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Tantrokt Hawan Paddhati : तांत्रोक्त हवन पद्धति
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 तांत्रोक्त हवन पद्धतितांत्रोक्त हवन पद्धतितांत्रोक्त हवन पद्धतिपटन देवी मंदिर में हवन करते हुए श्री अभिषेक कुमार
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Saraswati Mahima : मेरा पढ़ने में मन नहीं लगता, मैं क्या करूँ.
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मेरा पढ़ने में मन नहीं लगता(आज के विद्यार्थियों की वर्तमान समस्या)        हमारे शास्त्रों में लिखा गया है,जो व्यक्ति ज्ञान से हीन है, वह पशु के समान है। ज्ञान से हीन व्यक्ति बिना सींग एवं पूंछ के पशु है। जीवन में विद्या एवं ज्ञान का महत्व कम कर के नहीं आंका जा सकता। विद्या प्राप्ति का अर्थ केवल लोगों ने किताबी ज्ञान से ले लिया है, पर वास्तविक अर्थ ऐसा नहीं है। जीवित रहने हेतु भी ज्ञान आवश्यक है। अगर कृषि कार्य का ज्ञान न हो, तो भोजन कहाँ से मिलेगा। कौन मित्र है, कौन शत्रु, कौन विषैला सर्प है,तो कौन दूध देने वाली गाय, कौन मीठे फलों वाला वृक्ष है, तो कौन विष वृक्ष इत्यादि का ज्ञान होना आवश्यक है। अगर मनुष्य में सोंचने समझने की शक्ति न हो तो सड़क पार करना भी मुश्किल है। पर यहाँ बात कर रहा हूँ, वर्तमान समस्या की, जिससे कि आज के अधिकतर छात्र पीड़ित हैं।        शिक्षा दो प्रकार की होती है - सैद्धान्तिक एवं व्यावसायिक शिक्षा। व्यावसायिक शिक्षा का उद्देश्य  इतना ही रहता है कि व्यक्ति अपने क्षेत्र विशेष में तकनीकी दक्षता हासिल कर ले और रोजगार की प्राप्ति  कर ले। किंतु सैद्धान्तिक शिक्षा जीवन के समस्त पहलुओं और विषयों का अध्ययन करती है। कालांतर में सैद्धान्तिक शिक्षा का उद्देश्य भी व्यवसाय की प्राप्ति करना ही होता है।        जहाँ तक मेरा विचार है,व्यावसायिक शिक्षा से व्यक्ति केवल कार्य संपन्न करने वाला कर्मचारी हो जाएगा, किंतु जीवन के अनेक समस्यायें आने पर वह विवश हो जाएगा। किंतु सैद्धान्तिक शिक्षा जीवन के सभी समस्याओं पर प्रकाश डालता है। जैसे विज्ञान के क्षेत्र में बिजली के इस्तेमाल के समय यह जानना जरूरी है कि कौन-सा पदार्थ बिजली का सुचालक है या कुचालक। कौन-सा जंतु विषैला है या कौन-सा रसायन हानिकारक।        भूगोल के क्षेत्र में जायें,तो अगर आपको कहीं जाना है, तो उस क्षेत्र का वातावरण कैसा है, वहां गर्म कपड़े की जरूरत पड़ेगी या नहीं इत्यादि यह जानना आवश्यक है। आज के समय में हर व्यक्ति को अपने देश के प्रमुख कानूनों की जानकारी होना अति- आवश्यक है। अगर कहीं विदेश टूर में अथवा कार्य करने हेतु जा रहे हैं,तो वहां के कानून की जानकारी होना अति आवश्यक है। उसी प्रकार और सूक्ष्म दृष्टि से देखें, तो शिक्षा के तीन अन्य प्रकार सामने आते हैं - आत्मकल्याणकारी शिक्षा, जनकल्याणकारी शिक्षा तथा विनाशकारी शिक्षा। मैं यहाँ शिक्षा प्राप्ति में आ रहे विध्नों के आध्यात्मिक पहलू पर चर्चा करूंगा। आमतौर पर छात्रों की समस्या रहती है, किसी खास विषय में मन न लगना, पढ़ाई के समय मन भटक जाना, अध्ययन काल में गलत-संगति में पड़ जाना, आर्थिक संकट हो जाना,सही शिक्षक या मार्गदर्शक का उपलब्ध न होना।        अब तो वर्तमान् में एक सबसे भयंकर समस्या उत्पन्न हो गई है – शिक्षकों द्वारा छात्रों का यौन शोषण। विद्या के मंदिर को अपवित्र किया जा रहा है। साथ ही आजकल बच्चों में हिंसात्मक प्रवृति बढ़ रही है। अब तो 13 वर्ष का बच्चा, 15 वर्ष का बच्चा घोर गैरकानूनी अपराधिक कार्यों में संलिप्त है। आम तौर पर बच्चों में ऐसी समस्या आने पर माता-पिता परेशान हो जाते हैं। उनके मनोविज्ञान को समझे बिना उन्हें शारीरिक दंड दिया जाता है, घोर मानसिक प्रताड़ना दी जाती है, जिससे बच्चों में उद्दण्डता बढ़ती है, हिंसात्मक प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं एवं आत्महत्या की प्रवृत्ति।        ऐसी समस्यायें आने पर माता-पिता बच्चों को लेकर किसी गंडे-ताबीज देने वालों के यहाँ, पंडित-मौलवी इत्यादि के यहाँ दौड़ने लगते हैं, और फिर शुरू होता है, धर्म के इन तथाकथित ठेकेदारों द्वारा गण्डे-ताबीज देने का दौर शुरू। पर इससे होता क्या है,गली का गरीब मौलवी-पंडित है, तो कागज पर यंत्र लिख कर दे देगा और कोई बहुत बड़ा गुरू या ज्योतिषी है, तो रत्न,पिरामिड इत्यादि में उलझा देता है। अब तो फैशन हो गया है। अगर किसी का विद्या पक्ष कमजोर है, तो सीधे कह दिया जाता है, बृहस्पति कमजोर है,टोपाज या पुखराज पहन लो। पर किसी ने आज तक इसका सूक्ष्म आध्यात्मिक विवेचन किया ही नहीं है। जब तक रोग का कारण समझ में नहीं आएगा, उसका निदान कैसे संभव होगा/ क्यों होता है, बच्चों की पढ़ाई में यह समस्या उत्पन्न/ आखिर ऐसा कौन-सा कारक तत्व है, जो बच्चों को पढ़ने नहीं देता।        मैं बच्चा था। बरसात के दिनों में एक कीड़ा मुझे बार-बार तंग कर रहा था। मैं परेशान था, उससे। मेरी माँ वहीं पर थी। उसने मुझे परेशान देखा और कीड़े को किसी चीज से मार दिया। बस मेरी रक्षा हो गयी और मैं परेशानी से बच गया।        विश्व के प्राचीन धार्मिक मान्याताओं के अनुसार जीवन के हर क्षेत्र से संबद्ध देवी-देवता हैं। जैसे- पूर्ण संहार हेतु देवी काली, युद्ध की देवी दुर्गा, धन की देवी लक्ष्मी,सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, पालनकर्ता विष्णु,संहारकर्त्ता रूद्र, तो ज्ञान की देवी सरस्वती। परमब्रह्म ने इन्हें ज्ञान, विद्या, आध्यात्म एवं स्वर की अधिष्ठात्री नियुक्त किया है।        जीवन की विपरीत परिस्थितियाँ आने पर शस्त्र उठाना ही पड़ जाता है। वंशी बजाने वाले कृष्ण को भी चक्र उठाना पड़ ही जाता है।        अब इस विद्या की देवी का स्वरूप देखें। ब्रह्मलोक में जो ब्रह्माजी के साथ सरस्वती विराजती हैं, ग्रंथों में उनके स्वरूप् का ध्यान इस प्रकार बताया गया है। भगवती का स्वरूप श्वेत  वर्ण का है। वस्त्र भी उनके श्वेत वर्ण के हैं एवं उनका आसन कमल भी श्वेत ही है। उनका वाहन हंस भी श्वेत है। भगवती के चार हाथ हैं। एक हाथ में स्फटिक माला, दूसरे हाथ में वेद अर्थात् प्रथम एवं परम ज्ञान,तथा अन्य दो हाथों में वीणा धारण की हुई हैं। देवी पूर्ण यौवनमयी हैं। इस शक्ति के अधिष्ठाता एवं नियंत्रणकर्त्ता श्री ब्रह्मा जी का स्वरूप देखिए। ब्रह्मा जी रक्त वर्ण के हैं, एवं उनका आसन कमल पुष्प भी लाल है। ब्रह्माजी राजहंस की सवारी करते हैं। ब्रह्माजी के चार मुख हैं,तथा चार हाथ हैं। उनके चारों हाथों में कमण्डलु (ब्रह्म ज्ञान एवं ब्रह्म जल का प्रतीक, जो कि सृष्टि में जीव की उत्पत्ति का प्रमुख केंद्र है।) चारों वेद, रूद्राक्ष माला तथा लाल कमल शोभा पाते हैं। उनकी अवस्था वृद्ध है, और उनका पांचवा ऊर्ध्वमुखी मुख शिव द्वारा कटवा दिया गया है,अर्थात् परमेश्वर द्वारा दंड पा चुके हैं। उनके ऊपर बढ़ने की कला रोक दी गई है,और वे चारों दिशाओं में दृष्टि रखे हुए हैं।        यहाँ इन दोनों के ही हाथों में एक भी शस्त्र नहीं है। अब जबकि इनके पुत्रों पर, साधकों पर, इनके क्षेत्र के लोगों पर किसी प्रकार का कोई आक्रमण हो, संकट हो तो भला किस प्रकार से रक्षा कर पायेंगे/ अपने बछड़े पर संकट देख गाय भी सींग मारने को उद्यत हो जाती है। बस यही कारण है, इनके अराधकों अर्थात् विद्यार्थियों को सर्वाधिक कष्ट एवं विध्नों का सामना करने का। एक और कारण देखें। स्त्री तब तक पूर्ण नहीं होती,जब तक वह माँ न बन जाए। ओंकार स्वरूप् महागणपति सभी देवियों के पुकार पर उनके लोक में अपने अंश से पुत्र के रूप में प्रकट हो गए। सर्वप्रथम भगवान शंकर एवं पार्वती के यहाँ वे ॐ कार स्वरूप में उनके पुत्र के रूप में प्रकट हुए। दुर्गा के साथ वे भक्ष्य प्रिय हैं, तो काली के साथ सुरेश अर्थात् देवताओं के स्वामी। श्री अर्थात् लक्ष्मी के साथ वे विध्नहर्ता हैं,तो वहीं सरस्वती के साथ वे विध्नकर्ता के रूप में स्थापित हैं।बस अब आपको कारण समझ में आ गया है कि इनके अराधकों को इतना विध्न क्यों उत्पन्न होता है।         लक्ष्मी जी का भी जो स्वरूप है, उसमें उन्होंने अपने चार हाथों में, दो हाथों में कमल पुष्प धारण कर रखा है, एक में स्वर्णमुद्रा युक्त कलष है, तथा दूसरे हाथ से धन की वर्षा कर रही हैं। इनके भी हाथ में अस्त्र-शस्त्र नहीं है। यही कारण है, इनके क्षेत्र के लोगों को भी घोर कष्ट होता है। बिना शस्त्र के ये अपने साधकों अर्थात् व्यापारियों,पूंजीपतियों की रक्षा नहीं कर पाती। लेकिन यहाँ एक प्लस प्वाइंट है। इनके स्वामि श्रीहरि विष्णु अपने हाथों में चक्र एवं गदा तथा कंधे पर शारंग धनुष धारण करते हैं। अर्थात् इनके साधक स्वयं तो अपनी रक्षा नहीं कर पाते, किंतु किसी अन्य शस्त्रधारी से रक्षा प्राप्त करते हैं। जीवन एक संग्राम है। कभी-न-कभी युद्ध करना ही पड़ जाता है। अगर लक्ष्मी को युद्ध में जाना पड़े, तो वे भी नारायणी स्वरूप धारण कर हाथ में चक्र, गदा एवं शंख धारण कर ही लेती हैं। वाहन उनका गरूड़ हो जाता है। लेकिन देवी सरस्वती ब्रह्माणी का रूप् धारण करती हैं। उनके हाथ में कमण्डलु एवं रूद्राक्ष माला आ जाती है। जहाँ नारायणी (लक्ष्मीद) दिल में कोमलता रहते हुए भी युद्ध करती हैं, तो वहीं ब्रह्माणी केवल निस्तेज मात्र करती हैं। हो सकता है कोई और शक्ति उस शत्रु में तेज उत्पन्न  कर दे। बस यही कारण है, उनके आराधकों का सर्वाधिक पीड़ित होने का। यहाँ मैं महासरस्वती की चर्चा नहीं कर रहा हूँ, जो देवी कौशिकी के रूप में उत्पन्न हुई थी और शुम्भ-निशुम्भ का संहार किया था।        मैंने अपने गुरूदेवजी से बार-बार कहा था कि 'गुरू जी सरस्वती पर भी कुछ लिखें, ज्ञान प्रदान करें।' पर उन्होंने टाल दिया। मुझे आज्ञा दी कि नील सरस्वती की साधना संपन्न करो। शरीर में सरस्वती का वास कण्ठ में एवं जिव्हा पर माना गया है। आखिर क्या कारण था,विषपान के उपरांत शिव को अपने कंठ में सरस्वती की जगह नीलसरस्वती को स्थापित करने की।        अब नील सरस्वती का ध्यान देखें। वे शव के आसन पर हैं,एवं सर्पों का आभूषण है। उनके चारों हाथ में कपाल, पानपात्र, त्रिशूल एवं मुण्ड है,तथा मुण्डमाला धारण की हुईं हैं, तथा तीन नेत्र हैं। ये मुख्यतः तांत्रिकों को विद्या प्रदान करती हैं।        ब्रह्मलोक की भगवती सरस्वती श्वेत वर्ण की हैं। श्वेत वर्ण पवित्रता, उज्जवल चरित्र एवं ज्ञान का प्रतीक है। एक विद्यार्थी का जीवन भी पवित्र एवं उच्च चरित्र युक्त होना चाहिए। किंतु अब तो लोग विद्या के प्रेत हो गए हैं। गेस प्रश्न रट कर किसी प्रकार से अधिक से अधिक नंबर प्राप्त कर लेने को ही विद्या प्राप्ति समझ लिया गया है। इनका वाहन श्वेत राजहंस है।  हंस का यह गुण है कि वह पानी मिले दूध को जब पीता है,तो दूध पी जाता है और पानी को अलग कर देता है। एक सच्चे विद्यार्थी या विद्वान में यह गुण होना चाहिए कि वह सत्य-असत्य में, गुण-अवगुण में,न्याय-अन्याय में, ज्ञान-अज्ञान में, विद्या-अविद्या में,धर्म-अधर्म में इत्यादि में सही-सही फर्क कर सके।         लेकिन एक बात पर यह भी ध्यान दें कि श्वेत वर्ण पर दाग भी बहुत जल्दी दिखता है। अति शीघ्र मैला भी हो जाता है। मैंने पहले कहा सरस्वती का निवास हमारे शरीर में जिह्वा एवं विशुद्ध चक्र अर्थात् कण्ठ में रहता है। सहस्रार में परम शिव भगवती त्रिपुर सुन्दरी के साथ आलिंगनबद्ध रहते हैं। सरस्वती की तुलना हम किसी पार्टी के उस प्रवक्ता से कर सकते हैं, जो अपने अध्यक्ष या पार्टी के निर्णय या विचार को जनता के सामने प्रस्तुत मात्र कर देते हैं। उसी प्रकार सरस्वती भी मस्तिष्क में उठे विचार तरंगों को परम शिव की आज्ञा से वाणी का रूप प्रदान कर देती हैं। आज्ञा तो कहीं और से प्राप्त होती है।        आगे मैं महासरस्वती, ब्रह्मसरस्वती और नीलसरस्वती पर कभी विस्तृत चर्चा करूंगा। आखिर क्या अंतर है इनमें ? पर अभी मैं विवश हूँ,इन महाशक्तियों की विशद विवेचना में। एक बात पर और विवेचना करूंगा कि आखिर क्यों शिव को ब्रह्मसरस्वती को नीलसरस्वती में परिवर्तन करना पड़ गया।        अब मैं इसका ज्योतिषिय विवेचन कर दूं। विद्या प्राप्ति का कारक ग्रह बृहस्पति को माना जाता है। आमतौर पर किसी को अगर विद्या प्राप्ति में व्यवधान आ रहा है, उसे बृहस्पति का दोष बता दिया जाता है, और बृहस्पति का रत्न पहनने की सलाह दी जाती है। बृहस्पति की शांति करायी जाती है, इत्यादि। बृहस्पति देवताओं का गुरू है। यह शिक्षक विद्यालय, पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराता है। यह तो लगभग सभी विद्यार्थियों को उपलब्ध होता है, किंतु पढ़ने में मन न लगना, इस बात को ज्योतिषी बंधु भूल जाते हैं। मन का कारक ग्रह चंद्रमा है। मेरी ज्योतिषी बंधुओं को सलाह है कि वे बृहस्पति के साथ-साथ चंद्रमा एवं अन्य ग्रहों की स्थिति पर भी विचार करें। चंद्रमा जब पापी ग्रहों द्वारा दृष्ट होता है, अथवा किसी क्रूर ग्रह के साथ एक साथ किसी भाव में बैठ जाए अथवा राहु-केतु के साथ युति कर ग्रहण योग बनाए तो मानसिक वाचालता जातक में बनी रहती है। कुण्डली में पंचम भाव विद्या प्राप्ति का है। अगर यहाँ कोई ग्रह अपने नीच राशि में बैठ जाए तो विद्या प्राप्ति में व्यवधान आता है। चंद्रमा अगर शुक्र द्वारा पीड़ित होता है, एवं शुक्र को कोई पापी ग्रह देखता है, तो जातक के मन में असमय यौन आकांक्षा एवं दुष्चरित्रता उत्पन्न होती है। पढ़ने में मन नहीं लगने देता तथा विपरीत लिंग आकर्षण उत्पन्न करता है। आज अधिकांश युवा इस दोष से पीड़ित हैं। ऐसी स्थिति में विद्यार्थियों को सरस्वती की पूजा-अर्चना करने से लाभ मिलता है। जातक को विद्या प्राप्ति एवं पढ़ने में मन लगने का यंत्र पहनना चाहिए। जीवन में वह सरस्वती कवच को विशेष महत्व दे। विद्यार्थियों की इसी आवश्यकता को देखते हुए यहाँ सरस्वती कवच दे रहा हूँ। सरस्वती का चित्र एवं यंत्र प्राप्त कर नित्य एक बार कवच पाठ कर लेने मात्र से गारंटी लेता हूँ, किसी ज्योतिषी या यंत्र बगैरह लेने के लिए चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। यहाँ मैं कुछ विशेष सरस्वती मंत्र लिख रहा हूँ। किसी गुरू से दीक्षा प्राप्त कर किसी एक का विधिवत् जप करने से षीघ्र लाभ प्राप्त होता है।मंत्र -1.     ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।।2.     ॐ ह्रीं वद वद वाग्वादिनी स्वाहा।3.     ॐ ऐं क्लीं सौः वद वद वाग्वादिनी स्वाहा।4.     ॐ सरस्वत्यै च विद्महे, ब्रह्मपुत्रये च धीमहि। तन्नो वाणि प्रचोदयात्।।5.     ॐ ह्रीं श्रीं ऐं वाग्वादिनि भगवति अर्हन् मुख निवासिनी सरस्वती ममास्ये प्रकाशं कुरू कुरू स्वाहा।6.     ॐ नमो ॐ श्रीं वद वद वाग्वादिनी बुद्धि वर्द्धय ह्रीं ॐ नमः स्वाहा।        सरस्वती के अलावा विद्या प्राप्ति हेतु श्री गणेश, हनुमान, विद्या गोपाल मंत्र,गायत्री मंत्र, सूर्य मंत्र, बृहस्पति मंत्र एवं दक्षिणामूर्ति शिव गुरू के मंत्र की भी साधना की जाती है।विद्या प्राप्ति हेतु एवं परीक्षा पास करने हेतु श्री गणेश एवं हनुमान मंत्रः-श्री गणेश मंत्र -ॐ  एकदन्त महाबुद्धि सर्वसौभाग्य दायकः। सर्वसिद्धि करो देवा गौरि पुत्र विनायकः।।श्री हनुमान मंत्र -ॐ बुद्धि हीन तनु जानि के सुमिरौं पवन कुमार। बल, बुद्धि, विद्या देहु मोहि हरहु क्लेश विकार।।        इनमें गणेश मंत्र की साधना बुधवार से तथा हनुमान मंत्र की साधना मंगलवार से करें।श्री विद्या गोपाल मंत्र -1.    ॐ  कृष्ण कृष्ण महाकृष्ण सर्वज्ञ त्वं प्रसीद मे। रमा रमण विश्वेश, विद्यामाशु प्रयच्छ मे।।2.    ॐ  ऐं क्लीं कृष्णाय ह्रीं गोविन्दाय श्रीं गोपीजन वल्लभाय स्वाहा सौः।।(श्री नील सरस्वती देवी)श्री नील सरस्वती मंत्र – ॐ  श्रीं ह्रीं ह्रः सौः हुं फट् नील सरस्वत्यै स्वाहा।श्री विद्याराज्ञी मंत्र -ऐ ह्रीं श्रीं क्लीं सौं क्लीं ह्रीं ऐं ब्लूं स्त्रीं नीलतारे सरस्वती द्रां द्रीं ब्लूं सः ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः सौः ह्रीं स्वाहा।            विद्या प्राप्ति में आ रही कठिनाइयों को दूर करने के लिए सामान्य प्रयोग -जिस बच्चे को विद्या प्राप्ति में कठिनाइयां उत्पन्न हो रही हों, उसे दीपावली,वसंत पंचमी या कोई अन्य शुभ मुहूर्त में एक पेंसिल लेकर उसे सफेद वस्त्र में बांधकर इस मंत्र का 21 बार मात्र जप करें – ॐ ऐं क्रीं ऐं ॐ         इसके पश्चात् किसी भी गुरूवार से प्रारम्भ कर अगले गुरूवार तक नित्य उसी पेंसिल से इस मंत्र को बच्चे द्वारा नित्य तीन बार लिखवायें। इस पेंसिल को सुरक्षित रखें।विद्या प्राप्ति हेतु कुछ सिद्ध चमत्कारी यन्त्र     बच्चों को विद्या प्राप्ति में सफलता हेतु छः मुखी रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए।    उच्च प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में संलग्न व्यक्तियों को छः मुखी रूद्राक्ष के साथ गणेश रूद्राक्ष एवं स्फटिक माला अवश्य धारण करनी चाहिए। सरस्वती कवच (लॉकेट के रूप में) अवश्य ही धारण करना चाहिए। शक्ति अनुसंधान केंद्र से संपर्क स्थापित करने पर यह सारी सामग्री आपको उपलब्ध कराई जा सकती है।छः मुखी रूद्राक्ष धारण करने का मंत्र एवं विधि:-विनियोग -ॐ अस्य श्री कार्तिकेय मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषिः, पंक्तिः छन्दः,कार्तिकेय देवता, ऐं बींज, सौं शक्तिः,क्लीं कीलकम् विद्या प्राप्त्यर्थे च अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः। षयाऋश्यादिन्यास -ॐ दक्षिणामूर्ति ऋषये नमः।, शिरसि।  पंक्तिष्छन्दसे नमः। मुखे।   कार्तिकेय देवतायै नमः।, हृदि।ऐं बीजाय नमः।, गुह्ये। सौं षक्त्यै नमः।, पादयोः।करन्यास -ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्याम नमः।।     ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः।।  ॐ श्रीं मध्यमाभ्यां वषट ।।   ॐ क्लीं अनामिकाभ्यां हुं।। ॐ सौं कनिश्ठिकाभ्यां वौषट करतलकरपृश्ठाभ्यां अस्त्राय फट्।।अंगन्यास -ॐ ॐ हृदयाय नमः।।  ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा।  ॐश्रीं शिखायै वषट।  ॐक्लीं कवचाय हुं।  ॐ सौं नेत्रत्रयाय वौशट्।  ॐ ऐं करतलकर पृष्ठाभ्यां अस्त्राय फट्।  ध्यान:-ॐ सिन्दूरारूणकान्तिमिन्दुवदनं केयूरहारादिभिर्दिव्यैराभरणेर्विभूशित तनुं स्वर्गस्य सौख्यप्रदम्।अम्भोजाभय शक्ति  कुक्कुटधरं रक्तांगरागांषुकं सुब्रह्ममुपास्महे प्रणमतां भीतिप्रणाषोद्यतम्।।मंत्र - ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सौं ऐं    इस विशेष मंत्र का यथा संभव अधिक से अधिक जप कर ;रूद्राक्ष माला सेद्ध छः मुखी रूद्राक्ष धारण करें। इस मंत्र को जपने से पहले एक माला या पांच माला 'ॐ नमः शिवाय' या 'ह्रीं ॐ  नमः शिवाय ह्रीं' का भी जप कर लें। दशांश हवन करें। जप से पहले रूद्राक्ष को नर्मेद्श्वर या पारदेश्वर  शिवलिंग के समीप रख कर षोडशोपचार विधि से शिवलिंग तथा रूद्राक्ष की पूजा संपन्न कर लें।        विद्यार्थियों के लिए विशेष सरस्वती कवच - दो 6 मुखी और एक 4मुखी रूद्राक्ष को चांदी में मढ़वा लें। इसके बाद सोमवार के दिन पूजाघर में शिवलिंग के पास बंध को स्थापित करते हुए 'ॐ ऐं ॐ' मंत्र का 1100बार जप कर लें। जप प्रातः काल संपन्न करें। अगर एक दिन में संभव न हो तो दो या तीन दिन में करें। इसके बाद इस कवच को विद्यार्थी धारण करें। उन्हें विद्या अध्ययन में अद्भुत सफलता मिलेगी।रूद्राक्ष सरस्वती कवच का मूल्य - 200 रू0मात्र।        विद्यार्थियों के लिए वास्तु एवं फेंगशुई  टिप्स :-        अध्ययन कक्ष पश्चिम या दक्षिण- पश्चिम दिशा में सर्वोत्तम रहता है। अध्ययनकर्ता का मुँह उत्तर या पूर्व की ओर होना चाहिए। अगर व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, तो पष्चिम दिशा की तरफ मुँह रखें। दीवार से लगाकर टेबुल न रखें। अध्ययन कक्ष की दीवार हल्के रंग से रंगवायें। अध्ययन कक्ष में अपनी रूचि के अनुसार देवी-देवताओं या महापुरुष के चित्र लगायें। फिल्मी हीरो-हिरोईन के तस्वीर न लगायें। ऐसा करने से मन भटकेगा। शोर करने वाले उपकरण एवं टेलीफोन बगैरह अध्ययन कक्ष में न हों। इससे मन भटकता है। अपने पढ़ने के टेबल पर गायत्री,सरस्वती एवं गणेश की तस्वीर लगायें। संभव हो तो गणेश जी की एक छोटी-सी मूर्ति अवश्य टेबुल पर रखें। कमरे में लाइट न तो अत्यधिक तीव्र हो और न ही बहुत कम। अध्ययन कक्ष में व्यर्थ के गप करना या बाहरी व्यक्तियों का अनावश्यक आवागमन का निषेध करें। भोजन भी न करें। इस कक्ष में कुछ देर ध्यान अवश्य  लगायें। सरस्वती या गणेश कवच का पाठ अवश्य करें। इससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाएगी।विद्यालय, कॉलेज या अन्य शिक्षण संस्थानों के लिए वास्तु टिप्स -आखिर क्या कारण है कि कुछ विद्यालयों के विद्यार्थी सर्वाधिक अंक लाते हैं, और वही कोर्स पढ़ कर भी किसी विद्यालय के विद्यार्थी किसी प्रकार पास भर कर जाते हैं। कुछ विद्यालय या कोचिंग संस्थानों में छात्रों की भीड़ लगी रहती है, शिक्षकों को भी पढ़ाने में मन लगता है, तो कुछ शिक्षण संस्थानों में न तो छात्र टिकते हैं, न ही शिक्षक। इसके ऐसे तो बहुत कारण हो सकते हैं, किंतु मैं यहाँ सर्वोत्तम शिक्षण संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण वास्तु टिप्स दे रहा हूँ, जिसका पालन कर आप भी अपने संस्थान का दोष सुधार कर सकते हैं, एवं अपने संस्थान को ख्याति दिला सकते हैं।1.     किसी भी शिक्षण संस्थान के लिए वास्तुभूमि आयताकार या वर्गाकार होना चाहिए।2.     रास्ते पूर्व या उत्तर की ओर हो।3.     कक्षाओं के प्रवेश द्वार पूर्व, उत्तर या ईशान कोण में होने चाहिए।4.     प्राधानाचार्य का कार्यालय (कक्ष) पश्चिम दिशा में या आग्नेय अथवा नैर्ऋत्य कोण में होना चाहिए।5.     प्रार्थना या सभाखण्ड उत्तर में और उसका प्रवेश द्वार पूर्व में होना चाहिए।6.     प्रयोगशाला तथा पुस्तकालय पश्चिम में हो।7.     प्रशासनिक कार्यालय उत्तर या पूर्व दिशा में होना चाहिए।8.     स्टाफ रूम वायव्य कोण में सर्वोत्तम होता है।9.     स्टेशनरी या स्टॉक रूम दक्षिण या पश्चिम में हो।10.    शौचालय नैर्ऋत्य कोण या पश्चिम में हो।11.    पानी की टंकी या बोरिंग इत्यादि ईशान कोण अथवा उत्तर में हो।12.    अनावश्यक वस्तुयें जैसे टूटी बेंच कुर्सियाँ नैर्ऋत्य कोण में हों।13.    खेल-कूद हेतु मैदान पूर्व या उत्तर दिशा में हो।         ऊपर मैंने विवेचना की है कि ब्रह्मसरस्वती के हाथों में शस्त्र नहीं है, और ऐसी स्थिति में इनका साधक किस प्रकार रक्षा प्राप्त कर सकता है। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर व्यक्ति को महासरस्वती या नीलसरस्वती की भी साधना संपन्न करनी चाहिए अथवा इनके मंत्रों का जप करना चाहिए।इनके साधकों को दूसरे देवताओं द्वारा भी रक्षा पाने का विधान शास्त्रों में है। उन्हें इस प्रकार इन तीनों मंत्रों का जप करना चाहिए।1.     ॐ गं गणपतये नमः।। (गणेश मंत्र)2.     ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।। (महालक्ष्मी मंत्र)3.     ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।। (सरस्वती मंत्र)        इन तीनों मंत्रों की साधना करने हेतु विशेष गणेश-लक्ष्मी-सरस्वती का एक संयुक्त यंत्र होता है। इसमें साधक विध्नहर्ता मंगलकर्ता गणेश जी से रक्षा प्राप्त कर लेता है, क्योंकि उन्होंने अपने हाथों में अस्त्र-शस्त्र धारण कर रखा है। आगे के पृष्ठों में इस मंत्र और यंत्र के प्रयोग की विस्तृत विवेचना है। यह मैं अपने प्रत्येक शिष्य को विशेषकर विद्यार्थियों को देता हूँ।भगवती दुर्गा में आदिशक्ति के तीनों स्वरूप महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती विद्यमान हैं। वैष्णो देवी मंदिर में इन तीनों की ही पींडियाँ विराजमान हैं। कुछ व्यक्ति भगवती दुर्गा की साधना द्वारा ही इन तीनों महाशक्तियों की कृपा दृष्टि चाहते हैं। उनके लिए मंत्र इस प्रकार रहेगा।1.     ॐ ह्रीं  दुं दुर्गायै नमः।। (मूल मंत्र)2.     ॐऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। (नवार्ण मंत्र)3.     ॐक्रीं क्रीं  क्रीं ॐ । (महाकाली मंत्र)4.     ॐश्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।। (महालक्ष्मी मंत्र)5.     ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।। (सरस्वती मंत्र)        इनमें से प्रत्येक मंत्रों का क्रम से लाल चंदन या रूद्राक्ष की माला पर जप करें। इन पांच मंत्रों की सिद्धि एकमात्र देव्यनुग्रह यंत्र पर हो जाता है। किंतु अतिविषिश्टता प्राप्त करने के लिए देव्यनुग्रह यंत्र के साथ दुर्गा यंत्र, श्री यंत्र,महालक्ष्मी यंत्र, सरस्वती यंत्र तथा सर्वतोभद्र यंत्र स्थापित कर सकते हैं।         इस एक मंत्र द्वारा भी भगवती की तीनों षक्तियों की एक साथ साधना संपन्न की जा सकती है - ॐ श्रीं ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं महामाया महाकाली महागौरी महालक्ष्मी महासरस्वत्यै रूपिणी महाशक्त्यै क्लीं ह्रीं ऐं श्रीं ॐ विद्या प्रदायक धन धान्य देहि देहि श्रीं ॐनमो नमः।। (विद्या एवं धन प्राप्ति का महामंत्र)        विद्या प्राप्ति हेतु गायत्री यंत्र पर प्रयोग -        भारत का प्रत्येक आस्तिक वर्ग जीवन के किसी न किसी कालखण्ड में गायत्री मंत्र एवं यंत्र की उपासना अवष्य संपन्न करता है। गायत्री मंत्र में परमब्रह्म परमेश्वर के सभी स्वरूप समाहित हैं। यह प्रथम वैदिक मंत्र है,जिसके माध्यम से हमारे आर्य ऋषियों ने किसी पिंड में मौजूद पराब्रह्माण्डीय शक्ति की सत्ता का स्तवन किया था। आखिर सूर्य में ताप कहाँ से आता है,निश्चित ही उसके पीछे पराब्रह्माण्डीय महाशक्ति होगी। सविता देव की इस शक्ति को उन्होंने सावित्री नाम रखा। इस प्रकार सूर्य के माध्यम से आदिशक्ति की उपासना संपन्न हुई। बालकों में बुद्धि विकास हेतु - गायत्री मंत्र बुद्धि विकास हेतु ब्रह्मास्त्र है। एक गणेश रूद्राक्ष को गायत्री यंत्र के ऊपर रखें एवं तीन दिनों में 1100 बार मूल गायत्री मंत्र "ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्, भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।"  का जप करें। इसके बाद गणेश  रूद्राक्ष के ऊपर प्रतिदिन एक लालपुष्प (विषेशकर गुलाब का) अर्पित करते हुए गणेश गायत्री मंत्र "ॐ  एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो बुद्धि प्रचोदयात्।" मंत्र का 1100बार जप तीन दिन के अंदर संपन्न कर लें। जिस बालक के गले में यह रूद्राक्ष होगा, उसका बुद्धि पक्ष अत्यधिक विकसित हो जाएगा एवं शिक्षा से उसका समस्त प्रकार का उच्चाटन सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।        हकलाहट एवं अशुद्ध उच्चारण निवारण हेतु -कुछ लोगों में वाणी दोष होते हैं। बोलते-बोलते अटक जाना, अषुद्ध उच्चारण करना, भूल जाना आमतौर पर देखा जाता है। ऐसे लोगों के समस्या निवारण हेतु 3तीन मुखी रूद्राक्ष प्राण- प्रतिष्ठित  गायत्री यंत्र पर स्थापित करना चाहिए एवं ब्रह्म मुहूर्त में उठकर लगातार तीन दिन के भीतर 1100 बार वैदिक गायत्री मंत्र श्"ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्, भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।"  का जप कर लेना चाहिए। तत्पश्चात आने वाले तीन दिनों में उन्हें स्फटिक माला से सरस्वती गायत्री मंत्र "ॐ सरस्वत्यै च विद्महे, ब्रह्मपुत्रयै च धीमहि। तन्नो वाणि प्रचोदयात्।" का 1100 बार जप कर लेना चाहिए। प्रत्येक एक माला जप के पश्चात मिश्री मिश्रित शुद्ध जल की एक आचमनी रूद्राक्षों के ऊपर अर्पित कर देनी चाहिए। जप समाप्त होने के पश्चात तीनों तीन मुखी रूद्राक्षों को चांदी में मढ़वाकर कंठ में धारण कर लें। इस प्रकार कुछ ही दिनों में आपका वाणी दोष  सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।वाणी दोश निवारण हेतु एक अन्य प्रयोग -पीछे के पृष्ठों में मैंने जो 5वाँ सरस्वती मंत्र लिखा है, स्फटिक माला से एक 6मुखी रूद्राक्ष सामने रख कर 1100 बार या 2100बार जप कर किसी भी धागे में अथवा चेन में धारण कर लें। फिर जितना अधिक से अधिक हो सके इस मंत्र का जप करें। कम से कम 27 बार  अवष्य करें,तो स्वर विकार से मुक्ति मिलती है।श्री सरस्वती अष्टोत्तरशत नामावली(माता सरस्वती के 108नाम) 1.     ॐ  सरस्वत्यै नमः।2.     ॐ  महाभद्रायै नमः।3.     ॐ  महामायायै नमः।4.     ॐ  वरप्रदायै नमः।5.     ॐ  श्री प्रदायै नमः।6.     ॐ  पद्मनिलयायै नमः।7.     ॐ  पद्माक्ष्यै नमः।8.     ॐ  पद्मवक्त्रायै नमः।9.     ॐ  शिवानुजायै नमः।10.    ॐ  पुस्तकभृते नमः।11.    ॐ  ज्ञानमुद्रायै नमः।12.    ॐ  रमायै नमः।13.    ॐ  परायै नमः।14.    ॐ  कामरूपायै नमः।15.    ॐ  महाविद्यायै नमः।16.    ॐ  महापातकनाशिन्यै नमः।17.    ॐ  महाश्रयायै नमः।18.    ॐ  मालिन्यै नमः।19.    ॐ  महाभोगायै नमः।20.    ॐ  महाभुजायै नमः।21.    ॐ  महाभागायै नमः।22.    ॐ  महोत्साहायै नमः।23.    ॐ  दिव्यांगायै नमः।24.    ॐ  सुरवन्दितायै नमः।25.    ॐ  महाकाल्यै नमः।26.    ॐ  महापाषायै नमः।27.    ॐ  महाकारायै नमः।28.    ॐ  महांकुशायै नमः।29.    ॐ  पीतायै नमः।30.    ॐ  विमलायै नमः।31.    ॐ  विश्वायै नमः।32.    ॐ  विद्युन्मालायै नमः।33.    ॐ  वैष्णव्यै नमः।34.    ॐ  चन्द्रिकायै नमः।35.    ॐ  चन्द्रवदनायै नमः।36.    ॐ  चन्द्रलेखाविभूषितायै नमः।37.    ॐ  सावित्र्यै नमः।38.    ॐ  सुरसायै नमः।39.    ॐ  देव्यै नमः।40.    ॐ  दिव्यलंकारभूषितायै नमः।41.    ॐ  वाग्देव्यै नमः।42.    ॐ  वसुधायै नमः।43.    ॐ  तीव्रायै नमः।44.    ॐ  महाभद्रायै नमः।45.    ॐ  महाबलायै नमः।46.    ॐ  भोगदायै नमः।47.    ॐ  भारत्यै नमः।48.    ॐ  भामायै नमः।49.    ॐ  गोविन्दायै नमः।50.    ॐ  गोमत्यै नमः।51.    ॐ  शिवायै नमः।52.    ॐ  जटिलायै नमः।53.    ॐ  विन्ध्यवासायै नमः।54.    ॐ  विन्ध्याचलविराजितायै नमः।55.    ॐ  चण्डिकायै नमः।56.    ॐ  वैष्णव्यै नमः।57.    ॐ  ब्राह्मयै नमः।58.    ॐ  ब्रह्मज्ञानैकसाधनायै नमः।59.    ॐ  सौदामिन्यै नमः।60.    ॐ  सुधामूर्तये नमः।61.    ॐ  सुभद्रायै नमः।62.    ॐ  सुरपूजितायै नमः।63.    ॐ  सुवासिन्यै नमः। 64.    ॐ  सुनासायै नमः।65.    ॐ  विनिद्रायै नमः।66.    ॐ  पद्मलोचनायै नमः।67.    ॐ  विद्यारूपायै नमः।68.    ॐ  विशालाक्ष्यै नमः।69.    ॐ  ब्रह्मजायायै नमः।70.    ॐ  महाफलायै नमः।71.    ॐ  त्रयीमूर्तये नमः।।72.    ॐ  त्रिकालज्ञायै नमः।73.    ॐ  त्रिगुणायै नमः।74.    ॐ  शास्त्ररूपिण्यै नमः।75.    ॐ  शुम्भासुरप्रमथिन्यै नमः।76.    ॐ  षुभदायै नमः।77.    ॐ  स्वरात्मिकायै नमः।78.    ॐ  रक्तबीजनिहन्त्र्यै नमः।79.    ॐ  चामुण्डायै नमः।80.    ॐ  अम्बिकायै नमः।81.    ॐ  मुण्डकायप्रहरणायै नमः।82.    ॐ  धूम्रलोचनमर्दनायै नमः।83.    ॐ  सर्वदेवस्तुतायै नमः।84.    ॐ  सौम्यायै नमः।85.    ॐ  सुरासुरनमस्कृतायै नमः।86.    ॐ  कालरात्र्यै नमः।87.    ॐ  कलाधारायै नमः।88.    ॐ  रूपसौभाग्यदायिन्यै नमः।89.    ॐ  वाग्देव्यै नमः।90.    ॐ  वरारोहायै नमः।91.    ॐ  वाराह्यै नमः।92.    ॐ  वारिजासनायै नमः।93.    ॐ  चित्राम्बरायै नमः।94.    ॐ  चित्रगन्धायै नमः।95.    ॐ  चित्रमाल्यविभूशितायै नमः।96.    ॐ  कान्तायै नमः।97.    ॐ  कामप्रदायै नमः।98.    ॐ  वन्द्यायै नमः।99.    ॐ  विद्याधरसुपूजितायै नमः।100.   ॐ  श्वेताननायै नमः।101.   ॐ  नीलभुजायै नमः।102.   ॐ  चतुर्वर्गफलप्रदायै नमः।103.   ॐ   चतुराननसाम्राज्यायै नमः।104.   ॐ  रक्तमध्यायै नमः।105.   ॐ  निरंजनायै नमः।106.   ॐ  हंसासनायै नमः।107.   ॐ  नीलजंघायै नमः।108.   ॐ  ब्रह्मविष्णुशिवान्मिकायै नमः। श्री सरस्वती कवचम(विश्वविजय कवच)श्रीब्रह्मवैवर्त-पुराण के प्रकृतिखण्ड, अध्याय ४ में मुनिवर भगवान् नारायण ने मुनिवर नारदजी को बतलाया कि ‘विप्रेन्द्र ! सरस्वती का कवच विश्व पर विजय प्राप्त कराने वाला है। जगत्स्त्रष्टा ब्रह्मा ने गन्धमादन पर्वत पर भृगु के आग्रह से इसे इन्हें बताया था।’।।ब्रह्मोवाच।।श्रृणु वत्स प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वकामदम्। श्रुतिसारं श्रुतिसुखं श्रुत्युक्तं श्रुतिपूजितम्।।उक्तं कृष्णेन गोलोके मह्यं वृन्दावने वमे। रासेश्वरेण विभुना वै रासमण्डले।।अतीव गोपनीयं च कल्पवृक्षसमं परम्। अश्रुताद्भुतमन्त्राणां समूहैश्च समन्वितम्।।यद् धृत्वा भगवाञ्छुक्रः सर्वदैत्येषु पूजितः। यद् धृत्वा पठनाद् ब्रह्मन् बुद्धिमांश्च बृहस्पति।।पठणाद्धारणाद्वाग्मी कवीन्द्रो वाल्मिको मुनिः। स्वायम्भुवो मनुश्चैव यद् धृत्वा सर्वपूजितः।।कणादो गौतमः कण्वः पाणिनीः शाकटायनः। ग्रन्थं चकार यद् धृत्वा दक्षः कात्यायनः स्वयम्।।धृत्वा वेदविभागं च पुराणान्यखिलानि च। चकार लीलामात्रेण कृष्णद्वैपायनः स्वयम्।।शातातपश्च संवर्तो वसिष्ठश्च पराशरः। यद् धृत्वा पठनाद् ग्रन्थं याज्ञवल्क्यश्चकार सः।।ऋष्यश्रृंगो भरद्वाजश्चास्तीको देवलस्तथा। जैगीषव्योऽथ जाबालिर्यद् धृत्वा सर्वपूजिताः।।कचवस्यास्य विप्रेन्द्र ऋषिरेष प्रजापतिः। स्वयं च बृहतीच्छन्दो देवता शारदाम्बिका।।१सर्वतत्त्वपरिज्ञाने सर्वार्थसाधनेषु च। कवितासु च सर्वासु विनियोगः प्रकीर्तितः।।२श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा शिरो मे पातु सर्वतः। श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा भालं मे सर्वदावतु।।३ॐ सरस्वत्यै स्वाहेति श्रोत्रे पातु निरन्तरम्। ॐ श्रीं ह्रीं भारत्यै स्वाहा नेत्रयुग्मं सदावतु।।४ऐं ह्रीं वाग्वादिन्यै स्वाहा नासां मे सर्वतोऽवतु। ॐ ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा ओष्ठं सदावतु।।५ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्मयै स्वाहेति दन्तपङ्क्तीः सदावतु। ऐमित्येकाक्षरो मन्त्रो मम कण्ठं सदावतु।।६ॐ श्रीं ह्रीं पातु मे ग्रीवां स्कन्धौ मे श्रीं सदावतु। ॐ श्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा वक्षः सदावतु।।७ॐ ह्रीं विद्यास्वरुपायै स्वाहा मे पातु नाभिकाम्। ॐ ह्रीं ह्रीं वाण्यै स्वाहेति मम हस्तौ सदावतु।।८ॐ सर्ववर्णात्मिकायै पादयुग्मं सदावतु। ॐ वागधिष्ठातृदेव्यै सर्व सदावतु।।९ॐ सर्वकण्ठवासिन्यै स्वाहा प्राच्यां सदावतु। ॐ ह्रीं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहाग्निदिशि रक्षतु।।१०ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा। सततं मन्त्रराजोऽयं दक्षिणे मां सदावतु।।११ऐं ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरो मन्त्रो नैर्ऋत्यां मे सदावतु। कविजिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा मां वारुणेऽवतु।।१२ॐ सर्वाम्बिकायै स्वाहा वायव्ये मां सदावतु। ॐ ऐं श्रीं गद्यपद्यवासिन्यै स्वाहा मामुत्तरेऽवतु।।१३ऐं सर्वशास्त्रवासिन्यै स्वाहैशान्यां सदावतु। ॐ ह्रीं सर्वपूजितायै स्वाहा चोर्ध्वं सदावतु।।१४ऐं ह्रीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहाधो मां सदावतु। ॐ ग्रन्थबीजरुपायै स्वाहा मां सर्वतोऽवतु।।१५इति ते कथितं विप्र ब्रह्ममन्त्रौघविग्रहम्। इदं विश्वजयं नाम कवचं ब्रह्मरुपकम्।।पुरा श्रुतं धर्मवक्त्रात् पर्वते गन्धमादने। तव स्नेहान्मयाऽऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित्।।गुरुमभ्यर्च्य विधिवद् वस्त्रालंकारचन्दनैः। प्रणम्य दण्डवद् भूमौ कवचं धारयेत् सुधीः।।पञ्चलक्षजपैनैव सिद्धं तु कवचं भवेत्। यदि स्यात् सिद्धकवचो बृहस्पतिसमो भवेत्।।महावाग्मी कवीन्द्रश्च त्रैलोक्यविजयी भवेत्। शक्नोति सर्वे जेतुं स कवचस्य प्रसादतः।।इदं ते काण्वशाखोक्तं कथितं कवचं मुने। स्तोत्रं पूजाविधानं च ध्यानं वै वन्दनं तथा।।।।इति श्रीब्रह्मवैवर्ते ध्यानमन्त्रसहितं विश्वविजय-सरस्वतीकवचं सम्पूर्णम्।।(प्रकृतिखण्ड ४।६३-९१)   भावार्थः- ब्रह्माजी बोले - वत्स ! मैं सम्पूर्ण कामना पूर्ण करने वाला कवच कहता हूँ, सुनो ! यह श्रुतियों का सार, कान के लिये सुखप्रद, वेदों में प्रतिपादित एवं उनसे अनुमादित है। रासेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण गोलोक में विराजमान थे। वहीं वृन्दावन में रासमण्डल था। रास के अवसर पर उन प्रभु ने मुझे यह कवच सुनाया था।कल्प-वृक्ष की तुलना करने वाला यह कवच परम गोपनीय है। जिन्हें किसी ने नहीं सुना, वे अद्भुत मन्त्र इसमें सम्मिलित हैं। इसे धारण करने के प्रभाव से ही भगवान् शुक्राचार्य सम्पूर्ण दैत्यों के पूज्य बन सके। ब्रह्मन् ! बृहस्पति में इतनी बुद्धि का समावेश इस कवच की महिमा से ही हुआ है। वाल्मीकि मुनि सदा इसका पाठ और सरस्वती का ध्यान करते हैं। अतः उन्हें कवीन्द्र कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हो गया। वे भाषण करने में परम चतुर हो गये। इसे धारण करके स्वायम्भुव मनु ने सबसे पूजा प्राप्त की। कणाद, गौतम, कण्व, पाणिनी, शाकटायन, दक्ष और कात्यायन – इस कवच को धारण करके ही ग्रन्थों की रचना में सफल हुए। इसे धारण करके स्वयं कृष्णद्वैपायन व्यासदेव ने वेदों का प्रणयन किया। शातातप, संवर्त, वशिष्ठ, पराशर, याज्ञवल्क्य, ऋष्यश्रृंग, भारद्वाज, आस्तीक, देवल, जैगीषव्य और जाबालि ने इस कवच को धारण करके सबमें पूजित हो ग्रन्थों की रचना की थी। विप्रेन्द्र ! इस कवच के ऋषि प्रजापति हैं। स्वयं वृहती छन्द है। माता शारदा अधिष्ठात्री देवी है। अखिल तत्त्व-परिज्ञान-पूर्वक सम्पूर्ण अर्थ के साधन तथा समस्त कविताओं के प्रणयन एवं विवेचन में इसका प्रयोग किया जाता है।श्रीं-ह्रीं-स्वरुपिणी भगवती सरस्वती के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे सब ओर से मेरे सिर की रक्षा करें। ॐ श्रीं वाग्देवता के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे सदा मेरे ललाट की रक्षा करें। ॐ ह्रीं भगवती सरस्वती के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे निरन्तर कानों की रक्षा करें। ॐ श्रीं ह्रीं भारती के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे सदा मेरे दोनों नेत्रों की रक्षा करें। ऐं ह्रीं स्वरुपिणी वाग्वादिनी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे सब ओर से मेरी नासिका की रक्षा करें। ॐ ह्रीं विद्या की अधिष्ठात्री देवी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे होठ की रक्षा करें। ॐ श्रीं ह्रीं भगवती ब्राह्मी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे दन्त-पङ्क्ति की निरन्तर रक्षा करें। ‘ऐं’ यह देवी सरस्वती का एकाक्षर मन्त्र मेरे कण्ठ की सदा रक्षा करें। ॐ श्रीं ह्रीं मेरे गले की तथा श्रीं मेरे कंधों की सदा रक्षा करें। ॐ श्रीं विद्या की अधिष्ठात्री देवी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे सदा वक्षःस्थल की रक्षा करें। ॐ ह्रीम विद्या-स्वरुपा देवी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे मेरी नाभि की रक्षा करें। ॐ ह्रीं क्लीं-स्वरुपिणी देवी वाणी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे सदा मेरे हाथों की रक्षा करें। ॐ स्वरुपिणी भगवती सर्व-वर्णात्मिका के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे दोनों पैरों को सुरक्षित रखें। ॐ वाग् की अधिष्ठात्री देवी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे मेरे सर्वस्व की रक्षा करें। सबके कण्ठ में निवास करने वाली ॐ स्वरुपा देवी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे पूर्व दिशा में सदा मेरी रक्षा करें। जीभ के अग्र-भाग पर विराजने वाली ॐ ह्रीं-स्वरुपिणी देवी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे अग्निकोण में रक्षा करें। ‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा।’ इसको मन्त्रराज कहते हैं। यह इसी रुप में सदा विराजमान रहता है। यह निरन्तर मेरे दक्षिण भाग की रक्षा करें। ऐं ह्रीं श्रीं – यह त्र्यक्षर मन्त्र नैर्ऋत्यकोण में सदा मेरी रक्षा करे। कवि की जिह्वा के अग्रभाग पर रहनेवाली ॐ-स्वरुपिणी देवी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे वायव्य-कोण में सदा मेरी रक्षा करें। गद्य-पद्य में निवास करने वाली ॐ ऐं श्रींमयी देवी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करें। सम्पूर्ण शास्त्रों में विराजने वाली ऐं-स्वरुपिणी देवी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे ईशान-कोण में सदा मेरी रक्षा करें। ॐ ह्रीं-स्वरुपिणी सर्वपूजिता देवी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे ऊपर से मेरी रक्षा करें। पुस्तक में निवास करने वाली ऐं ह्रीं-स्वरुपिणी देवी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे मेरे निम्न भाग की रक्षा करें। ॐ स्वरुपिणी ग्रन्थ-बीज-स्वरुपा देवी के लिये श्रद्धा की आहुति दी जाती है, वे सब ओर से मेरी रक्षा करें। विप्र ! यह सरस्वती-कवच तुम्हें सुना दिया । असंख्य ब्रह्ममन्त्रों का यह मूर्तिमान् विग्रह है। ब्रह्मस्वरुप इस कवच को ‘विश्वजय’ कहते हैं। प्राचीन समय की बात है- गन्धमादन पर्वत पर पिता धर्मदेव के मुख से मुझे इसे सुनने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। तुम मेरे परम प्रिय हो। अतएव तुमसे मैंने  कहा है। तुम्हें अन्य किसी के सामने इसकी चर्चा नहीं करनी चाहिये। विद्वान् पुरुष को चाहिये कि वस्त्र, चन्दन और अलंकार आदि सामानों से विधि-पूर्वक गुरु की पूजा करके दण्ड की भाँति जमीन पर पड़कर उन्हें प्रणाम करे। तत्पश्चात् उनसे इस कवच का अध्ययन करके इसे हृदय में धारण करे। पाँच लाख जप करने के पश्चात् वह कवच सिद्ध हो जाता है। इस कवच के सिद्ध हो जाने पर पुरुष को बृहस्पति के समान पूर्ण योग्यता प्राप्त हो सकती है। इस कवच के प्रसाद से पुरुष भाषण करने में परम चतुर, कवियों का सम्राट् और त्रैलोक्य-विजयी हो सकता है। वहसबको जीतने में समर्थ होता है। मुने ! यह कवच कण्व-शाखा के अन्तर्गत है।                                                 -----अभिषेक कुमार(विद्यार्थी जीवन में पूजा करतेहु एवं भक्ति में लीन श्री अभिषेक कुमार)
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यह राम कौन हैं : मैं न जिऊँ बिन राम
यह राम कौन हैं : मैं न जिऊँ बिन राम  Guru Mahima GURU MAHIMA  #BLOG #EDUCRATSWEB | In this article, you can see photos & images. Moreover, you can see new wallpapers, pics, images, and pictures for free download. On top of that, you can see other  pictures & photos for download. For more images visit my website and download photos.
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यह राम कौन हैं : मैं न जिऊँ बिन राम पूजन की संपूर्णता पूजा से होती है। पूजा करने में यदि कोई अभाव रह जाता है, तो उसे परिक्रमा कर लेने से पूर्ण मान लेते हैं। यानि कानि पापानि......नश्यन्ति प्रदक्षिणां पदे पदे। पूज्य महाराज श्री द्वारिकाधीश्वर पीठाधीश्वर आदि शंकराचार्य के परावतार स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी ने नवम्बर 2006 में राम जन्मभूमि की परिक्रमा करने की उद्घोषणा की तो पूरे राष्ट्र में एक खलबली सी मची। किसी ने उसे किसी राजनीतिक पार्टी की नई चाल समझा तो किसी ने राजनीति से उकताए और धर्म की लगातार अवमानना से क्षुब्ध संत समाज का आक्रोश बताया। किसी और मंदिर की परिक्रमा करने की बात होती तो शायद बात इतनी तेजी से न फैलती। राम जन्मभूमि के मुद्दे पर यह खबर खर-पतवार में लगी आग की तरह तेजी से यहाँ से वहाँ तक फैलती चली गयी। मेरे मन में सोए राम ने भी अंगड़ाई लेते हुए आँखंे खोल दी। मैंने मन से पूछा आखिर ये राम कौन हैं, जो इतने विवादित भी हैं और निर्विवादित सत्य की पहचान भी। कोई रोम-रोम से छटककर अलग करने पर तुला है तो किसी की साँस उसी के नाम पर उठती-गिरती है।क्रौंच वध से उद्वेलित  महर्षि वाल्मीकी को देववाणी हुई कि रामकथा लिखो तो दूसरी ओर सनातन मान्यता के अनुसार पूरा युग राम के नाम हो गया। उस युग में ब्रह्मस्वरूप राम ने नर लीला की। तरह-तरह के संघर्ष किए, राक्षसों का वध और स्वराज की स्थापना की। अपने युग से आज तक उनकी लीला अनवरत चल रही है। गली-मोहल्लों से लेकर गाँव,  शहर, सिनेमा और अंतरर्राष्ट्रीय महोत्सवों तक। स्थूल से लेकर सूक्ष्म तक, जीवन से लेकर मरण तक। न जाने कैसा है यह राम तत्व जो इतने विवादों, अस्वीकारों के बाद भी और गहराई से जड़ें जमाता जाता है। इतनी गहरी कि विरोधियों को भी उसे उखाड़ने के प्रयास में झुकना ही पड़ता है। वैसे भी किसी वस्तु को समूल उखाड़ने के लिए पहले उसके सामने झुकना ही पड़ता है और झुकते ही न जाने कौन-सा जादू होता है कि आदमी बिछ जाता है राम के चरणों में। स्थूल काया नतमस्तक हो न हो, लेकिन अंतरआत्मा नतमस्तक हो जाती है। पृथ्वी की तरह उनका गुरुत्वाकर्षण अपनी ओर खींच ही लेता है। हर युग की प्रजा के साथ राजाओं-महाराजाओं को अपनी ओर खींचा राम तत्व ने।तुलसी बाबा लाख विसंगतियों के बीच भी राम के दास बने फिरते रहे और चित्रकूट के घाट पर उन्हीं के द्वारा घिसे चंदन का तिलक लगाकर रघुवीर ने उन्हें संतों और विद्वानों के तारामंडल में चंद्रमा की तरह सजाकर रख दिया। तुलसी बाबा की तरह ही कबीर आए। एक स्वर में उन्होंने ललकारा हिंदुओं को पाखंड के लिए तो मुसलमानों को कट्टरता के लिए। किसी ने बुरा नहीं माना, बल्कि मृत्यु के बाद उनके पार्थिव शरीर को लेकर दोनों वर्गों के शिष्यों में झगड़ा-टंटा अवश्य हुआ। उन निर्गुनिया कबीर को भी पी के रूप में राम ही भा गए। राम की बहुरिया बन पूर्णता प्राप्त की उन्होंने। उन्होंने ‘फूटा कुंभ जल जल ही समाना’ के द्वारा आत्मा-परमात्मा, जीव और ब्रह्म का अद्वैत स्थापित किया। ‘कस्तूरी कुंडल बसै मृग ढूंढे वनमाहिं, ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखे नाहिं।’ वस्तुतः कबीर के लिए राम परब्रह्म के पर्याय हैं। इसे पौराणिक काल का प्रभाव कहा जा सकता है, क्योंकि पुराणों में परब्रह्म के अवतार के रूप में राम की प्रतिष्ठा हुई है। ‘आध्यात्म रामायण’ के अनुसार जिसमें सभी देवता रमण करें, यानि परमशक्ति, एक सत्य, वही राम है।ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी द्वारा संवत 2020 (वसंत पंचमी) में प्रकाशित ‘हिंदी साहित्य कोश’ में राम और रामकथा साहित्य के विकास की एक विस्तृत व्याख्या की गयी है। इसके अनुसार वैदिक काल के पश्चात् संभवतः छठी शताब्दी ईसा पूर्व में इक्ष्वाकु वंश के सूत्रों के द्वारा ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर रामकथा विषयक गाथाओं की सृष्टि होने लगी थी। आदि कवि महर्षि वाल्मीकी ने इन आख्यानों के आधार पर एक विस्तृत प्रबंध काव्य की रचाना की। अवतारवाद की भावना सर्वप्रथम ‘शतपथ ब्राह्मण’ में दिखाई पड़ती है।आगे चलकर रामकथा की लोकप्रियता को ध्यान में रखकर बौद्धों और जैनियों ने भी अपने-अपने धर्म में इसे महत्वपूर्ण स्थान दिया है। बौद्ध धर्म में दशरथ जातकम, अनामकं जातकम् तथा दशरथ कथानकम् जैसे जातक साहित्य में राम को बोधिसत्व मानकर रामकथा को स्थापित किया गया। जैन धर्म में बौद्ध धर्म की अपेक्षा अधिक समय तक रामकथा की लोकप्रियता परिलक्षित होती है। विमल सूरी ने सर्वप्रथम इस्वी सन् की तीसरी शताब्दी में प्राकृत भाषा में ‘पउम चरिय’ लिखा। बाद में इसका संस्कृत रूपांतरण ‘पद्मचरित’ नाम से विख्यात हुआ। हेमचंद्र कृत ‘जैन रामायण, जिनदास कृत राम पुराण, कन्नड़ भाषामें नागचंद्र कृत पम्प रामायण, देवप्प कृत राम विजय चरित आदि साहित्य प्रतिष्ठित हुए। राम चरित को लेकर संस्कृत, प्राकृत तथा कन्नड़ में अनेक ग्रंथों की रचना हुई। उत्तर से लेकर दक्षिण तक,पूर्व से लेकर पश्चिम तक अनेक भाषाओं में रामकथा विषयक प्राचीन और अर्वाचीन साहित्य उपलब्ध होता है। विदेशों में रामकथा का का प्रसार बौद्धों द्वारा भी हुआ। ‘अनामकं जातकम्’ तथा दशरथ कथानकम का चीनी भाषा में अनुवाद हुआ। उसके बाद संभवतः आठवीं शताब्दी ईस्वी में तिब्बती रामायण की रचना हुई। खोतानी रामायण का काल निर्धारण लगभग नवीं शताब्दी ईस्वी का है और यह पूर्वी तुर्किस्तान से संबद्ध है। कंबोडिया में रामकेति (16वीं शताब्दी इस्वी) तथा ब्रह्मदेश में यू टो ने राम यागन की रचना हुई, जो एक महत्वपूर्ण काव्यग्रंथ माना जाता है। स्पष्ट है कि विश्व साहित्य के इतिहास में ऐसा अन्य कोई चरित्र दिखाई नहीं पड़ता, जो वैश्विक स्तर पर जनमानस से लेकर साहित्य तक को आच्छादित कर सके। राम और उनका उत्कर्ष आज तक वैसे ही अक्षुण्ण है।राम के विराट रूप को पूर्णतया देख सकने में असमर्थ आँखें झिप जाती हैं। झिपती हैं तो पुनः अपने आस-पास देखने का व्यापार शुरू हो जाता है। 40 वर्ष पहले के अपने बचपन की स्मृति में रामलीला शुरू हो जाती है। शाम से ही खाना जल्दी बनाकर ताई जी की छत से रामलीला देखने की माँ की हड़बड़ी और हमारा उल्लास आज के चाकचिक वाले डिब्बानुमा यंत्र में कहीं खो गया है, लेकिन उस डिब्बे का भी काम रामलीला के बिना नहीं चलता। माँ ताई जी की छत पर अपनी संगिनियों के साथ बैठ जातीं और हम बच्चे रामलीला मंच के आगे भूमि पर आसपास पड़ी ईट को पीढ़ा बनाकर बैठ जाते। एकटक मुँह खोले उत्सुकता से फुलवारी, धनुष यज्ञ, स्वयंवर, दशरथ विलाप, वनवास से लेकर रावण वध और अयोध्या तक लौटने का प्रसंग प्रतिदिन किसी नेमी धर्मी गंगा स्नानार्थी की तरह देखा करते। उनमें से ही राम सीता बने बच्चे कुछ विशेष हो उठते। चमकीली या गेरुआ पोशाक पहने, सिर पर नकली ही सही, चमकता मुकुट, चेहरे का साज-संवार हमें लुभाता। राम बनकर सबका दिल जीत लेने की इच्छा मन में अंगड़ाई लेती, लेकिन राम तो कोई एक ही बन सकता है। समूचे गाँव, कस्बे या मोहल्ले के बच्चे तो राम बनकर मंच पर नहीं उतर सकते। मन मसोसकर रह जाता।....... वह मसोस आज तक जारी है। हम राम बनना चाहते हैं, लेकिन कहाँ से लाएं, वह विराट स्वरूप, हृदय की वह विशालता। राम को अंतस में उतार ही लें, तो काम सध जाए, लेकिन भीतर के अंधेरे में वह श्यामलता फिसल-फिसल जाती है। राम की तरह राजपाट छोड़ने के नाम पर अकिंचन हो हम बिसूरने लगते हैं। क्या है हमारे पास। एक मैं तो छूटता नहीं, धन-जन की बात क्या। उसी मैं का साम्राज्य लिए जीवन भर भटकता मन अंत में राम की शरण में आता है। राम स्वयं न स्वीकारें, उस मैं के साम्राज्य को, तो अपनी चरण रज ही दे दें। उससे भी यह साम्राज्य नियंत्रित हो लेगा।कभी-कभी सोचती हूँ तो आश्चर्य होता है। साम्राज्य हथियाने के नाम पर नाना प्रकार के कपट, छल, छुरा भोंकने का इतिहास और वर्तमान सामने है। ऐसे में किसी कालखंड के साम्राज्य में एक जोड़ी खड़ाउं ने 14 वर्षों तक शासन किया हो, प्रजा मंे कहींसे असंतोष या छल-छद्म की एक चिंगारी भी न फूटी हो, यह विस्मित करने वाली घटना है। यह बात पृथक है कि परवर्ती और आधुनिक युग में उसी सुशासन के नाम पर, उसकी सत्यता और उस सत्य को भेदने के चक्कर में कई-कई ज्वालामुखी फोड़ने का प्रयास किया जाता रहा है, लेकिन वह अपनी ही हवा में चकरघिन्नी की तरह उड़कर शीतल लावा बन बह जाता है। सत्ता के गलियारों और धर्म नेताओं के नारों से परे केवल लेखकर वर्ग के बीच ऐसे ही न जाने कितने तथाकथित ज्वालामुखियों से वास्ता पड़ता रहता है। नासा के वैज्ञानिकों ने श्रीराम सेतु का अंतरिक्ष से चित्र लिया और अपनी परख के बाद उसे लगभग 17 लाख वर्ष पुराना घोषित किया। एक वक्री पथिक लेखक ने तुरंत अपनी दृष्टि प्रस्तुत करने का प्रयास करते हुए एक दैनिक अखबार में लेख लिखा कि यह सेतु राम के द्वारा निर्मित नहीं, बल्कि समुद्र के भीतर की भौगोलिक संरचना का परिणाम है। मानो पीढ़ियों से वो राम के खानदान के पट्टीदार रहे हैं और आज उनके अस्तित्व को खारिज करने का सुनहरा मौका हाथ लग गया है।वामपंथ का झोला ढोने वाले एक ऐसे ही देव तुल्य देवनाम मेरे घर आए। छिड़ते-छिड़ते चर्चा राम पर टिकनी थी, सो टिक गई। आरएसएस के राम और विहिप के राम का निंदा पुराण शुरू हुआ। मैंने विनम्रतापूर्वक दोनों ही संगठनों के हाथों से राम नाम की गठरी छीनकर उनके हाथों में थमाने की कोशिश की। ‘छोड़िए देवता, लीजिए ये रहे आपके राम। अब तो मानेंगे। उन्हें अपने हाथों में थमे आधुनिक हल्के झोले की चिंता हुई। इसे छोड़ राम नाम की इतनी भारी गठरी कैसे संभालें। फिर आगे चलने वाले उनके झंडाबरदार, कितनी लानत-मलामत भेजेंगे उनके नाम। तपाक से उनका बचकाना तर्क गूंजा-क्या प्रमाण है कि इसी अयोध्या में राम का जन्म हुआ था। मैं उनके भी जन्म पर सशंकित होते हुए बस इतना ही कह सकी कि विश्व में कहीं भी सरयू के किनारे अयोध्या का भूगोल आपने पढ़ा हो, तो चलिए वहीं के लिए राम जन्मभूमि का दावा ठोक दें। निरुत्तर से कुछ देर वे इधर-उधर देखते रहे और बड़ी उपेक्षा से अपने शास्त्रीय ज्ञान की अल्पज्ञता प्रकट की। मुझे आश्चर्य हुआ कि जिन्हें ग्रंथों से इतनी अरुचि है, वे खंडन-मंडन के शास्त्रार्थ में दिलचस्पी क्यों लेते हैं। राम को ही खारिज करने की इतनी उठा-पटक क्यों! दूसरे धर्म प्रवर्तकों की क्यों नहीं। फिर एक बार खारिज कर दिया तो कर दिया, बार-बार उस पर हाय तौबा, चीखना-चिल्लाना जारी रखने का क्या मतलब। एक चिरनवीन स्मृति की तरह राम बार-बार क्यों कौंध उठते हैं। एक दुःखद घटना के उदाहरण से ही संपुष्टि कर देती हूँ। एक वरिष्ठ जनवादी आलोचक के युवा पुत्र का असमय निधन हो गया। अर्थी उठाकर लोग चलने लगे तो दुःख के कारण किसी के कोई बोल नहीं फूटे। एकाएक बिलखते हुए पिता ने कंधा देते दूसरे लोगों से कहा, ‘अरे राम नाम तो बोलो, और स्वयं फूट-फूट कर रोने लगे।हर ऐसी घटना के बाद मन में यही आकुलता होती है-आखिर यह राम कौन है। क्यों इनके बिना जीवन, जीवन नहीं होता। मरण अनंत यात्रा का द्वार नहीं बन पाता।अभी हाल ही में एक समाचार पढ़ने को  मिला। जौनपुर जिले में कुछ लोगों को बहला-फुसला कर धर्मान्तरित किया गया और अनुष्ठान के रूप में राम, विष्णु आदि के चित्र कुएं में डलवाए गए। राम के चित्र के साथ उनके अस्तित्व को भी कुएं में डुबोने की बचकानी कोशिशों पर हंसी आई। पत्थर को अपने स्पर्श से तार देने वाले राम, समुद्र में अपने प्रताप से बड़ी-बड़ी शिलाओं को तैरा देने वाले राम, सागर को सोख लेने, वन्य जीव-जंतुओं को वश में करके संगठित करने वाले राम और भी न जाने कितने अद्भुत कारनामों से मिथक बने राम के चित्र को उन लोगों ने अपने हिसाब से कुएं में डुबो देने का काम किया और सोचा कि अब उनका स्मरण भी कोई नहीं कर पाएगा। इस तरह अपनी स्मृति को भी कुएं में डुबो देने का व्यापार हुआ ताकि अंधे कुएं से राम की स्मृति भी बाहर न आ सके। स्मृति समाप्त- राम समाप्त यानी राम को समाप्त करने के लिए अपनी स्मृति को पहले समाप्त करना होता है। स्मृति यानी मस्तिष्क का वह महत्वपूर्ण कोना जिससे हम होते हैं, संसार से नाता होता है, नाते-रिश्तेदार होते हैं और होता है हमारा जीवन चक्र। उसी स्मृति के नष्ट होते ही सब कुछ पार्थिव हो जाता है।एक कथा याद आती है। एक असाध्य रोग से पीड़ित व्यक्ति डॉक्टर के पास गया। बड़े विश्वास के साथ आए उस रोगी को देखकर डॉक्टर दुविधा में पड़ गया। कैसे कहें कि असाध्य रोग ठीक नहीं होगा और यह भी कैसा होगा कि उसका विश्वास एक झटके में तोड़ दें। अंततः डॉक्टर ने कुछ दवाइयाँ लिखीं और परहेज में दवा खाते समय शेर की याद न करने का मशविरा दिया। परिणाम हुआ कि हर दिन दवा खाते समय परहेज के साथ शेर का स्मरण होने ही लगा। इस तरह परहेज करने वालों के लिए दुर्निवार हो उठते हैं राम! झुठलाने और मिथ्या साबित करने की तमाम कोशिशें अपने आप खारिज होती जाती हैं। यह तो परहेजी लोगों के राम की दुर्निवार स्मृति है।भारत में एक बड़ा वर्ग अपने नाम के आगे बड़े गर्व से राम जोड़ता है। रामअवतार, रामधारी, रामवचन, रामदास, रामउजागर, रामदुलार, रामसागर जैसे अनेक नामों में यदि राम पहले ही जुड़ जाते हैं तो बाद में जाति के जुड़ने की गुंजाइश बनी रहती है। लेकिन नाम के बाद राम की उपस्थिति इन सारी कृत्रिमताओं को परे धकेल देती है। गांव की जोखू कक्का बो अक्सार अपने पति को याद करते हुए बतातीं-हमरे राम परेदस गए हैं, कमाए खातिर’ और बताते-बताते आंखें पनीली हो उठतीं, जिन्हें चुपके से वो साड़ी के कोर से पोछ लेतीं। मैं मुठ्ठी भर उन अत्याधुनिक महिलाओं की बात नहीं करती, जिनके पति उनके लिए राम नहीं, बल्कि हसबैंड से भी आगे पार्टनर हो गए हैं अथवा उन दुखियारी महिलाओं की भी बातें नहीं करती, जिनके राम रावण से भी बदतर आचरण करने लगे हैं, लेकिन अधिकांश मध्य एवं निम्न मध्यवर्गीय तथा अनाधुनिक भारतीय स्त्रियों के लिए पति राम होते हैं। अपने श्रद्धेय बप्पा (ससुर जी) के निधन के उपरांत सबकी कोशिश यही रहती है कि अम्मा (सासू माँ) अकेलापन न महसूस करने पाएं। इसलिए बारी-बारी से कोई न कोई उनके आसपास बना रहता। एक दिन अम्मा चारपाई पर लेटे-लेटे आकाश की ओर निर्निमेष देख रही थीं। हमारी उपस्थिति से बेखबर उनके होठ भजन गुनगुना रहे थे-‘जलि जाए इ देहियां राम बिन।’ हमारी आँखें छलछला आई थी। राम के बिना जीवन के व्यर्थता का बोध का यह सहज उद्घाटन क्या किसी शास्त्रीय ज्ञान या वाद-विवाद का मुखापेक्षी है। पति यानी राम, राम यानी जीवन, प्राणशक्ति, जिसके बिना इस जीवन का कोई अर्थ नहीं है। कोई कह सकता है कि यह सत्य केवल भारतीय नारी का सत्य है, पश्चिमी नारी का नहीं। मेरी भी अस्वीकृति नहीं है, इससे। राम भी तो हर उस मन का सत्य है, जो भारतीय है, भारत से जुड़ाव रखता है। इसलिए शास्त्रों और मंत्रों से परे अपढ़ जन भी ‘रामहि राम रटन करु जीभिया रे’ गुनगुनाता है। जन-जन की जिह्वा पर बसे राम, जन-जन के प्राण राम, जिनके लिए भरत के मुख से भी निकल जाता है, ‘जननी मैं न जिऊं बिन राम।’राम केवल राजा होते, न्यायी होते, सदाचारी होते, धर्म प्रवर्तक होते, तो शायद इतिहास के इतने लंबे अंतराल को पार कर उनकी स्मृति भी अन्य राजाओं, महाराजाओं या न्यायप्रिय सदाचारियों, धर्माचार्यों की तरह आज तक क्षीण हो चुकी होती। मात्र इतिहास बनकर रह गए होते वे भी, लेकिन राम इतिहास नहीं हैं। हर पलांत के वर्तमान हैं, मानवमात्र की जीवनी शक्ति हैं वे। धर्म का कोई अपना पंथ न चलाते हुए भी धर्म का आदि और अंत बने हैं। स्थूल रूप में अपने युग में नरलीला करते हुए भी अतीत नहीं हैं, वर्तमान हैं। हर प्राणी के संग हैं, प्राण हैं, इसलिए झुठलाए नहीं जा सकते। अपनी ही पहचान, हमारे राम की पहचान है। जब तक हम स्वयं को जानने का प्रयास नहीं करते, तब तक राम भी हमसे अपरिचित बने मुस्कुराते रहते हैं। ज्योंहि हमारा स्वयं से परिचय होना शुरू होता है, वे हमारे हो जाते हैं और हम उनके। कहीं कोई भेद शेष नहीं रहता। यह अभेद ही राम है। रामभाव का जागृत होना ही राम का भव्य मंदिर बनने का प्रारंभ है।                        --- नीरजा माधव (यह राम कौन हैं-पुस्तक की लेखिका)श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपालदास के हाथों अयोध्या में एक वर्ष पूर्व लोकार्पित हुई थी लेखिका की बहुचर्चित पुस्तक ‘यह राम कौन हैं?’ - यहाँ उसी पुस्तक का कुछ अंश प्रस्तुत किया गया है।नोट :- लेखिका के द्वारा लिखा गया यह लेख मुझे बहुत अच्छा लगा. इसलिए मैंने अपने सभी पाठकों को भगवान् राम पर लिखी गयी यह अनमोल रचना बार-बार पढने हेतु अपने ब्लॉग पर शामिल करना उचित समझा और इसे टाइप करके ज्यों का त्यों यहाँ रख दिया. यह लेख दैनिक जागरण समाचार पत्र में दिनांक 11 नवम्बर २०१९ (सोमवार) के अंक में प्रकाशित हुआ था.मेरे द्वारा किया गया यह कार्य आपको कैसा लगा, कृपा कर अपने महत्वपूर्ण विचारों से जरुर अवगत करायेंगे.
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चौसठ योगिनी रूद्र महाप्रयोगम : मन्त्र पाठ
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चौसठ योगिनी एवं एकादश रूद्र महाप्रयोगम : मंत्र पाठ
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गुप्त नवरात्री माहात्म्य
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गुप्त नवरात्री माहात्म्य और वाराही साधना 
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हिन्दू धर्म की महिमा
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।। ॐ नमश्चण्डिकायै।।।। या देवि सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नमः।।आओ हम विश्व के सबसे महान एवं प्राचीन धर्म सत्य सनातन हिन्दु धर्म में सम्मिलित हों।मित्रों,      विश्व में सनातन धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म है, जो एकांगी न होकर बहुरंगी है। इसमें जीवन का हर रंग है। यह परमेश्वर के किसी एक स्वरुप में न अटककर उनके सभी स्वरुप की व्याख्या करता है। इस धर्म को चलाने वाला कोई तथाकथित ईश्वर का पुत्र, गुरू, ज्ञानी मानव या देवदूत या पैगम्बर न होकर स्वयं ईश्वर द्वारा रचित है। यह धर्म प्रकृति के प्रत्येक तत्व में ईश्वर के दर्शन करता है। इस सनातन धर्म में धर्म के नाम पर कोई अंर्तकलह नहीं है। जबकि विश्व के अन्य सभी धर्म स्वयं अपनी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर अंर्तकलह से ग्रसित हैं।इस्लाम में शिया-सुन्नी विवाद, क्रिष्चियन (इसाइयों) में कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेंट मान्यताओं के आधार पर विवाद तथा बौद्धों में हीनयान, महायान एवं वज्रयान उपासना पद्धति के आधार पर विवाद जग-जाहिर है। वर्तमान में सिक्ख धर्म में अकाल तख्त एवं डेरा सच्चा सौदा का विवाद केवल मान्यताओं के आधार पर हिंसक स्वरूप ग्रहण करता जा रहा है। हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए निर्मित सिक्ख धर्म आज खुद अनेक भागों में विभाजित है। कोई अकाली सिक्ख है, तो कोई नामधारी, कोई मुण्डा इत्यादि। देहधारी गुरू हो या ना हो, इसी विवाद में अटके हुए हैं। जब शरीर में ही अटके रहोगे, शरीर से ही मोह नहीं छूटेगा, परमेश्वर को कहाँ से प्राप्त कर पाओगे।बौद्ध धर्म आज भटक चुका है। इसका वज्रयान समुदाय तंत्र-मंत्र एवं कर्मकाण्ड तथा हिन्दु देवी देवता को पूरी तरह अपना चुका है, जिसका बुद्ध ने स्वयं विरोध किया था और अन्य लोग अम्बेडकरवाद से ग्रसित हो गए हैं। भारत के सभी दलितों को बौद्ध धर्म में दीक्षित करना ही इनका एकमात्र उद्देश्य रह गया है और न जाने ये कौन-सा सुख दिला देंगे। जैन धर्म तो धर्म की इतनी अव्यावहारिक व्याख्या करता है कि इनके अनुसार कृषि कर्म भी पाप है, त्याज्य है। क्योंकि कृषि करने से कुछ कीड़े मरते हैं। भूखे रहोगे तो जीओगे कैसे? भूख से शरीर सुखा लेने को ये मुक्ति का मार्ग समझते हैं। इस्लाम की कट्टरता जगजाहिर है। जो इनके कुरआन को नहीं मानता है, वह काफिर है, अर्थात् ईश्वर से हीन है, गुनाहगार है और उन्हें मार देने से इन्हें जन्नत प्राप्त होती है। स्त्रियों का शोषण जबरदस्त है इसमें और ये जहाँ भी गए वहाँ आतंक ही फैला एवं भयंकर रक्तपात हुआ।इसाइयों के अनुसार ईसामसीह ने जगत के सारे पाप क्षमा करने का ठेका ले रखा है। तो ठीक है, कुछ हत्या वगैरह करके इसाई बन जाओ। जब परमेश्वर की अदालत में दंड नहीं मिलेगा, तो यहाँ की अदालत से भी दण्ड नहीं मिलना चाहिए।जबकि इन सबसे अलग हट के हमारा सनातन धर्म ईश्वर के सभी स्वरुप में विश्वास  करता है। हमारे अनुसार ईश्वर निर्गुण भी है, तो सगुण भी। जगत् के कल्याण हेतु निर्गुण परब्रह्म ही सगुण रूप धारण करते हैं। हमने नदियों की कल-कल में, समुद्र की लहरों में, झरनों के गर्जन में, सूर्य की किरणों में, चंद्रमा की शीतल चांदनी सभी में ईश्वर के स्वरूप की झाँकी देखी है। हमारे यहाँ कोई अंतर्विरोध नहीं है। हमारा ईश्वर किसी एक किताब में सिमट के नहीं रह गया है। वह सभी के दिलों में निवास करता है। क्योंकि हमने जाना है, "हरि अनंत हरि कथा अनंता"। ईश्वर के महिमा, उसके स्वरुप को किताब के कुछ पन्नों में कैसे समेटा जा सकता है। उसकी तो हर युग में हर समय में व्याख्या होगी।  हमारे धर्म में जीवन के प्रत्येक तत्व मौजूद हैं। इसमें अगर दुर्गा की तेजस्विता है, तो काली की विकरालता, हनुमान का अतुलित बल, शौर्य एवं तेज है, तो गणपति की माता-पिता रूपी परब्रह्म के चरणों में अगाध श्रद्धा और बुद्धि, सूर्य का प्रचंड तेज है, तो चंद्रमा की शीतल  चांदनी, राम और सीता की मर्यादा तथा त्याग की प्रतिमूर्ति तो राधा-कृष्ण का प्रेम माधुर्य भी। हमने शिव की तरह समाज के दिए विष को पीना भी सिखाया है, तो गणपति की तरह आनंदपूर्ण जीवन की प्राप्ति भी। यहाँ लक्ष्मी का ममतामयी वरदायिनी स्वरूप उपस्थित है, तो बगलामुखी की तरह शत्रुओं को चूर्ण करने की भी शक्ति है। अगर यहाँ देवी उमा, सावित्री एवं अनुसूया का महान सतीत्व है, तो मदहोश करने वाला अप्सराओं का मादक सौन्दर्य भी। हमने त्रिपुरसुन्दरी के महासौन्दर्य का भी दर्शन किया है, तो गायत्री की शक्ति से ब्रह्मज्ञान भी प्राप्त किया है। हमने ही संसार को सर्वप्रथम 'सत्यमेव जयते' कहना सिखाया है। हमारे यहाँ कोई खास व्यक्ति ईश्वर पुत्र न होकर प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर का पुत्र है। यहाँ डमरू का घोर निनाद है, तो वंशी की मधुर धुन भी। यहाँ शिव का ताण्डव है, तो जगदम्बा का लास नृत्य भी। अगर हमने 'अहिंसा परमो धर्मः' का उद्घोष किया है, तो रक्तबीज और महिषासुर जैसे मानवता का परम शत्रु के रक्त का एक-एक बूंद भी पीया है। हमने अति प्राचीन काल में ही समुद्र को लांघ लिया था, तो पर्वतों की ऊँचाइया भी दुर्लंध्य नहीं। अगर हमने आत्मा के दर्षन किये हैं, तो शरीर भी त्याज्य नहीं। संसार का सबसे प्राचीन चिकित्सा शास्त्र हमने ही प्रदान किया है। निष्काम कर्म के सिद्धांत की व्याख्या सारे संसार को हमने ही सर्वप्रथम गीता के माध्यम से सिखाया था। उपनिषदों का महान आत्मदर्शन रूपी गुह्य ज्ञान प्रस्तुत किया था, तो हजार श्लोको वाला कामशास्त्र भी यहाँ ही रचा गया था।अगर यहाँ शिव का परम ब्रह्माण्डीय ज्ञान है, तो कृष्ण के कर्म का सिद्धांत भी है। अगर हमने छिन्नमस्तिका की तरह महान आत्मोत्सर्ग एवं त्याग सिखा है, तो कामाख्या के माध्यम से कुल की रचना भी की है। तो ऐसे महान धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म के चक्कर में क्यों पड़े हैं?तो आओ विश्व के इस सबसे महान धर्म को स्वीकार करें।नोटः- जहाँ पर हम शब्द आया है, उसे संपूर्ण हिन्दु धर्म का द्योतक समझा जाए।लेखक :- श्री अभिषेक कुमार 
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तांत्रोक्त वनस्पति
तांत्रोक्त वनस्पति  Guru Mahima GURU MAHIMA  #BLOG #EDUCRATSWEB | In this article, you can see photos & images. Moreover, you can see new wallpapers, pics, images, and pictures for free download. On top of that, you can see other  pictures & photos for download. For more images visit my website and download photos.
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तांत्रोक्त वनस्पति आध्यात्म के अनेक रूप है, अनेक पहलू है. हर किसी से आध्यात्म का विशुद्ध रूप संभवनहीं है. इस पुस्तक में जन-सामान्य के लिए छोटे-छोटे वैसे प्रयोग सम्मिलित किये गए है, जो हमारे आस-पास आसानी से उपलब्ध है. इन छोटे टोटको का उपयोग व्यक्ति अपनी सामान्य समस्याओ के समाधान के लिए वैसी परिस्थिति में करते है, जब जिंदगी के सामान्य नियमो से काम नहीं चलते, उसका उपाय नहीं मिलता है. इससे पहले मैंने अपने इसी वेब-साईट पर एक साल पहले अपने द्वारा संकलित एक और किताब प्रकाशित की थी--- ''सुलभ सामग्री दुर्लभ प्रयोग". लोगो ने इसे हाथो-हाथ लिया. अब तक हजारो व्यक्ति इसे पढ़ चुके हैं. ये किताब उसी की एक कड़ी है, विस्तार है. इसमें प्रत्येक वनस्पतियो के तंत्र प्रयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी गयी है. इसके बारे में भी मै बिलकुल स्पष्ट कर दूं कि उस किताब की तरह ये भी मेरी कोई स्वतंत्र रचना नहीं बल्कि एक संकलन मात्र है. चूँकि पहली पुस्तक ''सुलभ सामग्री : दुर्लभ प्रयोग" लोगो को इतनी अच्छी लगी कि उसकी मांग बढ़ गयी. मेरे ऑफिस का एक मित्र इतना उस पुस्तक पर लोभित हुआ कि उसने वह पुस्तक मुझसे मांग ली और लौटाने में आना-कानी करने लगा. उससे भी यह पुस्तक दूसरी प्रति खरीद कर देने का वादा किया तब मुझे मेरे पुस्तक वापस मिली. लेकिन वह पुस्तक नहीं मिलनी थी सो नहीं मिली. उसी पुस्तक को खोजने के क्रम में पुस्तक विक्रेता की दुकान में यह किताब "तांत्रोक्त वनस्पति" मुझे प्राप्त हुई. ये भी किताब बहुत अच्छा लगा. अतः सभी पाठक वृन्दो के लिए इसे भी मैंने टाइप कर लिया और अब आप सभी तंत्र प्रेमी लोगो के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ.चलते-चलते यूं ही खो जाता हूँ मै. चलते-चलते ये किताब भी वैसे ही मिल गयी थी. गया था कुछ और खरीदने के लिए. साथ में ये भी खरीद लाया. मेरे परिवार के दोस्तों में उन सभी को बहुत पसंद आया जो आध्यात्म के लिए अपना बहुत समय नहीं निकाल सकते और उन्हें लाभ भी चाहिए.इस पूरी पुस्तक को डाउनलोड करने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करे और पूरी पुस्तक को पढ़ कर लाभ उठाए. https://docdro.id/dFTMS4a
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शिवरात्रि महापूजन 2020 वीडियो
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शिवरात्रि महापूजन 2020श्री रामचंद्रेश्वर मंदिर, ग्राम गोबरदाहा, जिला-जमुई में शिवरात्रि 2020 के शुभ अवसर पर यह विशेष रुद्राभिषेक एवं महापूजन श्री अभिषेक जी एवं उनके परिवार के लोगो द्वारा संपन्न किया गया.इस महापूजन में उनके पुरे परिवार के लोग सम्मिलित हुए. साथ ही महिला मंडली द्वारा विशेष भजन-कीर्तन का आकर्षक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया गया.नीचे प्रस्तुत है इस महोत्सव की कुछ विशेष झलक संपूर्ण विडियो को youtube पर देखने हेतु नीचे दिए गए लिंकों पर क्लिक करें.विभिन्न देव वंदना : महापूजन का प्रारंभ 108 दुर्वंकुरान महाप्रयोगम : श्री गणपति महापुजनमशिव पूजन के पहले सर्व देव वंदना भगवान् शिव का षोडशोपचार पूजन नीलकंठास्त्र स्तोत्र से महारुद्राभिषेक : सम्पूर्ण शनि ग्रह शान्ति हेतु एवं शिव सायुज्य प्राप्ति हेतु माता दुर्गा का विशेष षोडशोपचार महापुजनमशिवरात्रि व्रत के महात्म्य पर श्री अभिषेक जी के श्रीमुख से संक्षिप्त प्रवचन एवं जानकारी हवन कार्यक्रम : ईशान मंत्र और दुर्गा मंत्रों से हवन हवन कार्यक्रम : महानवार्ण मंत्र से हवन हवन कार्यक्रम : सर्व ग्रह शांति मंत्र से हवन महिलाओ द्वारा भजन-कीर्तन का विशेष कार्यक्रम : भाग 1महिलाओ द्वारा भजन-कीर्तन का विशेष कार्यक्रम : भाग 2महिलाओ द्वारा भजन-कीर्तन का विशेष कार्यक्रम : भाग 3भक्तो द्वारा भजन-कीर्तन एवं नृत्य का विशेष कार्यक्रम महिलाओ द्वारा भजन-कीर्तन का विशेष कार्यक्रम : भाग 4महिलाओ द्वारा भजन-कीर्तन का विशेष कार्यक्रम : भाग 5महिलाओ द्वारा भजन कीर्तन का विशेष कार्यक्रम : भाग 6महिलाओ द्वारा भजन कीर्तन का विशेष कार्यक्रम : भाग 7महिलाओ द्वारा भजन-कीर्तन का विशेष कार्यक्रम : भाग 8महिलाओ द्वारा भजन-कीर्तन का विशेष कार्यक्रम : भाग 9महिलाओं के द्वारा भजन-कीर्तन का विशेष कार्यक्रम : भाग 10महिलाओ द्वारा भजन-कीर्तन का विशेष कार्यक्रम : भाग 11कलश विसर्जन : शोभा यात्रा - भाग 1कलश विसर्जन : शोभा यात्रा - भाग 2कलश विसर्जन : शोभा यात्रा - भाग 3कलश विसर्जन : शोभा यात्रा - भाग 4कलश विसर्जन : नदी के किनारे Part 1कलश विसर्जन : नदी के किनारे Part 2कलश विसर्जन : नदी के किनारे Part 3
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Navratra 2019 Photo : नवरात्र 2019 फोटो
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 नवरात्र 2019 फोटो : Navratra 2019 Photo
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Maha Vidya Sadhna : महाविद्या साधना
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दस महाविद्यायो पर सम्बंधित विशेष 61 महाप्रयोग परमपूज्य गुरुदेव श्री निखिलेश्वरानंद जी महाराज के दिव्य वचनों से चयनित दस महाविद्याओ से सम्बंधित विशेष 61 दिव्य महाप्रयोगप्रयोग की पुरी विधि जानने और Download करने के लिए दिए गए लिंक पर click  करें.https://docdro.id/gUth3ndदस महाविद्या प्रयोग  प्रस्तुति :- श्री अभिषेक कुमार 
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Navratra Muhurt 2019 : नवरात्र मुहूर्त 2019
Navratra Muhurt 2019 : नवरात्र मुहूर्त 2019  Guru Mahima GURU MAHIMA  #BLOG #EDUCRATSWEB | In this article, you can see photos & images. Moreover, you can see new wallpapers, pics, images, and pictures for free download. On top of that, you can see other  pictures & photos for download. For more images visit my website and download photos.
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नवरात्र मुहूर्त 2019 (सम्पूर्ण नवरात्र महापुजनम)आश्विन शुक्ल शारदीय नवरात्रि २०१९ के संपूर्ण मुहूर्त की जानकारी और Download करने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें.https://docdro.id/gPTe5Viइसे आपकी सुविधा हेतु पूर्ण रूप से प्रिंट फ्रेंडली बनाया गया है. इसे आप पेपर के दोनों साइड प्रिंट करे. इसे पुस्तक के तरह पिन कर लें और नवरात्रि के पूजन में मुहूर्तो की जानकारी हेतु उपयोग करें.कलश स्थापना कर माता जगदम्बा की पूजा-अर्चना करते हुए श्री अभिषेक कुमार.आपकी जानकारी हेतु बता दूं कि इस पुस्तिका के निर्माण में श्री विश्व हिन्दू पंचाग एवं दृक पंचांग का विशेष सहयोग लिया गया है। इसके अलावा कुछ और भी पंचांगों का अध्ययन किया गया है। बाजार में जो पंचांग बहुतायत में प्रचलित हैं, वे मेरी सत्यता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। कोई जरूरी नहीं कि सारी दुनिया जिधर चल रही है, मैं भी उधर ही चलूं। कभी-कभी कोई काम स्वयं के तृप्ति हेतु भी किया जाता है। बाजार में जितने भी पंचांग मुझे देखने को मिले, सब के गणित गणना में बहुत अंतर था। तिथियों एवं नक्षत्रों के समय निर्धारण में तो दो-दो, तीन-तीन घंटे तक का अंतर और कभी-कभी तो पाँच-छः घंटे का भी अंतर देखने को मिला। एक ही तिथि एवं मुहूत्र्त के निर्धारण में कोई भी दो पंचांग मेल नहीं खाते। यह बड़ा ही भ्रम की स्थिति है। आखिर किस पर विश्वास किया जाय। निश्चित ही यह आधुनिक कालगणना करने वाले ज्योतिषियों और गणितज्ञों की बड़ी विफलता कही जा सकती है। इस पर विशेष विचार की आवश्यकता प्रतीत होती है। इन मुहूत्र्तों के निर्धारण में मेरे ज्योतिषिय गणितीय गणना की कसौटी पर श्री विश्व हिंदू पंचांग बहुत हद तक खरा उतरा। सच कहूँ, तो शब्द उनके और लिखावट मात्र मेरी है। यह भी बहुत हद तक संभव है कि हमारे पंडित लोग जिन पंचांगों को आधार मानकर मुहूत्र्त निर्धारण करते हैं, उनसे मेरा मुहूत्र्त निर्धारण मेल न खाए। अतः इस परिस्थिति में आपसे निवेदन है कि अपने विश्वास से ही मुहूत्र्तों का चयन करें। गलती एवं भूल-चूक मनुष्य के मस्तिष्क का विषय है। कोई जरूरी नहीं कि जिस पंचांग पर मैंने विश्वास किया, वो आपके भी विश्वास पर खरा ही उतरे। फिर भी, विश्वसनीयता एवं सत्यता के नजदीक मेरी गणना रहे, इसकी भरसक कोशिश रहती है। हमारा यह प्रयास आपको कैसा लगा, कृपा करके अपने टिप्पणियों से हमारे वेबसाईट पर अवगत अवश्य करवाईएगा। आपकी प्रत्येक आलोचना स्वीकार है। वास्तव में ये उन साधकों एवं भक्तों के लिए है, जो स्वयं कुछ करना चाहते हैं, पर भाषा ज्ञान उनके लिए बाध्यकारी बन जाता है। --- आपका ही अभिषेक कुमार (Mob:-9852208378, 9525719407)
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Navratri Mahapujan Bali : नवरात्र पूजा में महाबलि करते हुए श्री अभिषेक कुमार
Navratri Mahapujan Bali : नवरात्र पूजा में महाबलि करते हुए श्री अभिषेक कुमार  Guru Mahima GURU MAHIMA  #BLOG #EDUCRATSWEB | In this article, you can see photos & images. Moreover, you can see new wallpapers, pics, images, and pictures for free download. On top of that, you can see other  pictures & photos for download. For more images visit my website and download photos.
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दुर्गापूजा (शारदीय नवरात्र) में नवमी के दिन पूजन की पूर्णता पर नारियल की महाबलि करते हुए श्री अभिषेक कुमारhttps://youtu.be/gchE2GDXIL4देवी पूजन के अंत में पूजा की पूर्णता होने पर सामान्य रूप से बलि क्रिया संपन्न की जाती है. नवरात्री पूजन के उपरांत श्री अभिषेक जी द्वारा माता की प्रसन्नता हेतु नारियल की बलि विशेष मंत्रो से की गयी
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मंत्रों का विशिष्ट विज्ञान
मंत्रों का विशिष्ट विज्ञान Guru Mahima GURU MAHIMA  #BLOG #EDUCRATSWEB | In this article, you can see photos & images. Moreover, you can see new wallpapers, pics, images, and pictures for free download. On top of that, you can see other  pictures & photos for download. For more images visit my website and download photos.
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मंत्रों का विशिष्ट विज्ञान‘’मननात् त्रायते इति मंत्र’ अर्थात् जिसके मनन से त्राण मिले, वह मंत्र है। मंत्र अक्षरों का ऐसा दुर्लभ, विशिष्ट एवं अनोखा संयोग है, जो चेतना जगत को आंदोलित, आलोड़ित एवं उद्वेलित करने में सक्षम होता है। मंत्रविद्या से कुछ भी संभव हो सकता है | अतएव संभव होता भी है। इस विद्या से असाध्य सहज ही साध्य होता है। जो इस विद्या के सिद्धांत एवं प्रयोगों से परिचित हैं, वे प्रकृति की शक्तियों को मनोनुकूल मोड़ने, मरोड़ने में समर्थ होते हैं। वे प्रारब्ध के साथ खेल खेलते हैं। जीवन की अकाट्य कर्मधाराओं को अपनी इच्छित दिषा में मोड़ने और प्रवाहित होने के लिए विवष कर देते हैं। यह अतिश्योक्ति नहीं, एक यथार्थ है।मंत्र का यदि कोई अर्थ खोजे तो उसे वहाँ अर्थ मिल भी सकता है और नहीं भी, क्योंकि मंत्र की संरचना, बनावट एवं बुनावट अपने ढंग से होती है। बुद्धिमान व्यक्ति मंत्र को पवित्र विचार के रूप में परिभाषित करते हैं। उनका ऐसा कहना, मानना अनुचित नहीं है, क्योंकि मंत्र के माध्यम से अपने इष्ट से पवित्र भाव एवं विचार के साथ प्रार्थना की जाती है, परंतु इसके बावजूद मंत्र की परिभाषाओं की अपनी एक सीमा होती है और इस सीमा में मंत्र को परिभाषित कर पाना लगभग असंभव जैसा है। मंत्र की परिभाषा में मंत्र के सभी आयाम नहीं समा सकते, क्योंकि मंत्र बहुआयामी होता है। दरअसल मंत्र के अक्षरों का संयोजन इस ढंग से होता है कि उससे कोई अर्थ प्रकट होता है, परंतु कई बार यह संयोजन इतना अटपटा होता है कि इसका कोई अर्थ नहीं खोजा जा सकता।मंत्रवेत्ता ही मंत्र की संरचना और उसके प्रभाव के बारे में स्पष्ट जानकारी दे सकते हैं। केवल उन्हें ही इसकी समग्र जानकारी होती है। दरअसल मंत्रवेत्ता मंत्र की संरचना किसी विषेष अर्थ या विचार को स्थान में रखकर नहीं करते। वे तो बस, ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का किसी विषेष धारा से संपर्क, आकर्षण, धारण और उसके सार्थक नियोजन की विधि के विकास के रूप में करते हैं।मंत्रवेत्ता कोई भी नहीं हो सकता है और यहाँ तक कि कोई अतिशय बुद्धिमान व्यक्ति भी मंत्र की रचना करने में समर्थ नहीं होता है। मंत्रवेत्ता वही हो सकता है, जो तप-साधना के शिखर पर आरूढ़ हो और जिसकी दृष्टि सूक्ष्म एवं व्यापक, दोनों ही हो। मंत्रवेत्ता को ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के नियमों एवं विधानों के बारे में पता होता है और वे मंत्र के द्वारा इस ऊर्जा का किसी विशेष प्रयोजन हेतु नियोजन करने की क्षमता रखते हैं। अतः मंत्र कोई भी हो, वैदिक अथवा पौराणिक या फिर तांत्रिक, इसी विधि के रूप में प्रयुक्त होता है।मंत्रवेत्ता अपनी साधना के माध्यम से ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विभिन्न एवं विशिष्ट धाराओं को देखते हैं। ब्रह्माण्ड में ऊर्जाओं की विविध धाराएं प्रवाहित होती रहती हैं। ये कुछ ऐसा है- जैसे कुशल इंजीनियर धरती के अंदर जलस्तर को देखता है और वहाँ तक खोदकर मोटे पाईप के माध्यम से वहाँ का जल निकाल लेता है। ठीक उसी तरह से मंत्रवेत्ता ब्रह्माण्ड में प्रवाहित इन विभिन्न ऊर्जाधाराओं से संपर्क साधकर और इस ऊर्जा का विशिष्ट नियोजन करके मंत्र की संरचना करते हैं। मंत्र की अधिष्ठात्री शक्तियाँ जिन्हें देवी या देवता कहा जाता है, उन्हें प्रत्यक्ष करते हैं। इस प्रत्यक्ष के प्रतिबिम्ब के रूप में मंत्र का संयोजन उनकी भावचेतना में प्रकट होता है। इसे ऊर्जाधारा या देवषक्ति का शब्दरूप भी कह सकते हैं। मंत्रविद्या में इसे देवषक्ति का मूलमंत्र कहते हैं।देवशक्ति के ऊर्जा अंश के किस आयाम को और किस प्रयोजन के लिए ग्रहण-धारण करना है उसी के अनुरूप इस देवता के अन्य मंत्रों का विकास होता है। यही कारण है कि एक देवता या देवी के अनेकों मंत्र होते हैं, जैसे राहु देवता का बीजमंत्र, वैदिक मंत्र, पौराणिक मंत्र अलग-अलग होते हैं। इनका प्रभाव भी अलग-अलग होता है। इनमें से प्रत्येक मंत्र अपने विशिष्ट प्रयोजन को सिद्ध व सार्थक करने में समर्थ होता है। कुछ मंत्र इतने प्रभावशाली होते हैं कि उनके जप के साथ ही उनके प्रभाव और परिणाम दृष्टिगोचर होने लगते हैं। इस संदर्भ में बीजमंत्रों को लिया जा सकता है, जिसके प्रभाव त्वरित व अल्पकालिक होते हैं। वैदिक मंत्रों का प्रभाव लंबे समय के बाद परंतु दीर्घकालिक होता है।प्रक्रिया की दृष्टि से मंत्र की कार्यशैली अद्भुत एवं अनोखी है। इसकी साधना का एक विषिष्ट क्रम पूरा होते ही यह साधक की चेतना का संपर्क ब्रह्माण्ड की विषिष्ट ऊर्जाधारा या देवशक्ति से कर देता है। यह इसके कार्य का पहला आयाम है। इसके दूसरे आयाम के रूप में यह साथ-ही-साथ साधक के अस्तित्व या व्यक्तित्व को उस विषिष्ट ऊर्जाधारा अथवा देवषक्ति के लिए ग्रहणशील बनाता है। मंत्र से साधक का व्यक्तित्व प्रभावित ही नहीं होता है, बल्कि उसके कतिपय गुह्य केंद्र जाग्रत हो जाते हैं। ये जाग्रत केंद्र सूक्ष्मशक्तियों को ग्रहण करने, धारण करने में एवं उनका निर्माण करने में समर्थ होते हैं। ऐसी स्थिति में ही मंत्र सिद्ध होता है।मंत्र-साधना की एक अपनी प्रक्रिया होती है। हर साधक के अनुसार मंत्र का चयन होता है और यह चयन साधक एवं मंत्र की प्रकृति के अनुरूप होता है। इस तरह मंत्र को सिद्ध करने के लिए मंत्र की  प्रकृति के अनुसार अपने जीवन की प्रकृति बनानी पड़ती है। मंत्र साधना के विधि-विधान के सम्यक् निर्वाह के साथ साधक को अपने खान-पान, वेष-विन्यास, आचरण-व्यवहार को देवता या देवी की प्रकृति के अनुसार ढालना पड़ता है। उदाहरण के लिए बगलामुखी मंत्र की साधना के लिए पीले वस्त्र एवं पीले आसन, पीले प्रकाष एवं पीले खान-पान को अपनाना पड़ता है। इस मंत्र को पीली चीजों से बनी माला से जपना होता है। तभी इस मंत्र का सार्थक प्रभाव पड़ता है। चंद्रमा एवं शुक्र मंत्र के लिए श्वेत वस्त्र, श्वेत आसन एवं श्वेत खान-पान की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा आचारण-व्यवहार में भी पवित्रता का सम्यक् समावेष जरूरी है। इन सब चीजों को अपनाकर मंत्र सिद्ध होता है, उसके प्रभाव परिलक्षित होते हैं।मंत्रों की अपनी-अपनी प्रकृति होती है और ये अपनी प्रकृति के अनुसार न केवल व्यक्तित्व पर प्रभाव डालते हैं, बल्कि ये प्रकृति में भी अपनी छाप छोड़ते हैं। सूर्यमंत्र के एक विषिष्ट विधान से सूर्य की ऊर्जा का संदोहन किया जा सकता है। इससे सूर्य का तापक्रम घटने लगता है और धरती में शीतलता बढ़ने लगती है। इस प्रयोग से प्रकृति एवं पर्यावरण में भारी उथल-पुथल हो सकती है। ऐसे प्रयोग अनेकों बार किए भी जा चुके हैं। मनुष्य के अंदर स्थित कुंडलिनी के स्थान पर धरती की अपनी एक कुंडलिनी है, जो उत्तरी ध्रुव से निकलकर दक्षिणी ध्रुव तक एक रेखा के रूप में पहुंचती है। इसे भी मंत्र विधान से जाग्रत किया जा सकता है। यह प्रक्रिया भी की जा चुकी है।मंत्र प्रकृति की ऊर्जा का संदोहन एवं संरक्षण या पोषण करता है। कुछ तांत्रिक मंत्रों की प्रकृति और तीव्रता इतनी अधिक होती है कि इससे प्रकृति की ऊर्जा का दोहन होने लगता है। तांत्रिक मंत्र प्रकृति की ऊर्जा का बुरी तरह से दोहन एवं शोषण करते हैं। इसलिए तांत्रिक मंत्रों के प्रयोग से प्रकृति में घोर उथल-पुथल एवं असंतुलन पैदा हो जाता है। इसके लिए ऐसे विधान किए जाते हैं, जिनसे प्रकृति को पोषण मिलता रहे। इन मंत्रों से प्रकृति पोषित होती है तथा इसका विकास होता है। इन मंत्रों में गायत्री मंत्र, महामृत्यंजय मंत्र आदि आते हैं। विशिष्ट मंत्रों से किए जाने वाले यज्ञ-हवन से भी प्रकृति पोषित होती है।साधक अपने मंत्र को सिद्ध कर असंभव को संभव करता है, असाध्य को साध्य करता है और मनचाहे ढंग से अपने संकल्प के अनुसार उसका नियोजन कर सकता है। मंत्र की शक्ति एवं प्रकृति के अनुसार वह स्वयं की गंभीर समस्याओं के साथ ही दूसरों की असाध्य बीमारियों को भी ठीक कर सकता है। अतः प्रकृति के अनुसार मंत्रों का चयन कर विधि-विधान से मंत्र का जप करना चाहिए।
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ईश्वर को जानने की प्रक्रिया है ध्यान
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ईश्वर को जानने की प्रक्रिया है ध्यान         ईश्वर को पाना संभव है। उन्हें कर्मयोग के माध्यम से जाना जा सकता है। अगर ईश्वर को जानना है और उन्हें पाना है, तो उन्हें अपने हृदय में पहले स्थान पर रखना होगा। उन्हें बिना किसी स्वार्थ के पुकारना होगा। इस स्थिति तक पहुंचने के लिए ध्यान सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। कर्म, ज्ञान व भक्ति को संयुक्त और संतुलित करने की प्रक्रिया है ध्यान:-सर्वप्रथम आपको ईश्वर की एक सही धारण रखनी चाहिए, एक निश्चित विचार, जिसके द्वारा आप उनके साथ एक संबंध स्थापित कर सकें। तत्पश्चात् आपको ध्यान एवं प्रार्थन तब तक करनी चाहिए, जब तक कि आपकी मानसिक धारणा वास्तविक प्रत्यक्ष बोध में न बदल जाए। तब आप उन्हें जान पाएंगे। अगर आप दृढ़ता से डटे रहेंगे, तो ईश्वर अवश्य आएंगे। सबके हृदय को को जानने वाले प्रभु केवल आपके सच्चे प्रेम को चाहते हैं। वे एक छोटे बच्चे की भाँति हैं, उनको कोई आनी सारी संपत्ति भेंट कर सकता है और व उसे नहीं चाहते और दूसरा कोई उनको पुकारता है, ‘हे प्रभो! मैं आपको प्रेम करता हूँ! और उस भक्त की पुकार पर उसके हृदय में वे दौड़े चले आते हैं। ईश्वर को किसी बाह्य उद्देश्य से न खोजें, अपितु उनसे निःशर्त्त, एक लक्षित अविचल भक्ति से प्रार्थना करें। जब प्रभु के लिए आपका प्रेम इतना अधिक हो जाए, जितना कि अपनी नश्वर देह के प्रति आसक्ति, तब वे आपके पास आ जाएंगे। ईश्वर की खोज में भक्ति का महत्व कर्म से अधिक है। कुछ लोग कहते हैं, ‘ईश्वर शक्ति हैं, अतः हमें भी शक्ति के साथ कर्म करना चाहिए।’ जब आप अपने हृदय में ईश्वर को सर्वोच्च स्थान देते हुए अच्छे कर्म करने में सक्रिय होते हैं, तो इस प्रकार आप उनको अनुभव कर सकेंगे। परंतु अच्छा करने में भी गलत और सही, दोनों प्रकार के कर्म होते हैं। एक उत्साही पादरी, जो अपनी सभा में अधिक से अधिक लोगों को केवल अपने अहम को संतुष्ट करने के लिए आकर्षित करता है, वह इस कर्म के द्वारा ईश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकता। दिव्य अन्तर्निवासी की उपस्थिति को अनुभव करने की इच्छा प्रत्येक हृदय में प्रथम स्थान पर होनी चाहिए। जब आपके प्रत्येक कार्य निरंतर, निःस्वार्थ भाव से और प्रेम प्रेरित ईश्वर चिंतन के साथ करेंगे, तब वे आपके पास आएंगे। तब आपको अनुभव होगा कि आप जीवन-रूपी सागर हैं, जो प्रत्येक जीवन-रूपी छोटी लहर में बदल गए हैं। यही कर्मयोग के द्वारा ईश्वर को जानने का तरीका है। जब आपके मन में प्रत्येक कार्य करने से पहले, कार्य करने के दौरान और कार्य पूरा करने के बाद प्रभु का विचार बना रहे, तब वे स्वयं आपको दर्शन देंगे। आपको कार्यरत रहना होगा, परंतु ईश्वर को अपने माध्यम से कार्य करने दें, यह भक्ति का सबसे अच्छा पक्ष है। यदि आप निरंतर यह सोच रहे हैं कि वे आपके पैरों द्वारा चल रहे हैं, आपके हाथों के द्वारा कार्य कर रहे हैं, आपकी इच्छाशक्ति के माध्यम से कार्य संपादित कर रहे हैं, तब आप उन्हें जान लेंगे। आपको विवेक भी विकसित करना चाहिए, ताकि आप ईश्वर चिंतन के बिना किए गए कार्यों की अपेक्षा आध्यात्मिक रूप से रचनात्मक एवं ईश-चेतना से युक्त हर कार्य करने को प्राथमिकता दें।श्रेष्ठतर कर्म है ध्यान:- परंतु कर्म, भक्ति अथवा ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठतर है। सच्चाई से ध्यान करने का अर्थ है-केवल ब्रह्म पर एकाग्र होना। यह अंतरंग ध्यान है। यह उच्चतम प्रकार का कर्म है, जिसे मानव कर सकता है और यह ईश्वर को पाने का अत्यधिक संतुलित मार्ग है। यदि आप हर समय कार्य करते रहें, तो आप यंत्रवत् बन सकते हैं और अपने कर्त्तव्यों की व्यस्तता में उन्हें भूल सकते हैं। यदि उन्हें केवल विवेक द्वारा खोजें, तो आप असंख्य तर्कों की भूलभुलैया में उसे खो देंगे; और यदि आप केवल ईश्वर की भक्ति करते हैं, तो आपका विकास मात्र भावनात्मक हो सकता है। परंतु ध्यान इन सब पद्धतियों को संयुक्त और संतुलित करता है। केवल प्रभु के लिए कार्य करें, भोजन करें, चलें, हंसे, रोएं और ध्यान करें। जीने का यही सर्वोत्तम रीति है। इस प्रकार, उनके लिए सेवा करके, उनसे प्रेम करके और उनके साथ वार्तालाप करके आप वास्तव में प्रसन्न रहेंगे। जब तक आप अपनी इच्छाओं और भौतिक शरीर की कमजोरियों को अपने विचारों और कार्यों पर नियंत्रण करने देंगे, तब तक आप उन्हें नहीं पा सकेंगे। सदा अपने शरीर के स्वामी बने रहें। जब आप मंदिर या चर्च में बैठते हैं, तो हो सकता है आप कुछ भक्ति और विवेकशील ज्ञान का अनुभव करें, परंतु वह पर्याप्त नहीं है। यदि आप उनकी उपस्थिति के प्रति वास्तव में सचेत रहना चाहते हैं, तो ध्यान की अंतरंग क्रिया आवश्यक है। आप ऐसा सोच सकते हैं कि दो घंटे के ध्यान के पश्चात् मैं बुरी तरह उकता जाता होऊंगा। नहीं, मुझे इस संसार में अपने प्रभु के समान मतवाला कर देने वाला और कुछ नहीं मिला। जब मैं अपनी आत्मा की उस परिपक्व मदिरा का पान करता हूँ, तो मेरा हृदय आकाशतुल्य असीम आनंद से स्पन्दित होने लगता है। दिव्य आनंद प्रत्येक व्यक्ति में है। कोयले और हीरे पर सूर्य का प्रकाश एक समान चमकता है, परंतु हीरा प्रकाश को परावर्तित करता है। ऐसे ही वे पारदर्शी मन हैं, जो ब्रह्म को जानते हैं और परावर्तित करते हैं। इसी प्रकार, ध्यान की अंतरंग क्रिया में आप ईश्वर को जानने रहस्य का समाधान पाते हैं।                                    --- श्री श्री परमहंस योगानदं(योगदा सत्संग सोसायटी ऑफ इंडिया के सौजन्य से)
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नवरात्र पूजा में महाबलि करते हुए श्री अभिषेक कुमार
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दुर्गापूजा (शारदीय नवरात्र) में नवमी के दिन पूजन की पूर्णता पर नारियल की महाबलि करते हुए श्री अभिषेक कुमारhttps://youtu.be/gchE2GDXIL4
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अग्रसेन महाराज की जीवन गाथा
अग्रसेन महाराज की जीवन गाथा  Guru Mahima GURU MAHIMA  #BLOG #EDUCRATSWEB | In this article, you can see photos & images. Moreover, you can see new wallpapers, pics, images, and pictures for free download. On top of that, you can see other  pictures & photos for download. For more images visit my website and download photos.
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'जाने भगवान श्री अग्रसेन जी का ऐतिहासिक इतिहास''धार्मिक मान्यतानुसार इनका जन्म मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम की चौंतीसवी पीढ़ी में सूर्यवशीं क्षत्रिय कुल के महाराजा वल्लभ सेन के घर में द्वापर के अन्तिमकाल और कलि_युग के प्रारम्भ में आज से 5185 वर्ष पूर्व हुआ था। उनके राज में कोई दुखी या लाचार नहीं था। बचपन से ही वे अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बली प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालू राजा थे। भगवान अग्रसेन एक क्षत्रिय सूर्यवंशी राजा थे। जिन्होंने प्रजा की भलाई के लिए वणिक धर्म अपना लिया था। इनका जन्म द्वापर युग के अंतिम भाग में महाभारत काल में हुआ था। ये प्रतापनगर के राजा बल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे।विवाहसमयानुसार युवावस्था में उन्हें राजा नागराज की कन्या राजकुमारी माधवी के स्वयंवर में शामिल होने का न्योता मिला। उस स्वयंवर में दूर-दूर से अनेक राजा और राजकुमार आए थे। यहां तक कि देवताओं के राजा इंद्र भी राजकुमारी के सौंदर्य के वशीभूत हो वहां पधारे थे। स्वयंवर में राजकुमारी माधवी ने राजकुमार अग्रसेन के गले में जयमाला डाल दी। यह दो अलग-अलग संप्रदायों, जातियों और संस्कृतियों का मेल था। जहां अग्रसेन सूर्यवंशी थे वहीं माधवी नागवंश की कन्या थीं।इंद्र से टकरावइस विवाह से इंद्र जलन और गुस्से से आपे से बाहर हो गये और उन्होंने प्रतापनगर में वर्षा का होना रोक दिया। चारों ओर त्राहि-त्राही मच गयी। लोग अकाल मृत्यु का ग्रास बनने लगे। तब l भगवान अग्रसेन ने इंद्र के विरुद्ध युद्ध छेड दिया। चूंकि अग्रसेन धर्म-युद्ध लड रहे थे तो उनका पलडा भारी था जिसे देख देवताओं ने नारद ऋषि को मध्यस्थ बना दोनों के बीच सुलह करवा दी।तपस्याकुछ समय बाद भगवान अग्रसेन ने अपने प्रजा-जनों की खुशहाली के लिए काशी नगरी मैं जाकर शिवजी की घोर तपस्या की, जिससे भगवान शिव ने प्रसन्न हो उन्हें माँ लक्ष्मी की तपस्या करने की सलाह दी। माँ लक्ष्मी ने परोपकार हेतु की गयी तपस्या से खुश हो उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अपना एक नया राज्य बनाएं और वैश्य परम्परा के अनुसार अपना व्यवसाय करें तो उन्हें तथा उनके लोगों या अनुयायियों को कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होगी।अग्रोहा राज्य की स्थापनाअपने नये राज्य की स्थापना के लिए भगवान अग्रसेन ने अपनी रानी माधवी के साथ सारे भारतवर्ष का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें एक जगह शेर तथा भेडिये के बच्चे एक साथ खेलते मिले। उन्हें लगा कि यह दैवीय संदेश है जो इस वीरभूमि पर उन्हें राज्य स्थापित करने का संकेत दे रहा है। ॠषि मुनियों और ज्योतिषियों की सलाह पर नये राज्य का नाम अग्रेयगण रखा गया जिसे अग्रोहा नाम से जाना जाता है। वह जगह हरियाणा के हिसार के पास हैं। आज भी यह स्थान अग्रवाल समाज के लिए तीर्थ स्थान के समान है। यहां भगवान अग्रसेन माता माधवी और कुलदेवी माँ लक्ष्मी जी का भव्य मंदिर है।समाजवाद का अग्रदूतभगवान अग्रसेन जी को समाजवाद का अग्रदूत कहा जाता है। अपने क्षेत्र में सच्चे समाजवाद की स्थापना हेतु उन्होंने नियम बनाया कि उनके नगर में बाहर से आकर बसने वाले व्यक्ति की सहायता के लिए नगर का प्रत्येक निवासी उसे एक रुपया व एक ईंट देगा, जिससे आसानी से उसके लिए निवास स्थान व व्यापार का प्रबंध हो जाए। भगवान अग्रसेन ने तंत्रीय शासन प्रणाली के प्रतिकार में एक नयी व्यवस्था को जन्म दिया, उन्होंने पुनः वैदिक सनातन आर्य सस्कृंति की मूल मान्यताओं को लागू कर राज्य की पुनर्गठन में कृषि-व्यापार, उद्योग, गौपालन के विकास के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा का बीड़ा उठाया।इस तरह भगवान अग्रसेन के राजकाल में अग्रोहा ने दिन दूनी- रात चौगुनी तरक्की की। कहते हैं कि इसकी चरम स्मृद्धि के समय वहां लाखों व्यापारी रहा करते थे। वहां आने वाले नवागत परिवार को राज्य में बसने वाले परिवार सहायता के तौर पर एक रुपया और एक ईंट भेंट करते थे, इस तरह उस नवागत को लाखों रुपये और ईंटें अपने को स्थापित करने हेतु प्राप्त हो जाती थीं जिससे वह चिंता रहित हो अपना व्यापार शुरु कर लेता था।अठारह यज्ञकुलदेवी माता लक्ष्मी की कृपा से भगवान अग्रसेन के 18 पुत्र हुये। राजकुमार विभु उनमें सबसे बड़े थे। महर्षि गर्ग ने भगवान अग्रसेन को 18 पुत्र के साथ 18 यज्ञ करने का संकल्प करवाया। माना जाता है कि यज्ञों में बैठे 18 गुरुओं के नाम पर ही अग्रवंश (अग्रवाल समाज) की स्थापना हुई। यज्ञों में पशुबलि दी जाती थी। प्रथम यज्ञ के पुरोहित स्वयं गर्ग ॠषि बने, राजकुमार विभु को दीक्षित कर उन्हें गर्ग गोत्र से मंत्रित किया। इसी प्रकार दूसरा यज्ञ गोभिल ॠषि ने करवाया और द्वितीय पुत्र को गोयल गोत्र दिया। तीसरा यज्ञ गौतम ॠषि ने गोइन गोत्र धारण करवाया, चौथे में वत्स ॠषि ने बंसल गोत्र, पाँचवे में कौशिक ॠषि ने कंसल गोत्र, छठे शांडिल्य ॠषि ने सिंघल गोत्र, सातवे में मंगल ॠषि ने मंगल गोत्र, आठवें में जैमिन ने जिंदल गोत्र, नवें में तांड्य ॠषि ने तिंगल गोत्र, दसवें में और्व ॠषि ने ऐरन गोत्र, ग्यारवें में धौम्य ॠषि ने धारण गोत्र, बारहवें में मुदगल ॠषि ने मन्दल गोत्र, तेरहवें में वसिष्ठ ॠषि ने बिंदल गोत्र, चौदहवें में मैत्रेय ॠषि ने मित्तल गोत्र, पंद्रहवें कश्यप ॠषि ने कुच्छल गोत्र दिया। 17 यज्ञ पूर्ण हो चुके थे। जिस समय 18 वें यज्ञ में जीवित पशुओं की बलि दी जा रही थी, भगवान अग्रसेन को उस दृश्य को देखकर घृणा उत्पन्न हो गई। उन्होंने यज्ञ को बीच में ही रोक दिया और कहा कि भविष्य में मेरे राज्य का कोई भी व्यक्ति यज्ञ में पशुबलि नहीं देगा, न पशु को मारेगा, न माँस खाएगा और राज्य का हर व्यक्ति प्राणीमात्र की रक्षा करेगा। इस घटना से प्रभावित होकर उन्होंने क्षत्रिय धर्म त्याग कर वणिक धर्म को अपना लिया। अठारवें यज्ञ में नगेन्द्र ॠषि द्वारा नांगल गोत्र से अभिमंत्रित किया।ॠषियों द्वारा प्रदत्त अठारह गोत्रों को भगवान अ
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संपूर्ण हवन विधि
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संपूर्ण हवन विधि हवन की पुरी विधि जानने और Download करने के लिए दिए गए लिंक पर click  करें. संपूर्ण हवन विधि पटन देवी मंदिर में हवन करते हुए श्री अभिषेक जी विभिन्न प्रकार के हवन कुंड धनुष कुंडनारायण अस्त्र कुंडभद्रकाली प्रत्यंगिरा प्रयोग कुंड योनी कुंडशत्रु नाशक कुंडस्वस्तिक कुंडस्वस्तिक सुदर्शन कुंड
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शक्ति अनुसन्धान केंद्र में हवन
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शक्ति अनुसन्धान केंद्र में हवन दिनांक २८ जुलाई २०१९ को भगवान शिव का पूजन करने के पश्चात लघु मृत्युंजय मंत्र से हवन करते हुए श्री अभिषेक जी.
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संयुक्त यन्त्र : श्री गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती के एक साथ पूजन का यन्त्र और पूजन विधि
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संयुक्त यन्त्र : श्री गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती के एक साथ पूजन का यन्त्र और पूजन विधिपूजन की पुरी विधि जानने और Download करने के लिए दिए गए लिंक पर click  करें.https://docdro.id/nvBlBmV
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सुलभ सामग्री : दुर्लभ प्रयोग
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सुलभ सामग्री : दुर्लभ प्रयोग आध्यात्म के अनेक रूप है, अनेक पहलू है. हर किसी से आध्यात्म का विशुद्ध रूप संभवनहीं है. इस पुस्तक में जन-सामान्य के लिए छोटे-छोटे वैसे प्रयोग सम्मिलित किये गए है, जो हमारे आस-पास आसानी से उपलब्ध है. इन छोटे टोटको का उपयोग व्यक्ति अपनी सामान्य समस्याओ के समाधान के लिए वैसी परिस्थिति में करते है, जब जिंदगी के सामान्य नियमो से काम नहीं चलते, उसका उपाय नहीं मिलता है. चलते-चलते यूं ही खो जाता हूँ मै. चलते-चलते ये किताब भी वैसे ही मिल गयी थी. गया था कुछ और खरीदने के लिए. साथ में ये भी खरीद लाया. मेरे परिवार के दोस्तों में उन सभी को बहुत पसंद आया जो आध्यात्म के लिए अपना बहुत समय नहीं निकाल सकते और उन्हें लाभ भी चाहिए.इस पूरी पुस्तक को डाउनलोड करने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करे और पूरी पुस्तक को पढ़ कर लाभ उठाए. सुलभ सामग्री: दुर्लभ प्रयोग
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पूजा के नियम : सामान्य पूजन विधि
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पूजा के नियम : सामान्य पूजन विधि इस पेज में मैंने पूजन करने की सामान्य विधि का वर्णन किया है. ये परम पूज्य रामकृष्ण परमहंस द्वारा प्रतिपादित तांत्रिक पद्धति है. राम कृष्ण मिशन में इसी पद्धति से श्री परम हंस जी क पूजन किया  जाता है. इस विधि से आप किसी भी देवी-देवता का सामान्य या विशेष पूजन कर सकते है.यह पूरा पीडीएफ में संकलित है. इसे डाउनलोड करने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करे (विजिट करे) https://docdro.id/TosSgdM
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शिवरात्रि पूजन : प्राण प्रतिष्ठा सामारोह
शिवरात्रि पूजन : प्राण प्रतिष्ठा सामारोह Guru Mahima GURU MAHIMA  #BLOG #EDUCRATSWEB | In this article, you can see photos & images. Moreover, you can see new wallpapers, pics, images, and pictures for free download. On top of that, you can see other  pictures & photos for download. For more images visit my website and download photos.
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शक्ति अनुसन्धान केंद्र के उद्देश्य और कार्य
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About Us (हमारे बारे में)शक्ति अनुसन्धान केंद्र के उद्देश्य और कार्य 
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Shri Yantra : श्री यन्त्र
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श्री यन्त्र महा प्रयोगमश्री यन्त्र के बारे में श्री अभिषेक जी के कलम से इन प्रयोगों को संपन्न कर के आप अपनी दरिद्रता से अभावो से मुक्ति पा सकते है. माता त्रिपुर सुंदरी की कृपा प्राप्ति के अद्भूत एवं दुर्लभ प्रयोग Download करने के  लिए visit करे https://docdro.id/o3kVCjX
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सूर्य पूजा : Surya Puja
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भगवान् सूर्य को प्रत्येक दिन जलार्ध्य देने की सुगम विधि 
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