ्यूचर' और चेन्नई स्थित द इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमेटिकल साइंसेज के सिताभरा सिन्हा द्वारा 'द 'होल' इज मोर दैन द सम ऑफ इट्स पार्ट' जैसे विषयों पर बातचीत की गई। 'साइंस एट सभा' शाम चार बजे से साढ़े सात बजे के बीच यहां द म्यूजिक एकेडमी में आयोजित किया गया।

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