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पृथ्वी के 29 साल के बराबर होता है यहां पर 1 साल, जबकि साढ़े 10 घंटे का ही होता है दिन, जाने कैसे हुआ खुलासा


नई दिल्ली। आखिरकार वैज्ञानिकों ने इस बात से पर्दा उठा दिया कि, कि शनि ग्रह पर 1 दिन कितने घंटे का होता है। नासा ने सौरमंडल विज्ञान की इस गुत्थी को सुलझाते हुए बताया कि शनि ग्रह पर सिर्फ साढ़े 10 घंटे से अधिक का दिन होता है। कैसिनी मिशन अब वजूद में नहीं है, लेकिन उससे प्राप्त नए डेटा का उपयोग करके यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया-शांता क्रूज की अगुवाई में वैज्ञानिकों ने बताया कि शनि ग्रह पर एक साल पृथ्वी के 29 साल के बराबर होता है। लेकिन दिन सिर्फ 10 घंटे 33 मिनट और 38 सेकंड का होता है।

चंद्र मिशन की सफलता के बाद चीन बना रहा मंगल फतह करने की योजना, अगले साल शुरू हो सकता है काम

शनि ग्रह के भीतर लगातार होता है कंपन

लोग अब तक इस तथ्य से अनजान थे, क्योंकि यह छल्ले में छिपा हुआ था। विश्वविद्यालय में खगोल विज्ञान के छात्र क्रिस्टोफर मैंकोविज ने छल्ले के भीतर की तरंग के पैटर्न का विश्लेषण किया। नतीजों में पाया गया कि खुद ग्रह के भीतर होने वाले कंपनी से उसमें उसी तरह की प्रतिक्रिया मिलती है, जिस प्रकार की प्रतिक्रिया भूकंप की माप के लिए सिस्मोमीटर में मिलती है। शनि ग्रह के भीतर लगातार कंपन होता है, जिससे उसके गुरुत्वाकर्षण में बदलाव होता है। छल्ले से उस गति का पता चलता है।

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एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ है यह शोध

मैंकोविच ने बताया, "छल्ले में किसी खास स्थान पर यह दोलन छल्ले के कण को आकर्षित करता है, जिससे कक्षा में सही समय पर ऊर्जा का निर्माण होता है।" मैंकोविच का यह शोध एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ है। शोध में शनि ग्रह के आंतरिक मॉडल के बारे में बताया गया, जो छल्ले के तरंग की तरह है। इससे उनको ग्रह की आंतरिक गतिविधि और घूर्णन के बारे में पता चला है।


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अंतरिक्ष की रेस में आगे चीन तीन तरह से रखेगा दबदबा


पिछले साल अक्टूबर में डैमिन चेजल जब नील आर्मस्ट्रॉंन्ग की जीवनी ‘फस्र्ट मैन’ के रूप में रुपहले पर्दे पर आए तो सवाल उठा कि फिल्म में किन पहलुओं को नहीं दिखाया गया है? फिल्म में दिखाया गया है कि अमरीका कैसे अंतरिक्ष की रेस में चीन से पिछड़ गया है। असल में चीन 2045 तक अंतरिक्ष में भी शक्तिशाली देश बनना चाहता है। चीन का लक्ष्य अंतरिक्ष में वर्चस्व कायम करना है। चीन ल्यूनर मिशन से अंतरिक्ष से जमीन पर संपर्क बनाने, अंतरिक्ष की गहराई जानने और वहीं से सर्वेंक्षण करने की तैयारी में है।

पिछले हफ्ते चीन चांद के अनछुए हिस्से पर पहुंचकर अपने मिशन में आगे बढ़ा है। भविष्य में इसी से पता चलेगा कि अंतरिक्ष में कौन कितना ताकतवर है। अंतरिक्ष के संसाधनों जैसे पानी, बर्फ, लोहा, टाइटेनियम और प्लेटिनम पर किसका हक होगा जिसको लेकर लड़ाई तेज हो गई है। ये भी दिलचस्प होगा कि अंतरिक्ष में कौन औद्योगिक और व्यापार नीति बनाएगा और सबसे शक्तिशाली सेना किसके पास होगी। अमरीका अंतरिक्ष में बेतरतीब तरीके से दखल चाहता है तो चीन राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में अपनी बादशाहत कायम करने में लगा है। चीन की चाहत है कि वह सबसे पहले चांंद पर पहुंचकर वहां के संसाधनों पर कब्जा कर ले। ग्रहों में इस्तेमाल होने वाला रॉकेट फ्यूल हाइड्रोजन व ऑक्सीजन से बनता है। चीन इस ईंधन के निर्माण में लगा है जिससे अंतरिक्ष में सैन्य उपकरण और हथियारों का भंडारण हो सके।

चीन का मिशन 2030 भी तय
चीन 2030 तक चांद के उत्तरी और दक्षिणी पोल तक रोबोटिक प्रोब भेजना चाहता है। अब चीन और नासा के बीच ल्यूनर पेलोड सर्विसेस की लड़ाई है जिससे ये पता चलेगा कि अंतरिक्ष में संसाधनों का दोहन सबसे अधिक कौन करेगा। अमरीका चीन को चुनौती नहीं दे पा रहा है और चीन मजबूत होता जा रहा है।

वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत


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चंद्र मिशन की सफलता के बाद चीन बना रहा मंगल फतह करने की योजना, अगले साल शुरू हो सकता है काम


नई दिल्ली। साल के पहले महीने की शुरुआत में ही बड़ी उपलब्धी हासिल करने वाली चीन की अंतरिक्ष एजेंसी लगातार नए मिशनों पर काम कर रही है। ऐसे में चांद के सुदूर इलाके में सफलतापूर्वक रोवर को उतारने से खुश चीन की अंतरिक्ष एजेंसी 2019 के अंत तक चांद के एक अन्य मिशन और 2020 की शुरुआत में मंगल मिशन शुरू करने की योजना बना रही है।

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नासा कर रहा बजट में कटौती

मीडिया रिपोर्टस के अनुसार, अंतरिक्ष में चीन की महत्वाकांक्षा पर बल देने वाली यह योजना उस वक्त सामने आई है, जब अमेरिका नासा के बजट में कटौती कर रहा है और अंतरिक्ष खोज के लिए व्यवसायिक कंपनियों की ओर तेजी से रुख कर रहा है। चीन की अंतरिक्ष एजेंसी के उपाध्यक्ष वु यानहुआ ने कहा कि चाइना नेशनल स्पेस एडमिनस्ट्रेशन लाल गृह की छानबीन के लिए एक रोवर भेजने पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा, "चीन 2020 के आसपास मंगल के लिए अपना पहला अन्वेषण मिशन शुरू करेगा।"

 

तीन जनवरी को उतरा था चीन का रोबोटिक अंतरिक्ष यान

तीन जनवरी को चीन का रोबोटिक अंतरिक्ष यान चेंज 4 चांद के सुदूर हिस्से पर उतरा था, जो कि अंतरिक्ष अन्वेषण के मानव इतिहास में पहला था। वु ने कहा, "अंतरिक्ष एजेंसी की 2019 के अंत में चेंज 5 मिशन शुरू करने की योजना है, जिसका लक्ष्य चांद के समीप भाग से नमूने इकठ्ठा करना है। वे 1976 के बाद से प्राप्त किए गए पहले नमूने होंगे।"

 

चीन कर रहा है अपने खुद के अंतरिक्ष केंद्र का भी निर्माण

चीन अपने खुद के अंतरिक्ष केंद्र का भी निर्माण कर रहा है, जिसके 2022 तक शुरू होने की संभावना है। इसे टियानगोंग या हैवेनली पैलेस का नाम दिया गया है। हालांकि एजेंसी चांद पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने, न भेजने पर अभी फैसला कर रही है।


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दुनिया को पछाड़ इस मामले में भारत बनेगा वैश्विक केंद्र, सरकार बना रही अनुकूल नीतियां


नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र की व्यापार देखने वाली संस्था का कहना है कि भारत अपने विश्वस्तरीय गेम डेवलपर्स की मदद से वीडियोगेम डेवलपमेंट का वैश्विक केंद्र बन सकता है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (अंकटाड) ने सोमवार को अपनी क्रिएटिव इकोनॉमी आउटलुक रिपोर्ट में कहा, "भारत विजुअल इफेक्ट्स (वीएफएक्स) और एनीमेशन इंडस्ट्री में भी प्रगति करेगा जिसका व्यापार 2016 में 16.4 फीसदी वृद्धि कर 8.2 अरब डॉलर का हो गया।"

 

लचीली है भारतीय अर्थव्यवस्था

अंकटाड के क्रिएटिव इकोनॉमी कार्यक्रम की प्रमुख मेरिसा हैंडरसन के अनुसार, "वैश्विक व्यापार में गिरावट से हालांकि सभी उद्योगों पर असर पड़ता है लेकिन रिपोर्ट बताती है कि रचनात्मक अर्थव्यवस्था ज्यादातर की तुलना में ज्यादा लचीली है।" उन्होंने कहा, "रचनात्मक अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन उत्साह बढ़ाने वाला है और बताता है कि यह संस्कृति, प्रौद्योगिकी, व्यापार और नवोन्मेष के मिलन से पूरी हो रही है।"

 

सबसे बड़े बाजारों में एक है भारत

रिपोर्ट के अनुसार, "गेम डेवलपमेंट और गेम सपोर्ट सर्विस जैसी बाहरी स्रोत से काम कराने में भारत केंद्र बन चुका है। कम कीमतों और विश्वस्तरीय गेम डेवलपमेंट अनुभव वाले गेम डेवलपर्स के सुलभ होने से भारत आने वाले सालों में विभिन्न गेम के विकास, पोर्ट और डबिंग का केंद्र बन सकता है।" इसके अनुसार, 35 करोड़ की युवा जनसंख्या वाला भारत वैश्विक गेमिंग उद्योग के सबसे बड़े बाजारों में से भी है।

 

सरकार बना रही वीएफएक्स और एनीमेशन उद्योग के अनुकूल नीतियां

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका, कनाडा जैसे स्थापित और कोरिया गणराज्य, फ्रांस, चीन और मलेशिया जैसे उभरते बाजारों को चुनौती देने के लिए भारत में सरकारें वीएफएक्स और एनीमेशन उद्योग के अनुकूल नीतियां लागू कर रही हैं। अंकटाड ने महाराष्ट्र का उदाहरण दिया। इसके अनुसार महाराष्ट्र सरकार नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन एनीमेशन, वीएफएक्स, गेमिंग एंड कॉमिक्स स्थापित करने में सहयोग कर रही है। कर्नाटक ने फाइन आर्ट स्कूलों के पाठ्यक्रम में डिजिटल आर्ट्स को शामिल किया है और तेलंगाना एक इंक्यूबेशन सेंटर तैयार कर रहा है।


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इस साल प्रौद्योगिकी की दुनिया में रहेगा 'एबीसीडी-आई' का जलवा, रिपोर्ट में हुआ खुलासा


नई दिल्ली। प्रौद्योगिकी की दुनिया में वर्ष 2019 में एबीसीडी-आई (आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस (एआई), ब्लॉकचेन, क्लाउड, डाटा एनालिटिक्स और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) का अधिपत्य रहेगा। शनिवार को आई एक नई रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न उपक्रमों के प्रसार से ये अगले 2-3 सालों में और ज्यादा उन्नत हो जाएंगे। साइबर मीडिया रिसर्च (सीएमआर) के टैक्नॉलोजी ट्रेंड्स डोजियर 2019 के अनुसार, जहां ये प्रौद्योगिकियां पारंपरिक आईटी पर छा जाएंगी, वहीं ये व्यापक रूप से उपयोग में नहीं लाईं जा सकेंगी क्योंकि इनमें से कई अभी भी विसकित हो रही हैं।

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कई मायनों में होगा यह साल बेहद खास

सीएमआर के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और प्रमुख थॉमस जॉर्ज ने कहा, "सीएमआर में, हमने परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकियों के संपूर्ण और व्यापक पहलू को देखा जो उद्यमों का अगले 2-3 सालों विशेषकर 2019 में संचालन करेगा।" यही वजह है कि 2019 में सबसे प्रमुख विषय प्रौद्योगिकी निरंतरता और प्रौद्योगिकी परिपक्वता में से एक होगा।

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शामिल हुए थे इन क्षेत्रों के दिग्गज

सीएमआर के इंडस्ट्री इंटेलीजेंस ग्रुप के प्रमुख प्रभु राम ने कहा, "नई प्रौद्योगिकी खोजों से उद्यमों की तत्परता बढ़ाते रहने से मैपिंग और उद्यम दृष्टि सक्रिय करने और आगे की प्रौद्योगिकी को सूचीबद्ध करने के लिए सीआईओ की भूमिका और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।" डोजियर में भारत के कुछ प्रमुख सीआईओ, सीटीओ और विभिन्न प्रमुख उद्योगों के विशेषज्ञों के विचारों को शामिल किया गया।


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चीन ने चांद पर झंड़ा फहराकर गढ़ा नया कीर्तिमान, देखती रही पूरी दुनिया


नई दिल्ली। चीन का अंतरिक्ष यान चांग-4 शुक्रवार को रोवर चंद्रमा की सतह पर उतर कर एक नया कीर्तिमान गढ़ दिया। इसके बाद चीन ने चांग ई-4 मिशन को पूरी तरह सफल बताया है। इस मिशन में अंतरिक्षयान ने चंद्रमा के सुदूर क्षेत्र में कदम रखा था। रिले उपग्रह क्वीकियाओ (मैगपी ब्रिज) की सहायता से चांग ई-4 के रोवर युतु-2 (जेड रैबिट-2) और लैंडर ने एक-दूसरे की तस्वीरें ली हैं, जो इसके सुचारु रूप में कार्य करने का संकेत है। बता दें कि चीन ने चांग- 4 को पिछले महीने 8 दिसंबर को लॉन्च किया था। इससे पहले चीन ने साल 2013 में चांग- 3 लांच किया था जो 1976 के बाद चांद पर उतरने वाला पहला स्पेसक्राफ्ट बना था।

 

चांद से आई तस्वीरें

चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (सीएनएसए) ने कहा कि जांच में शामिल वैज्ञानिक उपकरणों ने अच्छी तरह से काम किया है और रोवर द्वारा ली गई तस्वीरें और डेटा को वापस ग्राउंड कंट्रोल में भेज दिया गया है। शुक्रवार शाम 4.47 बजे बीजिंग एयरोस्पेस कंट्रोल सेंटर में लैंडर और रोवर की तस्वीरें एक बड़ी स्क्रीन पर दिखाई गईं। दोनों लैंडर पर चीनी राष्ट्रध्वज नजर आ रहे थे और तस्वीरों की पृष्ठभूमि में चंद्रमा की सतह नजर आ रही थी। चांग ई-4 तीन जनवरी को 177.6 डिग्री पूर्वी देशांतर और 45.5 डिग्री दक्षिणी अक्षांश में चांद के अनदेखे हिस्से में उतरा था और फिर बीती रात रोवर चंद्रमा की सतह पर उतरा था।

 

चांद के एक हिस्से को नहीं देख पाते लोग

जिस प्रकार पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा करती है। ठीक वैसे ही चांद, पृथ्वी की परिक्रमा करती है। यही वजह है कि जब चांद धरती का चक्कर लगा होता है तो उस वक्त अपनी धुरी पर घूमने होने के कारण लोग चांद के एक हिस्से को ही देख पाते हैं और चंद्रमा का दूसरा हिस्सा पृथ्वी के सामने कभी नहीं आ पाता है। । बता दें कि पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा है, जिसने इसकी परिक्रमा ४.५३ बिलियन साल पहले शुरू की थी।


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पांच वैज्ञानिक जिन्होंने अपनी रिसर्च से देश को दुनियाभर में नई पहचान दी है


हाल ही अमरीकी संस्था क्लैरिवेट एनॉलिटिक्स ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें दुनियाभर से चार हजार प्रभावशाली वैज्ञानिकों को उनकी रिसर्च के लिए जगह मिली है जिसमें भारत के दस वैज्ञानिक शामिल हैं। रिपोर्ट में 60 देशों के वैज्ञानिकों को शामिल किया गया था जिसमें 80 फीसदी वैज्ञानिक दस देशों से थे। सबसे अधिक 186 वैज्ञानिक हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से इस सूची में शामिल किए गए थे। इस सूची के आने के बाद पूरे देश में अब आवाज उठने लगी है कि अगर शोध की दुनिया में भारत को आगे बढऩा है तो सरकार और वैज्ञानिकों को आधुनिक रिसर्च पर अधिक ध्यान देना होगा जिसस ेहम दूसरे देशों को बराबरी की टक्कर दे सकें। रिपोर्ट जारी होने के बाद कुछ वैज्ञानिकों ने कहा कि कॉलेज स्तर पर रिसर्च को बढ़ावा देने का वक्त आ चुका है।

समुद्र की 100 फीट गहराई में ईंधन बनाने की खोज

डॉ. रजनीश कुमार, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआटी) मद्रास के कैमिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर हैं। अपनी टीम के साथ मिलकर एक ऐसी खोज की है जिसमें क्लैथरेट हाइड्रेट मॉलीक्यूल जो मिथेन की तरह होता है उसका इस्तेमाल ईंधन के रूप में हो सकता है। ये तत्त्व आमतौर पर बहुत अधिक या बहुत कम तापमान में बनता है जैसे समुद्र में 100 मीटर नीचे या ग्लेशियर जैसे क्षेत्रों में। आइआइटी मद्रास की टीम ने लैब में 263 डिग्री सेल्सियस का तापमान पैदा किया जो सामान्यत: समुद्र की गहराई में ही संभव हो पाता है। इस तकनीक से कॉर्बनडाईऑक्साइड पर भी नियंत्रण कर ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के साथ कार्बनडाईऑक्साइड को समुद्र की तलहटी में दबाया जा सकता है।

दिल्ली को पराली के धुंए से बचाने की है तैयारी

डॉ. दिनेश मोहन दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों को प्रदूषण से बचाने के लिए ‘बायोचार’ तकनीक खोजी है जिससे पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को रोका जा सके। इन्होंने खेतों में जमीन के भीतर रिएक्टर तैयार करने का फॉर्मूला बनाया जिसमें पराली को जमीन के भीतर डालकर झोपड़ी बनाने में इस्तेमाल होने वाले कीचड़ से ढक देते हैं। इस प्रक्रिया में 24 से 48 घंटे का समय लगता है। कुछ साल के भीतर पराली जमीन के भीतर सड़ जाती है। इससे भूर्मि की ऊर्वरक क्षमता बढ़ती है। भूमि में पानी की नमी नमी लंबे समय तक बनी रहेगी।

कैंसर सेल्स पर अटैक करती है इनकी दवा

डॉ. संजीब कुमार साहू भुवनेश्वर के इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ साइंसेस में वैज्ञानिक हैं। कैंसर ड्रग डिलेवरी तकनीक में नैनो टेक्नोलॉजी के एक्सपर्ट हैं। इन्होंने अपनी रिसर्च में पाया कि इलाज के बाद पूरी तरह ठीक हो जाने वाला कैंसर दोबारा इसलिए होता है क्योंकि स्वस्थ कोशिकाओं में भी कैंसर सेल्स रह जाते हैं जो लंबे समय बाद उभरकर सामने आते हैं। ऐसी स्थिति में मैग्नेटिक (चुंबकीय) नैनो पार्टिकल तकनीक कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने के साथ एमआरआइ जांच में मदद करती है। कैंसर रिलैप्स को खत्म करना लक्ष्य है।

60 यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की डिग्री

डॉ. सी.एन राव भारत रत्न और वैज्ञानिक सी.एन राव कैमेस्ट्री के प्रसिद्ध जानकार हैं। इन्हें 60 विश्वविद्यालयों से डॉक्टरेट की मानद उपाधि मिली है। इनके 1500 से अधिक शोध पत्र और 45 से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी है। मौजूदा समय में देश के प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के प्रमुख हैं। 17 साल की उम्र में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से कैमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। 24 साल की उम्र में 1958 के दौर में दो साल नौ महीने में ही पीएचडी की डिग्री पूरी कर ली थी।

फसलों की गुणवत्ता बढ़ाने में लगे हैं

डॉ. राजीव वाष्र्णेय अंतरराष्ट्रीय स्तर के कृषि वैज्ञानिक हैं और इस क्षेत्र में इन्हें बीस वर्षों का अनुभव है। अभी ये ग्लोबल रिसर्च प्रोग्राम के तहत फसलों का जीन बैंक तैयार करने के साथ ब्रीडिंग सेल, बीज, मॉलीक्यूलर बायोलॉजी और जेनेटिक इंजीनियरिंग को लेकर काम कर रहे हैं जिससे कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाकर किसानों की आय और फसलों की गुणवत्ता को बेहतर किया जा सके। कृषि क्षेत्र को लेकर इनके 325 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं।


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एआई से घर खरीदने- बेचने की प्रक्रिया करेंगे आसान


जोसेफ सिरोश भारतीय मलू के अमरीकी नागरिक हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जाने माने एक्सपर्ट हैं। हाल ही दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट से इस्तीफा देकर न्यूयॉर्क की रियल एस्टेट कंपनी कंपास के साथ चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर के तौर पर काम शुरू किया है। ये घर खरीदने और बेचने की प्रक्रिया को तकनीक की मदद से आसान करेंगे। इसकी जानकारी ट्विटर अकाउंट से दी है।

इनकी बनाई तकनीक से जिस क्षेत्र में कोई घर बिकने वाला होगा और कंपास ऐप इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति जब उस घर के बीस फीट के दायरे से गुजरेगा तो ऐप पर उस घर से संबंधित सभी तरह की जानकारी मिलने लगेगी। खास बात ये है कि इसकी जानकारी घर बेचने वाले व्यक्ति को भी मिल जाएगी और दोनों चाहें तो एक दूसरे से उसी वक्त संपर्क कर सकते हैं। अब टेक्नोलॉजी और सेंसर से इसे और एडवांस्ड करने में लगे हैं। इसके साथ ही मशीन लर्निंग तकनीक से घर की तस्वीर को भी बेहतर ढंग से देख सकते हैं। इससे व्यक्ति का काफी समय बचेगा और घर खरीदने और बेचने की प्रक्रिया में कुल समय का केवल 11 फीसदी समय ही खर्च करना पड़ेगा। ये ऐप की मदद से रियल इस्टेट मार्केट को बदल देना चाहते हैं जहां बेचने वाले से लेकर खरीदार और बिचौलिये का काम आसान हो जाएगा। इन्होंने एक साक्षात्कार में कहा है कि भारत में भी इस तकनीक की मदद से कई क्षेत्रों की स्थिति को सुधारना चाहते हैं।

इनका मानना है कि भारत में सबसे पहले तीन क्षेत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बहुत अधिक जरूरत है जिससे हालात ठीक हो सकते हैं। इसमें सबसे पहले कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा का क्षेत्र है जिसमें एआई का इस्तेमाल किया जाए तो देश की बुनियाद को और अधिक मजबूत बनाया जा सकता है। इनका मानना है कि तकनीक व्यवस्था को व्यापक बनाने का काम करती है जिसका कम से कम समय में बेहतर परिणाम मिलता है। खास बात ये है कि इस तरह के बदलाव से देश के लाखों युवाओं को अच्छी नौकरियां भी मिलेंगी।


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गूगल में इस नाम से सर्च पर सिर्फ पुरुषों की तस्वीर क्यों?


महिलाएं हर क्षेत्र में आगे हैं लेकिन गूगल पर सीइओ और मैनेजर के नाम से तस्वीर खोजेंगे तो सबसे अधिक पुरुषों की तस्वीर स्क्रीन पर पहले दिखेगी। ये हाल तब है जब दुनियाभर में बारटेंडर, प्रोबेशनरी अफसर और मेडिकल विज्ञान जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या लगभग बराबरी पर है। 57 फीसदी नौकरियों से जुड़ी इमेज सर्च करने पर पुरुषों की तस्वीर अधिक सामने आती है जिससे ये लगता है कि इन क्षेत्रों में पुरुषों का दबदबा है जबकि हकीकत इसके उलट है। इससे इन पेशों में जो महिलाएं हैं उनका विश्वास कमजोर हो रहा है। इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम ये है कि कार्यस्थल पर महिलाओं को भेदभाव और मानसिक प्रताडऩा से गुजरना पड़ता है।

इसका खुलासा प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट में हुआ है जिसमें 100 नौकरियों को आधार बनाकर गूगल इमेज सर्च में महिला प्रतिनिधित्व के बारे में विस्तार से अध्ययन किया गया। इसके बाद इस रिपोर्ट की तुलना श्रम विभाग के आंकड़ों से की गई जिसमें ये चौंकाने वाली बात सामने आई है। शोध में ये भी पता चला कि सर्च रिजल्ट में पुरुष सबसे शीर्ष पर थे। दूसरी तस्वीर भी पुरुष की ही थी। जो महिला शीर्ष पर भी उसकी तस्वीर भी चौथी तस्वीर के बाद ही दिख रही थी।

महिलाओं के प्रति बनेगी नकारात्मक छवि: न्यू अमरीका लेफ्ट थिंक टैंक की फेलो हेली स्वेन्सन कहती हैं कि इससे समाज में महिलाओं को लेकर एक नकारात्मक छवि बनेगी जो उनके लिए ठीक नहीं है। प्यू सोशल ट्रेंड्स रिसर्च डायरेक्टर किम पार्कर कहती हैं कि ऐसा होने पर महिलाओं के प्रति एक अलग सोच बनती है और लोग उन्हें अल्पसंख्यक के तौर पर मानते हैं। प्यू रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार इस शोध में 7 जुलाई से 13 सितंबर 2018 के बीच 10 हजार तस्वीरों का अध्ययन किया गया था।


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इस यान से मंगल ग्रह पर पहुंचना होगा आसान, इलन मस्क ने उठाया तस्वीरों से पर्दा


नई दिल्ली। मंगलयान की यात्रा में जाने वाले लोगों के लिए अच्छी खबर आई है। दरअसल, स्पेसएक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी इलन मस्क ने पहली बार कंपनी के स्टारशिप परीक्षण उड़ान वाले यान की एक झलक दिखाई है। इस यान को 'हॉपर' नाम दिया गया है। इस बात की जानकारी मस्क ने यान की तस्वीर के साथ ट्वीट करके दी है। बता दें कि इस यान को मनुष्य और सामान को मंगल पर ले जाने के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है तथा इसके इस्तेमाल से यात्रा के समय में काफी कमी आएगी।

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मास्क ने ट्वीट करके दी जानकारी

बता दें मास्क ने गुरुवार को ट्वीट करके जानकारी दी, कि "स्टारशिप टेस्ट फ्लाइट रॉकेट की स्पेसएक्स टेक्सास लांच साइट पर अभी असेंबली का काम पूरा हुआ। यह एक वास्तविक तस्वीर है, कोई रैंडरिंग नहीं है।" गौरतलब है कि स्टारशिप यान को पहले बिग फाल्कन रॉकेट (बीएफआ) नाम से जाना जाता था। यह पूरी तरह से दोबारा इस्तेमाल किया जा सकने वाला यान है, जिसे मनुष्य और सामान को मंगल पर ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है। खास तौर पर डिजाइन के इस्तेमाल से यात्रा में लगने वाले समय में काफी हद तक कमी आएगी।

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यह दो चरणों वाला यान है

बता दें कि यह दो चरणों वाला यान है, जिसमें एक बूस्टर और एक शिप है। इसे कंपनी ने फॉल्कन 9, फॉल्कन हेवी और ड्रैगन अंतरिक्ष यान की जगह लेने के लिए डिजाइन किया है। इसे पृथ्वी की कक्षा के साथ ही चांद और मंगल की कक्षा में सेवा प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है।

भारत ने सालभर अंतरिक्ष क्षेत्र में गढ़े नए आयाम, ऐसा रहा पूरा सफरनामा


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आपके अंदर छिपी ये 'शक्ति' हर दिन ऐसे हो रही है खत्म, समय रहते कर लें ये काम नहीं तो...


नई दिल्ली। भागदौड़ वाली दिनचर्या, अव्यवस्थित जीवनशैली, काम का बोझ और मानसिक तनाव के बीच बुरी लतें मौजूदा दौर में लोगों की परेशानी और बढ़ा रही हैं, क्योंकि उनकी शारीरिक ऊर्जा दिन-ब-दिन क्षीण होती चली जाती है। विशेषज्ञ इसे गंभीर चिता का विषय बताते हैं। क्लिनिकल न्यूट्रीशियन, डाइटिशियन और हील योर बॉडी के संस्थापक रजत त्रेहन ने कहा कि लोगों यह सोचने की जरूरत है कि शारीरिक ऊर्जा को कम करने वाली कौन सी बुरी आदतें हैं जिन्हें त्यागकर वह स्वस्थ जीवनशैली अपना सकते हैं। ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कुल 130 करोड़ आबादी में से 28.6 फीसदी लोग तंबाकू का सेवन करते हैं। रिपोर्ट में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि करीब 18.4 फीसदी युवा न सिर्फ तंबाकू, बल्कि सिगरेट, बीड़ी, खैनी, बीटल, अफीम, गांजा जैसे अन्य खतरनाक मादक पदार्थो का सेवन करते हैं।

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बीते साल आई डब्लयू.एच.ओ की ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट में भी कुछ ऐसे ही चिंताजनक आंकड़े सामने आए थे। 2017 में आई इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में बीते 11 सालों में प्रति व्यक्ति शराब की खपत दोगुनी हुई है। जहां 11 साल पहले एक व्यक्ति 3 लीटर शराब पीता था वहीं बीते 11 वर्षो में बढ़कर इसकी खपत बढ़कर 6 लीटर हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस दशक में भारतीय युवाओं में तंबाकू और शराब के अलावा एक और नशीले पदार्थ की लत तेजी से बढ़ी है। वह नशीला पदार्थ है ड्रग्स। ड्रग्स और अन्य मादक पदार्थो के सेवन से शारीरिक कार्यक्षमता बनाए रखने में ऊर्जा का अत्यधिक उपयोग होता है, जिसके चलते ये नशीले पदार्थ यकृत और फेफड़ों में विषाक्त पदार्थ के रूप मं जमा होने लगते हैं। खान-पान की आदतें भी बीते कुछ वर्षो में काफी तेजी से बदली है। सपरफूड से लेकर जंक फूड न केवल शहरों बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी अब पांव पसारने लगे हैं। साल 2018 में आई क्लिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 35 फीसदी भारतीय सप्ताह से भी कम समय में एक बार फास्ट फूड खाते हैं।

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इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, 14 फीसदी स्कूली बच्चे मोटापे का शिकार हैं। जंक फूड में जरूरी पोषण तत्वों की कमी से मोटापा बढ़ता है, कम उम्र में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का खतरा और लीवर और खाना पचाने वाले अन्य पाचन अंगों को जंक फूड को पचाने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा और हार्मोनल स्त्राव की आवश्यकता होती है, क्योंकि इन खाद्य पदार्थो में काबोर्हाइड्रेट और वसा की उच्च मात्रा होती है। बदलती जीवन शैली और शहरी लाइफस्टाइल कम नींद का एक प्रमुख कारण है। काम का बोझ, शिक्षा का दबाव, रिश्तों में आती खटास, तनाव और अन्य समस्याओं के कारण लोगों को नींद नहीं आती है। युवा ज्यादातर समय मूवी देखने और रात में पार्टी करने में बिताते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि नींद की कमी से तनाव के हार्मोन रिलीज होते हैं। यह टेस्टोस्टेरोन कम करता है। कम नींद से हृदय रोग और मोटोपे बढ़ने का खतरा बना रहता है। कम नींद की वजह से शरीर को और भी ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होती है ऐसे में वसा का संचय होता है, जिससे मधुमेह यानी डायबीटिज का खतरा कई गुना तक बढ़ जाता है। योग, ध्यान और व्यायाम ये तीनो चीजें शरीर और शरीर से जुड़ी स्वास्थ्य समास्याओं से निजात पाने की संजीवनी हैं। ये सभी हमारे शरीर को ब्लड सकुर्लेशन को नॉर्मल (रक्त संचरण) और हार्मोन्स को बैलेंस करते हैं इसके साथ ही शारीरिक ऊर्जा और उसकी कार्य क्षमता को बनाए रखते हैं। शारीरिक व्यायाम करने के दौरान हमारे शरीर से वसा और कैलोरी बर्न होती है, जिससे शरीर को अधिक ऊर्जा मिलती है।


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स्मृति ईरानी ने महिलाओं को बताया अल्पसंख्यक, कहा- अनुवाद के जरिए विज्ञान को दिया जाएगा बढ़ावा


नई दिल्ली। केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी शनिवार को एक बार फिर से मुखर हुईं और महिलाओं के हक की आवाज उठाई। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में विज्ञान के क्षेत्र में महिलाएं सर्वाधिक अल्पसंख्यक हैं। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के पेशों में सिर्फ 14 फीसदी महिलाएं हैं। यह बाते उन्होंने आठवीं महिला विज्ञान कांग्रेस के उद्घाटन के मौके पर लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में बोलते हुए कही।

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भारतीय विज्ञान कांग्रेस का हिस्सा है महिला विज्ञान कांग्रेस

केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी ने समाज में महिलाओं के विरुद्ध निहित पूर्वाग्रह का जिक्र करते हुए कहा कि इससे अति प्रतिस्पर्धी विज्ञान-जगत में उनका प्रवेश बाधित होता है। इसके अलावा ईरानी ने जोर देते हुए कहा कि, "सबको मालूम है कि विज्ञान के में पुरुषों को वर्चस्व है, लेकिन महिलाओं को विज्ञान में अवसर प्रदान करने के मामले में तटस्थता नहीं है।" बताते चलें कि जिस महिला विज्ञान कांग्रेस में स्मृति ईरानी बोल रहीं थी वह भारतीय विज्ञान कांग्रेस का ही एक अभिन्न हिस्सा है।

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सिर्फ 14 प्रतिशत महिलाएं हैं इस क्षेत्र में

आंकड़ो का हवाला देते हुए स्मृति ईरानी ने कहा कि, "देशभर में अनुसंधान और विकास कार्य में 2.8 लाख वैज्ञानिक और इंजीनियर नियोजित हैं, जिनमें महिलाओं की संख्या सिर्फ 14 फीसदी है। इस तरह, विज्ञान में महिलाएं काफी अल्पसंख्यक हैं।" इस मौके पर मंत्री ने अकादमिक पत्र-पत्रिकाओं का अंग्रेजी से क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद की जरूरत बताई और कहा कि, "अंग्रेजी विज्ञान की सामान्य भाषा है, लेकिन जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 96.7 फीसदी आबादी अनुसूचित 22 भाषाओं पर निर्भर करती है।" उन्होंने कहा कि विज्ञान के अनूदित कार्य स्कूली बच्चों को प्रदान किए जाएं, ताकि उनमें विज्ञान के प्रति अभिरुचि पैदा हो।


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भविष्य की यात्रा को सुगम बनाएगा पैसेंजर ड्रोन


देश दुनिया में तेजी से बढ़ रही ट्रैफिक जाम की समस्या चिंता का सबब बनने लगी है। अब पूरी दुनिया में यातायात व्यवस्था को सुगम और आरामदायक बनाने पर विचार किया जा रहा है। मैट चेजन ‘पैसेंजर ड्रोन’ स्टिमुलेटर पर काम कर रहे हैं जिससे यातायात की व्यवस्था को दुनियाभर में सरल और आसान बनाया जा सके और सडक़ों पर लगने वाले जाम को कम से कम किया जा सके। लिफ्ट एयरक्राफ्ट के चीफ एक्जक्यूटिव मैट चेजन अब अपने इलेक्ट्रिक पॉवर्ड स्टार्टअप हेक्सा एयरक्राफ्ट की मदद से पूरी दुनिया की यातायात व्यवस्था को बदलना चाहते हैं।

हाल ही इनके बनाए पैसेंजर ड्रोन ने ऑस्टिन और टेक्सास में 15 मिनट की उड़ान भरी जिसमें 17,430 रुपए (करीब 249 अमरीकी डॉलर) का खर्च आया। पैसेंजर एयरक्राफ्ट ने जब उड़ान भरी तो लोगों का हुजूम उसे देखता रहा। सभी की आंखों में भविष्य की यातायात व्यवस्था नजर आ रही थी। इनका दावा है कि ऑस्टिन के बाद अन्य 25 शहरों में इसके इस्तेमाल पर रणनीति बनेगी जिससे पर्यटकों का दिन रोमांच से भर दिया जाए। मैट को उम्मीद है कि इस आधुनिक पैसेंजर ड्रोन पर फ्लाइंग एविएशन फेडरेशन भी अपनी मुहर लगा देगा।

हेक्सा एयरक्राफ्ट की उड़ान पर स्थानीय पर्यावरण प्राधिकरण को आपत्ति है कि इसका प्रयोग पैसेंजर एयरक्राफ्ट के तौर पर नहीं हो सकता है। मैट चेजन जो बोइंग इंजीनियर होने के साथ मैकेनिकल और स्पेस इंजीनियर हैं। वे मानते हैं कि समय के साथ लोगों और जिम्मेदार विभागों में इसके प्रति भरोसा बढ़ेगा। इसका इस्तेमाल करने में कोई हिचक नहीं होगी समय के साथ पूरी दुनिया इसका प्रयोग करेगी।

अगले 10 वर्ष खास
अगले 10 वर्षों में हेक्सा एयरक्राफ्ट शहरी क्षेत्रों में यातायात व्यवस्था को बेहतर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसका सबसे अधिक फायदा व्यस्त ट्रैफिक के समय में होगा जिसमें लोग 90 मिनट की दूरी को 10 मिनट में तय कर सकते हैं।

लाइसेंस नहीं चाहिए
पैसेंजर ड्रोन के लिए फ्लाइंग लाइसेंस की जरूरत नहीं होगी। इसके लिए फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन के नियमों का पालन करना जरूरी है। पैसेंजर ड्रोन दिन की रोशनी में ही उड़ान भरेगा। लोग इसे अपने मनोरंजन के तौर इस्तमाल कर सकते हैं।


जॉयस्टिक से कंट्रोल होगा पूरा ड्रोन

ड्रोन की तरह दिखने वाले इस पैसेंजर एयरक्राफ्ट को जॉयस्टिक और फ्लाइट कंप्यूटर की मदद से नियंत्रित किया जाएगा। एक सीट वाले इस पैसेंजर ड्रोन का वजन करीब 200 किलो (432 पाउंड) होगा जिसमें मोटर और बैटरी का वजन भी शामिल है। इसमें बैठने वाले पायलट का वजन 113 किलो (250 पाउंड) से अधिक नहीं होना चाहिए जिससे सुरक्षित यात्रा हो सके। जो लोग जॉयस्टिक फ्रेंडली हैं उन्हें इस पैसेंजर ड्रोन को उड़ाने में कोई भी परेशानी नहीं होगी। जीपीएस सिस्टम से लैस इस ड्रोन में आधुनिक लेवल की प्रोग्रामिंग और टेक्नोलॉजी को शामिल किया गया है। उड़ान के दौरान जैसे ही ड्रोन की बैट्री खत्म होने लगेगी उससे पहले ही वे लॉन्च साइट पर अपने आप उतर जाएगा। कंपनी इस साल से ऑस्टिन के झील वाले क्षेत्रों में पैसेंजर ड्रोन का इस्तेमाल करेगी जहां पर्यटक बड़ी संख्या में आते हैं ताकि लोग इस नई तकनीक से रू-ब-रू हो सकें।

भारत में ड्रोन से एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल पहुंचेगा अंग

देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में सेना ड्रोन से सीमा पर नजर बनाए हुए है। हाल ही केंद्रीय उड्डयन राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने बताया है कि विभाग ने नई ड्रोन नीति बनाई है। इसके तहत दो अस्पतालों के बीच ड्रोन कॉरिडोर बनेगा जिससे कैडेवर से निकाला गया अंग एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक प्रत्यारोपण के लिए पहुंचाया जा सकेगा।

पीटर हॉली, टेक्नोलॉजी रिपोर्टर वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत


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तकनीक जो जांच के दौरान होने वाले दर्द का स्तर बताएगी


मौहम सिद्दीकी भारतीय मूल की 17 वर्षीय अमरीकी नागरिक हैं। हाल ही कॉरनेल यूनिवर्सिटी की ओर से आयोजित ‘डिजिटल ट्रांसफॉरमेशन हैकाथॉन’ अपने नाम कर देश का गौरव बढ़ाया है। बारहवीं कक्षा की छात्रा हैं और न्यूयॉर्क के वेस्टल स्कूल में पढ़ाई करती हैं। ये ऐसी पहली छात्रा हैं जिसने स्नातक की पढ़ाई पूरी किए बिना ही डिजिटल ट्रांसफॉरमेशन हैकाथॉन प्रतियोगिता को अपने नाम किया है। इनकी बनाई ‘पेन डिटेक्टिंग डिवाइस’ की मदद से अब डॉक्टर ये पता कर सकेंगे की जांच के दौरान मरीज को कितना दर्द हो रहा है। इस आधार पर जांच के तौर-तरीकों में बदलाव किया जा सकता है।

इनका मानना है कि इस तकनीक का फायदा उन लोगों को ज्यादा होगा जो जांच के दौरान होने वाली गंभीर परेशानियों की वजह से जांच नहीं करा पाते हैं या उन्हें अधिक दर्द से गुजरना पड़ता है। ऐसे मरीजों के लिए ये तकनीक मददगार होगी जिससे उनका इलाज बाधित नहीं होगा। अवॉर्ड जीतने के बाद माइक्रोसॉफ्ट के साथ इनकी बात चल रही है जिससे इनकी डिवाइस को और बेहतर बनाया जा सके और इलसज में इसका इस्तेमाल हो सके।
दिमाग की तरंगों को पकड़ेगी इनकी डिवाइस
पेन डिटेक्टिंग डिवाइस ईसीजी की तरह काम करेगी जिसमें जांच के दौरान मरीज के सिर और सीने पर चिप लगाई जाएगी। जैसे ही जांच की प्रक्रिया शुरू होगी दिमाग और दिल में होने वाला बदलाव डिवाइस की स्क्रीन पर दिखने लगेगा। इसके बाद चिकित्सक मरीज की परेशानी और रिपोर्ट देखते हुए जांच की प्रक्रिया को सरल बनाने की कोशिश करेंगे।

इलाज आसान बनाना लक्ष्य
इनका सपना स्वास्थ्य से जुड़ी ऐसी डिवाइस तैयार करना है जिससे रोगियों और डॉक्टरों की परेशानी को कम किया जा सके। इन्हें पढ़ाई के साथ खेलना, किताबें पढऩा और तकनीक से जुड़ी बातों को जानने समझने में अधिक दिलचस्पी है। महीने में एक बार साइंस क्लब जरूर जाती हैं जहां देश-दुनिया में विज्ञान के क्षेत्र में हो रही हलचल के बारे में विस्तार से जानती और समझती हैं। कई साइंस कंप्टीशन में अवॉर्ड और मेडल भी जीत चुकी हैं।


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सियाचिन में पड़ती है खून जमा देने वाली ठंड, माइनस 28 डिग्री सेल्सियस में ऐसे नहाते हैं यहां पर तैनात जवान


नई दिल्ली। क्या आप जानते हैं कि भारत में सबसे अधिक ठंड कहां पड़ती है और इस ठंड के मौसम में यहां रहने वाले लोगों की दिनचर्चा कैसी होती है। जिन जगहों पर सामान्य ठंड पड़ती है वहां के लोग हफ्ते में 2 या 3 दिन नहाना शुरू कर देते हैं, वो भी गर्म पानी से। तो यहां पर लोग अपने नहाने का क्या इंतजाम करते हैं। ऐसे में हम आपको बता दें कि भारत में सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा वारजोन है और यहां का तापमान इतना कम होता है कि खून जम जाए और व्यक्ति की मौत हो जाए, लेकिन यहां पर भारतीय जवान पूरी मुस्तैदी से देश की सुरक्षा के लिए तैनात रहते हैं। ऐसे में उनको नहाने के लिए भी करीब 3 तीन महीने तक इंतजार करना होता था, लेकिन अब वो हर हफ्ते नहा सकते हैं।

 

वाटरलेस होगा बॉडी वॉश जेल

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सियाचिन में तैनात जवानों को नहाने के लिए ऐसे प्रोडक्ट्स दिए जाएंगे, जो वाटरलेस होंगे। इस बॉडी वॉश जेल की मदद से अब जवान हर सप्ताह में दो बार नहा सकेंगे। खास बात यह है कि 20 मिलीलीटर बॉडी वॉश जेल में एक सैनिक अराम से नहा सकेगा और इससे नहाने के बाद जवान खुद को पानी से नहाया हुआ जैसा ही महसूस करेगा। ऐसे में अब उनको नहाने के लिए तीन महीने तक इंतजार नहीं करना होगा। इस जेल को एडीबी (आर्मी डिजाइन ब्यूरो) ने तैयार किया है। एडीबी इसको बनाने के लिए 2016 से प्रयास कर रहा था। एडीबी का काम आर्मी और प्राइवेट सेक्टर के साथ मिलकर सैन्य जरूरतें पूरी करने के लिए जरूरी शोध एवं विकास कार्यों को अंजाम देना है।

 

3000 सैनिक करते हैं इस सीमा की सुरक्षा

बता दें कि सियाचिन की सीमा पर भारत की सुरक्षा के लिए हर वक्त 3000 सैनिक तैनात रहते हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि यहां की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचने के लिए रास्ता नहीं है ऐसे में जवानों को यहां तर पहुंचने के लिए 128 किलोमीटर तक पैदल चलना होता है। यहां पर ठंड के दिनों में तापमान -19 से -28 डिग्री तक चला जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सियाचिन में रोजाना करीब 7 करोड़ रुपये खर्च होते हैं।

 

पानी के लिए पिघलानी होती है वर्फ

बता दें कि यहां पर मौजूद पानी ठोस वर्फ का आकार ले लेता है। ऐसे में पीने के पानी से लेकर नहाने तक के पानी को पिघलाना पड़ता है। इसके लिए काफी मात्रा में ईधन की जरूरत होती है। जिससे वर्फ को पिघलाकर पानी में बदला जा सके और इस पानी को आम दिनचर्या के लिए इस्तेमाल किया जा सके। ऐसे में इस खास वाटरलेस बॉडी वॉश जेल के काफी मात्रा में पानी की बचत होगी।


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46 सालों से क्यों चांद पर नहीं पहुंच पाया कोई यात्री, हैरान कर देने वाली सच्चाई आई सामने


नई दिल्ली। चांद का सफर जितना रोमांचकारी है उतना ही कठिन भी। यूं तो हर कोई चांद पर जाना चाहता है लेकिन अभी यह इतना आसान नहीं है। यही कारण है कि आज भी इतिहास के पन्ने में 21 जुलाई 1969 की तारीख दर्ज है जब नील आर्मस्ट्रांग ने पहले अंतरिक्ष यात्री के रूप में चांद पर कदम रखा था और साल 1972 में चांद पर पहुंचने वाले आखिरी अंतरिक्ष यात्री यूजीन सेरनन बने थे। लेकिन उसके बाद से चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद कोई इंसान फिर से चांद पर क्यों नहीं पहुंच पाया इसका एक बहुत बड़ा कारण है।

बता दें कि साल 2004 में भी अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने चांद पर इंसानी मिशन भेजने का प्रस्ताव पेश किया था। इसके लिए 1,04,000 मिलियन डॉलर का अनुमानित बजट भी बनाया गया था, लेकिन बाद में वो प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में चला गया। हालांकि अमेरिका ने साल साल 2017 में फिर से ये एलान किया था कि वो फिर से चांद पर इंसानों को भेजेगा और खास बात यह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इससे जुड़े एक आदेश पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं।

सबसे अच्छी बात यह है कि भारत भी अब इस काम में पीछे नहीं है और 15 अगस्त 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मानव मिशन 2022 की घोषणा कर चुके हैं। इस परियोजना को अमलीजामा पहनाते हुए साल के आखिर में 28 दिसंबर को भारत के महत्वाकांक्षी मानव मिशन के क्रियान्वयन की दिशा में केंद्र सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये के गगनयान मिशन को मंजूरी दी। इस कार्यक्रम के तहत अंतरिक्ष में दो मानवरहित यानों के साथ-साथ एक यान ऐसा भेजे जाने की परिकल्पना है, जिसमें अंतरिक्ष यात्री भी होंगे। गौर करने वाली बता यह है कि अब तक केवल अमेरिका, रूस और चीन ने ही इंसानों को अंतरिक्ष में भेजा है।

 

दरअसल, चांद पर किसी इंसान को भेजना काफी महंगा होता है, जबकि इससे कोई ज्यादा खास फायदा नहीं होता है। ऐसे में कोशिश होती है कि अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर जरूरत पड़ने पर ही भेजा जाए। इस बारे में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में खगोल विज्ञान के प्रोफेसर माइकल रिच का कहना है, 'चांद पर इंसानी मिशन भेजने में काफी खर्च आया था, जबकि इसका वैज्ञानिक फायदा कम ही हुआ।' यही कारण है कि अधिकांश देश चांद पर इंसानों को भेजने से कतराते हैं।


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भारत ने सालभर अंतरिक्ष क्षेत्र में गढ़े नए आयाम, ऐसा रहा पूरा सफरनामा


नई दिल्ली। अंतरिक्ष क्षेत्र में वर्ष 2018 में भारत का बोलबाला रहा। गगनयान मिशन को मंजूरी, सबसे भारी संचार उपग्रह जीसैट-11, नवीनतम संचार उपग्रह जीसैट 29 और वायुसेना के लिए संचार उपग्रहण जीसैट 7ए के प्रक्षेपण सहित कई मिशनों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया। साल भर हुए कुछ प्रमुख अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर गौर करें तो भारत ने 2018 में कई उपलब्धियां हासिल कीं।

साल 2018 के पहले माह से बात शुरू करें तो 10 जनवरी को प्रख्यात वैज्ञानिक के. सिवन के भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की कमान संभालने के साथ भारत ने 12 जनवरी को ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी-सी 40) के जरिए 28 विदेशी उपग्रहों के साथ 31 उपग्रहों का प्रक्षेपण और उन्हें सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया।

सिवन ने इसरो की 2018 की उपलब्धियां साझा करते हुए कहा, "कई रॉकेट और उपग्रहों के प्रक्षेपण के साथ यह साल काफी व्यस्तताओं वाला रहा। सबसे बड़ी उपलब्धि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गगनयान की घोषणा रही। उन्होंने कहा, "हमने जीसैट 11, जीसैट 29, जीसैट 6ए और जीसैट 7ए जैसे महत्वपूर्ण उपग्रह लॉन्च किए। इस साल जीएसएलवी एमके तृतीय ने भी काम करना शुरू कर दिया है।"

चंद्रयान-2 की दिशा में उठाए गए कारगर कदम
इसरो ने 18 अप्रैल को मिशन चंद्रयान-2 की घोषणा की थी। 800 करोड़ रुपये की लागत वाले इस मिशन से जुड़े लगभग सभी तकनीकी मुद्दे सुलझा लिए गए हैं। ऐसी संभावना है कि चंद्रयान 2 अगले साल में लॉन्च हो जाएगा। इस मिशन की खासियत यह है कि इसके निर्माण और उपयोग में आने वाली सामग्री पूरी तरह स्वदेशी होगी और इसीलिए इसका खर्च काफी कम है। मिशन के दौरान एक लैंड रोवर और जांच उपकरण से युक्त यान चंद्रमा की सतह पर उतरेगा और उसकी सतह पर मौजूद मिट्टी व पानी के नमूने एकत्र करेगा।


इसरो का लिथियम आयन बैटरी तकनीक के हस्तांतरण का निर्णय
इसरो ने जून में वाहन उद्योग में उपयोग के लिए भारतीय उद्योग को गैर-विशिष्ट आधार पर अपनी लिथियम आयन सेल प्रौद्योगिकी को एक करोड़ रुपये में स्थानांतरित करने के अपने फैसले की घोषणा की थी। इस पहल से स्वदेशी इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग के विकास में तेजी आएगी। इसरो की लिथियम आयन सेल प्रौद्योगिकी में 100 से अधिक देशों ने रुचि दिखाई है और इसरो ने प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए 14 कंपनियों को शार्टलिस्ट भी किया है। मौजूदा समय में लिथियम आयन बैटरी औद्योगिक अनुप्रयोगों और एयरोस्पेस के अलावा मोबाइल फोन, लैपटॉप, कैमरे और कई अन्य उपकरणों में उपयोग की जानेवाली सबसे प्रभावशाली बैटरी है।

मानव मिशन की दिशा में अंतरिक्ष यात्री बचाव प्रणाली का परीक्षण
भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने जुलाई में अंतरिक्ष के लिए अपने मानव मिशन लक्ष्य की दिशा में अंतरिक्ष यात्री बचाव प्रणाली (क्रू इस्केप सिस्टम) की श्रंखला का पहला परीक्षण किया। मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए यात्री बचाव प्रणाली बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह लॉन्च के असफल होने की स्थिति में अंतरिक्ष यात्रियों के साथ क्रू मॉड्यूल को जल्दी से परीक्षण यान से निकालकर सुरक्षित दूरी पर ले जाती है।

अंतरिक्ष विज्ञान चैनल की घोषणा
इसरो ने 12 अगस्त को अंतरिक्ष व विज्ञान को समर्पित टेलीविजन चैनल लॉन्च की घोषणा की, जिसका मकसद देश भर के लोगों तक विज्ञान-प्रौद्योगिकी के फायदों को पहुंचाना है। अगस्त महीने में इसकी घोषणा करते हुए इसरो ने कहा था, "इस चैनल के माध्यम से हमारा उद्देश्य अंतरिक्ष कार्यक्रम कैसे आम जनता को फायदा पहुंचा सकता है, इसकी जानकारी देना है।"

देश के सबसे भारी प्रक्षेपण यान जीएसएलवी-एमके-3 की सफल उड़ान
इस साल 14 नवंबर को देश के सबसे भारी प्रक्षेपण यान-जियोसिनक्रोनस सैटेलाइट लांच व्हिकल-मार्क-3 (जीएसएलवी-एमके-3) ने जीसैट-29 उपग्रह के साथ उड़ान भरी। 3,423 किलोग्राम वजनी संचार उपग्रह जीसैट-29 सुदूर और ग्रामीण इलाकों की संचार संबंधी जरूरतें पूरी करने में सक्षम है।


सैन्य संचार उपग्रह जीसैट-7ए का प्रक्षेपण
देश की रणनीतिक सुरक्षा की ओर एक और कदम बढ़ाते हुए खास वायुसेना के लिए सैन्य संचार उपग्रह जीसैट-7ए का प्रक्षेपण किया गया। यह प्रक्षेपण 19 दिसंबर को किया गया, जिसके बाद वायुसेना अपने विभिन्न रडार केंद्रों और अड्डों से हवाई हमलों की पूर्व चेतावनी एवं नियंत्रण प्रणाली वाले विमान को जोड़ पाने में सक्षम हो पाएगी। खास बात यह है कि इससे मानवरहित वायुयान व ड्रोन को भी नियंत्रित किया जा सकता है। रणनीतिक उपग्रहों के मामले में भारत, अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों के रास्ते पर चल रहा है।

सबसे भारी संचार उपग्रह जीसैट-11 लॉन्च
दिसंबर माह में ही भारत का सबसे भारी व अगली पीढ़ी का संचार उपग्रह जीसैट-11 भी लॉन्च हुआ। 5,854 किलोग्राम वजनी जीसैट-11 इसरो द्वारा बनाया गया सबसे भारी उपग्रह है, जिसमें मल्टी-स्पॉट बीम के एंटीना लगे हैं, जो भारतीय भूमि और द्वीपों को कवर कर सकते हैं। यह भारत नेट प्रोजेक्ट के तहत आने वाले देश में ग्रामीण और अभी तक पहुंच से दूर ग्राम पंचायतों तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी को बढ़ावा देगा, जो डिजिटल इंडिया प्रोग्राम का हिस्सा है। इसके जरिए ई-बैंकिंग, ई-हेल्थ, ई-गवर्नेंस जैसी सार्वजनिक कल्याणकारी योजनाओं को बढ़ावा दिया जाएगा।

मानव मिशन 2022 की घोषणा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से मानव मिशन 2022 की घोषणा की थी। इस परियोजना को अमलीजामा पहनाते हुए साल के आखिर में 28 दिसंबर को भारत के महत्वाकांक्षी मानव मिशन के क्रियान्वयन की दिशा में केंद्र सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये के गगनयान मिशन को मंजूरी दी। इस कार्यक्रम के तहत अंतरिक्ष में दो मानवरहित यानों के साथ-साथ एक यान ऐसा भेजे जाने की परिकल्पना है, जिसमें अंतरिक्ष यात्री भी होंगे। अबतक केवल अमेरिका, रूस और चीन ने ही इंसानों को अंतरिक्ष में भेजा है।


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अगर लोग आपकी बातों को नहीं देते अहमियत, तो करें ये काम, जल्द ही बढ़ने लगेगी सामाजिक प्रतिष्ठा


नई दिल्ली। अगर लोग आपकी बातों पर जल्दी से भरोसा नहीं करते या उनको आपकी बातों में किसी तरह का धोखा या कोई खास पैनापन नजर नहीं आता है तो अब इसके लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि हाल ही में हुए एक शोध में यह बात स्पष्ट हुई है कि किसी व्यक्ति से बातचीत करने के दौरान सिर का थोड़ा झुकाव, दूसरे व्यक्ति को आपको जानने में बेहतर साबित हो सकता है। इसके अलावा यह आपके गहन सामाजिक संबंधों का मार्ग भी प्रशस्त कर सकता है।

पहला रिसर्च वेसल सागर तारा हुआ लांच, टीटागढ़ वैगंस के नाम जुड़ी यह बड़ी उपलब्धि

बता दें कि जर्नल 'पर्सेप्शन' में प्रकाशित एक शोध में कहा गया है कि सामाजिक मेलजोल के दौरान आई कांटेक्ट को महत्वपूर्ण माना जाता है, जबकि बहुत से लोगों का मानना है कि डायरेक्ट आई कांटेक्ट से भय बना रहता है। लेकिन सिर का झुकाव लोगों को आंख की तरफ देखने को ज्यादा दिखाता है और भय नहीं रहने का संकेत देता है। ऐसे में चेहरे की भाव-भंगिमा को समझना काफी महत्वपूर्ण है।

आंखों की रोशनी जाने के खतरे से निजात दिलाएगी यह नई दवा, पुराने जख्म भी हो सकेंगे ठीक

इस शोध के बारे में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सांता क्रूज के मनोविज्ञान की सहायक प्रोफेशसर निकोलस डाविडेनको का कहना है कि आंखों की तरफ देखना आपको ज्यादा सूचनाएं जुटाने में मददगार होता है। जबकि इसके विपरीत, आई कांटेक्ट बनाए बिना किसी बात को कहना या कुछ प्रदर्शित करना एक गैर जिम्मेदाराना रवैया प्रदर्शित करता है।

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पहला रिसर्च वेसल सागर तारा हुआ लांच, टीटागढ़ वैगंस के नाम जुड़ी यह बड़ी उपलब्धि


नई दिल्ली। सरकार के 'मेक इन इंडिया' विजन के तहत टीटागढ़ समूह की कंपनी टीटागढ़ वैगंस लि. ने बुधवार को पहले कोस्टल रिसर्च वेसल (तटीय शोध जहाज) सागर तारा को सफलतापूर्वक लांच किया। बता दें कि यह यह वेसल भू-विज्ञान मंत्रालय की नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी के लिए बनाया गया है। जटिल संरचना के बावजूद यह वेसल बुधवार को नियत समय से 3 माह पहले उतारा गया, जिससे वैज्ञानिक विभिन्न ओशेनोग्राफिक रिसर्च मिशनों पर काम कर सकेंगे।

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बता दें कि 'सागर तारा' में अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं होंगी, जिनमें आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण होंगे। इसमें एक ड्रॉप कील है, जिसका डिजाइन और उत्पादन देश में पहली बार किया गया है। यह वेसल ऑटो पायलट और डीपी1 सक्षमता से सुसज्जित है। लांचिंग के मौके पर केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन ने कहा, कि यह भारत के तटीय शोध के इतिहास में अब तक की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। निजी क्षेत्र सरकार के साथ मिलकर 'मेक इन इंडिया' को गति दे रहा है।

 

इस मौके पर भू-विज्ञान मंत्रालय के सचिव, ईएसएसओ के अध्यक्ष और पृथ्वी आयोग के अध्यक्ष डॉ. माधवन नायर ने कहा, देश की तटीय और समुद्री शोध क्षमताओं को बढ़ाना हमेशा से सरकार की प्राथमिकता रही है। एनआईओटी के मालिकाना हक वाले इस नए वेसल से हमारी शोध क्षमता उन्नत होगी और देश तथा नागरिकों को बहुआयामी लाभ होगा।

 

टीटागढ़ वैगंस लि. के कार्यकारी अध्यक्ष जगदीश प्रसाद चौधरी ने कहा, टीटागढ़ में हमारे पास रिकॉर्ड समय में तीन जहाज लांच करने की अनूठी उपलब्धि है। एनआईओटी के लिए दो कोस्टल रिसर्च वेसल्स में से एक को लांच किया गया है, जो इंडियन मैरिटाइम और ओशेनिक स्टडी में शोध क्षमताओं को मजबूत करेगा। ये रिसर्च वेसल्स अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी से निर्मित किए गए हैं और इनमें सबसे आधुनिक उपकरण हैं।


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आंखों की रोशनी जाने के खतरे से निजात दिलाएगी यह नई दवा, पुराने जख्म भी हो सकेंगे ठीक


नई दिल्ली। अगर आपको अपनी आंखों से प्यार है और आप इन आंखों से ताउम्र देखते रहना चाहते हैं तो आपको आज से ही इनकी देखभाल करनी होगी। क्योंकि संक्रमण के कारण आंखों की रोशनी जा सकती है हालांकि अब वैज्ञानिकों ने इस खतरे से बचने का रास्ता खोज निकाला है। बता दें कि वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक ऐसी दवा विकसित की है जो आंखों की रोशनी बनाए रखने में मदद कर सकती है।

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आंख की कॉर्निया पारदर्शी होती है, इसलिए इसे श्वेत पटल भी कहते हैं। लेकिन किसी प्रकार का संक्रमण होने या चोट लगने से इस पर दाग या धब्बा पड़ जाने से यह पारदर्शी नहीं रह जाती है, जिससे आंखों की रोशनी प्रभावित होती है। इसके अलावा कभी-कभी अंधा होने का भी खतरा बना रहता है। ऐसे में इससे बचने के लिए वैज्ञानिकों ने एक आई-ड्रॉप तैयार की है। इसमें फ्लुइड जेल के साथ-साथ जख्म को भरने वाला प्रोटीन डेकोरीन है जो जख्म को जल्द से जल्द भर के ठीक कर देता है।

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इस बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि यह फ्लुइड जेल आंख की पटल की सुरक्षा करने में कारगर है। अनुसंधान में पाया गया है कि आई-ड्रॉप लेने के कुछ दिनों में इसका असर दिखने लगता है। बता दें कि फ्लुइड जेल एक नया पदार्थ है जो ठोस से तरल अवस्था में बदल सकता है। मतलब यह खुद आंख की पटल पर फैल जाता है और उस पर बना रहता है, जिससे धीरे-धीरे आंखों का धुंधलापन समाप्त हो जाता है। वहीं अनुसंधान करने वाले विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एन. लोगान ने कहा कि आई ड्रॉप में यह नया फ्लुइड जेल आंखों की पटल पर डेकोरीन प्राप्त करने के लिए बनाया गया है।


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