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सूर श्रृंगार के श्रेष्ठ कवि हैं/ विरह श्रृंगार के वैशिष्ट्य


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 सूर श्रृंगार के श्रेष्ठ कवि हैं/ विरह श्रृंगार के वैशिष्ट्य जो कवि संयोग से भी ज्यादा वियोग में रमने और डूबने का जोखिम उठाता है, जो बिछोह की टीस और कचोट को तन्मयता के साथ वाणी देता है, वही श्रृंगार का रससिद्ध कवि हो सकता है। सूर की रचनाओं में वर्जनाओं से मुक्त, स्वतंत्र नारी की छवि अंकित है। वियोग श्रृंगार में वह नारी समर्पण, एक निष्ठता एवं स्वाभिमान से दीप्त होकर पहली बार पूरे भक्ति काव्य म [...]

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भ्रमरगीत का उद्देश्य / दार्शनिक एवं साहित्यिक पक्ष


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 भ्रमरगीत का उद्देश्य / दार्शनिक एवं साहित्यिक पक्ष सूरदास के 'भ्रमरगीत' के दो पक्ष हैं- दार्शनिक पक्ष और साहित्यिक पक्ष। दार्शनिक दृष्टि से इसके प्रत्येक पात्र, स्थान और घटना एक-एक आध्यात्मिक तथ्य के प्रतीक हैं। कृष्ण ब्रह्म हैं, गोपियाँ जीवात्माएँ हैं, गापियों की विरह-वेदना ब्रह्म के लिए आत्मा की पुकार है और उद्धव उस ज्ञानाभिमान के प्रतीक हैं जिससे पीछा छुराकर ही ईश्वर को पाय [...]

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सूरदास के भ्रमरगीत की काव्य संरचना/शिल्प/स्थापत्य/रचना विधान/काव्य रूपात्मकता


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 सूरदास के भ्रमरगीत की काव्य संरचना/शिल्प/स्थापत्य/रचना विधान/काव्य रूपात्मकता    सूरदास जी भ्रमरगीत में भावसजगता हीं नहीं शिल्पसजगता का भी परिचय देते हैं । सूरदास भ्रमरगीत में अनुभूति और अभिव्यक्ति का संतुलन कहीं बिखरने नहीं देते हैं। कुछ आलोचक इसे प्रगीत मुक्तकों का संग्रह मानते है। कुछ आलोचक इसे खंड काव्य भी मानते है। खंड काव्य के रूप में भी यह किसी की दृष्टि में उपालम्भ काव्य [...]

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सूरदास - सहृदयता, भावुकता, चतुरता, वाग्विदग्धता


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 सूरदास - सहृदयता, भावुकता, चतुरता, वाग्विदग्धता    सहृदयता और भावुकता का संबंध हृदय से है किन्तु चतुरता एवं वाग्विदग्धता का संबंध बौद्धिक क्षिप्रता एवं भाषिक कौशल से है। आचार्य शुक्ल की दृष्टि में सूर जितने सहृदय और भावुक हैं, उतने ही चतुर एवं वाग्विदग्ध भी। सहृदयता:       सूर के सहृदयता की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वात्सल्य एवं संयोग विरह श्रृंगार की जितनी अन्तर्दशाएं हो [...]

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सूर की भक्ति


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 सूर की भक्ति     सूरदास जी ने पुष्टिमार्ग की लीकवद्ध भक्ति को लोकवद्ध बनाया। धर्म में पहले लोभ, भय, कृतज्ञता के कारण ईश्वर से जुड़ने का विधान था। सूरदास जी ने लोभ भय, कृतज्ञता का तिरस्कार कर प्रेम को भक्ति का आधार बनाया। वल्लभचार्य जी के राय के अनुरूप ही सूरदास जी निर्गुण और सगुण दोनों को ब्रह्म का रूप मानते हैं – 'आदि सनातन हरि अविनाशी ,  निर्गुण सगुण धरे तन दोयि' । निर्गुण साधना ज्ञान स [...]

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कबीर की भाषा / वाणी के डिक्टेटर


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कबीर की भाषा / वाणी के डिक्टेटर       डॉ॰ हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है ‘‘भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के  डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है, उसे उसी रूप में भाषा से कहलवा लिया - बन गया तो सीधे-सीधे, नहीं तो दरेरा देकर।’’    कबीर की भाषा जनता के टकसाल से निकली है उसमें व्याकरण और शास्त्र का आग्रह नहीं था और शायद इसीलिए कबीर अपनी भाषा के [...]

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कबीर का समाज दर्शन


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कबीर का समाज दर्शन     कबीर जिस दुरावस्था के काल में पैदा हुए उस समय पूरी सामाजिक व्यवस्था अन्तर्विरोधों, रूढ़ियों, ढोंगों से जर्जरित होकर दिशाहीन हो गयी थी। इसलिए उन्होंने अंधविश्वासों रूढ़ियों और सामाजिक विषमताओं के विरोध में तूफानी अभियान चलाया था। इसी बिना पर कुछ विद्वान उन्हें समाज सुधारक, कुछ सर्वधर्म समन्वयकारी, कुछ हिन्दु-मुस्लिम एकता के प्रचारक, कुछ मानवधर्म के प्रवर्त्तक त [...]

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कबीर: काव्यात्मकता


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 कबीर: काव्यात्मकता         कबीर की कविता पर अकाव्यात्मकता के आरोप लगते रहे है। आज की कविता के मूल्यांकन में कविता की सामाजिक सम्बद्धता को एक कसौटी के रूप में अपनाया जाता है। कबीर की कविता युग जीवन की पीड़ा को आत्मसात करती है। उसमें मानवीय हक और अधिकार से वंचित लोगों की कराह है, समानता के लिए तड़प है। कबीर की कविता अपने समय के सामाजिक वैसम्य पर एक आलोचनात्मक टिप्पणी है।     यदि कवि [...]

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कबीर में योग और भक्ति का सफल समन्वय


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 कबीर में योग और भक्ति का सफल समन्वय कबीर की वाणी वह लता है जो योग के क्षेत्र में भक्ति के बीज पड़ने अंकुरित हुई थी।    कबीरदास जिस समय पैदा हुए ये उस समय उत्तर भारत में योग और दक्षिण भारत में भक्ति की धारा जोरों पर थी। कबीर शुरू में योगमार्ग की ओर झुके हुए थे। योग चित्तवृत्ति का निरोध करता है। मन को बस में करने का यह साधन है। योग के द्वारा ब्रह्म का साक्षत्कार किया जा सकता है। कबीर ने भी ख [...]

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कबीर की साधना पद्धति/साधना के श्रोत


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 कबीर की साधना पद्धति/साधना के श्रोत    कबीरदास जी का दर्शन भारतीय साधना पद्धतियों का हीं तर्कसंगत विकास है। कबीरदास जी में जात-पात विरोध की जो बाते हैं उसे देखकर कुछ लोग उसे मुसलमानी प्रभाव का परिणाम मानते हैं। जबकि यह सिद्धो-नाथों का प्रभाव है। अंग्रेज इतिहासकारों ने कबीर को एकेश्वरवादी कहा है। कबीर ने एकेश्वरवाद का खंडण किया है। उन्होंने कहा है कि ‘मुसलमान का एक खुदायी, कबीर का र [...]

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कबीर का दर्शन


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कबीर का दर्शन    कबीर का दर्शन उपर से जितना उलझा हुआ है भीतर से उतना ही सुलझा हुआ। कबीर ब्रह्म से शुरू होकर जीव तक जाते हैं या जीव से शुरू होकर ब्रह्म तक यह कहना कठिन है। लेकिन उनके काव्य में ब्रह्म जीव और जगत के बीच पारस्परिक दौड़ बहुत अधिक है। कबीर का जीव माया रहित होकर ही ब्रह्म हो जाता है। जगत भी जीव और ब्रह्म से पृथक सत्ता नहीं है। एक ओर जहॉ जगत ब्रह्म की अभिव्यक्ति है वहीं दूसरी ओर वह पं [...]

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कबीर का रहस्यवाद


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 कबीर का रहस्यवाद ‘रहसि भवम् रहस्यम्’! रहस्य का अर्थ है गोपनीय, गुप्त, गुह्य। प्राइवेट में सम्पन्न होने वाली अनुभूति ही रहस्य है। एकान्त साध्य कर्म ही रहस्य है। ब्रह्म भी इसलिए रहस्य है कि वह एकान्त में सम्पन्न हाने वाली प्राइवेसी है। रहस्य भावना है परोक्ष के प्रति जिज्ञासा।शब्द विकल्पोंं के जनक हैं। इन विकल्पात्मक शब्दों के द्वारा जब ब्रह्म का निवर्चन किया जाएगा तो धोखा ही होगा। कबीर [...]

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