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हिन्दुस्तान का एक ऐसा मंदिर जहां नहीं की जाती भगवान की पूजा


हिन्दुस्तान में शायद ही ऐसा कोई मंदिर होगा, जहां भगवान की पूजा नहीं होती होगी। शायद जवाब मिलेगा कि हर जगह पूजा होती है। लेकिन आज हम आपको बताएंगे ऐसे मंदिर के बारे में जहां भगवान की पूजा नहीं होती है, सिर्फ दर्शन किए जाते हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि उड़ीसा के पुरी में मौजूद भगवान जगन्नाथ की पूजा नहीं की जाती है। यहां भक्त सिर्फ उनके दर्शन करने आते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु जब चारों धाम की यात्रा पर गए थे, तब उन्होंने हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने अपने बद्रीनाथ धाम में स्नान किया था।

इसके बाद वहां से वे द्वारका में वस्त्र धारण किए थे। कहा जाता है कि वे पुरी में निवास करने लगे। माना जाता है कि यहां वे जग के नाथ बन गए। यही कारण है कि आज भी उन्हें जगन्नाथ के रूप में माना जाता है।

jagannath

जगन्नाथ धाम चार धामों में से एक है। यहां पर जगन्नाथ के साथ-साथ उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भी विरजमान हैं। यहां पर भगवान विष्णु ही जगन्नाथ के रूप में हैं। पुरी में जगन्नाथ के साथ-साथ बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां काष्ठ की हैं।

बताया जाता है कि प्रतिमा को 12 साल में एक बार नया कलेवर दिया जाता है और इन मूर्तियों का निर्माण किया जाता है। बताया जाता है कि उन मूर्तियों का आकार और रूप वैसा ही रहता है। ऐसा कहा जाता है कि इन मूर्तियों की पूजा नहीं होती, सिर्फ उन्हें दर्शन करने के लिए रखा गया है।


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चिता के ऊपर बना है यह मंदिर, जानें इसकी विशेषता


हिन्दुस्तान एक ऐसा देश है, जहां कुछ भी असंभव नहीं है। यहां की कई मंदिरें अजब-गजब नियमों को लेकर विश्वभर में प्रसिद्ध हैं तो कई मंदिरें स्थान/जगह को लेकर फेमस हैं। आज हम आपको ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे, जो स्थान और जगह को लेकर प्रसिद्ध है।

दरअसल, जिस मंदिर के बारे में हम बताने जा रहे हैं, उसके बारे में बताया जाता है कि वह चिता के ऊपर बनाया गया है। इस मंदिर को श्यामा माई के मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर बिहार के दरभंगा जिले में है।

कहा जाता है कि यहां मां काली का मंदिर चिता के ऊपर बना है। इस मंदिर में भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। इस मंदिर में सभी मांगलिक कार्य भी होते हैं। कहा जाता है कि श्यामा माई का मंदिर श्मशान घाट में महाराजा रामेश्वर सिंह के चिता के ऊपर बना है।

shyama mai mandir

माना जाता है कि महाराजा रामेश्वर सिंह दरभंगा राज परिवार के साधक राजाओं में एक थे। स्थानीय बताते हैं कि राजा के नाम के कारण इस मंदिर का नाम रामेश्वरी श्यामा माई पड़ा। दरभंगा के राजा कामेश्वर सिंह ने 1933 में इस मंदिर की स्थापान की थी।

इस मंदिर के गर्भ गृह में मां काली की विशाल प्रतिमा है। इस प्रतिमा के दाहिनी ओर महाकाल, बाईं ओर गणेश जी और बटुक देव की प्रतिमा है। यहां पर मां काली की पूजा वैदिक और तांत्रिक, दोनों विधियों से की जाती है। मंदिर में होनेवाली आरती का विशेष महत्व है।

हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार माना जाता है कि शादी के एक साल तक नवविवाहित जोड़ा को श्मशान घाट नहीं जाना चाहिए। लेकिन श्मशान भूमि में बने इस मंदिर में नवविवाहित जोड़े श्यामा माई से आशीर्वाद लेने आते हैं। साथ ही इस मंदिर परिसर में शादियां भी संपन्न कराई जाती है।


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इस अनोखे मंदिर में महाबली हनुमान जी के चरणों में नारी रूप में हैं शनि देव


शनि देव को सबसे क्रोधित देवता माना जाता है। कहा जाता है कि इनकी बुरी दृष्टि किसी व्यक्ति पर पड़ जाए तो उसके जीवन में परेशानियां आने लगती है। हमारे हिन्दू ग्रंथों में माना गया है जो भी व्यक्ति भगवान हनुमान जी की भक्ति करता है, उस पर शनि देव का प्रकोप नहीं रहता है। कहा जाता है कि महाबली हनुमान के आगे शनि देव भी कुछ नहीं कर पाते हैं।

आज हम आपको ऐसा मंदिर के बारे में बताएंगे जहां शनि देव महाबली हनुमान जी के चरणों में नारी रूप में हैं। अब सवाल ये भी उठता है कि आखिर वह कौन सा कारण था कि शनि देव को नारी रूप धारण करना पड़ा और महाबली हनुमान जी को चरणों में बैठना पड़ा? भारत में ऐसा मंदिर कहा है? तो अइये जानते हैं....

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार धरती पर शनि देव प्रकोप कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था। शनि देव की बुरी दृष्टि से मानव तो मानव देवता भी बहुत परेशान हो गए थे। इसके बाद सभी ने शनि देव के प्रकोप से बचने के लिए महाबली हनुमान जी को याद किया और उनसे रक्षा की गुहार लगाई। भक्तों की गुहार पर हनुमान जी ने शनि देव को सजा देने के लिए निकल पड़े।

जब इस बात की जानकारी शनि देव को लगी तो वो भयभीत हो गए। क्योंकि उन्हें पता था कि हनुमान जी के गुस्से से कोई रक्षा नहीं कर पाएगा। कथाओं के अनुसार, शनि देव हनुमान जी के गुस्से बचने के लिए उपाय निकाला और नारी का रूप धारण कर लिया।

सभी जानते हैं कि हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं और वे किसी स्त्री पर हाथ नहीं उठाते, ना ही बुरा बर्ताव करते। बस यही सोच कर शनि देव ने हनुमान जी से बचने के लिए नारी का रूप धराण कर लिए और भगवान हनुमान से उनके चरणों में शरण मांग ली। हनुमान जी को इस बात की जानकारी हो गई थी शनि देव ही स्त्री का रूप धारण किए हुए हैं। इसके बावजूद हनुमान जी ने शनि देव को नारी रूप में माफ कर दिया। उसके बाद शनि देव ने हनुमान जी के भक्तों पर से अपना प्रकोप हटा लिया।

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गुजरात के भावनगर में है मंदिर

ऐसा मंदिर गुजरात के भावनगर स्थि सारंगपुर गांव में है। इस प्रचीन हनुमान मंदिर को कष्टभंजन हनुमान मंदिर के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि जो भी भक्त इस मंदिर में हनुमान जी का दर्शन करने आता है और भक्ति करता है, उसके ऊपर से शनि देव का प्रकोप दूर हो जाता है। माना ये भी जाता है कि शनिदेव हनुमान जी के भक्तों को कभी परेशान नहीं करते हैं।


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यहां हर रोज बदलता है देवी मां का वाहन, दर्शन के लिए आने वालों की बदल जाती है किस्मत


मुंबई देश की आर्थिक राजधानी कहलाती है। कहा जाता है की इस शहर में लोग अपने सपनों को पूरा करने के लिए जाते हैं। सपनों की नगरी कहे जाने वाले इस शहर में फिल्मी कलाकार से लेकर कई बड़े बिज़नेसमेन भी रहते हैं। इन्हीं सब के बीच इस शहर में आकर्षण का केंद्र यहां स्थित एक मंदिर भी है। जो की मुंबई शहर के इस आकर्षण और नामी शहर का आधार है। जी हां, सालों पहले मुंबई एक उजाड़ शहर माना जाता था। अपनी बसावट के शुरुआती दौर में मुंबई मछुआरों की बस्ती हुआ करती थी। इस शहर ने आज जो मुकाम हासिल किया है उसका श्रेय देवी मां के इस चमत्कारी मंदिर को जाता है।

दरअसल हम जिस चमत्कारी मंदिर की बात कर रहे हैं वह मुंबई शहर में स्थापित मुंबा देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। मुंबा देवी का यह स्वरूप मां लक्ष्मी का ही रूप है। लोगों का मानना है की इन्हीं की कृपा के कारण मुंबई देश की आर्थिक राजधानी बन सका है। मां मुंबा देवी को मुंबई की ग्रामदेवी के रूप में पूजा जाता है। यहां हर शुभ काम से पहले मां का पूजन-अर्चन कर आशीर्वाद लिया जाता है। मंदिर की स्थापना यहां के मछुआरों ने समुद्र में आने वाले तूफानों से अपनी रक्षा के लिए की थी। तब से इन्हें मुंबा देवी के नाम से जाना जाता है। इन मुंबा देवी के नाम पर ही मुंबई शहर का नामकरण हुआ।

 

mumba devi mandir

यहां दिन के हिसाब से बदलता है देवी मां का वाहन

मां मुंबा का वाहन हर रोज बदलता है। कहते हैं दिन के हिसाब से मां मुंबा के वाहन का चयन होता है। सोमवार को मां नंदी पर सवार होती हैं तो मंगलवार को हाथी की सवारी करती हैं। बुधवार को मुर्गा तो गुरुवार को गरुड़ पर मां सवार होती हैं। शुक्रवार को सफेद हंस पर तो शनिवार को फिर से हाथी की सवारी करती हैं। वहीं रविवार को मां का वाहन सिंह होता है।

चांदी के बने हैं मां के वाहन

मां मुंबा हर दिन जिन वाहनों पर सवार होती हैं, उनका निर्माण चांदी से कराया गया है। इस मंदिर में प्रतिदिन 6 बार आरती होती है। आरती का समय अलग-अलग है। इस दौरान मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है।

mumba devi mandir

मंगलवार को होता है विशेष महत्व

मां मुंबादेवी के दर्शनों के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। श्रद्धालु मां से जो भी मन्नत सच्चे दिल से मांगते हैं, मां उस मन्नत को जरूर पूरा करती हैं। यहां सिक्कों को कील की सहायता से लकड़ी पर ठोककर मन्नत मांगी जाती है। हर मंगलवार को मां मुंबा के दर्शनों का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन यहां बहुत भीड़ रहती है।

ये है मंदिर से जुड़ी पैराणिक कथा

किवदंतियों के अनुसार, देवी मुंबा को ब्रह्माजी ने अपनी शक्ति से प्रकट किया था। जब स्थानीय लोग मुंबारक नाम के एक राक्षस से परेशान होकर ब्रह्मा जी से प्रार्थना की, तब उन्होंने प्रार्थना स्वीकार कर मुंबा देवी को प्रकट किया और देवी मां ने राक्षस का संहार किया। उसी के बाद मुंबई में देवी मां के भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया और मुंबारक का संहार करने वाली मां का नाम मुंबा देवी रखा दिया।


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भूलकर भी इस मंदिर में पति-पत्नी एक साथ न करें देवी के दर्शन, नहीं तो...


कहा जाता है कि शादी के बाद सभी शुभ कार्य पति-पत्नी को एक साथ ही करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें शुभ फल प्राप्त नहीं होते हैं। यही नहीं, ये भी कहा जाता है कि संभव हो तो मंदिर भी पति-पत्नी को एक साथ ही जाना चाहिए। लेकिन आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि एक ऐसा मंदिर भी है जहां पति-पत्नी को एक साथ जाने की इजाजत नहीं है। यहां पर एक साथ पति-पत्नी को पूजा अर्चना करना, दर्शन करने पर पूरी तरह रोक है। अब आप सोंच रहे होंगे कि ऐसा क्यों, तो हम आपको बताते हैं...

हिमाचल प्रदेश में एक श्राई कोटि माता का मंदिर है। यह मंदिर शिमला के रामपुर नामक स्थान पर स्थित है। इस मंदिर में पति-पत्नी को माता का पूजन और दर्शन पर पूरी तरह रोक है। इस मंदिर में एक साथ तो जा सकते हैं लेकिन एक साथ दर्शन नहीं कर सकते हैं। यहां पहुंचने वाले दंपती अलग-अलग समय पर मां के दर्शन करते हैं। कहा जाता है कि अगर कोई एक साथ जाकर माता का दर्शन करता है तो उसे सजा भुगतनी पड़ती है।

मान्यता है कि जब भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों गणेश और कार्तिकेय को ब्रह्मांड का चक्कर लगाने को कहा था, तब कार्तिकेय अपने वाहन पर बैठकर ब्रह्मांड का चक्कर लगाने चले गए थे, जबकि गणेश माता-पिता का चक्कर लगाकर कह दिया कि माता-पिता के चरण में ही ब्रह्मांड है। इसके बाद जब कार्तिकेय लौट कर आये तो उन्होने देखा कि गणेश जी का विवाह हो चुका है। इसके बाद उन्होंने कभी भी शादी नहीं करने का संकल्प ले लिया।

कार्तिकेय के विवाह नहीं करने के प्रण पर माता पार्वती बहुत ही नाराज हुईं। उन्होंने श्राप दिया कि जो भी पति-पत्नी एक साथ यहां उनके दर्शन करेंगे, वह एक दूसरे से अलग हो जाएंगे। यही कारण है कि आज भी इस मंदिर में एक साथ पति-पत्नी दर्शन नहीं करते हैं। माना जाता है कि अगर कोई दंपती भूलवश भी मंदिर में एक साथ दर्शन कर लेता है तो उसके वैवाहिक जीवन में बाधाएं आने लगती है।


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मां पीतांबरा के दरबार में अनसुनी नहीं जाती कोई पुकार


मध्य प्रदेश के झांसी के दतिया जिले में स्थित मां पीतांबरा के दरबार में लगाई गई गुहार कभी अनसुनी नहीं होती। कहा जाता है कि मां पीतांबरा सभी पर एक समान कृपा बरसाती हैं। राजा हो या रंक मां सभी की पुकार सुनती हैं।

बताया जाता है कि इस सिद्धपीठ की स्थापना 1935 में परम तेजस्वी स्वामी जी ने की थी। हालांकि मां पीतांबरा का जन्म स्थान, नाम और कुल आज तक रहस्य बना हुआ है। इसके बारे अब किसी ने भी सही जानकारी नहीं दी है। कहा जाता है कि मां का ये चमत्कारी धाम स्वामी जी के जप और तप के कारण ही एक सिद्ध पीठ के रूप में देशभर में जाना जाता है। यहां मां पीतांबरा चर्तुभुज रूप में विराजमान हैं। उनके एक हाथ में गदा, दूसरे में पाश, तीसरे में वज्र और चौथे हाथ में उन्होंने राक्षस की जिह्वा थाम रखी है।

यहां भक्त मां का दर्शन एक छोटी सी खिड़की से करते हैं। बताया जाता है कि दर्शनार्थियों को मां की प्रतिमा को स्पर्श करने से मनाही है। कहा जाता है कि मां बगुलामुखी ही पीतांबरा देवी हैं इसलिए उन्हें पीली वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं। बताया जाता है कि यहां पर भक्त विशेष अनुष्ठान करते हैं और मां को पीले कपड़े पहनाते हैं, उसके बाद ही मुराद मांगते हैं। माना जाता है कि मां किसी को निराश नहीं करती हैं।

कहा जाता है कि विधि-विधान से अगर अनुष्ठान किया जाता है तो मनोकामना जल्द पूरा कर देती हैं। माना जाता है कि मां पीतांबरा को राजसत्ता की देवी हैं और इसी रूप में भक्त उनकी आराधना करते हैं। राजसत्ता की कामना रखने वाले भक्त यहां आकर गुप्त पूजा अर्चना करते हैं। मां पीतांबरा शत्रु नाश की अधिष्ठात्री देवी है और राजसत्ता प्राप्ति में मां की पूजा का विशेष महत्व होता है।

यहां पर मां पीतांबरा के साथ ही खंडेश्वर महादेव और धूमावती के दर्शनों का भी सौभाग्य मिलता है। मंदिर के दायीं ओर खंडेश्वर महादेव हैं, जिनकी तांत्रिक रूप में पूजा होती है. महादेव के दरबार से बाहर निकलते ही दस महाविद्याओं में से एक मां धूमावती हैं. मां धूमावती का दर्शन केवल आरती के समय ही किया जा सकता है, बाकी समय मंदिर के कपाट बंद रहते हैं।


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Baglamukhi jayanti: यहां हर दिन होता है अनोखा चमत्कार, देखने के लिए लगती है भक्तों की भीड़


मध्यप्रदेश के दतिया में मां पीतांबरा पीठ लोगों की आस्था का केंद्र है। यह मंदिर देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है। देवी मां के स्वरूप में माता पीतांबरा का यह शक्तिपीठ बहुत ही चमत्कारी माना जाता है। मंदिर में वैसे तो सालभर ही भक्तों की भीड़ नज़र आती है, लोकिन विशेष अवसरों पर श्रद्धालु एक दिन पहले से ही यहां लाईन लगाकर खड़े हो जाते हैं। 12 मई 2019 को बगलामुखी जयंती है। इस अवसर पर भी बड़ी संख्या में लोग देवी के दर्शन करने आएंगे। कहा जाता है की जो भी भक्त यहां श्रद्धा से मां से मुराद मांगता है, उसकी मुराद जरूर पूरी होती है। यही नहीं राजसत्ता पाने के लिए इस मंदिर में विशेष पूजा अर्चना की जाती है। राजसत्ता की कामना रखने वाले भक्त यहां आकर गुप्त पूजा अर्चना करते हैं। मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर में कई बड़े-बड़े चमत्कार हुए हैं। इसके अलावा जो लोग मां पीतांबरा की शरण में आते हैं उनके शत्रु उनका कुछ नहीं बीगाड़ सकते हैं। इसको लेकर लोगों का कहना है कि, चीन से युद्ध के दौरान दतिया स्थित पीतांबरा माता ने ही हमारी मदद की थी। जिसके बाद चीन की सेना ने युद्ध रोक दिया था।

peetambara peeth datia

मंदिर में हुआ था 51 कुंडीय महायज्ञ

दरअसल भारत चीन युद्ध के समय यहां फौजी अधिकारियों व तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के अनुरोध पर देश की रक्षा के लिए मां बगलामुखी की प्रेरणा से 51 कुंडीय महायज्ञ कराया गया था। जिसके परिणामस्वरूप 11वें दिन अंतिम आहुति के साथ ही चीन ने अपनी सेनाएं वापस बुला ली थीं। उस समय यज्ञ के लिए बनाई गई यज्ञशाला आज भी यहां स्थित है। यहां लगी पट्टिका पर इस घटना का उल्लेख भी है।

देवी मां को बहुत पसंद है पीली चीज़ें

मां बगलामुखी को पीली वस्तुएं बहुत पसंद है। इनमें पीले प्रसाद से लेकर वस्त्र सभी शामिल हैं। इस मंदिर में माता के साथ खंडेश्वर महादेव भी विराजमान हैं। साथ ही यहां धूमावती देवी के दर्शन भी कर सकते हैं।

 

peetambara peeth datia

रोज बदलती हैं रूप

कहा जाता है कि मां पीतांबरा देवी अपना दिन में तीन बार अपना रुप बदलती हैं मां के दर्शन से सभी भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। इस मंदिर को चमत्कारी धाम भी माना जाता है।

स्वामीजी नें सन् 1935 में की थी मंदिर की स्थापना

ये इस सिद्धपीठ की स्थापना 1935 में स्वामीजी के द्वारा की गई। माना जाता है कि ये चमत्कारी धाम स्वामीजी के जप और तप के कारण ही एक सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा यहां भक्तों को मां के दर्शन एक छोटी सी खिड़की से ही होते हैं। जबकि मंदिर प्रांगण में स्थित वनखंडेश्वर महादेव शिवलिंग को महाभारत काल का बताया जाता है।


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एक ऐसा मस्जिद, जहां 27 साल तक नहीं की गई नमाज अदा


ब्रिटिश शासन के जुल्‍म और सितम की कहानी हमने कई किताबों पढ़ा है। इनके जुल्म और सितम से हमारे देश की मंदिर-मस्जिद भी अछूत नहीं रहीं हैं। आज हम आपको बताएंगे ऐसे मस्जिद के बारे में जहां 27 साल तक नमाज अदा नहीं की गई। अंग्रेजों ने यहां 27 साल तक किसी को भी नमाज अदा नहीं करने दी। यह मस्जिद लखनऊ शहर के प्रसिद्ध आसिफी मस्जिद है।

यह मस्जिद लखनऊ के बड़े इमामबाड़े में स्थित है। यहां पर गैर मुस्लिम लोगों को प्रवेश की अनुमति नहीं है। मस्जिद परिसर के आंगन में दो ऊंची मीनारें भी हैं। बताया जाता है कि यहां विश्व-प्रसिद्ध भूलभुलैया बनी है, जो अनचाहे प्रवेश करने वाले लोगों की रास्ता रोकती है।

अपनी भव्यता और नक्काशी के लिए दुनियाभर में मशहूर लखनऊ की आसिफी मस्जिद की बुनियाद 1784 में नवाब आसिफ-उद-दौला ने रखी थी। बताया जाता है कि इसका छत बिना किसी बीम के ढली है। जानकार बताते हैं कि एक दशक से भी ज्यादा समय तक अवध के लोग भयंकर अकाल की चपेट में थे।

बताया जाता है कि नवाब आसिफ-उद-दौला ने अकाल और भुखमरी से जनता को निजात दिलवाने के लिए आसिफी मस्जिद का निर्माण करवाना कार्य शुरू करवाया था ताकि यहां रहने वाले लोगों को खाने की समस्या से राहत मिल सके। बताया जाता है कि इसके निर्माण में लगभग 13 साल का समय लगा था।

27 साल बाद अदा की गई नमाज

यहां लगभग 27 साल बाद नमाज अदा की गई थी। दरअसल, 1857 की क्रांति से लेकर 1884 तक इस मस्जिद पर अंग्रेजों का कब्जा रहा। अंग्रेजी सरकार इसका इस्तेमाल गन पाउडर और गोला बारूद रखने के लिए करती थी। बताया जाता है कि लगभग 27 साल बाद इसे अंग्रेजों से मुक्त करवाया गया, तब यहां नमाज अदा हुई।

आज की तारीख में यहां पर लखनऊ शहर की सबसे बड़ी जुमे की नमाज अदा की जाती है। ईद और बकरीद में बड़ी संख्या नमाजी यहां नमाज अदा करने आते हैं।


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शत्रु पर पाना है विजय, तो इस देवी मंदिर में करें अनुष्ठान


इन दिनों मां बगलामुखी के दरबार में भक्तों की भारी भीड़ है। कहा जाता है कि मध्य प्रदेश के नलखेड़ स्थित मां बगलामुखी की मंदिर विश्व के सर्वाधिक प्राचीन मंदिरों में एक है। आजकल लोकसभा चुनाव के मद्देनजर प्रत्याशी और उनके समर्थक मां बगलामुखी के दरबार में मस्तक झुकाने आ रहे हैं ताकि चुनाव में वो जीत प्राप्त कर सकें। बता दें कि 12 मई को मां बगलामुखी की जयंती है।

यह स्थान नलखेड़ में नदी किनारे स्थित है। कहा जाता है कि यहां मां बगलामुखी की स्वयंभू प्रतिमा है। यह श्मशान क्षेत्र में स्थित है। बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना महाभारत युद्ध के दौरान 12वें दिन युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार किया था। बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना महाभारत में विजय पाने के लिए युधि‍ष्ठिर ने की थी। कहा जाता है कि मां बगलामुखी तंत्र की देवी हैं।

बताया जाता है कि तंत्र साधना में सिद्धि प्राप्त करने के लिए मां बगलामुखी को प्रसन्न करना पड़ता है, तब ही तंत्र साधना में सि्द्धि प्राप्त हो सकती है। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार, वैशाख शुक्ल अष्टमी को मां बगलामुखी की जंयती मनाई जाती है। पूरे विश्व में मां बगलामुखी की तीन मंदिर ऐतिहासिक है। जो भारत के मध्य प्रदेश नलखेड़ और दतिया में है जबकि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में मां बगलामुखी की मंदिर है।

मध्यप्रदेश में तीन मुखों वाली त्रिशक्ति माता बगलामुखी का यह मंदिर शाजापुर तहसील नलखेड़ा में लखुंदर नदी के किनारे स्थित है। द्वापर युगीन यह मंदिर अत्यंत चमत्कारिक है। यहां देशभर से शैव और शाक्त मार्गी साधु-संत तांत्रिक अनुष्ठान के लिए आते रहते हैं। इस मंदिर में माता बगलामुखी के अतिरिक्त माता लक्ष्मी, कृष्ण, हनुमान, भैरव तथा सरस्वती भी विराजमान हैं।

मां बगलामुखी को 8वीं महाविद्या कहा जाता है। इन्हें अधिष्ठात्री भी कहा जाता है। कहा जाता है कि मां बगलामुखी भक्तों के भय को दूर करके शत्रुओं और उनके बुरी शक्तियों का नाश करती हैं। इन्हें पीताम्बरा भी कहा जात है। बताया जाता है कि मां को पीला रंग पसंद है। यही कारण है कि इनके पूजन में पीले रंग की सामग्री का सबसे ज्यादा प्रयोग होता है। यही नहीं, मां बगलामुखी की आराधना करते समय भक्त को पीले वस्त्र का धारण करना चाहिए। कहा जाता है कि इनकी उपासना रात्रि काल में करने से विशेष सिद्धि की प्राप्ति होती है।

मां बगलामुखी स्तंभव शक्ति की अधिष्ठात्री हैं अर्थात यह अपने भक्तों के भय को दूर करके शत्रुओं और उनके बुरी शक्तियों का नाश करती हैं। मां बगलामुखी का एक नाम पीताम्बरा भी है इन्हें पीला रंग अति प्रिय है इसलिए इनके पूजन में पीले रंग की सामग्री का उपयोग सबसे ज्यादा होता है. देवी बगलामुखी का रंग स्वर्ण के समान पीला होता है अत: साधक को माता बगलामुखी की आराधना करते समय पीले वस्त्र ही धारण करना चाहिए।


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करनी है मनचाही शादी तो इस मंदिर में टेकें मत्था, हो जाएगी मुराद पूरी


जिंदगी में सच्चा प्यार सभी को नहीं मिलता। जो रिलेशन में रहते हैं वो चाहते हैं कि उनका प्यार हर हाल में मिल जाए ताकि वो अपना जीवन खुशी-खुशी से व्यतीत कर सकें। लेकिन बहुत बार ऐसा होता है कि जो एक दूसरे से प्यार करते हैं उन्हें अलग होना पड़ता है, जो उनके लिए पीड़दायी होता है।

लेकिन आज हम एक ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे जहां पर जाकर आप अपने मन की मुराद पूरा कर सकते हैं। कहा जाता यहां पर कई प्रेमी जोड़ा आए हैं जिनकी मुरादें पूरी हुई है। अगर आप भी चाहते हैं कि आपकी शादी मनपसंद साथी से हो तो आप एक बार जरूर इस मंदिर में जाएं और एक बार हनुमान जी का दर्शन करें। कहा जाता है कि इस मंदिर में आने वाले सभी श्रद्धालुओं का मनोकामना हनुमान जी पूरा करते हैं।

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बता दें कि हनुमान जी का यह मंदिर मध्य प्रदेश के आगासौद में है. जबलपुर से इस मंदिर की दूरी लगभग 20 किलोमीटर है। बाताया जाता है कि इस मंदिर में आने वाले हर प्रेमी जोड़ा लाल गुलाब का फूल चढ़ाता है। कहा जाता है हनुमान जी को लाल गुलाब काफी पसंद है। ऐसा करने से हनुमान जी प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मुरादें पूरी करते हैं।

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कहा जाता है कि जिनकी शादी नहीं होती है वो भी यहां आते हैं। इनके अलावा वो भी यहां आते हैं जिनके रिश्तों में कड़वाहट आ गई हो। कहा जाता है कि हनुमान जी सभी की मुरादें पूरी करते हैं और सभी के कष्टों का हरण करते हैं। बताया जाता है कि हर मंगलवार को यहां भक्तों की काफी भीड़ लगती है।


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ये है 'इश्किया मंदिर', यहां प्यार के लिए फरियाद करते हैं कपल्स


अगर आप प्यार करते हैं लेकिन आपके घर वाले इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर रहे हैं, तो घबराने की जरूरत नहीं है। आज हम आपको ऐसे मंदिर के बारे मां बताएंगे जहां फरियाद करने से आपकी हर मनोकामना पूरी हो जाएगी।

राजस्थान के जोधपुर में भगवान गणेश का एक ऐसा चमत्कारी मंदिर मौजूद है, जहां प्रेमी जोड़ों की हर मुराद पूरी होती है। यहां प्रेमी जोडे अपने प्यार फरियाद लेकर पहुंचते है। यही कारण है कि भगवान गणेश के इस मंदिन को 'इश्किया गजानन मंदिर' के नाम से जाना जाता है।

मान्यता है कि शादी की चाह रखने वाले युवा अगर इस मंदिर में आकर मन्नत मांगते हैं तो उनकी रिश्ता जल्द ही तय हो जाता है। यही नहीं, जो कपल्स अपने प्यार की फरियाद लेकर आते हैं, उनकी भी मुराद पूरी हो जाती है।

ishkiya gajanan

बताया जाता है कि यहां आनेवाले अधिकांश जोड़े अपने प्यार की फरियाद लेकर पहुंचते हैं और दुआ मांगते हैं कि उनकी शादी हो जाए। लोग कहते हैं कि इश्किया गजानन यहां आनेवाले सभी फरियादियों की मनोकामना पूरी करते हैं।

कहा जाता है कि इश्किया गजानन मंदिर को पहले गुरु गणपति के नाम से जाना जाता था। लोग बताते हैं कि शादी से पहले कपल्स पहली मुलाकात करने के यहां आया करते थे। बाद में यहां प्रेमी जोड़े भी आने लगे। लोग कहते हैं कि जब गणपति प्रेमी जोड़े की मुरादे पूरी करने लगे तो यह मंदिर इश्किया गजानन के नाम से मशहूर हो गया।

ishkiya gajanan

यहां हर बुधवार को भगवान गणेश के दर्शन के लिए प्रेमी जोड़ों की भीड़ उमड़ती है। लोग बताते हैं कि यह स्थान कपल्स के मिलने का स्थान बन गया है। यहां आनेवाले कपल्स अपने प्यार और रिश्ते की सलामती की दुआ मांगते हैं।


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भगवान परशुराम ने परशुरामेश्‍वर मंदिर में पाई हत्‍या की ग्‍लानि से मुक्ति


भगवान परशुराम को महान तपस्वी और योद्धा कहा जाता है। भगवान परशुराम को हत्या की ग्लानि से मुक्ति के लिए कठोर तपस्या करना पड़ा था। कहा जाता है कि भगवान परशुराम ने अपनी माता की हत्या की आत्मग्लानि से मुक्ति पाने के लिए शिवलिंग की स्थापना कर यहां घोर तपस्या की थी।

यह शिवलिंग आज भी मौजूद है। उत्तर प्रदेश के बागपद जनपद के पुरा गांव में परशुरामेश्वर महादेव मंदिर है। इस मंदिर को पौराणिक और ऐतिहासिक पवित्र स्थल माना जाता है। यहां साल में दो बार कांवर मेला लगता है। इस दौरान 20 लाख से अधिकक श्रद्धालु कांवर लेकर आते हैं और शिवलिंग जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि यहां जो भी मनोकामना मांगी जाती है, वह जरूर पूरी हो जाती है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह क्षेत्र पहले कजरी वन के नाम से जाना जाता था। इसी वन में परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि अपनी पत्नी रेणुका और पुत्रों के साथ रहते थे। एक बार राजा सहस्त्रबाहु शिकार के लिए कजरी वन में आए तो रेणुका ने कामधेनु के चलते उनका राजसी भोज से सत्कार किया।

राजा ने कामधेनु को अपने साथ ले जाने की इच्छा जताई तो रेणुका ने इनकार कर दिया, जिस पर क्रोधित होकर राजा रेणुका को जबरन अपने महल में ले गया। वहां तरस खाकर सहस्त्रबाहु की रानी ने उन्हें चुपके से मुक्त कर दिया। रेणुका आश्रम लौटी तो जमदग्नि ने रेणुका को अपवित्र बताकर आश्रम से जाने का आदेश सुना दिया।

रेणुका ने जमदग्नि से मोक्ष प्राप्ति के लिए उसका गला दबा देने की गुहार लगाई, जिसपर जमदग्नि ने वहां मौजूद चारों पुत्रों को अपनी माता की हत्या करने का आदेश दिया। तीन पुत्रों ने इसे महापाप बताते हुए आदेश मानने से इनकार कर दिया। लेकिन परशुराम ने पिता के आदेश का पालन करते हुए एक ही झटके में माता का सिर धड़ से अलग कर दिया।

धर्मशास्त्रों के अनुसार, माता की हत्या की ग्लानि से परशुराम काफी अशांत हो गए। आत्मशांति के लिए कजरी वन के करीब ही शिवलिंग स्थापित कर भगवान शिव की घोर तपस्या की। शिव ने प्रसन्न होकर वरदान के रूप में उनकी माता रेणुका को भी जीवित कर दिया।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार रुड़की स्थित कस्बा लंढौरा की रानी यहां से गुजर रही थीं, तो उनका हाथी इस स्थान पर आकर रुक गया। महावत की तमाम कोशिशों के बावजूद हाथी एक भी कदम आगे नहीं बढ़ा।

इसके बाद रानी ने नौकरों से यहां खुदाई कराई तो वहां शिवलिंग के प्रकट होने पर आश्चर्य चकित रह गईं। रानी ने यहां पर एक शिव मंदिर का निर्माण कराया। तब से लेकर आज तक यहां साल में दो बार कांवर मेला लगता है। श्रद्धालु हरिद्वार से कांवर लेकर आते हैं और भोलेनाथ पर जलाभिषेक करते हैं।


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अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर बांके बिहारी के चरणों के होते हैं दर्शन, मिलती है विशेष कृपा


देश के प्रमुख मंदिरों में से एक बांके बिहारी मंदिर बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित हैं। यहां वैसे तो सालभर ही भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन कुछ विशेष अवसरों या त्यौहारों पर यहां बहुत अधिक भीड़ रहती है। जैसे होली, कृष्ण जन्माष्टमी, अक्षय तृतीया आदि। वहीं 7 मई 2019 को अक्षय तृतीया आऩे वाली है इस मौके पर भक्तों का भारी जमावड़ा मंदिर में देखने को मिलेगा क्योंकि अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर बांके बिहारी मंदिर में बांके बिहारी जी के चरणों के दर्शन होते हैं। वैसे तो सालभर यहां बिहारी जी के चरण वस्त्रों और फूलों से ढ़के रहते हैं। लेकिन इस दिन कान्हा के चरणों के दर्शन करने से भक्तों को विशेष कृपा प्राप्त होती है।

 

banke bihari mandir

अद्भुत है यहां की मूर्ति

बांके बिहारी जी के मंदिर में राधा और श्री कष्ण की मूर्ति बहुत ही अद्भुत व आकर्षित है। यहां राधा और कृष्ण का सम्मिलित रुप है। माना जाता है कि स्‍वामी हरिदासजी ने इन्‍हें अपनी भक्ति और साधना की शक्ति से प्रकट किया था। बांके बिहारीजी के श्रृंगार में आधी मूर्ति पर महिला और आधी मूर्ति पर पुरुष के स्‍वरूप का श्रंगार किया जाता है।

भगवान के लिए मंगवाया जाता है विशेष चंदन

अक्षय तृतीया के दिन भगवान के पूरे शरीर पर चंदन का लेप किया जाता है। भगवान के लिए यह विशेष चंदन दक्षिण भारत से मंगवाया जाता है और उसे कई महीनों पहले घिसना शुरू कर दिया जाता है। अक्षय तृतीया से एक दिन पहले चंदन में कपूर, केसर, गुलाबजल, यमुनाजल और इत्रों को मिलाकर लेप तैयार कर लिया जाता है। फिर अक्षय तृतीया के दिन श्रृंगार से पहले भगवान के पूरे शरीर पर इसका लेप लगाया जाता है।

 

banke bihari mandir

अक्षय तृतीया को लेकर प्रचलित है यह कथा

एक बार वृंदावन में एक संत अक्षय तृतीया के दिन बांके बिहारीजी के चरणों का दर्शन करते हुए श्रद्धा भाव से गुनगुना रहे थे-श्री बांके बिहारीजी के चरण कमल में नयन हमारे अटके। एक व्‍यक्ति वहीं पर खड़ा होकर यह गीत सुन रहा था। उसे प्रभु की भक्ति का यह भाव बहुत पसंद आया। दर्शन करके वह भी गुनगुनाते हुए अपने घर की ओर बढ़ गया। भक्ति भाव में लीन इस व्‍यक्ति की गाते-गाते कब जुबान पलट गई, वह जान ही नहीं पाया और वह उल्‍टा गाने लगा- बांके बिहारी जी के नयन कमल में चरण हमारे अटके।

उसके भक्तिभाव से प्रसन्‍न होकर बांके बिहारी प्रकट हो गए। प्रभु ने मुस्‍कुराते हुए उससे कहा, अरे भाई मेरे एक से बढ़कर एक भक्‍त हैं, परंतु तुझ जैसा निराला भक्‍त मुझे कभी नहीं मिला। लोगों के नयन तो हमारे चरणों में अटक जाते हैं परंतु तुमने तो हमारे नयन कमल में अपने चरणों को अटका दिया। प्रभु की बातों को वह समझ नहीं पा रहा था, क्‍योंकि वह प्रभु के निस्‍वार्थ प्रेम भक्ति में डूबा था। मगर फिर उसे समझ आया कि प्रभु तो केवल भाव के भूखे हैं। उसे लगा कि अगर उससे कोई गलती हुई होती तो भगवान उसे दर्शन देने न आते। प्रभु के अदृश्‍य होने के बाद वह खूब रोया और प्रभु के दर्शन पाकर अपने जीवन को सफल समझने लगा। मान्‍यता है कि तब से अक्षत तृतीया के दिन बांके बिहारी के चरणों के दर्शन की परंपरा शुरू हुई।


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चमत्कारिक है यह मंदिर, स्वयं भगवान करते हैं यहां मौसम की भविष्यवाणी


मानसून आने से पहले या फिर मौसम के बदलने से पहले मौसम वैज्ञनिक द्वारा पूर्वानुमान लगाया जाता है की अब बारिश होगी या मौसम बदल जाएगा। लेकिन भारत देश में एक ऐसी चमत्कारी जगह है, जहां मानसून आने की सूचना भगवान स्वयं देते हैं। जी हां, आपको जानकर हैरानी हुई होगी लेकिन यह बात सही है। उत्तरप्रदेश के कानपुर में बेहटा गांव स्थित एक मंदिर है। यह मंदिर भगवान जगन्नाथ जी का है। लोगों की इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है। किसान बुआई और जुताई से पूर्व इस मंदिर में मानसून की जानकारी का इंतजार करते हैं और इसी के आधार पर खेती संबंधी योजना बनाते हैं। तो आइए मंदिर से जुड़े इस चमत्कार के बारे में जानते हैं....

 

jagannath mandir kanpur

भगवान जगन्नाथ का यह मंदिर कानपुर के घाटमपुर तहसील के बेहटा गांव में स्थित है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलदाऊ और बहन सुभद्रा भी विराजमान है। इनके अलावा मंदिर में पद्मनाभ स्वामी भी विराजमान हैं। मंदिर की मान्यता है की मानसून आने से ठीक 15 दिन पहले मंदिर की छत से पानी टपकने लगता है। इसी से आस-पास के लोगों को बारिश के आने का अंदाजा हो जाता है।

यह मंदिर करीब 5 हजार साल पुराना बताया जाता है। स्‍थानीय लोगों के बताए अनुसार उनके पूर्वजों द्वारा भी मंदिर की छत से टपकने वाली बूंदों द्वारा ही मानसून का पता लगाया जाता था और अब भी इसी के अनुसार मानसून के आने का पता करते हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर की छत से टपकने वाली बूंदों के हिसाब से ही बारिश भी होती है। यदि बूंदें कम गिरीं तो यह माना जाता है कि इस बार बारिश भी कम होगी। वहीं इसके विपरित देखें तो यदि ज्यादा बूंदें गिरीं तो बारिश भी अधिक होगी। मंदिर के इस प्रभाव को गांव के आसपास के 50 किलोमीटर के दायरे में देखने को मिलता है।

jagannath mandir kanpur

स्‍थानीय किसान बताते हैं कि वह अपनी खेती भी मंदिर से गिरने वाली बूंदों के हिसाब से ही करते हैं। इन बूंदों के अनुमान के हिसाब से ही खेतों की जुताई और बुआई का समय निर्धारित किया जाता है। बताया जाता है कि आज तक ऐसा नहीं हुआ कि मानसून आ गया हो और मंदिर से बूंदों के रूप में सूचना न मिली हो। कई बार तो वैज्ञानिकों ने भी मंदिर से गिरने वाली बूंदों की पड़ताल की, लेकिन आज तक किसी को नहीं पता चल सका कि आखिर मंदिर की छत से टपकने वाली बूंदों का राज क्‍या है और मानसून आने के पहले ही क्यों टपकती हैं।


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यहां परशुराम ने की थी शिव आराधना, जलाभिषेक से पूरी होती है मनोकामना


परशुरामेश्वर मंदिर भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है, जो शिवभक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस प्राचीन शिव मंदिर में लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं और भगवान को जल चढ़ाकर अपनी मनोकामना मांगते हैं। मान्यताओं के अनुसार यहां जो भी मनोकामना मांगी जाती है, वह जरूर पूरी होती है। परशुरामेश्वर महदेव मंदिर उत्तरप्रदेश के बागपत के पुरा गांव में स्थित है। मंदिर बहुत ही पवित्र स्थल माना जाता है, क्योंकि इसी स्थान पर भगवान परशुराम ने भगवान शिव की आराधना की थी। यहां साल में दो बार लगने वाले कांवड़ मेले में 20 लाख से अधिक श्रद्धालु कांवड़ लाकर भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं।

 

parshurameshwar mandir

मंदिर को लेकर मान्यता है की जहां पर परशुरामेश्वर पुरामहादेव मंदिर है। काफी पहले यहां पर कजरी वन हुआ करता था। इसी वन में जमदग्नि ऋषि अपनी पत्नी रेणुका सहित अपने आश्रम में रहते थे। रेणुका प्रतिदिन कच्चा घड़ा बनाकर हिंडन नदी से जल भर कर लाती थीं। वह जल शिव को अर्पण करती थीं। हिंडन नदी, जिसे पुराणों में पंचतीर्थी कहा गया है और हरनन्दी नदी के नाम से भी विख्यात है। जो यहां पास से ही निकलती है। ऐतिहासिक तथ्यों की माने तो भगवान परशुराम की तपोस्थली और वहां स्थापित शिवलिंग खंडहरों में तब्दील हो गया था। जिसके बाद पुनः लंढौरा की रानी ने करवाया था इस मंदिर का निर्माण।

 

parshurameshwar

किवदंतियों के अनुसार एक बार रुड़की स्थित कस्बा लंढौरा की रानी अपने लाव-लश्कर के साथ यहां से गुजर रही थीं, तो उनका हाथी इस स्थान पर आकर रुक गया। महावत की तमाम कोशिशों के बावजूद हाथी एक भी कदम आगे नहीं बढ़ा।

जिज्ञासावश रानी ने नौकरों से यहां खुदाई कराई तो वहां शिवलिंग के प्रकट होने पर आश्चर्य चकित रह गईं। इन्हीं रानी ने यहां पर एक शिव मंदिर का निर्माण कराया, जहां वर्तमान में हर साल लाखों श्रद्वालु हरिद्वार से पैदल गंगाजल लाकर भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो इस सिद्ध स्थान पर श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करता है उसकी सभी इच्छायें पूर्ण हो जाती हैं।


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ऐसा मंदिर जहां घर से भागे प्रेमी जोड़े को मिलता है सहारा


हिमाचल प्रदेश को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। प्राकृतिक सुंदरात के कारण इस प्रदेश की अलग पहचान है। बताया जाता है कि यहां लगभग दो हजार से अधिक मंदिरें हैं। हर मंदिर की अपनी एक कहानी है। आज हम बताने जा रहे हैं शंगचुल महादेव मंदिर की कहानी, जिसका संबंध महाभारत काल से है।

शंगचुल महादेव मंदिर कुल्लू के शांघड़ गांव में है। पांडवकालीन शांघड़ गांव में स्थित इस महादेव मंदिर के बारे में कहा जाता है कि घर से भागे प्रेमी जोड़े को शरण देते हैं। कहा जाता है कि किसी भी जाति-समुदाय के प्रेमी युगल अगर शंगचुल महादेव की सीमा में पहुंच जाते हैं, तो इनका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।

शंगचुल महादेव मंदिर की सीमा लगभग 100 बीघा का मैदान है। कहा जाता है कि इस सीमा में पहुंचे प्रेमी युगल को देवता की शरण में आया हुआ मान लिया जाता है। इसके बाद प्रेमी युगल के परिजन भी कुछ नहीं कर सकते।

sangchul mahadev mandir

विरासत के नियमों के पालन कर रहे लोग

कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां कुछ समय के लिए आये थे। कौरव उनका पीछा करते हुए यहां पहुंच गए। तब शंगचुल महादेव ने कौरवों को रोका और कहा कि यह मेरा क्षेत्र है, जो भी मेरी शरण में आया है, उसका कोई भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उसके बाद महादेव के डर से कौरव वापस लौट गए।

 

sangchul mahadev mandir

पलिस के आने पर प्रतिबंध

आज भी यहां रहने वाले लोग उसी विरासत के नियम का पालन करते हैं। इस गांव में पुलिस के आने पर प्रतिबंध है। इसके साथ ही यहां पर शराब, सिगरेट और चमड़े का सामान भी लेकर आना माना है। यहां भागकर आए प्रेमी युगल के मामले जब तक निपट नहीं जाते हैं तब-तक मंदिर के पंडित, प्रेमी युगल की खातिरदारी करते हैं। कहा जाता है कि समाज का ठुकराया हुआ शख्स या प्रेमी जोड़ा यहां शरण लेने पहुंचता है तो महादेव उसकी रक्षा करते हैं।

 


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बोनबीबी : हिंदू करते हैं पूजा, तो मुसलमान इबादत


सुंदरवन का नाम तो आपने सुना ही होगा। इसे आदमखोर बाघों की धरती भी कहा जाता है लेकिन आज हम आपको बताएंगे कि यहां की देवी के बारे में, जिनका हिंदू पूजा करते हैं, तो मुसलमान इबादत। कहा जाता है कि ये देवी बाघों से यहां पर रहने वाले लोगों की रक्षा करती हैं।

इस देवी का नाम है बोनबीबी। यहां के लोगों का मानना है कि इनमें ऐसी शक्ति है कि ये खुंखार बाघों से रक्षा करती हैं. हम आपको बताते हैं कौन हैं बोनबीबी और इनका इतिहास क्या है।

यहां के रहने वाले हिंदू और मुसलमान, दोनों ही मानते हैं कि हमारी रक्षा के लिए इन्हें स्वर्ग से भेजा गया है। स्थानीय लोग ये भी मानते हैं कि इनका जन्म सऊदी में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। कहा जाता है कि जब वो हज के लिए गईं थी थी तो उन्हें दैवीय शक्ति मिल गई और यहां आकर खुंखार बाघों से रक्षा करने लगीं।

मान्यता है कि इस जंगल पर दक्षिण राय नामक राक्षस का शासन था। मान्यता के अनुसार, राक्षस के अत्याचारों से लोगों को बचाने के लिए देवी ने राक्षस से युद्ध किया और उसे हरा दीं। कहा जाता है कि हारने के बाद राक्षस ने देवी से रहम की भीख मांगी, उसके बाद देवी ने उसे माफ कर दिया।

कहा जाता है कि राक्षस ने देवी को वचन दिया कि वो बाघों के हमले से लोगों की रक्षा करेगा लेकिन वे अपने वचन से मुकर गया और जंगल में जाकर छिप गया। यहां रहने वाले कहते हैं कि राक्षस ही बाघ का रूप धारण कर लोगों पर हमला करता है।

बता दें कि यहां के जंगलों में बोनबीबी की प्रतिमाएं जगह-जगह लगी हुई है। जंगल में प्रवेश करने से पहले यहां के रहने वाले लोग पहले बोनबीबी की पूजा करते हैं, उसके बाद ही जंगल में जाते हैं।

 


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इस शहर में जब चलती है लू, तब इस मंदिर में ठंड से कांपने लगते हैं श्रद्धालु, जानिए रहस्य


भारत में बहुत से ऐसे मंदिर हैं जो बहुत ही चमत्कारी माने जाते हैं। जिनका रहस्य आज तक ना तो पुरातत्व विभाग जान पाया और ना ही वैज्ञानिक इसकी तह तक जा पाए। ऐसे में भगवान को मानने वाले और ना मानने वाले दोनों लोग इसे भगवान का चमत्कार ही कहते हैं। हालांकि कुछ लोग ऐसे चमत्कारों को अंधविश्वास का नाम भी दे देते हैं, लेकिन कुछ लोग इसे मानते ही हैं। ऐसा ही एक मंदिर उड़ीसा के टिटलागढ़ में स्थापित है। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसके मुख्य द्वार में प्रवेश करते ही भक्तों ठंडी का अहसास होने लगता है। मंदिर के बाहर लोगों का गर्मी से चाहे जितना बुरा हाल हो लेकिन मंदिर के अंदर वे गर्मी भूल जाते हैं।

 

shiv parvati mandir titlagarh

मंदिर के दरवाजे बंद करने पर बढ़ जाती है ठंड

मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं तो इन हवाओं से अंदर बहुत ठंडक हो जाती है। वहीं मंदिर के बाहर इतनी गर्मी होती है कि 5 मिनट में आप पसीने से पूरी तरह तर हो जाएं और हो सकता है कि आपको लू लग जाए।

देव प्रतिमाओं से होती है ठंडक

टिटलागढ़ उड़ीसा राज्य का सबसे गर्म क्षेत्र माना जाता है। वहीं इतनी गर्म जगह एक कुम्‍हड़ा पहाड़ पर शिव-पार्वती का मंदिर अपने आप में रहस्यों को समेटे हुए है। पथरीली चट्टानों के चलते यहां पर भयानक गर्मी पड़ती है। लेकिन बावजुद इतनी गर्मी के मंदिर में इस मौसम का कोई असर दिखाई नहीं देता। मंदिर के पुजारियों का कहना है कि यहां स्थापित देव प्रतिमाओं से ही ठंडक आती है। भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की मूर्ती से ठंडी हवा निकलती है, जो पूरे मंदिर परिसर को ठंडा रखती है।

पुजारी बताते हैं कि मंदिर के बाहर के वातावरण में जैसे-जैसे धूप बढ़ती है, वैसे-वैसे मंदिर के अंदर ठंडक बढ़ती जाती है। गर्मियों में मंदिर का तापमान इतना गिर जाता है कि कंबल ओढ़ना पड़ता है।

 

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वैज्ञानिक भी नहीं जान पाए रहस्य

शिव-पार्वती मंदिर मंदिर के बाहर गर्मी का भयानक रूप और मंदिर के अंदर एसी से भी ज्‍यादा ठंड। इस रहस्‍य को जानने के लिए वैज्ञनिकों द्वारा काफी कोशिशें की जा चुकी है। लेकिन आज तक उन्हें कोई परिणाम नहीं मिला। यह बात आज भी रहस्य का विषय बनी हुई है।


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मंदिरः यहां यमराज को भी काल भैरव से लेनी पड़ती है अनुमति, दर्शन मात्र से दूर जाती है हर बाधा


कालाष्टमी के दिन भगवान काल भैरव की पूजा का विधान है। हर साल वैशाख माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी पर्व मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 26 अप्रैल, शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। कालाष्टमी के मौके पर देशभर के भैरव मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना की जाती है। वहीं उत्तरप्रदेश के काशी में बाबा भैरवनाथ का मंदिर बहुप्रसिद्ध है। कहा जाता है की बाबा विश्वनाथ की पावन नगरी काशी भगवान शिव की नगरी है, लेकिन यहां बाबा भैरवनाथ कोतवाल कहलाते है। मान्यताओं के अनुसार बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए आने वाले भक्तों को भैरवनाथ के दर्शन करना जरुरी होता है, अन्यता विश्वनाथ के दर्शन अधूरे माने जाते हैं। कालाष्टमी के दिन भैरवनाथ मंदिर में बड़ी धूमधाम व विशेष पूजा होती है। इस दिन मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है। आइए जानते हैं बाबा भैरवनाथ मंदिर के बारे में कुछ खास बातें....

 

 

kashi kotwal kaal bhairav

बाजीराव पेशवा ने बनवाया था मंदिर

बाजीराव पेशवा ने सान् 1715 में दोबारा इस मंदिर को बनवाया था। वास्तुशास्त्र के मुताबिक, ये मंदिर आज तक वैसा ही है। इसकी बनावट में कभी कोई बदलाव नहीं किया गया। मंदिर की बनावट तंत्र शैली के आधार पर है। ईशानकोण पर तंत्र साधना करने की महत्वपूर्ण स्थली है।

इसलिए कालभैरव करते हैं काशी की रखवाली

भगवान शिव की नगरी कही जाने वाली काशी के बाबा भैरवनाथ कोतवाल भी हैं। जी हां, भैरवनाथ को काशी का कोतवाल कहा जाता है। कथाओं के अनुसार, काल भैरव ने ब्रह्म हत्या के पापा से मुक्ति के लिए काशी में रहकर तप किया था। शिवजी ने काल को आशीर्वाद दिया कि तुम इस नगर के कोतवाल कहलाओगे। बस तभी से काल भैरव इस नगरी की रखवाली करते हैं और जहां बाबा भैरव ने तप किया था, आज वहां काल भैरव का मंदिर स्थापित है।

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काशी में यमराज को भी काल भैरव से लेनी पड़ती है अनुमति

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काशी में मृत्यु देने से पहले यमराज को काल भैरव से अनुमति लेनी पड़ती है। भैरव की अनुमति के बिना काशी में यमराज भी कुछ नहीं कर सकते हैं। जीवन में ग्रहों की स्थिति खराब हो या फिर मेहनत करने के बाद भी सफलता नहीं मिलती हो। ऐसे में काल भैरव का दर्शन करने से सारी बाधा दूर हो जाती है।

औरंगजेब ने जब काल भैरव मंदिर पर किया था हमला

बताया जाता है कि मुगल शासक औरंगजेब के शासन काल में जब काशी के विख्यात बाबा विश्वनाथ मंदिर का ध्वंस किया गया, तब भी कालभैरव का मंदिर पूरी तरह अछूता बना रहा था। कालभैरव का मंदिर तोड़ने के लिए जब औरंगजेब के सैनिक वहां पहुंचे तो अचानक पागल कुत्तों का एक पूरा समूह कहीं से निकल पड़ा था। उन कुत्तों ने जिन सैनिकों को काटा वे तुरंत पागल हो गए और फिर स्वयं अपने ही साथियों को उन्होंने काटना शुरू कर दिया। बादशाह को भी अपनी जान बचाकर भागने के लिए भागना पड़ा। उसने अपने अंगरक्षकों द्वारा अपने ही सैनिक सिर्फ इसलिए मरवा दिये की पागल होते सैनिकों का सिलसिला कहीं खुद उसके पास तक न पहुंच जाए। शास्त्रों के अनुसार, बाबा भैरव की सवारी कुत्ता है। बताया जाता है ये कुत्ते भैरवजी की सेना ही थी, जिससे मंदिर को कुछ नहीं हुआ। इस घटना के बाद काशी के कोतवाल की महिमा दूर-दूर तक फैल गई।


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जानिए प्रधानमंत्री मोदी को चुनाव से पहले मिला किस देवी का आशीर्वाद, शक्तिशाली है यह शक्तिपीठ


पावागढ़ माता का मंदिर मां के शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि पावागढ़ में मां के दाएं पैर का अंगूठा गिरा था, इस कारण इस जगह का नाम पावागढ़ हुआ। मां के इस धाम में माता की चुनरी का बहुत अधिक महत्व माना जाता है। कहा जाता है जिसे भी यहां की चुनरी या मां का आशीर्वाद प्राप्त होता है, वह बहुत ही भाग्यशाली होता है। पावागढ़ माता शक्तिपीठ का आशीर्वाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी प्राप्त हुआ। मंगलवार को लोकसभा के तीसरे चरण का मतदान हुआ। जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने गृहराज्य गुजरात में वोट डालने पहुंचे थे। वोट डालने से पहले मोदी ने गांधीनगर जाकर मां हीराबेन का आशीर्वाद लिया। मां ने अपने बेटे को जीत का आशीर्वाद देते हुए माथे पर तिलक लगाया और उन्हें पावागढ़ माताजी की चुनरी भेंट की। आइए जानते हैं मंदिर के बारे में खास बातें और यहां का महत्व...

paagarh mata mandir

करीब 550 मीटर की ऊंचाई पर है मंदिर

देश के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक देवी का यह मंदिर गुजरात के पंचमहल जिले में स्थित है। दक्षिणमुखी मां काली का यह मंदिर पावागढ़ की ऊँची पहाड़ियों के बीच तकरीबन 550 मीटर की ऊंचाई पर है। शक्ति के उपासकों के लिए माता का यह मंदिर अत्यंत सिद्ध स्थान है। इस मंदिर में मां काली की दक्षिणमुखी प्रतिमा विराजमान है जिनकी पूजा तंत्र-मंत्र से होती है। माता के इस मंदिर को शत्रुंजय मंदिर भी कहा जाता है। मान्यता है कि माता की इस भव्य मूर्ति की स्थापना स्वयं विश्वामित्र मुनि ने की थी। चूंकि काली माता की मूर्ति दक्षिणमुखी है, ऐसे में इसकी साधना-अराधना का विशेष महत्व है। यहां पर शत्रु, रोग आदि पर विजय पाने की कामना लिए हजारों-हजार भक्त पहुंचते हैं। देश के विभिन्न शक्तिपीठों की तरह यहां पर भी माता को अन्य प्रसाद सामग्री के साथ लाल रंग की चुनरी चढ़ाई जाती है। जिसे भक्तगण माता से मिले आशीर्वाद के रूप में अपने साथ ले जाते हैं।

pavagadh mata mandir

विश्वामित्र ने की थी काली की तपस्या

पावागढ़ की पहाड़ी का संबंध गुरु विश्वामित्र से भी रहा है। मान्यता है कि गुरु विश्वामित्र ने यहां माता काली की तपस्या की थी और उन्होंने ही मूर्ति को स्थापित किया था। यहां बहने वाली नदी का नाम भी उन्हीं के नाम पर विश्वामित्री पड़ा। माता के दरबार में पैदल पहुंचने वाले भक्तों को तकरीबन 250 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। हालांकि माता के दर्शन को पहुंचने के लिए रोपवे की सुविधा भी है।

पावागढ़ धाम की कहानी

पावागढ़ के नाम के पीछे भी एक कहानी प्रचलित है। जिसके अनुसार कहा जाता है कि पावागढ़ पर्वत पर चढ़ाई करना किसी के लिए भी संभव नहीं था। मंदिर के चारों तरफ घने जंगल और खाइयां थी। इन गहरी खाइयों से मंदिर के घिरे होने के कारण हवा का वेग भी चारों ओर से था। यही कारण है की इस शक्तिपीठ का नाम पावागढ़ पड़ा। पावागढ़ का अर्थ- ऐसी जगह कहा गया जहां हमेशा पवन यानी हवा का वास हो।

हर मनोकामना होती है पूरी

मान्यताओं के अनुसार यहां भक्तों द्वारा मां से सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। नवरात्र के समय इस मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और मुरादें पूरी होने का आशीर्वाद लेकर जाते हैं।


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