Patrika : Leading Hindi News Portal - Temples #educratsweb
HOME | LATEST JOBS | JOBS | CONTENTS | STUDY MATERIAL | CAREER | NEWS | BOOK | VIDEO | PRACTICE SET REGISTER | LOGIN | CONTACT US

Patrika : Leading Hindi News Portal - Temples

http://api.patrika.com/rss/temples 👁 913

इस मंदिर में एक गलती से चले जाती है जान, फिर भी दूर-दूर से आते हैं लाखों भक्त


हम हमेशा से ही सुनते आए हैं की भगवान में श्रद्धा हो तो और उनका आशीर्वाद हो तो मरते हुए व्यक्ति को भी जीवनदान मिल जाता है। दुनियाभर में कई मंदिर है जहां लोग अपनी मनोकामनाओं और मन की शांति के लिए मंदिर जाते हैं। कुछ लोग तो मंदिर प्रांगण में भी रुक जाते हैं। लेकिन आपको जनकर हैरानी होगी की भारत में एक ऐसा मंदिर भी है जहां माता रानी के भक्तों को मंदिर में रुकने की अनुमति नहीं है। कहा जाता है की रात को जो भी व्यक्ति यहां रुकता है उसको सुबह का सूरज देखना नसीब नहीं होता। जी हां, यह मंदिर है मध्यप्रदेश के सतना जिले के मैहर में। इस मंदिर को लेकर लोगों का मनना है की यदि मंदिर में कोई व्यक्ति रात के समय रूकने की कोशिश करता है, तो वह अगली सुबह नहीं देख पाता है। ऊंची पहाड़ी पर होने के बावजूद इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है।

 

 

 

ma sharda mandir maihar

सतना जिले के मैहर में स्थित यह मंदिर लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर में माता शारदा की पूजा की मुख्य पूजा की जाती है लेकिन इनके साथ-साथ देवी काली, दुर्गा, श्री गौरी शंकर, शेष नाग, श्री काल भैरवी, भगवान, फूलमति माता, ब्रह्म देव, हनुमान जी और जलापा देवी की भी पूजा होती है। मैहर तहसील के पास त्रिकूट पर्वत पर स्थित इस मंदिर को मैहर देवी का मंदिर भी कहा जाता है। मैय्या के दर्शनों के लिए यहां आने वाले भक्तों को 1063 सीढ़ियों का सफर तय करना पड़ता है। भक्तों का मानना है की मैहर में मां शारदा में मांगी हर मुराद पुरी होती है। लोग यहां मन्नत के धागे भी बांधते हैं और पूरी होने पर दोबार दर्शन के लिए आते हैं।

ma sharda mandir maihar

मंदिर में दर्शन के लिए सालों से आ रहे भक्त बताते हैं की मंदिर में आल्हा और ऊदल आकर सबसे पहले माता शारदा की पूजा और पूरा श्रृंगार करते हैं। इसके बाद ही यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के पट खुलते हैं। यहां के लोगों की मान्यता के अनुसार आल्हा और ऊदल माता के सबसे बड़े भक्त थे। ऐसा कहा जाता है कि इन दोनों के द्वारा ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के मंदिर की खोज की गई थी। फिर आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था। आज भी यह मान्यता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा और उदल ही करते हैं।

ma sharda mandir maihar

आल्हा मां को शारदा माई कहकर पुकारता था और इसी वजह से यहां विराजमान मां को शारदा माई कहा जाता है। वहीं इस मंदिर से जुड़ी एक मान्यता ये भी है कि रात को 2 बजे से लेकर 5 बजे तक इस मंदिर में किसी का भी प्रवेश वर्जित है और अगर कोई व्यक्ति इस समय मंदिर में प्रवेश करता है तो उसकी मृत्यु हो जाती हैं। वहीं मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है। तालाब से 2 किलोमीटर आगे जाने पर एक अखाड़ा मिलता है, जिसके बारे में ये मान्यता है कि यहां आल्हा और उदल कुश्ती लड़ा करते थे। मंदिर के पीछे वाले तालाब को आल्हा तालाब कहा जाता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/devi-sharda-mandir-in-maihar-satna-madhya-pradesh-4144991/

इस मंदिर की झील में मौजूद मगरमच्छ खाता है प्रसाद, किस्मत वालों को देता है दर्शन


कभी-कभी दुनिया में कुछ चीज़ें ऐसी होती है जिन्हें देखकर हम ये नहीं सोच पाते की इस पर यकीन करें या ना करें। उन चीज़ों को सोचकर सच में चमत्कार की अनुभूति होती है। ऐसी ही एक घटना केरल के अनंतपुर की है। कहा जाता है की यहां अनंतपुर के कासरगोड में एक अनोखा मंदिर है, यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। झील के बीचों-बीच बने इस मंदिर में आकर्षक का केंद्र यहां झील में रहने वाला एक मगरमच्छ है। लोगों का मानना है की यह मगरमच्छ लोगों का भाग्य चमका देता है, इसे देखने के लिए भक्तों की नज़रें झील में टिकी रहती है। लोक मान्यताओं की अनुसार ये मगरमच्छ इस मंदिर में वर्ष 1945 से रह रहा है और यह मंदिर की पहरेदारी करता है। आज तक इसने किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाया।

babiya magarmach

स्थानीय लोगों के अनुसार इस मगरमच्छ का नाम बबिया बताया जाता है। यह शाकाहारी मगरमच्छ यहां पिछले 60 साल से रह रहा है। किवदंतियों के अनुसार यहां जैसे ही एक मगरमच्छ की मृत्यु होती है वैसे ही वहां दूसरा मगरमच्छ प्रकट हो जाता है। कहा जाता है की यह बात बहुत ही रहस्यमयी है।

2 एकड़ की झील के बीचों-बीच भगवान विष्णु के इस मंदिर में भगवान अनंत-पद्मनाभस्वामी के नाम से पूजे जाते हैं। मान्यता है कि मंदिर की झील में रहने वाला यह मगरमच्छ पूरी तरह शाकाहारी है और मंदिर का प्रसाद खाकर यह अपना पेट भरता है। यहां के पुजारी मगरमच्छ के मुंह में प्रसाद डालकर इसका पेट भरते हैं और प्रसाद के रूप में इसे चावल और गुड़ खिलाया जाता है।

babiya magarmach

इस झील की एक विशेषता ये भी है की चाहे कितनी भी ज्यादा बारिश हो या कम बारिश हो इस झील का जल स्तर हमेशा एक जैसा रहता है। यहां ये भी कहा जाता है की अगर आपको मगरमच्छ के दर्शन हो जाये तो समझिये आप किस्मत वाले हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/vegeterian-crocodile-is-temple-protector-lucky-people-will-see-4132204/

इस अनोखे मंदिर में भगवान नहीं एक पेड़ करता है मुरादें पूरी, श्रीफल बांधने की है परंपरा


देशभर में भगवान श्री राम के अनेकों मंदिर है, जहां उनके साथ माता सीता और लक्ष्मण मौजूद रहते हैं। लेकिन भारत का एक मात्र मंदिर ऐसा है जो की भगवान श्री राम नहीं बल्कि उनकी माता कौशल्या का मंदिर है। माता कौशल्या का मंदिर कहीं ओर नहीं है, इस मंदिर में भगवान श्री राम माता कौशल्या की गोद में बैठे हुए हैं। मंदिर के गर्भगृह में कौशल्या माता की गोद में बालरुप में रामजी की प्रतिमा है। जो की श्रद्धालुओं का मन मोह लेती है। सात तालाबों से घिरे जलसेन तालाब के बीच में एक द्वीप है और इसी द्वीप पर मां कौशल्या का मंदिर है।

kaushalya mandir

श्रीफल बांधने से होती है मुराद पूरी

हम जिस प्राचीन और अद्भुत मंदिर की बात कर रहे हैं वह मंदिर छत्तीसगढ़ के चंद्रखुरी में स्थित है। मंदिर में माता कौशल्या और श्री राम के अलावा शिव जी और नंदी की प्रतिमाएं भी स्थापित है। वही मंदिर के मुख्य द्वार पर हनुमान जी की विशाल प्रतिमा लगी हुई है। मंदिर को लेकर लोगों की मान्यता है की यहां पर सीताफल का एक खास पेड़ लगा हुआ है, जिसे "मन्नत का पेड़' कहा जाता है। लोगों का मानना है की इस मन्नत के पेड़ पर पर्ची में अपना नाम लिखकर उसे श्रीफल के साथ बांधने से लोगों की मुरादें पूरी होती है। यहां जो भी भक्त आकर श्रद्धा से श्रीफल बांधता है उसकी मुराद जरुर पूरी होती है।

 

kaushalya mandir

मंदिर को लेकर पौराणिक मान्यताएं

पौराणिक कथाओं के अनुसार यहां पर एक पेड़ के नीचे सुषेण वैध की समाधि है आपको बता दें कि रामायण के अनुसार सुषेण लंका के राजा रावण का राजवैद्य था। जब रावण के पुत्र मेघनाद के साथ हुए युद्ध में लक्ष्मण मूर्छित हो गए, तब सुषेण ने ही संजीवनी बूटी मंगाकर लक्ष्मण के प्राण बचाए थे। जब रावण को मारकर श्री राम वापस अयोध्या आए तो सुषेण वैध भी उनके साथ आ गए और यहीं पर उन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया इसीलिए उनकी समाधि यहां बनाई गई।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/kaushalya-mata-and-shri-ram-mandir-in-chattisgarh-chandrakhuri-4103679/

इस हनुमान मंदिर में अर्जी लगाने के 90 दिन के अंदर हो जाती है शादी की मनोकामना पूरी, जानें रहस्य


यूं तो बजरंगबली को बाल ब्रम्हचारी कहा जाता है, लेकिन इसके बावजूद एक जगह ऐसी है जहां वे अपने भक्तों का विवाह भी करवाते हैं। हनुमान जी ने वनवास के दौरान भगवान श्री राम और देवी सीता को भी मिलाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी। इसी प्रकार हनुमान जी का एक मंदिर ऐसा है जहां भक्त उनके पास शादी की अर्जी लेकर आते है और हनुमान जी अपने भक्त की मुराद पूरी करते हैं। यह मंदिर शादी वाले हनुमान जी के नाम से प्रसिद्ध है। यह प्रसिद्ध मंदिर जबलपुर जिले से 20 किलोमीटर दूर आगासौद गांव में स्थित है। यहां लोगों का मानना है की हनुमान जी के इस मंदिर में लोग शादी की मनोकामना लेकर आते हैं और यहां अर्जी लगाने के 90 दिन के अंदर ही शादी की मनोकामना पूरी भी हो जाती है। मंदिर में युवक-युवती अपनी शादी की मुरादें लेकर बड़ी संख्या में दर्शन के लिए आते हैं।

 

hanuman mandir agasoud

नारियल बांधकर लगाते हैं अर्जी
हनुमान मंदिर में मनोकानाओं के लिए अर्जी लगाई जाती है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु लाल कपड़े में नारियल बांधते हैं। इसके बाद मन में मनोकामना लेकर इसे मंदिर में ही बांध दिया जाता है। मनोकामना पूरी होने के बाद इस नारियल को बजरंगबली को अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि शादी ही नहीं बल्कि हनुमानजी सभी प्रकार के कष्टों को दूर करते हैं।

अर्जी पूरी होने पर आते हैं लोग
यहां स्थानिय लोगों का कहना है की मंदिर में अर्जी लगाने के लिए श्रद्धालु को तीन बार आना पड़ता है। अर्जी पूरी होने के बाद यहां हवन किया जाता है। जो मंदिर समिति कराती है। ग्रामीण सीताराम का कहना है कि यहां रोजाना लोग शादी की मनोकामना लेकर आते हैं। अभी तक सैकड़ों विवाह संपन्न हो चुके हैं।

 

hanuman mandir agasoud

हफ्ते में दो दिन लगता है भक्तों का तांता

शनिवार और मंगलवार को हनुमानजी के मंदिर में बहुत भीड़ होती है। इसलिए इन दिनों भक्तों का तांता लगा रहता है, मंदिर में ना सिर्फ गांव के बल्कि दूर-दूर से भी लोग पूजा करने व अर्जी लगाने आते हैं। यहां गुरुवार को भी विशेष पूजन किया जाता है। शादी को लेकर प्रचलित मान्यता के बारे में ग्रामीण बताते हैं कि यहां लगाई गई अर्जी कभी खाली नहीं जाती है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/famous-shadi-vale-hanuman-mandir-in-agasoud-jabalpur-madhya-pradesh-4087046/

इस तालाब में साक्षात दिखाई देते हैं भगवान विष्णु, दर्शन के लिए उमड़ती है भक्तों की भीड़


देशभर में कई अद्भुत व आकर्षक मंदिर हैं जिनकी सुंदरता किसी भी व्यक्ति को अपनी तरफ खींच सकती है। उन्हीं मंदिरों में से एक मंदिर नेपाल के काठमांडू से लगभग 10 किलोमीटर दूर है। नेपाल के शिवपुरी में स्थित विष्णु जी का मंदिर बहुत ही सुंदर व सबसे बड़ा मंदिर है। मंदिर अपनी नक्काशियों के लिए बहुत प्रसिद्ध है, यहां स्थापित मंदिर बुढ़ानिलकंठ मंदिर नाम से जाना जाता है। मंदिर में श्री विष्णु की सोती हुई प्रतिमा विराजित है। जो की लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

 

vishnu mandir

मंदिर में विराजमान है भगवान विष्णु की शयन प्रतिमा

बुढ़ानिलकुंठ मंदिर में भगवान विष्णु की शयन प्रतिमा विराजमान है, मंदिर में विराजमान इस मूर्ति की लंबाई लगभग 5 मीटर है और तालाब की लंबाई करीब 13 मीटर है जो की ब्रह्मांडीय समुद्र का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान विष्णु की इस प्रतिमा को बहुत ही अच्छे से बनाया व दर्शाया गया है। तालाब में स्थित विष्णु जी की मूर्ति शेष नाग की कुंडली में विराजित है, मूर्ति में विष्णु जी के पैर पार हो गए हैं और बाकी के ग्यारह सिर उनके सिर से टकराते हुए दिखाए गए हैं। विष्णु जी की इस प्रतिमा में विष्णु जी चार हाथ उनके दिव्य गुणों को बता रहे हैं, पहला चक्र मन का प्रतिनिधित्व करना, एक शंख चार तत्व, एक कमल का फूल चलती ब्रह्मांड और गदा प्रधान ज्ञान को दिखा रही है।

मंदिर में अप्रत्यक्ष रूप से विराजमान है भगवान शिव

इस मंदिर में भगवान विष्णु प्रत्यक्ष मूर्ति के रूप में विराजमान हैं वहीं भगवान शिव पानी में अप्रत्यक्ष रूप से विराजित हैं। बुदनीलकंठ के पानी को गोसाईकुंड में उत्पन्न माना जाता है और यहां लोगों का मानना है कि अगस्त में होने वाले वार्षिक शिव उत्सव के दौरान झील के पानी के नीचे शिव की एक छवि देखी जा सकती है।

 

vishnu mandir

पौराणिक कथा के अनुसार मंदिर का महत्व

पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन के समय समुद्र से हलाहल यानि विष निकला तो सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए इस विष को शिवजी ने अपने कंठ में ले लिया और तभी से भगवान शिव का नाम नीलकंठ पड़ा। जब जहर के कारण उनका गला जलने लगा तो वे काठमांडू के उत्तर की सीमा की ओर गए और एक झील बनाने के लिए अपने त्रिशूल के साथ पहाड़ पर वार किया और इस झील के पानी से अपनी प्यास बुझाई, इस झील को गोसाईकुंड के नाम से जाना जाता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/budhanilkantha-temple-darshan-timings-in-kathmandu-nepal-4055960/

इस मंदिर में मां के प्रकोप से नष्ट हो गई थी सारी संपदा, झील में हो गई थी परिवर्तित


देवी दुर्गा के नौ रुपों के लगभग पूरे भारत में मंदिर बने हुए हैं और उन्हीं प्रसिद्ध मंदिरों में से एक मंदिर राजस्थान के सांभर कस्बे में स्थित हैं। सांभर जयपुर से करीब 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां मां दुर्गा का शाकंभरी रुप स्थापित है। वैसे तो दुर्गा जी के इस रुप के देशभर में कई मंदिर है, लेकिन यह मंदिर बहुत ही खास और प्रसिद्ध माना जाता है। सांभर का नाम भी मां शाकंभरी के तप के कारण ही पड़ा। लेकिन नमक झील और मंदिर से जुड़ी कुछ खास बाते हैं जो की मंदिर की खासियत बताते हैं....

shakambhari mandir

इस वजह से मां का नाम पड़ा शाकंभरी

देवीभाग्वतपुराण के अनुसार राक्षसों के दुष्प्रभाव के कारण एक बार पृथ्वी पर अकाल पड़ गया था। जिसके बाद सभी देवताओं और मनुष्यों नें आदिशक्ति की आऱाधना की और उसके बाद मां ने सभी की प्रार्थान स्वीकार कर मां आदिशक्ति ने नव रूप धारण करके पृथ्वी पर दृष्टि डाली और उनकी दिव्य ज्योति से बंजर धरती में भी शाक उत्पन्न हो गई। इन्हीं शाक को खाकर सभी ने अपनी भूख मिटाई। यही कारण है की मां का नाम शाकंभरी पड़ा।

shakambhari mandir

चौहान वंश ने की थी मंदिर की स्थापना

माना जाता है की चौहान वंश के शासक वासुदेव द्वारा इस मंदिर की स्थापना सातवीं सदी में झील और सांभर नगर में की गई थी। सांभर के शाकंभरी माता मंदिर में जो प्रतिमा लगी है, उसके बारे में कहा जाता है कि यह मां शक्ति की कृपा से प्रकट हुई स्वयंभू प्रतिमा है। मां शाकंभरी चौहान वंश की कुलदेवी भी मानी जाती हैं। सांभर में होने वाली कोई भी पूजा मां के आशीर्वाद के बीना नहीं होती। माना जाता है की हर शुभ कार्य को करने से पहले मां का आशीर्वाद लिया जाता है।

ऐसे हुई थी सांभर झील की उत्पत्ति

स्थानीय लोगों का कहना है की मां शाकंभरी के तप से ही यहां अपार संपदा उत्पन्न हुई थी। इसलिए मनुष्य लालच के कारण आपस में लड़ने लगे थे। जब इस समस्या ने विकट रूप ले लिया तो मां ने अपनी शक्ति से उस सारी संपदा को नमक में परिवर्तित कर दिया। यही कारण है की जिससे सांभर झील की उत्पत्ति हुई थी।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/famous-durga-mandir-shakambari-mandir-in-sambhar-rajasthan-4040537/

यहां देवी मां की घूमती गर्दन देखने पहुंचते हैं लोग, साल में एक दिन होती है सीधी


देवी मां के चमत्कारों और उनकी महीमा से कोन अज्ञान है, सभी जानते हैं की देवी दुर्गा के कई मंदिर है जो बहुत ही चमत्कारी है। जहां व्यक्ति को आश्चर्य कर देने वाली चीज़ें होती है। जो की आस्था को और भी ज्यादा गहरा कर देती है। जी हां, वैसे तो देशभर में कई ऐसे अनोखे व चमत्कारी मंदिर है और सभी मंदिरों की अपनी अलग विशेषता और अद्भुतत्व हैं। उन्हीं मंदिरों में से एक मंदिर मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के गांव गुदावल में है। गुदावल गांव रायसेन से 30 किलोमीटर दूर है जहां मंदिर स्थापित है। यह देवी मां का ऐसा मंदिर है जहां अक्सर चमत्कार होते रहते हैं। माता की यह आकर्षक मूर्ति चमत्कारों के कारण देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर में प्रसिद्ध है। मंदिर की खास बात तो यह है की यहां विराजमान देवी मां की मूर्ति की गर्दन तिरछी है और वो अचानक सीधी हो जाती है। यह चमत्कार देखने के लिए बड़ी संख्या में भक्त इस स्थान पर पहुंचते हैं। यह भी कहा जाता है कि जो भक्त नवरात्र के दौरान माता की गर्दन को सीधा होते हुए देख लेता है उसके साभी बिगड़े काम बन जाते हैं। लेकिन यह तो सिर्फ सौभग्य वाले लोगों को ही प्राप्त होता है।

kankali devi mandir

रायसेन में स्थित यह मंदिर कंकाली मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है और मंदिर में मां काली की मूर्ति स्थापित है। यह मां काली का प्रचीन मंदिर है, यहां मां काली की 20 भुजाओं वाली मूर्ति के साथ भगवान ब्रम्हा, विष्णु और महेश की प्रतिमाएं विराजमान हैं। वैसे तो यहां सालभर ही भक्तों की भीड़ लगती है, लेकिन नवरात्र में मंदिर में भक्तों का तांता लग जाता है। हरे-भरे जंगलों के बीच यह मंदिर आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।

लगभग 45 डिग्री झुकी गर्दन हो जाती है सीधी

मान्यता है कि नवरात्र के दिनों में माता की लगभग 45 डिग्री झुकी गर्दन कुछ पलों के लिए सीधी हो जाती है, यह चमत्कार देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। इसके अलावा लोगों का मानना है की देवी मंदिर से जुड़ी एक ओर मान्यता हैं। जिसके अनुसार जिन महिलाओं की गोद सूनी होती है, वह श्रृद्धाभाव से यहां गोबर से उल्टे हाथ लगाती हैं और उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है। मनोकामना पूरी होने पर हाथों के सीधे निशान बना दिए जाते हैं। यहां हाथों के हजारों निशान बने हुए हैं। नवरात्र में बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/kankali-devi-mandir-in-madhyapradesh-bhopal-raisen-4030007/

भूलकर भी घर लेकर ना आएं इस मंदिर का प्रसाद, वरना साथ आ जाएगी मुसीबत


भारत देश में वैसे तो कई अनोखे मंदिर हैं जिनमें होने वाले चमत्कारों के बारे में विज्ञान भी नहीं जान पाया है। वहीं हनुमान जी के मंदिरों की बात की जाए तो उनके मंदिरों में कई रहस्य और चमत्कार छिपे हुए हैं। भगवान हनुमान जी के इन्हीं मंदिरों में से एक प्रमुख मंदिर राजस्थान के दौसा जिले में स्थित है। यह मंदिर मेहंदीपुर बालाजी के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर में स्थापित मेहंदीपुर बालाजी की बायीं छाती में एक छोटा सा छेद है, जिससे लगातार जल निकलता है। लोगों की मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है की यह बालाजी का पसीना है। यहां बालाजी के साथ-साथ प्रेतराज और भैरों महाराज भी विराजमान है। भैरों जी को कप्तान कहा जाता है। मंदिर का नज़ारा पहली बार जाने वाले व्यक्ति के लिए बहुत ही भयानक होता है, क्योंकि यहां लोगों के ऊपर काली छाया और प्रेत बाधा का साया दूर करने के लिए लाया जाता है। मंदिर में प्रांगण में पहुंचते ही व्यक्ति के अंदर की बुरी शक्तियां जैसे भूत, प्रेत, पिशाच कांपने लगते हैं। यहां प्रेतात्मा को शरीर से मुक्त करने के लिए उसे कठोर से कठोर दंड दिया जाता है।

mehendipur balaji

मंदिर का प्रसाद नहीं ले जा सकते घऱ

बालाजी मंदिर की खासियत है कि यहां बालाजी को लड्डू, प्रेतराज को चावल और भैरों को उड़द का प्रसाद चढ़ाया जाता है। कहते हैं कि बालाजी के प्रसाद के दो लड्डू खाते ही भूत-प्रेत से पीड़ित व्यक्ति के अंदर मौजूद भूत प्रेत छटपटाने लगता है और अजब-गजब हरकतें करने लगता है। यहां पर चढ़ने वाले प्रसाद को दर्खावस्त और अर्जी कहते हैं। मंदिर में दर्खावस्त का प्रसाद लगने के बाद वहां से तुरंत निकलना होता है। जबकि अर्जी का प्रसाद लेते समय उसे पीछे की ओर फेंकना होता है। इस प्रक्रिया में प्रसाद फेंकते समय पीछे की ओर नहीं देखना चाहिए। आमतौर पर मंदिर में भगवान के दर्शन करने के बाद लोग प्रसाद लेकर घर आते हैं लेकिन मेंहदीपुर बालाजी मंदिर से मेहंदीपुर में चढ़ाया गया प्रसाद यहीं पूर्ण कर जाएं। इसे घर पर ले जाने का निषेध है। खासतौर से जो लोग प्रेतबाधा से परेशान हैं, उन्हें और उनके परिजनों को कोई भी मीठी चीज और प्रसाद आदि साथ लेकर नहीं जाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार सुगंधित वस्तुएं और मिठाई आदि नकारात्मक शक्तियों को अधिक आकर्षित करती हैं। इसलिए इनके संबंध में स्थान और समय आदि का निर्देश दिया गया है।

mehendipur balaji

मेहंदीपुर बालाजी जाने से पहले जरुर रखें इन बातों का ध्यान

मेंहदीपुर बाला जी के दर्शन करने वालों के लिए कुछ कड़े नियम होते हैं। यहां आने से कम से कम एक सप्ताह पहले लहसुन, प्याज, अण्डा, मांस, शराब का सेवन बंद करना होता है। इसके अलावा जब भी बालाजी धाम जाएं तो सुबह और शाम की आरती में शामिल होकर आरती के छीटें लेने चाहिए। यह रोग मुक्ति एवं ऊपरी चक्कर से रक्षा करने वाला होता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/mehendipur-balaji-hanuman-mandir-in-rajasthan-dosa-4001248/

यहां साल में एक बार भक्तों को साक्षात दर्शन देते हैं शनिदेव, होते हैं कई अद्भुत चमत्कार


उत्तराखंड की देवभूमी में कई प्रसिद्ध और चमत्कारी मंदिर है। उन्हीं मंदिरों में से एक शनिदेव का मंदिर उत्तरकाशी जिले के गांव खरसाली में स्थित है। शनिदेव का प्राचीन मंदिर समुद्र तल से करीब 7000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यह प्राचीन मंदिर अपनी अनोखी बनावट व सुंदर कलाकृतियों के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। किवदंतियों के अनुसार मंदिर में साल में एक बार कार्तिक पूर्णिमा के दिन शनिदेव प्रकट होते हैं, कहा जाता है की इस दिन शनिदेव के ऊपर रखे घड़े या कलश खुद ही बदल जाते हैं। ऐसा कैसे होता है ना तो आजतक किसी ने इसे देखा है और नाही इसके बारे में किसी को कोई जानकारी है। ये भगवान का चमत्कार ही माना जाता है। लोगों के अऩुसार जो भक्त मंदिर में दर्शन के लिए आता है उसके कष्ट हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं।

नदी की तरफ चलने लगते हैं फूलदान
कथाओं के अनुसार बताया गया है की मंदिर में दो बड़े फूलदान रखे हैं जिनको रिखोला और पिखोला कहा जाता है। इस फूलदान को जंजीर से बांध के रखा जाता है। क्योंकि कहानी के अनुसार पूर्णिमा के दिन ये फूलदान यहां से चलने लगते हैं और चलकर नदी की ओर जाने लगते हैं।

shani mandir

अपनी बहन से मिलने जाते हैं शनिदेव
खरसाली में यमनोत्री धाम भी है जो की शनि धाम से करीब 5 किलोमीटर बाद पड़ता है। यमुना नदी शनि की बहन मानी जाती है। खरसाली में मौजूद शनि मंदिर में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। कहा जाता है की इस मंदिर में शनि देव 12 महीने तक विराजमान रहते हैं। इसके अलावा हर साल अक्षय तृतीय पर शनि देव अपनी बहन यमुना से यमुनोत्री धाम में मुलाक़ात करके खरसाली लौटकर आते हैं।

पांडवों ने करवाया था मंदिर का निर्माण
मंदिर से जुड़ी कहानियों और इतिहासकार की मानें तो यह स्‍थान पांडवों के समय का माना जाता है। इसलिए कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा करवाया गया था। इस पांच मंजिला मंदिर के निर्माण में पत्थर और लकड़ी का उपयोग किया गया है। इसी लिए ये बाढ़ और भूस्‍खलन से सुरक्षित रहता है।बाहर से देखने पर आभास नहीं होता है कि ये कोई पांच मंजिल की इमारत है। मंदिर में शनिदेव की कांस्य मूर्ति शीर्ष मंजिल पर स्‍थापित है। इस शनि मंदिर में एक अखंड ज्योति भी मौजूद है। ऐसी मान्‍यता है कि इस अखंड ज्योति के दर्शन मात्र से ही जीवन के सारे दुख दूर हो जाते हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/famous-shani-mandir-in-uttarkashi-kharsali-in-uttrakhand-3969267/

देवी महालक्ष्मी के 1200 साल पुराने इस मंदिर में बंद है करोड़ों का खजाना, जानें रहस्य


कर्नाटक के उडुपी जिले के कोल्लूर में स्थापित मां दुर्गा का मंदिर बहुप्रसिद्ध है। यह मंदिर करीब 1200 साल पुराना मंदिर है। घने जंगलों के बीच ऊंची पहाड़ियों पर बना यह मंदिर सातमुक्ति स्थलों में से एक मंदिर है। यह भव्य व खूबसूरत मंदिर मूकाम्बिका मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर में देवी आदि महालक्ष्मी रूप में विराजमान हैं। मूकांम्बिका मंदिर में तीन पहर में तीन रूपों की पूजा की जाती है। सुबह यहां महाकाली के रूप में, दोपहर में महालक्ष्मी के रूप में और शाम में महा सरस्वती के रूप में पूजा की जाती है। यह मंदिर कर्नाटक और केरल राज्‍य का सबसे महत्‍वपूर्ण तीर्थस्‍थल है।

 

mukambika mandir

मंदिर को लेकर पौराणिक कथा

किंवदंतियों के अनुसार कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर में एक कौमसुरा नामक एक राक्षस रहता था। उसने भगवान शिव से विशेष शक्ति प्राप्त की थी और इन शक्तियों से उसने संसार में आतंक फैला रखा था। सभी देवता उस राक्षस से दुरी बनाकर रखते थे, उसके बाद उन्हें अचानक कहीं से यह खबर लगी की राक्षस की मृत्यु होने वाली है। यह बात राक्षस को भी पता चली जिसके बाद उसने शिव जी की घोर तपस्या शुरु कर दी। भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए और उसे पूछा की क्या वरदान चाहिए। इस राक्षस को वरदान देने के गंभीर खतरे को जानकर भाषण की देवी सरस्वती ने इसकी बोलने की क्षमता को छीन लिया। और इस कारण कौमासुरा का नाम मुकासुरा यानि मूक राक्षस पड़ा। इसके बाद सर्वोच्च देवी दुर्गा देवी ने सब देवताओं की शक्ति जुटाई और इस राक्षस का वद्ध कर दिया। तब से इस देवी मंदिर का नाम मूकाम्बिका पड़ा।

 

mukambika mandir

मंदिर का प्रमुख आकर्षण

पहाड़ी इलाके के इस सुंदर एवं भव्‍य मंदिर में एक ज्योतिर्माया शिवलिंग स्थित है जिसके बीच में एक स्वर्ण रेखा है जो शक्ति का एक चिन्ह है। कहते हैं कि छोटा हिस्सा जागृत शक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है जोकि ब्रह्मा, विष्णु और शिव के त्रिमूर्ति रुप का आदर्श रूप है और बड़ा हिस्सा सरस्वती, पार्वती और लक्ष्मी के रचनात्मक स्त्री बल का प्रतीक है। इस ज्योतिर्लिंग के पीछे स्थित देवी मूकाम्बिका की सुंदर धातु की मूर्ति को श्री आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित किया गया था। इस प्राचीन मंदिर में एक पवित्र सिद्दी क्षेत्र भी है जिसके साथ कई कहानियां जुड़ी हुई हैं। मंदिर में प्रमुख रूप से नवरात्रि में सरस्वती पूजा आयोजित की जाती है जिसमें सैकड़ों तीर्थयात्री आते हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/mookambika-temple-in-karnataka-kollur-3958545/

मंदिर में सिर के बल उल्टे खड़े हैं बजरंगबली, अत्यंत चमत्कारी है यहां स्थापित प्रतिमा


इंदौर शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर सांवेर गांव में हनुमान जी का अद्भुत मंदिर है। जहां हनुमान जी सिर के बल उल्टे खड़े हैं। इस प्राचीन मंदिर में स्थापित हनुमान जी की उल्टी प्रतिमा विश्व की इकलौती प्रतिमा है, जो लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। लोग हनुमान जी की अद्भुत प्रतिमा के दर्शन करने देश भर से आते हैं। मंदिर में हनुमान जी के साथ भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और शिव-पार्वती की भी मूर्तियां भी स्थापित है। किवदंतियों के अनुसार मंदिर में यदि कोई व्यक्ति तीन या पांच मंगलवार तक बजंगबली जी के दर्शनों के लिए लगातार आता है, उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। साथ ही उसकी सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण हो जाती है। यहां मंगलवार को हनुमानजी को चोला चढ़ाने की भी मान्‍यता है। मंदिर में स्थित हनुमान जी की प्रतिमा को अत्यंत चमत्कारी माना जाता है।

ulte hanuman mandir

उल्टे हनुमानजी की प्रतिमा के पीछे है एक पौराणिक कहानी

रामायण काल में भगवान श्री राम व रावण का युद्ध हो रहा था तब अहिरावण ने एक चाल चली और खुद अपना रूप बदलकर अपने को राम की सेना में शामिल कर लिया। इसके बाद रात के समय जब सब सो रहे थे तब अहिरावण ने अपनी शक्ति से श्री राम एवं लक्ष्मण जी को मूर्छित कर उनका अपहरण कर लिया। वह उन्हें अपने साथ पाताल लोक में ले गया और जब वानर सेना को इस बात का पता चलता है तो चारों ओर हड़कंप मच गया। हनुमान जी भगवान राम व लक्ष्मण जी की खोज में पाताल लोक पहुंचे और वहां पर अहिरावण का वध उन्होंने भगवान राम और लक्ष्‍मण को वापस ले आए। माना जाता है सांवेर ही वह जगह थी जहां से हनुमान जी पाताल लोक की और गए थे। उस समय हनुमान जी के पांव आकाश की ओर तथा सर धरती की ओर था। जिस कारण उनके उलटे रूप की पूजा प्रतिमा आज भी वहां स्थापित है और यह ही वह जगह है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/ulte-hanuman-mandir-in-sanwer-indore-madhya-pradesh-3953151/

हस्तिनापुर के इस शिव मंदिर में भोलेनाथ पूरी करते हैं हर मन्नत, युधिष्ठिर ने भी मंगी थी मुराद


हस्तिनापुर भारत के प्रमुख व मशहुर स्थानों में से एक स्थान है। इस जगह को ना सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी लोग जानते हैं। क्योंकि इसका महाभारत में वर्णित कई घटनाओं से संबंध है। महाभारत से जुड़ी लगभग कई घटनाएं हस्तिनापुर से जुड़ी हुई है और आज भी वहां कई बातों के साक्ष्य नजर आते हैं। जिन्हें देखने देश-विदेश से लोग आते हैं। यह जगह दिल्ली से 110 किमी और क्रांतिधरा मेरठ से करीब 38 किमी की दूरी पर गंगा किनारे बसा है। जो की एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। हस्तिनापुर जैन, हिंदू एवं सिख धर्म का पवित्र स्थल है। इसी पवित्र नगरी में एक प्रसिद्ध शिव मंदिर लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मंदिर को लेकर लोगों की मान्यताएं हैं की यहां आने वाले भक्त बाबा भोलेनाथ से मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद लेकर जाते हैं। हस्तिनापुर का यह प्रमुख मंदिर पांडेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।

pandeshwar mahadev mandir

मंदिर में होती है हर मनोकामना पूरी

हस्तिनापुर सुंदर स्थानों में शामिल है, यहां वन जंगल और झीलें लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। यहां हर साल लाखों श्रृद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर परिसर स्थित प्राचीन विशाल वट वृक्ष है। इस वृक्ष के नीचे भी श्रद्धालु दीपक जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं। यहीं पर प्राचीन शीतल जल का कुआं स्थित है। इसका जल श्रद्धालु अपने साथ ले जाते हैं। इस जल के घर में छिड़कने से शांति मिलती है। पांडवेश्वर मंदिर में प्रतिदिन श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। किवदंती है कि महाभारतकाल में पांडु पुत्र युधिष्ठिर ने धर्मयुद्ध से पूर्व यहां शिवलिंग की स्थापना कर बाबा भोलेनाथ से युद्ध में विजयी होने की मन्नत मांगी थी। यही नहीं मंदिर के समीप गंगा की धारा बहती थी। द्रौपदी प्रतिदिन इस मंदिर में पूजा-अर्चना करती थीं। मंदिर परिसर के बीच में शिवलिंग स्थित है।

महाभारतकालीन में हुआ था मंदिर का जीर्णोद्धार

महाभारतकालीन इस मंदिर का जीर्णोद्धार बहसूमा किला परीक्षितगढ़ के राजा नैन सिंह ने 1798 में कराया था। मंदिर में लगी पांच पांडवों की मूर्ति महाभारतकालीन है। इसका अंदाजा उनकी कलाकृति से लगता है। यहां स्थित शिवलिंग प्राकृतिक है। यह शिवलिंग जलाभिषेक के चलते आधा रह गया है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/pandeshwar-mahadev-mandir-in-hastinapur-meerut-3942695/

500 साल पुराने इस मंदिर में पूरी होती है नौकरी की मन्नतें, भक्तों का लगा रहता है तांता


अच्छी नौकरी और विदेश जाना हर व्यक्ति जाना चाहता है। लेकिन ये तमन्ना हर इंसान की पूरी नहीं होती। कुछ लोगों की अधूरी रह जाती है। पर शायद आपको यह नहीं पता की आपकी यह तमन्ना मंदिर में पूरी की जाती है। जी हां, हैदराबाद से करीब 40 किमी दूर एक मंदिर ऐसा अनोखा मंदिर है जहां बेरोजगार अपनी नौकरी की तमन्ना लेकर आते हैं। इसके अलावा में लोग वीजा दिलाने की प्रार्थना के लिए भी आते हैं। मान्यताओं के अनुसार यहां आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता।

chilkur balaji

जिस अनोखे मंदिर की हम बात कर रहे हैं वह मंदिर हैदराबाद की सीमा से लगभग 40 किमी दूर स्थित चिल्कुर बालाजी मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर में लोग चढ़ावे के रुप में हवाई जहाज चढ़ाते हैं। लोगों का कहना है की यहां हवाई जहाज़ चढ़ाने से वीजा मिलना आसान हो जाता है। दर्शानार्थी बताते हैं की वीज़ा के लिए दूतावास के चक्कर लगाने से अच्छा है चिल्कुर बालाजी मंदिर में आ जाएं। जल्द ही आपके वीजा बनने में आ रही सारी रुकावटें हट जाएगी। अगर आप को भी कई महीनों से वीजा नहीं मिल रहा है तो आन्ध्र प्रदेश स्थित चिल्कुर बालाजी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त कर लिजिए।

chilkur balaji

नौकरी भी दिलाते हैं चिल्कुर बालाजी

चिल्कुर बालाजी को वीजा वाले बालाजी के नाम से भी जाना जाता है। यह प्राचीन मंदिर लगभग 500 साल पुराना है। इस मंदिर में लोग नौकरी की मन्‍नतें लेकर भी आते है और उनकी मनोकामना जल्दी पूरी भी हो जाती है। लोक कथाओं के अनुसार वेंकटेश बालाजी के एक भक्त हर रोज़ कई किलोमीटर चलकर तिरुपति बालाजी के दर्शन के लिए जाते थे। एक दिन अचानक उनकी तबियत खराब हो गयी और वे मंदिर नहीं जा पाए। इस दौरान बालाजी ने खुद भक्त को सपने में आकर दर्शऩ दिए और बोले कि इतनी दूर जाने की कोई आवश्यकता नहीं है, मैं यहीं तुम्हारे पास इस जंगल में रहता है। अगले दिन जंगल में उसी जगह पर मूर्ति की स्थापना की गई। वह मंदिर आज चिल्कुर बालाजी के नाम से जाना जाता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/chilkur-balaji-mandir-or-visa-balaji-in-andra-pradesh-3922941/

इस अद्भुत मंदिर में आज भी सुरक्षित है सींग लगे नारियल, यहां भक्तों की पूरी होती है हर कामना


केरल के ही तिरुच्चूर रेलवे स्टेशन से 32 किलो मीटर दूरी पर गुरुवायूर मंदिर स्थित है। यहां स्थापित भगवान गुरुवायूरप्पा केरल के कई परिवारों के कुलदेवता के रूप में पूजे जाते हैं। गुरुवायुरप्पन श्री कृष्ण का बाल रूप है। वैसे तो यह मंदिर श्री कृष्ण को समर्पित है, लेकिन यहां भगवान विष्णु के दस अवतारों को भी दर्शाया गया है। मंदिर में आदि शंकराचार्य कुछ समय रुक थे। श्रीविल्वमंगल की आराधना का बहुत समय यहीं बीता था। जिसके बाद उन्होंने यहां की पूजा पद्धति में कुछ संशोधन किये थे और आज भी यहां आदि शंकराचार्य के नियमानुसार ही पूजा आराधना की जाती है। कहा जाता है की गुरुवायुर मंदिर में एकादशी और उल्सवम का त्यौहार बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। उल्सवम त्यौहार के दौरान यहां सांस्कृतिक कार्यक्रम, नृत्य का आयोजन किया जाता है। यहां आए भक्तों का मानना है की गुरुवायुरप्पा जी के दर्शन से मन में शांती मिलती है और सभी मनोकामनाएं भी जल्द पूरी होती है।

 

gayavur krishna mandir

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
एक पौराणिक कथा के अनुसार मंदिर में स्थित मूर्ति पहले द्वारका में स्थापित थी। एक बार द्वारका पुरी जब पूरी तरह जलमग्न हो गया तब यह मूर्ति बाढ़ में बह गई। कृष्ण जी की यह मूर्ति बृहस्पति देव को तैरती हुई दिखी। उन्होंने वायु देवता की सहायता से इस मूर्ति को बचाया तथा उचित स्थान पर स्थापित करने के लिए निकले। उचित स्थान की खोज में वह केरल पहुंच गए, जहां उन्हें भगवान शिव और देवी पार्वती के दर्शन हुए। भगवान की आज्ञा से उन्होंने मूर्ति की स्थापना केरल में ही की। क्योंकि इस मूर्ति की स्थापना गुरु और वायु ने की इसलिए इसका नाम 'गुरुवायुर' रखा गया। माना जाता है कि गुरूवायूर मंदिर उन कुछ भारतीय मंदिरों में से एक है जहां आज भी गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है।

मंदिर में आज भी रखे है सिंग लगे नारियल
किवदंतियों के अनुसार कहा जाता है की एक बार एक किसान फसल का पहला नारियल भगवान गुरुवापूर को चढ़ाने आ रहा था। मंदिर जाते समय उसे रास्ते में कुछ डाकू मिल गये। किसान ने डाकुओं से प्रार्थना की और कहा- सब कुछ ले लो, लेकिन भगवान को चढ़ाने के नारियल छोड़ दो। पर डाकू नहीं माने और बोलने लगे ‘गुरुवायूर के नारियलों में क्या सींग लगे हैं?’ इतना कहने के बाद सचमुच उन नारियलों में सींग निकल आये और डाकू डरकर भाग गये। इस घटना के बाद सिंग लगे नारियल आज भी मंदिर में सुरक्षित हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/guruvayoor-mandir-of-lord-krishna-in-kerala-3917692/

भारत की इस प्रसिद्ध व सुंदर गुफा मंदिर का सच जानकर हैरान रह जाएंगे आप, जानिए क्या है खासियत


भारत में कई जगहों पर कई प्रसिद्ध गुफाएं हैं जो की खुद में रहस्य व सुंदरता को समेटे हुए है। उन्हीं प्रसिद्ध गुफाओं में से एक है बादामी की प्रसिद्ध गुफा मंदिर। कर्नाटक राज्य के बागलकोट जिले में बादामी नाम के शहर में बना ये गुफा मंदिर बहुप्रसिद्ध हैं। भारत की सबसे पुरानी गुफा बादामी को 6वी शताब्दी में बनवाया गया था। बलुआ पत्थर से बने गुफा मंदिरों की सुंदरता देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। बादामी की इन मशहूर गुफाओं के निर्माण का सारा श्रेय चालुक्य वंश को जाता है। यहां की सभी गुफायें नगारा और द्रविड़ शैली में बनवाई गयी थी। इस शैली में बनाने के कारण यहा की सभी गुफाये बहुत ही सुन्दर दिखती है। यहां गुफा मंदिर अपनी सुंदर नक्काशियों के लिए जाने जाते हैं।

 

badami gufa mandir

नक्काशियों में दिखती पौराणिक और धार्मिक कथा

मंदिर में बनी नक्काशियों में पौराणिक तथा धार्मिक घटनाएं और शिक्षा दिखाई देती है। यहां चार गुफा मंदिर हैं, जिनमें से पहला गुफा मंदिर सबसे प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण 6वीं शताब्दी में हुआ था। इस मंदिर में भगवान शिव के अर्धनारीश्वर और हरिहर अवतार की नक्काशियां की गई हैं और इन नक्काशियों के साथ ही भगवान शिव का तांडव नृत्य की भी नक्काशी दिखाई देती है। इसके दाहिनी तरफ भगवान शिव का हरिहर रूप और बाईंं तरफ भगवान विष्णु का अवतार हैं। दर्शन करने आए दर्शनार्थी यहां भगवान शिव के साथ-साथ महिषासुरमर्दिनी तथा गणपति, शिवलिंगम और शन्मुख की मूर्तियां भी देख सकते हैं।

दूसरा गुफा मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है, जो वराह तथा त्रिविक्रम अवतार में यहां स्थापित हैं। वहीं तीसरी गुफा में भगवान विष्णु त्रिविक्रम और नरसिंह अवतार दिखाए गए हैं, जो की 100 फुट गहरा गुफा मंदिर है। चौथी गुफा मंदिर जैन धर्म को समर्पित है। जहां भगवान महावीर बैठी अवस्था में विराजमान है, इनके साथ ही गुफा में तीर्थकर पार्श्वनाथ का चित्र भी बना हुआ हैं। मंदिर की छत पर पुराणों के दृश्य दिखाए गए हैं। जिनमें भगवान विष्णु का गरुड़ अवतार दिखाया गया है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/badami-gufa-mandir-in-karnatak-jila-bagalkot-3905765/

मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति के मुख से लगातार आती है राम नाम की ध्वनी, चलती हैं सांसे


हनुमान जी के चमत्कारों से सभी बखूबी वाकिफ हैं और कहा भी जाता है की हनुमानजी को अजर अमर होने का वरदान मिला है। इसलिए वे आज भी धरती पर विराजमान हैं। दुनियाभर में माहवीर बजरंग बली के कई चमत्कारी मंदिर हैं जहां लोगों की आस्था जुड़ी है। उन्हीं मंदिरों में से एक मंदिर ऐसा भी है जहां हनुमान जी भक्तों की मुराद तो पूरी करते हैं बल्कि उनके होने का अहसास भी दिलाते हैं। जी हां, मंदिर में मौजूद मूर्ति प्रसाद खाती है और मूर्ति के आसपास राम नाम की ध्वनी भी सुनाई देती है। यही चमत्कार मंदिर में हनुमान जी के होने का संकेत देती है। यह मंदिर उत्तरप्रदेश के इटावा से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर थाना सिविल लाइन क्षेत्र के गांव रूरा के पास यमुना नदी के निकट पिलुआ महावीर मंदिर है। इस मंदिर से आसपास के जिलों सहित दूर-दूर से भी भक्तों की भीड़ उमड़ती है। यहां दर्शन करने आए भक्तों की महावीर जटिल से जटिल रोग ठीक कर देते हैं।

pilua hanuman mandir

हनुमान जी की मूर्ति खाती है प्रसाद

लोगों की मान्यताओं के अनुसार यहां मंदिर में स्थापित हनुमान जी की मूर्ति प्रसाद खाती है। इसके अलावा मूर्ति के मुख से लगातार राम नाम की ध्वनी सुनाई देती है और मूर्ति में सांसें चलने का आभास भी होता है। मंदिर में स्थापित हनुमान जी दक्षिण की तरफ मुंह करके लेटे हैं। मूर्ति के मुंह में जितना भी प्रसाद के रूप में लड्डू और दूध चढ़ाया जाता है वह कहां गायब हो जाता है, इसके बारे में आजतक कोई पता नहीं लगा पाया है।

ये है चमत्कारी मंदिर का इतिहास

अगर इस मंदिर के इतिहास पर नजर डालें तो आपको बता दें कि करीब तीन सौ साल पूर्व यह क्षेत्र प्रतापनेर के राजा हुक्म चंद्र प्रताप सिंह चौहान के अधीन था। उनको श्री हनुमानजी ने अपनी प्रतिमा यहां होने का स्वप्न दिया था। इसके तहत राजा हुक्म चंद्र इस स्थान पर आए और प्रतिमा को उठाने का प्रयास किया पर वे उठा नहीं सके। इस पर उन्होंने विधि-विधान से इसी स्थान पर प्रतिमा की स्थापना कराकर मंदिर का निर्माण कराया। दक्षिणमुखी लेटी हुई हनुमान जी की इस प्रतिमा के मुख तक हर समय पानी नजर आता है। चाहे जितना प्रसाद एक साथ मुख में डाला जाए, सब कुछ उनके उदर में समा जाता है। अभी तक कोई भक्त उनके उदर को नहीं भर सका और न यह पता चला कि यह प्रसाद कहां चला जाता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/pilua-hanuman-mandir-in-etawah-kanpur-uttar-pradesh-3864308/

इस काली मंदिर में प्रतिदिन तीन रुपों में दर्शन देती है देवी, चमत्कार देखने आते हैं भक्त


देवभूमि उत्तराखंड में बहुत से चमत्कारी मंदिर हैं, जो हिंदूओं की आस्था का केंद्र बने हुए हैं। उन्हीं चमत्करी मंदिरों में से एक मंदिर ऐसा है जो उत्तराखंड राज्य की रक्षा करता है। यहां मौजूद लोगों का मानना है की माता का यह मंदिर कई सालों से उनकी व राज्य की रक्षा करता है, उन्हें कठिनाईयों व आपदाओं से बचाता है। भक्तों की आस्था का केंद्र यहां मंदिर में स्थापित धारा देवी ना सिर्फ लोगों की बल्कि आसपास में मौजूद मंदिरों की भी रक्षा करता है। उत्तराखंड की देवभूमि पर स्थित यह मंदिर धारा देवी मंदिर के साम से प्रसिद्ध है, मंदिर में देवी धारा की पूजा व आरती समयानुसार पूर्ण विधि-विधान से की जाती है। मंदिर में दर्शन करने वाले लोगों का कहना है कि यहां मां काली प्रतिदिन तीन रूप बदलती है। वह प्रात:काल कन्या, दोपहर में युवती व शाम को वृद्धा का रूप धारण करती हैं। हर साल चैत्र व शारदीय नवरात्र में हजारों श्रद्धालु अपनी मनौतियों के लिए मंदिर में आते हैं। इसके अलावा चारधाम यात्रा के दौरान भी हर रोज सैकड़ों श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं

dhari devi mandir

माता का सिद्धपीठ उत्तराखंड के श्रीनगर से लगभग 15 किमी की दूरी पर स्थित है। शक्ति पीठों में कालीमठ यह मंदिर कलियासौड़ इलाके में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है। धारी गांव के पांडे ब्राहमण मंदिर के पुजारी हैं। मां काली कल्याणी की यह मूर्ति वर्तमान में अलकनंदा नदी पर जल-विद्युत परियोजना के निर्माण के चलते नदी से ऊपर मंदिर बनाकर स्थापित की गई है। रहवासियों के अनुसार, इस मंदिर के साक्ष्य साल 1807 में पाए गए थे। वहीं यहां के महंत का कहना है कि मंदिर 1807 से भी कई साल पुराना है। यहां मां का गुस्सा किसी से छुपा नहीं है, यहां के लोगों की मानें तो केदारनाथ में आया प्रलय धारी देवी के गुस्से का ही नतीजा था। लोगों का मानना है कि उत्तराखंड सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी और देवी माता के मंदिर को तोड़ दिया। पहाड़ी बुजुर्गों के अनुसार उत्तराखंड में समय-समय पर आने वाली विपदा का कारण मंदिर को तोड़कर मूर्ति को हटाया जाना ही है। ये प्रत्यक्ष रूप से देवी का प्रकोप है। 2013 जून में केदारनाथ में आई आपदा के लिए भी धारी देवी को मंदिर को अपलिफ्ट करना भी एक कारण बताया जाता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/dhari-devi-shaktipeeth-kalimath-mandir-in-uttrakhand-3835706/

यहां काली मंदिर में भक्तों को दिन में सिर्फ दो बार दर्शन देती हैं देवी, ये है रहस्य


हिमाचल प्रदेश के सराहन में भीमाकली मंदिर हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल माना जाता है। 51 शक्तिपीठों में से एक भीमाकली मंदिर पवित्र स्थल है। यह मंदिर रामपुर बुशहर से करीब 30 किलोमीटर दूर सराहन में देवी भीमाकली को समर्पित है। काली माता का प्राचिन मंदिर अपने अंदर सुंदरता समेटे हुए है। इसके साथ ही सराहन शहर की खुबसूरत पहाड़ियों में अपनी अनुठी शैली से बना यह मंदिर अपने अंदर शांति और सुकून का आभास करवाता है। काली माता का विख्यात और प्राचीन मंदिर करीब 1000 से 2000 वर्ष पुराना मंदिर है।

 

bhimakali mandir

हिंदू और बौद्ध शैली का मिश्रण है यह मंदिर

भीमाकली का मंदिर हिंदू और बौद्ध शैली का मिश्रण है। प्राचीन मंदिर केवल आरती या विशेष मौको पर ही खुलता है। नया मंदिर 1943 में बनाया गया था। मंदिर परिसर में भैरों और नरसिंह जी को समर्पित दो अन्य मंदिर भी हैं। पहाड़ो की बैकड्राप इस मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगा देती है। इस मंदिर को शक्तिपीठों में भी गिना जाता है। जहां पर देवी सती का बायां कान गिर गया था। इस लिहाज से ये मंदिर काफी महत्वपूर्ण बन जाता है।

लगभग 800 साल पुराना है यह मंदिर

भीमाकाली का मंदिर करीब लगभग 800 साल पहले बनाया गया माना जाता है। यह अपनी अनूठी वास्तुकला और मिश्रण शैली के लिए जाना जाता है। अब यह पुराना मंदिर सुबह और शाम में कर्मकांडों या आरती के समय को छोड़कर जनता के देखने के लिए बंद रहता है। मंदिर परिसर के भीतर एक नया मंदिर 1943 में बनाया गया था। मंदिर में देवी भीमाकली की एक मूर्ति को एक कुंवारी और एक औरत के रूप में चित्रित निहित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हिंदू देवता शिव की पत्नी सती, वैवाहिक जीवन के परम सुख और दीर्घायु की देवी का बायां कान इस जगह गिर गया था।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/bhimakali-mandir-mandi-rampur-sarahan-himachal-pradesh-3815428/

मंदिर में आज भी मौजूद है हनुमान जी के पद चिन्ह, भक्तों की मांगी हर मुराद होती है पूरी


समुद्र तल से 8048 फीट की ऊँचाई पर स्थित जाखू पहाड़ी शिमला शहर की बहुत ही खुबसूरत और मनोरम चोटीयां हैं। इस चोटी पर भगवान हनुमान जी का मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। मंदिर में देश ही नहीं विदेशों से भी लोग दर्शन के लिए आते हैं। मान्यताओं के अनुसार मंदिर रामायण काल से जुड़ा हुआ है। यहां बहुत बड़ी संख्या में वानर(बंदर) रहते हैं। कहा जाता है की ये बंदर भगवान हनुमान का रामायण काल से ही इंतजार कर रहे हैं। जाखू मंदिर के प्रांगण में ही हनुमान जी की 108 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा भी स्थापित है, जिसे शिमला के किसी भी कोने से आसानी से देखा जा सकता है। भक्तों का मानना है की यहां आने वाले हर भक्त की मुराद पूरी होती है। कोई यहां से खाली हाथ नहीं लौटता है।

 

jakhoo hanuman mandir

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह है मंदिर की कहानी

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है की राम और रावण के बीच युद्ध के दौरान लक्ष्मण जी के मूर्छित हो जाने पर संजीवनी बूटी लेने के लिए हनुमान जी हिमालय की ओर आकाश मार्ग से जा रहे थे उसी समय उनकी नज़र यहां तपस्या कर रहे यक्ष ऋषि पर पड़ी। बाद में इसका नाम यक्ष ऋषि के नाम पर ही यक्ष से याक, याक से याकू, याकू से जाखू तक बदलता गया। हनुमान जी विश्राम करने और संजीवनी बूटी का परिचय प्राप्त करने के लिए जाखू पर्वत के जिस स्थान पर उतरे, वहां आज भी उनके पद चिह्नों को संगमरमर से बनवा कर रखा गया है।

यक्ष ऋषि से संजीवनी बूटी का परिचय लेने के बाद वापस जाते हुए उन्होंने मिलकर जाने का वचन यक्ष ऋषि को दिया और द्रोण पर्वत की तरफ चल पड़े। मार्ग में कालनेमि नामक राक्षस के कुचक्र में फंसने के कारण समय के अभाव में हनुमान जी छोटे मार्ग से अयोध्या होते हुए चल पड़े। जब वह वापस नहीं लौटे तो यक्ष ऋषि व्याकुल हो गए। हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिया, उसके बाद इस स्थान पर हनुमान जी की स्वयंभू मूर्ति प्रकट हुई। जिसे लेकर यक्ष ऋषि ने यहीं पर हनुमान जी का मंदिर बनवाया। आज यह मूर्ति मंदिर में स्थापित है और दूर-दूर से लोग उनके दर्शन को आते हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/jakhoo-hanuman-mandir-in-shimla-himachal-pradesh-3802520/

मां काली के इस मंदिर में अमावस्या पर आती है डायन, होती है भक्तों की हर मुराद पूरी


आस्था के द्वार माता पोहलानी का मंदिर डलहौजी में डैनकुंड की खुबसूरत वादियों में बसा हुआ है। माता के इस दरबार में लोगों की भारी आस्था जुड़ी हुई है। हिमाचल प्रदेश के जिला चंबा के डलहौजी से 12 km की दूरी पर खूबसूरत वादियों के बीच स्थित इस मंदिर में मां काली का रुप पोहलानी स्थापित है। पोहलानी देवी पहलवानों की देवी कही जाती हैं। वैसे तो यहां हमेशा ही भक्तों का तांता देवी दर्शन के लिए लगा रहता है लेकिन नवरात्रि के मौके पर यहां अथाह भीड़ देखने को मिलती है। भक्त यहां अपनी मुरादें लेकर आते हैं उनका मानना है की यहां आने वाले हर भक्त की मन्नत पूरी जरुर होती है। मन्नत पूरी होने पर भक्त देवी को धन्यवाद देने भी आते हैं। मंदिर से काफी लोगों की आस्‍था जुड़ी हुई हैं। कहा जाता है कि हजारों वर्ष पहले इस डैनकुण्ड की पहाड़ी के उस मार्ग से कोई भी नहीं आ जाता था, क्योंकि इस पहाडीं पर राक्षसों का वास था। माता काली जी ने पहलवान के रुप में आकर उन राक्षसों का संहार किया तब से इस मंदिर का नाम पोहलवानी पड़ा। कहते है डेनकुण्ड नामक जगह पर डायने रहती थी यंहा पर आज भी कुंड देखे जा सकते हैं। लोगों का मानना है कि डैन अमावस्या पर यहां आज भी डायने आती हैं।

pohlani devi mandir

पौराणिक कथाओं के अनुसार

पौराणिक कथाओं के अनुसार लोगों पर बढ़ रहे अत्याचार को देखकर माता महाकाली से रहा नहीं गया और वह डैन कुंड की इन्ही पहाड़ियों पर एक बड़े से पत्थर से बाहर प्रकट हुई पत्थर के फटने की आवाज दूर दूर तक लोगों को सुनाई दी कन्या रूपी माता की हाथ में त्रिशूल था और यंही पर माता ने राक्षसों से एक पहलवान की तरह लड़ कर उनका वध किया तभी से यहाँ पर माता को पहलवानी माता के नाम से पुकारा जाने लगा। होवार के एक किसान को माता ने सपने में आकर कहा यहाँ पर माता का मंदिर स्थापित करने का आदेश दिया और उनके आदेशानुसार ही यहाँ पर माता के मंदिर की स्थापना की गई।

बेहतरीन पर्यटन स्थल है पोहलानी मंदिर

पोहलानी माता रखेड़ गांव के वाशिन्दों की कुल माता है इसके नजदीक खूबसूरत रखेड़ गांव पड़ता है जो काहरी पंचायत के अंदर आता है। यंही के लोगो की कमेटी मंदिर की देख रेख करती है। यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के उत्तर पश्चिम भाग में 2200 मीटर की उंचाई पर स्‍थित है। गमियों जहां पर्यटक यहां की ठण्डी हवाओं का लुप्त उठाते है तो वहीं सर्दी के मौंसम में बर्फ से ढ़के पहाडों का नजारा देखते ही बनता है। सर्दियों में ये मंदिर और इसके आसपास वर्फ़ की मोटी चादर बिछ जाती है, जिससे नजारा बहुत ही मनमोहक हो जाता है। दूर दूर तक वर्फ़ ही नज़र आती है उस समय यहां पंहुचना बहुत कठिन हो जाता है। यहां से चारों ओर का नजारा दिखाई देता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/pohlani-kali-mata-mandir-in-himachal-pradesh-3788833/

SHARE THIS


Subscribe via Email


Explore Jobs/Opportunities
West Bengal Jobs / Opportunities / Career
Sarkari Naukri Jobs / Opportunities / Career
Assam Jobs / Opportunities / Career
Explore Articles / Stories
Education
Government Schemes
News
Career
Admit Card
Study Material
Bihar
State Government Schemes
Technology
DATA
Public Utility Forms
Travel
Sample Question Paper
Exam Result
Employment News
Scholorship
Business
Astrology
Syllabus
Festival
Explore more
Main Page
Register / Login
Like our Facebook Page
Follow on Twitter
Subscrive Our Newsletter Via Nuzzle
Get Updates Via Rss Feed
Sarkari Niyukti
Free Online Practice Set
Latest Jobs
Feed contents
Useful Links
Photo
Video
Post Jobs
Post Contents
Supremedeal : India Business Directory
Find IFSC Code
Find Post Office / Pincode
Contact us
Best Deal

Disclaimer: we only provide job information. we are not associated with any job website. Although we take extreme care for accuracy of the information provided, but you must check the authenticity of the website before applying for the job. We are not responsible for your operation , once you leave our website and apply thereafter. Please recheck the genuineness of the job website from yourself also.

Copyright © 2018. Website template by WebThemez.com