Patrika : Leading Hindi News Portal - Temples #educratsweb
HOME | LATEST JOBS | JOBS | CONTENTS | STUDY MATERIAL | CAREER | NEWS | BOOK | VIDEO | PRACTICE SET REGISTER | LOGIN | CONTACT US

Patrika : Leading Hindi News Portal - Temples

http://api.patrika.com/rss/temples 👁 428

यहां साल में एक बार भक्तों को साक्षात दर्शन देते हैं शनिदेव, होते हैं कई अद्भुत चमत्कार


उत्तराखंड की देवभूमी में कई प्रसिद्ध और चमत्कारी मंदिर है। उन्हीं मंदिरों में से एक शनिदेव का मंदिर उत्तरकाशी जिले के गांव खरसाली में स्थित है। शनिदेव का प्राचीन मंदिर समुद्र तल से करीब 7000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यह प्राचीन मंदिर अपनी अनोखी बनावट व सुंदर कलाकृतियों के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। किवदंतियों के अनुसार मंदिर में साल में एक बार कार्तिक पूर्णिमा के दिन शनिदेव प्रकट होते हैं, कहा जाता है की इस दिन शनिदेव के ऊपर रखे घड़े या कलश खुद ही बदल जाते हैं। ऐसा कैसे होता है ना तो आजतक किसी ने इसे देखा है और नाही इसके बारे में किसी को कोई जानकारी है। ये भगवान का चमत्कार ही माना जाता है। लोगों के अऩुसार जो भक्त मंदिर में दर्शन के लिए आता है उसके कष्ट हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं।

नदी की तरफ चलने लगते हैं फूलदान
कथाओं के अनुसार बताया गया है की मंदिर में दो बड़े फूलदान रखे हैं जिनको रिखोला और पिखोला कहा जाता है। इस फूलदान को जंजीर से बांध के रखा जाता है। क्योंकि कहानी के अनुसार पूर्णिमा के दिन ये फूलदान यहां से चलने लगते हैं और चलकर नदी की ओर जाने लगते हैं।

shani mandir

अपनी बहन से मिलने जाते हैं शनिदेव
खरसाली में यमनोत्री धाम भी है जो की शनि धाम से करीब 5 किलोमीटर बाद पड़ता है। यमुना नदी शनि की बहन मानी जाती है। खरसाली में मौजूद शनि मंदिर में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। कहा जाता है की इस मंदिर में शनि देव 12 महीने तक विराजमान रहते हैं। इसके अलावा हर साल अक्षय तृतीय पर शनि देव अपनी बहन यमुना से यमुनोत्री धाम में मुलाक़ात करके खरसाली लौटकर आते हैं।

पांडवों ने करवाया था मंदिर का निर्माण
मंदिर से जुड़ी कहानियों और इतिहासकार की मानें तो यह स्‍थान पांडवों के समय का माना जाता है। इसलिए कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा करवाया गया था। इस पांच मंजिला मंदिर के निर्माण में पत्थर और लकड़ी का उपयोग किया गया है। इसी लिए ये बाढ़ और भूस्‍खलन से सुरक्षित रहता है।बाहर से देखने पर आभास नहीं होता है कि ये कोई पांच मंजिल की इमारत है। मंदिर में शनिदेव की कांस्य मूर्ति शीर्ष मंजिल पर स्‍थापित है। इस शनि मंदिर में एक अखंड ज्योति भी मौजूद है। ऐसी मान्‍यता है कि इस अखंड ज्योति के दर्शन मात्र से ही जीवन के सारे दुख दूर हो जाते हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/famous-shani-mandir-in-uttarkashi-kharsali-in-uttrakhand-3969267/

देवी महालक्ष्मी के 1200 साल पुराने इस मंदिर में बंद है करोड़ों का खजाना, जानें रहस्य


कर्नाटक के उडुपी जिले के कोल्लूर में स्थापित मां दुर्गा का मंदिर बहुप्रसिद्ध है। यह मंदिर करीब 1200 साल पुराना मंदिर है। घने जंगलों के बीच ऊंची पहाड़ियों पर बना यह मंदिर सातमुक्ति स्थलों में से एक मंदिर है। यह भव्य व खूबसूरत मंदिर मूकाम्बिका मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर में देवी आदि महालक्ष्मी रूप में विराजमान हैं। मूकांम्बिका मंदिर में तीन पहर में तीन रूपों की पूजा की जाती है। सुबह यहां महाकाली के रूप में, दोपहर में महालक्ष्मी के रूप में और शाम में महा सरस्वती के रूप में पूजा की जाती है। यह मंदिर कर्नाटक और केरल राज्‍य का सबसे महत्‍वपूर्ण तीर्थस्‍थल है।

 

mukambika mandir

मंदिर को लेकर पौराणिक कथा

किंवदंतियों के अनुसार कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर में एक कौमसुरा नामक एक राक्षस रहता था। उसने भगवान शिव से विशेष शक्ति प्राप्त की थी और इन शक्तियों से उसने संसार में आतंक फैला रखा था। सभी देवता उस राक्षस से दुरी बनाकर रखते थे, उसके बाद उन्हें अचानक कहीं से यह खबर लगी की राक्षस की मृत्यु होने वाली है। यह बात राक्षस को भी पता चली जिसके बाद उसने शिव जी की घोर तपस्या शुरु कर दी। भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए और उसे पूछा की क्या वरदान चाहिए। इस राक्षस को वरदान देने के गंभीर खतरे को जानकर भाषण की देवी सरस्वती ने इसकी बोलने की क्षमता को छीन लिया। और इस कारण कौमासुरा का नाम मुकासुरा यानि मूक राक्षस पड़ा। इसके बाद सर्वोच्च देवी दुर्गा देवी ने सब देवताओं की शक्ति जुटाई और इस राक्षस का वद्ध कर दिया। तब से इस देवी मंदिर का नाम मूकाम्बिका पड़ा।

 

mukambika mandir

मंदिर का प्रमुख आकर्षण

पहाड़ी इलाके के इस सुंदर एवं भव्‍य मंदिर में एक ज्योतिर्माया शिवलिंग स्थित है जिसके बीच में एक स्वर्ण रेखा है जो शक्ति का एक चिन्ह है। कहते हैं कि छोटा हिस्सा जागृत शक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है जोकि ब्रह्मा, विष्णु और शिव के त्रिमूर्ति रुप का आदर्श रूप है और बड़ा हिस्सा सरस्वती, पार्वती और लक्ष्मी के रचनात्मक स्त्री बल का प्रतीक है। इस ज्योतिर्लिंग के पीछे स्थित देवी मूकाम्बिका की सुंदर धातु की मूर्ति को श्री आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित किया गया था। इस प्राचीन मंदिर में एक पवित्र सिद्दी क्षेत्र भी है जिसके साथ कई कहानियां जुड़ी हुई हैं। मंदिर में प्रमुख रूप से नवरात्रि में सरस्वती पूजा आयोजित की जाती है जिसमें सैकड़ों तीर्थयात्री आते हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/mookambika-temple-in-karnataka-kollur-3958545/

मंदिर में सिर के बल उल्टे खड़े हैं बजरंगबली, अत्यंत चमत्कारी है यहां स्थापित प्रतिमा


इंदौर शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर सांवेर गांव में हनुमान जी का अद्भुत मंदिर है। जहां हनुमान जी सिर के बल उल्टे खड़े हैं। इस प्राचीन मंदिर में स्थापित हनुमान जी की उल्टी प्रतिमा विश्व की इकलौती प्रतिमा है, जो लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। लोग हनुमान जी की अद्भुत प्रतिमा के दर्शन करने देश भर से आते हैं। मंदिर में हनुमान जी के साथ भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और शिव-पार्वती की भी मूर्तियां भी स्थापित है। किवदंतियों के अनुसार मंदिर में यदि कोई व्यक्ति तीन या पांच मंगलवार तक बजंगबली जी के दर्शनों के लिए लगातार आता है, उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। साथ ही उसकी सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण हो जाती है। यहां मंगलवार को हनुमानजी को चोला चढ़ाने की भी मान्‍यता है। मंदिर में स्थित हनुमान जी की प्रतिमा को अत्यंत चमत्कारी माना जाता है।

ulte hanuman mandir

उल्टे हनुमानजी की प्रतिमा के पीछे है एक पौराणिक कहानी

रामायण काल में भगवान श्री राम व रावण का युद्ध हो रहा था तब अहिरावण ने एक चाल चली और खुद अपना रूप बदलकर अपने को राम की सेना में शामिल कर लिया। इसके बाद रात के समय जब सब सो रहे थे तब अहिरावण ने अपनी शक्ति से श्री राम एवं लक्ष्मण जी को मूर्छित कर उनका अपहरण कर लिया। वह उन्हें अपने साथ पाताल लोक में ले गया और जब वानर सेना को इस बात का पता चलता है तो चारों ओर हड़कंप मच गया। हनुमान जी भगवान राम व लक्ष्मण जी की खोज में पाताल लोक पहुंचे और वहां पर अहिरावण का वध उन्होंने भगवान राम और लक्ष्‍मण को वापस ले आए। माना जाता है सांवेर ही वह जगह थी जहां से हनुमान जी पाताल लोक की और गए थे। उस समय हनुमान जी के पांव आकाश की ओर तथा सर धरती की ओर था। जिस कारण उनके उलटे रूप की पूजा प्रतिमा आज भी वहां स्थापित है और यह ही वह जगह है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/ulte-hanuman-mandir-in-sanwer-indore-madhya-pradesh-3953151/

हस्तिनापुर के इस शिव मंदिर में भोलेनाथ पूरी करते हैं हर मन्नत, युधिष्ठिर ने भी मंगी थी मुराद


हस्तिनापुर भारत के प्रमुख व मशहुर स्थानों में से एक स्थान है। इस जगह को ना सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी लोग जानते हैं। क्योंकि इसका महाभारत में वर्णित कई घटनाओं से संबंध है। महाभारत से जुड़ी लगभग कई घटनाएं हस्तिनापुर से जुड़ी हुई है और आज भी वहां कई बातों के साक्ष्य नजर आते हैं। जिन्हें देखने देश-विदेश से लोग आते हैं। यह जगह दिल्ली से 110 किमी और क्रांतिधरा मेरठ से करीब 38 किमी की दूरी पर गंगा किनारे बसा है। जो की एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। हस्तिनापुर जैन, हिंदू एवं सिख धर्म का पवित्र स्थल है। इसी पवित्र नगरी में एक प्रसिद्ध शिव मंदिर लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मंदिर को लेकर लोगों की मान्यताएं हैं की यहां आने वाले भक्त बाबा भोलेनाथ से मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद लेकर जाते हैं। हस्तिनापुर का यह प्रमुख मंदिर पांडेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।

pandeshwar mahadev mandir

मंदिर में होती है हर मनोकामना पूरी

हस्तिनापुर सुंदर स्थानों में शामिल है, यहां वन जंगल और झीलें लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। यहां हर साल लाखों श्रृद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर परिसर स्थित प्राचीन विशाल वट वृक्ष है। इस वृक्ष के नीचे भी श्रद्धालु दीपक जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं। यहीं पर प्राचीन शीतल जल का कुआं स्थित है। इसका जल श्रद्धालु अपने साथ ले जाते हैं। इस जल के घर में छिड़कने से शांति मिलती है। पांडवेश्वर मंदिर में प्रतिदिन श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। किवदंती है कि महाभारतकाल में पांडु पुत्र युधिष्ठिर ने धर्मयुद्ध से पूर्व यहां शिवलिंग की स्थापना कर बाबा भोलेनाथ से युद्ध में विजयी होने की मन्नत मांगी थी। यही नहीं मंदिर के समीप गंगा की धारा बहती थी। द्रौपदी प्रतिदिन इस मंदिर में पूजा-अर्चना करती थीं। मंदिर परिसर के बीच में शिवलिंग स्थित है।

महाभारतकालीन में हुआ था मंदिर का जीर्णोद्धार

महाभारतकालीन इस मंदिर का जीर्णोद्धार बहसूमा किला परीक्षितगढ़ के राजा नैन सिंह ने 1798 में कराया था। मंदिर में लगी पांच पांडवों की मूर्ति महाभारतकालीन है। इसका अंदाजा उनकी कलाकृति से लगता है। यहां स्थित शिवलिंग प्राकृतिक है। यह शिवलिंग जलाभिषेक के चलते आधा रह गया है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/pandeshwar-mahadev-mandir-in-hastinapur-meerut-3942695/

500 साल पुराने इस मंदिर में पूरी होती है नौकरी की मन्नतें, भक्तों का लगा रहता है तांता


अच्छी नौकरी और विदेश जाना हर व्यक्ति जाना चाहता है। लेकिन ये तमन्ना हर इंसान की पूरी नहीं होती। कुछ लोगों की अधूरी रह जाती है। पर शायद आपको यह नहीं पता की आपकी यह तमन्ना मंदिर में पूरी की जाती है। जी हां, हैदराबाद से करीब 40 किमी दूर एक मंदिर ऐसा अनोखा मंदिर है जहां बेरोजगार अपनी नौकरी की तमन्ना लेकर आते हैं। इसके अलावा में लोग वीजा दिलाने की प्रार्थना के लिए भी आते हैं। मान्यताओं के अनुसार यहां आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता।

chilkur balaji

जिस अनोखे मंदिर की हम बात कर रहे हैं वह मंदिर हैदराबाद की सीमा से लगभग 40 किमी दूर स्थित चिल्कुर बालाजी मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर में लोग चढ़ावे के रुप में हवाई जहाज चढ़ाते हैं। लोगों का कहना है की यहां हवाई जहाज़ चढ़ाने से वीजा मिलना आसान हो जाता है। दर्शानार्थी बताते हैं की वीज़ा के लिए दूतावास के चक्कर लगाने से अच्छा है चिल्कुर बालाजी मंदिर में आ जाएं। जल्द ही आपके वीजा बनने में आ रही सारी रुकावटें हट जाएगी। अगर आप को भी कई महीनों से वीजा नहीं मिल रहा है तो आन्ध्र प्रदेश स्थित चिल्कुर बालाजी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त कर लिजिए।

chilkur balaji

नौकरी भी दिलाते हैं चिल्कुर बालाजी

चिल्कुर बालाजी को वीजा वाले बालाजी के नाम से भी जाना जाता है। यह प्राचीन मंदिर लगभग 500 साल पुराना है। इस मंदिर में लोग नौकरी की मन्‍नतें लेकर भी आते है और उनकी मनोकामना जल्दी पूरी भी हो जाती है। लोक कथाओं के अनुसार वेंकटेश बालाजी के एक भक्त हर रोज़ कई किलोमीटर चलकर तिरुपति बालाजी के दर्शन के लिए जाते थे। एक दिन अचानक उनकी तबियत खराब हो गयी और वे मंदिर नहीं जा पाए। इस दौरान बालाजी ने खुद भक्त को सपने में आकर दर्शऩ दिए और बोले कि इतनी दूर जाने की कोई आवश्यकता नहीं है, मैं यहीं तुम्हारे पास इस जंगल में रहता है। अगले दिन जंगल में उसी जगह पर मूर्ति की स्थापना की गई। वह मंदिर आज चिल्कुर बालाजी के नाम से जाना जाता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/chilkur-balaji-mandir-or-visa-balaji-in-andra-pradesh-3922941/

इस अद्भुत मंदिर में आज भी सुरक्षित है सींग लगे नारियल, यहां भक्तों की पूरी होती है हर कामना


केरल के ही तिरुच्चूर रेलवे स्टेशन से 32 किलो मीटर दूरी पर गुरुवायूर मंदिर स्थित है। यहां स्थापित भगवान गुरुवायूरप्पा केरल के कई परिवारों के कुलदेवता के रूप में पूजे जाते हैं। गुरुवायुरप्पन श्री कृष्ण का बाल रूप है। वैसे तो यह मंदिर श्री कृष्ण को समर्पित है, लेकिन यहां भगवान विष्णु के दस अवतारों को भी दर्शाया गया है। मंदिर में आदि शंकराचार्य कुछ समय रुक थे। श्रीविल्वमंगल की आराधना का बहुत समय यहीं बीता था। जिसके बाद उन्होंने यहां की पूजा पद्धति में कुछ संशोधन किये थे और आज भी यहां आदि शंकराचार्य के नियमानुसार ही पूजा आराधना की जाती है। कहा जाता है की गुरुवायुर मंदिर में एकादशी और उल्सवम का त्यौहार बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। उल्सवम त्यौहार के दौरान यहां सांस्कृतिक कार्यक्रम, नृत्य का आयोजन किया जाता है। यहां आए भक्तों का मानना है की गुरुवायुरप्पा जी के दर्शन से मन में शांती मिलती है और सभी मनोकामनाएं भी जल्द पूरी होती है।

 

gayavur krishna mandir

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
एक पौराणिक कथा के अनुसार मंदिर में स्थित मूर्ति पहले द्वारका में स्थापित थी। एक बार द्वारका पुरी जब पूरी तरह जलमग्न हो गया तब यह मूर्ति बाढ़ में बह गई। कृष्ण जी की यह मूर्ति बृहस्पति देव को तैरती हुई दिखी। उन्होंने वायु देवता की सहायता से इस मूर्ति को बचाया तथा उचित स्थान पर स्थापित करने के लिए निकले। उचित स्थान की खोज में वह केरल पहुंच गए, जहां उन्हें भगवान शिव और देवी पार्वती के दर्शन हुए। भगवान की आज्ञा से उन्होंने मूर्ति की स्थापना केरल में ही की। क्योंकि इस मूर्ति की स्थापना गुरु और वायु ने की इसलिए इसका नाम 'गुरुवायुर' रखा गया। माना जाता है कि गुरूवायूर मंदिर उन कुछ भारतीय मंदिरों में से एक है जहां आज भी गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है।

मंदिर में आज भी रखे है सिंग लगे नारियल
किवदंतियों के अनुसार कहा जाता है की एक बार एक किसान फसल का पहला नारियल भगवान गुरुवापूर को चढ़ाने आ रहा था। मंदिर जाते समय उसे रास्ते में कुछ डाकू मिल गये। किसान ने डाकुओं से प्रार्थना की और कहा- सब कुछ ले लो, लेकिन भगवान को चढ़ाने के नारियल छोड़ दो। पर डाकू नहीं माने और बोलने लगे ‘गुरुवायूर के नारियलों में क्या सींग लगे हैं?’ इतना कहने के बाद सचमुच उन नारियलों में सींग निकल आये और डाकू डरकर भाग गये। इस घटना के बाद सिंग लगे नारियल आज भी मंदिर में सुरक्षित हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/guruvayoor-mandir-of-lord-krishna-in-kerala-3917692/

भारत की इस प्रसिद्ध व सुंदर गुफा मंदिर का सच जानकर हैरान रह जाएंगे आप, जानिए क्या है खासियत


भारत में कई जगहों पर कई प्रसिद्ध गुफाएं हैं जो की खुद में रहस्य व सुंदरता को समेटे हुए है। उन्हीं प्रसिद्ध गुफाओं में से एक है बादामी की प्रसिद्ध गुफा मंदिर। कर्नाटक राज्य के बागलकोट जिले में बादामी नाम के शहर में बना ये गुफा मंदिर बहुप्रसिद्ध हैं। भारत की सबसे पुरानी गुफा बादामी को 6वी शताब्दी में बनवाया गया था। बलुआ पत्थर से बने गुफा मंदिरों की सुंदरता देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। बादामी की इन मशहूर गुफाओं के निर्माण का सारा श्रेय चालुक्य वंश को जाता है। यहां की सभी गुफायें नगारा और द्रविड़ शैली में बनवाई गयी थी। इस शैली में बनाने के कारण यहा की सभी गुफाये बहुत ही सुन्दर दिखती है। यहां गुफा मंदिर अपनी सुंदर नक्काशियों के लिए जाने जाते हैं।

 

badami gufa mandir

नक्काशियों में दिखती पौराणिक और धार्मिक कथा

मंदिर में बनी नक्काशियों में पौराणिक तथा धार्मिक घटनाएं और शिक्षा दिखाई देती है। यहां चार गुफा मंदिर हैं, जिनमें से पहला गुफा मंदिर सबसे प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण 6वीं शताब्दी में हुआ था। इस मंदिर में भगवान शिव के अर्धनारीश्वर और हरिहर अवतार की नक्काशियां की गई हैं और इन नक्काशियों के साथ ही भगवान शिव का तांडव नृत्य की भी नक्काशी दिखाई देती है। इसके दाहिनी तरफ भगवान शिव का हरिहर रूप और बाईंं तरफ भगवान विष्णु का अवतार हैं। दर्शन करने आए दर्शनार्थी यहां भगवान शिव के साथ-साथ महिषासुरमर्दिनी तथा गणपति, शिवलिंगम और शन्मुख की मूर्तियां भी देख सकते हैं।

दूसरा गुफा मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है, जो वराह तथा त्रिविक्रम अवतार में यहां स्थापित हैं। वहीं तीसरी गुफा में भगवान विष्णु त्रिविक्रम और नरसिंह अवतार दिखाए गए हैं, जो की 100 फुट गहरा गुफा मंदिर है। चौथी गुफा मंदिर जैन धर्म को समर्पित है। जहां भगवान महावीर बैठी अवस्था में विराजमान है, इनके साथ ही गुफा में तीर्थकर पार्श्वनाथ का चित्र भी बना हुआ हैं। मंदिर की छत पर पुराणों के दृश्य दिखाए गए हैं। जिनमें भगवान विष्णु का गरुड़ अवतार दिखाया गया है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/badami-gufa-mandir-in-karnatak-jila-bagalkot-3905765/

मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति के मुख से लगातार आती है राम नाम की ध्वनी, चलती हैं सांसे


हनुमान जी के चमत्कारों से सभी बखूबी वाकिफ हैं और कहा भी जाता है की हनुमानजी को अजर अमर होने का वरदान मिला है। इसलिए वे आज भी धरती पर विराजमान हैं। दुनियाभर में माहवीर बजरंग बली के कई चमत्कारी मंदिर हैं जहां लोगों की आस्था जुड़ी है। उन्हीं मंदिरों में से एक मंदिर ऐसा भी है जहां हनुमान जी भक्तों की मुराद तो पूरी करते हैं बल्कि उनके होने का अहसास भी दिलाते हैं। जी हां, मंदिर में मौजूद मूर्ति प्रसाद खाती है और मूर्ति के आसपास राम नाम की ध्वनी भी सुनाई देती है। यही चमत्कार मंदिर में हनुमान जी के होने का संकेत देती है। यह मंदिर उत्तरप्रदेश के इटावा से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर थाना सिविल लाइन क्षेत्र के गांव रूरा के पास यमुना नदी के निकट पिलुआ महावीर मंदिर है। इस मंदिर से आसपास के जिलों सहित दूर-दूर से भी भक्तों की भीड़ उमड़ती है। यहां दर्शन करने आए भक्तों की महावीर जटिल से जटिल रोग ठीक कर देते हैं।

pilua hanuman mandir

हनुमान जी की मूर्ति खाती है प्रसाद

लोगों की मान्यताओं के अनुसार यहां मंदिर में स्थापित हनुमान जी की मूर्ति प्रसाद खाती है। इसके अलावा मूर्ति के मुख से लगातार राम नाम की ध्वनी सुनाई देती है और मूर्ति में सांसें चलने का आभास भी होता है। मंदिर में स्थापित हनुमान जी दक्षिण की तरफ मुंह करके लेटे हैं। मूर्ति के मुंह में जितना भी प्रसाद के रूप में लड्डू और दूध चढ़ाया जाता है वह कहां गायब हो जाता है, इसके बारे में आजतक कोई पता नहीं लगा पाया है।

ये है चमत्कारी मंदिर का इतिहास

अगर इस मंदिर के इतिहास पर नजर डालें तो आपको बता दें कि करीब तीन सौ साल पूर्व यह क्षेत्र प्रतापनेर के राजा हुक्म चंद्र प्रताप सिंह चौहान के अधीन था। उनको श्री हनुमानजी ने अपनी प्रतिमा यहां होने का स्वप्न दिया था। इसके तहत राजा हुक्म चंद्र इस स्थान पर आए और प्रतिमा को उठाने का प्रयास किया पर वे उठा नहीं सके। इस पर उन्होंने विधि-विधान से इसी स्थान पर प्रतिमा की स्थापना कराकर मंदिर का निर्माण कराया। दक्षिणमुखी लेटी हुई हनुमान जी की इस प्रतिमा के मुख तक हर समय पानी नजर आता है। चाहे जितना प्रसाद एक साथ मुख में डाला जाए, सब कुछ उनके उदर में समा जाता है। अभी तक कोई भक्त उनके उदर को नहीं भर सका और न यह पता चला कि यह प्रसाद कहां चला जाता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/pilua-hanuman-mandir-in-etawah-kanpur-uttar-pradesh-3864308/

इस काली मंदिर में प्रतिदिन तीन रुपों में दर्शन देती है देवी, चमत्कार देखने आते हैं भक्त


देवभूमि उत्तराखंड में बहुत से चमत्कारी मंदिर हैं, जो हिंदूओं की आस्था का केंद्र बने हुए हैं। उन्हीं चमत्करी मंदिरों में से एक मंदिर ऐसा है जो उत्तराखंड राज्य की रक्षा करता है। यहां मौजूद लोगों का मानना है की माता का यह मंदिर कई सालों से उनकी व राज्य की रक्षा करता है, उन्हें कठिनाईयों व आपदाओं से बचाता है। भक्तों की आस्था का केंद्र यहां मंदिर में स्थापित धारा देवी ना सिर्फ लोगों की बल्कि आसपास में मौजूद मंदिरों की भी रक्षा करता है। उत्तराखंड की देवभूमि पर स्थित यह मंदिर धारा देवी मंदिर के साम से प्रसिद्ध है, मंदिर में देवी धारा की पूजा व आरती समयानुसार पूर्ण विधि-विधान से की जाती है। मंदिर में दर्शन करने वाले लोगों का कहना है कि यहां मां काली प्रतिदिन तीन रूप बदलती है। वह प्रात:काल कन्या, दोपहर में युवती व शाम को वृद्धा का रूप धारण करती हैं। हर साल चैत्र व शारदीय नवरात्र में हजारों श्रद्धालु अपनी मनौतियों के लिए मंदिर में आते हैं। इसके अलावा चारधाम यात्रा के दौरान भी हर रोज सैकड़ों श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं

dhari devi mandir

माता का सिद्धपीठ उत्तराखंड के श्रीनगर से लगभग 15 किमी की दूरी पर स्थित है। शक्ति पीठों में कालीमठ यह मंदिर कलियासौड़ इलाके में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है। धारी गांव के पांडे ब्राहमण मंदिर के पुजारी हैं। मां काली कल्याणी की यह मूर्ति वर्तमान में अलकनंदा नदी पर जल-विद्युत परियोजना के निर्माण के चलते नदी से ऊपर मंदिर बनाकर स्थापित की गई है। रहवासियों के अनुसार, इस मंदिर के साक्ष्य साल 1807 में पाए गए थे। वहीं यहां के महंत का कहना है कि मंदिर 1807 से भी कई साल पुराना है। यहां मां का गुस्सा किसी से छुपा नहीं है, यहां के लोगों की मानें तो केदारनाथ में आया प्रलय धारी देवी के गुस्से का ही नतीजा था। लोगों का मानना है कि उत्तराखंड सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी और देवी माता के मंदिर को तोड़ दिया। पहाड़ी बुजुर्गों के अनुसार उत्तराखंड में समय-समय पर आने वाली विपदा का कारण मंदिर को तोड़कर मूर्ति को हटाया जाना ही है। ये प्रत्यक्ष रूप से देवी का प्रकोप है। 2013 जून में केदारनाथ में आई आपदा के लिए भी धारी देवी को मंदिर को अपलिफ्ट करना भी एक कारण बताया जाता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/dhari-devi-shaktipeeth-kalimath-mandir-in-uttrakhand-3835706/

यहां काली मंदिर में भक्तों को दिन में सिर्फ दो बार दर्शन देती हैं देवी, ये है रहस्य


हिमाचल प्रदेश के सराहन में भीमाकली मंदिर हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल माना जाता है। 51 शक्तिपीठों में से एक भीमाकली मंदिर पवित्र स्थल है। यह मंदिर रामपुर बुशहर से करीब 30 किलोमीटर दूर सराहन में देवी भीमाकली को समर्पित है। काली माता का प्राचिन मंदिर अपने अंदर सुंदरता समेटे हुए है। इसके साथ ही सराहन शहर की खुबसूरत पहाड़ियों में अपनी अनुठी शैली से बना यह मंदिर अपने अंदर शांति और सुकून का आभास करवाता है। काली माता का विख्यात और प्राचीन मंदिर करीब 1000 से 2000 वर्ष पुराना मंदिर है।

 

bhimakali mandir

हिंदू और बौद्ध शैली का मिश्रण है यह मंदिर

भीमाकली का मंदिर हिंदू और बौद्ध शैली का मिश्रण है। प्राचीन मंदिर केवल आरती या विशेष मौको पर ही खुलता है। नया मंदिर 1943 में बनाया गया था। मंदिर परिसर में भैरों और नरसिंह जी को समर्पित दो अन्य मंदिर भी हैं। पहाड़ो की बैकड्राप इस मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगा देती है। इस मंदिर को शक्तिपीठों में भी गिना जाता है। जहां पर देवी सती का बायां कान गिर गया था। इस लिहाज से ये मंदिर काफी महत्वपूर्ण बन जाता है।

लगभग 800 साल पुराना है यह मंदिर

भीमाकाली का मंदिर करीब लगभग 800 साल पहले बनाया गया माना जाता है। यह अपनी अनूठी वास्तुकला और मिश्रण शैली के लिए जाना जाता है। अब यह पुराना मंदिर सुबह और शाम में कर्मकांडों या आरती के समय को छोड़कर जनता के देखने के लिए बंद रहता है। मंदिर परिसर के भीतर एक नया मंदिर 1943 में बनाया गया था। मंदिर में देवी भीमाकली की एक मूर्ति को एक कुंवारी और एक औरत के रूप में चित्रित निहित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हिंदू देवता शिव की पत्नी सती, वैवाहिक जीवन के परम सुख और दीर्घायु की देवी का बायां कान इस जगह गिर गया था।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/bhimakali-mandir-mandi-rampur-sarahan-himachal-pradesh-3815428/

मंदिर में आज भी मौजूद है हनुमान जी के पद चिन्ह, भक्तों की मांगी हर मुराद होती है पूरी


समुद्र तल से 8048 फीट की ऊँचाई पर स्थित जाखू पहाड़ी शिमला शहर की बहुत ही खुबसूरत और मनोरम चोटीयां हैं। इस चोटी पर भगवान हनुमान जी का मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। मंदिर में देश ही नहीं विदेशों से भी लोग दर्शन के लिए आते हैं। मान्यताओं के अनुसार मंदिर रामायण काल से जुड़ा हुआ है। यहां बहुत बड़ी संख्या में वानर(बंदर) रहते हैं। कहा जाता है की ये बंदर भगवान हनुमान का रामायण काल से ही इंतजार कर रहे हैं। जाखू मंदिर के प्रांगण में ही हनुमान जी की 108 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा भी स्थापित है, जिसे शिमला के किसी भी कोने से आसानी से देखा जा सकता है। भक्तों का मानना है की यहां आने वाले हर भक्त की मुराद पूरी होती है। कोई यहां से खाली हाथ नहीं लौटता है।

 

jakhoo hanuman mandir

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह है मंदिर की कहानी

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है की राम और रावण के बीच युद्ध के दौरान लक्ष्मण जी के मूर्छित हो जाने पर संजीवनी बूटी लेने के लिए हनुमान जी हिमालय की ओर आकाश मार्ग से जा रहे थे उसी समय उनकी नज़र यहां तपस्या कर रहे यक्ष ऋषि पर पड़ी। बाद में इसका नाम यक्ष ऋषि के नाम पर ही यक्ष से याक, याक से याकू, याकू से जाखू तक बदलता गया। हनुमान जी विश्राम करने और संजीवनी बूटी का परिचय प्राप्त करने के लिए जाखू पर्वत के जिस स्थान पर उतरे, वहां आज भी उनके पद चिह्नों को संगमरमर से बनवा कर रखा गया है।

यक्ष ऋषि से संजीवनी बूटी का परिचय लेने के बाद वापस जाते हुए उन्होंने मिलकर जाने का वचन यक्ष ऋषि को दिया और द्रोण पर्वत की तरफ चल पड़े। मार्ग में कालनेमि नामक राक्षस के कुचक्र में फंसने के कारण समय के अभाव में हनुमान जी छोटे मार्ग से अयोध्या होते हुए चल पड़े। जब वह वापस नहीं लौटे तो यक्ष ऋषि व्याकुल हो गए। हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिया, उसके बाद इस स्थान पर हनुमान जी की स्वयंभू मूर्ति प्रकट हुई। जिसे लेकर यक्ष ऋषि ने यहीं पर हनुमान जी का मंदिर बनवाया। आज यह मूर्ति मंदिर में स्थापित है और दूर-दूर से लोग उनके दर्शन को आते हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/jakhoo-hanuman-mandir-in-shimla-himachal-pradesh-3802520/

मां काली के इस मंदिर में अमावस्या पर आती है डायन, होती है भक्तों की हर मुराद पूरी


आस्था के द्वार माता पोहलानी का मंदिर डलहौजी में डैनकुंड की खुबसूरत वादियों में बसा हुआ है। माता के इस दरबार में लोगों की भारी आस्था जुड़ी हुई है। हिमाचल प्रदेश के जिला चंबा के डलहौजी से 12 km की दूरी पर खूबसूरत वादियों के बीच स्थित इस मंदिर में मां काली का रुप पोहलानी स्थापित है। पोहलानी देवी पहलवानों की देवी कही जाती हैं। वैसे तो यहां हमेशा ही भक्तों का तांता देवी दर्शन के लिए लगा रहता है लेकिन नवरात्रि के मौके पर यहां अथाह भीड़ देखने को मिलती है। भक्त यहां अपनी मुरादें लेकर आते हैं उनका मानना है की यहां आने वाले हर भक्त की मन्नत पूरी जरुर होती है। मन्नत पूरी होने पर भक्त देवी को धन्यवाद देने भी आते हैं। मंदिर से काफी लोगों की आस्‍था जुड़ी हुई हैं। कहा जाता है कि हजारों वर्ष पहले इस डैनकुण्ड की पहाड़ी के उस मार्ग से कोई भी नहीं आ जाता था, क्योंकि इस पहाडीं पर राक्षसों का वास था। माता काली जी ने पहलवान के रुप में आकर उन राक्षसों का संहार किया तब से इस मंदिर का नाम पोहलवानी पड़ा। कहते है डेनकुण्ड नामक जगह पर डायने रहती थी यंहा पर आज भी कुंड देखे जा सकते हैं। लोगों का मानना है कि डैन अमावस्या पर यहां आज भी डायने आती हैं।

pohlani devi mandir

पौराणिक कथाओं के अनुसार

पौराणिक कथाओं के अनुसार लोगों पर बढ़ रहे अत्याचार को देखकर माता महाकाली से रहा नहीं गया और वह डैन कुंड की इन्ही पहाड़ियों पर एक बड़े से पत्थर से बाहर प्रकट हुई पत्थर के फटने की आवाज दूर दूर तक लोगों को सुनाई दी कन्या रूपी माता की हाथ में त्रिशूल था और यंही पर माता ने राक्षसों से एक पहलवान की तरह लड़ कर उनका वध किया तभी से यहाँ पर माता को पहलवानी माता के नाम से पुकारा जाने लगा। होवार के एक किसान को माता ने सपने में आकर कहा यहाँ पर माता का मंदिर स्थापित करने का आदेश दिया और उनके आदेशानुसार ही यहाँ पर माता के मंदिर की स्थापना की गई।

बेहतरीन पर्यटन स्थल है पोहलानी मंदिर

पोहलानी माता रखेड़ गांव के वाशिन्दों की कुल माता है इसके नजदीक खूबसूरत रखेड़ गांव पड़ता है जो काहरी पंचायत के अंदर आता है। यंही के लोगो की कमेटी मंदिर की देख रेख करती है। यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के उत्तर पश्चिम भाग में 2200 मीटर की उंचाई पर स्‍थित है। गमियों जहां पर्यटक यहां की ठण्डी हवाओं का लुप्त उठाते है तो वहीं सर्दी के मौंसम में बर्फ से ढ़के पहाडों का नजारा देखते ही बनता है। सर्दियों में ये मंदिर और इसके आसपास वर्फ़ की मोटी चादर बिछ जाती है, जिससे नजारा बहुत ही मनमोहक हो जाता है। दूर दूर तक वर्फ़ ही नज़र आती है उस समय यहां पंहुचना बहुत कठिन हो जाता है। यहां से चारों ओर का नजारा दिखाई देता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/pohlani-kali-mata-mandir-in-himachal-pradesh-3788833/

यहां है विश्व की दूसरी ऊंची शिव जी की प्रतिमा, लिफ्ट का करना पड़ता है इस्तेमाल


शिव जी के अनेको मंदिर और उन मंदिरों की महिमा बहुत ही निराली है। क्योंकि शिव जी को प्रसन्न करना बहुत ही आसान होता है, वे सिर्फ एक लोटे सच्चे मन से चढ़ाने वाले पर भी प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव नें उन्हें दर्शन दिए और तभी वहां प्रकट शिवलिंग के रुप में मंदिर बना दिए गए। भारत में शिवालयों में एक अनोखा ही चमत्कार देखने को मिलता है। इऩ्हीं मंदिरों में से एक मंदिर कर्नाटक राज्य के भटकल में स्थित है। महादेव का यह मंदिर मुरुदेश्वर नाम से प्रसिद्ध है। मुरुदेश्वर मंदिर का इतिहास रामायण काल का बताया जाता है, कहा जाता है की यहां शिव जी की दूसरी सबसे बड़ी प्रतिमा स्थापित है। यह पवित्र मंदिर लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है।

मुरुदेश्वर शांत समुद्र तट के अलावा यहां श्रद्धालुओं के बीच यह स्थान काफी लोकप्रिय भी है। इस मंदिर में भगवान शिव के दूसरे स्वरूप श्री मृदेसालिंग की पूजा की जाती है। मुरुदेश्वर मंदिर तीन तरफ से घिरा हुआ है, शांत पहाड़ी पर स्थापित मंदिर का नज़ारा बहुत ही मनोरम दिखाई देता है। कर्नाटक राज्य के भटकल में स्थित मुरुदेश्वर हिंदुओं की पवित्र मंदिर के अलावा पर्यटक स्थल भी माना जाता है। घूमने के लिए यहां कुछ बेहद ही खास जगहें भी है।

murudeshwar mahadev

करीब 123 फीट ऊंची है शिव जी की प्रतिमा

इसके अलावा मंदिर परिसर में भगवान शिव की विशाल मूर्ति है, जो दूर से दिखाई देती है। प्रतिमा की ऊंचाई 123 फीट है और इसे बनाने में लगभग 2 साल लगे। मूर्ति इस तरह तैयार की गई है कि सूर्य का प्रकाश सीधे इस पर पड़े और इस तरह यह बहुत खुबसूरत दिखाई देती है। मूल रूप से, मूर्ति की चार बाहें है और इसे सोने से सुशोभित किया गया है। हालांकि, अरब सागर से उठने वाले तेज हवाओं के झोंके ने बाहों के रंग को उड़ा दिया और बारिश ने रंग को विघटित कर दिया। गोपरा आम तौर पर किसी भी हिंदू मंदिर का मुख्य द्वार होता है। राजागोपुरा मुख्यत:20 मंजिला इमारत है, जोकि मुरुदेश्वर मंदिर का प्रवेश द्वार है। श्रद्धालु इस गोपुरा में लिफ्ट का इस्तेमाल कर उपरी मंजिल अपर पहुंचकर मुरुदेश्वर मंदिर और शिव प्रतिमा और मीलों दूर तक फैले समुंद्र को देख सकते हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/worlds-second-highest-shiv-pratima-in-india-karnatak-3785406/

देशभर में काल भैरव के इन प्रसिद्ध मंदिरों में होती है हर मनोकामना पूरी, जरुर करें दर्शन


मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को काल भैरव अष्टमी कहा जाता है। इस दिन शिव जी के रुप काल भैरव ने अवतार लिया था। शिव जी के कई स्वरुप हैं। वैसे तो भोलेनाथ जी अपने नाम के अऩुसार भोले हैं और वे हमेशा शांत ही रहते हैं। लेकिन कहा जाता है की जब भी भोलेनाथ जी को गुस्सा आता है तो वह विनाशकारी आता है। वहीं शव जी के दो रुपों का शास्त्रों व पुराणों में उल्लेख है। उनका पहला रुप विश्वेश्वर स्वरुप बहुत ही सौम्य और शान्त है जो की भक्तों का उद्धार करने वाला रुप माना जाता है। वहीं दूसरा काल भैरव स्वरुप दुष्टों को दंड देने वाला रौद्र, भयानक, विकराल रुप माना जाता है। काल भैरव अष्टमी, तंत्र साधना के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन काल भैरव की पूजा करने से सभी संकटों से मुक्ति मिल जाती है। चूंकी काल भैरव जी की पूजा घर में नहीं की जाती है इसलिए मंदिरों में इनकी पूजा अर्चना के लिए अष्टमी के दिन बहुत भीड़ रहती है, भारत में कई स्थानों पर प्रसिद्ध कालभैरव मंदिर है जिसका अपना अलग-अलग महत्व है। आइए जानते हैं कौन से हैं वो मंदिर...

kaal bhairav mandir

घोड़ाखाडल बटुक भैरव मंदिर, नैनीताल

गोलु देवता के नाम से प्रसिद्ध बटुक भैरव जी का मंदिर घोड़ाखाल का बटुकभैरव मंदिर नैनिताल के समीप स्थित है। यहां मंदिर में विराजित श्वेत गोल प्रतिमा के दर्शन और पूजा करने के लिए रोज़ भारी संख्या में भक्त आते हैं।

काल भैरव मंदिर, काशी

काशी के काल भैरव मंदिर की विशेष मान्यता है। यह काशी के विश्वनाथ मंदिर से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। काल भैरव बाबा वाराणसी में काशी कोतवाल कहे जाते हैं। कहा जाता है कि बाबा काल भैरव काशी के रक्षक हैं और अगर आप काशी विश्वनाथ के दर्शन करने के बाद काल भैरव के दर्शन नहीं करते हैं तो फिर आपके दर्शन पूरे नहीं माने जाएंगे।

बटुक भैरव मंदिर पांडव किला और बटुक भैरव मंदिर, नई दिल्ली

पांडवों द्वारा बनाए गए मंदिरों में से भैरव बाबा के दो मंदिर है पहला बटुक भैरव नाथ मंदिर यह मंदिर नेहरू पार्क चाणक्य पुरी, दिल्ली में स्थित है। दूसरा किलकारी बाबा भैरव नाथ मंदिर, जो कि पुराने किले के बाहर है। बटुक भैरों नाथ मंदिर में भैरव बाबा का सिर्फ चेहरा ही है और चेहरे पर बड़ी- बड़ी दो आंखे है। दोनों ही मंदिर लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है।

कालभैरव मंदिर, उज्जैन

भारत का दूसरा प्रसिद्ध मंदिर कालभैरव उज्जैन में स्थापित है। कालभैरव का यह मंदिर उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है। इस मंदिर में काल भैरव की मूर्ति को न सिर्फ मदिरा चढ़ाई जाती है, बल्कि बाबा भी मदिरापान करते हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/kaal-bhairav-famous-mandir-in-india-3772054/

मंदिर में स्थापित है दस महाविद्याओं की प्रतिमा, मूर्ति से आती है आवाजें


हर मंदिर में पत्थर की मूर्ति होती है लेकिन यदि कहा जाए की मूर्ति बोलती है तो शायद आपको इस बात पर भरोसा नहीं होगा। लेकिन आपको बता दें की देवी मां का एक ऐसा मंदिर है जहां मूर्ति तो पत्थर की है लेकिन उसमें से आवाजें आती है। जी हां, आप इसे अंधविश्वास माने या देवी का चमत्कार कहें लेकिन यह बात बिलकुल सही है। हम सब कुछ नकार सकते हैं लेकिन देवी-देवताओं के अस्तित्व को और उनकी शक्ति को नहीं नकार सकते। हम जिस चमत्कारी मंदिर की बात कर रहे हैं वह मंदिर बिहार के बक्सर में स्थित देवी का एक ऐसा अद्भुत मंदिर है जहां प्रवेश करते ही भक्तों को देवी दुर्गा की शक्तियों का आभास होने लगता है। ऐसा लगता है की माता रानी आपके आसपास है। क्योंकि यहां मूर्तियां आपसे बात करती हैं। इस बात के पीछे का कारण जानने वैज्ञानिक भी यहां पहुंचे थे लेकिन वे भी इसका पता नहीं लगा पाए।

tripur sundari mandir

हम जिस प्रसिद्ध व चमत्कारी मंदिर की बात कर रहे है व मंदिर बिहार के बक्सर में स्थित राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी मंदिर से प्रसिद्ध है। यह मंदिर तंत्र साधना के लिए जाना जाता है। कहा जाता है की इस मंदिर में किसी के ना होने पर आवाजें सुनाई देती हैं। यहां साधना करने वाले हर साधकों की हर तरह की मनोकामना पूर्ण होती है। देर रात तक साधक इस मंदिर में साधना में लीन रहते हैं। मंदिर में प्रधान देवी राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी है। उनके अलावा यहां दस महाविद्याओं काली, त्रिपुर भैरवी, धुमावती, तारा, छिन्न मस्ता, षोडसी, मातंगड़ी, कमला, उग्र तारा, भुवनेश्वरी की मूर्तियां भी स्थापित हैं। दस महाविद्याओं के अलावा मां बंगलामुखी, दत्तात्रेय भैरव, बटुक भैरव, अन्नपूर्णा भैरव, काल भैरव व मातंगी भैरव की प्रतिमा स्थापित की गई है।

tripur sundari mandir

तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर की स्थापना भवानी मिश्र नामक तांत्रिक ने लगभग 400 साल पहले की थी। उसके बाद से ही मंदिर की पूजा-आरती का जिम्मा तांत्रिक के परिवार के सदस्य संभालते आए हैं। यहां माता की प्राण प्रतिष्ठा तंत्र साधना से ही की गई है। तांत्रिकों की आस्था इस मंदिर के प्रति अटूट है। राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी मंदिर की सबसे अनोखी मान्यता यह है कि निस्तब्ध निशा में यहां स्थापित मूर्तियों से बोलने की आवाजें आती हैं। मध्य-रात्रि में जब लोग यहां से गुजरते हैं तो उन्हें स्पष्ट आवाजें सुनाई देती हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है की यह कोई वहम नहीं है। इस मंदिर के परिसर में कुछ शब्द गूंजते रहते हैं। वैज्ञानिकों की एक टीम ने यहां रिसर्च करने के बाद उन्होंने बताया की यहां पर शब्द लगातार भ्रमण करते रहते हैं। वैज्ञानिकों ने यह भी मान लिया है कि हां पर कुछ न कुछ अजीब घटित होता है, जिससे कि यहां पर आवाज आती है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/raj-rajeshwari-tripur-sundari-mandir-in-bihar-3767703/

इस मंदिर में भोलेनाथ पीते हैं सिगरेट, अर्पित करते ही अपने आप सुलगने लगती है


भगवान शिव को भांग, धतुरा अर्पित किया जाता है। शिव जी को भांग बहुत प्रिय होती है। कई जगहों पर भांग से भगवान शिव जी का श्रृंगार किया जाता है और प्रसाद के रुप में भांग चढ़ाई जाती है। यह बात तो सब ही जानते हैं, लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है की भगवान शिव का एक ऐसा अनोखा मंदिर भी है जहां शिव जी को सिगरेट अर्पित की जाती है। जी हां, यहां शिव जी ना सिर्फ सिगरेट पीते हैं। बल्कि धुंआ भी उड़ाते हैं। जानकर आपको हैरानी जरुर होगी लेकिन हिमाचल प्रदेश के उर्की सोलन जिले में भगवान शिव का अनोखा मंदिर है। यह अनोखा मंदिर लुटरु महादेव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

luturu mahadev mandir

इस मंदिर में आने वाले भक्त फूल, प्रसाद के साथ सिगरेट भी साथ में लेकर आते हैं और भोले बाबा को अर्पित करते हैं। इतना ही नहीं शिव जी को सिगरेट चढ़ाते ही वे इसे बड़े चाव के साथ पीते हैं। इसलिए उनकी पूजा में यहां विशेष तौर पर सिगरेट चढ़ाई जाती है। लुटरू महादेव मंदिर में आज से नहीं बल्कि सदियों से शिवलिंग को सिगरेट पिलाई जाती है। कुछ लोग इसे चमत्कार कहते हैं तो कुछ इसे अंधविश्वास का नाम दे देते हैं, लेकिन इसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।

luturu mahadev mandir

अपने आप सुलग जाती है सिगरेट

इस शिवलिंग पर सिगरेट अर्पित करने के बाद उसे कोई सुलगाता नहीं है, बल्कि वो अपने आप ही सुलगती है। इसमें से धुंआ भी कुछ इसी तरह से निकलता है जिसे देखकर ऐसा लगता है जैसे कि स्वयं भोलेनाथ सिगरेट पी रहे हों। भगवान शिव के इस दृश्य को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते है और इस चमत्कार को देखते हैं। महादेव के इस मंदिर में भगवान शिव के शिवलिंग में कई जगहों पर गड्ढे बने हुए है, जिसमें भक्त सिगरेट फंसा देते है। इस दृश्य को देखते ही लोग खुद को अपने केमरे में विडियो बनाने से रोक नहीं पाते हैं। मंदिर का निर्माण सन् 1621 में बाघल रियासत के राजा द्वारा किया गया था। कहा जाता है की बाघल रियासत के राजा को एक दिन भगवान शिव ने सपने में दर्शन दिए व उन्हें इस मंदिर का निर्माण करने को कहा, तब राजा ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/luturu-mahadev-mandir-in-arki-solan-himachal-pradesh-3758670/

यहां मंदिर में विराजे हनुमान जी बताते हैं लोगों का भविष्य, अद्भुत है यहां का चमत्कार


भले ही ईश्वर का आकार-प्रकार ना दिखता हो लेकिन फिर भी उनकी शक्तियां हमें महसूस जरुर होती है। ऐसा ही एक हनुमान जी का मंदिर है जिसका चमत्कार राज्य नहीं बल्कि पूरे देश में विख्यात है। यहां मंदिर के सामने से निकलने के पहले ही ट्रेन की स्पीड कम हो जाती है। यह चमत्कारी मंदिर मध्यप्रदेश के शाजापुर जिले के बोलाई गांव में स्थित है। मंदिर को सिद्धवीर खेड़ापति हनुमान मंदिर के नाम से जाना जाता है। करीब 300 साल पुराना मंदिर लोगों के आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां हनुमान जी की प्रतिमा के साथ गणेश जी भी विराजमान हैं। जी हैं, यहां हनुमान जी की प्रतिमा के बाईं तरफ गणेश जी की मूर्ति स्थापित है। लोगों का मानना है कि इस मंदिर में एक साथ गणेश जी और हनुमान जी की प्रतिमा होना बड़ा शुभ है। इसलिए यहां आने वाले सभी भक्तों की मुराद जरुर पूरी होती है।

 

khedapati hanuman mandir

श्री सिद्धवीर खेड़ापति हनुमान मंदिर रतलाम-भोपाल रेलवे ट्रैक के बीच बोलाई स्टेशन से करीब 1 किमी दूर है। ये मान्यता है कि यहां आने वाले लोगों को भविष्य की घटनाओं का पहले ही अंदाजा लग जाता है। इस मंदिर से कई चमत्कार जुड़े हुए हैं। मंदिर का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि मंदिर के सामने से जब भी कोई भी ट्रेन निकलती है तो उसकी स्पीड अपने आप कम हो जाती है। ट्रेन के लोको पायलट का कहना है की मंदिर आने के पहले ही अचानक उन्हें ऐसा लगता है मानो कोई उनसे ट्रेन की स्पीड कम करने के लिए कह रहा है। यदि कोई ड्राइवर इसे नजरअंदाज करता है तो अपने आप ही ट्रेन की स्पीड कम हो जाती है। इसके अलावा मंदिर को लेकर एक अोर मान्यता यह भी है की मंदिर की एक अन्य मान्यता ये है कि यहां भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यहां हर शनिवार, मंगलवार और बुधवार को दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

khedapati hanuman mandir

पुजारी बताते हैं कि कुछ समय पहले रेलवे ट्रैक पर दो मालगाड़ी टकरा गईं थी। बाद में दोनों गाड़ियों के लोको पायलट ने बताया था कि उन्हें घटना के कुछ देर पहले अनहोनी का अहसास हुआ था। उन्हें ऐसा लगा था मानो कोई ट्रेन की रफ्तार कम करने के लिए कह रहा था। उन्होंने स्पीड कम नहीं की औऱ इस कारण आमने-सामने की टक्कर हो गई थी। हनुमान जी के इस मंदिर को लेकर लोगों का मानना है कि मंदिर में विराजे हनुमान जी लोगों का भविष्य बताते हैं। भक्तों का मानना है की जो भी यहां आता है, उसे अपने जीवन में आने वाली घटनाओं का पूर्वाभास हो जाता है। कई लोगों को इसका अहसास भी हुआ है। तब से लोगों का मंदिर और हनुमान जी के प्रति विश्वास और भी बढ़ गया।

वैसे तो मंदिर का कोई प्रमाणित इतिहास नहीं मिलता है। लेकिन मंदिर का निर्माण 300 साल पहले ठा. देवीसिंह ने करवाया था। यहां वर्ष 1959 में संत कमलनयन त्यागी ने अपने गृहस्थ जीवन को त्याग कर उक्त स्थान को अपनी तपोभूमि बनाया और यहां पर उन्होंने 24 वर्षों तक कड़ी तपस्या कर सिद्धियां प्राप्त की थी। इसलिए यह मंदिर बहुत ही सिद्ध मंदिर माना जाता है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/khedapati-hanuman-mandir-bolai-in-shajapur-madhyapradesh-3754442/

विदेश जाने की इच्छा हो जाती है पूरी, यहां प्रसाद के रूप में चढ़ता है हवाई जहाज


यूं तो भारत में देवी-देवताओं के अनेकों मंदिर हैं, जहां मुरादें पूरी करने के लिए अनोखी परंपराएं प्रचलित हैं। वहीं पंजाब के जालंधर जिले में संत बाबा निहाल सिंह जी गुरूद्वारा है। जहां श्रद्दालु खिलौने वाले हवाई जहाज़ प्रसाद के रुप में चढ़ाते हैं। मान्यताओं के अनुसार इस गुरूद्वारे में हवाई जहाज चढ़ाने से लोगों की विदेश जाने की मनोकामना पूरी हो जाती है। संत बाबा निहाल सिंह जी गुरूद्वारा के प्रति लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। इस गुरुद्वारे को हवाई जहाज गुरुद्वारे के नाम से भी जाना जाता है।

aeroplane gurudwara

इस गुरुद्वारे को लेकर लोगों का मानना है की यदि आपका वीज़ा या पासपोर्ट नहीं बन पा रहा है तो, खिलौने वाला हवाई जहाज़ दान करने से उसका पासपोर्ट बनने में आ रही अड़चनें दूर हो जाती है और आपकी विदेश यात्रा की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं। सप्ताह भर ही यहां लोग आते हैं लेकिन रपिवार के दिन यहां ज्यादा ही भक्तों की भीड़ रहती है। हर वो व्यक्ति जिसका सपना होता है विदेश में जाकर नौकरी हासिल करने की या विदेश में रह कर पढ़ाई करने की, वह संत बाबा निहाल सिंह जी गुरूद्वारे में एक हवाईजहाज लेकर जरूर आता है। मान्यता हैं कि जो लोग यहाँ आकर माथा टेककर प्रार्थना करते हैं, उसे विदेश जाने में किसी भी तरह की परेशानी नहीं होती है।

यह गुरुद्वारा कम से कम 150 साल से भी ज्यादा पुराना है। वहीं गुरुद्वारे के प्रबंधन से जुड़े लोगों का कहना है कि यहां भक्तों द्वारा अर्पित किए गए खिलौनों का ढेर लग जाता है। ऐसे में ये खिलौने मत्था टेकने के लिए आने वाले बच्चों में बांट दिए जाते हैं। यहां के स्थानीय दुकानदार अन्य चीजों के अलावा खिलौना हवाईजहाज भी जरूर रखते हैं, क्योंकि इसकी बड़ी मांग है। हवाईजहाज चढ़ाने से यह गुरुद्वारा काफी मशहूर है।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/sant-baba-nihal-gurudwara-hawai-jahaj-gurudwara-in-talhan-jalandhar-3745830/

साल में एक बार इस दिन खुलता है ये मंदिर और उमड़ जाती है भक्तों की भीड़, जानिए मंदिर की खासियत


कार्तिक मास को बारह मासों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ-साथ, श्री कार्तिकेय की भी पूजा का विधान माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस माह में कार्तिकेय को भगवान विष्णु द्वारा धर्म मार्ग को प्रबल करने की प्रेरणा दी गई थी। यह माह कार्तिकेय द्वारा की गई साधना का माह माना जाता है, इसलिए इस माह का नाम कार्तिका मास पड़ा। वहीं इस दिन कार्तिकेय मंदिर के द्वार भी खुलते हैं। यह मंदिर सालभर में एक बार सिर्फ कार्तिक पूर्णिमा के दिन खुलते हैं। भगवान कार्तिकेय का यह अनोखा मंदिर मध्यप्रदेश के ग्वालियर में स्थित है। यह मंदिर करीब 400 साल पुराना देश का इकलौता मंदिर है। मंदिर में सिर्फ कार्तिकेय ही नहीं बल्कि उनके साथ गंगा, यमुना, सस्वती और त्रिवेणी की मूर्तिया भी स्थापित है।

kartikey mandir

कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुबह चार बजे खुलता है मंदिर

कार्तिक पूर्णिमा के दिन मंदिर के द्वार सुबह चार बजे खुल जाते हैं। श्रृद्धालु सुबह चार बजे से ही दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। मंदिर के पट खुलने के बाद पुजारी भगवान कार्तिकेय का श्रंगार और अभिषेक करते हैं। दर्शन के लिए श्रृद्धालु दूर-दूर से आते हैं और अपनी झोली सुख-समृद्धि के आशीर्वाद से भरकर ले जाते हैं। मंदिर प्रांगण में भगवान कार्तिकेय के साथ इस मंदिर में हनुमान जी, गंगा, जमुना, सरस्वती और लक्ष्मीनारायण आदि मंदिर हैं, इन सभी मंदिरों में तो रोज़ दर्शन किए जाते हैं। लेकिन कार्तिकेय जी के दर्शन सिर्फ पूर्णिमा के दिन ही किए जा सकते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से कार्तिकेय पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर प्रशासन द्वारा विशेष इंतजाम किए जाते हैं।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/kartikey-mandir-opens-on-kartik-purnima-in-gwalior-madhyapradesh-3745572/

इस मंदिर में आने वालों का दूर हो जाता है नेत्र रोग, डाक्टर भी हो जाते हैं हैरान


देश में 52 शक्तिपीठ हैं, सभी शक्तिपीठों में देवी मां के शरीर का एक हिस्सा गिरा था। जिसके कारण यहां मंदिर स्थापित हुए। ऐसा ही एक शक्तिपीठ बिहार के मुंगेर जिले से करीब 4 किमी दूर है। यहां देवी सती की बाईं आंख गिरी थी यह मंदिर को चंडिका स्थान और श्मशान चंडी के नाम से जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार मंदिर में आने वाले श्रृद्धालुओं की हर मुराद पूरी होती है। इस स्थान को लेकर लोगों का कहना है की यहां आंखो से संबंधित हर रोग का इलाज होता है। जी हां, यहां खास काजल मिलता है जिसे आंखों में लगाने से व्यक्ति के आंख से संबंधित रोग दूर हो जाते हैं। वैसे तो यहां भारी संख्या में श्रृद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लेकिन नवरात्रि में यहां भक्तों का सैलाब आ पड़ता है।

 

chandika shaktipeeth

तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध है मंदिर

चूंकी मंदिर के पूर्व और पश्चिम में श्मशान है और मंदिर गंगा किनारे स्थित है। जिसके कारण यहां तांत्रिक तंत्र सिद्धियों के लिए आते हैं। नवरात्र को समय मंदिर का महत्व और भी अधिक हो जाता है। सुबह के समय मंदिर में तीन बजे देवी का पूजन शुरु होता है और शाम के समय भी श्रृंगार पूजन किया जाता है। श्रृद्धालुओं का मानना है की यहां देवी के दरबार में हाजिरी लगाने से हर मनोकामना पूरी हो जाती है। मंदिर प्रांगण में काल भैरव, शिव परिवार और बहुत सारे हिंदू देवी- देवताओं के मंदिर हैं।

 

chandika shaktipeeth

महाभारत काल से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

भगवान शिव जब राजा दक्ष की पुत्री सती के जलते हुए शरीर को लेकर जब भ्रमण कर रहे थे, तब सती की बाईं आंख यहां गिरी थी। इस कारण यह 52 शक्तिपीठों में एक माना जाता है। इसके अलावा इस मंदिर को महाभआरत काल से जोड़ा जाता है। कर्ण मां चंडिका के परम भक्त थे। वह हर रोज़ मां के सामने खौलते हुए तेल की कड़ाही में कूदकर अपनी जान देते थे और मां प्रसन्न होकर उन्हें जीवनदान दे देती थी और उसके साथ सवा मन सोना भी देती थी। कर्ण सारा सोना मुंगेर के कर्ण चौराहे पर ले जाकर बांट देते।

इस बात का पता जब उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के पड़ा तब वे वहां पहुंचे और उन्होंने अपनी आंखों से पूरा दृश्य देखा। एक दिन वह कर्ण से पहले मंदिर गए ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान कर स्वयं खौलते हुए तेल की कड़ाही में कूद गए। मां ने उन्हें जीवित कर दिया। वह तीन बार कड़ाही में कूदे और तीन बार मां ने उन्हें जीवनदान दिया। जब वह चौथी बार कूदने लगे तो मां ने उन्हें रोक दिया और मनचाहा वरदान मांगने को कहा। राजा विक्रमादित्य ने मां से सोना देने वाला थैला और अमृत कलश मांग लिया। मां ने भक्त की इच्छा पूरी करने के बाद कड़ाही को उलटा दिया और स्वयं उसके अंदर अंतर्ध्यान हो गई। आज भी मंदिर में कड़ाही उलटी हुई है। उसके अंदर मां की उपासना होती है। मंदिर में पूजन से पहले विक्रमादित्य का नाम लिया जाता है, फिर मां चंडिका का।


Click here to Read full Details Sources @ https://www.patrika.com/temples/chandika-shaktipeeth-in-bihar-munger-3736708/

SHARE THIS


Subscribe via Email


Explore Jobs/Opportunities
Jobs Jobs / Opportunities / Career
Haryana Jobs / Opportunities / Career
Bank Jobs / Opportunities / Career
Delhi Jobs / Opportunities / Career
Sarkari Naukri Jobs / Opportunities / Career
Uttar Pradesh Jobs / Opportunities / Career
Bihar Jobs / Opportunities / Career
Himachal Pradesh Jobs / Opportunities / Career
Rajasthan Jobs / Opportunities / Career
Scholorship Jobs / Opportunities / Career
Engineering Jobs / Opportunities / Career
Railway Jobs / Opportunities / Career
Defense & Police Jobs / Opportunities / Career
Gujarat Jobs / Opportunities / Career
West Bengal Jobs / Opportunities / Career
Uttarakhand Jobs / Opportunities / Career
Maharashtra Jobs / Opportunities / Career
Punjab Jobs / Opportunities / Career
Meghalaya Jobs / Opportunities / Career
Admission Jobs / Opportunities / Career
Explore Articles / Stories
Education
Government Schemes
News
Career
Admit Card
Bihar
State Government Schemes
Study Material
Technology
DATA
Public Utility Forms
Travel
Sample Question Paper
Exam Result
Employment News
Scholorship
Syllabus
Festival
Business
Wallpaper
Explore more
Main Page
Register / Login
Like our Facebook Page
Follow on Twitter
Subscrive Our Newsletter Via Nuzzle
Get Updates Via Rss Feed
Sarkari Niyukti
Free Online Practice Set
Latest Jobs
Feed contents
Useful Links
Photo
Video
Post Jobs
Post Contents
Supremedeal : India Business Directory
Find IFSC Code
Find Post Office / Pincode
Contact us
Best Deal

Disclaimer: we only provide job information. we are not associated with any job website. Although we take extreme care for accuracy of the information provided, but you must check the authenticity of the website before applying for the job. We are not responsible for your operation , once you leave our website and apply thereafter. Please recheck the genuineness of the job website from yourself also.

Copyright © 2018. Website template by WebThemez.com